Tuesday, October 30, 2012

हिमाचल के अखाड़े में चुनावी संग्राम .............








हिमाचल  प्रदेश में पश्चिमी विक्षोभ के कारण छाई  सर्द हवाओ ने भले ही मौसम ठंडा कर दिया हो लेकिन  राजनेताओ के  ताबडतोड़ चुनावी प्रचार पर इसका कोई असर नहीं है | राजधानी शिमला से लेकर कुल्लू मनाली और चंबा सरीखे इलाकों  तक विपरीत परिस्थितियों और प्रतिकूल मौसम के बावजूद  ठण्ड में भी प्रत्याशियों का चुनावी पारा सातवे आसमान पर है | टिकटों का घमासान थमने और नाम वापसी की तारीखों के ख़त्म होने के बाद अब सभी विधान सभाओ में चुनाव प्रचार तेज हो गया है और सभी पार्टियों ने अपनी पूरी ताकत चुनाव प्रचार  पर केन्द्रित कर दी है | जैसे जैसे मतदान की तिथि चार नवम्बर पास आती जा रही है वैसे वैसे हिमाचल की शांत वादियों में चुनावी सरगर्मियां  तेज होती जा रही हैं |

 राज्य में दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के बीच इस बार भी मुख्य जंग  है लेकिन बड़े पैमाने पर इन दोनों दलों के बागी प्रत्याशियों के मैदान में होने से हिमाचल लोक हित पार्टी जैसे छोटे दलों की पौ बारह होती दिखाई दे रही है जिसमे कई अन्य दल शामिल होकर तीसरे मोर्चे का विकल्प राज्य में पेश करने का एक प्रयास करते देखे जा सकते है | राज्य में मुकाबले में यूँ  तो भाजपा और कांग्रेस मुकाबले में बराबरी पर बने हैं लेकिन जिस  तरीके से इस दौर में दोनों दलों  में टिकट के लिए नूराकुश्ती देखने को मिली उसने राज्य के आम वोटर को भी पहली बार परेशान किया हुआ है और पहली बार इस ख़ामोशी के मायने किसी को समझ नहीं आ रहे है जिससे आलाकमान के सामने बड़ी मुश्किलें आ रही है | सभी दलों के नेता अब चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में स्टार प्रचारकों के आसरे हिमाचल को फतह करने के मंसूबे पालने लगे हैं | जहाँ यू पी ए अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने २२ अक्टूबर को कांगड़ा और मंडी में बड़ी रैली कर भाजपा  की धूमल सरकार को ललकारा  तो वहीँ राज्य के मुख्यमंत्री धूमल  तो तीन महीने पहले से ही अपने "मिशन रिपीट " में पूरी शिद्दत के साथ जुटे  हुए हैं |  "कहो दिल से धूमल फिर से " यही वह नारा है जिसके बूते भाजपा अपने ताबड़तोड़ चुनावी प्रचार को स्टार प्रचारकों के बूते कैश कराना चाहती है | अन्य दल भी अपने चुनाव प्रचार में पीछे नहीं हैं लिहाजा माया से लेकर ममता अगर हिमाचल के अखाड़े में अपने लिए सम्भावनाये तलाश रहे हैं तो इस चुनाव के मायने समझे जा सकते हैं | आने वाले कुछ दिनों में यहाँ पर इनकी कई बड़ी सभाए भी होनी हैं |

                  हिमाचल में सत्तारूढ़ भाजपा किसी भी कीमत पर अपने हाथ से सत्ता को फिसलते हुए नहीं  देखना चाहती है | इसके लिए वह पिछले कुछ समय से एड़ी चोटी का जोर लगाये हुए है | मुख्यमंत्री धूमल देर रात तक प्रदेश में अपनी सभाए कर कांग्रेस को निशाने पर ले रहे हैं | हाल ही में सोलन की एक सभा में धूमल ने केन्द्र सरकार को निशाने पर लेते हुए कहा कि अब केन्द्र सरकार ने कबाड़ खाना भी शुरू कर दिया है |उनका इशारा साफ तौर पर इस्पात मंत्रालय  की तरफ था  जिसकी कमान अभी कुछ समय पहले तक वीरभद्र सिंह के हाथो में  थी | भले ही इस सभा में उन्होंने वीरभद्र का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया लेकिन इशारो इशारो में उन्होंने वीरभद्र पर अपने तीर छोड़ ही दिए | वहीँ वीरभद्र कहा चुप बैठते उन्होंने खुद के पाक साफ़ होने का सर्टिफिकेट तक जारी कर दिया | बिझनी की एक  चुनावी सभा में उन्होंने भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए पैसे लेकर उनके खिलाफ साजिश रचने के आरोप मढ़ दिया तो कुल्लू में मीडिया कर्मियों के साथ अपने किये पर शर्मिंदगी व्यक्त की और माफ़ी मांगी | गौरतलब है कि अभी कुछ दिनों पहले भ्रष्टाचार के मसले पर पत्रकारों के साथ उनकी सीधी झड़प हुई थी जिसके बाद एक चैनल के पत्रकार के सवाल पर वह झल्ला  उठे थे और आपा खोकर यह कहते हुए पाए गए थे कि वह उसका कैमरा फोड़ देंगे | ऊपर का यह वाकया  ये बताने के लिए काफी है कि इस बार हिमाचल के चुनाव में आम आदमी के  सामने सत्तारूढ़ भाजपा की एंटी इनकम्बेंसी से ज्यादा चिंता केन्द्र सरकार के द्वारा बढाई गई परेशानियाँ ज्यादा हैं | 

मसलन राज्य का वोटर केन्द्र सरकार की महंगाई ,भ्रष्टाचार ,घरेलू  गैस की सब्सिडी खत्म करने , ऍफ़  डी आई जैसे मुद्दों से ज्यादा परेशान दिख रहा है जिसने एक तरीके से आम आदमी की कमर तोड़ने का काम किया है  | वहीँ राज्य की कांग्रेस सरकार में जारी भारी  गुटबाजी और भ्रष्टाचार पर वीरभद्र के  विरोध के चलते भाजपा जरुर बमबम है | लेकिन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी के बारे में हाल में हुए भ्रष्टाचार के खुलासो से उसकी लड़ाई भी कही न कही कमजोर नजर आ रही है | फिर भी बीते समय में धूमल सरकार ने हिमाचल में विकास की जो नई बयार बहाई है वह  आम जनता में एक सकारात्मक सन्देश देने में कामयाब भी  हुई है |किसानो के लिए शुरू की गई  दीनदयाल किसान योजना , अटल स्वास्थ्य योजना , अटल बचत योजना , अटल स्कूल यूनिफार्म योजना और  कर्मचारियों के एक बड़े वोट बैंक को ध्यान में रखकर शुरू की गई करोडो की दर्जन भर से ज्यादा योजनाये  धूमल के पिटारे में है जिसे वह जनता के बीच विकास की एक नई बयार के रूप में पेश करते नजर आ रहे हैं और यही लकीर है जिसके आसरे वह कांग्रेस के सामने एक नई नजीर पेश करते नजर आ सकते हैं |

 भाजपा ने राज्य में ६८ में से तकरीबन ४५ सीटो पर अपने प्रत्याशियों का ऐलान सबसे पहले कर कांग्रेस से मनोवैज्ञानिक तौर पर बढ़त  तो ले ही ली है  लेकिन हिमाचल में बगावत के फच्चर ने ऐसा पेंच भाजपा के सामने फसाया है जिससे पार पाने की बड़ी चुनौती  अब धूमल के सामने खड़ी हो गई है | ऊपर से शांता कुमार के साथ उनके छत्तीस  के आंकड़े ने भाजपा की रातो की नीद उड़ाई हुई है |

                                     

 हर बार के  चुनाव की तरह इस बार भी अब राज्य में कांगड़ा का इलाका सबके लिए महत्वपूर्ण हो चला है क्युकि यहाँ की तकरीबन २० सीटें प्रत्याशियों के जीत हार के गणित को सीधे प्रभावित करने का माद्दा रखती हैं | यह पूरा इलाका भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार का गृह जनपद रहा है लेकिन इस बार टिकट आवंटन में धूमल कैम्प और शांता कैम्प में टशन देखने को मिली |यह कोई पहला मौका नहीं है जब दोनों कद्दावर नेता आमने सामने आ गए | अतीत के पन्ने टटोलें तो दोनों के बीच यह तकरार नब्बे के दशक से उनका पीछा नहीं छोड़ रही है | मुख्यमंत्री  बनाये जाने को लेकर दोनों में  उसी दौर से एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ देखी जा सकती है लेकिन  ज्वालामुखी से निकला लावा आज भी इनका पीछा नहीं छोड़ रहा है | मौजूदा दौर में भी धूमल और शांता के बीच विवाद की बड़ी  जड़ कांगड़ा ही बना हुआ है | 

दरअसल ज्वालामुखी के इलाके में शांता के समर्थक रमेश धवाला के चुनावी  इलाके में परिसीमन का फच्चर ऐसा फसा कि उनकी विधान सभा के कई इलाके देहरा सीट का हिस्सा हो गए जबकि धूमल के बेहद करीबी रविन्द्र  रवि के  इलाके का अस्तित्व पूरी तरह लगभग समाप्त हो गया |थुरल का बड़ा हिस्सा देहरा में चले जाने के कारण इस दौर में टिकट आवंटन से पूर्व रवि टिकटों के जोड़ तोड़  में ही उलझे रह गए तो धवाला ज्वालामुखी से ही टिकट की मांग करने लगे | बाद में गडकरी की अदालत में फैसला आने के बाद रवि को देहरा से और धवाला को ज्वालामुखी से ही टिकट मिला | लेकिन इस मसले ने दिखा दिया कि धूमल कैम्प और शांता कैम्प किस तरह इस चुनाव में एक दुसरे को नीचा दिखाने की कोशिशे की  | भाजपा ने इस चुनाव में जहाँ रूप सिंह ठाकुर का पत्ता पूरी तरह काट दिया वहीँ डाक्टर राजन सुशांत की पत्नी सुधा को भी भाव नहीं दिया |इस बार के चुनावो में सत्ता के गलियारों में यह चर्चा आम है कि कांगड़ा में टिकट आवंटन में भाजपा आलाकमान ने  शांता कुमार को पूरी तरह से फ्री हैण्ड दिया जिसके चलते वह धूमल कैम्प को पटखनी देने में पूरी तरह कामयाब नजर आये हैं |

 शांता के भारी  दबाव का असर धूमल के चेहरे पर इस बार साफ़ झलक  रहा था जब वह अपने खासमखास राकेश पठानिया को टिकट नहीं दिलवा सके जो निर्दलीय ही अब मैदान में ताल ठोकते नजर आ रहे हैं |ज्वालामुखी के इलाके से प्रदेश भाजपा के औद्योगिक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष संजय गुलेरिया का टिकट शांता  कुमार ने इसलिए काट दिया क्युकि उनकी गिनती धूमल के सिपहसालारो में की जाने लगी थी |हालाँकि शांता पहले उनके लिए टिकट सर के बल लाने का दावा कर रहे थे |नूरपुर से कद्दावर नेता और राज्य के पर्यटन मंत्री रहे राकेश  पठानिया का भी इस चुनाव में पत्ता साफ़ शांता ने कर दिया | उन्हें भी टिकट न मिलने से उनके समर्थको के हाथ निराशा लगी है | गंगथ में भी शांता ने मनोहर धीमान को टिकट  देने का वादा पहले किया था लेकिन ऐन मौके पर रीता धीमान को प्रत्याशी बनाकर शांता ने दिखा दिया है कि धूमल पार्टी से बड़े नहीं हैं | दोनों के बीच यह तकरार कही भाजपा का पूरा खेल ही इस चुनाव में ना बिगाड़ दे |

 आज भाजपा को बागियों से कई सीटो पर तगड़ी चुनौती  मिल रही है | शान्ता कुमार के मन में अभी भी मुख्यमंत्री बनने के सपने हैं शायद इसलिए वह टिकट देने में अपने चहेतों का ध्यान रख रहे थे और समय समय पर धूमल सरकार को डेमेज करने में कोई कसर भी नहीं छोड़ रहे थे | बताया जाता है उन्होंने पहले पार्टी आलाकमान  के सामने हिमाचल  में चुनाव प्रचार में  नहीं भेजे जाने को लेकर गुहार लगाई बाद में वह कांगड़ा में अपने प्रत्याशियों के लिए जोर लगाने में लग गए |

 इस बार मौका ऐसा भी आया जब उन्होंने पार्टी छोड़े जाने तक की धमकी दे डाली लेकिन आलाकमान के दखल के चलते वह ऐसा कुछ भी नहीं कर सके जिससे भाजपा के लिए राज्य में मुश्किलें खड़ी हो जाए | शांता कुमार और धूमल की टशन देखकर उत्तराखंड की याद आती है | उत्तराखंड में शांता की भूमिका में जहाँ भगत  सिंह कोशियारी  एक दौर में खड़े थे वहीँ धूमल की भूमिका में खड़े थे  बी सी खंडूरी  | दोनों के बीच टशन से राज्य में भाजपा सरकार  अस्थिर हो गई थी | बाद में दोनों की लड़ाई का फायदा निशंक को मिला था जिसके बाद भ्रष्टाचार के मामलो ने निशंक  की  बलि ले ली थी  और इसका नतीजा यह हुआ  उत्तराखंड में  7 माह  पूर्व  हुए चुनावो में भाजपा खंडूरी के नेतृत्व में अच्छा परफार्म  कर गई लेकिन सत्ता में नहीं आ पायी |

