Friday, 7 May 2021

सल्ट विधानसभा उपचुनाव से निकले संदेश

 





 95 हजार मतदाताओं वाली अल्मोडा जिले की सल्ट विधानसभा सीट से 2002 में राज्य के पहले विधानसभा चुनाव  कांग्रेस के रणजीत रावत  विधायक बने । 2007 के परिसीमन में भिकियासैंण सीट समाप्त हो गई और इस विधानससभा का बड़ा इलाका सल्ट में शामिल कर दिया गया । परिसीमन के बाद से इस सीट पर  2007 से 2017 तक भाजपा का एकछत्र राज रहा ।  2007 में पहली बार दिवंगत सुरेन्द्र जीना  भिकियासैंण सीट से जहां विधानसभा पहुंचे थे वहीं 2012 के चुनाव में दूसरी बार सल्ट विधानसभा से जीते और 2017 में वह तीसरी बार फिर सल्ट विधानसभा से चुनाव जीत कर विधायक बने । सल्ट के दिवंगत विधायक सुरेंद्र सिंह जीना लोकप्रिय  विधायकों में गिने जाते थे। अब एक बार फिर सल्ट की उनकी विरासत उनके भाई महेश जीना संभालने जा रहे हैं।

सल्ट विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव ने एक साथ कई संदेश दिए हैं। सबसे बड़ा संदेश तो अंतर्कलह से जूझती  कांग्रेस के लिए है, जो तमाम कोशिशों के बावजूद  फिर एक बार एकजुट नहीं हो पाई और उत्तराखंड में एक के बाद एक उपचुनाव हारती ही जा रही है । मिशन 2022 से ठीक पहले आए सल्ट के इस नतीजे ने एक बार फिर से काँग्रेस पार्टी के भविष्य में मजबूत होने के सपने को जहां  तोड़ने का काम किया है साथ ही उसके संगठन पर एक बार  फिर से कई  सवाल खड़े कर दिये हैं। खास बात इन परिणामों की ये है काँग्रेस को आज अपने गिरेबान में झाँकने और आत्ममंथन करने की बड़ी जरूरत है आखिर उससे चूक कहाँ हुई क्युकि 2017 के विधान सभा चुनाव में जहां बीजेपी प्रत्याशी सुरेंद्र सिंह जीना मोदी की प्रचंड लहर के बीच महज 3000 मतों के अंतर से जीते थे, इस बार यह अंतर 4000 पार कर गया है और इस तरह एक बार फिर भाजपा सल्ट में मजबूत ताकत बनकर  उभरी है जिसकी तस्दीक  सल्ट विधान सभा उपचुनाव के हलिया परिणाम कर रहे हैं ।

इस उपचुनाव में भाजपा ने सुरेन्द्र जीना के भाई महेश जीना पर सहानुभूति का दांव  जहां लगाया वहीं कांग्रेस महासचिव  हरीश रावत ने अपनी करीबी  गंगा पंचोली को यहाँ से अपना प्रत्याशी बनाया जो एक दौर में ब्लॉक प्रमुख की कुर्सी संभाल चुकी थी ।  सल्ट में पूर्व विधायक  रणजीत रावत का सिक्का मजबूती के साथ चलता है  यह जानते हुए भी  काँग्रेस महासचिव  हरीश रावत की पसंद गंगा ही थी और उन पर ही पार्टी ने दांव खेला लिहाजा हरदा की प्रतिष्ठा को इस उपचुनाव से सीधे जोड़ा गया । गंगा तो महज प्रतीक भर थी काँग्रेस की राजनीति का , लेकिन सल्ट की जनता ने कमल खिलाते हुए महेश की झोली वोटों से भर दी । सल्ट में एक तरफ  भाजपा  एकजुट होकर चुनाव लड़ रही थी वहीं गुटों में बंटी काँग्रेस एकजुट होने का भ्रम पाले बैठी हुई थी । भाजपा के दर्जनों विधायक और कैबिनेट मंत्री यहां पार्टी प्रत्याशी के चुनाव प्रचार की कमान  टिकट  देने के बाद से संभाले हुए थे और छोटी छोटी सभाएं कर रहे थे । दूसरी तरफ कांग्रेस प्रत्याशी गंगा पंचोली के साथ राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एवं विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल और रानीखेत के विधायक करण माहरा , हरीश रावत के बेटे आनंद रावत  ही चुनावी प्रचार की कमान थामे हुए नजर आए । काँग्रेस महासचिव हरीश रावत आखिरी ओवर में बैटिंग करने आए और हिट विकेट हो गए । 

असल में पूर्व विधायक रणजीत रावत इस सीट पर अपने पुत्र विक्रम रावत को उपचुनाव लड़ाना चाहते थे। नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और  केंद्रीय प्रभारी देवेंद्र यादव  तक सीधे विक्रम  रावत को चुनाव लड़ाना चाहते थे लेकिन हरीश रावत ने यहाँ रणजीत रावत के बेटे का खेल खराब कर दिया और दस जनपथ में गंगा के लिए जबरदस्त पैरवी की जिसके चलते रणजीत रावत को मायूसी हाथ लगी और गंगा को टिकट मिलने के बाद से ही खुद को सल्ट से दूर कर लिया । इसे जानते हुए प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और  केंद्रीय प्रभारी देवेंद्र यादव ने रणजीत रावत के साथ रामनगर में उनके आलीशान होटल में छ्ह से सात दौर की मीटिंग भी की लेकिन रणजीत रावत टस से मस नहीं हुए । बेशक हरदा की बिछाई दस जनपथ की बिसात ने उन्हें  टिकट की दौड़ से बाहर कर दिया लेकिन रणजीत सिंह रावत  भी पूरे चुनाव प्रचार में कहीं नजर नहीं आए । उन्होंने चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में हरदा को तंत्र मंत्र करने वाला नेता बता कर पार्टी की संभावनाओं को  सल्ट में कमजोर करने का काम किया। 

कांग्रेस ने इस चुनाव में बहुत कुछ खोया है। उसने केवल जनता का भरोसा खोया, बल्कि अपने लोगों को भी खो दिया और हरीश रावत के 2022 में खुद के बतौर सी एम प्रोजेक्ट करने की संभावनाओं को भी पूरी तरह समाप्त करने का काम किया है । रणजीत  रावत खुलकर इस उपचुनाव में अपने बेटे के लिए टिकट मांग रहे थे, लेकिन हरदा इसके लिए तैयार नहीं थे । एक दौर में उत्तराखंड की राजनीति में हरदा और रणजीत की जोड़ी को जय और वीरू की जोड़ी कहा जाता था । याद कीजिये वह दौर जब हरदा राज्य  के सी एम बनाए गए थे तब हरदा की सरकार में नौकरशाह  राकेश शर्मा के साथ सबसे अधिक ताकतवर शैडो सी एम कोई था तो वह रणजीत रावत ही थे । रणजीत की ठसक को आप इस बात से समझ सकते हैं हरीश रावत के शपथ ग्रहण के दिन  ही रणजीत ने एक चर्चित आई पी एस अफसर को हटाने भर की बात क्या कही वो साहब उसी समय  पैदल कर दिये गए । यही नहीं तब हरदा की सरकार में रणजीत की परिक्रमा किए  बिना कोई काम नहीं हो पाते थे ।  2017 में विधान सभा चुनाव हारने के बाद से रावत बंधुओं के रिश्तों में तल्खी आ गई और उत्तराखंड काँग्रेस के विपक्ष में जाने और हरदा के दोनों सीटों से चुनाव हारने के बाद से दोनों नेताओं की दरार खाई में तब्दील हो गई । आज हालत यह है कि रणजीत हरीश रावत के खिलाफ आए दिन कोई न कोई बयानों के तीर छोड़ दिया करते हैं जिससे काँग्रेस महासचिव हरीश रावत की छवि पर सीधा ग्रहण लग जाया करता है । आज हरदा और रणजीत दोनों एक दूसरे के खिलाफ खूब आग उगलते हैं और रिश्तों में बहुत दरारें पड़ चुकी है । रणजीत तो आए दिन हरदा को राजनीति से सन्यास लेने तक की  सलाह  सार्वजनिक तौर पर कहने से भी नहीं चूकते । रामनगर से विधानसभा चुनाव हारने के बाद से  रणजीत रावत नेता प्रतिपक्ष इन्दिरा और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह के अधिक करीब नजर आने लगे हैं और भविष्य में इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता रणजीत सिंह रावत और  हरीश रावत के बीच शह मात का खेल इसी तर्ज पर चलता रहेगा जैसा अभी सल्ट में हुआ । रणजीत रावत पार्टी की दर्जन भर से अधिक चुनावी  सीटों के गणित को  प्रभावित कर सकते हैं । ऐसे में पार्टी को  रणजीत रावत की उपेक्षा भारी पड़ सकती है ।

उत्तराखण्ड की सल्ट विधानसभा सीट के उपचुनाव के परिणामों  ने प्रदेश में कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति में अब नया भूचाल ला दिया है। यह उपचुनाव 2022 के विधानसभा चुनाव से पूर्व कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी के बीच न सिर्फ राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का अखाड़ा बना, बल्कि इसने कांग्रेस की अंदरूनी गुटबाजी को सतह पर ला दिया । कांग्रेसी नेता क्या कार्यकर्ता भी इस उपचुनाव में आपस में भी भिड़ते नजर आए। सल्ट में पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव हरीश रावत की चुनावी जनसभाओं से चंद घंटे पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष और पूर्व विधायक रणजीत रावत ने जिस प्रकार हरीश रावत पर व्यक्तिगत हमला बोला उसने कांग्रेस की राजनीति के अंतर्विरोधों को खुलकर सामने ला दिया। चुनावी सभा के बीच  यह हमला  इस उपचुनाव का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ इसमें कोई दो राय नहीं । इससे भी बड़ी बात तो ये है इस पूरे प्रकरण पर काँग्रेस प्रभारी देवेंद्र यादव, प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह और नेता प्रतिपक्ष डा इंदिरा हृदयेश की चुप्पी तीनों के बीच बेहतरीन ट्रीटी की तरफ इशारा करती है जो काँग्रेस महासचिव हरदा की बिसात को डैमेज़ करने के लिए बनाई  गई । शायद तीनों के निशाने पर कांग्रेस महासचिव हरीश रावत उस समय से थे जब फेसबुक पर एक बार उन्होनें खुद को 2022 में काँग्रेस का चेहरा बनाने की  वकालत की थी । सल्ट विधानसभा का उपचुनाव निश्चित तौर पर नए प्रभारी देवेंद्र  यादव ने एक रणनीति के तहत लड़वाया जिसमें बड़े नेताओं से लेकर छोटे कार्यकर्ताओं की भी जवाबदेही तय की गई थी। ऊपर से कांग्रेस एक कागज पर एकजुट  नजर आई लेकिन मैदान में बंटी हुई दिखाई दी। जैसा कि प्रदेश कांग्रेस का चरित्र है, वही पुरानी कहानी नजर आई जहां कार्यकर्ता और नेता सब  अपनी गुटबाजी की भूमिका निभाते नजर आए । सल्ट विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के अंदर टिकट की मारामारी के चलते ये अंदाज पहले से था कि जिसे टिकट नहीं मिलेगा वो आक्रामक रहेगा, लेकिन ये अंदेशा किसी को नहीं था कि ये आक्रमण व्यक्तिगत स्तर तक पहुंच जाएगा।

