गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

वैलेंटाइन पर भारी बाजारू चकाचौंध




(14  फरवरी पर   विशेष ) 

 21 साल की  कविता  हाथो में गुलाब का फूल लिए कनाट  पेलेस  में  पालिका बाजार के सेंट्रल पार्क में अपने प्रेमी के आने के इंतजार में  बैठी है ।  उसे देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस इंतजारी के मायने इस दौर में क्या हैं ?  युवाओं पर वैलेंटाइन वीक का खुमार एक हफ्ते   पहले  से ही  चढ़ने लगा है। हर जगह लाल व गुलाबी रंगत देखने को मिल रही है। मॉलों में इसी थीम पर सजावट भी देखी जा सकती  है। गिफ्ट की दुकानें  हर जगह सज गई हैं । पिछले कुछ समय से  ग्लोबलाइज्ड  समाज में प्यार भी ग्लोबल ट्रेंड का हो गया है । आज जहाँ इजहार और इकरार करने के तौर तरीके बदल गए हैं वहीँ  इंटरनेट के इस दौर में प्यार भी बाजारू  हो चला है । कनाट  पेलेस के ऐसे दृश्य आज  कमोवेश हर कस्बे में देखने को मिल रहे हैं क्युकि पहली बार शहरी चकाचौंध  से इतर  प्यार का यह उत्सव एक बड़ा बाजार  को अपनी गिरफ्त में ले चुका  है । युवाओं के साथ-साथ किशोर तथा उम्र दराज लोग भी इस अवसर को खास बनाने के लिए तोहफे की खरीद कर रहे हैं। वैलेंटाइन्स डे का क्रेज युवाओं के साथ हर उम्र के  लोगों में साल-दर-साल दिखने लगा है। अब यह किसी खास आयु वर्ग से ऊपर उठकर हर आयु वर्ग व हर रिश्ते के लिए खास उत्सव साबित होने लगा है।   हमारे युवाओ को लगा वैलेंटाइन का चस्का भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है । शहरों से लेकर कस्बो तक वैलेंटाइन का जलवा देखते ही बनता है । आज आलम यह है यह त्यौहार भारतीयों में भी  तेजी से अपनी पकड़ बना रहा है। वेलेंटाइन्स डे की खुमारी तकरीबन सारी दुनिया में देखी जा रही है ।  पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक ।  वैलेंटाइन्स डे के दिन दुनिया भर में गुलाबों की बिक्री जबरदस्त तरीके से बढ़ जाती है ।  यह  मौका बाज़ार और कारोबार के लिहाज से भी अहम होता है। 

वैलेंटाइन के चकाचौंध पर अगर दृष्टि  डाले तो इस सम्बन्ध में कई किस्से प्रचलित है ।  रोमन कैथोलिक चर्च की माने तो यह "वैलेंटाइन "अथवा "वलेंतिनस " नाम के तीन लोगो को मान्यता देता है जिसमे से दो के सम्बन्ध वैलेंटाइन डे से जोड़े जाते है लेकिन बताया जाता है इन दो में से भी संत " वैलेंटाइन " खास चर्चा में रहे  । कहा जाता है संत वैलेंटाइन प्राचीन रोम में एक धर्म गुरू थे ।  उन दिनों वहाँ पर "कलाउ डियस" 2  का शासन था ।  उसका मानना था अविवाहित युवक बेहतर सैनिक  हो सकते है क्युकि युद्ध के मैदान में उन्हें अपनी पत्नी या बच्चों की चिंता नही सताती  । अपनी इस मान्यता के कारण उसने तत्कालीन रोम में युवको के विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया । 

किन्दवंतियो की माने तो संत वैलेंटाइन के क्लाऊडियस के इस फैसले  का विरोध करने का फैसला  किया ।  बताया जाता  है  वैलेंटाइन ने इस दौरान कई युवक युवतियों का प्रेम विवाह करा दिया ।  यह बात जब राजा को पता चली तो उसने संत वैलेंटाइन को 14  फरवरी को फासी की सजा दे दी । कहा जाता है  संत के इस त्याग के कारण हर साल 14 फरवरी को उनकी याद में युवा "वैलेंटाइन डे " मनाते है । 1260 में संकलित की गई 'ऑरिया ऑफ जैकोबस डी वॉराजिन' नामक पुस्तक में  भी सेंट वेलेंटाइन का वर्णन मिलता है। इसके अनुसार रोम में तीसरी शताब्दी में सम्राट क्लॉडियस के अनुसार विवाह करने से पुरुषों की शक्ति और बुद्धि कम होती है। उसने फरमान  जारी  किया  कि उसका कोई सैनिक या अधिकारी विवाह नहीं करेगा। संत वेलेंटाइन ने इस क्रूर आदेश का विरोध किया। उन्हीं के आह्वान पर अनेक सैनिकों और अधिकारियों ने विवाह किए। 

कैथोलिक चर्च की एक अन्य मान्यता के अनुसार एक दूसरे संत वैलेंटाइन की मौत प्राचीन रोम में ईसाईयों पर हो रहे अत्याचारों से उन्हें बचाने के दरमियान हो गई  । यहाँ इस पर नई मान्यता यह है  ईसाईयों के प्रेम का प्रतीक माने जाने वाले इस संत की याद में ही वैलेंटाइन डे मनाया जाता है । एक अन्य किंदवंती के अनुसार वैलेंटाइन नाम के एक शख्स ने अपनी मौत से पहले अपनी प्रेमिका को पहला वैलेंटाइन संदेश भेजा जो एक प्रेम पत्र था  । उसकी प्रेमिका उसी जेल के जेलर की पुत्री  थी जहाँ उसको बंद किया गया था ।  उस वेलेंन टाइन  नाम के शख्स  ने प्रेम पत्र  लिखा  " फ्रॉम यूअर  वेलेंनटाइन "  । आज भी यह वैलेंटाइन पर लिखे जाने वाले हर पत्र के नीचे लिखा रहता है ।  क्लॉडियस ने 14 फरवरी को संत वेलेंटाइन को फांसी पर चढ़वा दिया। तब से उनकी स्मृति में प्रेम दिवस मनाया जाता है। कहा जाता है कि सेंट वेलेंटाइन ने अपनी मृत्यु के समय जेलर की नेत्रहीन बेटी जैकोबस को नेत्रदान किया व जेकोबस को एक पत्र लिखा, जिसमें अंत में उन्होंने लिखा था 'तुम्हारा वेलेंटाइन'।  14 फरवरी के  बहाने  जिसे बाद में इस संत के नाम पूरे विश्व में निःस्वार्थ प्रेम से मनाया जाने लगा ।   

