Monday, 7 November 2022

‘ फिल्म इंडस्ट्री में नेपोटिज्म से ज्यादा फेवरेटिज्म है ’


 

 

मुंबई सपनों की नगरी है। इस मायानगरी में हर साल लाखों लोग एक्टर बनने का सपना लिए अपना घर छोड़ कर आते हैं लेकिन अभिनेता बनना इतना आसान नहीं होता है। इसके पीछे कई सालों का संघर्ष और खुद की मेहनत होती है। अमित सोनी   इंडियन डायमंड इंस्टीट्यूट सूरत (गुजरात) से ज्वैलरी डिजाइनिंग में गोल्ड मेडलिस्ट  रहे और बाद में  एमबीए  भी किया।  कुछ साल हांगकांग, चीन, ओमान  जैसी विदेशी सरजमीं  में  ज्वैलरी इंडस्ट्री में नाम रोशन किया ।  फिर भारत वापस आकर पीसी ज्वैलर्स में  मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ के रीजनल हेड रहे ।  इसी दौरान उन्हें लगा अब तक दूसरों  के सपने के लिए इतनी मेहनत की अब खुद के सपने के लिए नई  उड़ान भरूंगा।  अपने सपनों को साकार करने के लिए वह अपनी ज्वैलरी की जॉब को छोड़कर  देश के हृदयस्थल मध्य प्रदेश को छोड़कर  सीधे मुम्बई चले गए। एक इंटरनेशल ज्वैलरी डिजायनर से लेकर एक अभिनेता बनने तक का उनका अब तक का सफर तमाम चुनौतियों और संघर्ष से भरा रहा है। 

अमित सोनी ने बचपन से ही अपनी रचनात्मक कहानी कहने की कला को प्रस्तुत करना शुरू कर दिया था। वह अपने कहानी कहने के कौशल से अपने परिवार, स्कूल और दोस्तों को हैरत में डाल देते थे। अमित सोनी ने अपने फिल्म कैरियर की शुरुआत सबसे बड़े टीवी शो ‘सावधान इंडिया ’ से की। उसके बाद उन्हें 'एनआरआई दुल्हा ' में भूमिका निभाई लेकिन किन्हीं कारणों के चलते वो रिलीज नहीं हो पाया। फिर डीडी नेशनल का ‘ना हारेंगे हौसला हम’, ‘बेटा भाग्य से बिटिया सौभाग्य से’ किया। इसके बाद स्टार प्लस के प्रसिद्ध सीरियल ‘ये है मोहब्बतें’ की सफलता से उन्हें सर्वश्रेष्ठ नकारात्मक भूमिका और सर्वश्रेष्ठ अभिनय के लिए एक प्रतिष्ठित छवि मिली जिसके बाद उनकी सफलता को मानो नए पंख ही लग गए। ‘फियर फाइल्स’, ‘ससुराल सिमर का’, ‘सलाम इंडिया ’, ‘ श्रीमद् भागवत  महापुराण ’, ‘परम अवतार श्रीकृष्ण ’ जैसे सीरियल में उनके  दमदार अभिनय को देश और दुनिया में सराहना मिल चुकी है। यही नहीं , उनकी 'शुद्धि ' फिल्म मैनचेस्टर लिफ्ट आफ फिल्म फेस्टिवल में  प्रतिष्ठित पाइनवुड अवार्ड के  लिए  चयनित हुई,  जिसे  राष्ट्रीय वा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 13 अवार्ड मिले। उनकी पहली वेब सीरीज़ ‘जाह्नवी ’ (लीड) सोनी लिव जैसे प्रतिष्ठित चैनल से रिलीज हुई थी। कोरोना लाकडाउन के दौर में उन्होनें 22 सेलिब्रिटियों के साथ एक नया एल्बम गीत ‘सारा हिंदुस्तान’  में अभिनय किया और इसे प्रोड्यूस भी किया जिसमें जाकित हुसैन, सुरेश बेदी , रोहिताश गौड़, सुरेश बेदी,  सोनू सूद जैसे फिल्म जगत के दिग्गज सितारे शामिल थे।
 
आज अपने अभिनय के चलते अमित सोनी बॉलीवुड में किसी परिचय के मोहताज नही हैं। अमित  सोनी मूल रूप से द सिटी ऑफ़ लेक 'भोपाल' से ताल्लुक रखते हैं। अमित सोनी मानते हैं कि बहुत से लोग मुंबई आते हैं और अभिनेता बनने के लिए कोर्स करते हैं , लेकिन यह इतना आसान नहीं होता है। आपको रातों रात अभिनेता बनाने के लिए कोई कैप्सूल नहीं होता है और संघर्ष तो हर एक क्षेत्र में होता है। अमित के लिए अभिनय एक बड़ी सहज प्रक्रिया है। उनकी मानें तो दिल से किया गया अभिनय वो है जो दूसरों के दिलों को छू लेता है। 

 
अभिनेता अमित सोनी से उनके करियर और फिल्म इंडस्ट्री की यात्रा को लेकर विशेष बातचीत की। प्रस्तुत है उसके मुख्य अंश
 
 सागर के छोटे से कस्बे से लेकर मुंबई की मायानगरी की यात्रा ये जो सफर है आप इसे कैसे देखते हैं ?

 
 मेरी जिन्दगी में बहुत उतार और चढ़ाव रहा है। मेरी पैदाइश वैसे तो सागर की है लेकिन बैरासिया में मेरा बचपन गुजरा है। उसके बाद कुछ वक्त विदिशा, फिर सागर रहा। बुंदेलखंड से मेरा एक ख़ास लगाव रहा है। मुझे गर्व है कि मैं मध्यप्रदेश से हूँ। मैंने अपनी उच्च शिक्षा गुजरात से प्राप्त की। ज्वैलरी डिजाइनिंग का कोर्स भी किया। गोल्ड मेडलिस्ट रहा। देश – विदेश की कई बड़ी कंपनी में काम किया उसके बाद एक्टिंग के क्षेत्र में हाथ आजमाया। इसी दौरान सावधान इण्डिया का ऑडिशन भी चल रहा था।  उसमें मेरा चयन हुआ और उसमें काम किया। मेरे गुरु गोविन्द नाम देव जी हैं। उन्होंने मुझे सुझाव दिया भोपाल में वरिष्ठ रंगकर्मी आलोक चटर्जी से जाकर एक बार मिलें। उनके साथ काम करने का बेहतरीन अवसर मिला। बॉलीवुड अभिनेता इरफ़ान खान से मुलाकात भोपाल में हुई और उनसे प्रेरणा लेकर 'ये हैं मोहब्बतें 'सीरियल में काम किया।  मैंने अपनी एक कंपनी भी रजिस्टर्ड की और जब मैं मुंबई गया तो वहां पर मेरी मदद करने वाला कोई नहीं था इसलिए मेरी कोशिश रहती हैं कि मैं लोगों की दिल से मदद करूँ। 
 
सोनी लिव चैनल में 'जान्हवी' वेब सीरीज आई थी। इसके अलावा जी से मेरा सांग 'तू जो मिला खुदा मिला' भी लांच हुआ था। वो मैंने मलेशिया में शूट किया और इसका शेष बचा हुआ भाग मैंने भोपाल के पीपुल्स वर्ल्ड में शूट किया था। इसके अलावा टी सीरीज का 'खलिश' गाना था जो मैंने भोपाल और इंदौर शूट किया था। अभी जो मैंने ' स्क्र्यू यू'  करके अपने बैनर यानी 'अमित सोनी एंटरटेनमेंट' की शार्ट फिल्म बनाई है जो एक मैंने बड़े ओटीटी प्लेटफार्म पर पिच किया है। बहुत अच्छी टीम जुड़ गई है मेरी। मैंने साउथ  फिल्म के कुछ डायरेक्टर और प्रोड्यूसर को भी भोपाल घुमाया है। 2  फिल्म इंडस्ट्री के बड़े कलाकारों को भी जल्द में भोपाल ला रहा हूँ ताकि मध्य प्रदेश में फिल्म निर्माण की संभावनाओं को तराशा जा सके। मैं चाहता हूँ कि जब बॉलीवुड हो सकता है। टालीवुड हो सकता है तो फिर अपना भोपालीवुड क्यों नहीं हो सकता है?  हमारा भी एक हब बनना चाहिए। ऐसा नहीं हैं भोपाल में आजकल बहुत सारे शूट हो रहे हैं। कई बड़े बड़े एक्टर शूट कर रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि जो कहानियां हैं जो आज तक हमारे सामने नहीं आई वो कहानियाँ भी उभर कर आये। जहाँ आपने जन्म लिया होता है वहां के कर्जदार आप ज्यादा होते हैं।
 
आप बहुत अच्छे इंटरनेशनल ज्वैलरी डिजाइनर रहे हैं और आज भी डिजाइन के प्रोफेशन को आपने छोड़ा नहीं है इसकी कोई ख़ास वजह ?
 
आपने कहावत सुनी होगी चूहे का बच्चा है तो बिल तो खोदेगा । अब मेरे नाम में ही 'सोनी'  है। ज्वैलरी मेरा बैकग्राउंड भी हैं। अभिनय से मुझे तसल्ली मिलती हैं और ज्वैलरी के बिजनेस से मुझे साइड बाई साइड आय होती है। एक अभिनेता की जो जिन्दगी होती है वो हमेशा अप नहीं होती और हमेशा डाउन नहीं होती। उतार और चढ़ाव जीवन के हिस्से रहते हैं। जो मेरे पुराने ग्राहक हैं वो आज भी मुझसे ही ज्वैलरी खरीदना चाहते हैं। 
 
हाल के वर्षों में देखें तो सिनेमा में बहुत से बदलाव आये हैं। आप देख रहे होंगे ओटीटी प्लेटफार्म पर काफी सारी बेव सीरीज आ गई है। बड़े -बड़े कलाकार भी आजकल ओटीटी प्लेटफार्म का रूख कर रहे हैं। तो आप इस बदलाव को एक कलाकार के नजरिये से कैसे देख रहे हैं ?
 
बदलाव तो हमेशा आता है लेकिन ब्लैक एन्ड व्हाइट टेलीविजन से हम कलर टीवी में आने में हमने कितने दशक देखे हैं। उसी तरह से हर दशक में सिनेमा में भी बदलाव आये हैं। होता ये है कि हम आज के बदलाव को देखकर पीछे के बदलाव को भूल जाते हैं। जैसे आप देखेंगे कि नब्बे के दशक के जो गाने थे वो अलग किस्म के थे। आप किशोर कुमार के  गाने सुनेंगें तो उसमें एक अलग कल्चर दिखेगा। मुकेश का आपको एक अलग कल्चर दिखेगा। गोविन्दा की फिल्में अलग तरह की।
 
 तो ये जो बदलाव है उन्हें मैं दो तरह से देखता हूँ। दरअसल कोविड के बाद आदमी के पास वक्त था उसने ओटीटी प्लेटफार्म को समझा ही नहीं था। अब उसके बाद वक्त मिला ओटीटी प्लेटफार्म में वेब सीरीज देखने को मिली। अब इंसान को वक़्त देखने को मिला है। यदि आपका कंटेंट अच्छा है, क्रिएटिव है तो जनता उसे पसन्द करेगी। जो कंटेंट है आज उसकी ही मांग है और यही बदलाव है। दूसरी ओर बहुत खास बात है अगर आप साउथ की फिल्मों को देखते हैं तो वो अपने कल्चर को नहीं  छोड़ते हैं। हम एकदम से एडवान्स हो जाते हैं। हम अपने कल्चर को छोड़ देते हैं और हम इतना हाई क्लास चले जाते हैं कि उससे हमारा व्यूअर कनेक्ट नहीं होता। हमें कल्चर को भी नहीं छोड़ना है और नया कंटेंट  भी चाहिए।
 
 आप गाने भी करते हैं, सीरियल भी करते हैं और फिल्में प्रोड्यूस भी करते हैं। एक अच्छे ज्वैलरी डिजाइनर भी हैं। आप किस भूमिका में अपने आपको सहज मानते हैं ?
 