हरीश रावत के प्रति रणजीत रावत की तल्खी पिछले कुछ समय से बहुत ज्यादा बढ़ गई थी। एक बार उन्होंने हरीश रावत का मानसिक संतुलन खोने और उन्हें आराम करने की सलाह दी थी फिर हरीश रावत के कोरोना से संक्रमित होने पर उनके अस्पताल में भर्ती होने पर सवाल उठाए थे। लेकिन 15 अप्रैल को हरीश रावत की सल्ट उपचुनाव में जनसभाओं से एक घंटा पूर्व हरीश रावत को डरा हुआ हरीश रावत बता कई प्रकार के व्यक्तिगत हमले किए जिसने एक झटके में सल्ट का मैच पलट दिया । रणजीत सिंह रावत ने सल्ट उपचुनाव के बीच  जिस तरह का खुलासा हरदा के बारे में किया, वह चौंकाने वाला था । रणजीत रावत ने अपने बयानों में यहाँ तक कहा कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के दौरान  टोने-टोटके के चलते हरदा अपने गले में तेरह मालाएं और हर जेब में अलग-अलग रंग के कपड़े रखते थे। यही नहीं तांत्रिकों के चक्कर मे पड़कर बंदर और सुअर कटवाते थे और श्मशान घाट में जाकर शराब से नहाते थे।  रणजीत रावत के पूर्व में हरीश रावत के मानसिक संतुलन वाले बयान के बाद से अब भविष्य में काँग्रेस को गंभीर नुकसान होना तय है । सल्ट उपचुनाव चुनाव से पहले उनका हरीश रावत पर प्रहार किसके राजनीतिक नफे-नुकसान के लिए था इसका उत्तर वो ही दे सकते हैं, लेकिन ये उस कांग्रेस के फायदे के लिए तो कतई नहीं था जिस कांग्रेस की मजबूती का वो दावा करते हैं।  गाहे-बगाहे सल्ट के बहाने  कांग्रेस प्रत्याशी गंगा पंचोली के लिए रणजीत रावत एवं उनके समर्थकों के बयान कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने वाले ही थे। 

राजनीति जहां संभावनाओं का खेल है, वहीं जहां कुछ भी स्थाई नहीं है। 2017 से पहले के  दौर को देखें और उसमें आज की परिस्थिति को मिलाकर देखें तो कांग्रेस की आंतरिक राजनीति 2017 के मुकाबले आज डांवाडोल है । हरीश रावत के खास रहते 2017 तक रणजीत रावत के निशाने पर जो लोग थे, आज उन्हीं लोगों के साथ रहकर रणजीत के निशाने पर हरीश रावत हैं। राजनीति में निष्ठाओं के बदलने का ये नायाब  उदाहरण है। नई राजनीति का दिलचस्प पहलू कि न यहां दोस्त स्थाई है न दुश्मन, क्योंकि विचारधाराएं अब कोई मायने नहीं रखती। दुश्मन का दुश्मन आपका दोस्त। भले ही उसने आपको कितना ही अपमानित किया हो, लेकिन उसके द्वारा आपके दुश्मन का अपमान आपके अपमान को भुला देता है। 2017 की पराजय के लिए जिस बदनामी को जिम्मेदार ठहराते थे आज उसी बदनामी को ओढ़कर कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व मिशन 2022 को फतह करने की मंशा रखता है। जाहिर है यह महज शुरुआत है। इस मामले के अगले कुछ दिनों में लंबा खिंचने की आशंका लग रही है।

नए मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत और प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक के लिए सल्ट उपचुनाव जीतना बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी के प्रत्याशी महेश जीना  के जीतने के बाद अपनी पहली परीक्षा में ये दोनों पास हुए हैं । अगर भाजपा यह सीट गंवाती , तो यह  तीरथ  सरकार के लिए बड़ा झटका साबित होता और आने वाले 7 – 8 महीने उनके लिए चुनौती भरे रहते । इस टेस्ट में पास होने के लिए भाजपा जहां सहानुभूति को भुनाने की पूरी कोशिश की , वहीं उसने अपनी पूरी ताकत चुनाव प्रचार में लगा दी । दिवंगत विधायक सुरेन्द्र  जीना की मौत की सहानुभूति लेने के लिए भाजपा ने उनके भाई को चुनाव में उतारा जहां पार्टी के कई दिग्गजों जहां पार्टी के कई दिग्गजों यशपाल आर्य , बिशन सिंह चुफाल , धन सिंह रावत , सुरेश भट्ट , अजय टम्टा ने मोर्चा संभाला । सहानुभूति की इस लहर पर पहले भी भाजपा सवार हो चुकी है । वर्ष 2018 में गढ़वाल की थराली सीट से तत्कालीन भाजपा विधायक मगनलाल शाह की मौत के बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी मुन्नी देवी को टिकट दिया गया था। भाजपा ने यह सीट 1981 वोटों से  जीती वहीं  पिथौरागढ़ उपचुनाव  में भाजपा ने  दिवंगत प्रकाश पंत की पत्नी चंद्रा पंत को टिकट दिया था जो 3267  वोटों से जीती । इन सबसे इतर सल्ट को देखें तो सुरेंद्र सिंह जीना के निधन के बाद भाजपा के महेश  जीना ने कांग्रेस की गंगा पंचोली को 4697 वोट से हराया है जो अंतर बहुत अधिक है । 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में  भी कांग्रेस की गंगा पंचोली इस सीट से चुनाव हार गई थी।  इस बार उपचुनाव की खास बात यह रही चुनाव मैदान में खड़े अन्य लोगों को इतने वोट नहीं मिल पाए जितने कि नोटा को। भाजपा के महेश जीना को 21,874 मत मिले, जबकि कांग्रेस की गंगा पंचोली को 17,177 वोट मिले। इस तरह बीजेपी ने यह सीट 4697 वोटों के अंतर से जीत ली, जो पिछली जीत से भी बड़ी है। जाहिर है भाजपा व कांग्रेस प्रत्याशियों के बाद तीसरे नंबर पर नोटा ही रहा।
निसंदेह सल्ट उपचुनाव में भाजपा का चुनाव प्रबंधन बेहतरीन  था। पार्टी ने संगठन की एकजुटता का प्रदर्शन यहाँ बेहतरीन तरीके से किया।  उत्तराखंड कांग्रेस अगर भाजपा से इतना ही सीख ले तो उसकी ताकत लौट सकती है किंतु आदत से मजबूर कांग्रेसी शायद ही कभी इस दिशा में कभी  गंभीर हों। अब तो कहावत सी हो गई है कि कांग्रेस को जनता नहीं हराती, बल्कि कांग्रेसी खुद हार का कारण बनते हैं। अगर यह सच न होता तो 2017 में हरदा सीएम रहते हुए दो सीटों से नहीं हारते। यह भी सल्ट के इस उपचुनाव का बड़ा संदेश है। कांग्रेसी न समझें तो यह उनकी समस्या है। गुटबाजी को दूर किए बिना काँग्रेस के अच्छे दिन आने की उम्मीद अब कम ही दिख रही है । सल्ट से पहले हुए अन्य उपचुनावों में भी काँग्रेस ने यही गलती की थी जिसके चलते वह भाजपा के सामने असहाय हो गई थी और काँग्रेस की इसी अंतर्कलह का लाभ भाजपा को हुआ। अब 6 से 8 महीने में भाजपा से पार पाना काँग्रेस के लिए इतना आसान नहीं है ।  
इधर सल्ट विधान सभा से नवनिर्वाचित भाजपा विधायक महेश जीना को भी जनता के बीच काम करने के लिए बहुत कम वक्त मिलेगा।  मार्च 2022 तक नयी सरकार का गठन हो जाएगा ।  मौजूदा दौर में कोरोना की मार चल रही है और ऐसी त्रासदी के बीच जनप्रतिनिधियों के जनता से दूर जाने के समाचार हर जगह से सुनने को मिल रहे हैं । इस स्थिति में भाजपा के नवनिर्वाचित विधायक महेश जीना सल्ट की जनता के लिए उपयोगी कितना सिद्ध होंगे, देखना होगा । लेकिन जो भी हो  हरदा जैसे महारथी की बिछाई बिसात में सहानुभूति के कार्ड के बूते 4000 से अधिक वोट अपने नाम कर महेश जीना सल्ट की राजनीति में स्थापित जरूर हो गए हैं इससे आप और हम अब इंकार नहीं कर सकते । दिवंगत सुरेंद्र सिंह जीना के सपनों को पूरा करने की बड़ी चुनौती अब उनके सामने है।  सीएम तीरथ सिंह रावत और प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक  के लिए भी  सल्ट उपचुनाव के परिणाम  सुखद रहे हैं । दोनों की यह पहली परीक्षा थी और  उसमें वो उम्मीद से अधिक अंकों के साथ पास हो गए हैं । 




Thursday, 22 April 2021

बहुत कठिन है सियासत में 'बचदा' होना

 

   


 

