रविवार, 13 दिसंबर 2009

डाक-डिब्बे का शव ..


लिखा है...पिनकोड उपयोग किजिए।
उपयोग तो हो रहा है, मगर पिनकोड के लिए नहीं बल्कि पत्थरों के लिए। क्या ट्विटर वाले तो ये पत्थर नहीं फैंक गए हैं? या फिर ई-मेल या एसएमएस वाले? ये लाल-काला डिब्बा कितनी जिंदगियों के बिछोह और मिलन के संदेश अपने में समेटे रहता था, ये बात आज कुछ के लिए समझना असंभव है। जिस दिन से यहां पिनकोड और चिट्ठी-पत्री की जगह पत्थर पड़ने लगे उसी दिन से हम जुड़कर भी अलग हैं, मिलन में भी बिछड़े हुए हैं, खुश होकर भी दुखी हैं, मैसेज पाकर भी संदेश हीन हैं, अपनों के होते हुए भी बिना अपनत्व के हैं।

बड़ा दुख होता है यह सोचकर ही कि वह वक्त यूं ही भूला दिया गया। वो चिट्ठियां भेजने का सिलसिला यूं ही खत्म कर दिया गया। हमारे अपने पास होकर भी कितने दूर हो गए। सभी हमारी जेब के जरिए हमसे संपर्क में हैं फिर भी हम अपनों का हाल नहीं जान पा रहे हैं।

बचे अवशेष ...


लिखा है...
सिर्फ़ एक रुपये में नव दुनिया .. मिडिया प्रा. लि. इंदौर का प्रकाशन ।

रविवार, 6 दिसंबर 2009

मध्य प्रदेश में अब निकाय चुनावो का संग्राम...............







मध्य प्रदेश का चुनावी पारा सातवे आसमान पर है .... राज्य में होने जा रहे नगर निगम चुनावो में सत्तारुद भाजपा और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस एक बार फिर आमने सामने है ... लोक सभा चुनावो में भाजपा की घटी सीटो ने जहाँ मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान की मुसीबतों को बदा दिया है ,वही गुटबाजी की शिकार कांग्रेस कि सीटो में इजाफा होने से कार्यकर्ताओ की बाछें खिल गई है ...


इस बार भी दोनों के बीच मुकाबला रोमांचक होने के आसार दिखाई दे रहे है..... राज्य में तीसरी ताकतों के कोई प्रभाव नही होने से असली जंग इन दोनों राष्ट्रीय दलों के बीच होने जा रही है ....

भाजपा की उम्मीद शिवराज बने हुए है....."एक भरोसे एक आस अपने तो शिव राज" यह गाना प्रदेश की पूरी भाजपा इन दिनों गा रही है ..पार्टी को आस है विधान सभा ,लोक सभा चुनावो की तरह नगर निगम चुनाव में उसके मुखिया शिव तारणहार बनेंगे......शिवराज की साफ़ और स्वच्छ छवि का लाभ लेने की कोशिश भाजपा कर रही है ...ख़ुद "शिव " नगर निगम की "पिच " पर अपनी सरकार के एक साल की उपलब्धियों जनता के बीच ले जा कर बैटिंग कर रहे है....

पार्टी के कुछ नेताओं का कहना है अगर इन चुनावो में भाजपा का प्रदर्शन ख़राब रहता है तो जनता के बीच अच्छा संदेश नही जाएगा..... राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी में बद रही कलह बाजी भी राज्य में लोगो के बीच पार्टी कि अलोकप्रियता को उजागर कर रही है.... निकाय चुनावो की घोषणा से पहले जिस तरह से शिव राज ने ताबड़तोड़ घोषणा की है उससे तो यही लगता है पार्टी इस चुनाव को गंभीरता से ले रही है......

पिछले दिनों शिवराज के द्वारा किया गया मंत्री मंडल विस्तार भी निकाय चुनाव में लाभ लेने की मंशा से किया गया.... यही नही सतना में एक समारोह में उन्होंने यहाँ तक कह डाला प्रदेश में लगने वाले उद्योगों में स्थानीय लोगो को रोजगार दिया जाएगा...इस बयान ने राष्ट्रीय स्तर पर हलचल मचा दी..... जिसके बाद सफाई में उन्हें यह कहना पड़ा मीडिया ने उनके बयान को ग़लत ढंग से पेश किया ..... शिव ने अपने "ब्रह्मास्त्र " निकाय चुनावो से ठीक पहले फैक दिए जिसका लाभ उठाने की कोशिश वह करेंगे......

१९९९ के नगर निगम चुनावो पर नजर डाले तो भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला पाँच पाँच की बराबरी पर रहा था ... उस समय तीन सीट निर्दलीय के पाले में गई थी ....वही २००४ के नगर निगम चुनावो में भाजपा कांग्रेस पर पूरी तरह भारी पड़ी.... उस समय पार्टी के मुखिया बाबू लाल गौर थे ....तब पार्टी ने 13 नगर निगम सीटो में से १० सीटो पर भगवा लहराया था.... बाद में कटनी के निर्दलीय प्रत्याशी संदीप जायसवाल के भाजपा के पाले में आ जाने से उसकी संख्या ११ पहुच गई ... कांग्रेस की नाक राजधानी भोपाल में सुनील सूद ने भोपाल की महापौर की कुर्सी जीत कर बचाई ....


इस बार भाजपा के सामने जहाँ उसकी ११ सीट बचाने की चुनोती है वही भोपाल की बड़ी झील में कमल खिलवाने की भी... भाजपा को इस बात का मलाल है वह यहाँ पिछले दो चुनाव नही जीत पायी है..... लिहाजा इस बार उसको अपना महापौर जितवाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगवाना पड़ेगा...

हालाँकि इस बार के विधान सभा चुनावो में सात विधान सभा सीटो में से ६ सीटो पर भाजपा का कब्ज़ा बना है ....भाजपा के सभी बड़े नेता इस चुनाव में कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ने की जुगत में लगे हुए है ... भोअप्ल नगर निगम में महापौर की सीट इस बार महिला प्रत्याशी के लिए रिजर्व हो गई है ॥ नगरीय प्रशाशन मंत्री बाबू लाल गौर की बहू कृष्णा गौर के भाजपा प्रत्याशी के रूप में उतरने से यहाँ मुकाबला इस बार रोचक बन गया है ......


पिछले दो चुनावो में इंदौर , ग्वालियर , खंडवा , सागर, रीवा, जबलपुर लगातार भाजपा के खाते में गए है ....इस बार इन सीटो पर पार्टी के उपर बेहतर प्रदर्शन करने का भारी दबाव है ... शिव राज की प्रतिष्टा भी इस चुनाव में सीधे दाव पर लगी है..... अगर भाजपा उनके नेतृत्व में नगर निगम चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती है तो केंद्रीय स्तर पर पार्टी में उनका कद बदना तय है ...

संभवतया नरेन्द्र सिंह तोमर के संभावित उत्तराधिकारी के नाम पर शीर्ष नेतृत्व "शिव" की राय पर अपनी मुहर लगा सकता है ...निकाय चुनाव के बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद से नरेन्द्र सिंह तोमर की विदाई हो जायेगी...

वही दूसरी तरफ़ मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने भी भाजपा को इस बार के चुनावो में पटखनी देने की तैयारी कर ली है ॥ टिकटों के चयन में इस बार उसके द्वारा हुई देरी नुकसानदेह साबित हो सकती है .... बीते दिनों टिकटों को लेकर जिस तरह की खीचतान मची उसे देखते हुए यह नही कहा जा सकता की कांग्रेस भाजपा से पूरी ताकत से मुकाबला करने की स्थिति में है...

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष सुरेश पचौरी के सामने गुटबाजी से त्रस्त्र पार्टी के नेताओं ,कार्यकर्ताओं को साथ लेकर चलने की बड़ी चुनोती है ...लोक सभा , विधान सभा चुनावो में पार्टी की घटी सीटो का एक बड़ा कारण खेमेबाजी रही जिसका नुक्सान पार्टी को बड़े पैमाने पर उठाना पड़ा था .....पिछली बार ज्योतिरादित्य,कमलनाथ ,दिग्गी राजा, अजय सिंह, सुभाष यादव जैसे कई गुटों में पार्टी गई जिसका व्यापक नुकसान उठाना पड़ा था ....पर इन सबके बाद भी इस बार कांग्रेस पार्टी के पास लोक सबह में बड़ी सीटो का अस्त्र है ...

साथ में भाजपा को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ सकता है ....कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष पचौरी की माने तो भाजपा की नाकामियों को जनता के बीच ले जाने का काम कांग्रेस इस बार कर रही है ...यह चुनाव पचौरी की भावी राजनीती की दिशा को भी तय करेगा.....अगर कांग्रेस का प्रदर्शन निखारा तो उनका कद सोनिया गाँधी के दरबार में बदना तय है ...नही तो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से उनकी विदाई भी तय है.....


वोट के मौसम में जनता ने दोनों पार्टियों को लुभाने के लिए वादों की झड़ी लगा दी है... भाजपा ने अपना घोषणा पत्र कांग्रेस से पहले घोषित कर दिया.... जिसमे स्थानीय समस्याओ के समाधान की बात दोहराई गई है.... कांग्रेस के पिटारे में भी कुछ इसी तरह की योजनाओं का खाका देखा जा सकता है ....


भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर ने तो कांग्रेस के घोषणा पत्र को भाजपा की नक़ल बता दिया है ... खैर जनता जनार्दन तो दोनों की कार्य प्रणालियों से तंग आ चुकी है ... सीहोर जिले के बिलकीसगंज निवासी राजकुमार कहते है "घोसना पत्र तो चुनाव जीतने का स्तुंत है ॥ चुनावी वादे वादे बनकर रह जाते है" ......

राजधानी में टिकट बटने के बाद बड़े पैमाने पर विरोध के स्वर मुखरित हुए है ....भाजपा और कांग्रेस दोनों की कहानी एक जैसी ही है ..... असंतुस्ट की नाराजगी किसी भी दल की हार जीत की संभावनाओं पर अपना असर छोड़ सकती है...भाजपा को अपने पुराने किले बचाने में पसीने छूट सकते है... इंदौर, सतना, जबलपुर सीट भी इसके प्रभाव से अछूती नही है .... कांग्रेस के हालात भी भाजपा से जुदा नही है ...

टिकटों के चयन में इस बार भी पचौरी की जमकर चली है..वैसे राज्य के कई कांग्रेसी नेता पचौरी को राज्य की राजनीती में नही पचा पाये है ..पार्टी के अधिकांश नेता उनको थोपा हुआ प्रदेश अध्यक्ष मानते है ॥ "सोनिया" के वरदहस्त के चलते उनको राज्य की राजनीती में लाया गया पर अपनी ताजपोशी के बाद से वह पार्टी में नई जान नही फूक पाये.....

बहरहाल जो भी हो , नगर निगम चुनावो की चुनावी चौसर तैयार हो चुकी है ....भाजपा और कांग्रेस के कई दिग्गज नेताओं की प्रतिष्टा इस चुनाव में सीधे दाव पर है ... अब देखना है नगर निगम चुनाव का मैदान अपने बूते कौन मारता है ?







रविवार, 22 नवंबर 2009

येदियुरप्पा जी संकट अभी टला नही है ...........



भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के माडल की बात आती है तो सभी "मोदी" की प्रशंसा में कसीदे पड़ा करते है .... गुजरात के साथ दक्षिण के राज्य कर्नाटक राज्य की चर्चा भी अब भाजपा के माडल में हाल के कुछ वर्षो से होनी शुरू हुई है ...


जिस प्रकार औरंगजेब की बीजापुर और गोलकुंडा में विजय ने उसके दक्षिण में विजय का मार्ग प्रशस्त किया था ... ठीक उसी प्रकार भाजपा की दक्षिण में विजय का मार्ग कर्नाटक ने खोला ...इस रास्ते को खोलने में किसी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तो वह येदियुरप्पा थे .... नही तो उससे पहले भाजपा का वहां पर कोई अस्तित्व नही था.....


दक्षिणी राज्य कर्नाटक में शुरू से कांग्रेस का राज रहा ....८० के दशक में कांग्रेस की पतन की पटकथा शुरू हो गई ...इसके बाद राम कृष्ण लेकर पटेल तक का दौर आया ... जिसके झटको से वह अभी तक नही उबर पाई....



भाजपा ९० के दशक से कर्नाटक में मजबूत होनी शुरू हुई .... १९९९ के चुनावो में सात सांसदों के साथ उसने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई ॥ २००४ आते आते उसकी यह संख्या दो गुने से चार अधिक यानी १८ पहुच गई ....विधान सभा आते आते यह आंकड़ा ७९ पहुच गया ... यही वह समय था जब भाजपा को जे डी अस के साथ सरकार बनाने को मजबूर होना पड़ा ....


कुमार स्वामी और भाजपा में २०_ २० माह सरकार चलाने को लेकर सहमती बनी .... परन्तु कुमार स्वामी अपने कहे से मुकर गए ... जिस कारण जब येदियुरप्पा की बारी आई तो कुमार स्वामी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया ... येदियुरप्पा इसी मुद्दे को लेकर जनता के बीच गए ...और उन्हें इस मुद्दे पर सहानुभूति मिली जिस कारण भाजपा राज्य में अपनी सरकार बनाने में सफल हो पायी ...



परन्तु दक्षिण के "मोदी" कहे जाने वाले येदियुरप्पा की पिछले १८ माह से चल रही सरकार पर संकट के बादल छा गए.... वैसे ही भाजपा में केन्द्रीय स्तर पर जूतम पैजार मची हुई थी अब राज्य स्तर पर भी इसकी शुरुवात हो गई.......राजस्थान की महारानी को जैसे तैसे इस्तीफे के लिए मनाया गया ...


उसके संकट से निपटने के बाद भाजपा के सामने नया संकट कर्नाटक का शुरू हो गया.... भाजपा अपने राज्यों के शासन को लेकर बड़ी मिसाले दिया करती है परन्तु अभी तक भाजपा शासित कोई भी ऐसा राज्य नही रहा होगा जहाँ कलह बाजी नही हुई हो..... दक्षिण का एकमात्र राज्य कर्नाटक भी इससे अछुता नही रह सका......


दरअसल कर्नाटक की सरकार को अस्थिर करने में दो भाईयो की बड़ी अहम भूमिका रही .... जनार्दन और करुणाकरण रेड्डी .... इन दोनों ने मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को मुख्यमत्री की कुर्सी से बेदखल करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगवाया ....जनार्दन राजस्व मंत्री तो करुणाकरण पर्यटन मत्री की कुर्सी संभाले हुए है ...


