Friday, 11 February 2022

राष्ट्रीय ध्वज के जनक पिंगली वैंकैया


 

अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद होने के लिए असंख्य लोगों ने अपना बलिदान दिया । उनमें से अनेक लोगों को आज हम विस्मृत कर चुके हैं । देश की आन , बान और शान तिरंगा किस तरह वजूद में आया ये भी आज शायद गिने  चुने लोगों को याद होगा ।


 तिरंगे झंडे का जब भी जिक्र आएगा तो पिंगली वैंकैया के नाम का नाम स्मरण किए बिना शायद वो अधूरा रहे । भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की एक बैठक 1921 में विजयवाड़ा में हुई तो उसमें महात्मा गांधी जी ने पिंगली वैंकैया द्वारा तैयार किए गए राष्ट्रीय ध्वज के चित्रों की जानकारी दी । इसी बैठक में पिंगली द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय ध्वज की डिजाइन को महात्मा गांधी ने मान्यता दी ।

 राष्ट्रीय ध्वज की डिजाइन तैयार करने वाले पिंगली का जन्म आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले की दीवी तहसील के भताला पेनमरु गाँव में 2 अगस्त 1878 को हुआ था । प्रारम्भिक शिक्षा भटाला पेनमरु एवं मछलीपट्टनम से प्राप्त करने के बाद 19 वर्ष की उम्र में वो मुंबई चले गए । वहाँ जाकर उन्होनें सेना में नौकरी कर ली जहां से उनको दक्षिण अफ्रीका भेज दिया गया । 1899 से 1902 के बीच उन्होनें अफ्रीका के बायर युद्ध में भाग दिया वहीं पर उनकी मुलाक़ात महात्मा गांधी जी से हुई और वे उनके विचारों से बहुत अधिक प्रभावित हुए । स्वदेश वापस लौटने पर मुंबई में गार्ड की नौकरी में लग गए । इसी बीच मद्रास में प्लेग के चलते कई लोगों की मौत हो गई इससे उनका मन बहुत अधिक व्यथित हुआ और उन्होनें वह नौकरी छोड़ दी । वहाँ से मद्रास में प्लेग रोग उन्मूलन में इंस्पेक्टर के पद पर तैनात हो गए । पिंगली की संस्कृत, उर्दू और हिन्दी भाषा में अच्छी पकड़ थी । इसके साथ ही वो भू विज्ञान और कृषि के भी अच्छे जानकार थे। बात 1904 की है जब जापान ने रूस को हरा दिया । इस समाकर को सुनकर वो इतना प्रभावित हो गए कि उन्होनें जापानी भाषा सीख ली ।

उधर महात्मा गांधी का खेड़ा सत्याग्रह चल रहा था । इस आंदोलन ने पिंगली का मन बदल दिया । उसी दौरान उन्होनें अमरीका से कंबोडिया नामक कपास के बीज का आयात किया और इस बीज को भारत के कपास के बीज के साथ अंकुरित कर भारतीय संकरित कपास का बीज तैयार किया जिसे (उनके इस शोध कार्य के लिए ) बाद में वैंकैया कपास के नाम से भी जाना जाने लगा । उधर ब्रिटिश सरकार ने पिंगली वैंकैया को रायल एग्रीकल्चर  सोसायटी आफ लंदन के सदस्य के रूप में मनोनीत कर उनका गौरव बढ़ाया ।

1906 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ जिसकी अध्यक्षता दादा भाई नौराजी ने की थी । इस सम्मेलन में दादाजी ने पिंगली के कार्यों की सराहना की । बाद में उन्हें राष्ट्रीय काँग्रेस का सदस्य मनोनीत कर दिया गया । काँग्रेस के इस अधिवेशन में यूनियन जैक फहराया गया जिसे देखकर पिंगली वैंकैया का मन द्रवित हो उठा । उसी दिन से वे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की संरचना में लग गए । 1916 में उन्होनें ए नेशनल फ्लैग आफ़ इंडिया नामक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होनें राष्ट्रीय ध्वज के 30 नमूने प्रकाशित किए थे । पाँच साल बाद भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की बैठक 1921 में विजयवाड़ा में हुई तो उसमें गांधी जी ने सभी को पिंगली के द्वारा तैयार राष्ट्रीय ध्वज के चित्रों की जानकारी दी । इसी बैठक में गांधी जी ने पिंगली के द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय ध्वज को मान्यता दी । इस संदर्भ में महात्मा गांधी के ‘यंग इंडिया ’ में अपने संपादकीय में ‘अवर नेशनल फ़्लैग ’ शीर्षक से लिखा राष्ट्रीय ध्वज के लिए हमें बलिदान देने को तैयार रहना चाहिए । मछलीपट्टनम के आंध्र कालेज के पिंगली ने देश के झंडे के संदर्भ में एक पुस्तक भी प्रकाशित की जिसमें उन्होनें राष्ट्रीय ध्वज से संबन्धित अनेक चित्र प्रकाशित किए ।