एक्टर के तौर पर आपके लिए यही चुनौती है कि आप किसी भी करेक्टर को ना नहीं कहें। मैं ऐज आन ऐज एक्टर हर चीज को इंजाय करता हूँ। मुझे हर भूमिका जीने में मजा आता है। जैसे मैंने एक कपल पार्टी वेब सीरीज की है जो अमेजन प्राइम पर आने वाली है तो उस समय जो मेरे डायरेक्टर थे,  उन्होंने कहा कि अमित कुछ अलग चाहिए तो मैं अलग अलग किरदार में खुद को सहज समझता हूँ। जब आप कुछ नया करते हैं तो वो अलग होता है। किरदार के हिसाब से गेट अप बदलना, बॉडी ट्रांसफार्मेशन भी करता हूँ। मैंने जब "शुद्धि" फिल्म की थी तब मेरा वजन 92 किलो था, फिर मैंने 24 किलो वजन भी काफी मेहनत करके घटाया जो कि मेरे लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था।   
 
 
मुंबई का सफर बहुत चुनौतीपूर्ण रहता है। आपने खुद कोई प्रशिक्षण भी नहीं लिया। जो नये लोग आ रहे हैं इस फिल्म इंडस्ट्री में उनके लिए कितना चुनौतीपूर्ण टास्क है?  नये लोगों के लिए जगह बनाना और एक नया मुकाम हासिल करना ?
 

मैं बहुत स्टेट फारवर्ड बोलता हूँ। एक अच्छा कलाकार वह है जो थियेटर करता है। ये आपको आप को एक परफेक्ट पैकेज बनाता है। कई बार लोग नेपोटिज्म की बात करते हैं तो नेपोटिज्म आखिर है क्या?  आप अपना एक मुकाम हासिल करते हो। बीस पच्चीस साल बिजनैस करते हैं और जाहिर सी बात है कि आप आपने पड़ोसी के तो वारिस बनागे नहीं। वैसे ही दृष्टि में लोग नेपोटिज्म की जगह फेवरेटिज्म होता है आप किसी एक पर्टिकुलर ग्रुप का हिस्सा है तो आपको बढ़ावा दिया जाएगा। नेपोटिज्म इस इंडस्ट्री में है लेकिन इतना नहीं है जितना फेवरेटिज्म है। ऋतिक रोशन , वरुण धवन,  आलिया भट्ट, श्रद्धा कपूर है। इन्होनें  बकाया मेहनत भी की और एक्टिंग भी सीखी। डांस भी सीखा। फिजिक भी बनाई तभी एक पूर्ण पैकेज बनकर आए।
 
मेरा कहना है अगर आप मुंबई जा रहे तो आपका सबसे पहले एक बहुत अच्छा पैसों  का बैकअप भी होना चाहिए कि आप दो से पांच साल आप वहां सरवाईव कर सकें तो ही आप जाएं वर्ना मत जाइए क्योंकि एक फिल्म में चयन होने से लेकर रिलीज होने तक छह महीने तक या साल भर तक लग जाते हैं और ऐसा तो नहीं है कि आपको  जाने से काम मिल जाए। दूसरी बात आपको एक उचित ट्रेनिंग लेकर जाना चाहिए। एक फुल ऐसा पैकेज होना चाहिए कि आपको कोई रिजेक्ट ना कर सके। इसके अलावा अगर आप ये सोचते हैं कि फेसबुक या इन्ट्राग्राम पर हजार लाइक आ चुके हैं और आपको एक्टिंग  फिल्म में जाकर काम करना है तो मेरी सलाह रहेगी आप न जाएँ।
 
 
आज का जो युवा है वो थियेटर को छोड़कर सिनेमा की तरफ अपना रूख करना चाहता है तो इस बात से आप कहां तक इत्तेफाक करते हैं ?
 
मध्य प्रदेश में मध्य प्रदेश स्कूल ऑफ ड्रामा है दिल्ली में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा भी है। और भोपाल में ही देखिए कितने अच्छे थिएटर है, आप देखिए कि एनएसडी से जितने भी पास आउट हैं। आप उनको देख लें, उनके भीतर स्टेबलेटी है। नसीरुद्दीन शाह, अनुपम खेर, मनोज वाजपेयी, ये सब क्या है ? एनएसडी से पासआउट है आज भी वो सरवाइव क्यों कर रहे हैं ? आपको एक्टिंग फिल्म में आने से पहले एक उचित ट्रेनिंग लेनी पड़ेगी। आप सिर्फ देखने में खूबसूरत हैं इसलिए बॉलीवुड में चले जाएंगे मुझे नहीं लगता कि ये बहुत किस्मत की बात है,  करोड़ों लोगों  में से कुछ लोगों  को मौके से ऐसा अवसर मिलता है। 
 
रंगमंच इस क्षेत्र में सफलता के लिए बेहद जरूरी है लेकिन आम आदमी इतना रूचि नहीं  लेता। अब भोपाल के भीतर ही देखें टिकट लेकर देखने की प्रथा बिल्कुल भी खत्म हो गई है। इससे आप कितना इत्तेफाक रखते हैं ?
 
मैं इस बात से सौ प्रतिशत इत्तेफाक़ रखता हूँ। बॉलीवुड में आज जो लोग हैं और मुंबई में लोग आज जितने भी बड़े - बड़े कलाकार हैं वो बीच- बीच में जाकर थियेटर करते हैं। वो समझते हैं कि थियेटर एक ऐसा समंदर है,  इसमें जितना तैरते हैं,  उतना सीखते हैं। लोग आज इतने प्रैक्टिकल हो गए हैं कि उन्हें आज रेडी टू ईट चाहिए वो उस चीज को देखना चाहते हैं कि उन्होंने कितने महीने तक तैयारी की । लोग आज मनी माइंडेड हो रहे हैं। 
 
रंगमंच को मेनस्ट्रीम में लाने के लिए सरकार की कोशिशों को किस तरह से आप देखते हैं? क्या करना चाहिए ?
 
थियेटर को घर- घर तक पहुँचाना चाहिए क्योंकि कई थियेटर कलाकारों को स्थिति बेहद दयनीय है। सरकार को थियेटर को दुनिया के नक़्शे पर पहुँचाने के लिए मीडिया के माध्यमों का उपयोग करना चाहिए।
 
 मध्य प्रदेश में फिल्म निर्माण  की संभावनाओं  को आप किस तरह से देखते हैं?
 
खूबसूरत लोकेशंस के अलावा सुविधाजनक स्थल होने की वजह से डायरेक्टर्स फिल्म की शूटिंग के लिए मध्य प्रदेश आ रहे हैं। फिल्म निर्माताओं को शूटिंग की अच्छी लोकेशन यहां आसानी से मिल जाती है, साथ ही मध्य प्रदेश सरकार फिल्म के अनुकुल बुनियादी ढांचा स्‍थापित करने के उसे प्रोत्‍साहन भी दे रही है। यहाँ पर शूटिंग के लिए परमिशन और एनओसी मिलना भी अन्य राज्यों की अपेक्षा आसान है। मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों में लगातार हो रही शूटिंग के चलते ही हाल ही में 68 वें  राष्ट्रीय फिल्म में  मध्य प्रदेश ने 13 राज्यों को पीछे छोड़ते हुए दूसरी बार मोस्ट फ्रेंडली स्टेट का दर्जा पाया है।
 
पूरे देश में फिल्मों के निर्माण के लिए मध्य प्रदेश सब्सिडी सबसे अच्छी दे रहा है। मध्य प्रदेश सरकार फिल्म निर्माण के क्षेत्र को बढ़ावा देना के लिए निरंतर प्रयास कर रही है। यही वजह है कि लोग लगातार यहाँ आकर शूट कर रहे हैं। सरकार को छोटे प्रोडूयूसर को भी सब्सिडी में सहायता देनी चाहिए।
 
कोरोना के बाद देखें तो ओटीटी प्लेटफॉर्म में कंटेंट की बाढ़ सी आ गई है। क्या आपको लगता है कि आने वाले समय में ओटीटी प्लेटफार्म एक चुनौती बन सकता है?
 
पहले स्टार बिकता था। आज कंटेंट बिकता है चाहे ओटीटी हो या फिल्म।
 
आने वाले समय में आपके क्या प्रोजेक्ट हैं?  किन पर आप अभी काम कर रहे हैं ?
 
मेरे दो प्रोजेक्ट हैं जिसमें दो मेरी वेब सीरीज और फिल्म पर काम चल रहा है और बहुत जल्द ही गाना भी आएगा। मैं फरवरी या मार्च 2023 तक किसी बड़े स्टार के साथ काम करते आपको दिख सकता हूँ। अमित सोनी  इंटरटेनमेंट पूरे देश में फिल्म प्रोडक्शन का कार्य कर रही है , साथ ही भारत से बाहर विदेशों में भी नए प्रोजेक्ट प्लान कर रहे हैं , इससे पहले हमने मलेशिया भी सॉन्ग शूट किया था " तू जो मिला खुदा मिला "जो गाना जी म्यूजिक से लॉन्च हुआ था ,
 
अभी तक आपने जो भी किरदार निभाए हैं उसे पूरी तरह से जीने की कोशिश की चाहे  आपने जो भी किया। ऐसा कोई किरदार जो आपको बहुत भाता हो ?
 

मिस्टर तनेजा का निभाया किरदार मुझे बहुत अच्छा लगता है। तनेजा के किरदार से मुझे पहचान मिली। मेरे पन्द्रह दिन के रोल को उन्होंने 11 महीने दिए।
 
एक कलाकार के जीवन में उतार और चढ़ाव तो आते रहते हैं। कभी ऐसा कोई लगा हो जिससे आपको नकारात्मक लगा हो?
 
जब आप किसी किरदार को निभाते हैं तो कमेंट तो पढ़ते हैं।
 
 अभी तक आपको जो सम्मान मिला है उसके बाद आपकी चुनौतियाँ और जिम्मेदारी बढ़ जाती है कुछ नया करने की?
 
अभी तक जो कुछ भी मिला है उसके लिए मैं भगवान का शुक्रगुजार करता हूँ। 'शुद्धि ' फिल्म को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 13 अवार्ड मिले। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नॉमिनेट होना गर्व की बात है। जो मिलना अभी बाकी है उस पर मेरा फोकस है। लाइफटाइम एचिवेमेंट अभी तक नहीं मिला है इसलिए अभी  मेरी दौड़ जारी है।
 
आज के युवा जो इस क्षेत्र में आना चाहते हैं उनके लिए क्या सन्देश देना चाहते हैं आप ?
 