सियासत में बहुत कम ऐसे चेहरे हुए हैं जो अपनी सादगी , सौम्यता , सरलता और जीवंतता के लिए जाने जाते हैं। उत्तराखंड की राजनीति में बची सिंह रावत  'बचदा' उन खास शख़्सियतों में शुमार थे , जो हर मिलने जुलने वाले कार्यकर्ता और आम जन की फरियाद शिद्दत से सुनते थे। बचदा' से हर बार मिलकर एक अलग तरह का अनुभव होता था। नए- नए विषयों पर संवाद करना , अपने इलाके के विकास की हमेशा चिंता करना और जरूरतमंदों की हर संभव मदद करने के मामले में उनका कोई सानी नहीं था। पत्रकारों से संवाद के मामले में भी वह बिना लाग- लपेट कभी पीछे नहीं रहते थे। कई बार चाय की चुस्की के बीच ही हमारी खबर भी बन जाया करती थी। 'बचदा' का यही खास अंदाज हम सबके मन को भी बहुत भाता था और उनको राज्य का आम नेता बनाता था । आज के दौर में  'बचदाहोना आसान नहीं है। वे खुद बने और अनेकों को बनाया ।  हमें एक बात समझने की जरूरत है 'बचदाकिसी की कृपा से नहीं बनते हैं । उसके लिए जनता के दिलों में पैठ बनानी पड़ती है । 'बचदा' ने हर भाजपा के कार्यकर्ता को यह पाठ पढ़ाया है कि आपकी परिस्थितियाँ आपको बड़ा बनने से नहीं रोक सकती अगर आपके भीतर हौंसला है और आप जनता की नब्ज पकड़ना जानते हैं तो राजनीति  में आप नया मुकाम बनाने में कामयाब  जरूर होंगे। उत्तराखंड की राजनीति में हम सबके  दुलारे राजनेता  'बचदा एक ऐसे नायक के रूप में सामने आते हैं जिसने पहाड़ की खुरदुरी जमीन से जनसंघ से अपना सफर शुरू किया। जनता पार्टी से होते हुए वो  भाजपा में गए और उत्तर प्रदेश , उत्तराखंड में अपनी राजनीति से नई लकीर खींची। चार बार सांसद होना, केन्द्रीय मंत्री और  एक बार उत्तराखंड का प्रदेश अध्यक्ष होना किसी राजनेता के लिए इतना आसान नहीं है। वह भी तब जब सामने आपका प्रतिद्वंदी हरीश रावत सरीखा जमीन से जुड़ा नेता हो  ।

बची सिंह रावत 'बचदा'  ने 18 अप्रैल 2021 को अंतिम सांस ली। उन्हें फेफड़ों में संक्रमण होने के कारण हल्द्वानी से एयर एम्बुलेंस  द्वारा एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया गया। रविवार रात से ही उनकी हालत अचानक और बिगड़ गई और रात  8:45 बजे उनका निधन हो गया। जब उन्हें एम्स ऋषिकेश लाया गया था तो उनकी कोविड-19 रिपोर्ट निगेटिव थी लेकिन दोबारा कोरोना की जांच की गई, जिसमें वे संक्रमित पाए गए थे। उनके निधन की खबर सुनते ही मेरा मन उनके साथ हुई पुरानी यादों में खो गया ।

एक रोचक किस्सा 'बचदा'  के नाम से जुड़ा हुआ है। बहुत कम लोगों को ये बात मालूम है उनका असली नाम आनंद सिंह रावत था  जो कि बाद में बदलकर बची सिंह रावत 'बचदा' हो गया।  बची सिंह रावत 'बचदा'  के साथ कई बार इंटरव्यू करने का मुझे मौका मिला। मैंने पहली बार उनका इंटरव्यू तब लिया जब वह रक्षा राज्य मंत्री अटल जी की सरकार में बनाए गए। तब मैंने हँसते हुए एक बार उनसे अपने इस दिलचस्प नाम का किस्सा पूछा तो मुस्कुराकर उन्होनें जवाब दिया  उनका असली नाम आनंद सिंह रावत था। जब वह पैदा हुए तो बहुत बीमार हो गए थे तो उस समय उनके बचने की उम्मीद काफी कम थी। तब ज्योतिषी के कहने पर ही उनके पिता ने उनका नाम बची सिंह रावत रखा। बची सिंह रावत नाम रखने बाद से तो मानो चमत्कार सा हो गया । उनकी खराब तबीयत ठीक हो गयी। तब से ही वह परिवार में बची सिंह रावत 'बचदा' के नाम से ही जाने जाने लगे। बची सिंह रावत 'बचदा' की खासियत यही थी उन्होनें बहुत कम समय में अपनी प्रतिभा और योग्यता के दम पर विधायक , सांसद और प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर देश में नाम कमाया। राजनीतिक आडंबरों , छल प्रपंच से हमेशा दूर रहने  वाले बची सिंह रावत 'बचदा'  की छवि हमारे पहाड़ में एक धीर - गंभीर किस्म के नेता की रही।

    


 'बचदा' सियासत में सौम्यता , गंभीरता और जिम्मेदाराना व्यवहार के लिए जाने जाते थे जिन्हें जनता अल्मोड़ा पिथौरागढ़ संसदीय सीट की जनता का  दुलार प्यार हमेशा मिलता रहा । बची सिंह रावत 'बचदा'  ने अपनी राजनीति में विनम्रता की पूंजी को आजीवन बटोरा। बच्चे , बूढ़े,  जवान , बहनें , माताएँ सब उनके कायल थे। वह सब जगह सुलभ हो जाया करते थे। यही खास  अंदाज और मिलनसारिता का भाव जनता को उनके करीब लाया। उनसे मिलने का हमेशा एक अलग सा हसास होता था और जो एक बार मिल लेता था वह उनका मुरीद हो जाता था। मीडिया के साथ भी वह खूब गलबहियाँ किया करते थे। मुझे याद है एक बार पिथौरागढ़ में एक पत्रकार वार्ता में किसी पत्रकार ने उनसे रक्षा तकनीक पर रक्षा अनुसंधान केंद्र पंडा में एक सवाल पूछ लिया था तब मुखातिब होते होते उन्होनें रक्षा मंत्रालय की कई बातें सार्वजनिक ढंग से कह डाली जिसके बाद उन्हें रक्षा से हटाकर विज्ञान  प्रौद्योगिकी मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया। इस बात से साबित होता है 'बचदा'  कितने सहज , सरल और ईमानदार  थे दिल में कुछ भी नहीं रखते थेबातें  बिना लाग -लपेट के कहने से नहीं हिचकते थे'बचदा' एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थे। यह बात बहुत कम लोगों मालूम है वकील होने के साथ ही वह पहाड़ के ग्रामीणों के विकास के लिए काम करने वली ग्रामोत्थान समिति से भी जुड़े थे।

'बचदा'  का जन्म एक अगस्त 1949  को अल्मोड़ा जिले के रानीखेत तहसील क्षेत्र के अंतर्गत पाली गांव में हुआ था । उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा अल्मोड़ा में प्राप्त की जिसके बाद लखनऊ विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र विषय में उन्होंने परास्नातक किया ।  'बचदा' 1969 में जनसंघ से जुड़े थे । 1977 में जनसंघ का जनता पार्टी में विलय हुआ तो वे भी उसका अंग बन गए । इसके बाद 1980 में जनता पार्टी टूटी और भाजपा का गठन हुआ  तब 'बचदा'  की भाजपा में सक्रियता बढ्ने लगी । अविभाजित उत्तर प्रदेश में उन्होंने वर्ष 1991 और 1993 में रानीखेत विधानसभा क्षेत्र का  प्रतिनिधित्व किया ।  उत्तर प्रदेश की तत्कालीन कल्याण सिंह की सरकार में वे राजस्व राज्य मंत्री भी रहे । 1996 से 2004 तक अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ संसदीय क्षेत्र से सांसद निर्वाचित हुए । इस दौरान उन्होंने तीन बार काँग्रेस के दिग्गज हरीश रावत और एक बार उनकी पत्नी रेणुका रावत को करारी  चुनावी शिकस्त दी । वह दौर ऐसा  दौर था जब कांग्रेस के कद्दावर नेता हरीश रावत के खिलाफ भाजपा को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी, जो उन्हें टक्कर देने के साथ काम से पहचान बनाये। तब रानीखेत के विधायक व उत्तर प्रदेश में राजस्व उप मंत्री रहे बची सिंह रावत 'बचदा'  को भाजपा ने अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र से उतार दिया । अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र के चप्पे -चप्पे से वाकिफ और  हर व्यक्ति के लिए  आम जन के लिए दिन रात सुलभ 'बचदा' ने बतौर सांसद दूरस्थ क्षेत्रों तक विकास की किरण पहुंचाई । उन्होंने गांव -गांव दौरे कर ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि अल्मोड़ा संसदीय इलाके के लोगों के दिल में मानो बस से गए। अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र की जनता  की सेवा के लिए हमेशा तत्पर  रहने  वाले 'बचदा' ने बतौर सांसद सीमांत क्षेत्रों तक विकास की किरण पहुंचाई । उन्होंने गांव गांव दौरे कर लोकप्रियता हासिल की। 'बचदा' की बिसात इस इलाके में ऐसी मजबूत बिछी उनके किले का दरकना मुश्किल सा दिखने लगा। इसके बाद हरीश रावत की राजनीति पर ग्रहण लगने की बातें कही जाने लगी। तब  हरीश रावत को  अल्मोड़ा संसदीय सीट के आरक्षित होने के चलते हरिद्वार लोकसभा सीट की तरफ रुख करना पड़ा।