गांधी जी ने अपने संपादकीय में आगे लिखा ‘जब मैं विजयवाड़ा के दौरे में था उस दौरान पिंगली ने मुझे हरे और लाल रंगों से बने  बिना चरखे वाले कई चित्र बनाकर दिये थे । हर झंडे की रूप रेखा पर उन्हें कम से कम 3 घंटे तो लगे ही थे । मैंने उन्हें एक झंडे के बीच में सफ़ेद रंग कि पट्टी डालने कि सलाह दी जिसका उद्देश्य था कि सफ़ेद रंग सत्य व अहिंसा का होता है । उन्होनें इसे तुरंत मान लिया’ । इसी के बाद पिंगली द्वारा तैयार किए गए झंडे का नाम झण्डा वैंकैया लोगों के बीच  लोकप्रिय हो गया । 4 जुलाई 1963 को पिंगली का निधन हो गया । भारतीय डाक विभाग ने 12 अगस्त 2009 को पूरे 46 बरस बीतने के बाद पिंगली पर 5 रू का डाक टिकट जारी किया ।
 

Sunday, 6 February 2022

अलविदा 'स्वर कोकिला '


 


स्वर कोकिला  लता मंगेशकर आज सुबह हमसे  दूर चले गई। मुंबई के अस्पताल में सुबह उन्होनें अपनी अंतिम सांस ली ।  उनकी मखमली और जादुई आवाज की दुनिया दीवानी थी । उनकी आवाज़ दिल को छूती नहीं, बल्कि दिल में बस जाती थी, हर दिल अजीज लता मंगेशकर ने अपनी आवाज से हिंदी सिनेमा की गायकी में ऐसे चार चाँद लगाए कि हर कोई उनका मुरीद हुए बिना नहीं रह पाया । सही मायनों में  हिंदी सिनेमा की गायकी की दुनिया को लता ने अपने मधुर स्वर से नई दिशा देने का काम किया  । लता दीदी की वो आवाज हर किसी के  दिल के तारों को आज भी  झंकृत कर देती है । हिंदी सिनेमा के 100 बरस से अधिक के सफ़र में लता दीदी की गायकी सिल्वर स्क्रीन पर चार चाँद लगा देती है ।  ऐसी  आवाज हिन्दी फ़िल्म संगीत में हमेशा के लिए अमर रहेगी । 

लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में पंडित दीनानाथ मंगेशकर के मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। लता पांच भाई बहनों में सबसे बड़ी थी ।  लता मंगेशकर का जन्म के वक्त नाम 'हेमा' रखा गया था  लेकिन कुछ साल बाद अपने थिएटर के एक पात्र 'लतिका' के नाम पर, दीनानाथ जी ने उनका नाम 'लता' रखा ।

लता मंगेशकर के पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर एक क्लासिकल सिंगर और थिएटर आर्टिस्ट थे । लता की तीन बहनें मीना, आशा, उषा और एक भाई हृदयनाथ मंगेशकर थे । पांच साल की उम्र में ही लता जी ने अपने पिता से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी और थिएटर में एक्टिंग किया करती थी । जब वो स्कूल गयी तो वहां के बच्चों को संगीत सिखाने लगी लेकिन जब लता जी को अपनी बहन 'आशा' को स्कूल लाने से मना किया गया तो उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया ।
 
सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर का भी बॉलीवुड में सफर इतना आसान नहीं था ।  काफी समय तक उन्हें कोई प्रोजेक्ट नहीं मिला । प्रोजेक्ट नहीं मिलने की दो वजहें थीं।  एक तो साल 1940 के दौर में जब उन्होंने फिल्मी दुनिया में एंट्री ली बॉलीवुड में नूर जहां और शमशाद का दबादबा था और दूसरा लता की आवाज़ की पिच काफी हाई थी और आवाज़ पतली, ऐसे में उस दौर के चलन में चल रहे गानों के मुताबिक आवाज भी फिट नहीं बैठती थी।  
 
प्रोड्यूसर सशधर मुखर्जी ने लता मंगेशकर की आवाज को 'पतली आवाज' कहकर अपनी फिल्म 'शहीद' में गाने से मना कर दिया था ।  फिर म्यूजिक डायरेक्टर गुलाम हैदर ने लता मंगेशकर को फिल्म 'मजबूर' में 'दिल मेरा तोडा, कहीं का ना छोड़ा' गीत गाने को कहा जो काफी सराहा गया । लता मंगेशकर के पिता नहीं चाहते थे कि वो फ़िल्मों के लिये गाने गाये लेकिन लता मंगेशकर बचपन से ही गायक बनना चाहती थीं।  लता ने वसंग जोगलेकर द्वारा निर्देशित एक फ़िल्म कीर्ती हसाल के लिये पहली बार गाना गाया था लेकिन उनके पिता नहीं चाहते थे कि लता फ़िल्मों के लिये गाये इसलिये इस गाने को फ़िल्म से निकाल दिया गया लेकिन वसंत जोगलेकर लता की प्रतिभा से काफी प्रभावित हुये। साल 1942 में उनके पिता इस दुनिया को छोड़ गए और लता मंगेशकर के कंधों पर परिवार को संभालने की सारी ज़िम्मेदारी आ गई ।
 