फ्लाइट उड़ानी है तो आपको पायलट की ट्रेनिंग लेनी होगी। इसी तरह फिल्म में करियर बनाने के लिए फुल पैकेज बनना होगा।

Friday, 4 November 2022

उत्तराखंड का लोक पर्व इगास ( बूढ़ी दिवाली)

    


    इगास का अर्थ है एकादशी। गढ़वाली में एकादशी को इगास कहा जाता है। दिवाली के 11 दिन बाद आने वाली शुक्ल एकादशी को गढ़वाल में इगास का उत्सव होता है।  कुमाऊं में देवोत्थान एकादशी को बलदी  एकादशी भी कहा जाता है। कार्तिक माह की एकादशी  का  बड़ा   महत्व  रहा है। 

 देवउठनी एकादशी के दिन से विष्णु भगवान  देवलोक की कमान सँभालते हैं और इसी दिन से सभी  शुभ मांगलिक कार्य भी आरंभ हो जाते हैं।  इस दिन का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि भगवान विष्णु चार महीने की लंबी नींद से जागते हैं और फिर भक्तों की प्रार्थना सुनते हैं। इसी के साथ इस दिन से विवाह, गृह प्रवेश, उपनयन संस्कार के सभी मुहूर्त शुरू हो जाते हैं। इस खास मौके पर भगवान शालिग्राम का तुलसी माता से विवाह करने की परंपरा है। 

 पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि भगवान राम के 14 वर्ष के वनवास से अयोध्या लौटने की खबर गढ़वाल में 11 दिन बाद मिली इसी कारण से गढ़वाल में दिवाली 11 दिन बाद मनाई गई। वैसे कहा जाता है कि गढ़वाल में चार बग्वाल दिवाली होती है। पहली कार्तिक माह में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी फिर अमावस्या वाली बड़ी दिवाली जो पूरा देश मनाता है। इस दिवाली के 11 दिन बाद आती है इगास बग्वाल और चौथी बग्वाल बड़ी दिवाली के एक महीने बाद वाली अमावस्या को मनाते हैं। चौथी बग्वाल जौनपुर प्रतापनगर, रंवाई जैसे इलाकों में मनाई जाती है। कहा जाता है कि इस क्षेत्र में भगवान राम जी के अयोध्या पहुंचने की खबर एक महीने बाद पहुंची इसलिए  यहाँ पर भी दिवाली एक महीने बाद मनाई गई।

  

गढ़वाल एक वीर माधो सिंह भंडारी टिहरी के राजा महीपति शाह की सेना के सेनापति थे।  करीब 400  बरस पहले राजा ने माधो सिंह को सेना लेकर तिब्बत  की सेना से युद्ध  लड़ने के लिए भेजा।  इसी बीच  दिवाली का भी त्यौहार था लेकिन इस त्यौहार पर कोई भी सैनिक अपने घर नहीं लौट सका।  सबने सोचा माधो सिंह और उनकी सेना के सभी सिपाही युद्ध में शहीद हो गए लेकिन दिवाली  के ठीक  11  दिन बाद माधो सिंह अपने सैनिकों के साथ सकुशल तिब्बत से द्वायाघाट  युद्ध जीतकर वापस लौट आये  जिसकी जीत की ख़ुशी में लोगों ने अपने घरों में दिए जलाये और विशेष पकवान बनाये  और तभी से यह परंपरा चल पड़ी।  उस दिन एकादशी तिथि थी जिसे इगास नाम दिया गया और ख़ुशी में सभी थिरकने लगे।  

एक  अन्य  मान्यता  के अनुसार  जब पांडव  हिमालय में थे तो भीम का  असुर के साथ  युद्ध चल रहा था और जब भीम असुर का वध कर सकुशल लौटे तो गांव में इसी इगास  के दिन दिए  जलाकर लोग खुशियां मनाने लगे। इगास  बूढ़ी  दिवाली  में  कुछ विशिष्ट परंपराएं भी साथ साथ चलती हैं। इगास में घर आंगन की लिपाई और पुताई होती है। साथ ही घर के गौवंश की पूजा सेवा भी विशिष्ट रूप से होती है। इस दिन सुबह ही गाय बैलों के सींग पर तेल लगाया जाता है और तिलक लगाकर गले में माला डालकर पूजा जाता है। साथ ही पींडू (चावल, झंगोरे, मंडुआ से बना गौवंश का पौष्टिक आहार) दिया जाता है। गढ़वाल के पारंपरिक व्यंजन पूरी, भूड़े (उड़द दाल की पकौड़े), स्वाले(दाल से भरी कचौड़ी) तो बनते ही हैं साथ ही जो बच्चे इन गाय बैलों को चराकर या सेवा करके लाते हैं उन्हें भेंट स्वरूप मालू के पत्ते पर पूरी, पकौड़ी और हलवा दिया जाता है जिसे ग्वालढिंडी कहा जाता है।साथ ही मोटी रस्सी भी खींची जाती है। इस परंपरा में  रस्सी को समुद्र मंथन में वासुकी नाग की तरह समझा जाता है।

गढ़वाल  अंचल में लोग भैलो खेलकर अपना उत्साह दिखाते हैं। भैलो को अंध्या भी कहा जाता है जिसका अर्थ अंधेरे को दूर करने वाला होता है।  भैलो जंगली बेल की बनी रस्सी होती हैं जिसके एक छोर पर छोटी छोटी लकड़ियों का छोटा गट्ठर होता है यह लकड़ी चीड़ देवदार या भीमल के पेड़ की छाल होती हैं जो ज्वलनशील होती हैं। इसे दली या छिल्ला कहा जाता है। इगास के दिन लोग सामूहिक रूप से मिलकर भैलो जलाते हैं। लोग अपने को राम की सेना  मानते हैं और सामने पहाड़ी के लोग जो अपना भैलो जलाते हैं उन्हें रावण की सेना कहकर व्यंग्य करते हुए नृत्य गान भी करते हैं। 

उत्‍तराखंड के जौनसार में देश की दीपावली के एक माह बाद पांच दिवसीय बूढ़ी दीवाली मनाने का रिवाज है। हालांकि बावर व जौनसार की कुछ खतों में नई दीपावली मनाने का चलन शुरू हो गया है, लेकिन यहां पर भी  बूढ़ी दीवाली को मनाने का तरीका अनोखा था ।कुमाऊं में भी  बूढ़ी दिवाली अरसे  से मनाई  जाती है।  जनश्रुतियों के अनुसार हरिबोधिनी एकादशी के मौके पर तुलसी विवाह किया जाता है।  कूर्मांचल पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है। सनातन धर्म में तुलसी विवाह का विशेष महत्व माना गया है। तुलसी विवाह के दिन माता तुलसी और भगवान शालिग्राम की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और उनके वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि आती है। साथ ही पति-पत्नी के बीच उत्पन्न होने वाली समस्याएं भी दूर हो जाती हैं। इस मौके पर लोग अपने घरों में  रात में दिए जलाते हैं और पूजा पाठकर सुख और समृद्धि की कामना  करते हैं।  

 हरबोधनी एकादशी को कुमाऊँनी लोग बूढ़ी दीपावली के रूप में मनाते हैं। घर-घर में पुनः दीपावली मनाई जाती है।इस दिन कुमाऊँनी महिलाऐं गेरू मिट्टी से लीपे सूप में और घर के बाहर आंगन में गीले बिस्वार द्वारा लक्ष्मी नारायण एवं भुइयां (घुइयां) की आकृतियां चित्रित करती हैं। सूप के अंदर की ओर लक्ष्मी नारायण व तुलसी का पौधा तथा पीछे की ओर सूप में भुइयां ( यानि दुष्टता, इसकी आकृति वीभत्स रूप में होती है) को बनते हैं।


 गृहणियां दूसरे दिन ब्रह्म मुहूरत में इस सूप पर खील, बतासे, चुडे़ और अखरोट रखकर गन्ने से उसे पीटते हुए घर के कोने कोने से उसे इस प्रकार बाहर ले जाती हैं जैसे भुइयां को फटकारते हुए घर से निकाल रही हों।इस सब का तात्पर्य है कि लक्ष्मी नारायण का स्वागत करते हुए घर से दुष्टता, दरिद्रता तथा अमानवीयता आदि का अन्त हो और घर में सदैव सुख, शान्ति एवं सात्विकता का वास हो।"आ हो लक्ष्मी बैठ नरैणा,निकल भुईंया निकल भुईयां "उच्चारण करते हुए रात्रि के अन्तिम पहर में भुईंया महिलाओं द्वारा निकाला जाता है।  लोग अपने खेती से जुड़े  औजारों  को हल, सूप, मोसल को गेरुवा के उपर चावल के विस्वार से डिज़ाइन बना कर रखते  हैं और शाम को पूवे - पूरी व पांच पकवान बना कर खिल बतासे ले कर ओखल पर हल लगा कर पूजा की जाती है।

 कुमाऊं में बैलों के माथे पर फुन लगाने की परम्परा  भी लम्बे समय से चली आ रही है। पहाड़ के बुजुर्ग लोग बताते हैं पहले के दौर में लोग खेती के काम आने वाले अपने बैलों की इस ख़ास अवसर पर पूजा करते थे और उनको रोली, चन्दन और टीका लगाकार पूजते थे।  इसके  बाद  इनके सींगों पर  सरसों का तेल लगाकर रंग बिरंगी फुन  बांधते थे।  साथ ही प्रात में अपने अपने बैलों के लिए विशेष तरह के पकवान बनाकर खिलाया करते थे लेकिन आज के  स्मार्ट फ़ोन और व्हाट्सएप  विश्वविद्यालय के दौर में यह परंपरा सिर्फ रस्म  भर  रह गई  है।  पहाड़ों से लोगों का पलायन जहाँ हो रहा है वहीँ खेती जंगली जानवरों की भेंट चढ़ती जा रही  है।  गाँव के गाँव खाली होते जा रहे हैं और पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आती। यहां की नई पीढ़ी अपने गावों से लगातार कटती जा रही है।  

आज पहाड़  में लोगों ने जहां खेती-बाड़ी छोड़ दी है, वहीं पशुपालन घाटे का सौदा बन गया है, क्योंकि वन संपदा लगातार सिकुड़ती जा रही है।  उत्तराखंड में रोजी रोटी की जटिलता, संघर्ष और रोजगार के समुचित अवसर न होने के चलते पलायन को बढ़ावा मिला है। राज्य के पर्वतीय  ग्रामीण क्षेत्रों में ढाई लाख से ज्यादा घरों पर ताले लटके हैं। खासकर पर्वतीय क्षेत्रों के गांवों में रहने वाली रौनक कहीं गुम हो चली है। गांव वीरान हो रहे हैं तो खेत-खलिहान बंजर में तब्दील हो गए हैं। बावजूद इसके गांव अब तक की सरकारों के एजेंडे का हिस्सा नहीं बन पाए हैं। यदि बनते तो शायद आज पलायन की भयावह  ऐसी तस्वीर नहीं होती।  पलायन और आधुनिकता की चकाचौंध  के चलते भले ही  पारंपरिक इगास दिखना थोड़ा कम हो गया है लेकिन आज बहुत सी संस्थाएं पहाड़ ही नहीं मैदानी क्षेत्रों में भी इगास का आयोजन करती  हैं जहां उत्तराखंडी व्यंजन के साथ भैलो खेल का भी आयोजन किया जाता है।