येदियुरप्पा का कैबिनेट में लिया एक फैसला इनको नागवार गुजरा जिसमे उन्होंने कहा था बेल्लारी की खदान से अयस्क भरने वाले हर ट्रक पर १००० रूपया अतिरिक्त कर वसूला जाएगा...यही नही तभी से उन्होंने राज्य में सरकार को गिराने की तैयारी कर ली थी... इसके लिए बाकायदा येदियुरप्पा के असंतुस्ट विधायको से संपर्क साधा गया.....


कर्नाटक में येदियुरप्पा नाम के भले ही भाजपा नेतृत्व कसीदे पड़े परन्तु असलियत यह है यहाँ पर रेड्डीबंधुओं का बड़ा वर्चस्व रहा है ... दो भाई ही नही उनके तीसरे भाई सोमशेखर भी चर्चा के केन्द्र बिन्दु बने हुए है वह वर्तमान में दुग्ध संघ अध्यक्ष की कुर्सी संभाले हुए है ॥ रेड्डी बंधू कर्नाटक में उस समय चर्चा में आए जब १९९९ में सोनिया गाँधी ने वहां से लोक सभा का चुनाव लड़ा था... और वहां पर उनके विरोध में भाजपा की तेज तर्रार नेत्री सुषमा स्वराज उठ खड़ी हुई थी॥


बताया जाता है तब इन्होने सुषमा की तन, मन धन से बड़ी खिदमत की .... तभी से यह सुषमा के विश्वास पात्र बने हुए है.....हालाँकि सुषमा यहाँ से चुनाव हार गई थी लेकिन अगले लोक सभा चुनाव में जब सोनिया ने अमेठी का रुख किया तो यहाँ पर सुषमा के कहने पर रेड्डी को टिकेट दिया गया....


बताया जाता है कर्नाटक में दोनों की बहुत पहुच है जिसका फायदा वह उठाते रहे है ....महंगे बंगलो से लेकर आलीशान आशियाने .... हवाई जहाजो का काफिला इनकी शान है ..... तभी वहां पिछले विधान सभा चुनाव में कई विधायक उनके प्रसाद से चुनाव जीते थे ... यही नही येदियुरप्पा सरकार को समर्थन दिलवाने के लिए इनके द्वारा एक अभियान खरीद का चलाया गया था जिसके बाद येदियुरप्पा सरकार सदन में बहुमत साबित कर पाने में सफल हो पायी थी ....



यही नही रेड्डी के कहानी के किस्से यही खत्म नही होते..... अनंतपुर में इनके पास एक खनन की खदान लीज पर है ... यह खदान दो राज्यों की सीमा से लगी हुई है जिस कारण यहाँ वन विभाग के एक आला अधिकारी द्वारा इनको हरी झंडी नही दी गई ... जिसके बाद यह अन्दर ही अन्दर सुलग रहे थे ॥


आंखिर यह तो कोई बात ही नही हुई जिस राज्य में उनकी सरकार हो और उनके खदान के काम में कोई अदना सा आला अधिकारी अडंगा लगाये... बेल्लारी के एसपी ,कमिश्नर का तबादला बिना रेड्डी बंधुओ की स्वीकृति से कर दिया गया जिस कारण नाक तो लगनी ही थी .... ऐसा ही कुछ मामला कडप्पा में भी है॥ यहाँ पर दोनों का एक स्टील प्लांट है जिसके लिए इनको जमीन आंध्र के पूर्व सी ऍम राजशेखर रेड्डी द्वारा उपलब्ध करवाई गई..यह तकरीबन १०००० एकड़ है ....


कहा तो यह भी जा रहा है कांग्रेस ने जगन्मोहन रेड्डी को येदियुरप्पा की सरकार गिरवाने को उकसाया ... यह भी हो सकता है अगर कर्नाटक की भाजपा सरकार अल्पमत में आ जाती तो फिर आंध्र में जगन्मोहन को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल जाती ..... इन्ही सब बात के चलते येदियुरप्पा सरकार को अस्थिर करने की कोशिसे चलती रही..... येदियुरप्पा सरकार को अस्थिर करने में अनंत कुमार की भी कम भूमिका नही है ....उनकी नजरे कब से वहां के मुख्यमंत्री बन्ने में लगी हुई है... वह रात को इस मसले पर रेड्डी बंधुओं की क्लास तक ले लिया करते थे......


बताया जाता है राज्य विधान सभा के अध्यक्ष जगदीश को यह सभी मुख्यमंत्री का ताज पहनाना चाहते थे परन्तु उनकी यह उम्मीदे पूरी नही हो पायी...... यहाँ पर बता दे संघ परिवार इस बार येदियुरप्पा को हटाने के मूड में नही दिखाई दिया ..साथ ही जाती वाला मसला भी ध्यान में रखना था... येदियुरप्पा भी लिंगायत थे जगदीश भी ॥



असंतुष्टो की अगुवाई कर रहे रेड्डी बंधुओ ने विधायको को भड़काने के काम को बखूब अंजाम दिया ....राज्य की ग्रामीण विकास मत्री शोभा करंदलाजे की येदियुरप्पा के साथ निकटता लोगो को रस नही आ रही थी.....


बताया जाता है मुख्यमंत्री के कई निर्णयों में शोभा का दखल हुआ करता था.....जिस कारन विधायक रेड्डी के पक्ष में लामबंद होने शुरू हो गए थे...पर विरोधी खेमे की अगुवाई मे कुछ बातें मान ली गई है.... जैसे शोभा की मंत्रिमंडल से छुट्टी कर दी गई .....


मुख्य सचिव वी पी वालिगर को हटाकर प्रसाद को बैठा दिया गया ... ....साथ ही यह तय हुआ है बेल्लारी जिले के मामलो में येदियुरप्पा का अब कोई दखल नही होगा..... यहाँ पर तोपों की सलामी सिर्फ़ और सिर्फ़ रेड्डी बंधुओं को मिलेगी........यहाँ पर मुख्यमंत्री का फैसला नही वरन रेड्डी भाईयो का फैसला अंतरिम होगा ..... जगदीश को मंत्री बना दिया गया है ॥



बहरहाल जो भी हो , इस पूरे प्रकरण को हवा में रेड्डी बंधुओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है .... उनकी अधिकाँश मांगे मान ली गई है ...येदियुरप्पा की इस प्रकरण में हार हुई है .... उनकी कुर्सी तो बच गई है पर यह बात सामने निकालकर आ गई है अपने को दूसरो से अलग कहने वाली भाजपा में आज पैसा कैसे बोलता है...?


आज इस पार्टी में भी करोडपतियों की कमी नही रह गई है.... देश की सांसद में सैकड़ो धनी सांसदों में इसके सांसद भी किसी से कम नही है ......कर्नाटक ने पार्टी का चाल , चलन, असली चेहरा सभी के सामने दिखा दिया है ...पार्टी को आज इमानदारी से काम करने वाले मुख्यमंत्रियों की जरुरत नही है ....उसे तो बस चुनावी फंड चाहिए.........मान ना मान में तेरा मेहमान .............

येदियुरप्पा जी यह संकट तो समाप्त हो गया है ... पर आगे आपकी राह आसान नही लगती.....रेड्डी कब फिर से भड़क जाए इसका कोई भरोसा नही है..........नीचे की पंक्तिया सटीक है __________


"जुल्फों की घटाओं में बिजली ने किया डेरा ....

कब जाने बरस जाए इसका न भरोसा है ...

शैतान की नानी है ये कड़कती तडपन

कब आशिया जला दे इसका ना भरोसा है "


शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

क्या संघ करेगा गडकरी पर उपकार ?



भाजपा में नए अध्यक्ष को लेकर माथापच्चीसी शुरू हो गई है..... तीन राज्यों में पार्टी की करारी पराजय से जहाँ कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटा है ,वही राष्ट्रीयस्वयं सेवक संघ भी अब भाजपा को नए ढंग से पुनर्गठित करना चाहता है..संघ प्रमुख मोहन भागवत के हलिया प्रकशित एक इंटरव्यू का हवाला ले तो इस बार वह संगठन में किसी भी प्रकार की ढील देने के मूड में नही दिखायी देते ....


भागवत ने दिल्ली की एक पत्रिका को दिए इंटरव्यू में साफ़ कह दिया है नया अध्यक्ष नायडू, अनंत, सुषमा , जेटली में से कोई नही होगा.... इस बयान को अगर आधार बनाया जाए तो मतलब साफ़ है भागवत नही चाहते कोई इन चार में से नया अध्यक्ष बने...शायद उनको भी पता है अगर इनमे से कोई नया अध्यक्ष बन गया तो पार्टी की गुटबाजी तेज हो जायेगी... वैसे भी पार्टी की दूसरी पंक्ति ने नेताओ में आगे जाने की लगातार होड़ किसी से छिपी नही है ... सभी राजनाथ के भावी उत्तराधिकारी होना चाहते है पर मीडिया के सामने अपना मुह खोलने से परहेज कर रहे है ...



अभी एक दो दिन पहले भाजपा के दिल्ली स्थित ऑफिस पर नए अध्यक्ष को लेकर तेज सुगबुगाहट होती दिखायी दी॥ कुछ सूत्रों की अगर माने तो ऑफिस खुलने के पीछे एक बहुत बड़ा संदेश छिपा हुआ है....अभी ३ राज्यों में करारी हार के बाद जहाँ भाजपा के ऑफिस में मायूसी देखीगई वही अब ऑफिस में कार्यकर्ताओं के लगते जमघट को नए अध्यक्ष की ताजपोशी के रूप में देखा जा रहा है...


बताया जाता है संघ ने नए अध्यक्ष पद के नाम का चयन कर लिया है अब बस बैठक द्बारा राजनाथ के भावी उत्तराधिकारी के नाम पर मुहर लगनी बाकी है... इसी कारण इन दिनों भाजपा अपने ऑफिस में नए अध्यक्ष के लिए जोर आजमाईश कर रही है ...



भाजपा भले ही कहे उसमे संघ का दखल नही है पर असलियत यह है वह कभी भी अपने को संघ की काली छाया से मुक्त नही कर पाएगी... बताया जाता है भाजपा में इस बार २ लोक सभा चुनाव हारने के बाद से गहरा मंथन चल रहा है ...


हार के कारणों की समीक्षा की जा रही है.... मोहन भागवत का कहना है अब तो हद हो गई है... समय से पार्टी के सभी नेता एकजुट हो जाए .... इस कलह का नुक्सान भाजपा को उठाना पड़ रहा है.... ऐसा नही है देश में भाजपा के विरोध में कोई लहर है... मुद्दों की कमी भी नही है पर विपक्ष के कमजोर होने का सीधा लाभ कांग्रेस को मिल रहा है ....



कल मोहन भागवत की राजनाथ के साथ मुलाकात के बाद कयासों का बाजार फिर से गर्म हो गया है ... बताया जाता है राजनाथ ने भागवत से मिलकर अपना दुखडा रोया है .... उन्होंने" संघम शरणम गच्छामी " का नारा बुलंद करते हुए साफ़ कहा है संघ भाजपा का शुरू से मार्गदर्शन करता रहा है....अब इस समय भाजपा बुरे दौर से गुजर रही है तो संघ का पार्टी में दखल होना जरूरी है ... संघ अपने विचारो से पार्टी को नई दिशा दे सकता है.....


गौरतलब है अभी कुछ समय पूर्व राजनाथ ने मीडिया से कहा था भाजपा को किसी भी प्रकार की सर्जरी की जरुरत नही है किसका दिमाग ख़राब हो गया है? राजनाथ भागवत के कामोपेरेथी वाले बयान पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे... आपको याद होगा राजनाथ ने प्रतिक्रिया में क्या कहा था... बाद में दोनों ने अपने बयानों से कन्नी काट ली थी....


खैर , अब राजनाथ सही ट्रैक पर लौटते दिखाई दे रहे है ... उनकी समझ में आ गया है भाजपा को सही दिशा देने का काम संघ के सिवाय कोई नही कर सकता है ...
प्रेक्षक कल संघ प्रमुख भागवत और राजनाथ की मुलाकात के कई अर्थ निकाल रहे है ...


महाराष्ट्र के भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नितिन गडकरी के दिल्ली में होने के भी कई निहितार्थ निकाले जा रहे है ... कुछ लोगो का कहना है संघ प्रमुख भागवत ने गडकरी को झंडेवालान स्थित संघ मुख्यालय में आमंत्रित किया था....उनको पार्टी के संभावित राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में भी देखा जा रहा है ... गडकरी नागपुर की उसी धरती से आते है जहाँ संघ का मुख्यालय है ... इस समय संघ में मराठा लोबी पूरी तरह से हावी है॥


पार्टी के बड़े बड़े पदों पर मराठियों का कब्जा है॥ अब गडकरी को प्रदेश अध्यक्ष अगर बनाया जाता है तो संगठन में मराठी मानुष का मुद्दा जोर पकड़ सकता है... यह बताते चले संघ प्रमुख भागवत ने गडकरी का नाम संभावितों में सबसे ऊपर रखा है ... वह युवा भी है साथ में उनके नाम पर सहमती भी आसानी से हो जायेगी॥ हाँ यह अलग बात है पार्टी की डी ४ कम्पनी (सुषमा, जेटली, अनंत, नायडू) को यह बात नागवार गुजरेगी अगर उनकी ताजपोशी राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए हो जाती है....


गडकरी को केन्द्र की राजनीति का कोई अनुभव नही है... उनका महाराष्ट्र का लेखा जोखा भी कुछ ख़ास नही रहा है... इस बार पार्टी महाराष्ट्र में जीत हासिल करने के बहुत सारे दावे कर रही थी पर आखिरकार उसकी हालत पतली रह गई ...अतः गडकरी का राज्य की राजनीती से सीधे केन्द्र में दखल किसी को रास नही आएगा....


राजनाथ भी अपने कार्यकाल में कुछ ख़ास नही कर पाये....उनके गृह राज्य उत्तर प्रदेश में भाजपा की हालत बहुत पतली हो गई ....साथ ही उनके कार्यकाल में पार्टी की राज्य इकाईयों में संकट लगातार बना रहा ॥ चाहे वह उत्तराखंड का मामला रहा हो या राजस्थान में महारानी का हर जगह पार्टी की खासी फजीहत हुई है..अब ऐसे बुरे दौर में गडकरी को कमान संभालने को मिल गई तो उनको सभी को साथ लेकर चलना पड़ सकता है ...भागवत ने तो गडकरी का नाम अपनी लिस्ट में सबसे पहले रख दिया है ...