पिता की मौत के बाद लता को पैसों की बहुत किल्लत झेलनी पड़ी और काफी संघर्ष करना पड़ा ।  इसी वज़ह से लता मंगेशकर ने 1942 से लेकर 1948 तक करीब 8 हिंदी और मराठी फिल्मों में काम किया । 40 के दशक में लता मंगेशकर जब फिल्मों में गाना शुरू किया तो वो लोकल पकड़कर अपने घर मलाड जाती थी। वहां से उतरकर पैदल स्टूडियो बॉम्बे टॉकीज जाती। रास्ते में किशोर दा भी मिलते लेकिन वो एक दूसरे को नहीं पहचानते थे। किशोर कुमार लता मंगेशकर की ओर देखते रहते। कभी हंसते। कभी अपने हाथ में पकड़ी छड़ी घुमाते रहते। लता मंगेशकर को किशोर कुमार की ये हरकत अजीब लगती थी ।हिंदी सिनेमा में उन्होंने पहला गाना साल 1943 में गाया ।   ये गाना था फिल्म 'गजाभाऊ' का और इसके बोले थे माता एक सपूत की दुनिया बदल दे तू ।हालांकि इस गाने से लता को कुछ खास पहचान नहीं मिली ।  लता मंगेशकर खेमचंद प्रकाश की एक फिल्म में गाना गा रही थी। एक दिन किशोर दा भी उनके पीछे-पीछे स्टूडियो पहुंच गए। लता मंगेशकर ने किशोर कुमार की खेमचंद से शिकायत की। तब खेमचंद ने लता को बताया कि किशोर कुमार अशोक कुमार के छोटे भाई हैं।
 
1948 में म्यूज़िक कंपोज़र गुलाम हैदर ने लता के बड़ा ब्रेक दिया, जिसके बाद उनका संघर्ष का दौर खत्म हुआ और फिल्मी दुनिया में ऐसा सिक्का चला कि लोग उनकी आवाज के दीवाने हो गए । आज भी लता की गायकी सिल्वर स्क्रीन में चार चाँद लगा देती है |  फिल्म 'मजबूर' में लता मंगेशकर ने 'दिल मेरा तोड़ा मुझे कहीं का न छोड़ा' गाना गया । 1949 में उन्होंने फिल्म 'महल' में गाया उनका गाना 'आएगा आनेवाला' बेहद पसंद किया गया।  इसके बाद उन्होंने 'दुलारी', 'बरसात' और 'अंदाज़' में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा । चंद महीनों में ही लता के प्रति लोगों का नजरिया बदला और उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली और फिर इसके बाद उन्हें मुड़कर पीछे नहीं देखना पड़ा । लता मंगेशकर ने फिल्म इंडस्ट्री के सभी दिग्गज म्यूज़िक डायरेक्टर्स और सिंगर्स के साथ काम किया ।1942 से अब तक वो 1000 से भी ज्यादा हिंदी फिल्मों और 36 से भी ज्यादा भाषाओं में गाना गा चुकी हैं । लता मंगेशकर ने 1950 के दौर में कई सुपरहिट फिल्मों में अपनी रूहानी आवाज़ का जादू बिखेरकर सुनने वालों को सुकून पहुंचाया । लता मंगेशकर ने 1950 के दौर में कई सुपरहिट फिल्मों में अपनी रूहानी आवाज़ का जादू बिखेरकर सुनने वालों को सुकून पहुंचाया । उस दौरान उन्होंने बैजू बावरा, मदर इंडिया, देवदास और मधुमति जैसी हिट फिल्मों में गाने गाए. फिल्म 'मधुमति' के गाने 'आजा रे परदेसी' के लिए 1958 में लता मंगेशकर को पहला फिल्मफेयर मिला ।
 
60, 70 और 80 के दशक में गाए गए लता मंगेशकर के ज्यादातर गाने ऑल टाइम हिट्स की कैटगरी में आते हैं । कहा जाता है कि बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स, म्यूज़िक डायरेक्टर्स और एक्टर्स उनके साथ काम करने के लिए होड़ लगाया करते थे । साल 1977 में आई फिल्म 'किनारा' में लता मंगेशकर 'नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज़ ही, पहचान है, गर याद रहे' गीत गाया । लता मंगेशकर की ये लाइनें उनके हर चाहने वाले को हमेशा याद रहेंगी । लता मंगेशकर ने 1950 के दौर में कई सुपरहिट फिल्मों में अपनी रूहानी आवाज़ का जादू बिखेरकर सुनने वालों को सुकून पहुंचाया । उस दौरान उन्होंने बैजू बावरा, मदर इंडिया, देवदास और मधुमति जैसी हिट फिल्मों में गाने गाए ।फिल्म 'मधुमति' के गाने 'आजा रे परदेसी' के लिए 1958 में लता मंगेशकर को पहला फिल्मफेयर मिला ।
 