भाजपा के राज्य सभा सांसद अनिल बलूनी अपने नवाचारों के कारण जाने जाते रहे हैं।  वह पहाड़ की परम्पराओं को पुनर्जीवित करने की दिशा में  हर संभव कोशिशें करते रहे हैं।  पिछले कुछ बरस में अगर इगास ( बूढ़ी  दिवाली) के रूप में लोकप्रिय हुआ है तो इसमें उनकी बड़ी भूमिका को नहीं नकारा जा सकता।  उन्होनें मेरा वोट मेरे गाँव और  अपने गाँव मनाये इगास  कार्यक्रमों के माध्यम से प्रवासी उत्तराखंडियों को देश और दुनिया तक जोड़ने में सफलता पाई है।  आज उन्हीं के प्रयासों से पहाड़ में इस तरह की परम्परा जीवित है।  नई  पीढ़ी में उत्तराखंड  के  लोक पर्व  इगास ( बूढ़ी  दिवाली) को लेकर  अब उत्सुकता नजर आ रही  है। उत्तराखंड सरकार ने भी पिछले वर्ष से इस अवसर पर राजकीय अवकाश देना शुरू किया है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।  अभी तक दूसरे राज्यों के त्योहारों पर यहाँ अवकाश दिया जाता था  जिससे  अपने त्यौहार ग्लोबल स्वरुप ग्रहण नहीं कर पाते थे।  उम्मीद है इस साल से  पहाड़ी इगास  देश और दुनिया में अपनी चमक बिखेरेगी।   


Monday, 31 October 2022

देश का दिल 'मध्य प्रदेश ' बन रहा फिल्म निर्माताओं की पहली पसंद

 



मध्य प्रदेश 1 नवंबर को अपना 67वां स्थापना दिवस मानने जा रहा है। कभी पिछड़ा और बीमारू कहा जाने वाला मध्यप्रदेश आज विकास की राह पर तेजी से बढ़ रहे राज्यों की श्रेणी में अग्रणी है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में प्रदेश ने विकास की नई संभावानाएं तलाशने के साथ ही उपलब्धियों के कई आयाम भी गढ़े हैं। आज प्रदेश की पहचान फिल्म उद्योग के लिए अपार अवसरों के रूप में हुई है। मध्यप्रदेश में फिल्म उद्योग को बढ़ावा देने के लिए बनाई गई फिल्म नीति के परिणाम अब सामने आने लगे हैं। प्रदेश में मिल रही बेहतर सुविधाओं के कारण आज फिल्म निर्माताओं का रुझान मध्यप्रदेश की तरफ बढ़ा है। फिल्मांकन के लिए आवश्यक अनुमतियां प्राप्त करने में अब किसी के आगे चक्कर नहीं लगाने पड़ते हैं। एक ही प्लेटफार्म पर सभी अनुमतियां आसानी से मिल जाती हैं। पिछले कुछ समय से मध्यप्रदेश में फिल्मों की शूटिंग की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। शिवराज सरकार प्रदेश में फिल्म उद्योग को लगातार प्रोत्साहित कर रही है।


फिल्म निर्माताओं को आकर्षित कर रहा देश का दिल 

शूटिंग के लिए खास एवं बेहद खूबसूरत लोकेशंस के अलावा सुविधाजनक स्थल होने की वजह से डायरेक्टर्स मध्यप्रदेश खिंचे चले आते हैं। फिल्म निर्माताओं को शूटिंग की अच्छी लोकेशन यहां आसानी से मिल जाती हैं, साथ ही मध्यप्रदेश सरकार फिल्म के अनुकूल बुनियादी ढांचा स्थापित करने के साथ- साथ उसे प्रोत्साहन भी दे रही है। यहाँ शूटिंग के लिए परमिशन और एनओसी मिलना भी अन्य राज्यों की अपेक्षा आसान है। मध्यप्रदेश सरकर ने 2016 में पर्यटन बोर्ड का गठन किया और 2019 में फिल्म के लिए अपनी पॉलिसी जारी की। वर्तमान में यह देश का ऐसा राज्य है, जो शूटिंग के लिए 5 श्रेणियों में सब्सिडी दे रहा है। प्रदेश में फिल्म निर्माण की गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए फिल्म पर्यटन नीति 2020 लागू की गई है। इसमें फिल्मांकन की अनुमति अलग-अलग कार्यालयों की जगह एक स्थान से दिए जाने की व्यवस्था बनाई गई है। अंतरराष्ट्रीय फिल्म, टीवी सीरियल या वेब सीरीज के लिए अधिकतम 10 करोड़ रुपये तक अनुदान देने का प्रविधान किया गया है। वहीं, राष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए 25 प्रतिशत या दो करोड़ रुपये, टीवी सीरियल अथवा वेब सीरीज के लिए 25 प्रतिशत या एक करोड़ रुपये तक अनुदान देने की व्यवस्था है। इसी तरह डाक्यूमेंट्री के लिए अधिकतम 40 लाख रुपये का अनुदान दिया जा रहा है। राज्य के स्थानीय कलाकारों को फिल्म निर्माण में लेने पर 25 लाख रुपये अतिरिक्त देने का प्रविधान है। फिल्म से संबंधित अधोसंरचना विकास पर 30 प्रतिशत तक अनुदान के साथ फिल्म से जुड़े अमले के लिए पर्यटन विभाग के होटल और रिसार्ट में ठहरने पर 40 प्रतिशत छूट दी जाती है। प्रदेश में फिल्म उद्योग के विकास के लिए फिल्म सिटी, फिल्म स्टूडियो, कौशल विकास केंद्र आदि स्थापित करने निजी निवेश को प्रोत्साहन और भूमि देने का प्रावधान भी नीति में किया गया है। फिल्म सिटी के निर्माण के लिए विभिन्न जिलों में भूमि भी आरक्षित की जा रही है। अभी तक प्रदेश में 100  से ज्यादा फिल्म, सीरियल और वेब सीरीज की शूटिंग हो चुकी है।

दूसरी बार मोस्ट फ्रेंडली स्टेट 

मध्यप्रदेश में बुनियादी ढाँचा तैयार कर फिल्म निर्माताओं को यहाँ निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे प्रदेश को देश और दुनिया में नई पहचान मिल रही है। राज्य सरकार ने फिल्म पर्यटन नीति लागू कर अपनी प्रतिबद्धता को दिखा दिया है। हाल के वर्षों में सरकार द्वारा शूटिंग की अनुमति को आसान बनाया गया है, जिससे प्रदेश में फिल्म निर्माताओं की रूचि बढ़ी है। राज्य सरकार फिल्मों को प्रोत्साहन दे रही है, जिसके अन्तर्गत थीम पार्क और सेल्फी पॉइंट भी बनाये जा रहे हैं। मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में लगातार हो रही शूटिंग के चलते ही हाल ही में 68 वें राष्ट्रीय फिल्म में मध्यप्रदेश ने 13  राज्यों को पीछे छोड़ते हुए को दूसरी बार मोस्ट फ्रेंडली स्टेट का दर्जा पाया। इसका कारण यहाँ की बेस्ट लोकेशन और सरकार से मिलने वाली सब्सिडी और शूटिंग के लिए सिंगल विंडो परमिशन है।

 

मुख्यमंत्री शिवराज की अपील का  हुआ बड़ा असर

मध्य प्रदेश को मोस्ट फिल्म फ्रेंडली स्टेट पुरस्कार दिए जाने की घोषणा पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के नागरिकों, पर्यटन विभाग के अधिकारियों एवं फिल्म उद्योग से जुड़े सभी साथियों को बधाई दी साथ ही उन्होंने सभी पर्यटकों को प्राकृतिक और ऐतिहासिक धरोहरों के सौंदर्य से समृद्ध मध्यप्रदेश आने के लिए आमंत्रित किया, जिसके बाद से प्रदेश में फिल्म निर्माण की कोशिशें परवान चढ़ने लगी। राजधानी भोपाल में बड़ा तालाब, वन विहार, भारत भवन, गौहर महल, पुरानी विधानसभा, कमला पार्क, किलोल पार्क जैसी लोकेशन फिल्म निर्माताओं को निःशुल्क उपलब्ध करवाई  जा रही हैं।  


कई फिल्में हो चुकी हैं शूट

मध्यप्रदेश लम्बे समय से फिल्म निर्माण के लिए पसंदीदा जगहों में शामिल रहा है। नया दौर, दिल दिया दर्द लिया, चम्बल की कसम जैसी  कई फिल्में मध्यप्रदेश में शूट हुईं,  जिनके शूट नरसिंहगढ़, मांडवगढ़, शिवपुरी में फिल्माए गए। राजनीति, प्यार किया तो डरना क्या, तेवर, पान सिंह तोमर,दबंग, पंचायत- 2 वेब सिरीज, सूरमा भोपाली, पीपली लाइव, चक्रव्यूह, गंगाजल 2 जैसी कई फिल्मों की शूटिंग मध्य प्रदेश में हुई है। मध्यप्रदेश न केवल फिल्मों बल्कि अब वेब सीरीज की शूटिंग के लिए भी निर्माताओं की पहली पसंद बनता जा रहा है।  अब तक कई फिल्में प्रदेश की खूबसूरत लोकेशंस में शूट हो चुकी हैं। हाल ही में रघुबीर यादव की हरी ओम की शूटिंग पूरी हुई है। फिल्म के सभी शूट भोपाल में ही किये गए हैं। विगत वर्षों में सिंह साहब द  ग्रेट, पंगा, जैसी कई फिल्मों के दृश्य  भोपाल और इंदौर में फिल्माए गए।  अशोका, यमला पगला दीवाना, दबंग 2 जैसी फिल्मों के दृश्य नर्मदा और महेश्वर की खूबसूरत लोकेशंस पर फिल्माए गए।  चंदेरी में स्त्री मूवी, ग्वालियर में लुकाछुपी सभी को मध्यप्रदेश में फिल्म बनाने के लिए लुभा रही है।  बीते कुछ वर्षों में फिल्मों के साथ ही अनेकों वेब सीरीज भी प्रदेश में शूट हुई है जिनमें गुल्लक, आश्रम 3, पंचायत, शिक्षा मंडल के  शूट भोपाल में ही शूट हुए।  राजश्री प्रोडक्शन की एक विवाह ऐसा भी, गली गली में चोर है, राजनीति, आरक्षण, सत्याग्रह, गंगाजल, क्रेजी नुक्कड़ सरीखी कई दर्जन फिल्में भोपाल, पचमढ़ी, होशंगाबाद के आसपास शूट हुई।  

 