बस अब भाजपा के बड़े नेताओं से हरी झंडी मिलने का इन्तजार है॥ संभवतया इस मसले पर वह कुछ दिनों बाद आडवानी से भी चर्चा कर सकते है.. बताया जाता है इस मसले पर सुरेश सोनी भी आडवानी से गुप्तगू कर चुके है ॥ कोई कुछ क्यों नही कहे आडवानी अब पार्टी का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखना चाहते है.... उनकी मंशा तभी पूरी हो सकती है जब संघ उनकी सहमती से नए नाम का चयन करे...



नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम की भी चर्चा है .... मोदी को आगे कर भाजपा अपनी मूल विचारधारा पर वापस लौट सकती है ... वैसे भी गुजरात में आज "मोदी" एक बहुत बड़ा ब्रांड बने हुए है... कई राज्यों के मुख्यमत्री अब अपने राज्यों में इस ब्रांड को अपना रहे है.... इसलिए बेहतर यह होगा मोदी अब केन्द्र की राजनीती करे.... पर मोदी के नाम पर आसानी से मुहर नही लग सकती..... क्युकि उनको आगे करने से भाजपा के सहयोगी दल अलग हो जायेंगे.. अब यह भाजपा को तय करना है उसको सबको साथ लेकर चलना है या कांग्रेस की तरह"चल अकेला " वाली नीति अपनानी है ....


वैसे आपको बता दूँ मोदी के नाम पर सहमती नही बन पाएगी ... "गोधरा " का जिन्न अभी भी उनके साथ लगा है.... साथ ही कट्टर उग्र हिंदुत्व की उनकी छवी उनका माईनस पॉइंट है ... विपक्षी उनको पसंद नही करते .... बिहार में लोक सभा चुनावो के दरमियान नीतीश ने सापफ तौर पर कह दिया था बिहार में उनके प्रचार की कोई आवश्यकता नही है ...


साथ ही लोक सभा के चुनाव परिणामो में भाजपा की करारी हार के लिए कुछ लोग मोदी को जिम्मेदार मान रहे है... जिन मुस्लिम बाहुल्य संसदीय इलाकों में मोदी गए भाजपा की वहां करारी हार हुई.... इसके अलावा मोदी अक्खड़ किस्म के है...एक वाक़या हमें याद है॥ गुजरात चुनावो के दौरान जब सभी लोग बैठक में टिकेट माग रहे थे......और मोदी से कह रहे थे "नरेन्द्र भाई " टिकेट दे दो तो मोदी ने संघ की पसंद को राजनाथ और आडवानी , रामलाल के सामने दरकिनार कर दिया.....अब अगर मोदी आगे हो गए तो या तो भाजपा में "मोदीत्व " आगे रहेगा या "उग्र हिंदुत्व ".... संघ को घास देना मोदी की फितरत नही है .... इसलिए मोदी की कम सम्भावना बन रही है ....


राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का दावा भी सबसे मजबूत नजर आता है ....चौहान को लेकर भाजपा पशोपेश में फसी हुई है ... शिवराज की मध्य प्रदेश सरकार के काम करने के ढंग की भाजपा के सभी बड़े दिग्गज प्रशंसा करते नही थकते.... अपने दम पर मध्य प्रदेश की सत्ता में वापसी कर उन्होंने दिखा दिया है सबको साथ लेकर कैसे चला जाता है और विकास क्या चीज है ?


बताया जाता है शिवराज की दिलचस्पी केन्द्र से ज्यादा अभी प्रदेश में है.... आडवानी के बर्थडे समारोह में शिवराज ने अपनी इस इच्छा से संघ और पार्टी के बड़े नेताओं को अवगत करवा दिया है ...बताया जाता है पार्टी में एक बड़ा तबका यह मानकर चल रहा था की शिव के आने से भाजपा मजबूत होगी॥ उनमे अटल बिहारी वाजपेयी जैसी समझ है॥ छवी भी पाक साफ है....साथ में उनको केन्द्र की राजनीती का अच्छा अनुभव भी रहा है ... इस लिहाज से वह सब पर भारी पड़ते दिखाई दे रहे है ...


पर शिवराज की मध्य प्रदेश में बदती दिलचस्पी को देखते हुए पार्टी का आलाकमान कोई रिस्क नही लेना चाहता ॥ इसके अलावा अभी प्रदेश में उनका कोई विकल्प भी नही है ..इस लिहाज से कोई उनको केन्द्र में नही लाना चाहेगा....


एक सम्भावना यह भी है अगर शिव भाजपा के तारणहार बनकर केन्द्र में भेज दिए जाते है तो मध्य प्रदेश में उनके स्थान पर नरेंद्र सिंह तोमर को लाया जा सकता है... राज्य में भाजपा को लाने में दोनों ने भरपूर योगदान दिया है ... वैसे भी इस बार तोमर का कार्य्क्काल पूरा हो रहा है ... उनके सीं ऍम बन जाने की स्थिति में प्रभात झा की प्रदेश अध्यक्ष के रूप में ताजपोशी हो सकती है ....


अभी शिव की मध्य प्रदेश में रमने की इच्छाओं को देखते हुए कहा जा सकता है संघ उनको मुख्यमंत्री के तौर पर प्रदेश की राजनीती में ही चलने दे और बाद में समय आने पर उनको आगे करे.... आने वाले लोक सभा चुनाव अभी बहुत दूर है...


गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पारिकर का नाम भी अध्यक्षों की जमात में शामिल है... आडवानी को बासी आचार कहने के बाद से उनको भावी अध्यक्ष के तौर पर देखा जा रहा है ... कहा जा रहा है संघ ने उनसे यह बयान जबरन दिलवाया हो...इसके बाद भाजपा से इस बयान पर कोई प्रतिक्रिया नही आई ॥ जिससे अनुमान यह लगाया जा रहा है उनका नाम भी तगडे दावेदार के तौर पर संघ की सूची में बना हुआ है....


उनका प्लस पॉइंट यह है वह ईसाई है॥ उनको आगे कर भाजपा यह संदेश देने में कामयाब रह जायेगी हमारे यहाँ हिंदू ही महत्वपूर्ण कुर्सियों में आसीन नही है... साथ ही हिंदू से इतर अन्य जातिया भी भाजपा की तरफ़ झुक जायेंगी ......


पर परिकर की एक समस्या आडवानी है .... आडवानी कभी नही चाहेंगे नया अध्यक्ष उनकी नापसंद का बने ....कोई माने या न माने भाजपा को खड़ा करने में आडवाणी का बड़ा योगदान है .....महज २ लोक सभा सीटो से १०० पार ले जाने में उनके योगदान की उपेक्षा नही की जा सकती...इस बात को मोहना भागवत भी भली प्रकार जानते है ....वह नया अध्यक्ष चुनने से पहले आडवानी की रजामंदी करवाना पसंद करेंगे..अगर आडवानी की चली तो पारिकर का " बासी आचार " का बयान ख़ुद उनकी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की राह में बड़ा रोड़ा बन सकता है ॥

बहरहाल जो भी हो नया अध्यक्ष संघ द्बारा तय किया जा चुका है .... गडकरी ,शिवराज , मोदी , परिकर इन चार नामो पर ही विचार किया जा रहा है ...अगर संघ की चली तो वह मोदी, शिवराज को अपने राज्यों के मुख्यमंत्री के रूप में चलने दे .... ऐसी सूरत में गडकरी , परिकर के बीच ज़ंग होगी....वैसे अगर भागवत की चली और भाजपा ने उनकी पसंद पर मुहर लगा दी तो गडकरी राजनाथ के वारिश साबित हो सकते है ... नागपुर संघ मुख्यालय से होना उनके लिए फायदे का सौदा बन सकता है ...अब देखते है राजनाथ का भावी उत्तराधिकारी कौन होता है ?




शनिवार, 31 अक्तूबर 2009

......... मान गई महारानी.....................



आखिरकार राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे मान गई । राज्य में नेता प्रतिपक्ष के पद से उन्होंने अपना इस्तीफा राजनाथ को दे ही दिया...... पिछले कुछ समय से राजस्थान में उनकी कुर्सी से विदाई का माहौल बना हुआ था ...... परन्तु ख़राब स्वास्थ्य कारणों के चलते उनकी विदाई की खबरें दबकर रह गयी । .. साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की साढ़े साती की दशा चलने के कारण महारानी की विदाई नही हो पायी.......


गौरतलब है "पार्टी विद डिफरेंस" का नारा देने वाली भाजपा में अनुशासन हाल के दिनों में उसे अन्दर से कमजोर कर रहा है...पार्टी लंबे समय से अंदरूनी कलहो में उलझी रही जिस कारण राजस्थान में वसुंधरा की विदाई समय पर नही हो पायी.......



...... यहाँ यह बताते चले वसुंधरा की विदाई का माहौल तो राज्य विधान सभा में भाजपा की हार के बाद ही बनना शुरू हो गया था परन्तु पार्टी हाई कमान लोक सभा चुनावो से पहले राजस्थान में कोई जोखिम उठाने के मूड में नही दिखाई दिया.............. लोक सभा चुनावो में पार्टी की करारी हार के बाद माथुर की प्रदेश अध्यक्ष पद से छुट्टी कर दी गई ...पर आलाकमान वसुंधरा के अक्खड़ स्वभाव के चलते उनसे इस्तीफा लेने की जल्दी नही दिखा सका ..साथ ही वसुंधरा को आडवानी का " फ्री हैण्ड" मिला हुआ था जिस कारण पार्टी का कोई बड़ा नेता उन्हें बाहर निकालने का साहस जुटाने में सफल नही हो सका। ..यही नही इस्तीफे की बात होने पर वसुंधरा के "दांडी मार्च " ने भी पार्टी आलाकमान का अमन चैन छीन लिया।



दरअसल महारानी पर लोक सभा चुनावो के बाद से इस्तीफे का दबाव बनना शुरू हो गया था..... उत्तराखंड के मुख्यमंत्री खंडूरी ने जहाँ पाँच सीटो पर पार्टी की करारी हार के बाद अपने पद से इस्तीफे की पेशकश कर डाली वही महारानी हार के विषय में मीडिया में अपना मुँह खोलने से बची रही ... पर केन्द्रीय स्तर पर वसुंधरा विरोधी लाबी कहाँ चुप बैठने वाली थी ... उन्होंने महारानी को राजस्थान से बेदखल कर ही दम लिया...


आखिरकार वसुंधरा की धुर विरोधी लोबी ने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ को साथ लेकर अनुशासन के डंडे पर महारानी की विदाई का पासा फैक दिया..... इससे आहत होकर महारानी ने राजनाथ से मिलने के बजाय आडवानी से मिलना ज्यादा मुनासिब समझा .....महारानी ने ओपचारिकता के तौर पर राजनाथ को अपना इस्तीफा भिजवा दिया.....



राजनाथ और महारानी के रिश्तो में खटास शुरू से रही है । राजस्थान में वसुंधरा के कार्य करने की शैली राजनाथ सिंह को शुरू से अखरती रही है ... लोक सभा चुनावो में राजस्थान में पार्टी की पराजय के बाद वसुंधरा की राजनाथ से साथ अनबन और ज्यादा तेज हो गई.... उस समय पार्टी आलाकमान ने उनसे इस्तीफा देने को कहा था पर वसुंधरा के समर्थक विधायको की ताकत को देखकर वह भी हक्के बक्के रह गए... जब पानी सर से उपर बह गया तो "डेमेज कंट्रोल" के तहत राजस्थान में पार्टी ने वेंकैया नायडू को लगाया पर वह महारानी को इस्तीफे के लिए राजी नही कर पाये... जिसके चलते पार्टी ने राजस्थान की जिम्मेदारी सुषमा स्वराज के कंधो पर डाली...


पिछले कुछ समय से वह भाजपा की संकटमोचक बनी हुई है... चाहे आडवानी के इस्तीफे का सवाल हो या फिर जसवंत की किताब पर बोलने का प्रश्न ॥ या फिर कलह से जूझती भाजपा का और ३ राज्यों के परिणामो में भाजपा की पराजय का प्रश्न उन्होंने बेबाक होकर इन सभी मसलो पर अपनी राय रखी है और अपनी सूझ बूझ को दिखाकर हर संकट का समाधान किया .... पर राजस्थान में महारानी को वह इस्तीफे के लिए नही मना सकी ....जिसके बाद राजस्थान में राजनाथ ने अपना "राम बाण " फैक दिया ...


वसुंधरा पर अनुशासनात्मक कार्यवाही होने के समाचार आने के बाद राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष के पद से वसुंधरा को इस्तीफा देने को मजबूर होना पड़ा... इस्तीफे के बाद ४० विधायको के साथ किए गए प्रदर्शन में महारानी ने कहा " जबरन इस्तीफा लेकर पार्टी हाई कमान ने उनको अपमानित किया है ... राजस्थान में अपने दम पर भाजपा की सरकार उन्होंने पूर्ण बहुमत के साथ बनाई " साथ ही उन्होंने विधायको से कहा आज नही तो कल हमारा होगा..... मैं राजस्थान की बेटी हूँ मेरी अर्थी भी यही से उठेगी........



राजस्थान में महारानी की नेता प्रतिपक्ष से विदाई के बाद उनके उत्तराधिकारी को लेकर ज़ंग तेज हो गई है... वसुंधरा ने अपने पद से इस्तीफा तो दे दिया है परन्तु उनकी विदाई के बाद भाजपा में सर्वमान्य नेता के तौर पर किसी की ताजपोशी होना मुश्किल दिखाई देता है ...


खबरे है महारानी इस पद पर अपने किसी आदमी को बैठाना चाहती है परन्तु राजनाथ के करीबियों की माने तो नए नेता के चयन में वसुंधरा महारानी की एक नही चलने वाली...यही नही लोक सभा चुनाव में पीं ऍम इन वेटिंग के प्रत्याशी रहे आडवाणी की पार्टी में पकड़ कमजोर होती जा रही है ....


सूत्रों की माने तो आडवाणी की संसद के शीतकालीन सत्र के बाद पार्टी से सम्मानजनक विदाई हो जायेगी ..... बताया जाता है मोहन भागवत ने आडवानी की विदाई के लिए २२ दिसम्बर तक डैड लाइन तय कर ली है ... यहाँ यह बताते चले संसद का यह सत्र २२ दिसम्बर को समाप्त हो रहा है ... इसी अवधि में आडवानी की सम्मानजनक विदाई होनी है साथ ही पार्टी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष भी खोजा जाना है ...