 60, 70 और 80 के दशक में गाए गए लता मंगेशकर के ज्यादातर गाने ऑल टाइम हिट्स की कैटगरी में आते हैं । कहा जाता है कि बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स, म्यूज़िक डायरेक्टर्स और एक्टर्स उनके साथ काम करने के लिए होड़ लगाया करते थे । साल 1977 में आई फिल्म 'किनारा' में लता मंगेशकर 'नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज़ ही, पहचान है, गर याद रहे' गीत गाया । लता मंगेशकर की ये लाइनें उनके हर चाहने वाले को हमेशा याद रहेंगी।उस दौरान उन्होंने बैजू बावरा, मदर इंडिया, देवदास और मधुमति जैसी हिट फिल्मों में गाने गाए । फिल्म 'मधुमति' के गाने 'आजा रे परदेसी' के लिए 1958 में लता मंगेशकर को पहला फिल्मफेयर मिला ।
 
  लता मंगेशकर को साल 2001 में 'भारत रत्न' से भी नवाजा गया था । लता दीदी को इसके पहले पद्म भूषण (1969), पद्म विभूषण(1999) और दादा साहब फाल्के अवार्ड (1989) पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है । सुर साम्राज्ञी के बर्थडे लता मंगेशकर ने ताउम्र शादी नहीं की । इसकी वजह बताते हुए वो कहती थी  कि पिता की मौत के बाद घर के सभी सदस्यों की जिम्मेदारी उन पर थी। ऐसे में कई बार शादी का ख्याल आता भी तो उस पर अमल नहीं कर सकती थी। बेहद कम उम्र में ही वो काम करने लगी थी। बहुत ज्यादा काम उनके पास रहता था। सोचा कि पहले सभी छोटे भाई बहनों को व्यवस्थित कर दूं। फिर कुछ सोचा जाएगा। फिर बहन की शादी हो गई। बच्चे हो गए। तो उन्हें संभालने की जिम्मेदारी आ गई। और इस तरह से वक्त निकलता चला गया।  
 
लता ही एकमात्र ऐसी जीवित व्यक्ति थी जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं। कई राज्य सरकारें उनके नाम से पुरस्कार देती हैं । मध्यप्रदेश सरकार ने 1984 में लता मंगेशकर पुरस्कार शुरू किया। इस पुरस्कार के लिए चयनित कलाकारों को दो-दो लाख रूपए की राशि, सम्मान पट्टिका, शाल-श्रीफल से अलंकृत किया जाता है । राष्ट्रीय लता मंगेशकर सम्मान मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा विभिन्न कलाओं और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाता है। ‘लता मंगेशकर सम्मान’ ‘सुगम संगीत’ के लिए दिया जाने वाला राष्ट्रीय अलंकरण है।
 
1992 से शुरू होने वाले महाराष्ट्र सरकार द्वारा जारी एक लता मंगेशकर पुरस्कार भी है। यह आधिकारिक रूप से "जीवनकाल में उपलब्धि के लिए लता मंगेशकर पुरस्कार" के रूप में भी जाना जाता है। आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा एक और पुरस्कार दिया जाता है। लता यूँ ही सबकी हर दिल अजीज नहीं थी।  


उन पुरस्कारों पर एक नज़र डालें जिनसे उन्हें सम्मानित किया गया था-

1959: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार (मधुमति)
1963: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार (बीस साल खराब)
1964-91: 15 बंगाल फिल्म पत्रकार संघ पुरस्कार
1966: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक (खानदान) के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार
1966: ‘आनंदघन’ नाम के तहत साध मानस (मराठी) के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक
1966: साध मनसा के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका
1969: पद्म भूषण
1970: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का फिल्मफेयर पुरस्कार (जीने की राह)
1972: फिल्म परिचय के गीतों के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार।
1974: वह रॉयल अल्बर्ट हॉल में प्रदर्शन करने वाली पहली भारतीय बनीं।
1974: लता मंगेशकर ने 1974 में गिनीज रिकॉर्ड में भारतीय संगीत के इतिहास में सबसे अधिक दर्ज की गई कलाकार होने का गौरव प्राप्त किया।
1974: फिल्म कोरा कागजी के गीतों के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
1977: जैत रे जैतो के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक
1980: जॉर्ज टाउन, गुयाना, दक्षिण अमेरिका के शहर की प्रस्तुत कुंजी
1980: सूरीनाम गणराज्य, दक्षिण अमेरिका की मानद नागरिकता
1985: टोरंटो, ओंटारियो, कनाडा में उनके आगमन के सम्मान में 9 जून को एशिया दिवस के रूप में घोषित किया गया
1987: ह्यूस्टन, टेक्सास में संयुक्त राज्य अमेरिका की मानद नागरिकता
1989: लता मंगेशकर को 1989 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
1989: पद्म विभूषण
1990 – श्री राजा-लक्ष्मी फाउंडेशन, चेन्नई द्वारा राजा-लक्ष्मी पुरस्कार
1990: फिल्म लेकिन के गीतों के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार।
1993: लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
1994: फ़िल्मफ़ेयर विशेष पुरस्कार
1996: स्टार स्क्रीन लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड।
1996 – राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार
1997: राजीव गांधी पुरस्कार
1997: महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार
1998 – साउथ इंडियन एजुकेशनल सोसाइटी द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
1998: साउथ इंडियन एजुकेशनल सोसाइटी द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
1999: लाइफटाइम अचीवमेंट्स के लिए ज़ी सिने अवार्ड
1999: एनटीआर राष्ट्रीय पुरस्कार
2000: आईफा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
2001: हीरो होंडा और फ़ाइल पत्रिका “स्टारडस्ट” द्वारा मिलेनियम (महिला) की सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका
2001: उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
2001: महाराष्ट्र रत्न (पहला प्राप्तकर्ता)
2002: आशा भोंसले पुरस्कार (प्रथम प्राप्तकर्ता)
2002: वर्ष के ‘स्वर रत्न’ के लिए सह्याद्री नवरत्न पुरस्कार।
2004: फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा लिविंग लीजेंड अवार्ड
2004: फ़िल्मफ़ेयर विशेष पुरस्कार
2004: फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) द्वारा लिविंग लीजेंड अवार्ड।
2007: फ्रांस सरकार ने उन्हें 2007 में अपने सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार (ऑफिसर ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर) से सम्मानित किया।
2008: लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए वन टाइम अवार्ड
2009: एएनआर राष्ट्रीय पुरस्कार
2011: पुणे नगर निगम द्वारा स्वरभास्कर पुरस्कार (प्रथम प्राप्तकर्ता)
2019: भारत सरकार ने सितंबर 2019 में उनके 90वें जन्मदिन पर उन्हें डॉटर ऑफ द नेशन अवार्ड से सम्मानित किया