 तो क्या माना जाए  हिमाचल भी शान्ता और धूमल की बगावत के चलते उसी लीक पर जाता दिख रहा है | राजनीती में कुछ भी सम्भव है और हिमाचल  और उत्तराखंड की परिस्थितियां  भी कमोवेश एक जैसी ही है लिहाजा इस सम्भावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता अगर यही कलह जारी रहती है तो भाजपा को नुकसान उठाने के लिए तैयार रहना होगा | 

                   
      
 वहीँ कांग्रेस के सामने भी भाजपा जैसी मुश्किलें इस दौर में राज्य के भीतर हैं | मंडी में डी डी ठाकुर को उम्मीदवार  बनाये जाने से कांग्रेस के कई नेता नाराज बताये जा रहे है |ऊपर से वीरभद्र  पर  भ्रष्टाचार के नए नए मामले कार्यकर्ताओ का जोश ठंडा कर रहे है | वैसे भी  केन्द्र की  यू पी ए सरकार के मंत्री इस मसले पर सरकार की हर रोज छिछालेदारी करने में लगे हुए हैं | वीरभद्र सिंह के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोपों की फुलझड़ी जलाए जाने से कार्यकर्ता हताश और निराश हो गए है | इसका असर यह है कि तकरीबन  आधी  विधान सभा की सीटो पर कांग्रेस को बागियों से कड़ी चुनौती  मिलने का अंदेशा बना है |

कांग्रेस की मुश्किल इसलिए भी असहज हो चली है क्युकि यहाँ इस चुनाव में कांग्रेस में गुटबाजी ज्यादा बढ़ गई है | वीरभद्र सिंह का यहाँ पर एक अलग गुट सक्रिय है तो वहीँ नेता प्रतिपक्ष  विद्या  स्टोक्स  , पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कौल सिंह ठाकुर और केन्द्रीय मंत्री आनंद शर्मा की राहें भी जुदा जुदा लगती हैं | मेजर विजय सिंह मनकोटिया  को वीरभद्र सिंह  ने शाहपुर से टिकट तो थमा दिया है लेकिन वह आज भी वीरभद्र सिंह के कैम्प से बाहर ही  बताये जा रहे है | दोनों के बीच रिश्ते पुराने दौर जैसे ही बने हैं | हालाँकि इस बार टिकट आवंटन में वीरभद्र ने अपना सिक्का चलाया है लेकिन भ्रष्टाचार  के आरोप और सी डी  कांड ने पार्टी के कद्दावर  नेताओ की सियासत पर ग्रहण सा लगा दिया है | कौल सिंह ठाकुर खुद अपने नेतृत्व में चुनाव लड़ने के इच्छुक थे लेकिन वीरभद्र ने उनके रास्ते में  खुद रोड़ा अटका दिया है |

 आनंद शर्मा से कभी उनके मधुर सम्बन्ध थे लेकिन उनको  भी अब केन्द्र की राजनीती ज्यादा पसंद आने लगी है लिहाजा राज्य में कांग्रेस की डूबती नैया की  तरफ उनका ध्यान नहीं जा पा रहा है | भाजपा और कांग्रेस से इतर अब सबकी नजरें इस चुनाव में महेश्वर सिंह और उनकी पार्टी हिमाचल लोक हित पार्टी पर जा टिकी है | हाल ही में उन्होंने बीजेपी के कई कार्यकर्ताओ को तोड़कर अपनी पार्टी में जोड़ा है साथ में श्याम शर्मा और महेंद्र सोफत के साथ आने से उनकी पार्टी को एक तरह से मजबूती मिली है |

महेश्वर की असली ताकत इस चुनाव में कांगड़ा में दिख सकती है जहाँ कांग्रेस और भाजपा को तगड़ी चुनौती  मिलने का अंदेशा है क्युकि यह पूरा इलाका महेंद्र का गढ़ रहा है |साथ ही कुल्लू के इलाकों में भी उनका जादू चल सकता है |इन इलाकों में एंटी इनकम्बेंसी भी एक बड़ा फैक्टर  है और महेश की शांता कुमार के साथ नजदीकिया भी सबका ध्यान इस चुनाव में खीच  रही  है | अगर महेश का जादू इन इलाकों में चल गया तो धूमल की मुश्किलें बदनी तय है | 
                              

कांग्रेस के लिए भी यह खतरे की घंटी है | हिमाचल का यह ट्रेंड पिछले समय से देखने तो मिला है कि यहाँ बारी बारी से भाजपा और कांग्रेस सत्ता में आते रहे हैं | १९७७ के बाद सिर्फ एक बार १९८५ में यहाँ पर कांग्रेस की वापसी हुई | कांग्रेस में यहाँ  यशवंत सिंह परमार १९५२ से १९७७ तक सी ऍम रहे तो ठाकुर रामलाल ने १९७७ से १९८२ तक सी ऍम की कमान संभाली| परमार के शासन का सबसे सुनहरा दौर हिमाचल में कांग्रेस के नाम रहा है शायद इसी के चलते आज जब सबसे अच्छे मुख्यमंत्रियों की बात की जाती है तो सबकी जुबान पर परमार का ही नाम आता है और लोग यह कहने लगते है उन्हें यशवंत परमार जैसा मुख्यमंत्री चाहिए |

 वीरभद्र १९८३ में सी ऍम बने  | १९९० में शांता कुमार की सरकार आई तो १९९३ में फिर वीरभद्र | इसके बाद १९९८ में धूमल मुख्यमंत्री हुए तो २००३ में वीरभद्र फिर से मुख्यमंत्री बनने में कामयाब रहे | पिछले विधान सभा चुनावो में भाजपा ने जहाँ ४1  सीटें जीती वही कांग्रेस २३ पर सिमट कर रह गई थी |  उस चुनाव में ३ निर्दलीय प्रत्याशी भी चुनाव जीते थे |  लेकिन इस बार के हालत भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए मुश्किलों भरे हैं क्युकि दोनों दल बागियों को मनाने के लिए मान मनोवल करते देखे जा सकते हैं | 

                प्रदेश की दोनों बड़ी पार्टियों ने आखिरी दम तक बागी प्रत्याशियों को मनाने की कोशिश की लेकिन कई सीटों पर बागी उम्मीदवारों ने पार्टी प्रत्याशियों की मुसीबत बढ़ा दी है। भाजपा सरकार के वरिष्ठ नेता रूप सिंह ठाकुर सुंदरनगर से बतौर निर्दलीय प्रत्याशी मैदान में हैं वहीं कांग्रेस के विधायक योगराज देहरा से आजाद प्रत्याशी के रूप में डटे हैं। रूप सिंह भाजपा के कद्दावर नेता हैं और कई बार विधायक एवं मंत्री भी रहे हैं। सांसद राजन सुशांत की पत्नी सुधा सुशांत फतेहपुर से, जयसिंहपुर से रवि धीमान, सुजानपुर से राजेंद्र राणा, कांगड़ा से पवन कुमार काजल, धर्मशाला से कमला पटियाल, सोलन से एचएन कश्यप, अर्की से आशा परिहार, बल्ह से महंत राम चौधरी, दून से दर्शन सैनी, कुसुम्पटी से दिनेश्वर दत्त, भटियात से भूपिंद्र सिंह चौहान, जवाली से संजय गुलेरिया, शिमला से तरसेम भारती व इंदौरा से मनोहर लाल धीमान भी डटे हैं।

 कांग्रेस के ऊना से ओपी रत्न, कांगड़ा से डॉ. राजेश शर्मा, कोटकहलूर से होशियार सिंह, कसौली से राम स्वरूप, बिलासपुर से जितेन्द्र चंदेल व केडी लखनपाल, बैजनाथ से ऊधो राम, करसोग से मस्त राम, सिराज से चेतराम, घुमारवीं से कश्मीर सिंह व राकेश चोपड़ा, पांवटा से किरनेश जंग, मनाली से धर्मवीर धामी, आनी से ईश्वर दास, इंदौरा से मलेंद्र राजन, कुल्लू से पूर्व मंत्री सत्य प्रकाश ठाकुर की पत्नी प्रेमलता ठाकुर व भरमौर से महेंद्र ठाकुर भी मैदान में हैं।अब नाम वापसी के बाद यह आलम है कि विधान सभा इलाको में बागियों के असर को कम करने में हिमाचल के अखाड़े में दोनों दल अपना मनेजमेंट करने में सिरे से जुट गए हैं |
                                                              
 वैसे हिमाचल के इस बार के विधान सभा चुनावो में बागियों से पार पाना  भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए आसान नहीं दिख रहा | अगर बागी सफल हो जाते हैं तो यह भाजपा और कांग्रेस सरीखे दलों के हाथ सत्ता फिसलने में देरी नहीं लगेगी और ऐसे हालातो में स्थितिया उत्तराखंड जैसे बनने का अंदेशा बना है जहाँ खंडूरी खुद तो चुनाव हार गए लेकिन भाजपा को उन्होंने करारी हार से बचा लिया लेकिन  पार्टी कांग्रेस से एक सीट कम ही ला सकी जिसके बाद निर्दलियो को साथ लेकर कांग्रेस सत्ता की दहलीज पर विजय बहुगुणा के नेतृत्व में पहुची थी | अगर हिमाचल में भी ऐसा ही होता है तो यहाँ भी सत्ता की चाबी इन्ही बागियों के हाथ रहेगी | अब देखना है हिमाचल के इस चुनाव में कहो धूमल का नारा चलता है या यह औंधे मुह गिरता है |  फिलहाल इसके लिए  २० दिसम्बर  का इन्तजार करना होगा  |   


Saturday, October 27, 2012

टूटने लगा बहुगुणा का तिलिस्म ........................



आज से तकरीबन साढ़े सात महीने पहले जब  विजय बहुगुणा ने  उत्तराखंड के मुख्यमन्त्री का कांटो रुपी  ताज पहना था तो लोगो को उम्मीद थी कि वह पर्वत पुत्र माने जाने वाले अपने पिता स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा के सच्चे वारिस साबित होंगे लेकिन बहुगुणा के शासन से अब उत्तराखंड के आम जनमानस  का धीरे धीरे  मोहभंग होता जा रहा है | यही नहीं अब बहुगुणा सरकार के मंत्री भी खुलकर अपने समर्थको को लालबत्तियां  देने के लिए नए सिरे से लाबिंग करने में सिरे से लग गए हैं जिसके चलते बहुगुणा के सामने इस दौर में सबसे  बड़ी मुश्किल पेश आ रही है | टिहरी लोक सभा उपचुनाव  में अपने बेटे साकेत की हार से अब राज्य में    बहुगुणा  के खिलाफ विरोध के स्वर मुखरित होने लगे हैं | 
                   

 विजय बहुगुणा ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में जो ख्वाब प्रदेश वासियों को दिखाए थे वह  राज्य में  अब हवा हवाई ही साबित हो रहे है | प्रदेश में इस समय  अफसरशाही बेलगाम है और कभी न्यायाधीश रहे बहुगुणा इससे जूझ पाने में विफल साबित हो रहे हैं | बहुगुणा का अब तक का ज्यादातर समय दिल्ली की मैराथन दौड़ में ही जहाँ  बीता है वहीँ कांग्रेस के विधायक भी अंदरखाने बहुगुणा को राज्य में मुख्यमन्त्री के रूप में नहीं पचा पा रहे हैं | राज्य में विकास कार्य  इस कलह से सीधे प्रभावित हो रहे हैं और शायद यही कारण है  राजनीती के ककहरे  से अनजान बहुगुणा को  पहली बार सियासी अखाड़े में अपनी पार्टी के लोगो से ही  तगड़ी  चुनौती मिल रही है जहाँ अपनी कुर्सी बचाने के लिए वह दस जनपथ में अपनी बराबर हाजिरी लगाते हुए देखे जा सकते हैं |  राज्य  में कांग्रेस के  एक  बड़े नेता की माने तो बहुगुणा पूरे प्रदेश की जनता को कम समय दे पा रहे हैं जिसके चलते सरकार की योजनाये आम आदमी तक नहीं पहुच पा रही हैं | राज्य  कांग्रेस  में  बने कई गुट भी कांग्रेस की साख को  प्रभावित कर रहे हैं | इस समय राज्य में हरीश रावत, सतपाल महाराज , इंदिरा हृदयेश , यशपाल आर्य का गुट सक्रिय है जिसमे खुद विजय बहुगुणा  भी शामिल हैं  लेकिन बहुगुणा  की सबसे बड़ी दिक्कत यही हो चली है  हर गुट को मनाना उनके लिए संभव नहीं है | साथ में बहुगुणा को बाहर से समर्थन दे  रहे बसपा , यू के डी ( पी ) और  निर्दलियो को खुश करना उनके लिए एक बड़ी पहेली बनता जा रहा है | जिस गुट को भाव ना दो वही आँखें तरेर देता है जिसके बाद बहुगुणा को आप बीती सुनाने आलाकमान के यहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज करानी पड़ती है  और अपनी सरकार के नेता और कार्यकर्ताओ के विरोध के बीच  बहुगुणा साथियो के विरोध पर  सीधे कुछ  भी कहने से भी बचते रहे हैं |
      