2022 में भी कई फिल्म निर्माताओं के किया प्रदेश का रुख

 इस साल प्रदेश में राजकुमार संतोषी के निर्देशन में गांधी वर्सेज गोडसे को शूट किया गया। वहीं, नवाजुद्दीन और अवनीत कौर की फिल्म टिक्कू वेड्स शेरू, गौहर खान की वेब सीरीज शिक्षा मंडल, हुमा कुरैशी की वेब सीरीज महारानी 2, अक्षय कुमार और इमरान की फिल्म सेल्फी,  भोपाल और उसके आसपास के इलाकों में हुई।  नवम्बर  में बुलबुल मैरिज हाल, रहे इश्क़ की शूटिंग शुरू होगी, जिनमें दिवाली के बाद कई बड़े सितारे आने हैं। जिनमें पुलकित सम्राट से लेकर अली फजल, उर्मिला मतोड़कर से लेकर कृति खरबंदा के नाम शामिल हैं। बड़े बजट की कई फिल्में आने वाले वर्षों में बॉलीवुड में आने वाली हैं जिनकी शूटिंग मध्यप्रदेश की विभिन्न लोकेशनों पर होगी।  प्रतीक गांधी और ऋचा चड्डा की वेब सीरीज ग्रेट इंडियन मर्डर 2 की शूटिंग भी यहाँ  प्रस्तावित है। मध्यप्रदेश में 2022 के अंत तक दर्जन भर से अधिक फिल्में और वेब  सीरीज की शूटिंग पूर्ण होगी।  


मप्र पर्यटन विभाग और  फिल्म निर्माताओं के बीच हुआ एमओयू

मध्य प्रदेश में जल्द ही बड़े बजट की मेगा स्टार फिल्मों की शूटिंग भी होगी। इसके लिए मप्र पर्यटन विभाग और प्रसिद्ध फिल्म निर्माताओं के बीच एमओयू हुआ है। इससे बड़े बजट और मेगास्टार फिल्मों की शूटिंग प्रदेश में होगी, साथ ही फिल्म पर्यटन से प्रदेश में रोजगार की संभावनाएं बढ़ेगी।

 एमओयू के अनुसार फिल्म निर्माताओं को प्रदेश के विभिन्न पर्यटन स्थलों की अनुमति, समन्वय हेतु सिंगल विंडो सुविधा एवं म.प्र. पर्यटन इकाई में फिल्म के क्रू के लिए आकर्षक डिस्काउंट मिलेगा। फिल्म निर्माताओं द्वारा लगभग 50 करोड़ का निवेश आने वाले 5 वर्षों में किया जाएगा, जिसमें फिल्म, वेब सीरीज, डाक्यूमेंट्री आदि सम्मिलित हैं। शिवराज सरकार की ये कोशिशें अगर परवान चढ़ी तो आने वाले दिनों में यहां एक बड़ी फिल्म सिटी भी प्रदेश में नया आकार ले सकती है।  

Sunday, 16 October 2022

मप्र में हिन्दी माध्यम में पढ़ाई, मुख्यमंत्री शिवराज की सराहनीय पहल




हिन्दी दुनिया की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल अन्य इक्कीस भाषाओं के साथ हिन्दी का एक विशेष स्थान है। मातृभाषा के  रूप में  हिन्दी को आगे बढ़ाने की दिशा में  किसी राज्य  ने अपने कदम तेजी से बढ़ाये हैं  तो वह है देश का हृदयस्थल कहा जाने वाला  मध्य प्रदेश। इसका श्रेय  सूबे के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को जाता है जो लगातार  हिन्दी  भाषा को बढ़ावा देने के लिए काम कर  रहे हैं। उनके नेतृत्व में प्रदेश में  हिन्दी भाषा  रफ़्तार के साथ आगे बढ़ रही है।

 नई शिक्षा नीति के आने से पहले मध्यप्रदेश में अटल बिहारी वाजपेयी  हिन्दी विश्वविद्यालय भोपाल ने हिन्दी में इंजीनियरिंग और चिकित्सा शिक्षा शुरू करने की घोषणा की थी।  विश्वविद्यालय ने तीन भाषाओं में जहां  इंजीनियरिंग की शुरुआत की, वहीं एमबीबीएस पाठ्यक्रम हिंदी में शुरू करने की दिशा में भी कदम बढ़ाये, हालांकि तत्कालीन  समय में भारतीय चिकित्सा परिषद से इसकी अनुमति नहीं मिली थी। विश्वविद्यालय द्वारा छोटे स्तर पर हुई पहल मध्यप्रदेश सरकार की नई शिक्षा नीति के तहत की गई पहल के चलते रंग लाई।  मध्य प्रदेश  में अब इंजीनियर बनने में  भाषा  राह में रुकावट नहीं बनेगी। प्रदेश में मेडिकल के साथ ही इंजीनियरिंग, नर्सिंग और पैरामेडिकल की पढ़ाई भी  हिन्दी  में कराई जाएगी।  हिन्दी  के प्रयोग से जहाँ  इंजीनियरिंग, मेडिकल  की पढ़ाई  का दायरा बढ़ेगा वहीँ समाज के हर वर्ग के प्रतिभाशाली युवा तकनीकी पढ़ाई के लिए आगे आएंगे।  इससे पठन - पाठन का  स्तर  जहाँ सुधरेगा वहीँ शोध की गुणवत्ता और स्तर में भी सुधार होगा।

 मध्य प्रदेश देश का ऐसा पहला राज्य है जहां एमबीबीएस की पढ़ाई भी अब हिन्दी में होगी।  प्रदेश के सभी 13 सरकारी मेडिकल कालेजों में मौजूदा सत्र से ही एमबीबीएस प्रथम वर्ष में एनाटामी, फिजियोलाजी और बायोकेमेस्ट्री की पढ़ाई कराई जाएगी। अगले सत्र से एमबीबीएस द्वितीय वर्ष में भी इसे लागू किया जाएगा। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह 16 अक्टूबर को  राजधानी भोपाल में एमबीबीएस के हिन्दी पाठ्यक्रम की शुरूआत करेंगे।  भोपाल के लाल परेड ग्राउण्ड में  एम.बी.बी.एस. के पहले वर्ष की हिन्दी पुस्तकों का विमोचन होगा।  पढ़ाई  को हिन्दी  में भी कराने के लिए पुस्तकें भी अंग्रेजी से अनुवाद कर हिन्दी में तैयार की गई हैं।  पठन सामग्री  इस तरह से तैयार की गई, जो छात्र -छात्रों  को आसानी से समझ में आ जाएं।  इस कार्यक्रम में सभी कालेजों के एमबीबीएस प्रथम वर्ष  में अध्ययनरत सभी छात्र छात्राओं   को बुलाया जा रहा है।इंजीनियरिंग, चिकित्सा विज्ञान की पुस्तकों में अंग्रेजी  भाषा की  कठिन शब्दावली के होने से  हिन्दी माध्यम  में पढ़ने वाले ग्रामीण छात्र छात्राओं को कठिनाई होती है। अब  इंजीनियरिंग और एमबीबीएस पाठ्यक्रम शुरू होने से गरीब एवं मध्यम वर्ग के  हिन्दी माध्यम में पढ़ने वाले छात्र छात्राओं के लिये पढ़ाई  आसान होगी ।  मध्य प्रदेश सरकार का हिन्दी  भाषा को  बढ़ावा देने की दिशा में उठाया गया यह कदम  सराहनीय  है।
 
 मध्य प्रदेश  की धार्मिक नगरी उज्जैन में नवनिर्मित श्री महाकाल लोक में खूबसूरत स्थानों  को हिन्दी  के माध्यम से नई पहचान मिल रही है।  हिन्दी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यहाँ सभी नाम  हिन्दी  में रखे गए हैं।   सभी स्थानों के अंग्रेजी नाम अब हटाए जा चुके हैं। विजिटर फेसिलिटी सेंटर को मानसरोवर, मिड-वे ज़ोन को मध्यांचल, कमर्शियल प्लाजा को त्रिवेणी मंडपम, लोटस पॉन्ड, को कमल सरोवर, नाइट गार्डन को सांध्य वाटिका, गजिबो क्षेत्रों को त्रिपथ मंडपम व भैरव मंडपम, डेक-1 को अवंतिका और डेक-2 को कनकशृंगा नाम दिया गया है।  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले दिनों  यहाँ के अंग्रेजी नामों पर आपत्ति जताई थी , जिसके बाद  उनके निर्देशों पर ही  हिन्दी नाम रखे गए ।

 प्रधानमंत्री नरेन्द्र  मोदी का संकल्प है कि शिक्षा का माध्यम मातृ-भाषा बने ।  शिक्षा मंत्रालय ने  अपनी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाई  शुरू करने की जरूरत बताई  , जिसके बाद  मध्य प्रदेश सरकार ने मातृभाषा पर ज़ोर देते हुए हिन्दी  में पढ़ाई शुरू  करने की दिशा में अपने कदम तेजी से बढ़ाये हैं ।  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  मानते हैं  विद्यार्थी अंग्रेजी अवश्य सीखें, पर शिक्षा अंग्रेजी में ही संभव है, इस विचार से मुक्ति  मिलनी जरूरी है। हिन्दी में पढ़ाई के लिए देश में आत्म-विश्वास पैदा करना आवश्यक है।  हिन्दी  भाषा में  मेडिकल और  इंजीनियरिंग  की पढ़ाई उसी की शुरुआत है।

अनेक मौकों पर मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान ने हिन्दी  को बढ़ावा देने , खुद उपयोग करने और दूसरों को भी प्रेरित  करने की जरूरत बताई। इस साल  हिन्दी दिवस के मौके पर  मुख्यमंत्री ने हिन्दी  के प्रयोग न करने और कम प्रयोग करने के  कार्य को एक तरह की मानसिक गुलामी का प्रतीक बताया था ।  तब उन्होंने इस भाव को देश से बाहर  निकालने की जरूरत भी बताई । मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान की इस  पहल से प्रदेश के गरीब, ग्रामीण इलाकों के बच्चों ,  मध्यमवर्गी परिवारों को इसका  बड़ा लाभ मिलेगा। इससे  छात्र छात्राओं  को शिक्षा के लिए समान अवसर  भी  मिलेंगे और उनकी पढ़ाई में अब अंग्रेजी भाषा बाधा नहीं बनेगी । 

Monday, 10 October 2022

शिवराज की सोच से साकार हुई भव्य महाकाल लोक की परिकल्पना

 



 धर्म देश की प्राणवायु है और आस्था इस महान देश की आत्मा। भारतीय संस्कृति अगर आज जीवंत बनी है तो इसके पीछे हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक परम्पराएं हैं।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी भारत को दुनिया के मानचित्र पर नई पहचान मिल रही है। उनके कुशल नेतृत्व में हमारे देश के कई वर्षों की समृद्ध विरासत को न केवल संजोने का प्रयास किया जा रहा है बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों को पुनर्स्थापित  करने का भी बेहतर प्रयास किया जा रहा है। दिव्य महाकाल लोक देश की सनातन संस्कृति की पौराणिकता, ऐतिहासिकता और गौरवशाली परम्परा का अद्भुत संगम है। इसका निर्माण जिस भव्यता और सुंदरता  के साथ नए रुप में किया गया है, वह आमजन को आज चमत्कृत कर देता है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रथम चरण के इसके निर्माण कार्य को समय से पहले पूर्ण कर अपनी आध्यात्मिक नगरी और विकासवादी सोच की अवधारणा को मजबूत किया है।