यह सब देखते हुए कहा जा सकता है वसुंधरा की चमक आने वाले दिनों में फीकी पड़ सकती है ... साथ ही महारानी को आने वाले दिनों में नायडू, जेटली, सुषमा, अनंत की धमाचौकडी से जूझना है ... यह सब देखते हुई महारानी की राह में आगे कई शूल नजर आते है...



नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पाने के लिए इस समय पार्टी में कई नाम चल रहे है .... इस सूची में पहला नाम गुलाब चंद कटारिया का है.... कटारिया के नाम पर सभी नेता सहमत हो जायेंगे ऐसी आशा की जा सकती है .... उनकी उम्र के नेताओ को छोड़ दे तो राज्य में अन्य नेताओ को उनके नाम पर कोई ऐतराज नही है... साथ ही संघ भी उनके नाम को लेकर अपनी हामी भर देगा क्युकि संघ से उनके मधुर रिश्ते रहे है..... राजस्थान में पार्टी में कलह बदने की सम्भावना को देखते हुए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उनके नाम पर अपनी मुहर लगा सकता है..


कटारिया की छवि एक मिलनसार नेता की रही है साथ ही वह सबको साथ लेकर चलने की कला में सिद्धिहस्त माने जाते है ...वसुंधरा को भी उनके नाम से कोई दिक्कत नही होगी ....

दूसरा नाम वसुंधरा के विश्वास पात्र माने जाने वाले राजेंद्र राठोर का चल रहा है.... राठोर को समय समय पर महारानी के द्बारा आगे किया जाता रहा है .... महारानी के सबसे करीबी विश्वास पात्रो में वह गिने जाते है .... अगर महारानी की नया नेता चुनने में चली तो राजेंद्र की किस्मत चमक सकती है .... वैसे भी अभी वह रेस के छुपे रुस्तम बने है...परन्तु उनके साथ सबसे बड़ी दिक्कत राजनीती की पिच पर अपरिपक्वता बनी हुई है ...यही बात उनकी राह का बड़ा रोड़ा बनी है ॥



तीसरा नाम घन श्याम तिवारी का है ... तिवारी वर्तमान में सदन में उपनेता के पद को संभाले हुए है...वर्तमान में वसुंधरा के इस्तीफे के बाद कार्यवाहक नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी उनके कंधो पर सोपी गई है ...विरोधियो को साथ लेकर चलने की कला तिवारी का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है...परन्तु उनका ब्राहमण होना उनकी राह कठिन बना सकता है ...


गौरतलब है इस समय पार्टी के अध्यक्ष पद पर राजस्थान में अरुण चतुर्वेदी काबिज है जो ख़ुद भी ब्राहमण है ... अगर वसुंधरा के बाद तिवारी को यह जिम्मेदारी सोपी गई तो दोनों पदों पर ब्राह्मण काबिज हो जायेंगे .... ऐसे में राज्य में जातीय संतुलन कायम नही हो पायेगा.... अतः पार्टी ऐसी सूरत में उनको काबिज कर कोई बड़ा जोखिम राजस्थान में मोल नही लेना चाहेगी......



पूर्व उप रास्ट्रपति भैरव सिंह शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी का नाम भी इस रेस में बना हुआ है ...नरपत के बारे में राजस्थान में एक किस्सा प्रचलित है ... मेरे राजस्थान के एक मित्र बताते है एक बार कुछ राजनीतिक मांग को पूरा करने के लिए नरपत ने खाना पीना छोड़ दिया था ...बेटी को मोहरा बनाकर अपने ससुर के जरिये नरपत अपनी इस इच्छा को पूरा करने की जुगत में लगे थे ... ... दामाद के हट को देखते हुए शेखावत अपने दामाद को राजस्थान की राजनीति में ले आए.... उम्र के इस अन्तिम पड़ाव पर भी भैरव बाबा नरपत सिंह राजवी को नेता प्रतिपक्ष के पद पर लाने की पुरजोर कोशिस कर रहे है॥


नरपत का युवा होना उनकी राह आसान बना सकता है ...बाबोसा के संघ से जनसंघ के दौर से मधुर रिश्तो के मद्देनजर नरपत के सितारे बुलंदियों में जा सकते है ...परन्तु नरपत की जनता में कमजोर पकड़ और पार्टी में उनके समर्थको की कमी एक बड़ी बाधा बन सकती है ...साथ ही राजस्थान की राजनीति में उनका ख़ुद का कोई कद नही है....


राजनीती के ककहरे से अनजान रहने वाले नरपत का ऐसे में ख़ुद को कंट्रोल करना तो दूर पार्टी को कंट्रोल करना दूर की कौडी लगता है ... वसुंधरा को उनके पद से हटाने के लिए बाबोसा ने कुछ महीने पहले एक करप्शन की मुहीम चलाई थी... अब वसुंधरा की विदाई के बाद बाबोसा के सुर में भी नरमी आ गई है... पिछले कुछ दिनों से वह भाजपा में प्यार की पींगे बड़ा रहे है..... १५ वी लोक सभा में ख़ुद को पीं ऍम इन वेटिंग बनाने पर तुले थे पर इन दिनों भाजपा के साथ बदती निकटता उनके किसी बड़े कदम की और इशारा कर रही है ...वह नरपत को राजस्थान में ऊँचा रुतबा दिलाना चाहते है...


अभी तक उनकी राह का बड़ा रोड़ा महारानी बनी हुई थी पर अब महारानी के राजपाट के लुट जाने के बाद बाबोसा को अपने दामाद का रास्ता साफ़ होता नजर आ रहा है...संभवतया इस बार पार्टी और संघ जनसंघ के इस नेता की राय पर अपनी मुहर लगा दे...और नए नेता के चयन में सिर्फ़ और सिर्फ़ शेखावत की ही चले.......

अगर वसुंधरा के खेमे से किसी की ताजपोशी की बात आती है तो दिगंबर सिंह का नाम भी सामने आ सकता है ... सूत्रों की माने तो महारानी की प्राथमिकता अपनी पसंद के नेता को प्रतिपक्ष की कुर्सी पर बैठाने की है... इस बात का ऐलान वह अपने जाने से पहले ही कर रही थी ...उन्होंने राजनाथ से साफतौर पर कहा था वह तभी अपनी कुर्सी छोडेंगी जब उनकी मांगे मानी जायेगी .... उनकी पहली मांग में नए नेता का चयन उनकी सहमती से होना था....अब यह अलग बात है पार्टी में " आडवानी ब्रांड" में गिरावट आने से वसुंधरा के विरोधी नेता उनकी पसंद के नेता को राजस्थान में प्रतिपक्ष की कुर्सी पर नही बैठाएंगे .....


वसुंधरा खेमे के नेताओं में दिगंबर को लेकर आम सहमती बनाने में भी कई दिक्कते पेश आ सकती है...इन सबके इतर कोई अन्य नाम भी"डार्क होर्स " के रूप में सामने आ सकता है.. माथुर के बाद जब चतुर्वेदी को नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया था तो किसी को उनकी ताजपोशी की उम्मीद नही थी... हाई कमान ने जब उनका नाम फाईनल किया तो सभी चौंक गए... किसी ने उनके अध्यक्ष बनने के विषय में नही सोचा था... पर संघ से निकटता उनके लिए फायेदेमंद साबित हुई ... इसी प्रकार शायद इस बार नए नेता का चयन संघ की सहमती से हो इस संभावना से भी इनकार नही किया जा सकता.... राज्य में वसुंधरा समर्थक विधायको की बड़ी तादात देखते हुए वसुंधरा यह कभी नही चाहेंगी नया नेता विरोधी खेमे का बने ......


परन्तु अगर राजनाथ और संघ की चली तो वसुंधरा के राजस्थान में दिन लद जायेंगे..... जिस तरह इस्तीफे को लेकर महीनो से वसुंधरा ने ड्रामे बाजी की उससे राजनाथ की खासी किरकिरी हुई है ....पूरे प्रकरण से यह झलका है वसुंधरा किसी की नही सुनती है... आज वह पार्टी से भी बड़कर हो गई है... तभी वह राजनाथ से मिलने के बजाए आडवाणी से मिलना पसंद करती है...


बात राजनाथ की करे तो वह भी उत्तर प्रदेश से आगे नही बाद पाये.... खांटी राजपूत नेता होते हुए भी वह राजस्थान में ब्राह्मण राजपूत समीकरणों को आज तक नही समझ पाये.... और किसी तरह महारानी को राजस्थान से हटाने पर तुले थे ... राजनाथ को राजस्थान में भाजपा के गिरते वोट बैंक की जरा भी परवाह होती तो वह वसुंधरा को राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष से नही हटाते ...


राजनाथ के अंहकार के चलते इस गंभीर गलती का खामियाजा कही भाजपा के बचे खुचे वोट बैंक पर भी नही पड़े ...राजस्थान भाजपा में इन दिनों वैसे ही "सूर्य ग्रहण " छाया है .... अब राजनाथ ने वसुंधरा को हटाकर भाजपा के बचे खुचे वोट बैंक पर कुल्हाडी मारने का काम किया है ........



बहरहाल जो भी हो महारानी मान गई है.... महारानी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.... साथ ही राजनाथ को लैटर लिखकर उनको हटाए जाने के निर्णय को चुनोती दे डाली है.....महारानी की विदाई के बाद उनके तेवरों को देखते हुए नए नेता की ताजपोशी आसान नही दिख रही है... नए नेता को जहाँ कार्यकर्ता , पार्टी, संगठन के साथ तालमेल बैठाना है वही प्रदेश अध्यक्ष चतुर्वेदी के साथ भी...... यहाँ यह बताते चले चतुर्वेदी के साथ वसुंधरा के सम्बन्ध अच्छे नही रहे है ....


बताया जाता है वसुंधरा समर्थक उनकी ताजपोशी को नही पचा पायेंगे... ऐसे में देखना होगा नए नेता के अध्यक्ष के साथ सम्बन्ध कैसे रहते है? इन सबके मद्देनजर राजस्थान में भाजपा की आगे की राह आसान नही दिखाई देती है ........ पनघट की कठिन डगर को देखते हुए भाजपा को फूक फूक कर कदम रखने होंगे.......

सोमवार, 26 अक्तूबर 2009

इस चित्र पर गौर फरमाए.........


आजाद प्रेस

( ... ऊपर का यह चित्र बहुत दुर्लभ है ......
सफ़ेद रंग की प्रेस की इस गाड़ी में एक "कुक्कुर" महाशय आराम फरमा रहे है ............
शायद उनको भी अच्छे से पता है लोकतंत्र में प्रेस के स्थान की कितनी अहमियत है
...तभी तो वह कह रहे है.. "ऐसी आज़ादी और कहाँ " ? )

रविवार, 4 अक्तूबर 2009

चुफाल के हाथ उत्तराखंड भाजपा की कमान .........



लम्बी जद्दोजहद के बाद उत्तराखंड के नये प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर बिशन सिंह चुफाल की ताजपोशी कर दी गई ..वर्तमान में वह निशंक की सरकार में कैबिनेट मंत्री के पद को संभाले हुए थे..जून में पांचो लोक सभा सीट गवाने के बाद जहाँ पार्टी हाई कमान ने खंडूरी की छुट्टी करवा दी थी वही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बची सिंह रावत को विकास नगर के उपचुनाव तक अभय दान दे दिया था ॥


अब विकास नगर के चुनाव परिणामो के आने के बाद बची सिंह रावत की भी कुर्सी सलामत नही रह पायी और उनको अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा...उत्तराखंड में इस बार के लोक सभा चुनावो में भाजपा का राज्य से पूरी तरह से सूपड़ा साफ़ हो गया था ... यहाँ तक की भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बची सिंह रावत भी अपनी नैनीताल सीट नही जीत पाये थे जिसके चलते उन पर भी इस्तीफे का दबाव लोक सभा चुनावो के ठीक बाद बनना शुरू हो गया था... पर उस समय पार्टी हाई कमान ने इस्तीफे के लिए कोई जल्दी नही दिखाई ...लेकिन विकास नगर के उप चुनाव के बाद पार्टी हाई कमान बची सिंह रावत की विदाई को लेकर आश्वस्त हो गया...




दरअसल उत्तराखंड के भाजपा के कई बड़े नेता खंडूरी के साथ बचदा से भी बुरी तरह से खार खाए हुए थे॥इसका कारण दोनों की घनिष्ट निकटता थी... यहाँ बताते चले दोनों वाजपेयी जी की सरकार में मंत्री रहे थे... जहाँ खंडूरी केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री थे वही बचदा विज्ञान प्रोद्योगिकी राज्य मंत्री ... उत्तराखंड में तिवारी सरकार के कार्यकाल के पूरा होने के बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की पहली पसंद के रूप में जनरल खंडूरी उभरे थे...इसी कारण २००७ में उनके सर राज्य के मुख्यमंत्री पद का सेहरा बधा था.... उस समय विधायको का बहुमत भगत सिंह कोश्यारी के साथ होने के बाद भी खंडूरी को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई..तभी से खंडूरी कोश्यारी की नजरो में खटकने लगे थे... खंडूरी की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी के बाद पार्टी हाई कमान ने कोश्यारी के स्थान पर नये अध्यक्ष की खोज शुरू कर दी ...कोश्यारी इस पद पर अपने आदमी को बैठाना चाहते थे पर खंडूरी की आडवानी कैंप में मजबूत पकड़ के चलते कोश्यारी हाथ मलते रह गए॥


आखिरकार राज्य के अध्यक्ष पद पर खंडूरी बची सिंह रावत को ले आए... इसका एक कारण उनके साथ खंडूरी की अच्छी ट्यूनिंग तो था ही साथ ही दोनों केन्द्रीय स्तर के नेता थे॥ दूसरा लंबे समय से जिस संसदीय इलाके का बचदा प्रतिनिधित्व करते आ रहे थे वह रिज़र्व हो गया था लिहाजा पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी बचदा के अनुभव का लाभ लेना चाहता था अतः उसने खंडूरी के कहने पर बचदा को राज्य की बागडोर सौप दी.........