यही नही वैलेंटाइन के बारे में कुछ अन्य किन्दवंतिया भी है  । इसके अनुसार तर्क यह दिए जाते है प्राचीन रोम के  प्रसिद्ध  पर्व "ल्युपर केलिया " के ईसाईकरण की याद में मनाया जाता है  । यह पर्व रोमन साम्राज्य के संस्थापक रोम्योलुयास और रीमस की याद में मनाया जाता है  ।  इस आयोजन पर रोमन धर्मगुरु उस गुफा में एकत्रित होते थे जहाँ एक मादा भेडिये ने रोम्योलुयास और रीमस को पाला था इस भेडिये को ल्युपा कहते थे और इसी के नाम पर उस त्यौहार का नाम ल्युपर केलिया पड़ गया ।  इस अवसर पर वहां बड़ा आयोजन होता था ।  लोग अपने घरो की सफाई करते थे।  साथ ही अच्छी फसल की कामना के लिए बकरी की बलि देते थे ।  कहा जाता है प्राचीन समय में यह परम्परा खासी लोक प्रिय हो गई। 

एक अन्य किंदवंती यह कहती है 14  फरवरी को फ्रांस में चिडियों के प्रजनन की शुरूवात मानी जाती थी जिस कारण खुशी में यह त्यौहार वहा प्रेम पर्व के रूप में मनाया जाने लगा  । प्रेम के तार रोम से   भी  सीधे जुड़े नजर आते है  । वहा पर क्यूपिड को प्रेम की देवी के रूप में पूजा जाने लगा जबकि यूनान में इसको इरोश के नाम से जाना जाता था । प्राचीन वैलेंटाइन संदेश के बारे में भी लोगो में   एकरूपता नजर नही आती । कुछ ने माना है  यह इंग्लैंड के राजा ड्यूक ने  लिखा जो आज भी वहां के म्यूजियम में रखा हुआ है ।  ब्रिटेन की यह आग आज भारत में भी लग चुकी है । अपने दर्शन शास्त्र में भी कहा गया है " जहाँ जहाँ धुआ होगा वहा आग तो होगी ही " सो अपना भारत भी इससे अछूता कैसे रह सकता है? 

युवाओ में वैलेंटाइन की खुमारी सर चढ़कर  बोल रही है ।  इस दिन के लिए सभी पलके बिछाये बैठे रहते हैं ।   भईया प्रेम का इजहार जो करना है ? वैलेन्टाइन प्रेमी  इसको प्यार का इजहार करने का दिन बताते है ।  यूँ तो प्यार करना कोई गुनाह नही है लेकिन जब प्यार किया ही है तो इजहार करने मे देर नही होनी चाहिए लेकिन अभी का समय ऐसा है जहाँ युवक युवतिया प्यार की सही परिभाषा नही जान पाये है । वह इस बात को नही समझ पा रहे है प्यार को आप एक दिन के लिए नही बाध सकते ।वह तो  प्यार को हसी मजाक का खेल समझ रहे है ।  हमारे एक  परम मित्र पंकज चौहान कहते है आज का प्यार मैगी के नूडल जैसा बन गया है जो दो मिनट चलता है ।  सच्चे प्रेमी के लिए तो पूरा साल प्रेम का प्रतीक बना रहता है  लेकिन आज के समय में प्यार की परिभाषा बदल चुकी है । इसका प्रभाव यह है 1 4 फरवरी को प्रेम दिवस का रूप दे दिया गया है जिसके चलते संसार भर के "कपल "प्यार का इजहार करने को उत्सुक रहते है ।जहां चीन में यह दिन 'नाइट्स ऑफ सेवेन्स' प्यार करने वालो के लिए खास होता है, वहीं जापान व कोरिया में इस पर्व को 'वाइट डे' का नाम से जाना जाता है। इतना ही नहीं, इन देशों में  इस दिन से पूरे एक महीने तक लोग अपने प्यार का इजहार करते हैं । 

आज  14 फरवरी का कितना महत्त्व बढ गया है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है इस अवसर पर बाजारों में खासी रौनक  छा जाती है । गिफ्ट सेंटर में उमड़ने वाला सैलाब , चहल पहल इस बात को बताने के लिए काफी है यह किस प्रकार आम आदमी के दिलो में एक बड़े पर्व की भांति अपनी पहचान बनने में कामयाब हुआ है । इस अवसर पर प्रेमी होटलों , रेस्ताराओ में देखे जा सकते है । प्रेम मनाने का यह चलन भारतीय संस्कृति को चोट पहुचाने का काम कर रहा है ।  यूं तो हमारी संस्कृति में प्रेम को परमात्मा का दूसरा रूप बताया गया है अतः प्रेम करना गुनाह और प्रेम का विरोधी होना सही नही होगा लेकिन वैलेंटाइन के नाम पर जिस तरह का भोड़ापन , पश्चिमी परस्त विस्तार हो रहा है वह विरोध करने लायक ही है  । वैसे भी यह प्रेम की स्टाइल भारतीय जीवन मूल्यों से किसी तरह मेल नही खाती ।आज का वैलेंटाइन डे भारतीय काव्य शास्र में बताये गए मदनोत्सव का पश्चिमी संस्करण प्रतीत होता है लेकिन बड़ा सवाल जेहन में हमारे यह आ रहा है क्या आप प्रेम जैसे चीज को एक दिन के लिए बाध सकते है? शायद नही । पर हमारे अपने देश में वैलेंटाइन के नाम का दुरूपयोग किया जा रहा है । 

वैलेंटाइन के फेर में आने वाले प्रेमी भटकाव की राह में अग्रसर हो रहे है । एक समय ऐसा था जब राधा कृष्ण , मीरा वाला प्रेम हुआ करता था जो आज के वैलेंटाइन प्रेमियों का जैसा नही होता था । आज लोग प्यार के चक्कर में बरबाद हो रहे है। हीर रांझा, लैला मजनू रोमियो जूलियट  के प्रसंगों का हवाला देने वाले हमारे आज के प्रेमी यह भूल जाते है मीरा वाला प्रेम सच्ची आत्मा से सम्बन्ध रखता था  । आज तो  प्यार बाहरी आकर्षण की चीज बनती जा रही है । प्यार को गिफ्ट और पॉकेट  में तोला जाने लगा है । वैलेंटाइन के प्रेम में फसने वाले कुछ युवा सफल तो कुछ असफल साबित होते है । जो असफल हो गए तो समझ लो बरबाद हो गए क्युकि यह प्रेम रुपी "बग" बड़ा खतरनाक है । एक बार अगर इसकी जकड में आप आ गए तो यह फिर भविष्य में भी पीछा नही छोडेगा । असफल लोगो के तबाह होने के कारण यह वैलेंटाइन डे घातक बन जाता है। 