 'बचदा'   अटल सरकार में रक्षा राज्य मंत्री और बाद में  विज्ञान प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री भी बने।  'बचदा' पर जब लिखने बैठ रहा हूँ तो उनसे   से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा मुझे याद आ रहा है  9 नवंबर 2000 को जब अलग उत्तराखंड राज्य का गठन किया गया तो उनको नित्यानन्द स्वामी के स्थान पर सी एम बनाया जा रहा था। तब वह तत्कालीन पी एम अटल जी से मिलने गए तो अटल जी ने उनसे शपथ के लिए तैयार रहने के लिए कहा इसके लिए उन्होने बाकायदा एक ड्रेस भी सिलवा ली लेकिन उसी दिन कुछ घंटे बाद भाजपा की एक बैठक संघ के साथ हुई जिसमें अटल , आडवाणी और डॉ जोशी भी साथ बैठे और उनसे उत्तराखंड के नए सी एम भगत सिंह कोश्यारी के नाम पर सहमति ले ली और संसदीय बोर्ड के इस फैसले के आगे उन्हें नतमस्तक होना पड़ा था लेकिन इसके बाद भी बी सी खण्डूरी के पहली बार राज्य के सीएम बनने के दौर में  उन्हें  2007  से 2010 तक  प्रदेश भाजपा अध्यक्ष का दायित्व भी सौपा गया जिसे ज़िम्मेदारी के साथ उन्होनें निभाया । अपने प्रदेश अध्यक्ष के कार्यकाल में उनके द्वारा कई फैसले लिए गए और बी सी खण्डूरी की सरकार के साथ बेहतर तालमेल बनाने में कामयाब रहे ।

 2008 में अल्मोड़ा सीट आरक्षित होने की वजह से 2009 में नैनीताल-ऊधमसिंहनगर लोकसभा सीट से भाजपा टिकट पर चुनाव लड़े लेकिन कांग्रेस के दिग्गज केसी सिंह बाबा से  रिकार्ड मतों से चुनाव हारे लेकिन तब 'बचदा' अब अपनों से ही बुरी राजनीतिक मात खा गए । 'बचदा' ने कई दशकों तक उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई लेकिन 2014 में मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाए जाने के बाद से  लोकसभा टिकट आवंटन में उनका नाम तक पैनल में नहीं रखा गया । इस कारण एक बार  वे पार्टी नेतृत्व से बेहद खफा से हो गए। नैनीताल में एक मुलाक़ात में उन्होनें इसका जिक्र मुझसे किया था । तब उन्होनें मुझसे कहा था भाजपा से रूठने का सिर्फ यही कारण है कि मेरा नाम नैनीताल-ऊधमसिंहनगर लोकसभा सीट के लिए पैनल में नहीं रखा गया ।  उस दौर में प्रत्याशी चयन समिति की एक बैठक हुई थी । उसमें चुनाव समिति ने तीन नाम तय किए थे जिनमें  भगत सिंह कोश्यारी , बची सिंह रावत  और बलराज पासी का नाम शामिल था । ये तीनों नाम बाकायदा रजिस्टर में दर्ज किए गए । तब कहा गया था कि इन तीनों ही नामों को चयन समिति संसदीय बोर्ड के सामने रखेगी लेकिन जब अखबार में पढ़ा कि पैनल में सिर्फ भगत सिंह कोश्यारी का नाम था तो बची सिंह रावत को  यह बात बुरी तरह खल गई। इसके बाद उन्होनें पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा देने का फैसला किया।  मैंने जब 'बचदा' से पूछा इसे  आप राज्य भाजपा नेताओं का षड्यंत्र मानते हैं तो  उन्होनें कहा मैं तब से भाजपा का सदस्य हूं जब 25 पैसे की सदस्यता दी जाती थी । मैं वर्ष 1969 से पार्टी की राजनीति कर रहा हूं । 25 पैसे की सदस्यता लेकर जनसंघ से जुड़ा था । वरिष्ठ की श्रेणी में होने के बावजूद भी मुझे साइड लाइन क्यों किया गया यही सोचकर आज मैं काफी परेशान हूं।  तब उन्होनें यह कहा मुझे लगता है यह सब प्रदेश के नेताओं के इशारों पर हुआ है। उन्होंने यह सब एक व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने के लिए किया है । इसके लिए केंद्रीय नेतृत्व के सामने यह दिखावा किया गया कि एक ही नाम इस सीट से आया है जिससे लगे सभी भाजपा नेताओं की इसमें सहमति है । इससे मैं बहुत अधिक  आहत हुआ हूं । हालांकि बाद में समझा बुझाकर वह मान गए ।


जब मैंने एक
प्रश्न और पूछा 2009 में आप चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे लेकिन कोश्यारी जी के दबाव में आपको लड़ना पड़ा? इस पर भी ऑफ द रिकॉर्ड उन्होने लंबी बात की और पूरा माजरा मुझे  समझाया।  उन्होनें  यहाँ तक कहा 2009 में लोकसभा चुनाव से पूर्व मेरी  उनसे बात हुई थी। मैंने उनसे कहा था कि आप नैनीताल से चुनाव लड़ें । तब उन्होंने मना कर दिया था। उस वक्त प्रदेश अध्यक्ष और मेरा छह माह का कार्यकाल बचा था । राज्यसभा की एक सीट का चुनाव भी छह माह बाद होना था। मैंने कहा था कि छह माह बाद मैं अपना कार्यकाल भी पूरा कर लूंगा और राज्यसभा भी चला जाऊंगा लेकिन तब कोश्यारी जी को पता था कि नैनीताल की राह आसान नहीं है । इसके चलते ही उन्होंने मेरा नाम यहां से प्रस्तावित करा दिया और बाद में खुद राज्यसभा चले गए। चाय पर चर्चा के दौरान  इतना सटीक जवाब सुनकर में भी भौचक्का रहा गया था । राजनीति में ऐसा साफ दिल राजनेता मैंने बहुत कम देखे हैं ।

'बचदा' से बात करते हुए हमेशा जो भी अनुभव हुए हैं वे विलक्षण थे। सत्ता में रहें या नैनीताल से लोकसभा चुनाव हार गए , उन्होनें जिस अंदाज में अपनी राजनीतिक बिसात पहाड़ों में बिछाई आज के दौर में ऐसा कर पाना असंभव है । बची सिंह रावत की विनम्रता, सादगी और वायदा पूरा करने के गुणों  के चलते लोग  उनके कायल रहे।  उनकी खूबी यह थी वो अपने मूल्यों की राजनीति किया करते थे । जिसे साथ चलना हो चले , जिसे बाहर जाना हो जाए , वे अपना रास्ता खुद बनाया करते थे और कई बार आलाकमान को भी ठसक के आईना दिखा दिया करते थे। ऐसा मैंने उन्हें नैनीताल सीट के टिकट आवंटन वाले दौर में देखा था। इन सबके बाद भी बचदा सहज , सरल व्यक्तित्व के धनी होने के साथ ही मृदुभाषी, विनम्र और वादा पूरा करने वाले व्यक्ति थे। आज के दौर में खोजकर भी आपको ऐसे नेता नहीं मिल सकते यही नहीं 'बचदा' उत्तराखंड की ब्राह्मण ठाकुर की राजनीति की  संकीर्णता से हमेशा दूर रहे और समाज के हर तबके के लिए हमेशा सुलभ रहे। 'बचदा' समाज के हर तबके के बीच इतने लोकप्रिय थे कि अपनी सौम्यता के चलते  लगातार चुनाव जीतकर अल्मोड़ा में हैट्रिक लगाने में सफल  रहे ।

बात 'बचदा' ही चली है तो उनसे जुड़ा एक किस्सा और दिलचस्प है 1999 के लोकसभा चुनाव में पिथौरागढ़ के देव सिंह मैदान में भाजपा की एक रैली हुई जिसमें भाजपा के स्टार प्रचारक और  प्रमोद महाजन मंच पर 'बचदा' के साथ थे 'बचदा' के साथ उस समय वर्तमान भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता सुरेश जोशी भी उस बड़ी जनसभा में साथ थे तब भाजपा के टेक्नोक्रेट रहे प्रमोद महाजन ने जनसभा के मंच से खुद कहा था पिथौरागढ़ जाने से पहले मैं प्रधान मंत्री अटल जी से मिला था मैंने बताया  'बचदा' के लिए जनसभा करने  पिथौरागढ़ जा रहा हूँ तब अटल जी ने ये कहा ये बच्चा ('बचदा')  मेरे लिए बहुत लकी रहा है ये बच्चा ('('बचदा')  जब पहली बार 1996 अल्मोड़ा पिथौरागढ़ संसदीय सीट से सांसद निर्वाचित हुआ तो मेरी सरकार 13 दिन चली , बच्चा ('बचदा')  जब दूसरी बार 1998 में  इस संसदीय सीट से सांसद बना तो मेरी सरकार 13 महीने चली अब इस बार 1999 में अगर इस बच्चे ('बचदा')  की अल्मोड़ा पिथौरागढ़ संसदीय सीट से हैट्रिक लगती है तो मेरी सरकार पूरे पाँच साल चलेगी और हुआ भी ऐसा ही तब प्रमोद महाजन के ऐसा कहते ही पूरा देव सिंह मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा था इस वाकये से समझ सकते थे 'बचदा' सभी के लिए  कितने सरल और सुलभ थे

केंद्रीय राज्य मंत्री रहे 'बचदा' ने अपने कार्यकाल में अनेक स्थानों पर केंद्रीय विद्यालयों की स्थापना की। 2004 में आर्य भट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान एरीज नैनीताल को केंद्रीय दर्जा दिलाने में तत्कालीन मुख्यमंत्री एनडी तिवारी, तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री डॉ मुरली मनोहर जोशी के साथ महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1954 में उत्तर प्रदेश राजकीय वैधशाला की स्थापना हुई थी जिसे बाद में 'बचदा' के रहते अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली केंद्र के अधीन जाने के बाद एरीज को पर्याप्त बजट मिला जिससे नई खोजों और शोध , नवाचार में आसानी हुई 'बचदा' के रहते एरीज में 3.6 मीटर के टेलिस्कोप की स्थापना हो सकी जो नैनीताल के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं है केंद्रीय राज्य मंत्री के साथ बतौर सांसद 'बचदा' ने हर साल अपनी सांसद निधि के साथ ही अपने प्रयासों से किये कामों के अलावा संसद में उठाये गए सवालों व उनके जवाब की किताब प्रकाशित करने की एक नवीन परंपरा शुरू की। उस किताब को अल्मोड़ा संसदीय क्षेत्र के गावों और  शहरों में बांटा जाता था। 'बचदा' ने अलग उत्तराखंड राज्य निर्माण के लिए लोकसभा में निजी विधेयक भी पेश किया था। साथ ही अलग राज्य निर्माण का मामला अनेक बार संसद की पटल पर उठाया। 'बचदा' हर किसी से आत्मीयता के साथ मिलते थे और किसी को भी निराश नहीं करते थेएक मुलाक़ात में ही वो आपका नाम याद रख लेते थे और बड़ी भीड़ में भी पहचान जाते थे और नाम लेकर पुकारते थे शायद इसका कारण ये थे जो जमीन से जुड़े जनसंघ के नेता थे