बचदा के नेतृत्व में राज्य में भाजपा की गाडी सही से बडी ... इस दौरान पार्टी ने राज्य में एक के बाद एक चुनाव जीते... खंडूरी और बचदा के समय में सरकार और संगठन में बेहतर समन्वय देखा गया... पर दोनों की कार्य शैली को भगत सिंह कोश्यारी नही पचा पाये और दिल्ली जाकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने खंडूरी के बारे में दुष्प्रचार फैलाते रहे... पार्टी हाई कमान भी कभी निकाय चुनाव तो कभी पंचायत चुनावो का हवाला देकर अक्सर उनकी मांग को ठुकराता रहा.. दरअसल देहरादून की कोश्यारी वाली विधायको की एक लाबी ने खंडूरी को चलने ही नही दिया ... क्युकि कोश्यारी के विधायको के समर्थन को नजरअंदाज करते हुए खंडूरी राज्य के मुख्यमंत्री बना दिए गए...


साथ में जनरल ने कई भारी भरकम मंत्रालय अपने पास रखे जिस कारन राज्य के मंत्रियो की मन माकिफ मंत्रालय पाने की उम्मीद धराशायी हो गई.. राज्य के एक नए विधायक की माने तो राज्य की भाजपा सरकार में गुट बाजी बढाने में कोश्यारी जैसे नेताओ का हाथ रहा ... वह अपने को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे जिस कारन बार बार वह खंडूरी जी की सरकार को अस्थिर करते रहे...


कोश्यारी ने जब जब विधायको को लामबंद कर अपने पाले में लेकर हाई कमान के सामने खंडूरी हटाओ की मांगे रखी तब तब जनरल और ज्यादा मजबूत होते गए... इसी के चलते राज्य में निकाय ,पंचायत चुनावो में भाजपा ने खंडूरी के नेत्तृत्व में धमाकेदार जीते दर्ज की ....पर इन सब के बाद भी कोश्यारी के चेहरे पर खुशी नाम की चीज नही रही॥ भला रहती भी क्यों नही? राज्य में खंडूरी को सी ऍम बना दिया गया....


पहली बार राज्य में ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया गया जिसकी इमानदारी के चर्चे अटल बिहारी की सरकार के समय जोर शोर से हुआ करते थे...पर कोश्यारी के कुछ विधायको के पर खंडूरी ने छोटे मंत्रालय देकर कतर दिए..... यह सब उनको नागवार गुजरा और वह न्याय की फरियाद पाने कोश्यारी के पास पहुच जाया करते थे...


कोश्यारी कई बार राजनाथ और आडवाणी के यहाँ खंडूरी को हटाने की परेड विधायको को साथ लेकर किया करते थे ... पर हर बार पार्टी हाई कमान उनको आश्वाशन देकर मतभेदों को आपस में बैठकर सुलझाने की सलाह देता रहता था..बाद में जब बहुत हद हो गई तो पार्टी ने एक फोर्मुले के तहत कोश्यारी की राज्य की राजनीति से छुट्टी कर दी ..... इसी कारन पार्टी ने उनको उत्तराखंड की सक्रिय राजनीती से केन्द्र की राजनीती करने राज्य सभा भेज दिया पर इसके बाद भी कोश्यारी के बगावती तेवरों में कमी नही आई....


लोक सभा चुनाव में ५ सीट गवाने के बाद कोश्यारी ने फिर खंडूरी के ख़िलाफ़ अपना मोर्चा खोल दिया..इस बार तीर निशाने पर लग गया .... खंडूरी की ५ सीटो पर हार ने उनकी सी ऍम की कुर्सी से विदाई करवा दी....खंडूरी की विदाई के बाद कोश्यारी को आस थी वह राज्य के मुख्यमंत्री बन जायेंगे पर हाई कमान ने उनको इस बार लंगडी दे दी... ख़ुद खंडूरी ने इस बात को बताया कोश्यारी ने लोक सभा चुनावो में पार्टी के लिए काम नही किया जिस कारन विरोधियो को पुरस्कृत नही किया जाना चाहिए॥


कोश्यारी अपनी पसंद के प्रकाश पन्त को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे पर खंडूरी ने निशंक को आगे कर कोश्यारी को पस्त कर दिया ॥इसके बाद बची सिंह रावत की छुट्टी का माहौल बनना शुरू हो गया.... वह भी नैनीताल सीट नही जीत सके शायद पार्टी हाई कमान उनकी कपकोट के बाद विदाई का इच्छुक था ... पर कपकोट जीतने के बाद भी बचदा की विदाई नही हो पायी .... शायद उनके संभावित उत्तराधिकारी के नाम पर मुहर नही लग पायी ... तभी उनकी कुर्सी विकासनगर के चुनाव परिणाम आने के कुछ दिन तक सलामत रह गई....अब विकास नगर चुनाव जीतने के साथ ही खंडूरी के बाद लोक सभा में हार की गाज बचदा पर गिरी है ...


पार्टी ने उनके स्थान पर निशंक सरकार में केबिनेट मंत्री रहे बिशन सिंह चुफाल को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनाया है...चुफाल के अध्यक्ष बनने के साथ ही पार्टी हाई कमान ने यह संदेश देने की कोशिश की है हार की जिम्मेदारी सामूहिक है ..गौरतलब है की कुछ दिनों पहले भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री खंडूरी ने जसवंत और शौरी के सुर में सुर मिलाते हुए यह बात कही थी की पार्टी में हार के लिए जिम्मेदारी तय नही की जाती ॥ यही नही खंडूरी द्बारा राजनाथ को लिखे गए उस पत्र की मीडिया में बड़ी चर्चा हुई थी जिसमे उन्होंने कहा था मुझसे हार के बाद जबरन इस्तीफा लिया गया ...


अब कम से कम चुफाल की ताजपोशी से यह साफ हुआ है पार्टी राज्य में 5 सीट हारने के बाद गंभीर है .... जिस तरीके से चुफाल की ताजपोशी हुई है उससे कोश्यारी कैंप को फिर से करारी हार मिली है ..यहाँ यह बताते चले कभी कोश्यारी के करीबी रहे चुफाल राज्य में खंडूरी की सरकार बन्ने वाले समय से खंडूरी के खासमखास रहे है ....इसकी एक बानगी उस समय देखने को मिली थी जब खंडूरी और कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाये जाने को लेकर २००७ में देहरादून के एक होटल में सिग्नेचर अभियान चला था तब बिशन सिंह चुफाल ने निशंक का साथ देकर खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाये जाने की मांग रखी थी....


जब चुफाल के हाथ बागडोर सौपे जाने का समाचार मैंने सुना तो अपनी देहरादून वाली २ साल की याद ताजा हो गई तब हम भी देहरादून में सत्ता के लटके झटके देख रहे थे ..आज सोच रहा हूँ खंडूरी से यह गहरी निकटता बिशन सिंह चुफाल के लिए फायदे का सौदा बनकर उभरी है ..खंडूरी ने अपने मंत्रिमंडल विस्तार में चुफाल का हमेशा ध्यान रखा ॥ उनको हमेशा मलाईदार मंत्रालय दिए... चुफाल ने भी अपने कामो को बखूबी अंजाम दिया...खंडूरी के जाने के बाद भी निशंक ने चुफाल का ध्यान रखा ... तभी वन, पर्यावरण ,सहकारिता , ग्रामीण अभियंत्रण परिवहन जैसे मंत्रालय देकर चुफाल को अपना करीबी बनाये रखा ...इस बार पार्टी राज्य में ५ सीट बुरी तरह हार गई... हार का पोस्ट मार्टम तक नही किया गया .... हार का दोष खंडूरी को दे दिया गया ...किसी ने इस बात पर मंथन नही किया इस लोक सभा चुनाव में खंडूरी की केबिनेट के सारे मंत्रियो की विधान सभा में भाजपा बुरी तरह हारी ...सिवाय बिशन सिंह चुफाल की विधान सभा को छोड़कर अन्य जगह भाजपा को कांग्रेस के हाथो पटखनी मिली....हार के लिए जब जवाबदेही तय होती तो पार्टी आलाकमान ने खंडूरी, बचदा के साथ सारे मंत्रियो की भी क्लास लेनी चाहिए थी पर उन्होंने खंडूरी और बचदा को बलि का बकरा बना दिया...


चुफाल को बागडोर सोपने के पीछे हाई कमान की एक मंशा लोक सभा चुनावो में उनकी अपनी विधान सभा में भाजपा को मिली बम्पर बदत भी रही है......बिशन सिंह चुफाल की छवि सीधे सादे नेता की रही है ... चुफाल के राजनीतिक जीवन की शुरुवात ८० के जनान्दोलनों से हुई ॥ १९८३ में ग्राम प्रधान बने चुफाल 19८६ में डी डी हट के ब्लोक प्रमुख निर्वाचित हुए..इसके बाद १९८४ से १९९२ तक पिथोरागढ़ जिले में भाजपा जिला अध्यक्ष रहे ..१९९६ में पहली बार अविभाजित उत्तर प्रदेश में विधायक चुने गए... राज्य की नित्यानंद स्वामी सरकार में चुफाल कबीना मंत्री रहे ... यह सिलसिला २००२ में भी जारी रहा ... हाँ ,यह अलग बात है उस समय राज्य में पहले विधान सभा चुनावो में कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल की... जिसके चलते भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा था....२००७ के चुनावो में कांग्रेस के नए चेहरे हेम पन्त को पटखनी देने के बाद चुफाल फिर से विधायक चुने गए...सरल स्वभाव के धनी चुफाल में सीधे आदमी के दर्शन होते है ..आधुनिक राजनीतिक तड़क भड़क और दिखावे से कोसो दूर रहने वाले चुफाल उत्तराखंड में भाजपा के युवा पोस्टर बॉय है.. शालीनता ,सरलता, सादगी ही शायद उनकी राजनीती का मूल मन्त्र है ॥


चुफाल की राजनीती को करीब से देखने का सौभाग्य मुझे मिला है...२००७ के चुनावो की याद आज भी जेहन में बनी है तब चुफाल गाव गाव वोट मांगने जाया करते थे ...तब उनकी विधान सभा से ताल्लुक रखने वाले बरला के अनिल कहा करते थे चुफाल की पकड़ गावो के चूल्हों तक है ... अभी जैसे ही उनके अध्यक्ष के रूप में शपथ ग्रहण करने की ख़बर आई तो अनिल की बात सोलह आने सच हो गई ....


कम से कम पार्टी हाई कमान को भी इस बात का एहसास हो गया चुफाल में लम्बी रेस का घोड़ा बन्ने की काबिलियत है ॥चुफाल को राज्य में कमान सौपकर भाजपा ने एक तीर से कई निशाने खेल दिए है ॥ इससे भगत सिंह कोश्यारी के समर्थको को जहाँ फिर से ठिकाने लगाने की कोशिस की गई है वही कुमाऊ गडवाल में संतुलन कायम करने की कोशिस की गई है ..पिछली बार खंडूरी जब सी ऍम थे तो ब्राह्मणहोने के साथ वह गडवाल से थे वही दूसरी तरफ़ बची सिंह रावत राजपूत थे जो कुमाऊ से ताल्लुक रखते थे .... इस बार भी ऐसा कुछ किया गया है .. निशंक गडवाल से है तो चुफाल कुमाऊ से ..भाजपा ने २०१२ के चुनावो की तैयारी शुरू कर दी है ॥


चुफाल के हाथ भाजपा की बागडोर है....उनको सभी को साथ लेकर चलना है .... साथ ही गुटों में विभाजित भाजपा को एकजुट करना है ... खंडूरी की कुर्सी खाली होने के बाद भी कोश्यारी के समर्थक चुप बैठ जायेंगे ऐसी उम्मीद करना बेमानी है ...क्युकि कोश्यारी की मुख्यमंत्री बन्ने की लालसा कब जाग जाए यह कह पाना मुश्किल है ? साथ ही विकासनगर में भाजपा के जीत जाने के बाद खंडूरी चुप बैठ जायेंगे ऐसी उम्मीद करना भी बेमानी होगी...ऐसे में चुफाल को फूक फूक कर अभी से कदम रखने होंगे....चुफाल के सामने जनता तक पहुचने की भी चुनोती है ...


मुख्यमंत्री आम कार्यकर्त्ता और मंत्रियो के लिए उपलब्ध रहे इसका उनको ध्यान रखना होगा....साथ ही सरकार और संगठन को साथ लेकर चलना होगा तभी उत्तराखंड में २०१२ में कमल खिल सकता है..नही तो अभी के हालत देखकर नही लगता पार्टी खंडूरी के जाने के बाद बहुत अच्छी स्थिति में है...निशंक ने विकास नगर सीट भाजपा प्रत्याशी कुलदीप को जीता तो दी है लेकिन जीत का अन्तर बहुत मामूली रहा ..लोक सभा की पाँच सीट गवाने के बाद भाजपा ने यह सीट जीतकर निशंक सरकार की नाक बचाई है ...


रही बात चुफाल की तो उनको निशंक के साथ मिलकर काम करना होगा....राज्य की जनता में इस समय भाजपा सरकार को लेकर आक्रोश चरम पर है ॥ जनता आए दिन हड़ताल कर रही है ॥ सड़क , बिजली, पानी जैसी बुनियादी समस्यायें जस की तस है.... जिन उद्देश्यों को लेकर राज्य की लड़ाई लड़ी गई थी वह पूरे नही हो पाये है.... खंडूरी के जाने के बाद कानून व्यवस्था की स्थिति ख़राब हो गई है... भू माफियाओ की सक्रियता पैर पसार रही है॥ करप्शन चरम पर है ...


बिना रिश्वत के कोई काम नही बनता ... पहाड़ से पलायन थमने का नाम नही ले रहा ..ऐसे विषम हालातो में भाजपा की हालत अच्छी नही कही जा सकती ..चुफाल को इन सब विषम परिस्थितियों से जूझना है ...उनको अगर २०१२ में फतह हासिल करनी है तो निशंक के साथ कदम से कदम मिलकर चलना होगा...नही तो राज्य में भाजपा की दुर्गति को कोई नही रोक पायेगा ...देखना होगा चुफाल इस बार केन्द्रीय नेतृत्व की उम्मीदों में कितना खरा उतर पाते है ?