वैलेंटाइन के नाम पर आज हमारे समाज में  जिस तरह की उद्दंडता हो रही है वह चिंतनीय ही है ।  इसके नाम पर कई बार अश्लील हरकते भी  देखी जा सकती है । संपन्न तबके साथ आज का मध्यम वर्ग और अब निम्न तबका भी  इसके मकड़ जाल में फसकर अपना पैसा और समय दोनों ख़राब करते जा रहे है ।   आज वैलेंटाइन की स्टाइल बदल गई है ।  गुलाब गिफ्ट दिए ,पार्टी में थिरके बिना काम नही चलता ।  यह मनाने के लिए आपकी जेब गर्म होनी चाहिए । यह भी कोई बात हुई क्या जहाँ प्यार को अभिव्यक्त करने के लिए जेब की बोली लगानी पड़ती हो ?  कभी कभार तो अपने साथी के साथ घर से दूर जाकर इसको मनाने की नौबत आ जाती है ।  डी जे की थाप पर थिरकते रात बीत जाती है ।  प्यार की खुमारी में शाम ढलने का पता भी नही चलता जिसके चलते समाज में क्राइम भी क्राइम भी बढ़  रहे हैं । 

आज के समय में वैलेंटाइन प्रेमियों की तादात बढ रही है ।  साल दर साल । इस बार भी प्रेम का सेंसेक्स पहले से ही कुलाचे मार रहा है. । वैलेंटाइन ने एक बड़े उत्सव का रूप ले लिया है ।  मॉल , गिफ्ट, आर्चीस , डिस्को थेक, मैक डोनल्स  पार्टी   का  आज इससे चोली दामन का साथ बन गया है ।  अगर आप में यह सब कर सकने की सामर्थ्य नही है तो आपका प्रेमी नाराज । बस बेटा  फिर प्रेम का  द  एंड समझे  । कॉलेज के दिनों से यह चलन चलता आ रहा है ।  अपने आस पास कालेजो में भी ऐसे दृश्य दिखाई देते है । लडकियां  भी गिव एंड टेक के फार्मूले  को अपनाती हैं ।   प्यार का स्टाइल समय बदलने के साथ बदल रहा है ।  वैलेंटाइन प्रेमी  भी हर साल बदलते  ही जा रहे है ।आज   तो वैलेंटाइन मनाना सबकी नियति बन चुकी है  । आज प्यार की परिभाषा बदल गई है ।  वैलेंटाइन का चस्का हमारे युवाओ में तो सर चदकर बोल रहा है लेकिन उनका प्रेम आज आत्मिक नही होकर छणिक बन गया है ।  उनका प्यार पैसो में तोला जाने लगा है । आज की युवा पीड़ी को न तो प्रेम की गहराई का अहसास है न ही वह सच्चे प्रेम को परिभाषित कर सकती   है ।  उनके लिए प्यार मौज मस्ती और सैर सपाटे  का खेल बन गया है जहाँ बाजार में प्यार नीलाम हो गया है और पूरे विश्व में  जब इस दिन मुनाफे के नाम पर  बड़ा कारोबार किया जा रहा हो तो भला भारत  भी इससे कैसे अछूता रह सकता है ?

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

दिल्ली के दिल में केजरीवाल







बीते बरस 16 मई  के दिन को याद करें । इस दिन पूरे देश  नजरें लोक सभा  चुनावो पर केन्द्रित थी ।   जैसे ही  भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की वैसे हीं  पूरा मीडिया मोदीमय हो गया  था । तीसरी बार गुजरात को हैट्रिक लगाकर फतह करने के बाद नरेन्द्र दामोदरदास मोदी ने जैसे ही भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाया वैसे ही पूरा मीडिया मोदीमय  हो गया ।  उनकी जीत ने कार्यकर्ताओ के जोश को भी दुगना कर दिया । इसके बाद महाराष्ट्र , हरियाणा , झारखंड और जम्मू में कमल खिलाने से भाजपा गदगद थी ।  अमित शाह के कसीदे हर कार्यकर्ता पढ़   रहा था  । भाजपा के   हर दफ्तर में उस समय  दिवाली मनाई जा रही थी । लेकिन परिणाम आने के बाद नजारा  बदला  सा  नजर  आ रहा था ।  दिल्ली चुनावो  के परिणाम आने  के बाद   11 अशोका रोड  से लेकर गोविन्द बल्लभ पंत मार्ग का नजारा झटके में  बदल  गया ।   भाजपा के राष्ट्रीय दफ्तर पर सन्नाटा  पसरा था । पार्टी का कोई आला नेता और प्रवक्ता न्यूज़ चैनल्स को बाईट देने के लिए उपलब्ध नहीं था । शायद इसकी सबसे वजह  दो बरस पहले दिल्ली  सरजमीं  में  खड़ी  ऐसी  पार्टी  थी जिसने केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली में वह सब करके दिखाया जिसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी । कहाँ तो भाजपा और आप  लड़ाई दिल्ली में कांटे की  बताई   जा रही थी और जब चुनाव परिणाम आये तो भाजपा के चुनावी प्रबंधको को सांप सूंघ गया । 

किसी ने ठीक ही कहा है आप पर जितने व्यक्तिगत हमले होते हैं आप उतनी मजबूती के साथ उभरकर सामने आते हैं । दिल्ली के चुनावो के हालिया संकेतों को डिकोड करें तो जेहन  में यही तस्वीर उभरकर सामने आती है । 2007  के गुजरात विधान सभा के चुनावो के दौर को याद करें । तब गुजरात में चुनावों के दौरान कांग्रेस मोदी को गोधरा  पर  घेरा करती थी और उन्हें मौत  का सौदागर बताने मात्र से ही भाजपा की जीत आसान हो गयी थी । इन व्यक्तिगत हमलों से मोदी ना केवल भाजपा शासित राज्यों के कद्दावर  सी एम के रूप में उभरे बल्कि इसी ऐतिहासिक जीत ने उनके कदम  देश के सरदार बनने  की दिशा में मजबूती के  साथ  बढ़ाये । इन बातों का जिक्र  आज इसलिए करना  पड़  रहा है क्युकि  दिल्ली में आप की ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत से जीत ने राष्ट्रीय राजनीती में उस शख्स  का कद बड़ा दिया है जिसे अब तक भगोड़ा  अराजकवादी और नक्सली करार दिया जा रहा था ।  