  दरअसल बहुगुणा पर मुख्यमन्त्री बनने के बाद से ऐसी  साढ़े साती की अंतरदशा चल रही है जो अभी तक उनका पीछा नहीं छोड़  पा रही  है |  तमाम विरोध और बगावत के बीच बहुगुणा राज्य के नए मुख्यमन्त्री तो  बनाए गए लेकिन उसी समय से राज्य में कुछ भी सामान्य नहीं चल रहा है |  हालाँकि  सितारगंज  विधान सभा चुनाव में करोडो रुपये खर्च कर और पानी की तरह पैसा बहाने के बाद बहुगुणा के हाथ ४०००० से ज्यादा वोटो से उत्तराखंड के विधान सभा चुनावो में अब तक मिली सबसे बड़ी भारी जीत हाथ तो लग गई लेकिन हाल ही में जनता ने उनकी ताजपोशी पर सवाल उठाते हुए उनके बेटे साकेत  को टिहरी लोक सभा उपचुनाव में  करारी हार का ऐसा तमाचा मारा जिसकी टीस बहुगुणा को  सताती रहेगी | आज आलम यह है  टिहरी की हार के सपने बहुगुणा को नींद में भी आ रहे हैं और वह सपने में  भी अपनी मुख्यमन्त्री की कुर्सी सलामत  नहीं देख रहे हैं शायद तभी टिहरी की हार के बाद सोनिया के सलाहकार और दस जनपथ के सबसे बड़े पावर हाउस अहमद पटेल  ने उनको भाव नहीं दिया है और उत्तराखंड  के  मामले को गुजरात और हिमाचल के विधान सभा चुनाव निपटने  तक टाल दिया है | 

                  

बहुगुणा इस कठिन दौर में इस बात के लिए  भाग्यशाली हैं इस समय पार्टी आलाकमान का सारा ध्यान हिमाचल और गुजरात में लगा हुआ है इसी के चलते  वह उत्तराखंड को ज्यादा तवज्जो इस दौर में नहीं दे रहा है लेकिन टिहरी का चुनाव निपटने  के बाद अब बहुगुणा के सामने असली परीक्षा की घडी शुरू हो रही है जब  चुनाव निपटने के बाद प्रदेश के नेताओ और कार्यकर्ताओ ने संगठन में व्यापक फेरबदल के साथ कांग्रेस  मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष  यशपाल आर्य को भी बदलने की मांग की है जिनका कार्यकाल इसी नवम्बर में ख़त्म हो रहा है |  छनकर सूत्रों से आ रही खबरें कह रही हैं विजय बहुगुणा और सतपाल महाराज यशपाल को दूसरा कार्यकाल देने के मूड में हैं तो वहीँ केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत अपने समर्थको को इस कुर्सी पर बैठाना चाह रहे हैं जिनमे सबसे आगे पिथौरागढ़ के विधायक मयूख महर हैं  तो वहीं अगर इस पर सहमति नहीं बनती है तो रावत अपने चहेते विधायक प्रीतम सिंह , सांसद प्रदीप टम्टा का नाम आगे कर सकते हैं | इन पर मुहर  ना लगने  की सूरत में  तिवारी सरकार में पूर्व कैबिनेट मंत्री नरेन्द्र सिंह भंडारी और कांग्रेस के कद्दावर नेता महेंद्र पाल का नाम आगे किया जा सकता है | 

वैसे बताते चलें इनके साथ बैटिंग करने में बहुगुणा अपने को असहज महसूस करते रहे हैं और अगर हरीश रावत के यह समर्थक प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी पाने में कामयाब हो जाते हैं तो ऐसे में बहुगुणा के सामने मुश्किलें ज्यादा  बढ़ जाएगी शायद इसलिए अब उनकी पूरी कोशिश इस बात को लेकर है किसी भी तरह यशपाल आर्य को राज्य में दूसरा कार्यकाल दिया जाए | वह टिहरी हार का ठीकरा खुद और यशपाल के बजाए अब अन्य नेताओ पर फोड़ने के लिए रजामंद हो गए हैं जिस पर सतपाल महाराज ने भी अपनी सहमति व्यक्त कर दी है | सतपाल हरीश रावत को डेमेज करने के लिए आखरी समय में अपने चेहेते किसी नेता का नाम इस पद के लिए आगे कर सकते हैं | संभव है आने वाले समय में मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा की राय को भी तवज्जो दी जाए | 
                     

                                        लेकिन बहुगुणा का संकट यह नहीं है जो अभी वह टिहरी उपचुनाव में बेटे की हार के बाद  से झेल रहे हैं | उन्हें तो शपथ ग्रहण से ही राज्य के कांग्रेस से जुड़े  विधायको  से तगड़ी चुनौती  मिलनी शुरू हो गई थी जब २० से ज्यादा उनकी पार्टी के विधायक उनके शपथ  ग्रहण समारोह में नहीं पहुंचे थे | फिर इसके बाद मंत्री पद मनमाफिक  ना मिलने से हरीश रावत के समर्थक विधायक असंतुष्ट हो गए और वह खुलकर बहुगुणा के विरोध में अपना मोर्चा खोलने लगे | उस दौर में कांग्रेस की मुश्किल प्रणव चैम्पियन जैसे विधायको ने बढाई जो अपनी मांगो को लेकर जंतर मंतर हो आये वहीँ वह राज्य के खेल मंत्री दिनेश अग्रवाल को निशाने पर लेते रहे जो ओलंपिक खेलो को देखने लन्दन गए थे | चैम्पियन ने उनको ललकारते हुए कह डाला  अग्रवाल  खेल मंत्री बनने लायक नहीं हैं और उनके लन्दन जाने का प्रदेश को कोई लाभ नहीं मिलने वाला है | अब ऐसे बयानों पर सी ऍम बहुगुणा कुछ प्रतिक्रिया नहीं देते थे जिसके चलते बहुगुणा की भद्द पिटती थी | 

यही नहीं इसके बाद अल्मोड़ा के विधायक  मनोज तिवारी ने भी अपनी सरकार के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया | उन्होंने अपने विधान सभा इलाके में चिकित्सको  की नियुक्ति  ना होने का मामला उठाया जिसका  बागेश्वर , चम्पावत, पिथौरागढ़ जिलो के विधायको  ने भी समर्थन किया | इसके  बाद खुद स्वास्थ्य मंत्री सुरेन्द्र नेगी ने मोर्चा संभाला तब कही जाकर यह मामला शांत हो पाया था | वहीँ बहुगुणा के रूठे विधायको की कहानी यहीं नहीं थमी | धारचूला के नए नवेले विधायक हरीश धामी ने  जहाँ काली पट्टी बांधकर विधान सभा में बहुगुणा के खिलाफ अपना विरोध खुले आम बीते कुछ महीनो में  दर्ज किया वहीँ पिथौरागढ़ के विधायक मयूख महर तो सुपर विधायक निकले |  पार्टी आलाकमान के निर्देशों को धता बताते हुए उन्होंने आज तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष का पद ग्रहण नहीं किया है | 


 बहुगुणा के विरोध की कहानी यहीं नहीं थमती | कृषि मंत्री हरक सिंह रावत ने जहां दमयंती रावत को तराई बीज निगम का निदेशक बना डाला तो वहीँ शिक्षा मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी ने उनको रिलीव नहीं किया जिससे दोनों मंत्रियो की तकरार सबके सामने आ गई  | यह विवाद  बहुगुणा के लिए गले की फांस बना रहा लेकिन वह इस पर अपना मुह नहीं खोल पाए |  बहुगुणा की सबसे बड़ी व्यथा यह है कि राज्य में कांग्रेसियों के हर गुट को साधना उनके लिए मुश्किल  हो रहा है  शायद इसलिए उनको अपने साढ़े सात  महीने के छोटे से कार्यकाल में कई विधायको को कैबिनेट सचिव का ओहदा देना पड़ा है | 
               

बहुगुणा के खिलाफ नाराजगी यहीं नहीं थमी है | बहुगुणा ने टिहरी में हरीश रावत के सिपहसालार किशोर उपाध्याय को हरवाने के लिए हालिया  विधान सभा चुनाव में पूरा जोर लगाया था और वहां निर्दलीय प्रत्याशी दिनेश धने का समर्थन किया था | दिनेश ने टिहरी  विधान सभा चुनाव जीत लिया और बहुगुणा को इस शर्त पर समर्थन दिया कि वह उनको कैबिनेट मंत्री बनायेंगे लेकिन बहुगुणा ने काफी माथापच्चीसी  के   बाद उनको  गढ़वाल विकास निगम का अध्यक्ष बनाया | धने ने तो यह भी कहा था वह बहुगुणा के लिए विधान सभा  उपचुनाव  में सीट खाली करवाएंगे लेकिन दाल ना गलने पर दिनेश ने विधायकी से इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया जिसके बाद बहुगुणा के लिए तराई के दबंग नेता तिलक राज बेहड़ ने मिशन सितारगंज चलाकर भाजपा के विधायक रहे किरण मंडल के साथ करोडो की डीलिंग  कर बहुगुणा के  चुनाव लड़ने के लिए सीट खाली कराई |  
                              

बहुगुणा सितारगंज चुनाव तो  जीत गए लेकिन उनके बेटे साकेत  अभी हाल ही में टिहरी से लोक सभा का चुनाव हार गए | हार की बड़ी वजह यह थी टिहरी की  जंग  पारिवारिक लड़ाई में तब्दील हो  गई जिसे केवल बहुगुणा का परिवार ही लड़ रहा था |हरीश रावत सरीखे खांटी  कांग्रेसी समर्थको  को इस उपचुनाव में एक बार फिर हाशिये पर रखा गया था जिसका नुकसान पूरी कांग्रेस को झेलना पड़ा  | आलम यह था जब नतीजे आये तो देहरादून की सात विधान सभा सीटो में से ६ में कांग्रेस को करारी हार का मुह देखना पड़ा  जो इस बात को बताने के लिए काफी था कि देहरादून  नगर का पढ़ा  लिखा वोटर बहुगुणा की नीतियों से खासा नाराज हो चला था शायद इसी के चलते उसने कांग्रेस के मुह पर यहाँ तमाचा मार कर इस बात का अहसास जरुर करवाया समय रहते बहुगुणा को अपनी कार्यशैली  में  बदलाव लाना होगा नहीं तो राज्य में २०१४ के लोक सभा चुनावो में उसकी मिटटी पलीत हो जाएगी  |
                      
प्रदेश के कई बड़े कांग्रेसी नेताओं के अलावा सक्रिय कार्यकर्ताओं को भी इस चुनाव में बहुगुणा ने  नजरअंदाज किया जिसका परिणाम यह हुआ  टिहरी संसदीय सीट बहुगुणा परिवार के हाथ से खिसक कर फिर से राजपरिवार की झोली में आ गई। राजनीतिक विश्लेषक कांग्रेसी नेताओं और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा को हार का सबसे बड़ा कारण मान रहे हैं  | परिवार के अलावा कांग्रेस के एक-दो नेताओं को ही साकेत बहुगुणा ने अपनी टीम में जगह इस उपचुनाव में  दी । चुनाव के दौरान क्षेत्र एवं प्रदेश के कुछ दिग्गज नेताओं को हाशिए पर रखा गया |  हालत यह थी कि टिहरी विधानसभा क्षेत्र में पड़ने वाले पूर्व कांग्रेसी विधायक को भी नजरअंदाज किया गया। । भाजपा के हाथों मिली शिकस्त के बाद हाशिए पर रखे गए ये नेता अब चुनाव प्रबंधन पर निशाना साधने लगे हैं शायद तभी  पूर्व मंत्री शूरवीर सिंह सजवाण ने चुनाव निपटने के बाद बहुगुणा को इशारो इशारो में जो सन्देश दिया उस  पर सभी का ध्यान गया | 

सजवाण ने कहा  हम पार्टी के समर्पित नेता हैं पार्टी की हार से दुख होता है। हार का मुख्य कारण पार्टी नेताओं में आपसी विश्वास की कमी रही है। उन्होंने यह भी बताया कि 'हम पार्टी के साथ मजबूती से खडे़ रहे हैं लेकिन जब हम पर शक किया जाता है जासूसी कराई जाती  है तो मन को  चोट पहुंचती है। शूरवीर सिंह सजवाण के अलावा टिहरी के पूर्व कांग्रेस विधायक किशोर उपाध्याय की भी चुनाव में उपेक्षा की गई। पिछले चुनाव में भी वह कुछ ही वोट से हारे थे इसके बावजूद पार्टी ने उनकी उपेक्षा की। उन्होंने भी बहुगुणा के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कहा 'यह हार पार्टी के लिए चिंता का विषय है। पूरे चुनाव में एक बार भी हमसे सहयोग नहीं लिया गया। हमने स्वयं पार्टी प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष और मुख्यमंत्री को इस बाबत पत्र लिखे थे मगर उन लोगों ने हमारा भरोसा नहीं किया।'


 दरअसल टिहरी की  इस हार का बड़ा कारण  विजय बहुगुणा का अहंकार भी था  जो हरीश रावत सरीखे खांटी कांगेसी नेता और उनके समर्थको की उपेक्षा करने में लगे  थे और अपने को सुपर सी ऍम समझने की भारी  भूल कर बैठे जबकि बहुगुणा का उत्तराखंड के जनसरोकारो से सीधा कोई वास्ता भी नहीं रहा है | वह तो अपने पिता हेमवती नंदन बहुगुणा के  नाम  परिवारवाद  और कॉरपोरेट के आसरे उत्तराखंड के सी ऍम की कुर्सी पा गए और सितारगंज में धन बल के जरिये अपना चुनाव जीत भी गए |जबकि बहुगुणा के जनसरोकारो का असली चेहरा यह रहा है कि वह पहाड़ के जनसरोकारो से ज्यादा कॉरपोरेट कंपनियों के ज्यादा करीब रहे हैं और इसी कॉरपोरेट ने उनके लिए दस जनपथ में मुख्यमंत्री बनाने की बिसात  इस बार बिछाई थी | यह सच भी शायद ही किसी से छुपा है कि बहुगुणा   इंडिया बुल्स जैसी विवादास्पद कम्पनी के वकील और ट्रस्टी एक दौर में रहे है जब उत्तराखंड भी नहीं बना था | उसी दौर में यह बहुगुणा अगर रईसजादो के महंगे गोल्फ जैसे खेलो से जुड़ उत्तराखंड के सरोकारों से जुड़ने का ढोंग करते हुए इस दौर में पाए जाते हैं तो यह कुछ हास्यास्पद सा मालूम पड़ता है क्युकि बहुगुणा  राजनीति को निजी व्यवसाय समझते हैं  शायद तभी उन्होंने साकेत के लिए टिहरी लोक सभा चुनाव में टिकट के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया | 