रविवार, 27 सितंबर 2009

रहस्य बनी रूसिया की मौत

















शान ऐ भोपाल कही जाने वाली भोपाल एक्सप्रेस ट्रेन में पिछले दिनों एक बड़ी घटना घटी ..... इसको कोई मामूली घटना नही कह सकते... ट्रेन में भोपाल विकास प्राधिकरण के सीईओ मदन गोपाल रूसिया गायब हो गए ... उनकी लाश १ दिन बाद आगरा में मिली ... १० सितम्बर की रात को रूसिया दिल्ली से भोपाल लौट रहे थे ॥इस दौरान उनके साथ विधायक डागा भी इसी ट्रेन में एसी कोच में साथ सवार थे..मामला चौकाने वाला है क्युकि पुलिस को दिए बयान में डागा ने इस बात को स्वीकार किया वह ट्रेन में पूरी रात सोये थे जिस कारण उनको रूसिया के लापता होने का पता नही चला ... रूसिया और डागा ट्रेन में साथ साथ आ रहे थे और अगली सुबह रूसिया की फ़िक्र छोड़कर डागा भोपाल पहुचकर उतरने की तैयारी कर रहे थे....
यहाँ यह बताते चले की रूसिया और डागा विद्या नगर की विकास योजना को अमली जामा पहनाने के लिए भूमि अधिग्रहण सम्बन्धी कुछ कागजातों के साथ दिल्ली रवाना हुए थे... यह जमीन जिसके अधिग्रहण की कार्यवाही चल रही है वह २६ एकड़ है जिसमे ८ एकड़ जमीन सरकारी है बाकी जमीन डागा की है...इसी सिलसिले में बात करने के लिए डागा अपने साथ रूसिया को सुप्रीम कोर्ट के वकील के घर ले गए थे॥ रूसिया के परिजनों का कहना है इस मौत के लिए डागा जिम्मेदार है ... बताया जाता है इस जमीन के नियम शिथिल करने के लिए डागा रूसिया पर दबाव बनाये हुए थे..वह इस जमीन का ज्यादा मुआवजा चाहते थे .....रूसिया नियमो को तोड़कर कोई काम नही करना चाहते थे जिस कारण डागा ने रूसिया को रास्ते से हटा दिया हो ऐसी आशंका से इनकार नही किया जा सकता .... जिस समय रूसिया ट्रेन से लापता हुए उस समय तकरीबन ११ बजकर ५५ मिनट का समय हुआ था... इस समय यह ट्रेन आगरा के पास पहुचती है ..ख़ुद डागा ने यह बयान दिया है.... विधायक जीतेन्द्र की माने तो आगरा में दोनों ने साथ साथ भोजन किया था भोजन के बाद उनकी आँख लग गई और उनकी नीद भोपाल में खुली ...भोपाल पहुचकर जब उनकी सीट पर नजर गई तो वह खाली थी उसमे रूसिया के जूते और सामान रखा था ...
यही पर से रहस्य गहरा गया है...बड़ा सवाल यह है रूसिया की आँखे सुबह ट्रेन के भोपाल पहुचने में ही क्यों खुली ? रूसिया के फ़ोन कॉल की डिटेल कह रही है सुबह ६ बजने के बाद उनके द्बारा सुनील नाम के किसी व्यक्ति से बात की गई है ... अगर डागा सो रहे थे तो सुनील से उनकी बात पहले ही कैसे हो गई जबकि यह ट्रेन आमतौर पर ७ बजे भोपाल पहुचती है ... अगर वह सो रहे थे फ़ोन पर कोई भी बात ७ बजे के बाद ही होनी चाहिए थी......साथ ही ऐसा भी कहा जा रहा है रूसिया जिस बर्थ में सवार थे वहां पर कोल ड्रिंक के साथ मदिरा पान भी किया गया था ऐसे में इस घटना को सोच समझकर अंजाम दिए जाने की बात कही जा सकती है...इस मामले में शक की सुइया रेलवे पर भी है ॥ रूसिया के सहायक ने उनके सीट के नीचे रखी शराब की बोतल को क्यों फैक दिया यह बात भी किसी को समझ नही आ रही है ... पता चला है की रेलवे की जांच में अभी कुछ दिनों बाद इस बात का खुलासा होना है की रूसिया की सीट के नीचे शराब की बोतल के सबूत को कोच के २ सहायको ने जान बुझकर मिटाने का प्रयास किया है... साथ ही इस मामले से एक बात और निकलकर सामने आ रही है ...ट्रेन के भोपाल पहुचने के ३ घंटे बाद रूसिया की गुमशुदगी की रिपोर्ट क्यों लिखाई गई ? कहा जा रहा है किसी ने कोच के सहायक को मोटी रकम देकर मामले को बड़ी सूझ बूझ से अंजाम दिया है




रूसिया की मौत के बाद भोपाल में बवंडर मच गया...रूसिया के परिजनों ने तो उनके लापता होने के बाद विधायक जितेन्द्र को ही अपने निशाने पर ले लिया... वही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान रूसिया मसले पर बेक फ़ुट में आ गए ... विधायक उनकी भाजपा का जो है..यही नही विधायक की भाजपा की कद्दावर नेता सुषमा स्वराज से निकटता है.... भोपाल के हवाई अड्डे के पास खरीदे गए एक फार्म हाउस को जितेन्द्र ने सुषमा के नाम कर दिया था .. सुषमा के भोपाल आने पर वहां जाना अक्सर लगा रहता ....जितेन्द्र का भोपाल में प्रोपर्टी का बड़ा कारोबार है .. वह सुषमा सरीखी बड़ी नेता की आड़ में बेखोफ होकर अपने कारोबार को फैलाने में जुटे थे ....इसका पता अपन को एक बुजुर्ग सज्जन ने बताया ...उनकी माने तो विधान सभा का टिकेट जितेन्द्र को दिलवाने में सुषमा की खासी अहम् भूमिका रही है ... हाँ, यह अलग बात है रूसिया मामले में जितेन्द्र के नाम के सामने आने के बाद सुषमा उनसे पल्ला झाड़ रही है ..




रूसिया की मौत की गुत्थी सुलझाना ३ राज्यों की पुलिस के लिए भी मुश्किल होता जा रहा है ..उनकी मौत आगरा के आस पास ही हुई है यह तो तय है ॥ लाश का आगरा से ३० किलोमीटर दूर मिलना इस बात को प्रमाणित कर देता है... अब यह पता नही लग पा रहा है उनको ट्रेन से नीचे फैका गया या अगुवा कर मारा गया .... रूसिया से मध्य प्रदेश की सियासत गरमा गई है ....पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने तो दो टूक कहा है इस मामले की सी बी आई जांच होनी चाहिए॥ दिग्गी राजा के साथ विभिन्न लोगो की जांच की मांगो और प्रदेश की भाजपा सरकार के खिलाफ बनते माहौल को देखते हुए मुख्यमंत्री शिव राज सतर्क हो गए है .... उन्होंने रूसिया मामले की जांच सी बी आई से करवाने के लिए एक पत्र उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को लिखा है ...




इस रूसिया मामले में प्रदेश की शिवराज सरकार पर दवाब उस समय बन गया जब कई लोगो ने इसे हादसा मानने से इनकार कर दिया ... मामले पर भोपाल विकास प्राधिकरण के एक अधिकारी श्रीराम का मुह खुलने के बाद तो सरकार के कान ही खड़े हो गए..उन्होंने विधायक जितेन्द्र पर भोपाल विकास अथॉरिटी को धमकाने के आरोप लगा डाले.... साथ ही श्रीराम की माने तो रूसिया इस भूमि वाले मसले पर विधायक के दबाव के चलते पिछले कुछ समय से परेशान थे ..




विधायक जितेन्द्र इस मसले पर अपना नाम घसीटे जाने से आहत है॥ उनकी माने तो इस प्रकरण पर उनको जबरन फसाया जा रहा है ..लेकिन बड़ा सवाल यह है वह पुलिस को सही बयान क्यों नही दे रहे है॥ पता चला है मध्य प्रदेश की पुलिस और दिल्ली के साथ उप की पुलिस को दिए गए उनके बयानों में बड़ा विरोधाभास है॥ शिव राज ने समझ दिखाकर गेंद को "उप " की "बहिन जी " के पाले में फैक दिया है ..ऐसे में रूसिया के रहस्य का पर्दा कब हटेगा कह पाना मुश्किल है ?

सोमवार, 21 सितंबर 2009

तस्करों के निशाने पर यारसा गम्बू ............

उत्तराखंड गठन के बाद सामरिक दृष्टी से बेहद संवेदनशील पिथोरागढ़ जिले के उच्च हिमालयी इलाकों में जडी बूटी के तस्करों के गिरोह कुछ ज्यादा ही सक्रिय हो गए है ....... मादक पदार्थो और जीव जन्तुओ की तस्करी के लिए सबसे मुफीद माने जाने वाले इस छोटे से राज्य में अब तस्करों के निशाने पर दुर्लभ ओषधि कीडा जडी आ गई है......

बुग्यालों के बीच १३००० फीट की ऊँचाई पर पाई जाने वाली इस औषधि को स्थानीय भाषा में कीडा जडी नाम से जाना जाता है..... वैसे यह "यारसा गम्बू " नाम से लोकप्रिय है..... अन्तराष्ट्रीय बाज़ार में जडी की जबर्दस्त मांग के चलते जिस तरीके से तस्कर इसका अंधाधुन्द दोहन करने में लगे हुए है उसको देखते हुए इसके अस्तित्व के नाम पर सवाल उठ रहे है....... लेकिन राज्य सरकार और वन विभाग तस्करों के सामने नतमस्तक नजर आते है .....

उच्च हिमालयी इलाकों में पाई जाने वाली यह जडी एक ऐसा कवक है जो तितली की प्रजाति "माथ" के लार्वा में पलता है ....... दिलचस्प बात यह है बर्फ़बारी के साथ ही इसका विकास शुरू होता है और बर्फ पिघलने पर तस्कर इसका दोहन करने पहाडियों पर चल निकलते है...... यही वह समय होता है जब कीडा जडी के गुलाबी रंग का निचला हिस्सा भोजन के लिए हिलता डुलता है.....


तस्कर इसका दोहन कर इसको पीसते है और कैप्सूलों में भरकर इंटरनेशनल मार्केट में पहुचाते है...... यौन शक्ति वर्धक होने के साथ ही यह कीडा जडी बाँझपन , दमा , केन्सर, किडनी , हृदय और फेफडो के रोगों के लिए रामबाण समझी जाती है .....इसके अलावा इसमे कई तरह के विटामिन और खनिज पाए जाते है जो लाभकारी साबित होते है..........

९० के दशक में इसकी विशेषता तिब्बत के व्यापारियों ने भारतीय व्यापारियों को बताई .........तभी से इसके दोहन की शुरूवात हो गई...... इंटरनेशनल मार्केट में इसकी तस्करों को मुहमांगी कीमते मिल जाती है जिसके चलते इसके दोहन की रफ़्तार नही थम रही है...... एक मोटे अनुमान के अनुसार इंटरनेशनल मार्केट में इसकी कीमत १.५० लाख से २ लाख रुपए तक है ....... दिल्ली में ५० से ७५ लाख तो चाइना में पूरे २ लाख तक की कमाई हो जाती है .......इसकी डिमांड बीजिंग, ताइवान, हांगकांग जैसे शहरों में ज्यादा है .......कई बार तो इन शहरों में मनचाही कीमते मिल जाती है .....

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बाज़ार में इसकी बड़ी मांग है और मांग के अनुरूप उतार चदाव आता रहता है .....वन विभाग के पास तस्करों को पकड़ने के लिए इंतजामों की कमी के चलते उत्तराखंड के बुग्यालों में कीडा जडी का अवेध कारोबार हर वर्ष साल के अंत में धड़ल्ले से चलता है ..... जनवरी के हिमपात के बाद तस्करों की सक्रियता इलाके में बढ जाती है...... तस्करों के रास्तो की खोज करना वन विभाग के लिए हमेशा टेडी खीर साबित होता है....

सीमान्त जनपद पिथोरागढ़ की चिप्लाकेदार की पहाडिया यारसा की तस्करी के लिए कोलार की खाने है...... एक किलो ग्राम यारसा गम्बू में १००० कीडे आते है...... एक कीडे की कीमत १०० से १५० रुपये तक होती है....... बाजार में इसके दामो में उतार चदाव आता रहता है....... धन के मोह में सीमान्त के उच्च हिमालयी इलाकों में प्रवास के लिए जाने वाले लोग इसको खोजने महीनो तक जुटे रहते है ...... प्रतिबन्ध की तलवार लटकने का डर ग्रामीणों को सताता रहता है जिस कारन वह इसको हिमालयी इलाकों में ही औने पौने दामो में तस्करों को बेचकर चले आते है .......फिर इसको तस्कर गुप्त मार्गो के द्वारा इंटरनेशनल मार्केट में पहुचाते है...............

जडी के अवेध दोहन से उत्तराखंड सरकार को वर्षो से करोडो के राजस्व का चूना लग रहा है.... इस बाबत पूछने पर वन विभाग के आला अधिकारियो का कहना है वर्षो से इसकी तस्करी को देखकर विभाग खासा मुस्तैद है..... जिसके चलते संभावित इलाकों में हथियारों से लेस टीम का गटन हर वर्ष किया जाता है ......

रक्षा अनुसन्धान केन्द्र पिथोरागढ़ के वैज्ञानिको का कहना है उच्च हिमालयी इलाको में पाई जाने वाली जिन जडी बूटियों का उनके द्वारा गहन अध्ययन किया गया उसमे यारसा गम्बू भी शामिल थी ..... वैज्ञानिको ने पाया इसको छोटे आकर के चलते ढूँढ पाना दुष्कर होता है .......यह छोटे आकर में मिलती है ....... उन्होंने इसको न केवल यौन बताया गया बल्कि कई बीमारियों की रामबाण दवा से भी नवाजा .....

वैज्ञानिको ने पाया अत्यंत शक्ति वर्धक होने के कारण इसके सेवन से तुंरत फुर्ती आ जाती है जिस कारन बड़े पैमाने पर एथलीट इसको लेते है .......दिलचस्प बात तो यह है इसको लेने के बाद डोपिंग में यह बात पता नही चलती एथलीट ने कीडा जडी युक्त कैप्सूल का सेवन किया है ......इस लिहाज से देखे तो कई असाध्य बीमारियों का तोड यारसा में है जिस कारन तस्कर चाहकर भी इसके दोहन से पीछे नही हट पाते......

सोमवार, 7 सितंबर 2009

वर्षा ऋतु का त्यौहार है हिलजात्रा............