दिल्ली चुनाव जीतकर केजरीवाल  ने सही मायनों में अपनी अखिल भारतीय छवि हासिल करने के साथ ही खुद को राष्ट्रीय राजनीती में भावी  फ्रंट रनर के तौर पर पेश किया है । लोक सभा  चुनावो  में  जिस तरह आप के प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गयी थी उससे   यह भ्रम बन गया था कि आप  आंतरिक लोकतंत्र नहीं है और यह पार्टी जल्द हुई बिखर जाएगी ।  लेकिन केजरीवाल ने हाल के दिनों में जिस तरीके से दिल्ली की सडकों  पर  कार्यकर्ताओ को साधकर  अपनी बिसात बिछाई   उसने इस भ्रम को तोड़  दिया  । आप पार्टी  के बारे में उनके विरोधी का  एक बड़ा तबका  जीत  को लेकर आशंकित था ।  इस बार   जिस   तरीके से मोदी की टीम   हर राज्य  में  लगी हुई थी उससे दिल्ली की लड़ाई में मोदी के मैजिक चलने के आसार   बताये जा रहे थे । शायद तभी  कहा जाने लगा था दिल्ली का यह चुनाव मोदी सरकार के 8  माह का कार्यकाल एसिड   टेस्ट  से कम नहीं है ।  लेकिन केजरीवाल  ने अपने बूते दिल्ली  फतह  कर यह बता दिया पार्टी में उनको चुनौती देने की कुव्वत किसी में नहीं है । 

दिल्ली चुनाव में एक छोर  पर केजरीवाल थे तो दूसरे छोर  पर 120  सांसदों  से लेकर 24  केंद्रीय मंत्रियो और दूसरे  राज्य से लाये गए भाजपा नेताओ की टोली जो दिल्ली में भाजपा के कार्यकर्ताओ के साथ भाजपा  करने के लिए एड़ी चोटी  का जोर लगा रही थी । इन सभी ने केजरीवाल पर इतने ज्यादा व्यक्तिगत हमले किये जिसके बाद केजरीवाल दिल्ली की मजबूत दीवार बनकर उभरे । भाजपा का यही  नकारात्मक चुनाव प्रचार दिल्ली में पार्टी की लुटिया को डुबो गया । कल तक जो भाजपा प्रवक्ता चुनाव परिणाम  आने से पहले मिठाई बंटवाने की बात कह  थे परिणाम आने  चेहरे पर हताशा साफ़ झलक रही थी ।   कम  से कम ऐसी करारी  हार  की कल्पना तो भाजपा के किसी नेता ने नहीं की होगी । दिल्ली  में झाड़ू ने  भाजपा का सूपड़ा ही साफ़ कर डाला ।  कांग्रेस तो ढल ही  रही  थी भाजपा में मोदी  के अश्वमेध घोड़े की लगाम अब शायद  दिल्ली  थाम दे । इसका  असर आने वाले समय   में बिहार , उत्तर प्रदेश  और बंगाल  जैसे राज्यों पर भी पड़  सकता है । 

इस चुनाव में भाजपा  ने  केजरीवाल पर  जितने  व्यक्तिगत हमले किये शायद ही किसी राज्य के   चुनावो  में इस तरह के हमले किये गए । प्रधानमंत्री मोदी ने जहाँ लोक  सभा चुनावो में  केजरीवाल पर व्यक्तिगत हमले  करने से बचे वहीँ इस बार  रामलीला  मैदान की  पहली रैली से ही उन्होंने केजरीवाल को अपने निशाने पर ले लिया । भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की पूरी टीम ने केजरीवाल को विकास के आईने के बजाए अराजक नेता के तौर पर अपनी सभाओ में पेश किया लेकिन जनता की अदालत में केजरीवाल बरी हो गए  ।   जनता ने दिल  खोलकर जिस तरह झाड़ू को वोट दिए हैं उसने पहली बार साबित किया  है अब जनता बेहतर विकल्प की तलाश में है ।  दिल्ली में   लोगों ने आप को भाजपा और कांग्रेस  के मुकाबले बेहतर विकल्प के रूप में   देखा ।    ईमानदार चेहरों की लड़ाई में इस बार दिल्ली का महासमर घिर गया था  | भाजपा के लिए तो दिल्ली में सरकार बनाना नाको चने चबाने जैसा बन गया था क्युकि प्रधान मंत्री मोदी की प्रतिष्ठा अब सीधे दिल्ली से जुड़ गयी  | 49 दिन की सरकार गिरने और लोक सभा चुनाव  के बाद भले ही केजरीवाल की रफ़्तार थम गयी हो लेकिन दिल्ली में उनका बड़ा जनाधार आज भी है इस बात से अब  इनकार नहीं किया जा सकता | झुग्गी झोपड़ी से लेकर ऑटो चालक और रेहड़ी लगाने वालो से लेकर महिलाओ के एक बड़े तबके को केजरीवाल करिश्माई तुर्क नजर आता है जिससे उन्हें आज भी बड़ी उम्मीद हैं । भाजपा के  आतंरिक सर्वे में भी पार्टी की हालत केजरीवाल नाम के भूत ने खराब की हुई थी शायद इसका बड़ा कारण अरविन्द केजरीवाल के कद का कोई नेता दिल्ली में ना होना था |  वहीँ भाजपा भी चुनाव को लेकर अपने पत्ते फेंटने की स्थिति में नहीं थी  | उसके तुरूप के इक्के हर्षवर्धन केंद्र की नमो सरकार में मंत्री रहे  और जगदीश मुखी से लेकर आरती शर्मा और विजय गोयल से लेकर विजेंदर गुप्ता आउटडेटेड हो चुके थे  और इनको आगे कर भाजपा दिल्ली में कमल खिलाने में नाकाम रह सकती थी  क्योंकि उसे मालूम था  कि दिल्ली की जनता को उसने जो भरोसा दिलाया था वह उसे पूरा नहीं कर पाई ह।  किरण बेदी को भी आखरी समय  में पार्टी   ने आगे किया । बाहरी नेताओ पर ज्यादा भरोसा  और अपने नेताओं की अंदरूनी लड़ाई  ने पार्टी  में गुटबाजी बढ़ाने का काम किया ।  भाजपा ने जिस महंगाई को मुद्दा बनाकर चुनाव लडा उसे वह दूर नहीं कर पाई साथ ही सबसे बड़ा दल होने के बाद भी वह सरकार बनाने से पीछे हट गयी और आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर 49 दिनों की सरकार चलायी  जिसके  चलते  भाजपा की दिल्ली में कई सर्वे में  लोकप्रियता में  भारी गिरावट हाल के दिनों में देखने को मिली   |वहीँ समाज के मजदूर और पिछड़े तबके के साथ ही  मध्यम वर्ग  और युवाओ का एक बड़ा वोट बैंक आप के  साथ आज भी जुड़ा रहा  | दिल्ली के परिणाम इस बात की तस्दीक करते हैं ।          