इसमें कोई दो राय नहीं दिल को छू जाने वाली आवाज की मलिका और भारतरत्न लता मंगेशकर ने भारतीय सिनेमा को संगीत के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया है। एक से बढ़कर एक सुपरहिट गाने देने वाली लता आज भी सभी सिंगर और सिंगिंग की दुनिया में करियर बनाने वालों के लिए आदर्श हैं।  आज भले ही वो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज का जादू लम्बे समय तक भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में रंग भरता रहेगा । मेरी अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ,शत शत नमन !


Saturday, 5 February 2022

खेती बनी वरदान, शिव के 'राज ' में मुस्कुराया अन्नदाता किसान

 





 मध्य प्रदेश की बड़ी आबादी आज भी गाँवों में बसती है जिसकी जीविका कृषि , पशुधन और कृषि से सम्बद्ध अन्य क्षेत्रों पर निर्भर है। जो कृषि आज प्रदेश में रोजगार का बड़ा माध्यम बनी है वो कृषि पिछली सरकारों में अनेक विसंगतियों का शिकार रही है। नीति नियंताओं की अदूरदर्शी नीतियां प्रदेश में किसानों पर बोझ बन गई थी जिसके चलते कृषि की तमाम समस्याओं का हल खोज पाने में हम कामयाब नहीं हो पाए।


राजनीति में किसानों के हर दुःख और दर्द में सहभागी बनने की कोई परंपरा भी देखने को नहीं मिलती लेकिन पिछले कुछ महीनों में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पूरी सरकारी मशीनरी के साथ खेती की तमाम समस्याओं का निदान खोजने में लगे हैं ,वह अभूतपूर्व है। किसानों के दर्द के प्रति संवेदना जगाने का ये प्रयास मुख्यमंत्री अपने अंदाज में कर रहे हैं। खेती को लाभ का सौदा बनाने में की दिशा में वो शिद्दत के साथ जुटे हुए हैं। किसी भी मुख्यमंत्री द्वारा किसानों के दर्द में इस प्रकार के फैसले लेना एक बड़ी मिसाल है। मध्यप्रदेश ने 7 बार राष्ट्रीय स्तर पर कृषि कर्मण अवार्ड लेकर कृषि के क्षेत्र में अपनी शानदार उपलब्धियां हासिल कर पूरे देश में अपना मान बढ़ाया है । यह मुख्यमंत्री शिवराज की किसानों की समस्याओं के प्रति गहरी समझ और किसानों के प्रति संवेदनशीलता का ही परिचायक है कि वे दिन –रात किसानों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने की दिशा में रहकर सारे प्रयास कर रहे हैं।


कोरोना काल की विषम चुनौतियों के बीच प्रदेश के मुखिया शिवराज ने किसानों के चेहरों पर  सही मायनों में  मुस्कुराहट लाने का काम किया है। किसान पुत्र मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की कृषि को लेकर दिखाई गई विशेष दिलचस्पी के चलते आज प्रदेश का किसान जहां खुशहाल नजर आता है वहीं उसे फसलों का सही मूल्य भी मिल रहा है। बीते साल कोविड कोरोना लॉकडाउन के कारण प्रदेश की अर्थव्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। किसानों की फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदना बहुत बड़ी चुनौती थी। कोरोना संक्रमण उस समय चरम पर था। दिन पर दिन कोरोना के  केस बढ़ते जा रहे थे, ऐसे में कोरोना से बीच बचाव करते हुए फसलें खरीद लेने और उन्हें मंडी तक लाने की विकराल चुनौती सरकार के सामने खड़ी थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी मुख्यमंत्री ने किसानों के साथ खड़ा होकर उन्हें सरकार का समर्थन दिलवाया ।


