Wednesday, June 23, 2010

"शिवराज" सरकार के मंत्री विजय शाह का कारनामा....विधान सभा को किया गुमराह.....


आजादी के बाद से भ्रष्टाचार हमारे आचार विचार का एक आवश्यक अंग बन गया है... नेताओं के साथ ही नौकरशाह , अधिकारी, कर्मचारी इसे बढावा देने में पीछे नही है.."स्वर्णिम मध्य प्रदेश" बनाने में लगे प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान के राज में भी यही हो रहा है...

सरकार भ्रष्टाचार के मामले में आये दिन बदनाम हो रही है... ताजा मामला मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के आदिम जातिकल्याण विभाग का है जहाँ एक वित्तीय अनियमितता के आरोप में विभागीय मंत्री कुवर विजय शाह ने ऐसे ३ कर्मचारियों के निलंबन की घोषणा विधान सभा में कर दी जिनका उस विभाग में कोई अस्तित्व ही नही है॥ ऐसे में कुवर साहब अब अपनी घोषणा पर ही विपक्ष के निशाने पर आ गए है.....

जिस स्थान पर नियम कानून बनाये जाते है उसी स्थान पर अगर नियमो की धज्जियाउड़ाई जाए तो ये आम जनता के साथ छलावा है ॥ ऐसा ही कुछ कारनामा कर दिखाया है आदिम जन कल्याण मंत्री विजय शाह ने मध्य प्रदेश में .....


दरअसल ये मामला कार्यालय आयुक्त अनुसूचित जाती विकास निगम का है जहाँ केंद्र की और से विभाग को ७ करोड़ रुपये की राशि दी गयी थी लेकिन विभागीय अधिकारियो की मिली भगत से इस पैसे की बन्दर बांट इस कदर हुई कि अनियमितता के चलते ये मामला मध्य प्रदेश की विधान सभा में भी ध्यानाकर्षण के जरिये उठा था....

२३ मार्च को विधान सभा में आरिफ अकील , अन पी प्रजापति के ७ करोड़ रुपये में से लाखो रुपये के अनियमित भुगतान पर विधान सभा में बहस की थी...

राशी भुगतान में हुई अनियमितता पर बहस के दौरान अनुसूचित जाति विभाग के मंत्री विजय शाह द्वारा चार कर्मचारियों गोविन्द जेठानी, अनिल जी, सावनेर जी, और सुरेश जी के निलंबन की घोषणा की गयी लेकिन इन चारो में से तीन कर्मचारियों का निलंबन सरकार आज तक नही करवा पायी है॥

मजेदार बात तो ये है माननीय मंत्री जी को अभी तक इसकी भनक नही है कितने लोगो के खिलाफ कारवाही हुई है ....निलंबन की घोषणा के बाद के घटनाक्रम को देखने से लगता है विभागीय अधिकारी इस मामले पर लीपा पोती करने में जुट गए है ...

बड़ा सवाल ये है अधिकारियो ने विजय शाह को सोची समझी साजिश के चलते तो नही फसाया? कौन से ऐसे अधिकारी थे जो विधान सभा में " ब्रीफिंग" के समय मौजूद थे...पूरे मामले में कौन से ऐसे अधिकारी थे जिन्होंने मंत्री जी को झूटी जानकारी देकर सदन को गुमराह करने का प्रयास किया... ये ऐसे सवाल है जिनकी पड़ताल किये बिना मामले की तफदीश पूरी नही हो पाएगी.... लेकिन विभागीय अधिकारी इसे चूक मानने से साफ़ इनकार कर रहे है....



माननीय मंत्री जी ने विधान सभा में गोविन्द जेठानी के निलंबन की घोषणा तो सही कर दी लेकिन दुसरे और तीसरे यानि अनिल जी और सावनेर जी नाम के कोई कर्मचारी विभाग में काम ही नही करते ... निलंबित चौथे आरोपी सुरेश जी है लेकिन अनुसूचित विकास निगम में सुरेश नाम के चार कर्मचारी है ॥ ऐसे में किसका निलंबन हुआ है यह अभी तक तय नही हो पाया है?