 

 महाकाल ने लिया नया आकार

 शिवराज सिंह चौहान देश के उन चुनिंदा राजनेताओं में से एक हैं जो हर कदम पर  जनता से साथ निभाने का वादा करते हैं, तो निभाते भी हैं और हर कदम पर जनता के  साथ खड़े दिखाई देते हैं। क्षिप्रा के तट पर बसी प्राचीनतम नगरी उज्जैन का महाकाल लोक आज उनकी कुशल नेतृत्व क्षमता और दूरदर्शी सोच को प्रस्तुत करता है जो भगवान शिव के भक्तों के स्वागत के लिए अब तैयार है। महाकवि कालिदास के महाकाव्य मेघदूत में महाकाल वन की परिकल्पना को जिस सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया था, सैकड़ों वर्षों के बाद उसके वैभव को मुख्यमंत्री शिवराज ने साकार रूप प्रदान किया है। ये दुनिया के हर कोने से उज्जैन आने वाले  भक्तों के लिए के लिए नया  अनुभव देने का अनूठा प्रयास भी है जिसके परिणाम आने वाले वर्षों में सामने आएंगे। 

महाकाल लोक की अवधारणा वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान के मन में आई थी। इस पर विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संस्थाओं, संतों और विषय-विशेषज्ञों के साथ विचार-विमर्श कर योजना तैयार की गई थी जिस पर गंभीरता से अमल करते हुए योजना का प्रथम चरण पूर्ण हुआ है।

 


 महाकाल लोक आज आधुनिक व्यवस्थाओं और संसाधनों से  पूरी तरह से सुसज्जित है। कम समय में  शिवराज सरकार ने  यहाँ पर इतनी व्यवस्थाएं की हैं जो उज्जैन आने वाले लोगों का मन मोह लेती है। मंदिरों के साथ ही पूजा सामग्री और हार-फूल की दुकानों को भी विशिष्ट तरीके से लाल पत्थर से बनाया गया है,जिन पर सुंदर नक्काशी की गई है। भगवान शिव की जिन कथाओं का महाभारत, वेदों तथा स्कंद पुराण के अवंती खंड में उल्लेख है, उनका जीवंत अनुभव अब  धर्मनगरी उज्जैन में लिया जा सकता है ।  महाकाल लोक के जरिए शिव के सभी स्वरूप एक स्थान पर लाना  मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार के सामने मुश्किल कार्य था लेकिन सरकार के अथक प्रयासों से यह काम समय में  साकार हो गया। आज महाकाल लोक के जरिये  भारतीय सांस्कृतिक विरासत दुनिया के फलक पर अपनी चमक बिखेर रही है। 

 सिंहस्थ में भी दिखी कुशल नेतृत्व क्षमता 

  2016 में उनके सफल कार्यकाल में ही उज्जैन में ऐतिहासिक सिंहस्थ महाकुम्भ सम्पन्न हुआ था। व्यवस्थाओं और संसाधनों की दृष्टि से इसे भारत का अब तक का सबसे सफलतम धार्मिक आयोजन कहा गया। एक मुखिया की दूरदृष्टि , संकल्प शक्ति और जूनून है जो किसी भी प्रयास में प्राण फूंक देती है। सिंहस्थ के आयोजन में भी मुखिया शिवराज की प्रबल संकल्प शक्ति दिखी जिसने नर्मदा को मोक्षदायिनी क्षिप्रा से जोड़कर उसे प्रवाहमान नदी बना दिया।  सिंहस्थ के उस आयोजन  में भी उन्होंने निर्माण कार्यों में पल -पल नजर रखी और योजनाओं का जमीनी क्रियान्वयन किया और खुद अपने दौरे कर जनता के बीच रहकर दिक्कतें दूर की। दूरदर्शिता दिखाते हुए पूरे इलाके की व्यवस्थाएं चाक -चौबंद की। ये  मुख्यमंत्री  शिवराज  की  कार्यकुशलता , सहजता और व्यवहार ही था जिसने सिंहस्थ जैसे महापर्व को जन -जन  से जोड़ते हुए इसे  सफल बनाया।  सिंहस्थ के सफल आयोजन के बाद से उज्जैन आने वाले भक्तों की तादात बढ़ी है वहीँ सरकार द्वारा इस खूबसूरत नगरी को संवारने के भरपूर प्रयास किये हैं।

 खूबसूरत नक्काशी दिला रही है नई पहचान

 आज यहाँ का सफर फोरलेन  के माध्यम से जहाँ सुविधाजनक हुआ है वहीँ सांस्कृतिक गौरव की नई गाथाएं पत्थरों पर लिखी गयी हैं। फूल प्रसादी काउंटर को नई पहचान दी गई हैं वहीँ दुकानों को परम्परागत लुक। महाकाल लोक में बने स्थानों के नाम  सबसे महत्वपूर्ण हैं। महाकाल लोक में खूबसूरत स्थानों की पहचान अंग्रेजी नामों के साथ हो रही थी, लेकिन अब सभी नाम हिंदी में रखे गए हैं। सभी स्थानों के अंग्रेजी नाम हटाकर उन्हें हिंदी नाम दिए हैं। विजिटर फेसिलिटी सेंटर को मानसरोवर, मिड-वे ज़ोन को मध्यांचल, कमर्शियल प्लाजा को त्रिवेणी मंडपम, लोटस पॉन्ड, को कमल सरोवर, नाइट गार्डन को सांध्य वाटिका, गजिबो क्षेत्रों को त्रिपथ मंडपम व भैरव मंडपम, डेक-1 को अवंतिका और डेक-2 को कनकशृंगा नाम दिया गया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अंग्रेजी नामों पर आपत्ति जताई थी। उनके निर्देशों पर ही हिंदी नाम रखे गए हैं। आने वाले दिनों में दूसरे चरण के कार्य पूरे होने के बाद यह देश का एक गतिशील शहर बन जाएगा। 

 खुद शिव साधक हैं शिवराज

 मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं शिव भक्त है, वे महाकाल के न केवल समय - समय पर दर्शन करते रहे हैं बल्कि शाही सवारी में कई वर्षों से शामिल होते रहे हैं।  मुख्यमंत्री उज्जैन को धार्मिक पर्यटन नगरी के प्रमुख  रूप में उभारने को लेकर शुरुआत से प्रतिबद्ध रहे हैं और इसी को ध्यान में रखते हुए  सिंहस्थ के  वर्ष 2017 में श्री महाकाल लोक की बड़ी योजना तैयार हुई। महाकाल लोक प्रोजेक्ट मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का ड्रीम प्रोजेक्ट है। यही वजह है कि मुख्यमंत्री शिवराज प्रोजेक्ट के संबंध में समय - समय अधिकारियों के साथ कई दौर की मीटिंग्स की और स्वयं भी उज्जैन में जाकर किये जा रहे कार्यों का जायजा लिया। विभिन्न मौकों पर  मुख्यमंत्री शिवराज ने बाबा महाकाल से प्रदेश की जनता की सुख  समृद्धि के लिए कामना की। 

 


महाकाल के आगे नतमस्तक शिवराज सरकार

 

प्रदेश के मुख्य शिवराज सिंह चौहान हैं, लेकिन उज्जैन पहुंचते ही वे भी सेवक बन जाते हैं। इसका एक उदाहरण धार्मिक नगरी उज्जैन में पहली बार हुई कैबिनेट की बैठक में देखने को मिला। यहां पर मुख्यमंत्री शिवराज के साथ पूरी कैबिनेट बैठी। अध्यक्षता उज्जैन के महाराजा भगवान महाकाल ने की। टेबल की मुख्य सीट पर बाबा महाकाल की तस्वीर को आसीन किया गया। आसपास सीएम शिवराज और मंत्रिमंडल के अन्य सदस्य बैठे। इस दौरान पूरी कैबिनेट नतमस्तक रही। बैठक में कैबिनेट ने शहर के विकास से जुड़ी कई योजनाओं को मंजूरी दी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कैबिनेट की बैठक के पहले खुद कहा कि महाकाल महाराज से सबके कल्याण की कामना करता हूं। महाकाल महाराज यहां के राजा हैं, हम लोग सेवक हैं। सेवक के नाते हम लोग महाकाल महाराज से प्रार्थना कर रहे हैं।

 


सोशल मीडिया भी हुआ महाकालमय

 जैसे - जैसे  महाकाल लोक के लोकार्पण का समय नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे पूरा मध्यप्रदेश महाकालमय हो रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज ने सभी से अपील की है कि वह अपने सोशल मीडिया प्रोफाइल में श्री महाकाल लोक के लोगो वाली फोटो लगाएं।  इसकी शुरुआत खुद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ट्विटर हैंडल से हुई। मुख्यमंत्री शिवराज ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर डीपी बदल ली है। उन्होंने प्रोफाइल पिक्चर पर महाकाल लोक का लोगो लगाया है। मुख्यमंत्री  शिवराज ने ट्विटर पर लोगों से अपील करते हुए लिखा कि 'पुण्य अवसर आया है, 11 अक्टूबर को हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी श्री महाकाल महाराज को अर्पित करेंगे "श्री महाकाल लोक" आइये,इस उत्सव के सहभागी बनें और अपनी सोशल मीडिया प्रोफाइल की डीपी व बैनर पर श्रद्धा भाव से श्री महाकालेश्वर की वंदना करें।  जय श्री महाकाल। '

 


मुख्यमंत्री शिवराज की अपील के बाद से ही सोशल मीडिया पर भी हजारों लोगों ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट की प्रोफाइल पिक्चर में महाकाल लोक का लोगो लगाया है। अब सोशल मीडिया पर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि सोशल मीडिया भी महाकालमय हो गया है।

 आध्यत्मिक पर्यटन में होगा इजाफा

 मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दूरदर्शी सोच का ही नतीजा है कि आज महाकाल लोक का इतना भव्य रूप सभी को आकर्षित कर रहा है। प्रदेश सरकार के इस महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट से आध्यत्मिक पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। पर्यटन बढ़ेगा तो सीधे तौर पर वहां के आम आदमी का जीवन स्तर बेहतर होगा। रोजगार में वृद्धि होगी जिससे प्रदेश की धार्मिक नगरी को विश्व के नक़्शे पर एक अलग पहचान मिलेगी।

 


 शिव के नेतृत्व में नवाचारों का गढ़ बनता प्रदेश

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में प्रदेश भर में लगातार नवाचार किये जा रहे हैं। महाकाल लोक के अद्भुत और विहंगम रूप को पूरी दुनिया के सामने लाने के लिए प्रदेश सरकार कई सारे नवाचार कर रही है। मुख्यमंत्री  चौहान ने कहा कि श्री महाकाल लोक का लोकार्पण अद्भुत समारोह होगा, इसमें जन-जन को जोड़ने के लिये प्रयास किये जा रहे हैं। पिछले कई दिनों से खुद मुख्यमंत्री  चौहान स्वयं प्रदेशवासियों को विभिन्न संचार माध्यमों से समारोह में आमंत्रित कर रहे हैं , वहीँ  उनके द्वारा यह आहवान भी किया जा रहा है कि प्रदेश के सभी मंदिरों में 11 अक्टूबर को दीप जला कर भजन-कीर्तन किये जाएँ। प्रदेश के देव स्थानों में दीपमालाएँ जला कर रोशनी की जाए। सभी जिलों के बड़े शिव मंदिरों में भजन और कीर्तन आदि हों और मंदिरों  बिजली की मालाओं की  रोशनी से जगमग किया जाए। उज्जैन के मुख्य कार्यक्रम का लाइव प्रसारण करने की व्यवस्था  की गई  है जिससे  देश और दुनिया में लोग इस ऐतिहासिक पल के  साक्षी बन सकें।