एक ओर किसानों के  ट्रैक्टर , फसल कटाई, , हार्वेस्टर, कृषि उपकरणों के सुधार  आदि की  पहल सरकार द्वारा  की गई वहीं हर दिन किसानों को एस.एम.एस भिजवाकर खरीदी केंद्रों पर सोशल डिस्टेंसिंग, सेनेटाईजेशन आदि करवाकर समर्थन मूल्य पर खरीदी का कार्य शुरू किया गया। इतनी विषम परिस्थिति में भी मध्यप्रदेश ने गेहूं का ऑलटाइम रिकार्ड उपार्जन किया। मध्यप्रदेश ने पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य को भी गेहूं खरीदी में पीछे छोड़ दिया। प्रदेश में एक करोड़ 29 लाख 34 हजार 500 मीट्रिक टन गेहूं की खरीदी 16 लाख किसानों से की गई और  उन्हें करीब 24 हजार करोड़ रूपये का भुगतान किया गया। किसानों के लिए सरकार ने शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराने की सुविधा प्रारंभ कराई । साथ ही पिछले वर्षों की फसल बीमा की लगभग 2990 करोड़ रुपये की राशि किसानों के खातों में अंतरित की गई।किसानों को उनकी उपज का अधिकतम मूल्य दिलाए जाने के लिए मंडी अधिनियम में संशोधन किया गया, जिससे किसानों को मंडी और सौदा पत्रक के माध्यम से अपनी फसल बेचने की सुविधा दी गई । राज्य में किसान उत्पादक संगठन  को स्व-सहायता समूहों की तरह सशक्त बनाने की भी तैयारी भी उनके द्वारा की गई। गरीब तबके को हर प्रकार की सहायता देने के लिए संबल योजना पुन: प्रारंभ की गई जो आज गरीबों का सुरक्षा कवच बनकर सामने आई है।


किसान हितैषी मुख्यमंत्री के प्रयासों से प्रदेश के किसान का डंका आज पूरे देश में बज रहा है । 1 करोड़ 29 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उपार्जन कर प्रदेश का किसान आज उत्पादन के मामले में मध्य प्रदेश, हरित क्रांति के अगुवा राज्य पंजाब को पीछे छोड़ चुका है वहीं कोविड के दौर में 5.11 लाख हेक्टेयर मूंग, उड़द और धान आदि की बोवनी करा चुका है। इसी दौरान  मूंग के  5.76 लाख मीट्रिक टन उत्पादन और किसानों को दी मंडियों के बाहर सौदा पत्रक से उपज बेचने की सुविधा भी दी गयी जिसके परिणाम बेहतरीन रहे हैं । समर्थन मूल्य पर उपार्जन हेतु एक दिन में किसान से खरीदी की अधिकतम सीमा 25 क्विटंल को समाप्त कर असीमित खरीदा जाना भी  शिवराज सरकार की एक बड़ी उपलब्धि रही है । एक ही बार में पूरी उपज का सौदा  होने से किसान के  समय और धन दोनों की हुई बचत हो रही है और उसे बेवजह  मंडियों के चक्कर नहीं काटने पड़ रहे हैं । पिछले साल अतिवृष्टि और कीट प्रकोपों से जब प्रदेश प्रभावित हुआ तो सरकार द्वारा राहत राशि के रूप में 3 हजार 500 करोड़ रुपये की सहायता किसानों को दे गई। सरकार ने सहकारी बैंकों की सेहत में सुधार के लिए 800 करोड़ की सहायता भी दी। प्रधानमन्त्री किसान सम्मान निधि , प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना , किसान क्रेडिट कार्ड योजना को प्रदेश में बेहतरीन ढंग से लागू किया गया है ।प्रधानमंत्री किसान कल्याण योजना के माध्यम से अब तक 111 हजार 889 करोड़ रु का भुगतान किसानों को किया जा चुका है।  शून्य ब्याज दर पर ऋण देने वाले प्रदेशों में आज  मध्य प्रदेश का नाम शुमार हुआ है । अब तक 26000 करोड़ से अधिक का ऋण किसानों को दिया गया है ।  