सबसे  नाइंसाफी अगर इस दौर में उत्तराखंड में किसी के साथ हुई है तो वह केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत हैं जिन्होंने अपने प्रयासों से उत्तराखंड में कांग्रेस को ना केवल अपनी सांगठनिक छमताओ से  सींचा वरन राज्य  में कांग्रेस  का बड़ा जनाधार भी बनाया | वह उत्तराखंड के पहले चुनाव में कांग्रेस को अपने बूते सत्ता में भी लाये लेकिन पार्टी ने उनको दरकिनार कर एन डी तिवारी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया और इस बार भी हरीश रावत के साथ कांग्रेस ने नाइंसाफी कर उत्तराखंड की कमान विजय बहुगुणा के हाथ दे दी जिनका उत्तराखंड में कोई जनाधार ही नहीं है | लेकिन अब टिहरी में कांग्रेस की करारी हार के बाद बहुगुणा के सामने असली संकट लाल बत्ती देने का खड़ा हो गया है जिसमे बड़े पैमाने पर हरीश रावत के समर्थको के साथ उन्हें कांग्रेस के अन्य गुटों में भी संतुलन बनाना है | देखना होगा वह आने वाले दिनों में कैसे सरकार चलाते हैं  | 
        

             बहुगुणा को राज्य में शुरुवात से हर मसले पर विरोध का सामना करना पड़ा | बिजली परियोजनाए शुरू करने के मसले पर हरीश रावत  के साथ उनके मतभेद खुलकर सामने आ गए | हरीश रावत को संतो के साथ खड़े होकर एक समय बहुगुणा को डेमेज करने में लगे थे जब उन्होंने गंगा की  अविरलता बनाये रखने के लिए गंगा के किनारे भजन कीर्तन करने की बात कही थी | बहुगुणा की किरकिरी उस वक्त भी हुई थी जब उन्होंने रातो रात कैबिनेट की बैठक में पल भर में राज्य में चार प्राइवेट यूनिवर्सिटी खोलने का ऐलान कर दिया था | तब भी हरीश  रावत ने उनके इस निर्णय पर खुले आम सवाल उठये थे | यही नहीं जब आपदा आई तो उनके कई कैबनेट मंत्री लन्दन में ओलंपिक देखने चले गए और बहुगुणा आपदा प्रभावितों के बीच जाकर यह कहने लगे आपदा आई है तो भजन कीर्तन करो ऐसे बयानों से भी उनकी छवि  खूब ख़राब हुई | 

 कई रोज पूर्व सिडकुल फेज 2  के सितारगंज में उद्घाटन को लेकर भी बहुगुणा की सरकार में मत भिन्नता देखने को मिली  | उत्तराखंड से कांग्रेस के कद्दावर नेता और केन्द्रीय मत्री हरीश रावत ने बहुगुणा की इस निवेश योजना पर सवाल उठाकर भाजपा के सुर में सुर कृषि भूमि कम होने पर चिंता जताते हुए  मिलाया है |विपक्षी  भाजपा भी इस कार्ययोजना के औचित्य पर सवाल उठाते हुए सेज पर  स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन को तरजीह देने की पैरवी कर रही है | वहीँ राज्य में इस समय  पेयजल, बिजली जैसी समस्याओ का संकट  खड़ा है तो राजधानी दून में दिन दहाड़े अपराध बढ रहे हैं पर क़ानून  व्यवस्था लचर की लचर ही बनी है | अधिवक्ता की पत्नी की दिन दहाड़े हत्या पर कई वकील घंटाघर में बहुगुणा के खिलाफ प्रदर्शन कर चुके हैं तो बीते दिनों कानून व्यवस्था की लचर स्थिति पर दून बंद भी हो चुका है  यह स्थिति तब है जब उत्तराखंड में सी ऍम की कमान एक हाई कोर्ट के जज के हाथो में है | एडवोकेट की पत्नी रही पुष्पा सकलानी मर्डर केस के आधे अधूरे खुलासे को लेकर दून पुलिस की किरकिरी हो ही रही थी की अपराधियों ने बीते दिनों एक और बड़ी वारदात  को अंजाम दे दिया | क्लेमेंट टाउन  थाना एरिया के कश्मीरी मोहल्ले के रहने वाले सोनू नाम के युवक का सहसपुर में मर्डर कर दिया गया |  ऐसे में समझा जा सकता है राज्य में बहुगुणा सरकार का शासन कैसा चल  रहा है ? 

बहरहाल जो भी हो टिहरी चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद अगर बहुगुणा ने  अपनी कार्यशैली में बदलाव नहीं किया तो इतना तय है कि उन पर मुख्यमंत्री का  सिंहासन खाली करने का भारी दबाव   पड़  सकता है और राज्य में उनको समर्थन दे रहे बसपा , यू  के डी (पी ) जैसे दल भी उनसे किनारा कर किसी नए चेहरे को सी ऍम बनाने की मांग कर सकते है | ऐसे में संभावनाए हैं कि हरीश रावत के सितारे बुलंदियों पर  जा सकते हैं क्युकि उनके समर्थक विधायको और कार्यकर्ताओ की बड़ी संख्या उनको  सी ऍम  बनाने के लिए एक बार फिर से  9, तीन मूर्ति लेन जैसे  सियासी गलियारों के अखाड़े में उतर सकती है जिसके बाद कांग्रेस आलकमान को  इस बार उत्तराखंड में डेमेज कंट्रोल के लिए उसी हरीश रावत को मैदान में आगे करना पड़ सकता है जिसे उत्तराखंड की जमीनी हकीकत की  गहरी समझ  है | जो भी हो अगर ऐसा होता है तो इस छोटे से राज्य उत्तराखंड में रोचक सत्ता का संघर्ष देखने को मिल सकता है | देखना होगा आने वाले दिनों में ऊट किस करवट यहाँ बैठता है ?  

Wednesday, October 24, 2012

मलाला के जज्बे को सलाम ..................






" मैं स्कूल के लिए तैयार हो रही थी और ड्रेस पहनने  वाली थी कि मुझे याद आया कि प्रधानाचार्य ने हमसे स्कूल की ड्रेस नहीं पहनने के लिए कहा है | इसलिए मैंने अपनी पसंदीदा गुलाबी रंग की पोशाक पहनी |  स्कूल की बाकी लड़कियां भी रंग बिरंगी पोशाको में थी  | सुबह असेम्बली में हमसे कहा गया कि हम रंग बिरंगे परिधान न पहने क्युकि तालिबान को इस पर आपत्ति होगी " 

पाकिस्तान की स्वात घाटी में रहने वाली १४ वर्षीय मलाला युसुफजई की "गुल मकई " नाम से २००९ में बीबीसी उर्दू के लिए खास तौर पर  लिखी गई यह डायरी उसके इरादों को बताने के लिए काफी है | बीते ९ अक्टूबर को दोपहर १२.४५ पर मिंगोरा में चंद नकाबपोश आतंकियों ने एक स्कूल वैन को रोका जिसमे तीन छात्राए घर वापस लौट रही थी | आतंकियों ने पूरी बस को घेर लिया और पूछा कौन है मलाला ? वहां पर मौजूद तीनो सहेलियां मलाला को पहचानने से साफ इनकार कर देती हैं | ए के ४७ की पिस्टल उनकी कनपटी पर तनी रहती है लेकिन जान की परवाह किये बिना वह अपना मुह नहीं खोलती हैं |   मलाला के जज्बे को देखिये वह सहेलियों को बचाने के लिए खुद को आगे आने से नहीं रोकती है और अपना परिचय नकाबपोशो को खुद देती है | तब नकाबपोशो के हाथ एक बड़ी कामयाबी उस समय हाथ लगती है जब मलाला को गोली लगती है | उस पल  वहां के माहौल को देखकर हर किसी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं | वातावरण गोलियों की थर्राहट से काँप उठता है | गोली मलाला के सर और गर्दन में लगती है जिससे वह बुरी तरह घायल हो जाती है | इससे अंदाजा लगाया जा सकता है मलाला पर हुआ आतंकी हमला कितना भीषण रहा होगा | आज वह गंभीर स्थिति में है और जिन्दगी  और मौत से जूझ  रही है | पेशावर के एक अस्पताल में कोमा में चले जाने के बाद अब उसको लन्दन के एक अस्पताल में वेंटिलेटर पर इलाज के लिए भेजा गया है जहाँ   मलाला यूसुफजई कोमा से बाहर आ गई है । लन्दन के क्वीन  एलिजाबेथ अस्पताल के डेव रोजर ने यह जानकारी दी। 'द न्यूज' ने रोजर के हवाले से बताया कि मलाला  कोमा से बाहर आ गई है  और उसने अपने विचारों को पहली बार  लिखकर व्यक्त किया। रोजर के अनुसार मलाला बोल नहीं पा रही हैं लेकिन उम्मीद है कि जल्द ही बोलने लगेगी। उसे वेंटीलेटर से हटा दिया गया है।घायल होने के बाद मलाला पहली बार सहारे के साथ खड़ी भी हुई है । पूरे विश्व में लोग आज  उसकी सलामती की दुआ कर रहे हैं | खुदा करे वह लन्दन से ठीक होकर फिर से अपने देश वापस लौटे और महिलाओ को  शिक्षित करने के अपने मिशन में फिर से लग जाए |
                       


इस हमले के बाद तालिबान की प्रतिक्रिया गौर करने लायक थी क्युकि तालिबान के प्रवक्ता ने  कहा अगर  हमले के बाद भी वह जिन्दा बच जाती है तो हम उस पर फिर से हमला कर देंगे | लेकिन मलाला के जज्बे को देखिये उसकी हिम्मत को देखकर तालिबानी लड़ाको के पसीने छूट गए  | पहले भी उसे तालिबान से जान से मारने की कई धमकियाँ मिल चुकी हैं लेकिन इन सबसे बेपरवाह होकर उसने महिला शिक्षा की अपनी आवाज को हमेशा से बुलंद ही रखा | तालिबानी कट्टरपंथियों  के अलावा पाकिस्तान  के कुछ कट्टरपंथियों की धमकियों से बेपरवाह होकर वह स्त्री शिक्षा के लिए अपने संघर्ष को जारी रखती है वह भी उस देश में जहाँ स्त्री शिक्षा का विरोध शुरू से होता आया है | पाकिस्तान की राजनीती पर पकड़ रखने वाले कई जानकारों का मानना है कि वहां बीते कुछ  समय से तालिबान ने पाक के आवाम में जैसा खौफ पैदा किया है उसके मुकाबले के लिए  अभी कई  और मलाला चाहिए |  इस  घटना के बाद पाकिस्तान में मलाला के समर्थन में एक बड़ा तबका उसके साथ खड़ा दिखता है और एक नयी मोर्चाबंदी की आहट वहां सुनाई देने लगी है जिसमे तालिबान के विरोध  में कई स्वर मुखरित हुए हैं | तो क्या माना जाए मलाला की यह लकीर पाकिस्तान को  पहली  बार उसे एक नई मोर्चाबंदी की तरफ ले जाती दिख रही है जिसमे  पाक के आम जनमानस के साथ धर्म गुरुओ की बड़ी जमात तालिबान को अपने गिरेबान में झाँकने को मजबूर कर रही है जिसमे महिला शिक्षा के बारे  में उसके  गैर मुस्लिम दृष्टिकोण पर सवाल उठाकर  पाक एक नई लीक पर जाने का साहस दिखा रहा है | असल में पूरी तस्वीर ऐसी नहीं है | पाकिस्तान में एक तबका जहाँ मलाला के साथ खुलकर खड़ा है तो वहीँ कट्टरपंथियों  की एक बड़ी जमात तालिबानियों के सुर में सुर मिलते हुए दिखाई दे रही है | तालिबानियों ने मलाला को निशाना बनाकर यह दिखा दिया वह किस तरह आज भी महिलाओ की शिक्षा का कितना बड़ा विरोधी है | साथ ही इसकी हिमाकत करने वाली एक छोटी सी बच्ची को मारने में भी वह देरी नहीं कर सकता | तालिबान के निशाने पर मलाला उस दौर से है जिस दौर में २००९ में तालिबानियों ने स्वात घाटी में अपने झंडे गाड़ लिए थे और अपनी मनमानी द्वारा वहां के सारे स्कूल ,कालेज बंद करा दिए थे | यही नहीं उनके अनुसार महिलाओ की जगह घर की चहारदीवारी में है और उसे वहीँ कैद रहना चाहिए | इसका विरोध करने वाली महिलाओ को मौत के घाट उतारा जाना वहां आम बात हो गई थी | उस समय वहां के बारे में  यह कहा जाने लगा था यहाँ जान भी सस्ती है | उसी दौर में मलाला महिला शिक्षा के लिए खुलकर सामने आती हैं और घर घर जाकर लोगो से महिला शिक्षा की उपयोगिता के बारे में  भाषण देती है तो तबसे वह तालिबान की आँखों में खटकने लगी | मलाला को उसके इस  कार्य के लिए अंतरराष्ट्रीय शांति  पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है  और अब मलाला पर हाल में हुए हमलो ने पूरी दुनिया में उसके  नाम को सबकी जुबान पर ला दिया है | आज विश्व के तमाम देशो में लोग  मलाला की बहादुरी से प्रेरित होकर जहाँ अपनी लडकियों के नाम उसके नाम पर रख रहे है वहीँ अब घर घर में रहने वाली बेटियां मलाला बनने का सपना पालने लगी हैं | 
                                  