आज जब वे इस दुनिया से जा चुके हैं तो मेरा यही कहना है बहुत कठिन सियासत में  'बचदा'   होना।  बहुत कठिन । आज के दौर में हम राजनेताओं को कोसते हैं लेकिन जनता की नजर में एक काबिल नेता बन पाना बहुत मुश्किल है। मैंने कई बार उन्हें  पहली बार सांसद बनने पर भी कई बार लैंडलाइन नंबर पर फोन किएकेन्द्रीय मंत्री बनने के दौरान भी कई मसलों पर उनकी बाइट लेनी चाही लेकिन हमेशा वह फोन लाइन पर हमेशा उपलब्ध रहे कई बार उनके पीए फोन उठाते थे बात नहीं हो पाती थी तो पीए खुद कहा करते थे अभी भाई साहब  उपलब्ध नहीं हैं  आप रात में या सुबह बात कीजिएगा दिन में बहुत व्यस्तता रहती है लेकिन बात निश्चित ही हो जाती थी आज के दौर में ऐसा हो पाना असंभव है आप किसी नेता के साथ फोन पर बात करें ऐसा सोच भी नहीं सकते अधिकारी ही आजकल मोबाइल फोन नहीं उठाते और बैक काल तक नहीं करते फिर नेता तो नेता हैंआज तो नेताजी की चरण वंदना करने वाले वाहन चालक तक में गुरूर आ जाता है पी ए तो बहुत  दूर की बात है

कुल मिलाकर कहा जा सकता है मौजूदा दौर में  'बचदा'  होना आसान नहीं है। वे खुद बने और अनेकों को बनाया । एक बात समझनी होगी 'बचदा'  किसी की कृपा से नहीं बनते हैं । उसके लिए जनता के दिलों में पैठ बनानी पड़ती है और कार्यकर्ता को दुत्कारना पड़ता है वह जनसंघ के दौर के ऐसे नेता थे कभी भी उन पर सत्ता की ठसक हावी नहीं हुईप्रदेश अध्यक्ष बने तब भी वैसे ही सहज और विनम्र रहे उनसे मिलने के लिए कभी घंटों लाइन में नहीं लगना पड़ा शायद यही जनसंघ के पुराने संस्कार ही थे जो बचदा को विनम्र बनाए हुए थे नहीं तो  आज के दौर में तो कुर्सी के साथ नेताजी के रंग बदलते जा रहे हैं मंत्री बनने के बाद नेताजी  कार्यकर्ताओं को नहीं पूछ रहे फिर हम पत्रकार तो पत्रकार हुएवैसे भी आज सोशल मीडिया का दौर हैहर नेता मीडिया के सामने आने से बचना चाहता हैअब तो दौर मीडिया मैनेजरी  का है वही प्रेस नोट बनाकर सभी मीडिया को दे रहा है  'बचदा'  इतने शालीन नेता रहे कभी उनका नाम किसी विवाद में नहीं आया। 2014 के बाद भी वह पहले जैसे ही रहेवह चाहते तो अपने लिए पार्टी से और भी बहुत कुछ मांग सकते थे कभी अपने बेटे या पत्नी के लिए टिकट नहीं मांगा ना ही राज्यपाल के पद को पाने के लिए किसी तरह की लाबिंग की शायद अपनी ईमानदारी  और सरल स्वभाव के चलते वह जन -जन में बेहद लोकप्रिय थे । मेरे साथ एक बार एक इंटरव्यू में उन्होनें खुद सांसद रहते कहा था अब मैं हमेशा सांसद या मंत्री थोड़ी रहूँगा इंसान को किसी पद का मोह कभी नहीं होना चाहिए सत्ता का नशा नहीं होना चाहिए नेताओं को विनम्र होना चाहिए तभी तरक्की की सीढ़ियां चढ़ी जा सकती हैं 'बचदा'  का असमय चला जाना उत्तराखंड भाजपा के लिए एक बड़ी क्षति है। भाजपा को अभी आपके  अनुभवों का लाभ और लेने की जरूरत थी । 'बचदा' , आप बहुत जल्दी चले गए । भला इतनी जल्दी भी कोई जाता है । मेरी विनम्र अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि

 

Wednesday, 21 April 2021

सावधान ! कोरोना अभी जिंदा है

 




कोरोनारूपी महामारी से जुड़ी हर मुश्किल घड़ी का सामना लाकडाउन में  हमने भले ही मुस्कुराते हुए किया हो , लेकिन अनलाक में  कोरोना अब  अधिक  दुर्गम सार्वजनिक चुनौती बन रहा है  और रुला  रहा है । कोरोना को लेकर सरकारी घोषणा एवं आकलन भी चुनावी घोषणा पत्र की तरह लगने लगे हैं। भारत में जब कोरोना के मामले नगण्य थे, सरकार और प्रशासन बहुत जागरूक था। जब मामले चरम पर थे, सरकारें निस्तेज हो गयी थी, यह कैसी विडम्बना एवं विरोधाभास है? कोरोना का खतरा  एक  बार फिर डरा रहा है, कोरोना पीड़ितों की संख्या  फिर बढ़ने लगी है।  कोरोना महामारी की दूसरी लहर  में लापरवाही बहुत घातक साबित हो सकती है ।  दूसरी लहर में रोजाना सामने आने वाले नए मामलों की संख्या 20 हजार से 1 लाख पार करने में महज 25 दिन लगे जबकि पहली लहर में मात्र 76 दिनों में आंकड़ा 1 लाख पहुंचा था । इस दौर में 8 राज्य कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं और 80 फीसदी से अधिक मामले  इन्हीं राज्यों में पाये गए हैं ।  इन बढ़ती कोरोना पीड़ितों की संख्या से केवल सरकार के चिन्तित होने से काम नहीं चलेगा, आम जनता को जागरूक एवं जिम्मेदार होना होगा। लोगों की थोड़ी-सी लापरवाही खतरे को बढ़ाती चली जा रही है।  इस साल की शुरुवात में  जनवरी फरवरी के महीने में ऐसा लगने लगा था कि अब कोरोना जाने वाला है, नए मामलों की संख्या 11,000 के पास पहुंचने लगी थी, लेकिन अब नए मामलों की संख्या रोजाना 50 हजार के पार कर चुकी है। रविवार को तो देश में 93 हजार से ज्यादा नए कोरोना संक्रमित मामले सामने आए हैं जिसने  सभी के माथे पर फिर से चिंता की लकीरें खींच दी हैं । 9-10 सितंबर 2020 के आसपास हमने कोरोना का चरम देखा था, जब मामले रोज 97,000 के पार पहुंचने लगे थे। इसमें दुखद तथ्य यह है कि तब भी महाराष्ट्र सबसे आगे था और आज भी 60 प्रतिशत से ज्यादा मामले अकेले इसी राज्य से आ रहे हैं।

हम वही देखते हैं, जो सामने घटित होता है। पर यह क्यों घटित हुआ या कौन इसके लिये जिम्मेदार है? यह वक्त ही जान सकता है। आदमी तब सच बोलता है, जब किसी ओर से उसे छुपा नहीं सकता, पर वक्त सदैव ही सच को उद्घाटित कर देता है। देश के लिए यह सोचने का समय है, ताकि पिछले साल की तरह कोरोना संक्रमण वापसी न कर सके। आंखें खोलकर  एक पर आंकड़ों को गौर से नए चश्में से  देखना होगा। यक्ष प्रश्न है कि आखिर कोरोना को परास्त करते-करते क्यों दोबारा से कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ने लगी हैं इसलिये हमें कोरोना महामारी के दूसरे दौर के लिये अधिक सतर्क , सावधान एवं दायित्वशील होना होगा।

देश अभी भी कोरोना की मार से पस्त है। एक तरफ कोरोना सप्ताह दर सप्ताह नए-नए रिकॉर्ड बना रहा है तो दूसरी तरफ लापरवाही पहले की तुलना में कई गुना अधिक बढ़ गई है।   आज  लोगों में लापरवाही भी बढ़ रही है। लोग भीड़भाड़ वाले इलाकों में जाने से अब परहेज नहीं कर रहे हैं । मास्क और सेनिटाइजर का उपयोग हमारे  दैनिक जीवन में कम होता जा रहा है । आए दिन बैंकों , बाज़ारों में लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है जहां पर सोशल डिस्टेन्सिंग तार तार हो रही है। कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है । खुद देश के प्रधानमंत्री अनलाक के दौरान देश के नाम अपने संदेश में ये कह चुके हैं जब तक सभी को  दवाई नहीं तब तक ढिलाई नहीं । इसके बावजूद भी जनता सब घोर लापरवाही बरत रहे हैं । निजी वाहनों , सरकारी वाहनों और रोडवेज की बसों में तो बहुत बुरा हाल है । इन सब जगहों पर सामाजिक दूरी है नहीं , अधिकांश यात्री , चालक और परिचालक मास्क तक  मास्क नहीं लगा रहे और खुले आम घूम रहे हैं । पढ़े लिखे लोगों की इसी जमात की लापरवाही  जिले में कोरोना के एक बार फैलने का बड़ा कारण बन सकती है  । यदि ऐसी ही लापरवाही आगे भी चलती रही तो  देश में कोरोना की दूसरी लहर विकराल हो जाएगी  ।