 


शिवमय होगा मध्यप्रदेश

11 अक्टूबर को पूरा मध्यप्रदेश शिवमय होने जा रहा है। अवसर होगा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रदेश की संस्कारधानी ऐतिहासिक, पौराणिक धार्मिक नगरी उज्जैन में महाकाल लोक के लोकार्पण के  साथ ही पूरे प्रदेश में गाँव-गाँव, शहर-शहर देवालयों में बड़ी संख्या में लोग एकत्रित होकर शिव भजन, पूजन, कीर्तन, अभिषेक, आरती करेंगे। शंख-ध्वनि होगी, घंटे-घड़ियाल बजाए जाएंगे। मंदिरों, नदियों के तट तथा घर-घर दीपक जलाए जाएंगे। धार्मिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे तथा भोजन-भंडारे आयोजित होंगे।कार्तिक मेला ग्राउंड उज्जैन में प्रधानमंत्री मोदी के सभा-स्थल पर शिवमय थीम पर केन्द्रित साज-सज्जा की जाएगी। साथ ही विशेष ध्वनि, प्रकाश एवं सुगंध के माध्यम से मंदिर के पवित्र वातावरण का निर्माण किया जाएगा। संतों के लिए पृथक से मंच की व्यवस्था की गई है। प्रख्यात गायक श्री कैलाश खैर द्वारा महाकाल स्तुति गान होगा।

 

उज्जैन एवं इंदौर संभाग की प्रत्येक ग्राम-पंचायत से श्रद्धालु कार्यक्रम स्थल पर पहुँचेंगे। सभा स्थल पर एक लाख से अधिक नागरिकों की उपस्थिति की संभावना है। उज्जैन में शिप्रा नदी के सभी घाटों पर लगभग एक लाख श्रदालु एलईडी स्क्रीन के माध्यम से कार्यक्रम देखेंगे।

 धार्मिक नगरी ने रूप में मिलेगी उज्जैन को पहचान

 उज्जैन में महाकाल लोक के निर्माण का फायदा न केवल शिव भक्तों को मिलेगा बल्कि रोजगार और पर्यटन की दृष्टि से भी यह फलदायी होगा। महाकाल लोक में लाखों लोग एक साथ भ्रमण कर सकते हैं और रुकने की दृष्टि से भी इसे सर्व सुविधायुक्त बनाया गया है। अब शिव भक्त यहाँ महाकाल के दर्शन के लिए आएंगे भी और आराम से वे रुक भी सकेंगे। ऐसे में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे। मध्य प्रदेश में मालवा का यह सम्पूर्ण क्षेत्र धार्मिक कॉरिडोर के रूप में पहचान बनाने में  सफल होगा। महाकाल लोक की लोकप्रियता और आकर्षण से इस क्षेत्र में नये-नये उद्योग भी बढ़ेंगे। सांस्कृतिक विरासत,रोजगार और पर्यटन के अदभुत केंद्र के रूप में दुनिया भर में अपना विशिष्ट स्थान बनाने में यह सफल होगा।

 

Friday, 7 October 2022

अदभुत, अकल्पनीय और अविश्वसनीय 'महाकाल लोक'

 

 



 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद देश आधारभूत संरचनाओं के मामले में न केवल विकास की नई ऊंचाइयों को छू रहा है बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी भारत को दुनिया के मानचित्र पर नई पहचान मिल रही है। उनके कुशल नेतृत्व में हमारे देश के कई वर्षों की समृद्ध विरासत को न केवल संजोने का प्रयास किया जा रहा है बल्कि धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों को पुनर्स्थापित  करने का भी बेहतर प्रयास किया जा रहा है। काशी विश्वनाथ धाम कारिडोर से लेकर केदारनाथ धाम,  रामजन्मभूमि से लेकर  श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा के सौंदर्यीकरण और सोमनाथ मंदिर जैसे देश के इन ऐतिहासिक स्थलों का अब कायाकल्प हो गया है। अब इसी क्रम में देश के हृदय स्थल  मध्य प्रदेश का महाकाल लोक भी तैयार है जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र  मोदी 11 अक्टूबर को करने जा रहे हैं। काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर के रूप में देश को बड़ी सौगात भी मिली थी, लेकिन उससे कहीं अधिक भव्य महाकाल लोक की परिकल्पना इसकी सुंदरता में चार चांद लगा रही है। 

 धार्मिक नगरी  उज्जैन का प्राचीन वैभव विराट

 महाराज विक्रमादित्य की प्रसिद्ध नगरी उज्जैन भारत की अत्यंत प्राचीन नगरी है।  पुरातन साहित्य में अनेक स्थान पर इसकी महिमा बताई गई है। धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से उज्जैन का बड़ा महत्व रहा है। पौराणिक महत्त्व की दृष्टि से इसका उज्जयिनी नाम इसलिए पड़ा कि त्रिपुरासुर को मारने के लिए देवताओं के साथ भगवान शिव ने महाकाल वन में रक्तदन्तिका चंडिका की आराधना करके महापाशुपत अस्त्र प्राप्त किया और उससे त्रिपुरासुर का वध किया।प्रबल शत्रु को 'उज्जित' करने के कारण ही इसका नाम उज्जयिनी पड़ा जो आगे चलकर उज्जैन के नाम से जाना जाने लगा। इसका प्राचीन नाम अवंतिका भी कहा जाता है। यह पवित्र नगरी देवता, तीर्थ, औषधि, बीज और प्राणियों का अवन अर्थात रक्षण करती है। स्कंदपुराण में इस नगरी को 7 प्राचीन  नगरियों में गिना जाता है। यह नगरी काशी से दस गुना पुण्यदायी बताई गई है। 

 वामन पुराण में भी उल्लेख किया गया है प्रह्लाद ने उज्जैन में क्षिप्रा नदी में स्नान करके महाकाल के दर्शन किये थे। महाकाल भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है जिसकी महिमा का वर्णन महाभारत में भी मिलता है। महाकाल के निकट कोटि तीर्थ का स्पर्श होने से अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता है। यहीं पर वासुदेव श्रीकृष्ण , उनके भाई बलराम और सुदामा ने उज्जैन में ही सांदीपनि के आश्रम में विद्या प्राप्त की थी।  ज्योतिष में भी उज्जैन का बड़ा  महत्व रहा  है। काल गणना के लिए देशांतर की शून्य रेखा उज्जैन में होकर गई जिसका उल्लेख भास्कराचार्य द्वारा रचित सिद्धांत शिरोमणि में मिलता है जिसमें कहा गया है लंका से उज्जैन और कुरुक्षेत्र होते हुए जो रेखा मेरु पर्वत तक पहुँचती है, वह मध्य रेखा मानी गई है। इसी के संकेतस्वरूप उज्जैन की वेधशाला आज भी कार्य कर रही है। प्राचीन भारतीय साम्राज्यों और सभी धर्मों और संस्कृतियों से इस नगरी का विशेष सम्बन्ध रहा है। 

 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकाल

 पवित्र नगरी उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर मंदिर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। महाकाल की महिमा का विभिन्न पुराणों में  विस्तृत  वर्णन किया गया है। कालिदास जैसे  संस्कृत  के महान कवियों ने इस मंदिर को भावनात्मक रूप से समृद्ध किया है। उज्जैन प्राचीन काल से  भारतीय समय की गणना के लिए केंद्रीय बिंदु हुआ करता था और महाकाल को उज्जैन का विशिष्ट पीठासीन देवता माना जाता था। समय के देवता, शिव अपने सभी वैभव में, उज्जैन में शाश्वत शासन करते हैं। महाकालेश्वर का मंदिर, इसका शिखर आसमान में चढ़ता है, आकाश के खिलाफ एक भव्य अग्रभाग, अपनी भव्यता के साथ आदिकालीन विस्मय और श्रद्धा को उजागर करता है। महाकाल शहर और उसके लोगों के जीवन पर हावी है।  भगवान महाकाल  के दर्शन से नि:सन्देह मुक्ति पद प्राप्त होता है। यहां तक कहा गया है कि संसार में वे मनुष्य धन्य हैं, जो निरन्तर  महाकाल के दर्शन के करते हैं। महाकाल की अद्भुत महिमा को लेकर वृतान्त भरे पड़े हैं ।

  नवनिर्मित देवलोक कॉरिडोर ने बदला उज्जैन का नजारा

 भगवान शिव के महाकालेश्वर धाम कॉरिडोर का नजारा बिल्कुल देवलोक में बदल गया है। अब इस परिसर में शिव पुराण में मौजूद  भोलेनाथ के 200 रूपों की प्रतिमाएं देखने को मिलेंगी। इनके  अलावा अभी इस नवनिर्मित कॉरिडोर के भीतर सप्तर्षियों की प्रतिमाएं भी स्थापित की गई हैं जिनमें महर्षि कश्यप, महर्षि भारद्वाज, अत्रि, महर्षि गौतम, महर्षि विश्वामित्र, जमदग्नि और महर्षि वशिष्ठ की प्रतिमाएं हैं।  नवनिर्मित  महाकाल लोक  भारत की  सनातन संस्कृति की पौराणिकता और नूतनता का अद्भुत संगम है।  इसकी भव्यता आज उज्जैन की सुंदरता पर चार चांद लगा रही है। 

 

 2019 में मिली कॉरिडोर प्रोजेक्ट को मंजूरी

 2019 में महाकाल कोरिडोर के प्रोजेक्ट को मंजूरी मिली थी। जब इस प्रोजेक्ट को मंजूरी मिली तब इसका बजट महज 300 करोड़ रुपए था लेकिन मध्य प्रदेश की सत्ता में बीजेपी के आने के बाद मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में इसका बजट दोगुने से भी अधिक कर दिया गया। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कुशल नेतृत्व में सिंहस्थ-2016 में उज्जैन में विश्व स्तरीय अधो-संरचना का विकास किया गया था। अब उनके अथक प्रयासों और प्रधानमंत्री नरेन्द्र  मोदी के विजन से महाकाल लोक के माध्यम से उज्जैन को देश और दुनिया में नई पहचान मिल रही है। 