लोकसंस्कृति का सीधा जुडाव मानव जीवन से होता है..... उत्तराखंड अपनी प्राकृतिक सुषमा और सौन्दर्य का धनी रहा है ..... यहाँ पर मनाये जाने वाले कई त्योहारों में अपनी संस्कृति की झलक दिखाई देती है... राज्य के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ में मनाये जाने वाले उत्सव हिलजात्रा में भी हमारे स्थानीय परिवेश की एक झलक दिखाई देती है...
हिलजात्रा एक तरह का मुखोटा नृत्य है .... यह ग्रामीण जीवन की पूरी झलक हमको दिखलाता है... भारत की एक बड़ी आबादी जो गावों में रहती है उसकी एक झलक इस मुखोटा नृत्य में देखी जा सकती है... हिलजात्रा का यह उत्सव खरीफ की फसल की बुवाई की खुशी मनाने से सम्बन्धित है... इस उत्सव में जनपद के लोग अपनी भागीदारी करते है...
"हिल " शब्द का शाब्दिक अर्थ दलदल _ कीचड वाली भूमि से और "जात्रा" शब्द का अर्थ यात्रा से लगाया जाता है ... कहा जाता है मुखोटा नृत्य के इस पर्व को तिब्बत ,नेपाल , चीन में भी मनाया जाता है... उत्तराखंड का सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ सोर घाटी के नाम से भी जाना जाता है ...यहाँ पर वर्षा के मौसम की समाप्ति पर "भादों" माह के आगमन पर मनाये जाने वाला यह उत्सव इस बार भी बीते दिनों कुमौड़ गाव में धूम धाम के साथ मनाया गया...इस उत्सव में ग्रामीण लोग बड़े बड़े मुखोटे पहनकर पात्रो के अनुरूप अभिनय करते है.....
कृषि परिवेश से जुड़े इस उत्सव में ग्रामीण परिवेश का सुंदर चित्रण होता है......इस उत्सव में मुख्य पात्र नंदी बैल , ढेला फोड़ने वाली महिलाए, हिरन, चीतल, हुक्का चिलम पीते लोग, धान की बुवाई करने वाली महिलाए है ....
कुमौड़ गाव की हिलजात्रा का मुख्य आकर्षण "लखिया भूत " होता है... इस भूत को "लटेश्वर महादेव" के नाम से भी जानते है॥ मान्यता है यह लखिया भूत भगवान् भोलेनाथ का १२वा गण है ... कहा जाता है इसको प्रसन्न करने से गाव में सुख समृधि आती है... हिलजात्रा का मुख्य आकर्षण लखिया भूत उत्सव में सबके सामने उत्सव के समापन में लाया जाता है... जिसको २ गण रस्सी से खीचते है...यह बहुत देर तक मैदान में घूमता है ..... माना जाता है यह लखिया भूत क्रोध का प्रतिरूप है...... जब यह मैदान में आता है तो सभी लोक इसकी फूलो और अक्षत की बौछारों से उसका हार्दिक अभिनन्दन करते है...इस दौरान सभी शिव जी के १२ वे गण से आर्शीवाद लेते है...कहते है इस भूत के प्रसन्न रहने से गाव में फसल का उत्पादन अधिक होता है ...
कुमौड़ वार्ड के पूर्व सभासद गोविन्द सिंह महर कहते है यह हिलजात्रा पर्व मुख्य रूप से नेपाल की देन है... जनश्रुतियों के अनुसारकुमौड़ गाव की "महर जातियों की बहादुरी के चर्चे प्राचीन काल में पड़ोसी नेपाल के दरबार में सर चदकर बोला करते थे ... इन वीरो की वीरता को सलाम करते हुए गाव वालो को यह उत्सव उपहार स्वरूप दिया गया..... तभी से इसको मनाने की परम्परा चली आ रही है ..... आज भी यह उत्सव उल्लास के साथ मनाया जाता है......

रविवार, 30 अगस्त 2009

फिर आई मिस्टर भरोसेमंद की याद.............


"बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले......." यह जुमला टीम इंडिया में अगर किसी खिलाड़ी पर लागू होता है तो वह भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान "मिस्टर भरोसेमंद " कहे जाने वाले राहुल द्रविड़ है...... लंबे समय से अन्तराष्ट्रीय क्रिकेट से दूर रहने वाले राहुल द्रविड़ पर भारतीय चयनकर्ताओ ने एक बार फिर से भरोसा जताया है...

उनकी भारतीय टीम में वापसी के बाद निश्चित ही भारत का मध्य क्रम मजबूत होगा ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए.... राहुल द्रविड़ की प्रतिभा के सभी कायल है ..... उन्होंने खेल के हर डिपार्टमेन्ट में अपनी उपयोगिता को बखूबी साबित कर दिखाया है....... जब भी भारत को उनकी जरूरत हुई है तब तब अपने प्रदर्शन से उन्होंने करोडो खेलप्रेमियों का दिल जीत लिया ...

राहुल को अगर मैच विजेता खिलाड़ी कहा जाए तो कोई गलती नही होगी..... राहुल भारतीय टीम की वाल रहे है..... टेस्ट में भी उनका खेल अच्छा रहा है....लेकिन एक दिवसीय मैचो में चयनकर्ताओ द्वारा उनकी उपेक्षा बीते कुछ सालो से हो रही थी..... दिलीप वेंगसरकर सरीखे चयनकर्ता उनके चयन पर अपनी आँख की भोहें टेडी कर लिया करते थे ... पर इस बार चयनकर्ता उनकी अनदेखी नही कर सकते थे... बताया जाता है इस बार राहुल के चयन में के श्रीकांत (चीका ) की महत्वपूरण भूमिका है ...

श्रीकांत को उन पर पूरा भरोसा है यही कारण है २ साल खेल से दूर रहने के बाद भी राहुल का दाव टीम इंडिया में खेला गया है... देखते है इस बार श्रीलंका में त्रिकोणीय सीरीज़ और साउथ अफ्रीका में चैम्पियंस ट्राफी में भारत की यह दीवार कैसा प्रदर्शन करती है? वैसे इस बार आई पी अल के मैचो में उनका प्रदर्शन अच्छा रहा था .....देखते है अब क्या होता है???



विलक्षण प्रतिभा के धनी थे पर्वत पुत्र.........
भारत रत्न पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त का नाम आज भी राष्ट्रीय राजनीती में बड़े गर्व के साथ लिया जाता है..... पन्त जी के योगदान के कारण वह पूरे राष्ट्र के लिए एक युगपुरुष के समान थे जिसने अपने ओजस्वी विचारो के द्वारा राष्ट्रीय राजनीती में हलचल ला दी... उनके व्यक्तित्व में समाज सेवा , त्याग, दूरदर्शिता का बेजोड़ मिश्रण था.... पूरा देश १० सितम्बर को उनकी १२२ वी जयंती पर याद करेगा...पन्त जी का जन्म १० सितम्बर १८८७ को उत्तराखंड के अल्मोडा जनपद से ३० किलोमीटर दूर हवालबाग विकासखंड के खूंट नमक गाव में हुआ था... प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा अपने जिले में पूरी करने के बाद उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु पन्त जी इलाहाबाद गए... जनमुद्दों की वकालत करने में अग्रणी रहने के कारणइन्होने इलाहाबाद से एल एल बी की डिग्री ली.... १९०५ में इन्होने अपना पूरा जीवन न्यायिककार्यो में समर्पित कर दिया.....पन्त जी के जीवन पर महात्मा गाँधी का खासा प्रभाव पड़ा..... गाँधी जी के कहने पर वकालत को छोड़कर राजनीती में कूद पड़े... तत्कालीन समय में कुमाऊ में दो तरह प्रकार की विचारधाराये प्रचलित थी ... पहली विचारधारा में प्रतिष्ठित लोग हुआ करते थे , जो उस समय अपने को प्रगतिशील मानते थे , वही दूसरी विचारधारा स्वदेश प्रेम सम्बन्धी विचारो से भरी थी... पन्त जी ने अपनी सूझ बूझ द्वारा दोनों विचारधाराओ में सामंजस्य कायम कर कुमाऊ में राष्ट्रीय चेतना फैलाने में अपनी भागीदारी निभाई.... पन्त जी ने गरीबो के शोषण के विरूद्व आवाज उठाते हुए कुली बेगार के खिलाफ विशाल आन्दोलन चलाया...... १९१६ में अपने प्रयासों से कुमाऊ परिसद की स्थापना की और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य चुने गए......१९१६ का वर्ष पन्त जी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण रहा.... इस वर्ष पन्त जी अपने असाधारण कार्यो के कारण किसी के परिचय के मोहताज नही रहे... इस वर्ष राष्ट्रीय राजनीती में वह धूम केतु की तरह चमके... १९२० में गाँधी के साथ असहयोग आन्दोलन में भी इनके द्वारा सक्रिय सहयोग दिया गया..... १९२७ में सर्वसम्मति से कांग्रेस के प्रेजिडेंट चुन लिए गए... १९ नवंबर १९२८ को लखनऊ में जब साईमन कमीशन आया तो नेहरू जी के साथ इन्होने भी इसका पुरजोर विरोध किया... देश की आज़ादी में पन्त जी के योगदान को नही भुलाया जा सकता है... जंगे आज़ादी के दौर में हिमालय पुत्र द्वारा हर आन्दोलन चाहे वह सत्याग्रह हो या असहयोग आन्दोलन हो , अपना पूरा योगदान दिया... इसी कारण आज़ादी के दौर में अपनी सक्रिय भूमिका के चलते पन्त जी को कई वर्षो तक जेल की यात्रा भी करनी पड़ी...१५ अगस्त १९४७ को वह आजाद भारत में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाये गए... इस पद पर वह १९५२ तक कार्य करते रहे... १९५२ में देश का संविधान बनने के बाद प्रथम आम चुनाव हुए जिनका संचालन पन्त जी के प्रयासों से हुआ था ... इन चुनावो में कांग्रेस सरकार ने विजय हासिल की....... १९५४ में जवाहर लाल नेहरू के आग्रह पर केन्द्रीय मंत्रिमंडल में होम मिनिस्टर का ताज पन्त जी ने पहना.... अपने कार्यकाल में पन्त जी ने विभिन्न कार्यो को पूरा करने का भरसक प्रयत्न किया... २६ जनवरी १९५७ का दिन कुमाऊ के इतिहास में बड़ा महत्वपूर्ण रहा... इस तिथि को भारत सरकार द्वारा उन्हें "भारत रत्न" की उपाधि से विभूषित किया गया... ७ मार्च १९६१ को ह्रदय गति रुकने से उनकी मौत हो गई... पन्त जी ने अपने प्रयासों से राष्ट्रीय हित के जितने कार्य किए उनके चलते भारतीय इतिहास में योगदान को नही भुलाया जा सकता ....


मंगलवार, 18 अगस्त 2009

......वाडा को लेकर बीसीसीआई का ऐतराज ...................


आजकल बीसीसीआई और आईसीसी के बीच वाडा एक बड़ी दुविधा बनी हुई है......... वैसे इस बार आईसीसी ने बीसीसीआई की ना के बाद इस विषय पर कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है .... दरअसल जिस वाडा को आईसीसी ने स्वीकार कर लिया है उसको स्वीकार करने से बीसीसीआई कतरा रहा है... इसी कारण दोनों के बीच तलवारे खिच गई है.... वाडा ( विश्व डोपिंग निरोधक एजेन्सी ) है जो खेलो को डोपिंग से बचाने के नए नियमो पर अपनाकाम कर रही है...


वाडा की स्थापना ९० के दशक में की गई ... अब २००९ से उसके द्बारा नए नियम बना दिए गएहै ... वाडा के नए नियमो के अनुसार अब खिलाड़ी डोपिंग परीक्षणों से नही बच सकते... इसके नियमो के अनुसार खिलाड़ी कही भी खेल रहे हो जब जांच के लिए कहा जाएगा उनको हर हाल में उपलब्ध होना पड़ेगा.... खिलाडियों की जांच उस समय भी की जायेगी जब वह नही भी खेल रहे हो..... इस मसले पर भारतीयखिलाडियों के साथ बीसीसीआई को भी ऐतराज है ... बीसीसीआई की माने तो वाडा को यह कोई अधिकार नही हैजब खेल प्रतिस्पर्धा नही हो रही हो तो वह जबरन खिलाडियों की तलाशी ले...

बीसीसीआई को इस पर ऐतराज है .........यह तो कोई बात नही हुई ............खिलाड़ी कब कहा है इसकी सूचना वाडा को उपलब्ध कराये...वाडा के नए नियम बीसीसीआई को नागवार गुजर रहे है..... वैसे पहले इस मसले पर विश्व के कई खिलाड़ी अपना विरोध प्रदर्शन कर रहे थे पर अब उन्होंने इस नए नियमो को स्वीकारने में ही अपनी भलाई समझी है॥ यहाँ यह बताते चले माईकल फेलप्स ,नडाल जैसे दिग्गज खिलाड़ी भी कभी वाडा के नएनियमो के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने में पीछे नही थे लेकिन अब जब सभी खेलो को वाडा के नए नियमो के दायरे में लाया जा रहा है तो विश्व के कई बड़े खिलाड़ी भी वाडा के नए नियमो पर अपनी हामी भरते नजर आ रहेहै... पर अपना बीसीसीआई देखिये वह इन नियमो को स्वीकारने से न जाने क्यों हिचक रहा है...?
बीसीसीआई की यह ना सही नही है.... शायद वह अपनी पैसो की हेकडी के चलते वाडा के नियमो को मानने से मना कर रहा है ....


बीसीसीआई की माने तो वाडा के नए नियम सही नही है ... उसकी माने तो खेलो केदौरान अगर जांच की जाए तो यह बात सही है लेकिन जब खेल ही न हो रहा हो तो जबरन जांच कहा तक जायज है? वाडा के नए नियम इतने कड़े है अगर कोई खिलाड़ी साल में डोपिंग से ना नुकर करता है तो उस पर प्रतिबंध भी लग सकता है ... यह सही है वर्तमान समय में लोग पदक पाने के लिए तरह तरह की उत्तेजक दवाईयों काप्रयोग करते रहते है ....पर अब वाडा के नए नियमो के तहत जब सभी खेलो को एक नजर से देखा जा रहा है तो बीसीसीआई को इस पर क्यों आपत्ति हो रही है?

अब बीसीसीआई की यह बात किसी के गले नही उतर रही है इस जांच के जरिये आप सभी की निजी लाइफ में झाँक रहे है.....यह नियम तो सभी के लिए समान होंगे .... अबऐसा तो नही है की किसी धावक के लिए यह बताना कम्पलसरी है की वह कहा है ? क्या कर रहा है? ऐसा सभीखिलाडियों पर लागू हो रहा है ....