 किसानों के प्रति मुख्यमंत्री की दूरगामी नीतियों का असर ही रहा, उनके रहते प्रदेश में हर स्तर पर किसानों की समस्याओं को सुना गया और विभिन्न फसलों के बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने और पहली बार प्रदेश में किसानों की विभाग से संबंधित समस्याओं के निराकरण के लिये 'कमल सुविधा केंद्र'  की स्थापना सुनिश्चित की गयी  जहां पर  शिकायतों का  त्वरित निराकरण हुआ।  अब तक कई हजार समस्याओं का निराकरण बेहद कम समय में पूरा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में केन बेतवा परियोजना का निर्माण शुरू हुआ है।  ये परियोजना प्रदेश में सिंचाई व्यवस्था को मजबूत बनाने का काम भविष्य में करेगी।  आज भी कृषि के क्षेत्र में एग्रीकल्चर इन्फ्रास्टेक्चर फंड परियोजना के माध्यम से कृषि में बुनियादी सुधारों को अमली जामा पहनाया जा रहा है। 150 नए ऍफ़.पी. ओ के गठन से प्रदेश में किसानों के लिए नई लकीर खींचने की कोशिशें शुरू हुई हैं। आज प्रदेश में कृषि विकास दर जहाँ दहाई के अंक में पहुँच चुकी है वहीँ प्रदेश का कुल कृषि उत्पादन बढ़कर 6 करोड़ मीट्रिक टन पार कर चुका है। पिछले 17 बरस में सिंचित क्षेत्र भी 42 लाख हेक्टेयर तक पहुँच गया है ।  इस दौर में प्रदेश सरकार ने किसानों को बिजली के कनेक्शन देने के लिए 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का अनुदान भी दिया है ।    


शिवराज सरकार का एकमात्र संकल्प प्रदेश के किसानों की समृद्धि है ।  इसी को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2018 में 9.51 लाख किसानों को खरीफ का 1987.27 करोड़ रु. वर्ष 2018-19 में 8.94 लाख किसानों को रबी का 1241 करोड़ रु.,  खरीफ 2019 का 24.54 लाख किसानों को 5,531  करोड़ रुपये की बीमा राशि का भुगतान कराया गया। इस प्रकार कुल  44 लाख किसानों को 8,891 करोड़ रु. की राशि का भुगतान बीमा कंपनियों द्वारा कराया गया। कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते  हुए खरीफ वर्ष 2020-21 के लिए फसल बीमा की अंतिम तारीख 31 जुलाई के स्थान पर  पिछले साल एक माह बढ़ाकर 31 अगस्त की गई । बाढ़ प्रभावित पांच जिलों के लिए तारीख आगे बढ़ाकर 7 सितंबर तक  की गई जिससे प्रदेश में खरीफ फसल के लिए 44 लाख 53 हजार से ज्यादा किसानों ने बीमा पंजीयन कराया।प्रदेश में मूंग फसल क्षेत्र 2021 में बढ़कर 8.35 हेक्टेयर पहुँच चुका है जिसमें पिछले साल के मुकाबले दुगनी वृद्धि हुई है ।


भारत सरकार द्वारा माह दिसम्वर 2018 से प्रधानमंत्री किसान सम्मान  निधि योजना प्रारंभ की गई जिसमें  प्रतिवर्ष कृषकों को एक वर्ष में तीन समान किश्तों  में कुल राशि 6 हजार का भुगतान किया जाता है। इस योजना अंतर्गत  अब तक प्रदेश में 81 लाख 49 हजार  किसानों को 1492  करोड़ रूपये की राशि का वितरण किया गया है। मुख्य्मंत्री किसान कल्याण योजना प्रदेश में  22 सितम्वर 2020 से  शुरू हुई जिसके तहत वित्तीय वर्ष में 2 समान किश्तों  में पात्र किसानों को 4 हजार रूपये का भुगतान किया जाता है। मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना के अंतर्गत 2020-21 में जहाँ 74 लाख 50 हजार किसानों के खातों में लगभग 1 हजार 492 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान किया गया है वहीँ 2021-22 के लिए पहली किश्त के रूप में 75 लाख किसानों को 1 हजार 500 करोड़ रुपये वितरित किये जा चुके हैं। वर्ष 2021-22 में प्रस्तु त बजट में मुख्यमंत्री किसान कल्यानण योजना अंतर्गत 3200.00 करोड़ रूपये राशि का प्रावधान किया गया है।   इसी प्रकार वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में शामिल कराकर वन अधिकार पट्टेधारियों को फसल बीमा योजना का लाभ दिलाया गया है। पूर्व में सरसों का उपार्जन 13 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के मान से तथा चना का उपार्जन 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर . के मान से किया जा रहा था, जिसे बढ़ाकर प्रदेश सरकार के द्वारा 'जितना उत्पादन-उतना उपार्जन' के मान से 20-20  क्विंटल   प्रति हेक्टेयर तक चना तथा सरसों की उपार्जन मात्रा नियत  किया गया। इससे चना एवं सरसों उत्पादक किसानों को अपनी उपज के बेहतर मूल्य प्राप्त हुए हैं। समर्थन मूल्य पर उपार्जन हेतु एक दिन में एक किसान से खरीदी की अधिकतम सीमा 25 क्विंटल को समाप्त कर असीमित  पंजीयन अनुसार एक साथ असीमित खरीदा जाना निश्चित किया गया जिससे किसान  के धन और समय की एक साथ बचत हुई है। बीज ग्राम कार्यक्रम किसानों को नई किस्मों के बीज दिलाने के लिए भारत सरकार  के सहयोग से चलाया जा रहा है । 2021-22 में रबी की फसल हेतु मसूर, सरसों , अलसी बीज का मिनी किट बीज का वितरण  प्रदेश में निशुल्क किया जा रहा है । मोटे अनाजों के मूल्य संवर्धन हेतु अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों के लिए मिलेट मिशन योजना चलाई जा रही है जिससे किसानों की आय निश्चित रूप से बढ़ेगी ।कृषि अधोसंरचना निधि के अंतर्गत वर्ष 2020-21 में  प्रदेश को 7500 करोड़ रूपये का आवंटन प्राप्त हुआ है। इसका उपयोग आधुनिक मंडियों की स्थापना, फूड पार्क, शीत गृहों की श्रृंखला स्थापित करने के साथ-साथ साइलोस एवं वेयर हाउस के निर्माण में किया जाएगा । रबी विपणन बर्ष 2021-22 हेतु चना, मसूर, सरसों का उपार्जन गेहूं के उपार्जन से पहले किए जाने का निर्णय भी प्रदेश सरकार के द्वारा किया गया ।