                           

                    तालिबान में लम्बे समय से कट्टरपंथियों का शासन रहा है | वह  आधुनिकीकरण के घोर विरोधी रहे है | यहाँ तक की महिलाओ को शिक्षित करने के फैसलों के खिलाफ वह खुलकर फसाद करने से भी बाज नहीं आते | इसी के चलते अपने प्रभाव वाले इलाको पर उसने स्कूल कालेज  लम्बे समय से बंद किये हुए  हैं  और इस फैसलों के विरोध में जाने वाले लोगो को बंदूक के दम पर खौफ दिखाकर ठिकाने लगाया जाता रहा है | लेकिन मलाला को देखिये उसने तालिबानियों की मांद में घुसकर  उन्हें ललकारा है और तालिबान को उसी की भाषा में जबाव महिला शिक्षा का समर्थन  कर दिया है | तालिबानी नेता फजल उल्लाह ने अपने गुर्गो को मलाला को मारने के लिए भेजा जिसमे वह बुरी तरह घायल हो गई | अभी वह जिन्दगी और मौत से जूझ  रही है | लेकिन तालिबान ने अभी भी यह कहा  है कि वह उसे मार कर ही दम लेंगे | तालिबान के कट्टरपंथी पाकिस्तान के कुछ कठमुल्लों के समर्थन  के बूते  महिला  शिक्षा विरोधी  झंडा  थामे हुए हैं लेकिन शायद यह कहते हुए वह यह भूल रहे है इस्लाम में महिला शिक्षा पर किसी तरह के प्रतिबन्ध की बात नहीं कही गई है | पैगम्बर साहब तो खुद महिलाओ को शिक्षित किये जाने पर शुरू से बल देते थे | इस लिहाज से तालिबान के इस कदम की जितनी निंदा की जाये उतनी कम है क्युकि वह महिला शिक्षा को देश की प्रगति में एक बड़ा रोड़ा मानता रहा है |शायद वह यह समझते हुए वह  यह भूल जाता है कि महिलाओ को शिक्षित करने से जहाँ उनका सामाजिक स्तर ऊँचा उठता है वहीँ वह पुरुष की बराबरी पर आकर खड़ी हो जाती हैं | लेकिन तालिबानियों के गले यह बात थोड़ी उतरती है | अगर ऐसा होता तो मलाला पर हमला नहीं होता | तालिबान द्वारा मलाला पर हमले से उसकी खासी किरकिरी हुई है शायद तभी अब वह अपने निशाने पर विदेशी मीडिया को लेने से बाज नहीं आ रहा जिसकी  बेरोकटोक कवरेज से मलाला के पक्ष में ना केवल लहर  चली बल्कि दुनिया के कोने कोने से उसे खासी सहानुभूति भी मिली | आज स्थिति यह है कि प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सभी के निशाने पर तालिबान है | यही नहीं अब तो सोशल मीडिया में भी पूरी दुनिया मलाला के साथ में आकर खड़ी हो गई है |अफगानिस्तान के इलाको में भी मलाला का जादू सर चदकर बोलने लगा है और लोग मलाला के समर्थन में आकर खड़े हुए है | पाकिस्तान में 14 साल की मानवाधिकार कार्यकर्ता मलाला यूसुफजई पर हमले के बाद एक और स्कूली लड़की ने तालिबान से धमकी मिलने का दावा किया है। मूलत: स्वात घाटी की रहने वाली हिना खान ने कहा है कि वह तालिबान की हिट लिस्ट में है। हिना मालकंद घाटी में तालिबान के खिलाफ लगातार सार्वजनिक रूप से आवाज उठाती रही है। हिना के हवाले से डॉन अखबार ने लिखा है लड़कियों के स्कूल जाने पर तालिबान की धमकी के बाद हमें स्वात छोड़ना पड़ा, लेकिन अब तालिबान की ताजा धमकी के बाद मुझे लगता है कि मैं इस्लामाबाद में भी स्कूल नहीं जा पाऊंगी। हालांकि तालिबान की ओर से इसकी पुष्टि नहीं हो पाई  है लेकिन  हिना के पिता रायतुल्ला खान ने अखबार को बताया कि उनकी सामाजिक कार्यकर्ता पत्नी फरहत को भी इसी साल अगस्त में धमकियां मिलनी शुरू हुईं।  कुछ दिनों पहले जब वह घर से बाहर निकले  तो दरवाजे पर एक लाल क्रॉस देखा। उन्होंने  यह सोचकर इसे मिटा दिया कि यह किसी बच्चे की करतूत होगी लेकिन अगले रोज  उसे दोबारा देख वह  डर गए । इसके अगले दिन उनको  एक फोन आया और किसी  ने कहा कि हिना अगली मलाला होगी। यह घटना ये बताने के लिए काफी है कि मलाला पर घटी आतंकी घटना आज भी वहां के लोगो को अच्छे से याद है और पहली बार लोग उसी तर्ज पर सामने आने से खुलकर बोलने से नहीं कतरा रहे जिस लीक पर चलने का साहस अकेले मलाला सरीखी लडकियों ने दिखाया है  | आज आलम यह है कि हर परिवार के सदस्य अपनी आप बीती मीडिया के सामने लाने से पीछे नहीं हट रहा  है तो इसका बड़ा कारण मलाला का जज्बा है जो लोगो को तालिबान के विरोध में बिगुल बजाने  को मजबूर कर रहा है |
             
               

अरब देशो में भी मलाला ने अपने काम के बूते जागरूकता ला दी है | शायद इसी के चलते अब वहां भी लोग महिलाओ को अच्छी शिक्षा देने की पैरवी अगर खुलकर करने लगे हैं तो समझा जा सकता है मलाला इस दौर में कितना लोकप्रिय हो गई हैं ? यह स्थिति उस अफगानिस्तान की भी है जहाँ कभी तालिबान के शासन  में महिलाओ का घर से बाहर निकलना मुश्किल होता था | लेकिन पाकिस्तान में तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखने को मिलता है जहाँ वहां के आवाम का बड़ा  तबका आज भी खुलकर मलाला के साथ आने से परहेज करता हुआ देखा जा सकता है |वैसे भी पाकिस्तान में सेना, सरकार और आई एस आई तीनो की राह अलग अलग चलती रही है | वहां पर आज भी तालिबान को लेकर एक विशेष हमदर्दी देखी जा सकती है | सेना तालिबान के समर्थन  में खड़ी देखी जा सकती है | उसके बिना वहां पत्ता भी नहीं हिला करता  और यही जमात ऐसी है जो आज भी अमेरिका को उसका दुश्मन नम्बर एक मानती है | भले ही हिचखोले खाती पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अमेरिका के सहयोग से चलती है लेकिन पाकिस्तान इस मदद का बेजा इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के इस्तेमाल में करता आया है जिसके चलते आज भी वहां का लोकतंत्र खतरे में है| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नाम की कोई चीज वहां नहीं बची है | भले ही वहां की  सरकार अमेरिका का गुणगान आर्थिक मदद के चलते करती आई है लेकिन पाक में कट्टरपंथियों  की एक बड़ी जमात आज भी खूनखराबे और आतंक पर ही भरोसा करती है शायद इसलिए वहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नाम मात्र की बची है | अमेरिका आतंक के खिलाफ लड़ाई में एक बड़ी राशि प्रतिवर्ष पाक को देता है जिसमे तकरीबन १७ करोड़ डॉलर शिक्षा के लिए दिए जाते हैं ताकि वहां की शिक्षा व्यवस्था पटरी पर आ सके लेकिन इस मदद का बेजा इस्तेमाल वह आतंकी गतिविधियों में करता रहा है जिस पर अमेरिकी सीनेट  में भी कई बार सवाल उठ चुके हैं | और शायद यही कारण है कि हाल के दिनों में सी आई ए के पूर्व  अधिकारी ब्रूस रीडेल ने "डेली बीस्ट "  के सम्पादकीय में अमेरिकी चुनाव में राष्ट्रपति  पद के दोनों उम्मीदवारों से  आखरी बहस में अपना ध्यान पाकिस्तान पर केन्द्रित करने की नसीहत दे डाली है | उन्होंने सवाल उठाते हुए पूछा है अगर तालिबान की फिर से सत्ता में वापसी हो जाती है और वहां स्कूल जाने वाली तीस लाख  से  ज्यादा लडकियों के साथ मलाला जैसे बर्ताव होता है तो उनकी हिफाजत के लिए अमेरिका की क्या नीति है ?  पाकिस्तान अगर सच में महिलाओ का हितेषी होता  होता तो  मलाला पर हमला करने की जुर्रत तालिबान नहीं कर पाता और ना ही पाकिस्तान के गृह मंत्रालय को उन उलेमाओ को धमकी देनी पड़ती जिन्होंने मलाला पर हमले के विरोध में तालिबानियों की इस कार्यवाही के खिलाफ सवाल उठाये थे और फ़तवा जारी किया था | इसे  आतंकी कट्टरपंथियों के आगे घुटने  टेकना ना कहें  तो और क्या कहें  ?  लेकिन जो भी हो इस पूरे वाकये में मलाला के जज्बे को सलाम करने की जरुरत है |  

Monday, October 22, 2012

" एक्शन" और "रोमांस " का यश ............







मशहूर फिल्म निर्माता और निर्देशक यश चोपड़ा  ने बीते रविवार को दुनिया को अलविदा कहा तो एक पल यकीन ही नहीं हुआ क्युकि अभी बीते २७ सितम्बर को उन्होंने सादगी के साथ अपनी जिन्दगी के ८० बसंत पूरे किये थे | लेकिन इस जिन्दगी का भी कोई भरोसा नहीं है |अपनी जिन्दगी के अंतिम पडाव पर यश चोपड़ा  भी डेंगू की चपेट में आ गए जिसके बाद उनको मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ उन्होंने आंखरी सांस ली और इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया |अपने पांच दशको के फ़िल्मी करियर में यश चोपड़ा ने जहाँ त्रिशूल ,सिलसिला , दीवार,  कभी कभी ,चांदनी, वीरजारा, जैसी सुपर डुपर फिल्मे बालीवुड को दी वहीँ दिल तो पागल है,दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे जैसी फिल्मो के जरिए सिल्वर स्क्रीन पर  प्रेम और रोमांस का ऐसा ताना बाना बुना जिसे देश के युवा पीड़ी आज भी आज भी बड़ी साफगोई से याद करती है | असल में बालीवुड   बतौर डायेक्टर  के तौर पर जहाँ उन्हें धूल का फूल, वक्त, दीवार , काला पत्थर ,सिलसिला ,लम्हें , डर, दिल तो पागल है और उनकी रिलीज होने वाली आखरी  फिल्म जब तक है जान के जरिए याद करेगा वहीँ बतौर प्रोड्यूसर उनके काम को  दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे , दिल तो पागल है, मोहोब्बतें ,साथिया, चक दे, रब ने बना दी जोड़ी, न्यूयार्क, बैंड, बाजा और बारात ,एक था टाइगर के जरिए पहचानेगा | 




पंजाब के लाहौर में जन्मे यश चोपड़ा इंजीनियरिंग के छात्र थे | पिता उन्हें पढ़ाई के लिए  लन्दन भेजना चाहते थे लेकिन उनका मन पढाई लिखाई में कम लगता था | अपने भाई बी आर चोपड़ा की तरह उन्हें भी फिल्मो से प्यार हो गया | माँ से आशीर्वाद लेकर मायानगरी मुंबई की ओर रुख किया | पहले आई एस जौहर  और फिर बाद में अपने भाई बी आर चोपड़ा के साथ बतौर  सहायक निर्देशक उन्होंने मुंबई में काम संभाला | शेरो शायरी से उन्हें बचपन से लगाव था | उस दौर में साहिर लुधयानवी बहुत बड़ा नाम होते थे | उनकी शायरियो ने यश चोपड़ा को भी खासा प्रभावित उस दौर  किया  और यह भी साहिर की तरह शायरियां गुनगुनाए बिना नहीं रह पाते थे | कहा जाता है उस दौर की प्रसिद्ध अभिनेत्री मीना कुमारी यश चोपड़ा से प्रभावित हुई और उन्होंने यश को हीरो बनने की सलाह दी लेकिन बैजन्तीमाला के निर्देशक बनने का सुझाव  उन्हें  भाया जिसके बाद उन्होंने निर्देशन की दुनिया में अपने  कदम  आगे बढाये  | १९५९ में यश ने पहली सफल फिल्म धुल का फूल बनाई हालाँकि उनकी पहली सफल फिल्म वक्त (१९६५) को माना जाता है | दाग से उन्होंने अपने खुद के यशराज बैनर की शुरुवात १९७३ में की | दाग में उन्होंने उस दौर के सुपर स्टार राजेश खन्ना को साथ लिया था लेकिन बाद में उन्होंने हिंदी सिनेमा को दो बड़े कलाकार दिए जो अमिताभ बच्चन ओर शाहरुख़ खान हुए | हालाँकि यश ने पचास के दशक  में अपना फ़िल्मी करियर शुरू किया था लेकिन वह उस दौर से हर दर्शक वर्ग की नब्ज पकड़ना जानते थे शायद यही कारण रहा वह अपने प्रशंसको को हर दौर में एक के बाद एक हिट फिल्में देते रहे | यही नहीं उन्होंने अपने दौर में हर तरह की कहानियो को परदे के कैनवास में उकेरकर अपने निर्देशन से नया रंग दिया जिसने हर वर्ग के तबके पर अपनी छाप छोड़ी | यश चोपड़ा ने बालीवुड की दीवार से एक ऐसा नायक देश को दिया जो कानून को चुनौती देते हुए खुले आम मेरा हाथ चोर है लेकर चला वहीँ त्रिशूल में "एंग्री यंग मैन" को साथ लेकर खून के ताने बाने पर आधारित ऐसा संसार रचा कि सिलसिला आते आते प्यार के त्रिकोण को रुपहले परदे पर उतारकर रोमांस की दुनिया में कदम रख दिया |