 वहीँ अब अपने को चाय बेचने वाले का बेटा कह लोगों को कॉर्पोरेट के आसरे चमचमाते कायकल्प होने के सपने दिखाने वाले नरेंद्र मोदी से  लोक सभा चुनाव निपटने के बाद  जनता की अपेक्षाएं इस कदर बड़ी हुई है आने वाले  पांच बरस में उनके पूरे होने पर  अब सभी की नजरें लगी रहेंगी  |  वैसे उनके अब तक के कार्यकाल  में आम आदमी ही सबसे ज्यादा  निराश हुआ ह और महंगाई की सबसे अधिक मार इसी तबके ने झेली  |  जिस नरेंद्र मोदी सरकार ने कांग्रेस मुक्त भारत का सपना लोक सभा चुनावो के चुनाव प्रचार के दौरान दिखाया था  वह  सरकार भी अब  कांग्रेस के पग चिन्हों पर चलती दिखाई दे रही है | बीमा और ऍफ़ डी आई सरीखे मसलो पर कभी कांग्रेस को घेरने वाली भाजपा आज सत्ता में आने के बाद अब इन सबको लागू करने का मन  बना चुकी है तो स्थितियों को बखूबी समझा जा सकता है | महंगाई  लगातार बढ़ रही हैं लेकिन सरकार इस पर चुप्पी नहीं तोड़ रही | उसका ध्यान स्वच्छ भारत से लेकर गंगा की साफ़ सफाई और अंतर्राष्ट्रीय साख बनाने में लगा रहा  |  लव जेहाद , हिन्दू राष्ट्रवाद, घर वापसी जैसे मसले उछालकर उसके नेता खुद मोदी की छवि पर बट्टा  लगाने पर तुले रहे  । कभी विपक्ष में रहने पर  भाजपा ने सत्ता में आने पर 30 फीसदी  की सब्सिडी और बिजली पर  700 करोड़ की सब्सिडी देने का वादा किया था जिससे उन्होंने आज दिल्ली में उन्होेने  दिल्ली  में  ही पल्ला झाड लिया  |   यही नहीं  दिल्ली चुनावों से ठीक पहले अमित शाह  काले धन के मसले को चुनावी जुमला बताने से भाजपा को  बड़ा नुकसान  हुआ । बेशक  अब मोदी को भी इस बात को समझना जरुरी होगा कि लोक सभा चुनाव और राज्यों   के विधान सभा  चुनावों में जनता का मूड अलग अलग होता है जिसके ट्रेंड को हम हाल के कुछ वर्षो से देश में बखूबी देख भी रहे हैं |  देश में केजरीवाल का जादू भले ही ना चला हो लेकिन दिल्ली में आज भी केजरीवाल सब पर भारी पड रहे हैं  और शायद  इसकी  सबसे बड़ी वजह दिल्ली में उनके साथ जुडा मजबूत  जमीनी संगठन है |  दिल्ली की गद्दी छोड़कर  लोक सभा चुनावो में जल्द कूदने को अपनी भारी भूल बता चुके केजरीवाल  शुरुवात से ही  इस  चुनाव में बहुत संयम के साथ  काम  कर  रहे थे  । आम आदमी के वोटर के साथ वह  अपनी इस  भावनात्मक अपील के साथ  जुड़े ।  वहीँ  जनता भी  केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद छोड़ने को  अभी भूली नहीं थी  । महंगाई पर भाजपा की विफलता , बिजली पानी की बड़ी कीमतों से दिल्ली में अगर कोई सबसे ज्यादा लाभ लेने की  स्थिति में था  वह आम आदमी पार्टी ही थी  | 

 अब  दिल्ली फतह  के बाद केजरीवाल इस चुनावो में सही मायनो में  जीत  के नायक बनकर उभरे हैं ।  कार्यकर्ताओ में उनकी दीवानगी है ।   तो क्या माना जाए केजरीवाल  2015  की    कई राज्यों की विधान सभा की बिसात में सबसे बड़ा चेहरा होंगे ?  क्या  कुछ समय बाद  वह अपने कार्यकर्ताओ वाली लीक पर चलने का साहस दिखायेंगे और  सीधे राष्ट्रीय राजनीती के केंद्र में होंगे ? ये ऐसे सवाल हैं  जो इस समय भाजपा के आम कार्यकर्ता से लेकर पार्टी के सहयोगियों और यू पी ए के सहयोगियों से लेकर कांग्रेस को परेशान कर रहे हैं । अस्सी के दशक को याद करें तो उस दौर में एक बार इंदिरा गांधी ने तमाम सर्वेक्षणों की हवा  निकालकर दो तिहाई प्रचंड बहुमत पाकर संसदीय राजनीती को  आईना दिखा दिया था । इस बार केजरीवाल  ने दिल्ली   के  दिल को जीत लिया ।  भाजपा के पास अब विपक्ष के तौर पर दिल्ली विधान सभा में नामलेवा सीटें ही बची हैं ।  सबका साथ सबका विकास के भाजपा के  नारे  फ़ेल  हो गए ।  मोदीनोमिक्स  मॉडल  की हवा  मायनो  में निकल गयी कि  जगदीश मुखी और किरण बेदी सरीखे प्रत्याशी हार गए । जनता ने केजरीवाल   के  49  दिनों  के  माडल पर न केवल अपनी मुहर लगाई बल्कि मुस्लिम बाहुल्य  और झुग्गी झोपड़ी वाले इलाको में आप  का प्रदर्शन काबिले तारीफ रहा । यही नहीं दिल्ली  फतह करने के बाद अब अब केजरीवाल रुपी राजनीति के नए नायक  का परचम एक नई  बुलंदियों में पहुच गया है ।  आम आदमी  का जादू लोगो पर सर चदकर बोल रहा है । उनका जादू किस कदर चला इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हर इलाके में झाड़ू ने भाजपा की सफाई कर दी ।   कम  से  कम  यह केजरीवाल  की लोकप्रियता को असल रूप में  बयाँ करवाने के लिए काफी है ।   हर जगह झाड़ू  की तूती  ही इस चुनाव में बोली है । पूरा दिल्ली  इस कदर केजरीवाल के साथ  था कई  समाज के हर  तबको का समर्थन जुटाने   वह सफल रहे । 

दिल्ली  का युवा वोटर अब मोदी  के अलावे पर केजरीवाल  पर अपनी नजरें गढाये बैठा है । उसकी मानें तो वैकल्पिक नई  राजनीती  का बेडा केजरीवाल  ही पार लगा सकते हैं । दिल्ली के प्रचंड बहुमत के बाद केजरीवाल  अब बड़े नेता के तौर पर उभर कर सामने आ गए हैं ।  दिल्ली  जीत के बाद  केजरीवाल  निश्चित ही अब सबसे मजबूत हो गए हैं। अब केजरीवाल के सामने जनता से  किये  गए वायदों को पूरा करने की कठिन चुनौती है । इस बार उनके साथ प्रचंड बहुमत है इसलिए वह जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते । उम्मीद है वह दिल्ली को मॉडल राज्य बनाने के लिए एक नई  लकीर अपने इस नए कार्यकाल कार्यकाल में खींचने की कोशिश  करेंगे ।

सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

निकाय चुनावो में भी चला 'शिवराज' का मैजिक





 भोपाल, इंदौर, जबलपुर और छिंदवाड़ा की नगर निगमों में भी भारतीय जनता पार्टी की फतह के बाद मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री  शिवराज सिंह चौहान का कद राष्ट्रीय  राजनीती में एक बार फिर बढ़ गया है   ।  मध्य प्रदेश के इन नगर निगमों को जीतने के बाद शिवराज ने अपने को राजनीती के चाणक्य के रूप में  स्थापित किया है बल्कि  कब्जे के बाद शहरों से कांग्रेस का सफाया जिस तरीके से हुआ है उसने पहली बार इस बात को साबितकिया है प्रदेश में  कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए लम्बा इन्तजार करना पड़  सकता है । । विधानसभा और फिर लोकसभा चुनावों  के बाद नगर निगम में  मिली कांग्रेस की  हार में बड़े सबक छिपे हुए हैं । इसने एकबात को साबित किया है अब अगर आपको चुनाव जीतना है तो खूब पसीना बहाना होगा और  जनता की नब्ज को पकड़ना होगा जिसे शिवराज ने मध्य प्रदेश में बखूबी पकड़ा है । वह इन चुनावो में ना केवल जीत के स्टारप्रचारक थे बल्कि भाजपा अध्यक्ष नंद  कुमार चौहान ने जिस तरीके से शिवराज के साथ बिसात बिछाई वह न केवल उनके बेहतर तालमेल की मिसाल थी बल्कि सत्ता और संगठन का बेहतर तालमेल भी नजर आया । 

कांग्रेस ने विधानसभा-लोकसभा चुनावों के बाद नगरीय निकाय चुनावों में अपने लगातार कमजोर प्रदर्शन को दोहराया है। नगर निगम चुनाव नतीजों से साफ हो गया है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं का भरोसा डगमगा गया है।चुनाव में उनके शीर्ष नेताओं के बीच  भारी गुटबाजी देखने को मिली । गुटबाजी की बीमारी सुरेश पचौरी के दौर से ही कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ रही है । अरुण यादव के दौर के आने के बाद भी परिस्थितियां कमोवेश वैसीही हैं जैसी कमोवेश बीते दौर में हुआ करती थी । कांग्रेस के पास मध्य प्रदेश में दिग्गी राजा , ज्योतिरादित्य , अरुण यादव , अजय सिंह, कमलनाथ, सुरेश पचौरी,  कांति  लाल भूरिया  के चेले चपौटों की अभी भी भारी फ़ौजही कागजो   है   ।  उसके इन  दिग्गज नेताओ  के इलाको में ही  कांग्रेस के हाथ सत्ता फिसल गयी।  मिसाल के तौर पर कांग्रेस के कद्दावर नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री  कमलनाथ अपने गृह क्षेत्र की सीट भी नहीं जीता  सके।छिंदवाड़ा नगर निगम में भाजपा ने  30 सीटों पर जीत हासिल की  जबकि छिंदवाड़ा ऐसी जगह है जहाँ कमलनाथ का जबरदस्त प्रभाव न केवल है बल्कि उनके अलावे वहां पर किसी का पत्ता तक नहीं खड़कता लेकिन इननिकाय चुनावो का सन्देश साफ़ है कमलनाथ को अपना गढ  अगर आने वाले वर्षो में मजबूत रखना है तो अभी से उन्हें खासी मेहनत  की जरुरत पड़ेगी नहीं तो शिवराज की आंधी में पूरी कांग्रेस ढह जायेगी । कांग्रेसअध्यक्ष अरुण यादव   के लिए निकाय चुनावो की हार निश्चित ही  खतरे की घंटी  है ।  इन चुनावो के बाद उनका सिंहासन खतरे में पड़ता नजर आ रहा है ।  कांग्रेस के साथ एक बड़ी बीमारी गुटबाजी की लग गयी है जो हरचुनाव में उसका खेल ख़राब कर देती है  ।  इस बार भी ऐसा ही हुआ है । वहीं भाजपा की जीत में  बूथ मैनेजमेंट  और कार्यकर्ताओ  के समर्पण और शिवराज सिंह चौहान से लेकर संगठन की मजबूत बिसात को हर छोटे बड़ेचुनाव  नजरअंदाज नहीं किया  सकता । भाजपा की जीत  के असल  नायक शिवराज ही रहे ।  मुख्यमंत्री ने ना केवल  कई किलोमीटर के रोड शो किए बल्कि भोपाल  में आलोक शर्मा के लिए अपना तन मन समर्पित किया। कांग्रेस टिकटों के चयन में ही नहीं पिछड़ी बल्कि कई बागी खिलाड़ियों ने चुनाव में उसका खेल  ही ख़राब कर दिया ।

नमो के कांग्रेस मुक्त भारत की परिकल्पना अब मध्य प्रदेश  होती दिख रही है । शिवराज ने मध्य प्रदेश में जिस तरीके से सबको साथ लेकर अपना मध्य प्रदेश बनाने की ठानी है वह उनकी दूरगामी सोच का परिचायक है । मुख्यमंत्री के रूप में जिस तरीके से शिवराज ने मध्य प्रदेश में काम किया है और उसे बीमारू राज्य से बाहर निकाला है उससे अब भाजपा का शिवराज मॉडल आने वाले दिनों में भाजपा शासित  राज्यों के लिए रोल मॉडलबन सकता है ।  निकाय चुनाव के  हालिया परिणाम भाजपा के पक्ष में आने से निश्चित ही शिवराज मजबूत होंगे । हाल के दिनों में कैलाश विजयवर्गीय के राष्ट्रीय राजनीती में  चुनावी प्रबंधक के रूप में उभरने से कुछ लोगयह मान रहे थे हरियाणा में भाजपा की सरकार बनने के बाद अब राज्य में कैलाश विजयवर्गीय  को शिवराज का उत्तराधिकारी माना जा रहा था  लेकिन इस जीत के बाद शिवराज जिस तरीके से मजबूत हुए हैं उसने यहसाबित किया है फिलहाल जिस अंदाज में वह  मजबूती  कदम बडा  रहे हैं उससे लगता तो यही है उनके कद को चुनौती  दे पाने की स्थिति में फिलहाल कोई नेता दूर दूर तक उनके आस पास भी नहीं फटकता । 