यह वाडा का व्हर अबाउट क्लॉज़ है जो हर किसी पर लागू हो रहा है .... इसमेकिसी खिलाड़ी को नही छोड़ा जा रहा है ..... जब सभी को एक कानून द्बारा एक दायरे में लाया जा रहा है तो हमारेबीसीसीआई को न जाने इस पर क्यों आपत्ति हो रही है?


असल में बात यह है हमारे क्रिकेट के खिलाड़ी अपने को वी आई पी से भी बढकर मानने लगे है ... उनकी असली दिक्कत यह है अगर आउट ऑफ़ सीजन वह डोपिंग में फस जायेंगे तो उनकी सारी प्रतिष्ठा मटियामेट हो जायेगी..... दरअसल हमारे यह क्रिकेट सितारे अपने को बहुत बड़ा आइकन मानने लगे है ...भारत में इनको भले ही देवता जैसा पूजा जाता रहा हो पर इन क्रिकेटरों को विदेशो में उतना मान नही मिल पाता है जितना हमारे यहाँ मिलता है ..... यह भी भ्रम है सचिन , सहवाग, धोनी कमाई के मामले में विश्व में सबसे धनी है .... सच्चाई यह है इनसे कई गुना कमाई विश्व में टेनिस , सूकर खेलने वाले खिलाडियों की है ....


बहरहाल जो भी हो हमारा तो इतना कहना है जब सभी के लिए नियम समान है तो यह क्रिकेटर कोईभगवान् है जो वाडा के नियमो को मानने से इनकार कर रहे है.... कायदे कानून तो सभी के लिए समान ही होते हैचाहे आप हो या हम........................ अब पैसो की हेकडी के चलते बीसीसीआई ने आईसीसी के वाडा वाले फरमानको मानने से साफ़ इनकार कर दिया है ....


इसके लिए ५ सदस्यीय कमेटी बना दी गई है .... उसका फैसला आनाअभी बाकी है ... समिति में अनिल कुंबले , बिंद्रा जैसे लोग शामिल है जो किसी निष्कर्ष पर पहुचेंगे.......देखते हैक्या इस बार आईसीसी बीसीसीआई के आगे झुकती है या नही ? वैसे अभी तक वह बीसीसीआई के इशारो परनाचती रही है. क्युकी बीसीसीआई धनी बोर्ड है पूरे विश्व का .... देखते है वाडा पर इस बार कैसा रवैया अपनाया जाता है ?

शनिवार, 1 अगस्त 2009

कब तक सहते रहेंगे अपमान..............

भारत के पूर्व रास्ट्रपति कलाम के साथ अमेरिका की कांटिनेंटल एयर लाइंस के द्बारा ली गई तलाशी कोई छोटीमोटी घटना नही है ..... इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है अमेरिकी एयर लाइंस ने यह तलाशी भारतीय हवाई अड्डेमें तब ली जब कलाम न्यू जर्सी की फ्लाईट पकड़ने हवाई अड्डे में पहुचे .... चूकि यह घटना भारतीय हवाई अड्डेपर घटित हुई इस कारण इसने आम आदमी का दिल कचोट दिया है॥कम से कम विदेशी एयर लाइंस द्बाराभारतीय प्रोटोकोल के नियमो की अवहेलना इस कदर नही की जानी चाहिए थी ... चौकाने वाली बात तो यह है यह पूरा मामला तीन महीनों से दबा रहा ... हमारी सरकार इस वाकये पर मूकदर्शक बनी रही ॥उसने अमेरिकी एयरलाइंस पर कोई कार्यवाही नही की ॥ प्रफुल्ल पटेल भी इस मसले पर चुप्पी साधे रहे.....

मीडिया में मामला प्रकाश में आने के बाद पटेल को सफाई देनी पड़ी॥ वैसे ,यह घटना भारत से जुड़ी है अतः इस बार बवाल मचा॥ फिर मामला पूर्व महामहिम का था... अरसे पहले हमारे कई नेता इस तरह की जांच प्रक्रियाओं से गुजर चुके है॥पूर्व रक्षा मंत्री फर्नांडीज की एक बार अमेरिका में इस तरह की तलाशी ली जा चुकी है॥ यही नही अपने सोमनाथ दा ने तो एक बार इसके चलते अपना विदेशी दौरा ही रद्द कर दिया था॥इस बार अमेरिका ने कलाम की तलाशी भारत में लेकर पूरे मुल्क को बदनाम करने की कोई कसर नही छोडी...

भारत में हमारे अधिकारियो के बीच इस तरह एक पूर्व रास्ट्रपति के साथ भद्दा व्यवहार नही किया जाना चाहिए था॥साथ ही अमेरिकी विमान कंपनी को यह मालूम होना चाहिए भारत में अमेरिका जैसे कानून नही चला करते है..वैसे मामला मीडिया में आने के बाद एयर लाइंस द्बारा माफ़ी मांग ली गई है लेकिन माफ़ी से काम नही चलेगा..वह तो कलाम का व्यक्तित्व इतना शालीन है की इतनी बेइज्जती होने के बाद भी इस मसले पर उन्होंने अपना मुह नही खोला है ...आख़िर हम इस अपमान को कब तक सहन करते रहेंगे??अमेरिका को किसी दूसरे देश को सिक्यूरिटीका पाठ पदाने की कोई जरुरत नही है ...

बेहतर होगा वह अपने देश में अपने कानूनों के हिसाब से चले ....पूराविश्व उसके अपने कानूनों से नही चलेगा.... हर देश का अपना ख़ुद का संविधान होता है ॥ बाकायदा अलग नियमकानून भी होते है...............इसी तर्ज पर अगर हम किसी अमेरिकी नेता की तलाशी उसके भारतीय दौरे पर लेनेलगे तो बखेडा ही मच जाएगा......

रविवार, 26 जुलाई 2009

कलह ने किया कमजोर............





"अस्सी पार के इस पड़ाव में आडवाणी का सक्रिय राजनीती में बने रहना एक त्रासदी की तरह है...|क्युकि पार्टी मेंजितना योगदान उनको देना था वह दे चुके ...|अब उनकी रिटायर मेंट की एज हो गई है... बेहतर होगा वह अबआराम करे और युवा पीड़ी के हाथ कमान सौप दे.... पर आडवानी का बने रहना यह बताता है भाजपा का संकटअभी खत्म नही हुआ है .......|"
ऊपर का यह बयान भाजपा की सूरते हाल को सही से बताने के लिए काफ़ी है ...|यह बयान कभी भाजपा के थिकटेंक की रीद रहे के एन गोविन्दाचार्य का है जिन्होंने लंबे अरसे से भाजपा को करीब से देखा है ...|वर्तमान में वह भाजपा छोड़ चुके है और राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के संयोजक भी है ...| भाजपा में आज कुछ भी सही नही चलरहा है...| अनुशासन के नाम पर जो पार्टी अपने को दूसरो से भिन्न मानती थी आज वही अनुशासन पार्टी को अन्दर से कमजोर कर रहा है...| चारो ओर हताशा का माहौल है ...| उनतीस सालो के लंबे इतिहास में यह पहला संकट हैजब पार्टी में व्यक्ति की लड़ाई अहम हो गई है...|
पार्टी में अभी भारी उथल पुथल मची हुई है ...|वर्तमान दौर ऐसा है जब भाजपा के पास अपने अस्तित्व को बचाने की गहरी चुनोती है॥| उसके पुराने मुद्दे वोटरों पर अपना असर नही छोड़ पा रहे है...|इसी कारण पार्टी अभी "बेकगेयर " में चल रही है ...| हमारे देश का युवा वोटर जिसकी तादात तकरीबन ६५ फीसदी है वह राहुल गाँधी के " हाथपर मुहर लगाना पसंद करता है ....|परन्तु वह ८१ के पड़ाव पर खड़े आडवाणी को प्रधान मंत्री की कुर्सी पर नही देखना चाहता है॥| यह सवाल भाजपा के लिए निश्चित ही खतरे की घंटी है...|अतः ऐसे में पार्टी को आडवानी पर निर्भरता को छोड़ किसी दूसरे नेता को आगे करने पर विचार करना चाहिए..|परन्तु लोक सभा चुनाव निपटने के बाद अभी भी भाजपा आडवानी का विकल्प नही खोज पा रही है यह अपने में एक चिंता जनक बात है...|
हमको तो समझ से परे यह बात लगती है आडवानी ने चुनावो से पहले यह कहा था अगर वह इस बार पी ऍम नहीबन पाये तो राजनीती से सन्यास ले लेंगे....लेकिन अभी तक आडवानी कुर्सी से चिपके हुए है..|उनके माथे पर हार की कोई चिंता नजर नही रही है ...| फिर से रथ यात्रा की तैयारिया की जाने लगी है...|
पार्टी में बहुत से नेता हार का दोष आडवानी को दे रहे है...|पर आडवानी की माने तो "जब पार्टी जीतती है तो यह सभी की जीत होती है हारती है तो यह भी सभी की हार होती है "...| अब साहब इस बयान के क्या अर्थ निकाले? मतलब साफ है अगर भाजपा इस चुनाव में हारी है तो सिर्फ़ उनके कारण नही...|आडवानी की "मजबूत नेता निर्णायक सरकार " कैम्पेन के रणनीतिकार सुधीन्द्र कुलकर्णी ने भी अपने एक लेख में उनको बचाया है.......|कुलकर्णी ने भी हार का ठीकरा अन्य नेताओ के सर फोड़ा है...|
साफ़ है पराजय के बाद भी आडवाणी हार मानने को तैयार नही है...| तभी तो चुनाव में भाजपा की भद्द कराने केबाद आडवानी ने अपनी पसंद के लोगो को मनचाहे पदों में बैठाने में कोई कसर नही छोडी...| लोक सभा
में उपनेता के तौर पर सुषमा की ताजपोशी और राज्य सभा में जेटली को पुरस्कृत कर आडवाणी ने अपनी मंशा जता दी है....."हार नही मानूंगा... सिक्का तो मेरा ही चलेगा"..........|
आडवानी की मंशा है अभी ज्यादा से ज्यादा लोगो को उनकी मर्जी से महत्वपूर्ण पदों में बैठाया जाए...|यही नही अगर सब कुछ ठीक रहा तो राजनाथ के बाद "अनंत कुमार " पार्टी के नए प्रेजिडेंट हो सकते है...|पर हमारी समझ अनुसार अभी आडवानी को २०१४ के चुनावो के लिए पार्टी को एकजुट करने पर जोर देना चाहिए...| साथ ही उन कारणों पर मंथन करना चाहिए जिनके चलते पार्टी की लोक सभा चुनावो में करारी हार हुई..|अभी महीने पहले हुईभाजपा की
रास्ट्रीय कार्य समिति की बैठक में हार के कारणों पर कोई मंथन नही किया गया...| निष्कर्ष निकला "दिन चले अदाई का कोस"......| वहाँ भी एक दूसरे पर टीका टिप्पणी जमकर हुई.....|पर हार के कारणों पर कोईमंथन नही हुआ.........|
भाजपा को यह समझना चाहिए इस चुनाव में आतंरिक कलह ने उसको अन्दर से कमजोर कर दिया....| राजानाथ के साथ आडवानी का ३६ का आंकडा जगजाहिर था साथ में पार्टी के कई बड़े नेता उनको प्रधान मंत्री पद की कुर्सी पर बैठते नही देखना चाहते थे...|चुनावी प्रबंधन सही से हो पाने के चलते पार्टी की करारी हार हुई.....|गौर करनेलायक बात यह है आज भाजपा में वह जोश नही है जो अटल बिहारी वाजपेयी जी के दौर में था ...|उस दौर में पार्टीमें एकजुटता थी .....| पर आज पार्टी में पञ्च सितारा संस्कृति हावी हो चुकी है...| पार्टी अपने मूल मुद्दों से भटक गईहै...| सत्ता की मलाई चाटते चाटते पार्टी इतनी अंधी हो गई है "हिंदुत्व " और एकात्म "मानवता वाद " रद्दी की टोकरी में चले गए है...|आज पार्टी यह तय नही कर पा रही है किस विचारधारा में चलना उसके लिए सबसे अच्छाहै...| संघ के साथ रिश्ते बनाये रखे या उससे अपने रिश्ते तोड ले इस पर पार्टी में कलह मचा हुआ है...|
पार्टी यह नही समझ पा रही है उसका हिंदुत्व किस तरह का है? परन्तु संघ की काली छाया से पार्टी अपने कोमुक्त कर लेगी ऐसा मुश्किल दिखाई देता है ..|भाजपा को इस बात को समझना चाहिए अब समय गया है जब वह किसी नए नेता का चयन करे और बूडे नेताओ पर अपनी निर्भरता को छोड़ दे...|युवा देश की सबसे बड़ी ताकतहै ... २०१४ में कांग्रेस से राहुल गाँधी पी ऍम पद की दौड़ में आगे रहेंगे.... पर भाजपा अपना नया लक्ष्मण नही खोजपा रही है ......| २००४ की तरह इस बार की हार को पार्टी नही पचा पा रही है.....| तभी तो हार के बाद भी अरुण शोरी, यशवंत सिन्हा अपनी वाणी पर लगाम नही लगा पा रहे है ...|
भाजपा की ग्रह दशा इस समय सही नही चल रही है....|सादे साती की यह दशा पार्टी में लंबे समय तक बने रहने काअंदेशा बना हुआ है...| सभी ने जेटली के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला हुआ है..|एक तरफ़ आडवानी के प्रशंसको की लॉबीखड़ी है तो दूसरी तरफ़ राजनाथ के प्रशंसको की कतार ....| एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशे जारी है..| कहाँतो हार की समीक्षा होनी चाहिए थी पर एक दूजे को कुर्सी से बेदखल करने की मुहिम पार्टी में चल पड़ी है...|पार्टी मेंहर नेता अपने को बड़ा समझने लगा है....| और तो और अपने आडवानी बुदापे में ओबामा जैसा बनने की चाहतफिर से पालने लगे है.... ऐसे में पार्टी की खराब हालत कैसे सुधार जायेगी?
इन हालातो में पार्टी में किसी युवा नेता की खोज दूर की कौडी लगती है ...|अगर ऐसा ही रहा तो पार्टी अपने झगडोमें ही उलझ कर रह जायेगी..|वैसे इस कलह ने भाजपा को अन्दर से कमजोर कर दिया है और भगवा पार्टी केभीतर पनप रहे असंतोष के लावे को पूरे देश के सामने ला खड़ा किया है ...| इसी कारण लोग अब भाजपा कीकथनी करनी समझने लगे
है.............|