चौथे ,सुरेश नाम के तीन व्यक्ति है विभाग में .... पहले सुरेश कुमार थापक है जो सहायक संचालक के पद पर काम कर रहे है... अनियमितताओ के समय ये लेखा विभाग में सहायक संचालक के पद पर काम कर रहे थे ... लेकिन वर्तमान में ये लम्बी छुट्टी पर चले गए है...


दुसरे सुरेश है सुरेश कुमार गर्ग सहायक ग्रेड १ शाखा में अभी काम कर रहे है इन पर अभी विभाग में ऊंगली उठ रही है .... बताया जाता है इस पूरे मामले के असली मास्टर माईंड यही है जिन्होंने अशोक शर्मा केशियर के साथ मिलकर पूरे मामले को अंजाम दिया...

सुरेश का अभी तक कोई बाल बाका नही कर पाया है॥ यही नही विभाग के कुछ लोगो ने बताया इसने अभी तक कई फर्जी बिल का भुगतान जेठानी के साथ मिलकर पूरा किया... लेकिन इस मामले पर कुछ कहने से वह बच रहा है उसका कहना है वह बेकसूर है...


तीसरे सुरेश विभाग में है सुरेश कुमार अहिरवार जो वहां चालक है जिनका इस विवाद से दूर दूर तक कुछ भी लेना देना नही है॥ अब विभागीय अधिकारी इस पेशोपेश में उलझे है सुरेश नाम के किसव्यक्ति को बलि का बकरा बनाया जाए... उसके बाद उन्हें अनिल जी और सावनेर जी नाम के कर्मचारियों को पैदा करने की चुनौती से पार पाना है...

बड़ा सवाल है अगर अनियमितता के दोष का सही पता विभाग के द्वारा किया गया होता तो केशियर के साथ ही सहायक संचालक लेखा , अपर संचालक लेखा और आयुक्त को भी जांच के दायरे में लाया जाना चाहिए था.... लेकिन इन चारो में से ३ गलत और एक सही नाम की घोषणा विधान सभा में विजय शाह से करवाकर विभागीय अधिकारियो ने भी अपना दामन बचाने की कोशिश की....

अब सभी के निशाने पर विजय शाह है ॥ अगर वे सही है तो आखिर झूटी घोषणा करने वाले अधिकारी पर वे कार्यवाही करने से क्यों परहेज कर रहे है? विधान सभा में गलत जानकारी देना भी एक अपराध की केटेगरी में आता है ... विजय शाह ने यह सब कर सदन को गुमराह करने का प्रयास किया है॥



विजय शाह से जब मैं इस खबर पर बात करने मंत्रालय में मिला तो पहले तो उन्होंने ये कहा की दोषियों के खिलाफ कारवाही की जायेगी लेकिन जब गलत जानकारी देकर सदन को गुमराह करने की बात मैंने पूछी तो उन्होंने ये कहा वे भी आदमी है इंसान से भी कभी गलती हो जाया करती है...

कुवर विजय शाह मामले को गंभीरता से लेने की बात कर रहे है लेकिन विधान सभा में गलत जानकारी देने के कारण उनकी खुद की छवि भी ख़राब हो रही है... लिहाजा एक और जांच को बैठकर वे मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिशो में जुटे है...



अब विभाग के पास बड़ा सवाल ये है कैसे सुरेश नाम के व्यक्ति को पैदा करे? साथ ही अनिल जी और सावनेर जी नाम के व्यक्तियों को पैदा करना है.... इस मामले पर कब तक कारवाही होगी कह पाना मुश्किल है... आज़ादी के बाद से भ्रष्टाचार हमारे जीवन का एक आवश्यक अंग बन चूका है जिस पर रोक लग पानी मुश्किल दिखाई दे रही है....


एक और मध्य प्रदेश के मुखिया शिवराज" स्वर्णिम मध्य प्रदेश" बनाने की बात कह रहे है वही "शिव" के राज में मंत्री और नौकरशाह मिलकर भ्रष्टाचार को बदावा देकर स्वर्णिम मध्य प्रदेश के सपने को धूल धूसरित करने में लगे है......