  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रोड शो  में विकास का तड़का लगाया और अपनी उपलब्धियों के आसरे मतदाताओ का दिल जीत लिया । भोपाल में पिछली बार बाबूलाल गौर की बहु कृष्णा गौर महापौर बनी थी । उससेपहले के दौर को याद करें तो यहाँ पर दस बरस से भी ज्यादा समय से कांग्रेस का एकछत्र राज था । इस बार भी यहाँ पर भाजपा के  आलोक शर्मा  ने कमल खिलाया है । जबलपुर में भी भाजपा ने जीत का सिलसिला जारीरखा है । यहां से भाजपा की स्वाती गोड़बोले ने शरत तिवरी को हराया  पिछली बार  जबलपुर में भी भाजपा के प्रभात साहू ने ही भाजपा का झंडा फहराया था । वहीं इंदौर में लंबे समय तक महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहीअर्चना जायसवाल को भी महापौर सीट के लिए शिकस्त का सामना करना पड़ा । "मिनी मुंबई" के नाम से जाने जाने वाले इंदौर में भाजपा  विधायक मालनी गौड़ ने भी भाजपा  की सरकार बनाने में सफलता हासिल की ।पिछली बार भाजपा के कृष्ण मुरारी मोघे ने यहाँ सफलता कायम की थी । तब उन्होंने यहाँ पर कांग्रेस के पंकज संघवी को  हराया था । संघवी ने  उस दौर  में पैसा पानी की तरह बहा दिया था पर इसके बाद भी वह नही जीतसके थे। संगठन और सरकार के जबरदस्त तालमेल से भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार होता जा रहा है। आने वाले 4 वर्षों में अब कोई चुनाव नहीं है, लेकिन हाल ही में हुए चुनावों से कांग्रेस को सबक लेनेकी आवश्कता है ताकि वह अपनी खोई प्रतिष्ठा पुन: प्राप्त कर सकें।

निकाय चुनावो में कमल के खिलाने के बाद शिवराज ने साबित कर दिया है मध्य प्रदेश में उनका राज किसलिए चलता है । इस जीत के बाद केन्द्रीय स्तर पर उनका कद एक बार फिर बढ़  गया है  ।  संभवतया केन्द्रीयनेतृत्व अब  मध्य प्रदेश को लेकर लिए जाने वाले हर निर्णय में उनको फ्री हैण्ड दे । वहीँ  कांग्रेस को चाहिए वह बचे  वर्षो में  मजबूती से विपक्ष की भूमिका निभाए अन्यथा शिवराज अकेले ही सभी पर भारी पड़ जायेंगे ,इससे अब शायद ही कोई इंकार करे ।  कांग्रेस को  चुनावो के बाद अब  इन बातो की दिशा में गंभीरता से विचार करने की जरुरत है ।

बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

सारदा की आंच से सहमी ममता की सियासत






माँ ,माटी और मानुष  के जिस मुद्दे के आसरे कुछ बरस पहले ममता ने 'पोरिबर्तन ' की जो लकीर खींचने की कोशिश की थी वह अब मिटती  दिखाई दे रही है । राज्य में औद्योगिक  विकास की तमाम कोशिशो पर जहाँ ग्रहण लगा हुआ है वहीँ बंगाल की बड़ी आबादी के सामने न्यूनतम जरुरतो की चीजो को लेकर जैसा संकट गहरा रहा है उसने राज्य को वामपंथी शासन  के दौर की याद दिला  दी है जहाँ परिस्थितियां इतनी जटिल नहीं थी जितनी अभी हैं । मौजूदा दौर में किसानो की माली हालत बंगाल में सबसे खराब  हो चली है वहीँ क़ानून व्यवस्था की लचर स्थिति  ने इस दौर में सीधे ममता को कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की है । रही सही कसर सारदा को लेकर हुए अरबों के वारे न्यारे ने पूरी कर दी है । हर दिन इस मामले  में जिस तरीके से नए खुलासे हो रहे हैं उससे पश्चिम बंगाल की राजनीती भी नई  करवट बदलने की दिशा में तेजी के साथ बढ़ रही है  और अगर यही सब रहा तो आने वाले पंचायत और निकाय चुनावो के बाद होने वाले विधान सभा चुनाव में ममता की मुश्किलें बढ़ सकती हैं ।  

सारदा  घोटाले में गिरफ्तार किए गए तृणमूल कांग्रेस सांसद सृंजय बोस इस मामले में जमानत पर रिहा होने वाले तृणमूल के पहले वरिष्ठ नेता थे । सीबीआई ने सारदा घोटाले में शामिल होने के आरोप में बीते बरस  बोस को गिरफ्तार किया था। कार्गो के कारोबार के अलावा   बोस बांग्ला दैनिक संवाद प्रतिदिन के मालिक व संपादक भी हैं।  सारदा  घोटाले की चपेट में ममता सरकार के एक के बाद एक कई वरिष्ठ नेता सीबीआई की चंगुल में फंसते जा रहे हैंजिससे ममता की साख संकट में है और जिस तरह के प्रदर्शन आये दिन  ममता के खिलाफ हो रहे हैं उससे  तृणमूल  के समर्थको में निराशा का माहौल है ।  ममता सरकार में नंबर -2 की हैसियत रखने वाले मुकुल रॉय से  सीबीआई ने जिस अंदाज में सारदा पर  पूछ ताछ की है उससे  अब जांच का दायरा ममता तक बढ़ने की सम्भावनाओ से इंकार नहीं किया जा सकता ।   तृणमूल कांग्रेस में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद दूसरे नंबर की हैसियत मुकुल राय की ही है  ।  सारदा  चिट फंड घोटाले में तृणमूल कांग्रेस के दो सांसद और पश्चिम बंगाल सरकार के एक कैबिनेट मंत्री पहले से ही हिरासत में हैं। 

इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा पशोपेश की स्थिति खुद तृणमूल के सामने खड़ी  हो गयी है ।  जो सबूत सीबीआई के पास हैं उसका तर्कसंगत जवाब पार्टी न तो जांच एजेंसियों को दे रही है और न ही अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को।  मुकुल रॉय ने  सी बी आई के सामने पूछताछ में खुद स्वीकार किया था कि वह सारदा  के कर्ता-धर्ता सुदीप्तो सेन से मिलते रहे हैं  जिससे  पार्टी  को भारी  नुकसान के अनुमान लगाये जा रहे हैं । सीबीआई के सूत्रों की मानें तो बिहार के चारा घोटाले की तरह  सारदा  घोटाले में भी साक्ष्य डॉक्यूमेंट्स के ऊपर आधारित हैं  जिसमें आरोपियों के लिए बचना मुश्किल होता  जा रहा है । पार्टी के एक अन्य राज्यसभा सदस्य कुणाल घोष के अलावा मंत्री मदन मित्रा और तृणमूल नेता व पूर्व पुलिस महानिदेशक रजत मजूमदार अभी भी जेल में हैं। सारदा  घोटाले के कथित मास्टरमाइंड सुदीप्त सेन और उनका एक  सलाहकार बताये जाने से यह मसला अब काफी जटिल बन गया है ।  सूत्रों का कहना है कि दास ने कथित तौर पर सेन को एक पोंजी योजना की शुरूआत करने तथा भारी मुनाफे का वादा कर जमाकर्ताओं को आकर्षित करने के लिए कहा। इसके बदले में  व्यापार शुरू करने के बाद सेन ने दास को शारदा रियल्टी में एक निदेशक तथा शेयरधारक बनाया। जांच के दायरे के आगे बढ़ने से अब खुद ममता की साख प्रभावित हो रही है । देर सबेर  सी बी आई उनके घर भी दस्तक दे सकती है । उधर गृह सचिव अनिल गोस्वामी को बीते दिनों सरकार ने बर्खास्त कर दिया । केंद्र सरकार ने यह फैसला गृह मंत्रालय के कहने पर लिया। माना जा रहा है की सीबीआई निदेशक ने कहा कि गृह सचिव ने सीबीआई की उस टीम को फ़ोन किया था जो सारदा  मामले की जांच कर रही थी और उस टीम से आरोपी मतंग सिंह को किन सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किया जा रहा है यह  जानना चाहा। साथ ही कहा कि सीबीआई के पास पर्याप्त सबूत नहीं है इसलिए गिरफ़्तारी नहीं बनती। सीबीआई ने यह सब बातें फाइल में पी एम ओ  को भेज दी जिसकी  जानकारी भी सीबीआई निदेशक ने गृहमंत्री को दी।  पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री मतंग सिंह को कथित रूप से आपराधिक षड्यंत्र रचने, धोखाधड़ी और रकम की गड़बड़ी करने के आरोपों में पिछले सप्ताह गिरफ्तार किया गया था। ये आरोप सारदा  चिटफंड घोटाले से जुड़े हैं जिसके तहत हज़ारों छोटे निवेशकों को उनकी बचत से हाथ धोना पड़ा था। मतंग सिंह का नाम शारदा के चेयरमैन सुदीप्ता सेन ने सीबीआई को लिखे एक खत में उजागर किया था। 