कोरोना से बचने के लिए कुछ नियमों का पालन जरूरी है । इसमें निश्चित दूरी का पालन और चेहरे पर मास्क लगाना अनिवार्य है । इन्हीं कुछ नियमों के साथ सवारी वाहनों को चलने की छूट दी गई थी । शुरुवात में तो वाहन चालकों और आम लोगों ने इन नियमों का पालन किया लेकिन धीरे धीरे सभी ने इनकी अनदेखी करना शुरू कर दिया । अब  देश के किसी भी रूट पर देख लें , नियमों का कहीं कोई पालन नहीं हो रहा । लोग  बेरोकटोक घूम रहे हैं , सामाजिक दूरी का पालन नहीं कर रहे हैं और बिना मास्क पहने एक दूसरे से मिल रहे हैं ।  ट्रेन , बस में यात्रा करने अधिकांश यात्रियों के चेहरे बिना मास्क के साफ देखे जा सकते हैं । सब्जी  और ठेले वालों की दुकानों का भी यही हाल है ।  दुकानदार बिना गलब्ज  और मास्क के सामान दे रहे हैं और लोग दुकानों में टूट पड़ रहे हैं  । कमोवेश  यही हाल निजी वाहनों में सवारी करने वाले यात्रियों का भी है । जो थोड़े बहुत लोग मास्क लगा भी रहे हैं वो भी गलत तरीके से । यात्री तो छोड़िए खुद वाहनों के चालक तक अपने चेहरे पर मास्क नहीं लगा रहे हैं और वाहनों और बसों के कंडक्टर बगैर मास्क के ही टिकट काट रहे हैं । हालत कितने गंभीर हैं समझे जा सकते हैं और ऐसे बसों और वाहनों में कोई कोरोना संक्रमित हो तो कई लोगों को वह अपनी चपेट में ले सकता है ।  देश में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों  के हालात  भी बुरे हैं । मास्क लगाना ये अपनी शान के खिलाफ समझते हैं ।  स्कूलों और कालेज में भी छात्र , छात्राएँ बगैर मास्क के आवाजाही कर रहे हैं ।  इन हालातों को देखते हुए देश में तो कोरोना वायरस पर नियंत्रण की उम्मीद करना बेमानी है । इस तरह से तो किसी भी हालात में कोरोना का खतरा नहीं टल पाएगा।

लाकड़ाउन के बाद जब देश अनलाक हुआ तों बाज़ारों में भीड़ उमड़ने पर संक्रमण का खतरा था। संक्रमण न फैले इसके लिए सरकार ने मास्क और शारीरिक दूरी का पालन कराने की बात भी कही थी। कुछ दिन तक तों इसका शुरुवाती असर दिखाई दिया लेकिन अब बाज़ारों में सारे नियम टूट चुके हैं। कुछ लोग मास्क पहनकर आते हैं और कुछ शो पीस की तरह इसे अपने चेहरे पर लटकाते हुए घूमते हैं। कोरोना की टेस्टिंग का रेट भी देश में नहीं बढ़ पाया है ।  स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली भी इस दौर में सवालों के घेरे में है । जहां बीते बरस  सितंबर अक्टूबर माह में कोरोना की प्रतिदिन औसतन हजारों  के आसपास सैम्पलिं  हर जिले में हो रही थी , वहीं आज आलम ये है जिलों में  प्रतिदिन बमुश्किल 100 से 500  सैंपल लिए जा रहे हैं  और थर्मल स्क्रीनिंग करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जा रही है ।   कोविड 19 की गाइडलाइन का पालन करने को कहीं से कहीं तक गंभीर  कोई नहीं दिख रहा जिसके चलते देश में मामले बढ़ रहे हैं ।  कोरोना के प्रति ये लापरवाही कहीं पूरे नगर के लिए मुसीबत न बन जाये ।  

 देश में टीकाकरण अभियान में बहुत भारी भीड़ उमड़ रही है लेकिन प्रशासन के पास पर्याप्त  इंतजामात नहीं हैं ।   दूरदराज़ इलाकों में लोगों को घंटों  गर्मी में लाइन  में खड़ा होना पड़ रहा है । कमरों  में लोगों के बैठने के लिए भी जगह कम पड़ रही है । कोविड के खतरों को देखते  हुए बीमार लोगों शासन की गाइडलाइन के तहत ही टीकाकरण कराया जा रहा है जो केवल  कागजों में दर्ज है ।   वैक्सीन लगाने वाले कोरोना के हमारे वारियर भी अब मास्क पहनने के नाम पर औपचारिकता ही निभा रहे हैं ।  सोशल डिस्टैंसिंग भी अब  इनके लिए दूर की गोटी हो चुकी है ।   टीकाकरण बूथ पर पहचान पत्र, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या अन्य फोटोयुक्त आईडी के आधार पर पंजीकरण तो  हो रहा है वहीं टीकाकरण के बीच गंभीर बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए शासन ने गाइडलाइन जारी की है जिसमें  कहा गया है कि गंभीर बीमारी से ग्रस्त 45 से 59 साल उम्र तक के ऐसे लोग जिन्हें ब्लड प्रेशर, कैंसर, हृदय रोग , सांस  संबंधी बीमारी है, तो तो उन्हें अपने साथ इलाज करने वाले डॉक्टर का पर्चा और उनका परामर्श दिखाना होगा। इसे पहले पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा फिर मौजूद स्वास्थ्य विशेषज्ञों के विचार के बाद ही उन्हें टीका लगेगा लेकिन अब ऐसा  कहीं नहीं हो रहा है  और  सारी कवायद  कागज में डाटा फिट  हर दिन बढ़त बढ़ाने  तक सिमटती जा रही है ‌। अब तो वैक्सीन लगाने  का सिलसिला  रफ्तार पकड़ चुका है । क्या  स्वस्थ  क्या  गंभीर बीमार सब एक श्रेणी के  हो चले हैं ।
 
 भारत ही नहीं दुनिया के विकसित देश भी इस भयावह बीमारी से जूझ रहे हैं। वैज्ञानिक अप्रैल के मध्य में कोरोना की दूसरी लहर के पीक स्तर पर पहुंचने का अनुमान लगा रहे हैं। दुनिया को इस महामारी से जूझते हुए एक वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। हालांकि वैक्सीन भी आ चुकी है परन्तु वैक्सीन लगवाने की रफ्तार बेहद धीमी है। भारत में अभी तक मात्र छह करोड़ लोगों को ही वैक्सीन लग पाई है। सरकारें अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं। कहीं पर पूर्ण तो कहीं पर आंशिक पाबंदियां लगाई गई हैं। बेशक इस प्रकार की पाबंदियां, लॉकडाउन इस महामारी  का हल नहीं परन्तु  इस प्रकार की पाबंदियों द्वारा कोरोना की रफ्तार को कुछ कम अवश्य किया जा सकता है।

लॉकडाउन के दौरान आने वाली समस्याओं से जनता भी रूबरू हो चुकी है। सरकारी प्रयास तभी सफल होते हैं जब जनता की उसमें सहभागिता होती है। कोरोना को रोकने की जिम्मेदारी केवल सरकार की है यह सोचने की भूल मानव जीवन पर भारी पड़ सकती है। कोरोना से बचने के लिए हर एक व्यक्ति को जागरूक होना होगा और खुद का बचाव करना होगा।हमारे शरीर में कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाना भी कोरोना के  पुन: उभरने का एक कारण है।  अभी भी  लॉकडाउन से संक्रमण को थामा जा सकता है। बेशक पिछले साल यही उपाय अधिक कारगर रहा था, लेकिन इसका फायदा यह मिला कि कोरोना के खिलाफ हम अधिक सावधान हो गए, कमियां एवं त्रुटियां सुधार लीं। अस्पतालों की सेहत सुधार ली लेकिन अब साधन-सुविधाओं से अधिक सावधानी ही बचाव का सबसे जरूरी उपाय है। मास्क पहनना, शारीरिक दूरी का पालन करना और सार्वजनिक जगहों पर जाने से बचना कहीं ज्यादा प्रभावी उपचार है। मानसिक और सामाजिक सेहत के लिए हमारा घर से बाहर निकलना जरूरी है। मगर हां, निकलते वक्त हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी। अभी लापरवाही एवं गैर-जिम्मेदाराना हरकत किसी अपराध से कम नहीं है।  जनता को यह बात समझने की आज जरूरत है ।

Tuesday, 20 April 2021

सल्ट के रण में भाजपा से पिछड़ती काँग्रेस



आगामी 17 अप्रैल को उत्तराखंड के  सल्ट विधानसभा क्षेत्र के लिए होने जा रहे उपचुनाव भाजपा से अधिक काँग्रेस के लिए अधिक  चुनौतीपूर्ण  बन गया है।सल्ट को जीतने में भाजपा ने जहां  अपनी पूरी ताकत झोंकी  है और वह एकजुट नजर आ रही है वहीं  कांग्रेस  गंगा के भरोसे संघर्ष  कर रही है । भाजपा सहानुभूति के रथ पर सवार है, लेकिन  काँग्रेस की अंतर्कलह  इस  चुनावी संग्राम  में जिस तरह  दिख रही है उसे देखते हुए  लग रहा है कहीं इस बार भी काँग्रेस के  खाते में 2022 से पहले हार की पटकथा पहले से ही तैयार हो चुकी है । 