                        यश चोपड़ा को इसलिए भी याद किया जायेगा उन्होंने अपने निर्देशन में दो कलाकारों को बालीवुड में नई पहचान दी जिनमे अमिताभ के साथ शाहरुख़ खान  शामिल हैं | अमिताभ उस दौर में यश के करीब आये थे जब उनको कही काम नहीं मिल रहा था तब यश ने उनके करियर को नया सहारा दिया था जिसके बाद अमिताभ हिंदी फिल्मो के सुपर स्टार कहलाये | अमिताभ बच्चन   को दीवार के बाद एंग्री यंग मैन कहा गया | जंजीर में भी वह गुस्सैल मिजाज के हीरो के रूप में लोगो के सामने आये थे | बाद में यश चोपड़ा ने बिग बी के लिए काला पत्थर और सिलसिला बनाईजिसके बाद उनके कदम रोमांस की दुनिया में गए |  यश ने अमिताभ के बाद शाहरुख़  को परदे पर प्रोजेक्ट किया | सिरफिरे आशिक की कहानी "डर " के जरिए लोगो तक पहुंचाई और युवाओ के बीच  होने वाले  प्यार की असल तस्वीर   दिल वाले दुल्हनिया ले जायेगे, मोहोब्बते , वीर जारा के जरिए दिखाई तो देश के यंगिस्तान के बीच शाहरुख़  खान का जादू सर चढ़कर बोलने लगा | हाल ही में जब तक है जान के जरिए यश चोपड़ा  ने ८ साल बाद फिर से निर्देशन में अपने कदम रखे  जिसे उन्होंने अपनी जिन्दगी की आखरी फिल्म बताया जो इस साल दिवाली पर १३ नवंबर को पूरे देश में रिलीज होगी | 

                          हिंदी सिनेमा में यश चोपड़ा के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता | सत्तर के दशक में उनके खोया पाया फोर्मुले की यादें  आज भी दर्शको के जेहन में हैं जिसे उन्होंने वक्त और सिलसिला के साथ आजमाया |  बाद में उनकी  मल्टी कास्ट वाली लीक  पर चलने का साहस मनमोहन देसाई ने किया जिसके बूते वह भी बालीवुड में राज करने लगे | यश चोपड़ा की फिल्मो की खासियत उनकी फिल्मो का मधुर संगीत था |  यश चोपड़ा की फिल्मो के गीत आज के दौर में भी प्रासंगिक और हिट रहे हैं | खाली पलों में उनको गुनगुनाने का अपना अलग एहसास है |दिवाली पर रिलीज होने वाली उनकी आखरी  फिल्म जब तक है जान का संगीत भी अभी से सहारा जाने लगा है | यश चोपड़ा की फिल्मो के गीत देश की हर पीड़ी आज भी बड़े चाव से गुनगुनाती है | एकान्त में इसे गुनगुनाने से दिल को सुकून मिलता है | ऐसा लगता है मानो यश चोपड़ा की फिल्में गीत ,संगीत के बल पर टिकी हैं | संगीत के बिना यश की  कोई उपयोगिता नहीं है | यश के सिलसिला से लेकर प्यार का डर और चांदनी  से लेकर कभी कभी और फिर दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे से लेकर जब तक है जान तक का संगीत आज में देश के युवाओ को खूब भाता है तो इसके मायने एक्शन और रोमांस के पर्याय बने यश के कुशल निर्देशन से समझा समझा जा सकता है  |

 यश चोपड़ा ने अपने निर्देशन में तकरीबन २२ फिल्में बनाई और अपने कुशल निर्देशन से हिंदी सिनेमा को नई पहचान दिलाई | उनकी पहचान उस निर्देशक के तौर पर बालीवुड में है जो हर समय नया करने को उतावला रहता था | उनकी फिल्मो की रूमानियत दिल के तारो को झंकृत कर देती थी | इत्तेफाक  , दाग में उन्होंने राजेश खन्ना को नए अंदाज में जहाँ लोगो के बीच रखा वहीँ काला पत्थर में अमिताभ और शत्रुघ्न सिन्हा शॉट गन  की उस दौर में टक्कर कराई जब उनकी आपस में बोलचाल बिलकुल बंद थी | यही नहीं दीवार आते आते उन्होंने अमिताभ की एंग्री यंग मैन की नई छवि को लोगो के बीच  पेश किया | उस दौर में मेरे पास माँ है का डायलाग आज भी यादगार  और सदाबहार बना है | भारतीय सिनेमा को सही मायनों  में विदेशी धरती पर पहुचाने का श्रेय भी यश चोपड़ा को जाता है | उन्होंने ही पहली बार अपनी फिल्मो के  दृश्यों  को  स्विट्जर्लैंड  की  हसीन  वादियों में फिल्माया जहाँ हर फिल्म के गानों में कल कल करते झरने, बर्फ से ढकी  पहाड़ियां नजर आती थी | कहा जाता है उनके काम से प्रभावित होकर स्विट्जरलैंड  सरकार ने उन्हें सम्मानित किया और एक झील का नाम तो बाकायदा उन्ही  के नाम से रख दिया |  अपने अप्रीतम योगदान के  कारण यश चोपड़ा को दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चूका है |
                                             
यश चोपड़ा को इसलिए भी याद किया जायेगा उन्होंने अपनी छत्रछाया में अमिताभ और शाहरुख़ खान जैसे कलाकारों को सुपर स्टार बनाया | जंजीर से अमिताभ को शोहरत  मिली लेकिन यश के निर्देशन में अमिताभ के अभिनय की असल पटकथा दीवार में लिखी जा चुकी थी जो सिलसिला आते आते सुपर हिट हो गई | यही नहीं डर के जरिए शाहरुख को सामने लाकर उन्होंने बालीवुड को अमिताभ के बाद अब तक का  सबसे बड़ा कलाकार हिंदी सिनेमा को दिया जिसकी कामयाबी का सफ़र दिल वाले दुल्हनिया ले जायेगे से लेकर  दिल तो पागल है ,वीरजारा तक जारी है और यह महज संयोग  ही है कि अपने रोमांस की खुशबू और   शाहरुख़ की रूमानियत से प्यार का एक नया पाठ अपनी   फिल्म जब तक है जान में पढ़ाते नजर आयेगे जो दिवाली के मौके पर रिलीज होने वाली उनकी आखरी  फिल्म होगी तो उनके प्रशंसक  एक्शन और रोमांस के यश को पहली बार मिस करेगे | जाहिर है ऐसे माहौल में दिवाली तो फीकी होगी ही लेकिन अपनों के खोने का गम उनके चाहने वाले करोडो प्रशंसको को सताता रहेगा |  सही मायनों में यश आप बहुत याद आओगे ........

Saturday, October 6, 2012

टिहरी उपचुनाव -- दाव पर दिग्गजों की प्रतिष्ठा






उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा द्वारा खाली कराई गई  टिहरी संसदीय सीट के लिए होने जा रहा चुनाव दिलचस्प बनता  जा रहा है | जैसे जैसे मतदान की तिथि १० अक्तूबर पास आते जा रही है वैसे वैसे पूरे संसदीय इलाके में चुनाव प्रचार जोर पकड़ता जा रहा है | टिहरी संसदीय सीट पर कांग्रेस के टिकट पर विजय बहुगुणा के बेटे साकेत बहुगुणा पहली बार राजनीती के समर में अपना भाग्य आजमाने उतरे हैं | वही इस सीट पर भाजपा ने राजघराने की  बहू माला राजलक्ष्मी पर दाव लगाया है | टिहरी लोक सभा उपचुनाव उत्तराखंड में ऐसे समय में हो रहा है जब लोक सभा के आम चुनाव होने में बमुश्किल दो साल से भी कम का समय बचा है | ऊपर से कांग्रेस जिस तरीके से आर्थिक सुधारो की अपनी लीक पर सहयोगियों को धता बताकर फर्राटा भर रही है और जिस तरीके से इस मसले पर उसके सहयोगी लगातार उससे छिटकते जा रहे हैं उसने पहली बार मध्यावधि चुनावो की आशंका को बल प्रदान किया है | इन सबके बीच यह उपचुनाव निश्चित ही भाजपा और कांग्रेस सरीखे दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए उत्तराखंड में अहम हो चला है क्युकि टिहरी उपचुनाव की बढ़त दोनों दलों के लिए आने वाले लोक सभा चुनावो में उनके मनोबल को सीधे प्रभावित करेगी | वैसे भी राज्य में कांग्रेस और भाजपा इन दोनों दलों के इर्द गिर्द ही राजनीती चलती आई है | २००९ के लोकसभा  चुनावो में कांग्रेस ने ५-० से भाजपा को करारी शिकस्त दी थी जिसके बाद राज्य के तत्कालीन सीएम बी सी खंडूरी की मुख्यमंत्री की कुर्सी चली गई थी | टिहरी लोक सभा चुनाव में उस समय विजय बहुगुणा ने भाजपा प्रत्याशी निशानेबाज जसपाल राणा  को धूल चटाई थी |  ऐसे में अब भाजपा के सामने टिहरी के इस उपचुनाव को जीतकर अपनी खोयी प्रतिष्ठा हासिल करने का सुनहरा अवसर है | 
                                        




वैसे  टिहरी लोक सभा उपचुनाव में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने राज्य के कांग्रेसियों के भारी विरोध के बावजूद जहाँ अपने बेटे साकेत बहुगुणा पर दाव इस चुनाव के बहाने खेला है वहीँ भाजपा ने भी टिहरी उपचुनाव के बहाने टिहरी राजघराने की बहू माला राजलक्ष्मी शाह का नाम कांग्रेस प्रत्याशी घोषित होने से पहले प्रत्याशी चयन में कांग्रेस से बढ़त जरुर ले ली है  | टिहरी उपचुनाव में उत्तराखंड के दो राजनीतिक परिवारों की तीसरी पीड़ी की साख दांव पर लगी है जिसके सामने अपने राजनीतिक वजूद को तलाशने की एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है | मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पुत्र साकेत बहुगुणा पहली बार राजनीतिक अखाड़े में अपनी किस्मत आजमाने उतरे है | साकेत बहुगुणा अपने " पर्वत पुत्र " दादा हेमवतीनंदन बहुगुणा के नाम के आसरे जहाँ टिहरी उपचुनाव की नैय्या पार लगने की उम्मीद पाले बैठे हैं तो वहीँ महारानी राजलक्ष्मी भी अपने ससुर राजा मानवेन्द्र शाह के नाम में अपनी जीत की सम्भावनाये तलाश रही हैं जिनकी ईमानदारी के किस्से आज भी टिहरी में सर चढ़कर बोलते हैं  जो  टिहरी संसदीय इलाके से रिकॉर्ड 8  बार  जीते  भी थे | 
       
                                      तकरीबन बारह लाख से ज्यादा वोटरों से  घिरी टिहरी लोक सभा सीट  उत्तराखंड के देहरादून, उत्तरकाशी, टिहरी जिलो तक फैली हुई है | इन सीटो पर भाजपा और कांग्रेस दोनों समय समय पर अपना दावा जताती आई हैं |  उत्तराखंड के हालिया विधानसभा चुनावो में १४ सीटो पर भाजपा और कांग्रेस के बीच मुकाबला बराबरी पर जहाँ सिमटा है वही एक सीट निर्दलीय और एक यू के डी के पाले में गई |  गढ़वाल के इलाको में आज भी अधिकतर सीटो पर खंडूरी का जलवा कायम है | इसी के चलते भाजपा पहले बी सी खंडूरी को यहाँ से चुनाव लडाना चाह रही थी लेकिन खंडूरी द्वारा आलाकमान को राज्य की राजनीती में ज्यादा  दिलचस्पी के निर्णय से पहले ही अवगत करवा दिया गया था जिसके चलते पार्टी ने माला राजलक्ष्मी का नाम फ़ाइनल  करने में लम्बी मैराथन नहीं करनी पड़ी | वहीँ कांग्रेस में इस उपचुनाव के बहाने एक बार फिर गुटबाजी का असर देखने को मिला | केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत जहाँ इस  उपचुनाव में अपने समर्थको को टिकट देने का मूड बना चुके थे वहीँ राज्य में कांग्रेस के प्रभारी चौधरी वीरेंद्र सिंह भी पहली बार इस मसले पर रावत के साथ खड़े दिखाई दिए | बाद में मुख्यमंत्री  विजय बहुगुणा ने दस जनपथ के अपने सम्पर्को का लाभ  उठाते हुए अपने बेटे साकेत बहुगुणा का नाम फ़ाइनल  करवाकर हरीश रावत सरीखे खांटी कांग्रेसी और उनके समर्थको को एक बार फिर से पटखनी दे दी | 