प्रदेश के सभी 52 जिलों में भूमि के भू अभिलेख आनलाइन प्रदान करने की सुविधा भी प्रदेश सरकार ने शुरू की है। प्रदेश में कोर्स तकनीक के माध्यम से किसी भी मौसम में सटीकता के साथ सर्वेक्षण और सीमांकन करने की सुविधा भी दी गई है । नए सीमांक एप के माध्यम से स्मार्टफोन के माध्यम से भूखंड को नापकर राजस्व अभिलेख के माध्यम से उसका मिलान किया जा सकता है । इस एप की प्रदेश में लोकप्रियता अपने चरम पर है ।केंद्र सरकार के द्वारा देश के समस्त किसानों के लिए वन स्टाप पोर्टल का निर्माण किया गया है । इसी तर्ज पर प्रदेश सरकार ने किसानों को एकल खिड़की उपलब्ध कराई है, जहाँ सभी समस्याओं का समाधान निकालने की कोशिशे हो रही हैं । साथ ही सरकारी प्रयासों की निगरानी के लिए एक पारदर्शी निगरानी तंत्र की व्यवस्था सरकार ने सुनिश्चित की है  सरकारी नीतियों को लागू करते समय किसानों की राय को भी लिया जाता है जिसके चलते अन्नदाताओं की तमाम समस्याओं का बेहतर निदान किया जा सका है। सरकारी नीतियों का निर्माण लोक मंगल की भावनाओं के साथ किया जा चाहिए। अच्छी बात ये है मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने इस कार्यकाल में किसानों के हितों के लिए बड़े फैसले लेने से नहीं हिचकिचा रहे हैं और उनकी प्राथमिकताओं के केंद्र में सत्ता सँभालने के पहले दिन से ही प्रदेश के किसान हैं ।

 प्रदेश सरकार की इस उपलब्धि में किसानों की अथक मेहनत के साथ ही कृषि मंत्री  कमल पटेल ने भी किसानों के हित में हर वो जतन किया है जिससे किसानों की आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो। इन्ही प्रयासों से तरक्की और उन्नति की नई इबारत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से किसानों के हित में चलाई जा रही योजनाएँ प्रदेश के करोड़ों किसानों की आँखों में खुशी , जिंदगी में खुशहाली की गारंटी हैं । मुख्यमंत्री शिवराज खुद किसान हैं लिहाजा उनके पास किसानों का ऐसा सुरक्षा कवच है जो दशकों से बिचौलियों के चंगुल में फंसे किसानों को आजादी दिलाने में मील का पत्थर साबित होंगे । आज राज्य में खेती का रकबा जहाँ बढ़ा है वहीँ किसानों को सिंचाई की बेहतर सुविधाएं भी मिल रही हैं।  पहले की अपेक्षा उन्हें आज 24 घंटे बिजली पूरे प्रदेश में मिल रही है।

मध्यप्रदेश के अन्नदाता का मान  शिवराज सरकार के आने से बढ़ा है। आज मध्यप्रदेश अनाज के उत्पादन में सर्वश्रेष्ठ राज्य बन गया है । वैसे भी शिवराज सिंह चौहान किसानों के प्रति सदैव संवेदना से भरे रहे हैं। वे खुद को भी किसान परिवार का बेटा बताने में पीछे नहीं रहे हैं। अन्नदाता की हर समस्या को लेकर वो पूरी सक्रियता से काम को अंजाम तक पंहुचा रहे हैं । किसानों को  कोई कष्ट न हो इसके लिए  उनकी सरकारी मशीनरी हर समय तत्पर रहती है पिछले साल सत्ता में आते ही उन्होंने जिस तरह ताबड़तोड़ फैसले  किसान हित में लिए हैं उसने यह साबित किया कि वे मुश्किल समय में अपना धैर्य नहीं खोते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  की यही पहचान अन्य नेताओं से उनको अलग करती है । मुख्यमंत्री शिवराज किसान हितैषी सी एम के तौर पर पूरे देश में जाने जाते हैं। राज्य को कृषि क्षेत्र में  नित ऊंचाईयों पर ले जाने का श्रेय निश्चित ही उन्हें जाता है।