आमतौर पर उपचुनावों का ट्रेंड  सत्तारूढ़ दलों के खाते में ही दर्ज होता रहा है । पहले भी राज्य में ऐसा देखने को मिलता रहा है जो पार्टी सत्ता में होती है उसकी लिए उपचुनाव में जीत दर्ज करने में आसानी होती है ।  राज्य में 2017 के विधान सभा चुनावों के ठीक बाद हुए दो विधानसभा उपचुनावों में भाजपा के प्रत्याशी सहानुभूति लहर की बदौलत जीतते रहे हैं। सल्ट में भी भाजपा को इसी सहानुभूति के करिश्में की उम्मीद दिवंगत नेता सुरेन्द्र सिंह जीना के भाई महेश जीना से है ।भाजपा के लिए महेश जीना नवेले उम्मीदवार हैं। पार्टी के पूर्व  विधायक सुरेंद्र सिंह जीना का बीते साल कोरोना के कारण देहांत हो गया था। उसके बाद से ही सुरेंद्र सिंह जीना के भाई महेश जीना सल्ट विधानसभा सीट में मतदाताओं के बीच आए हैं। महेश के बारे में बताया जाता है कि वह दिल्ली में रहकर अपना बिजनेस संभालते थे। भाजपा के कार्यकर्ताओं में भी उनकी ज्यादा पैठ नहीं है। लेकिन दिवंगत विधायक जीना की मौत की सहानुभूति लेने के लिए उनके भाई को चुनाव में उतारा गया। सल्ट में भाजपा के प्रत्याशी महेश जीना  व्यवसायी हैं और दिल्ली में ही रहते  हैं ।काँग्रेस इस बात को खूब प्रचारित कर रही है लेकिन  सहानुभूति एक ऐसी चीज है जो हर मतदाता के दिल में उस दिन उभर जाया करती है जब वह वोट करता है । सल्ट में भाजपा एकजुट होकर  चुनाव लड़ रही है और पार्टी के सभी छोटे से बड़े नेता कार्यकर्ताओं को चुनाव प्रचार में लगा चुकी है वहीं  भाजपा के 25-30 विधायक  यहां पार्टी प्रत्याशी के चुनाव प्रचार की कमान संभाले हुए हैं जिससे महेश जीना मजबूत होकर उभर रहे हैं । वहीं  कांग्रेस प्रत्याशी गंगा पंचोली के साथ सिर्फ   सांसद प्रदीप टम्टा, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष एवं विधायक गोविंद सिंह कुंजवाल,  रानीखेत के विधायक करण माहरा , पूर्व सीएम हरीश रावत के बेटे आनंद रावत चुनावी प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। पार्टी को इस चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत की कमी खूब खल रही है।  हरदा  कोरोना से अभी हाल ही में उबरे हैं और इन दिनों  एम्स  से  डिस्चार्ज होकर दिल्ली  में अपना स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं ।  चिकित्सकों ने फिलहाल उन्हें आराम करने की सलाह दी है ।इस लिहाज से उनकी सल्ट में फिलहाल कोई सभा होनी फिलहाल मुश्किल दिख रही है शायद इसी को जानते हुए उन्होनें एम्स से एक आडियो सोशल मीडिया पर गंगा पंचोली के समर्थन में बीते दिनों  डाला ताकि जनता भी हरीश रावत के साथ खड़ी हो सके और गंगा पंचोली के हाथ मजबूत कर  काँग्रेस का हाथ सल्ट में मजबूत हो सके ।  काँग्रेस महासचिव हरीश रावत ने गंगा के पक्ष में एक मार्मिक आडियो अपील जारी कर भाजपा खेमे में भारी हलचल मचा दी है। सल्ट क्षेत्र में इस अपील का क्या   प्रभाव पड़ेगा यह देखने वाली बात होगी ?  इस समय  कांग्रेस का संकट  उसकी अंदरूनी कलह है। हरीश रावत के कई करीबी संकट की इस घड़ी में रणजीत रावत के साथ गलबहियां करते नजर आ रहे हैं।  खुद के चुनाव प्रचार न कर पाने के चलते हरीश रावत ने  सल्ट उपचुनाव का पूरा प्रबंधन अपने करीबी  पूर्व विधानसभा अध्यक्ष गोविंद सिंह कुंजवाल ,सांसद प्रदीप टम्टा के हवाले कर दिया है।

सल्ट का जिक्र जब भी उत्तराखंड में होता है तो बिना रणजीत रावत के सल्ट अधूरा सा लगता है । 2017 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और रणजीत रावत की एकजुटता थी , तब रणजीत हरदा के सलाहकार हुआ करते थे ।  तब रणजीत रावत रामनगर से चुनाव लड़े और  गंगा पंचोली को सल्ट से आजमाया गया ।  गंगा पंचाोली सुरेन्द्र जीना के हाथों पराजित हुई और मोदी लहर में रणजीत का किला भी दरक गया  । इस चुनाव में करारी हार के बाद रणजीत हरदा के धूर  विरोधी बन गए और इन्दिरा कैंप में अपना नया आशियाना बनाया ।  इस बार यही देखने को मिली है सल्ट उपचुनाव  में अब तक  पूर्व कांग्रेसी विधायक रणजीत सिंह रावत और उनके पुत्र ब्लाॅक प्रमुख विक्रम रावत की चुनाव में सक्रियता नहीं  के बराबर है और वह किसी सूरत में गंगा पंचोली  को विजयी नहीं देखना चाहते । काँग्रेस के अंदर भीतरघात अगर सल्ट उपचुनाव में होता है तो  कहीं  रणजीत रावत की यह  नाराजगी काँग्रेस का कोई  बड़ा नुकसान न कर जाये । वैसे भी इस बार  पूर्व विधायक रणजीत रावत इस सीट पर अपने बेटे ब्लाक प्रमुख  विक्रम रावत को उपचुनाव लड़ाना चाहते थे।  काँग्रेस के पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट विक्रम रावत के फ़ेवर में थी तो वहीं  नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश और प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह ,  प्रभारी देवेंद्र यादव भी खुलकर दस जनपथ में  विक्रम रावत को ही  टिकट देने की पैरवी करते दिखाई दिये । इन्दिरा और प्रीतम तो  टिकट के एलान से पहले से ही विक्रम रावत के नामांकन के लिए हामी  भरते नजर आए  लेकिन काँग्रेस महासचिव  हरीश रावत  दस जनपथ का भरोसा फिर से जीतने में कामयाब रहे और  दस जनपथ ने गंगा पंचोली पर दांव लगाया जो पिछला चुनाव थोड़े अंतर से हार गई थी । अब चुनाव प्रचार में दो चार  दिन रह गए हैं और काँग्रेस प्रदेश अध्यक्ष और नेता प्रतिपक्ष गंगा को प्रत्याशी बनाए जाने के बाद से  इस चुनाव से नदारद दिख रहे हैं उसने कांग्रेस के भीतर कई सवालों को खड़ा कर दिया है ।  चुनाव में जिस तरह से काँग्रेस के ये सभी नेता अपनी  बेरूखी दिखा रहे हैं इसको देखते हुए कहा जा सकता है  काँग्रेस का  अपना आंकड़ा सल्ट उपचुनाव  के जरिये नहीं बढ़ने वाला है । हाँ , हमेशा की तरह गुटबाजी काँग्रेस का इस चुनाव में खेल जरूर  खराब कर देगी  ।  

  वैसे इस  सूबे में भाजपा ने उपचुनाव में सहानुभूति का पूरा  फायदा उठाया  है । वर्ष 2018 में गढ़वाल की थराली सीट से तत्कालीन भाजपा विधायक मगनलाल शाह की मौत के बाद हुए उपचुनाव में उनकी पत्नी मुन्नी देवी को टिकट दिया गया था। भाजपा ने यह सीट जीती तो सही लेकिन अपेक्षा के विपरीत जीत का अंतर बहुत कम यानी महज 1981 मतों का ही रहा। इसके बाद  पिथौरागढ़ में  प्रकाश पंत  के असामयिक निधन के बाद भाजपा ने उनकी पत्नी चंद्रा पंत  को टिकट दिया जिसमें उसकी रणनीति सफल दिखी । सुरेंद्र सिंह जीना दो बार विधायक रहने के बाद तीसरी बार चुनाव मैदान में थे, फिर भी गंगा पंचोली ने मोदी लहर में उन्हें कड़ी टक्कर दी थी। शायद यही वह प्रमुख वजह हो सकती है जिसके कारण भाजपा ने यहां से मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत पर दांव लगाने का जोखिम सल्ट से नहीं लिया। सूबे के मुखिया तीरथ सिंह रावत के लिए  2022 से पहले  यह सेमीफाइनल  जीतना बहुत जरूरी  है। सल्ट में भाजपा के प्रत्याशी महेश जीना अगर विजय श्री हासिल करते  हैं तो वह  2022 से पहले निश्चित ही  बहुत मजबूत होंगेऔर इसके बाद उन्हें भी अपने लिए किसी सुरक्षित सीट से उपचुनाव जीतने में आसानी होगी ।

Saturday, 27 March 2021

प्रधानमंत्री मोदी की बांग्लादेश यात्रा के मायने




 


 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 26 मार्च को अपने दो दिवसीय दौरे परबांग्लादेश पहुँच चुके हैं। नरेंद्र मोदी के हाल के दौरे पर सबकी नजर है। वह राष्ट्रीय दिवस समारोह में हिस्सा लेने के खास मौके पर बांग्लादेश पहुंचे हैं ।कोरोना महामारी की शुरुआत के बाद यह मोदी की पहली विदेश यात्रा है। बांग्लादेश इस  बार अपनी आजादी की 50वी वर्षगांठ मना रहा है। इस दिन को बांग्लादेश के लोग मुजीब दिबस के रुप में भी मनाते है। इस खास मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बांग्लादेशपहुँचने के कई मायने हैं। 

राष्ट्रीय दिवस के खास मौके पर पी एम मोदी  ने बांग्लादेश के अखबार में एक खास लेख भी लिखा है जिसमें दोनों देशों के गहन रिश्तों की बात की गई है । बांग्लादेशी अखबार द डेली स्टार में अपने लेख में पीएम मोदी ने बंगबंधुशेख मुजीबुर्रहमान को याद किया, साथ ही बांग्लादेश के गठन के लिए उनके संघर्ष को सलाम किया है । पीएम मोदी ने लिखा कि बंगबंधु की जिंदगी संघर्ष से भरी हुई थी, जिन्होंने बांग्लादेश को एकजुट करने का काम किया । अपने लेख में यह भी लिखा है कि बंगबंधु  शेख मुजीबुर्रहमान को भारत में भी बड़े सम्मान के साथ देखा जाता है और उनकी सोच को सराहा जाता है यही कारण है  इस जश्न के खास मौके पर भारत भी बांग्लादेश के साथ खड़ा है । अपने लेख में  मोदी ने भारत-बांग्लादेश के बीच 2015 में हुए सीमा समझौते की तारीफ करने केसाथ ही दोनों देशों की दोस्ती के लिए बंगबंधु के विजन की तारीफ की है। पीएम मोदी  ने लिखा कि आज भारत और बांग्लादेश एक साथ मिलकर विकास की ओर बढ़ रहे हैं और अपने लोगों को मौका दे रहे हैं। इस लिहाज से इस ऐतिहासिक समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का शामिल होने के बड़े निहितार्थ हैं। मोदी के अलावे समारोह में  भूटान , नेपाल, श्रीलंका, और मालदीव के राष्ट्राध्यक्ष भी शिरकत कर रहे हैं । इस लिहाज से देखें तो सभी के एक मंच पर आने से पड़ोसियों के साथ दोस्ती  में गर्मजोशी बढ़ने की उम्मीद है ।