हरीश रावत कांग्रेस से किशोर उपाध्याय , हीरा सिंह बिष्ट, जसपाल राणा  और बहुगुणा सरकार में कैबिनेट  मंत्री प्रीतम सिंह के लिए अपने स्तर से लाबिंग करने में लगे हुए थे लेकिन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य , सांसद सतपाल महाराज के विजय बहुगुणा के साथ आने से साकेत बहुगुणा के नाम पर मुहर लगनी आसान हो गई | दस जनपथ के अपने सलाहकारों  के साथ अहमद पटेल ने भी  टिहरी उपचुनाव  के लिए  विजय बहुगुणा के बेटे साकेत को टिकट देने के लिए हामी भर दी जिससे साकेत बहुगुणा सब पर भारी पड़े और अंततः नए राजनीतिक माहौल के बीच टिहरी में हो रहे उपचुनाव के इस घमासान में कांग्रेस के सामने मुश्किलें इस दौर में ज्यादा हैं क्युकि राज्य की कांग्रेस सरकार का ६ साल का निराशाजनक  कार्यकाल, प्रमोशन में आरक्षण ,मूल निवास प्रमाण पत्र, आपदा का मुद्दा सत्तारूढ़  कांग्रेस के लिए भारी पड़ता दिखाई दे रहा है | वहीँ केंद्र सरकार द्वारा सब्सिडी ख़त्म करने, महंगाई, एफ डी आई जैसे मुद्दे भी टिहरी के आम वोटर को सीधे प्रभावित कर रहे हैं |   एफ डी आई के मसले पर पूरे भारत बंद का इस संसदीय सीट पर खासा असर हाल में देखने को मिला | वैसे भी उत्तराखंड में छोटे व्यापारियों की तादात ज्यादा है जो सबसे ज्यादा  मसूरी, देहरादून, उत्तरकाशी , टिहरी में अपना असर दिखा सकते  है |


जहाँ  गैस ,तेल की बड़ी कीमतों से संसदीय इलाके का आम वोटर परेशान  दिखता  है वही आपदा की  विभीषिका पर हीलाहवाली के भाजपा  द्वारा लगाये गए आरोप भी बहुगुणा सरकार की मुश्किलों को  बढ़ा सकते  हैं क्युकि इस चुनावी बेला में आपदा प्रभावितों की सुध लेने के बजाये सभी अपनी पूरी ताकत टिहरी चुनाव जीतने को लगाये हुए हैं | मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा स्टार प्रचारक बनकर हेलिकॉप्टरो में अपने तूफानी दौरे कर रहे हैं | आपदा प्रभावितों से उनका कोई सरोकार भी नहीं रहा शायद तभी वह प्रभावितों से  आपदा आई है तो भजन कीर्तन करो यह कहते हाल के दिनों में  देखे गए | वहीँ प्रमोशन में आरक्षण का मसला भी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा की गले की फाँस बना हुआ है | यह मुद्दा राज्य के हर वोटर को सबसे ज्यदा प्रभावित कर रहा है | खास तौर से कर्मचारियों में इसे लेकर खासा रोष देखा जा सकता है |

 बीते दिनों कर्मचारियों की लम्बी हड़ताल के बाद टिहरी उपचुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद विजय बहुगुणा ने जस्टिस इरशाद हुसैन की अध्यक्षता में कमेटी  बनाकर कुछ दिनों के लिए राहत की सांस जरुर ली है लेकिन दून  के सचिवालय , परेड ग्राउंड  से  निकली क्रमिक अनशन की चिंगारी पूरे प्रदेश को अपने आगोश में ले चुकी है|  संभावना है टिहरी उपचुनाव के संपन्न  होने के बाद आक्रोशित  कर्मचारी परेड  ग्राउंड से बहुगुणा सरकार के विरुद्ध फिर से कोई बड़ी हुंकार भरें |  इस समय  में टिहरी की चुनावी बेला सभी के लिए  टशन बढ़ाने  का काम कर रही है |   





भाजपा प्रत्याशी माला राजलक्ष्मी  तो इन मुददों के आसरे कांग्रेस की दुखती रग पर हाथ रखकर जनता के बीच कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं | वह अपने ससुर राजा मानवेन्द्र शाह की साफगोई को भ्रष्टाचार विरोधी माहौल के बीच  भुनाने में लगी हैं | राजा मानवेन्द्र अपनी साफगोई के चलते टिहरी को  8 बार फतह करने में कामयाब हुए थे | केंद्र सरकार की नाकाम नीति, विजय बहुगुणा के खिलाफ बन रहे असंतोष , असंतुष्टो  की बढती संख्या भी इस उपचुनाव में अपना असर दिखा सकती है | शायद इसी के चलते मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने टिहरी  उपचुनाव को उनकी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया है और वह खुद भी यहाँ से लगातार दो बार जीत दर्ज कर अपने पुत्र साकेत को     जीत दिलाकर "हैट्रिक" लगाने की फ़िराक में हैं | 

राजनीतिक विश्लेषको का आंकलन है कि पार्टी  हाईकमान के भरोसे में खरा उतरने की चुनोती इस समय बहुगुणा के सामने खड़ी है | वह भी ऐसे दौर में जब राज्य के सभी कांग्रेसी नेता राज्य की राजनीती में अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढाने के लिए  बैचैन खड़े हैं | संगठन और हरीश रावत सरीखे खांटी कांग्रेसी नेता को हाशिये पर धकेल कर विजय बहुगुणा साकेत के लिए तो टिकट ले आये लेकिन अगर इस चुनाव में साकेत का दाव नहीं चला तो खुद  मुख्यमंत्री  विजय बहुगुणा के खिलाफ राज्य में हरीश रावत के समर्थक अपना मोर्चा खोल  सकते हैं | ऐसे में विजय बहुगुणा की मुख्यमंत्री की कुर्सी खतरे में पड़  सकती है | शायद इसी के मद्देनजर विजय बहुगुणा ने टिहरी उपचुनाव में अपनी पूरी मशीनरी लगाई हुई है जहाँ हेलीकाप्टर के दौरों में  पानी की तरह पैसा बहाया  जा रहा है | यहाँ भी मुख्यमंत्री सितारगंज विधान सभा उपचुनाव की तरह अपने भरोसेमंद साथियो से चुनाव प्रचार करवा रहे हैं |  


मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पूरे  परिवार का जोर  इस समय टिहरी चुनाव में अपनी प्रतिष्ठा बचाने में लगा हुआ है| मुख्यमंत्री बहुगुणा की बहन  यू पी की पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष रही रीता बहुगुणा जोशी भी इस समय चुनाव प्रचार में देखी जा सकती हैं |  हरीश रावत सरीखे जमीनी नेता और उनके समर्थक  इस दौर में एक बार उपचुनाव के बहाने हाशिये पर चले गए हैं |






 टिहरी उपचुनाव में सपा , बसपा ने इस बार भी सितारगंज विधान सभा उपचुनाव की भांति कांग्रेस प्रत्याशी साकेत बहुगुणा  को वाक ओवर दे दिया है |  बहुगुणा सरकार में शामिल यू के डी   (पी) की इस चुनाव में स्थिति सबसे असहज हो चली  है क्युकि उसके कोटे के कैबिनेट मंत्री प्रीतम सिंह पवार जहाँ चुनाव प्रचार में नदारद हैं वहीँ पार्टी के केन्द्रीय अध्यक्ष त्रिवेन्द्र सिंह पंवार चुनावी अखाड़े में अपनी ताकत दिखाने डटे हुए हैं जो  मुकाबले  को त्रिकोणीय संघर्ष में तब्दील  करने की आस में हैं | यू के डी ( पी ) के नेताओ में इस बात को लेकर टीस जरुर है  क़ि वह पिछले लोक सभा चुनाव में इस सीट से अस्सी हजार वोट लाकर अच्छी स्थिति में थी | इस लिहाज से बहुगुणा के बेटे के खिलाफ दम दिखाना स्वांग नहीं लग रहा | वैसे भी यू के डी  में उत्तराखंड के इस बार के विधान सभा चुनाव के दरमियान दो फाड़ हो चुका है और उस पर भाजपा और कांग्रेस के साथ सत्ता में सांठगाँठ करने के आरोप राज्य गठन के बाद से लगते रहे हैं | यह टिहरी उपचुनाव निश्चित ही उसकी ताकत का थोडा बहुत अहसास तो जरुर ही करवा सकता है | 

 बहरहाल जो भी हो कांग्रेस और भाजपा के दो राजपरिवारो की तीसरी पीड़ी उत्तराखंड के टिहरी उपचुनाव के बहाने अपने वजूद  को लेकर संघर्ष कर रही है | राज्य की कांग्रेस सरकार के लिए राहत की बात यह है क़ि चुनाव से ठीक पहले निशंक सरकार में कैबिनेट मंत्री  रहे मातबर सिंह कंडारी ने बीते दिनों भाजपा को अलविदा कहकर २१ सालो बाद कांग्रेस का दामन  थामा | उनकी वापसी बहुगुणा परिवार के लिए क्या गुल खिलाती है यह तो आने वाला समय ही बतायेगा ? लेकिन इस चुनावी  बिसात में  भाजपा प्रत्याशी रानी राजलक्ष्मी भी फिट बैठ रही है क्युकि उनके ससुर राजा मानवेन्द्र शाह का टिहरी में व्यापक प्रभाव आज भी कायम है | उनकी बहू रानी खुद नेपाली मूल की हैं और इस संसदीय इलाके कई तकरीबन पचास हजार से ज्यादा वोटर जीत के आंकड़ो को सीधे प्रभावित कर सकते हैं  और महिला प्रत्याशी होना भी उनके लिए फायदे का सौदा बनकर  उभर रहा है | इससे भाजपा के महिला आरक्षण के समर्थन को भी बल मिल रहा है | 

वैसे पूर्व में भाजपा ने नैनीताल संसदीय सीट से नब्बे के दशक में इला पन्त को आगे कर नया एक नया दाव खेला था| तब इला पन्त ने कांग्रेस के कद्दावर नेता और यू पी के मुख्यमंत्री रहे नारायण  दत्त तिवारी को हराकर सबको  चौका दिया था | क्या भाजपा यह इतिहास फिर राजलक्ष्मी के जरिये टिहरी में दोहरा रही है ? कह पाना मुश्किल है लेकिन रानी राजलक्ष्मी की सभाओ में उमड़ रही भारी भीड़ बहती हवा का थोडा बहुत अहसास  तो जरुर ही करवा  रही है  और इस चुनाव के बहाने भाजपा  के उत्तराखंड में तीन बड़े चेहरे खंडूरी, कोश्यारी और निशंक एकजुट होकर यह अहसास जरुर करवा रहे हैं कि भाजपा ने सितारगंज के हालिया उपचुनावों से कुछ सबक जरुर लिया है |  वैसे हमारी समझ से टिहरी के गलियारों में इस समय यह सवाल भी घुमड़ रहा है क़ि अगर विजय बहुगुणा यहाँ से अपने पुत्र साकेत बहुगुणा के बजाए अपनी पत्नी सुधा बहुगुणा या उनकी बहु गौरी बहुगुणा का दाव  खेलते तो मुकाबला बराबरी का हो सकता था | लेकिन क्या करें राजनीती की बिसात ही बड़ी अप्रत्याशित है  |  यहाँ असंभव से संभव होने में कुछ देर नहीं लगती | क्या टिहरी उपचुनाव इतिहास की एक नई इबारत लिखने जा रहा है ? देखना होगा आगे क्या होता है | तो इन्तजार करिए १३ अक्तूबर को होने वाली काउंटिंग  का.......................

Wednesday, October 3, 2012

आपदा से सहमा उत्तराखंड .................

"  इस साल अगस्त महीने की वो काली रात आज भी याद आती है जब हम रात का खाना खाकर सो ही रहे थे कि घरो के बाहर भीषण बरसात ने जनजीवन बुरी तरह प्रभावित कर दिया  | वैसे भी पहाड़ो  में बरसात के मौसम में दिन बड़े कष्टप्रद रहते हैं | रात एक बजते बजते भीषण जल प्रलय ने लोगों की जिन्दगी तबाह कर दी और प्रकृति का ऐसा कहर   टूटा कि आज भी वो काली याद का दर्दनाक          मंजर  मैं नहीं भूला हूँ | "       

                       उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में रहने वाले मान सिंह ने जब ४ अगस्त की सुबह का आँखों देखा मंजर मुझे बताया तो उसकी आँखों से आंसू  छलक आये |  किसी आपदा में अपनों के खोने का गम क्या होता है यह मान सिंह का दर्द बताने के लिए काफी है जिसने उस रात अपने आस  पास के कई गाँवों को तबाह होते देखा |  उत्तराखंड के लिए हर साल अगस्त, सितम्बर , अक्टूबर का महीना भयानक विनाश बरसाता  रहा है | यूँ तो इस इलाके में आपदाए सत्तर और अस्सी के दशक  के दौरान भी आई हैं लेकिन इस साल आपदा से हुई  तबाही का मंजर अन्य वर्षो से ज्यादा खतरनाक रहा है |  आज  आपदा की   भयावहता  इतनी भीषण है कि लोग अपने सगे सम्बन्धियों, रिश्तेदारों ,पड़ोसियों का पता नहीं लगा पा रहे जो आपदा के चलते जमीदोंज हो गए हैं | लोग इस हादसे को अभी भूले भी नहीं थे कि सितम्बर के मध्य में गढ़वाल मंडल के रुद्रप्रयाग जिले के उखीमठ और कुमाऊ मंडल के बागेश्वर जनपद में  कई  लोग बादल फटने की घटना के चलते काल के गाल में समा गए | उत्तराखंड की जो सुरम्य वादियाँ अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के कारण देश दुनिया में जानी पहचानी जाती थी बादल फटने का कहर उन पर ऐसा टूटा कि दर्जनों गाँवों का नामोनिशान  ही मिट गया | बिजली ,पानी  , सड़क की  सुविधा बहाल  होना तो दूर आज चुन्नी, मंगली , किमाड़ा सरीखे  गाँव जो उखीमठ वाले इलाके में आते हैं ये कई साल पीछे चले गए मालूम पड़ते  हैं | रास्तो का नामोनिशान मिट चुका है | संचार तो बहुत दूर की गोटी है | हर तरफ सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा है |  कभी यह गलियां शोर से सरोबार हो उठती थी लेकिन आज ये वीरान हैं क्युकि अपनों के खोने का गम आज भी यहाँ के लोगो को आज भी सताता है  