ममता की पार्टी के नेताओ की आये दिन हो रही पूछताछ और गिरफ्तारी ने जहाँ केंद्र के साथ ममता की तल्खी को बढ़ाने का काम किया है वहीँ खुद ममता की सियासत पर भाजपा राज्य में ग्रहण लगा रही है  लेकिन ममता इन सारे आरोपों को बेबुनियाद बताकर अपने को  पाक साफ़ बताने पर तुली हुई है । ममता जिस तरह आक्रामक होकर इस मामले पर बयान बाजी कर रही है उससे उनकी परेशानी और अड़ियल रवैये को देखा जा सकता है । वह इस मसले पर केंद्र की मोदी सरकार क निशाना बनाने से नहीं चूक रही जबकि असलियत यह है सारदा की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही है । दरअसल  इस पूरे मामले पर ममता को ना उगलते बन रहा है ना निगलते ।  कुणाल घोष  से  परिवहन मंत्री मदन मिंत्रा तक  होता हुआ सफर अब जिस तरहब मुकुल राय और मतंग सिंह तक जाता दिख रहा है उससे ममता की मुश्किलें कम नहीं हो रही है । हर दिन कोई नया नाम इस मेल में जुड़ रह है और जिस तरह की खबरें बंगाल को लेकर इस दौर में आ रही हैं उससे ममता के वोट बैंक में गिरावट के आसार दिखाई दे रहे हैं । यानी जनाधार के सिकुड़ने का साया अब ममता की सियासत में मंडरा  रहा है । 

बंगाल में चिटफंड के कारोबार में जिस तरीके से अरबों के वारे न्यारे किये गए हैं और  चिटफंड ने जिस तरह कुलांचे मारे हैं उससे एक बात  तो साफ है कम समय में मालामाल होने का यह धंधा बंगाल में जोर शोर के साथ कई दशको से चल रहा था जिसमे कारोबारियों ने राजनेताओ के साथ मिलकर काली कमाई के कुबेर बनने का कोई भी मौका हाथ से नहीं जाने दिया । चिटफंड के कारोबार में तृणमूल  के कई नेता और कार्यकर्ताओ की मिलीभगत से इंकार नहीं किया जा सकता  शायद यही वजह है इस सारदा मामले में नेटवर्क काफी मजबूत नजर आ रहा है । वामपंथियो के 34  वर्षो के शासन का सफाया ममता ने जिस तरीके 2011  के विधान सभा चुनावो के दौरान किया था उससे उनसे लोगों को काफी  उम्मीदें बंधी  थी  लेकिन आज आलम यह है बंगाल के तमाम बुद्धिजीवी जो कभी वामपंथियो  के साथ थे  वह अब भाजपा में अपना विकल्प खोजने में लगे हुए हैं । हाल के लोक सभा चुनावो में भाजपा का वोट प्रतिशत जिस तरीके से बढ़ा है और जिस तरीके से केशव कुञ्ज नागपुर संघ की शाखाओ में अपना डमरू बंगाल में बजा रहा है उससे ममता की सियासी रफ़्तार थमने के आसार दिखाई देने लगे हैं । आज हालत कितनी ख़राब है इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं वामपंथियो के दौर में जो तृणमूल कांग्रेस में शामिल हुए वह अब भाजपा में जाने की तिकड़म भिड़ाने में लगे हुए हैं । भाजपा जिस तरीके से बंगाल में अमित शाह की अगुवाई में मास्टर स्ट्रोक ममता को घेरने के लिए खेल रही है उससे लगता तो यही है भाजपा समाज के हर तबके में अपना जनाधार मजबूत करने में लगी हुई है । अगर भाजपा का ग्राफ इसी तरह से बढ़ता रहा तो ममता की मुश्किल सबसे ज्यादा बढ़ने के आसार हैं ।  बंगाल में ममता की रफ़्तार अगर थमी तो इसका असर पूर्वोत्तर के तमाम राज्यों में भी पड़ेगा जहाँ विधान सभा चुनावो की डुगडुगी आने वाले वर्षो में बजनी है ।  वैसे भी ममता की सरकार के कई कैबिनेट  मंत्री इस दौर में अमित शाह के सीधे संपर्क में हैं ।  पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री  दिनेश त्रिवेदी  तो भाजपा में शामिल होने के लिए बावले हो चले हैं । ऐसे में ममता की राजनीती पर ग्रहण लगने की प्रबल संभावनाएं दिख  रही  हैं । बंगाल में  वामपंथी वेंटिलेटर  में हैं । कांग्रेस सिकुड़ चुकी है । उसका कोई नामलेवा संगठन नहीं बचा है । वहीँ  तृणमूल सारदा की आंच में  ढलान पर है । ऐसे में भाजपा बंगाल में मजबूत विकल्प बने इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता । बहरहाल  जो भी हो यह तय है सारदा की आंच से ममता बनर्जी पूरी तरह  सहमी हुई है और जिस तरीके से जांच में तृणमूल के नेताओ की संलिप्तता  सबके सामने आ रही है उससे आने वाले दिनों में ममता के सामने ही पार्टी की सियासत साधने की विकराल चुनौती खड़ी  हो गयी है इस संम्भावना से कम  से कम अब  तो इंकार नहीं किया जा सकता  ।