भारत और बांग्लादेश के बीच  50साल का सफर एक ऐसा  यादगार मौका है जिसे दोनों देश कई समझौतों के जरिये यादगार बना सकते हैं। मोदी की इस यात्रा में गंगा नदी के पानी के बटवारे का मुद्दा सुलझने के आसार हैं। यह अहम समझौता 2026 में समाप्त  होने जा रहा है जो हाल के दौरे में नया आकार ले सकता है। बांग्लादेश में अभी भी इसका भारी विरोध होता रहा है लेकिन शेख हसीना अपने देश के हितों को ताक पर रख किसी नतीजे पर पहुँच पाएँगी यह देखते वाली बात होगी । गंगा और ब्रह्मपुत्र भारत के लिहाज से जहां महत्वपूर्ण हैं वहीं यह बंगाल की खाड़ी में ही जाकर गिरती हैं जिसे उस इलाके की जीवन रेखा कहा जाता है । बांग्लादेश के लिहाज से भी इसकी बहुत अधिक उपयोगिता है और उनकी पूरी अर्थव्यवस्था इन नदियों पर ही टिकी है। गंगा की बात करें तो बेशक यह भारत के कई राज्यों से होकर गुजरती है लेकिन यह बांग्लादेश की पानी की जरूरत कोभी पूरा करती है ,साथ ही यह बांग्लादेश के उत्तर पश्चिम और उत्तर इलाके के जल भाव कोबरकरार रखने में भी सहायक की भूमिका में नजर आती हैं । बांग्लादेश के भीतर इस बातको लेकर विरोध के स्वर बहुत पहले से ही उठते रहे हैं । इसे इस तरह  प्रचारित किया जाता रहा है भारत पानी के बहाव को रोककर उनके देश के लिए परेशानी पेश कर सकता है । पड़ोसी से संधि की शर्तें बदलसकता है । आज भारत दक्षिण एशिया में अपनी मजबूत पकड़ रखता है जिसका लोहा खुद अमरीका जैसा देश भी मानता रहा है और कोरोना संकट के बीच दुनिया में चीन की किरकिरी के बाद भारत ने अपनी साख जिस अंदाज में बनाई है उसके मद्देनजर चीन को सबक सिखाने के लिए हर देश भारत के करीब चीन को काउंटर करने के लिए आना चाहता है । इस लिहाज से भी देखें तो बांग्लादेश भारत के साथ रखकर  दोनों  देशों की दोस्ती को प्रगाढ़ बना सकता है । मोदी की इस  दो दिवसीय यात्रा  को वह ऐतिहासिक बनाने का मौका हाथ से छोड़ना नहीं चाहता ।

बांग्लादेश के साथ भारत के सम्बन्धों में दशकोंसे कई उतार चढ़ाव देखने को मिलते रहे हैं लेकिन रिश्तों में तल्खी अन्य  पड़ोसी देशों की तुलना में बेहद कम रही । 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी में भारत की बड़ी भूमिका रही जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की रणनीति  ने  बड़ा काम किया था ।   पाक की सेना ने तत्कालीन जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण किया थातब बांग्लादेश आज़ाद हुआ था । 2015 में कई दशकों पुराना सीमा विवाद जहां मोदी के दौर में ही सुलझ गया वहीं दोनों देश झटके में एक दूजे के पास आ गए। शेख हसीना की सरकार जब-  जब बांग्लादेश में  सत्ता में आई है तब-  तब भारत के करीब बांग्लादेश रहा है । हाल के समय में केंद्र सरकार द्वारा पारित किया गया नागरिकता संशोधन कानून,  मोदी सरकार की नीतियां और बीजेपी सरकार का मुसलमानों के प्रति रुख को इन सभी ने कई बार बांग्लादेश के लोगों को असहज किया है। 2019 में बांग्लादेश और भारत के बीच संबंधों में तल्ख़ी तब देखने को मिली जब केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन क़ानून पारित किया। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख़ हसीना ने इस क़ानून को 'अनावश्यक' बताया था। तब शेख हसीना ने भी इस परअपना विरोध दर्ज किया था हालांकि हाल के समय में इसे  भारत के आंतरिक मामले से जुड़ा होने की बात दोहराई जाती रही है । भारत में भी एक दौर में सीएए और एनआरसी को लेकर भारी विरोधप्रदर्शन हुए थे। बांग्लादेश के  मुस्लिम वर्ग के लोगों ने इन कानूनों को लेकर अपनी चिंता जाहिर की थी, कि इन कानूनों से मुस्लिम वर्ग को देश से बाहर धकेला जा रहा है। विरोध-प्रदर्शन के कारण मुस्लिम देशों ने भी भारत की मोदी सरकार की आलोचना की थी लेकिन अब हालात काफी अलग हैं ।   इसके अलावा कोरोना काल में भी कई बार ऐसे हालात बन गए जिससे दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव पैदा हो गया।  

हाल के समय में भारत और बांग्लादेश के सम्बन्ध सिर्फ़ सामरिक दृष्टिकोण से मज़बूत नहीं हुए हैं बल्कि उससे भी आगे जा चुके हैं।  भारत और बांग्लादेश के लिए अब ये ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि वो किस तरह दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश  को और मज़बूत और व्यापक बना सकते हैं।  हाल के समय में मोदी ने  फेनी नदी मैत्री सेतु का उद्घाटन भी किया है जोभारत के पूर्वात्तर राज्यों को बांग्लादेश से जोड़ती है जो  1147 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है जिसमें से 535 वर्ग किमी भारत में और शेष बांग्लादेश में है। यह दोनों सीमाओं से जुड़ी हुई नदी है। फेनी  नदी त्रिपुरा की राजधानी अगरतला से 135 किमी दक्षिण में बहती है। यह दोनों सीमाओं से जुड़ी हुई नदी है जिसके पानी के अधिकारों को लेकर विवाद चल रहा था । फेनी नदी वर्ष 1934 से विवादों में रही है। त्रिपुरा के जल संसाधन विभाग के अनुसार,बांग्लादेश द्वारा आपत्ति व्यक्त किये जाने के बाद फेनी नदी से जुड़ी 14 परियोजनाएं वर्ष 2003 से ही रुकी हुई थी जिसके चलते  इस क्षेत्र के गांवों में सिंचाई प्रभावित हो रही  थी। पीएम मोदी ने अपने कार्यकाल में इस विवाद को सुलझा कर नई लकीर खीचने का काम किया है ।

मोदी की बांग्लादेश की इस बार की यात्रा में तीस्ता के समझौते पर हस्ताक्षर होने के आसार भी दिखाई दे रहे हैं।  2019 में भी दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश पर खूब चर्चा हुई लेकिन यह समझौता लटका रहा।  इस नदी का बंटवारा  दोनों देशों के लिए मुश्किल काम है।  तीस्ता का बांग्लादेश की आर्थिकी  में बड़ा योगदान है।  अगर इस पर बंटवारा हो जाता है तो बांग्लादेश में भीषण सूखे के हालत होंगे । ऐसे में फूँक फूँक कर कदम रखने की जरूरत होगी। बांग्लादेश  के किसी प्रधानमंत्री ने अब तक इस पर कोई कदम आगे नहीं बढ़ाए लेकिन क्या शेख हसीना इस पर हस्ताक्षर का जोखिम मोल लेंगी देखने वाली बात होगी । साल 2017 में जब प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत आईं थी, तब दोनों देशों के बीच 22 समझौते हुए थे लेकिन सबसे ज़्यादा चर्चित तीस्ता समझौता अधर में ही लटका रहा है। क्या इस बार तीस्ता पर कुछ नई पहल हो पाएगी देखने वाली बात रहेगी। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी  इस संधि पर हस्ताक्षर करने से इंकार करती रही हैं। उनका तो साफ मानना है इससे उत्तर बंगाल के पांच जिलों कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, दक्षिण और उत्तर दिनाजपुर, दार्ज़लिंग में सिंचाई प्रणाली प्रभावित होगी।

प्रधानमंत्री  मोदी की यात्रा से पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने  भी कुछ समय पहले ढाका की यात्रा की। उन्होंने भी कहा कि भारत का तीस्ता को लेकर पक्ष नहीं बदला है । ऐसे में पीएम  मोदीके रुख पर सभी की नजरें होंगी । बांग्लादेश से मज़बूत रिश्ते भारत के लिए  बेहद ज़रूरी है ।  नरेंद्र मोदी के हाल के दौरेसे  दोनों देशों के संबंधों में नए आयाम जुड़ेंगे इससे इंकार नहीं किया जा सकता । बांग्लादेश हमेशा से ही मानकर चलता रहा है कि उसकी मुक्ति में भारत का बड़ा योगदान है । हालांकि  रोहिंग्या मुसलमानों के मसले पर भी बांग्लादेश को भारत का उतना समर्थन नहीं मिला है जितनी वह आस वह लगा रहा था ।  प्रधानमंत्री मोदी बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों में मधुरता लाने का काम कर रहे है। वहीं दूसरी तरफ बांग्लादेश की बहुसंख्यक आबादी अल्पसंख्यकों पर अत्याचार कर रही है। ऐसे में कई और मसलें हैं जिनको लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बांग्लादेश में विरोध हो सकता है।  

 प्रधानमंत्री मोदी के मई, 2014 में पदभार संभालने के बाद से ‘एक्ट ईस्ट पॉलिसी’ आज प्रासंगिक बनी हुई है । आज बांग्लादेश हमारा  महत्वपूर्ण पड़ोसी ही नहीं है  बल्कि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र के सीमावर्ती इलाकों में  अहम साझेदार। भारत के लिए सबसे चिंता का मसला दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्वी एशिया में आतंकवादी संगठनों की व्यापक पैठ और तस्करी है । बांग्लादेश में इन संगठनों की गतिविधियाँ अगर बढ़ती हैं तो यह भारत  की सुरक्षा  गंभीर ख़तरा बन सकता है । इस पर शेख़ हसीना सरकार के भावी  रुख से दोनों देशों के भावी सम्बन्धों की पटकथा  तैयार होगी ।