            उत्तरकाशी ,रुद्रप्रयाग,बागेश्वर  जिले की आपदाएं उत्तराखंड के लिए नई नहीं हैं  | १९७८ में जहाँ जीवनदायनी भागीरथी ने यहाँ कहर बरपाया था तो वहीँ १९८० में उत्तरकाशी के ज्ञानसू में बादल फटने से सैकड़ो लोगो की मृत्यु हो गई थी | १९९१ में उत्तरकाशी के भूकंप की यादें आज भी यहाँ के लोगो के जेहन में हैं जो  मन में सिहरन पैदा कर देती हैं |  राज्य गठन के बाद यहाँ पर आपदाओ के ग्राफ में तेजी से इजाफा हुआ |   २४ सितम्बर २००३ को वरुणावत पर्वत से रुक रुक कर हुए भूस्खलन ने  सैकड़ो लोगों की जिन्दगी को ग्रहण लगाया था | यही नहीं बीते दस बरस में राज्य के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़  के  मुनस्यारी इलाके के  बरम, तल्ला जोहार , मल्ला जौहार, नामिक इलाको और बागेश्वर जनपद के कपकोट , सुमगढ़ में बादल फटने और भूस्खलन की कई घटनाएं हो चुकी हैं जो राज्य के लोगों के लिए कहर बनकर आई |

                प्राकृतिक आपदाओ की दृष्टि से संवेदनशील माने जाने वाले उत्तराखंड राज्य में बादल फटने , बाढ़, भूस्खलन ,भूकंप की घटनाये लगातार हो रही है लेकिन भयानक तबाही का मंजर  देखने के बाद भी यहाँ आपदा प्रबंधन नाम की कोई तैयारी शासन की ओर से नहीं की गई है | उत्तराखंड में इस साल प्राकृतिक  आपदा से जान माल का  व्यापक  नुकसान हुआ  है | उखीमठ में बादल फटने का कहर जहाँ ६ गाँवों में बादल फटने से टूटा वहीँ आपदा से सबसे ज्यादा प्रभावित जिलो में रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, बागेश्वर और पिथौरागढ़   जनपद रहे | सरकारी आंकड़ो पर अगर गौर फरमाए तो आपदाओ से इस साल तकरीबन ४० हक्टेयर कृषि योग्य भूमि 
को  नुकसान पंहुचा साथ ही ३०० से ज्यादा मोटर  मार्ग और दर्जनों पैदल मार्ग जिनमे लोगो की आवाजाही होती थी बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं | बीते ६ बरस में सरकारी आंकड़ो में जहाँ २०७ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि प्रभावित बताई जा रही है वहीँ २२ हजार के आस पास मकान इस दौर में जमींदोज हो गए |
                                             
                                          बेहद संवेदनशील माने जाने वाले उत्तराखंड में इन आपदाओ से मुकाबले के लिए अलग से आपदा प्रबंधन मंत्रालय गठित किया जा चुका है परन्तु राज्य गठन के बाद से आज तक इसका नतीजा सिफर ही रहा है | हर साल इसका प्रबंधन फेल रहता है | यह तभी हरकत में आता है जब आपदा घट जाती है और बचाव कार्य शुरू होते हैं | इस साल भी सूबे में आपदा राहत  के  नाम  पर हवा हवाई काम हो रहे हैं | सत्ता पक्ष और विपक्ष के लोग आपदा राहत  के नाम पर भी अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने में ही लगे हुए हैं | आपदा 
राहत  के नाम पर जमकर धन की बंदरबाट भी हो रही है  |  आपदा से प्रभावित  इलाको की  जमीनी सच्चाई से उत्तराखंड के राजनेताओ का कोई सरोकार नहीं रहा  है | आपदा की इस संकट घडी में गिले शिकवे भुलाने के बजाय वह एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं | दिल्ली से पैराशूट मुख्यमंत्री के रूप में उतारे गए विजय बहुगुणा आपदा की इस  घडी में जहाँ हवाई दौरे कर  लोगो का उपहास आपदा आई है तो भजन कीर्तन करो कहकर उडा रहे हैं वहीँ आपदा प्रभावित ज्यादातर इलाको में कांग्रेस और भाजपा का कोई   प्रतिनिधि नहीं पंहुचा है | आपदाओ से मुकाबला करने के लिए कोई बड़ी कार्ययोजना तैयार करने के बजाय सारी नौकरशाही  सरकारी आंकड़ो की फर्जी बाजीगिरी  और केंद्र  सरकार से पत्र व्यवहार करने में ही लगी हुई है | आज भी असलियत यह है कि आपदा से प्रभावित इलाको में सरकारी तंत्र की पोल खुल रही है | लोगो को तो दो समय का भोजन,पानी भी  ठीक से नहीं मिल पा रहा है |   

                                                         सरकारी आंकड़ो के लिहाज से उत्तराखंड के २३३ गाँव विस्थापन के मुहाने पर खड़े हैं | इनका विस्थापन  किया जाना जरुरी है लेकिन आज तक राज्य की दोनों सरकारें इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं कर पाई | ऐसे सबसे अधिक ७१ गाँव जहाँ पिथौरागढ़ जिले में हैं वहीँ चमोली में ४२ तो बागेश्वर में भी ४२ हैं |  अब उखीमठ ,भागीरथी 
घाटी , सुमगढ़ जैसे इलाके भी इसमें शामिल हो गए हैं | ऐसे इलाको में अधिकांश इलाके नगरीय इलाको से सटे हुए हैं जिसके चलते शासन प्रशासन के सामने मुश्किलों का पहाड़ ही खड़ा हो गया है | सरकारे इन इलाको में पुनर्वास के नाम पर मोटे बजट के खर्च होने का रोना रोती  रहती हैं | इन २३३ गाँवों में से अभी तक बमुश्किल १०० गाँवों का ही सर्वे हो पाया है | पुनर्वास तो बहुत दूर की  गोटी है |  राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग किस कछुआ चाल से चल रहा है यह इस बात से पता लगता है कि आज तक किसी भी गाँव का पुनर्वास नहीं हो पाया है | तत्कालीन भाजपा सरकार ने जहाँ विस्थापन नीति को अपने शासन में अमली जामा पहनाया वहीँ कांग्रेस सरकार आने के बाद इसकी रफ़्तार थम सी गई है | मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा  का पूरा जोर भाजपा के कार्यकाल में शुरू की गई योजनाओ के नाम बदलने में लगा हुआ है  जिसको उन्होंने बाकायदा शुरू भी कर दिया है | विस्थापन  के मसले पर मौजूदा सरकार  केंद्र सरकार  की ओर ताक़ रही है | उसका कहना है केंद्र सरकार से मोटे पैकेज की  मांग की जा रही है |

                            उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदाए लगातार बढ़ रही हैं  | भूगर्भीय दृष्टि से यहाँ के पहाड़ मौजूदा दौर में बेहद कमजोर हो चले हैं जिनका बरसात में दरकना आम बात हो चुकी है | लगातार बढ रही आबादी ने पहाड़ के प्राकृतिक असंतुलन को बढ़ाने का काम हाल के वर्षो में किया है | जहाँ  वनों के कटान पर अंकुश नहीं लग पाया वहीँ माफियाओ, नौकरशाहों ओर राजनेताओ के कॉकटेल  ने पहाड़ो को खोखला  कर दिया है | राज्य बनने के बाद यहाँ रिजोर्ट , खनन, बाँध बनाने का कारोबार खूब फला फूला है  | अवैध खनन के इस कारोबार ने जहाँ पहाड़ की सुन्दरता पर ग्रहण लगाया वहीँ माफियाओ की भी खूब चांदी हुई है क्युकि प्रशासन माफियाओ के आगे नतमस्तक रहता है |   इस दरमियान  पर्यावरणीय  मानको   की जहाँ लगतार अनदेखी अपने पहाड़ो में हो रही है वहीँ धड़ल्ले से एन ओं सी प्राप्त करने का धंधा चल पड़ा है | राज्य के तराई इलाको में स्टोन क्रेशर बड़ी आबादी वाले स्थानों में चल रहे है जिनमे तमाम मानको की अनदेखी हुई है | दुर्भाग्य है जनता के हितो की बात करने वाले सामाजिक संगठन  जो कभी जल , जमीन , जंगल का सवाल अपने आंदोलनों के जरिये उठाते थे  वह आज पहाड़ो को बचाने के मसलो पर अपना मुह नहीं खोल रहे | इसका बेहतर नमूना भाजपा शासन के कार्यकाल में कई हाइड्रो  परियोजनाए हैं जिन पर निशंक के राज में कई समाजसेवियों , आन्दोलनकारी संगठनो के दबाव में रोक लग गई थी | आज  दिल्ली से पैराशूट मुख्यमत्री के रूप में उतारे गए विजय  बहुगुणा ने कॉरपरेट  लाबी के दबाव में उनको फिर से शुरू करने का ऐलान एक झटके में कर दिया तो यह सारे समाजसेवी और आन्दोलनकारी ख़ामोशी की चादर ओड़ लिए है |  राज्य की कृषि योग्य भूमि आने पौने दामो पर बेचीं जा रही है | यह स्थिति तब है जब  भूगर्भ विज्ञानी मान चुके हैं  कि उत्तराखंड के सैकड़ो गाँव आज आपदा के बड़े  ढेर में बैठे हैं |  
                    
                    हाल में आई  प्राकृतिक आपदा ने बता दिया है कि राज्य में आज पानी कितना सर से उपर बह चुका है | पहाड़ो का मौसम चक्र तो गड़बड़ा ही चुका है साथ ही  यहाँ  की पारिस्थिकी  भी नाजुक दौर में है | अगर समय रहते इस दिशा में कारगर प्रयास नहीं किये गए तो इसकी कीमत पहाड़ वासियों को किसी भी बड़े हादसे के रूप में चुकानी पड़  सकती है | आपदा के बाद आज उत्तराखंड में राहत कार्य के नाम पर केवल राजनीती हो रही है और प्रभावित स्थल नेताओ के लिए पिकनिक स्पॉट बन गए हैं  | ऐसे में प्रभावितों को कितनी मदद मिलेगी या मिल रही है इसका अनुमान लगाना  आसान  है | राज्य के नेताओ का आज पहाड़ से कोई सरोकार भी नहीं रहा | अधिकांश विधायक या मंत्री राजधानी देहरादून में डटे रहते है | अपने विधान सभा इलाको से वह दूर हो रहे हैं | वहीँ राज्य के पैराशूट सी ऍम विजय बहुगुणा का भी बीता ६ महीने का समय दिल्ली में पार्टी से जुड़े मसले सुलझाने में ही बीता है |  कुछ कर गुजरने की तमन्ना जिस खंडूरी सरीखे शासक में है उसे निशंक सरीखे लोग भीतर घात से हरा देते हैं | चुनाव निपटने के बाद भी भीतरघातियो पर कार्यवाही तक नहीं होती 
जो   बतलाता है स्थितिया इस दौर में कितनी बेकाबू हो गई हैं | नौकरशाही  , माफिया खंडूरी के राज में खौफ खाते थे जिसके चलते उत्तराखंड में विकास कार्य कभी उतना प्रभावित नहीं हुए जितना बहुगुणा के शासन में हो रहे हैं | मुख्यमंत्री बहुगुणा   की सारी कवायद अपनी कुर्सी बचाने में लगी हुई है क्युकि उनकी पार्टी के नेता, विधायक उनकी नाक में दम किये   हुए है | ऐसे में विकास कार्य सीधे प्रभावित हो रहे हैं क्युकि नौकरशाहों पर मुख्यमंत्री का कोई नियंत्रण नहीं रहा | खुद मुख्यमंत्री बहुगुणा जज के अपने अन्तर्मुखी आवरण से बाहर  नहीं निकल पा रहे है  | ऐसे में समझा जा सकता है उत्तराखंड किस राह में जा रहा है  ?
 
                        सरकार अगर ईमानदारी से आपदा के मुकाबले के लिए कोई कारगर योजना तैयार करती है तो उत्तराखंड में बहुत कुछ हो सकता है| राहत कार्यो में तेजी आ सकती है |लेकिन इसे राज्य का दुर्भाग्य ही कहेंगे यह राज्य अब नौकरशाहों , राजनेताओ , माफियाओ की अवैध कमाई का अड्डा बन चुका है | जिन लोगो  के मन में उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने को लेकर कोई पीड़ा नहीं थी उनके नुमाइंदे आज शासन कर रहे है | इन दिनों राज्य में केंद्र सरकार से राहत पैकेज  मांगने का नया चलन चल रहा है | केंद्र में  कांग्रेस की सरकार होने के बाद भी विजय बहुगुणा  आपदा राहत के नाम पर कोई बहुत बड़ा पैकेज राज्य के लिए नहीं ला सके हैं | अपने घर में डिजास्टर मैनेजमेंट खुद 
फेल  हो रहा है | आपदा के नाम पर केंद्र से पैसा मांगने से नेताओ की राजनीती तो चमक सकती है लेकिन मान सिंह सरीखे लोगो का दर्द हवाई दौरों से नहीं समझा जा सकता जिसने अपनी आँखों के सामने कई परिवारों को उजड़ते देखा है | लेकिन क्या किया जाए जब मौजूदा दौर में हर व्यवस्था भ्रष्टाचार और लूट खसोट की पोषक बन चुकी है | ऐसे में जनता बेहाल होकर अगर किसी तारणहार को ना ताके तो और करे भी क्या क्युकि नेताओ की सारी बिसात  तो राजनीती और अपनी कुर्सी बचाने ,चमकाने और आरोप प्रत्यारोप पर ही  टिक गई है | ऐसे में उत्तराखंड की  आपदा राहत  की लकीर भी भला  इससे अछूती कैसे रह सकती है ?