पहले चरण के कामों ने बदली सूरत

 पहले चरण में महाकाल के आँगन में छोटे एवं बड़े रूद्र सागर, हरसिद्धि मन्दिर, चार धाम मन्दिर, विक्रम टीला आदि का विकास किया गया है। इसके अलावा सप्तर्षियों की प्रतिमाएं, महाकालेश्वर वाटिका, शिवा अवतार वाटिका, अर्ध पथ क्षेत्र, धर्मशाला, शिव तांडव स्त्रोत, और शिव विवाह प्रसंग जैसी चीजें देखने को मिलेंगी। हिंदू मान्यताओं के अनुसार गणना में संख्या 108 का विशेष महत्व है फिर चाहे वह मंत्रोचार हो, जप मालाएं हो या फिर या फिर कुछ और हर जगह 108 संख्या को शुभ माना जाता है। इसी तर्ज पर महाकाल मंदिर के नवनिर्मित कॉरिडोर को भी 108 स्तंभों पर बनाया गया है। 910 मीटर का यह पूरा महाकाल मंदिर परिसर 108 स्तंभों पर टिका होगा।  मंदिर परिसर में शिव तांडव स्त्रोत शिवविवाह प्रसंग पार्किंग स्थल, धर्मशाला और कई अन्य सारी चीजें बनाई गई हैं लेकिन  महाकाल वन सबका ध्यान अनायास ही खींच रहा है  जिसका निर्माण संस्कृत के महाकवि कालिदास के महाकाव्य मेघदूत में महाकाल वन के वर्णन और चित्रण के आधार पर किया गया है। इन सबके अलावा मंदिर परिसर कार और मोटर बाइक पार्किंग सुविधाओं का विकास भी किया गया है जिनमें एक समय में  कई हजार गाड़ियों को पार्क किया जा सकता है।

  यहाँ पर पग यात्रियों  के लिए 200 मीटर लम्बा मार्ग बनाया गया है। इसमें 25 फीट ऊँची एवं 500 मीटर लम्बी म्युरल वॉल बनाई गई है। शिव स्तंभ, शिव की मूर्तियां  अलौकिक  छटा को  बिखेर रहे हैं। यहाँ पर लोटस पोंड, ओपन एयर थिएटर तथा लेक फ्रंट एरिया और ई-रिक्शा एवं आकस्मिक वाहनों के लिए मार्ग भी  बनाए गए हैं। बड़े रूद्र सागर की झील में साफ़ पानी भरा गया है।  महाकाल थीम पार्क में भगवान श्री महाकालेश्वर की कथाओं से युक्त म्यूरल वॉल, सप्त सागर के लिए डैक एरिया एवं उसके नीचे शॉपिंग और बैठक क्षेत्र सुविधाएँ विकसित की गई हैं। इसी तरह त्रिवेणी संग्रहालय के समीप कार, बस और दोपहिया वाहन की मल्टीलेवल पार्किंग बन चुकी है। इस क्षेत्र में धर्मशाला एवं अन्न क्षेत्र भी  हैं। रोड क्रॉसिंग के जरिये पदयात्रियों की अब बेहतर कनेक्टिविटी विकसित की गई है। मिड-वे झोन में पूजन सामग्री की दुकानें, फूड कोर्ट, लेक व्यू रेस्टोरेंट, लेक फ्रंट डेवलपमेंट, जन-सुविधाएँ और टॉवर सहित निगरानी एवं नियंत्रण केन्द्र की स्थापना भी की गई है जो इस परिसर के बदलते रूप को बता रहा है। 

 2.2 हेक्टेयर से बढ़कर 20 हेक्टेयर से अधिक हो गया है परिसर

 पहले मंदिर का परिषद महज 2.2 हेक्टेयर था। नवनिर्मित परिसर लगभग 20 हेक्टेयर से भी अधिक का हो गया है। महाकाल लोक  का यह नवनिर्मित कॉरिडोर उत्तर प्रदेश के काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर से लगभग 4 गुना बड़ा है। काशी विश्वनाथ मंदिर के नवनिर्मित परिसर का क्षेत्रफल 5 हेक्टेयर है जबकि महाकाल मंदिर के जिस कोरिडोर का उद्घाटन होने जा रहा है उसके परिसर का क्षेत्रफल 20 हेक्टेयर से भी अधिक है। अब महाकाल मंदिर का यह परिसर इतना बड़ा हो चुका है कि इस समय 1 घंटे में  लाखों  श्रद्धालु दर्शन कर सकते हैं।

 धर्म नगरी उज्जैन को मिलेगी एक नई पहचान

 महाकाल कॉरिडोर के निर्माण से भगवान शिव की जिन कथाओं का महाभारत, वेदों तथा स्कंद पुराण के अवंती खंड में उल्लेख है, वे कथाएं अब धर्मनगरी उज्जैन में जीवंत हो उठेंगी साथ ही देश और दुनिया से महाकाल का दर्शन करने के लिए लाखों की संख्या में भक्तों पहुंचेंगे जिससे उज्जैन शहर में पर्यटन नई  ऊंचाइयों पर पहुंचेगा। 

 

 जनता में  बढ़ाफ्लाईओवर सेल्फीका  क्रेज

 पिछले महीने मध्य प्रदेश मंत्रिमंडल की महाकाल नगरी में हुई आज़ादी के बाद की  पहली बैठक के बाद फ्लाईओवर सेल्फीके लिए लोगों की दीवानगी बढ़ गई है। इस  प्रोजेक्ट की भव्यता को लेकर स्थानीय लोग उत्साहित हैं। हर दिन सूरज के ढलने के बाद काफी संख्या में लोग ओवरब्रिज के पास एकत्र होकर प्राचीन रुद्रसागर झील की छटा को निहारते हैं और और उसे अपनी  सेल्फीमें कैद करने की कोशिश करते हैं। सरकार के प्रयासों  के चलते अब यहाँ श्रद्धालुओं को पहुंचने और महाकाल  के दर्शन करने में आसानी होगी।

 पर्यटन विकास को लगेंगे नए पंख

 महाकाल लोक का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करकमलों से होने के बाद  प्रदेश के पर्यटन विकास को नए पंख लगेंगे।  प्रधानमंत्री के आने का कार्यक्रम तय  होने के बाद से  उज्जैन में पिछले  कई दिनों से  25 से 30  हजार श्रद्धालु और पर्यटक आने लगे हैं। लोकार्पण के पहले ही महाकाल कारिडोर में भी  भक्तों की आवाजाही बढ़ गई है। ऐसे में जब महाकाल कारिडोर का भव्य लोकार्पण हो जाएगा तो भक्तों और पर्यटकों की संख्या में भारी इजाफा होना तय माना जा रहा है। इससे जहाँ पर्यटन व्यवसाय बढ़ेगा वहीँ दुनिया के धार्मिक पर्यटन का मुख्य केन्द्र भविष्य में उज्जैन बन जाएगा। केन्द्र सरकार द्वारा धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये इस पूरे इलाके में विशेष प्रयास किये जा रहे है।  उज्जैन में धार्मिक पर्यटन की असीम और अपार संभावनाएं हैं। महाकाल लोक की परिकल्पना जिस तरह से साकार हुई  है उसे देखते हुए कहा जा सकता है शिव के सभी स्वरूप एक स्थान पर  लाना एक बड़ा काम है।

 उज्जैन में कम से कम दो दिन

 उज्जैन जिला प्रशासन ने महाकाल लोक को एक नई टैग लाइन दी है, जिसमें लिखा है उज्जैन में कम से कम दो दिनयानि अब आप उज्जैन आएंगे तो यहां महाकाल लोक एवं दर्शन के साथ-साथ पूरे शहर में घूमने के लिए आपको दो दिन का वक्त निकालना होगा। इसे यहाँ धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की कोशिशों के तौर पर देखा जा रहा है। 

 दूसरा चरण

 महाकाल लोक क्षेत्र विकास योजना के दूसरे चरण ‘’मृदा प्रोजेक्ट-2’’ में महाराजवाड़ा परिसर का विकास किया जायेगा। इस चरण के कार्य वर्ष 2023-24 में पूर्ण होंगे। इसमें ऐतिहासिक महाराजवाड़ा भवन का हैरिटेज के रूप में पुनर्पयोग, पुराने अवशेषों का समावेश कर भवन का आंशिक उपयोग कुंभ संग्रहालय के रूप में करते हुए इस परिसर का महाकाल मन्दिर परिसर से एकीकरण किया जायेगा।  महाराजवाड़ा परिसर का भी विकास किया जायेगा जिसमें ऐतिहासिक महाराजवाड़ा भवन का हैरिटेज के रूप में पुनर्पयोग, कुंभ संग्रहालय के रूप में पुराने अवशेषों का समावेश एवं इस परिसर का महाकाल मन्दिर परिसर से एकीकरण होगा। स्थानीय कला एवं संस्कृति को दर्शाते हुए सांस्कृतिक हाट का भी यहाँ निर्माण होगा। रामघाट फसाड ट्रीटमेंट के घटक में रामघाट की ओर जाने वाले पैदल मार्ग का कायाकल्प, फेरी एवं ठेला व्यवसाइयों के लिये अलग व्यवस्था, वास्तुकलात्मक तत्वों के प्रयोग द्वारा गलियों का सौन्दर्यीकरण रामघाट पर सिंहस्थ थीम आधारित डायनेमिक लाइट शो किया जायेगा। पार्किंग, धर्मशाला, प्रवचन हॉल एवं अन्न क्षेत्र का भी निर्माण किया जा रहा है।

 छोटा रूद्र सागर लेक फ्रंट विकास योजना में लैंडस्केपिंग सहित मनोरंजन केन्द्र, वैदिक वाटिका एवं योग केन्द्र, मंत्रध्वनि स्थल एवं पार्किंग का विकास  भी सरकार की प्राथमिकताओं में है। रूद्र सागर को शिप्रा नदी से जोड़ा जायेगा। हरि फाटक ओवर ब्रिज की चारों भुजाओं को चौड़ा किया जायेगा और जयसिंहपुरा के समीप रेलवे अण्डरपास बनाया जायेगा। महाकालेश्वर थाने के पास स्थित महाकाल द्वार का संरक्षण किया जायेगा और यहाँ हेरिटेज कॉरिडोर विकसित होगा। इसी तरह बेगमबाग क्षेत्र का विकास एवं सौन्दर्यीकरण भी होगा। रूद्र सागर पर 210 मीटर लम्बा पैदल पुल बनाया जायेगा, जो पीएचई की पानी की टंकी से महाकाल थीम पार्क को जोड़ेगा। इस चरण में श्री महाकाल मन्दिर परिसर के आगे के भाग का लगभग 70 मीटर तक विस्तार किया जायेगा।  इस क्षेत्र में बैठने का स्थान, लैंडस्केपिंग एवं पैदल मार्ग भी प्रस्तावित हैं।

 इस प्रकार महाकाल लोक की निराली महिमा यहाँ के कण- कण में समायी हुई है। उज्जयिनी, अवंतिका, अमरावतीपद्मावती, कुशस्थली, भोगवती, हिरण्यवती, कनकशृंगा, कुमुद्धवती, प्रतिकल्पा, विशाल और अवन्ति आदि नामों से पूजनीय महाकाल की नगरी का स्मरण अक्षय फल प्रदान करने वाला है। 

Thursday, 8 September 2022

चीतों की दहाड़ से गूंजेगा कूनो , टाइगर स्टेट के नाम जुड़ेगी नई उपलब्धि

    


मध्य प्रदेश ने  वन्य प्राणी संरक्षण और प्रबंधन पर विशेष ध्यान देकर वन्यप्राणी समृद्ध प्रदेश बनाने में किसी प्रकार का कोई प्रयास नहीं  छोड़ा  जिसके चलते  मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट का दर्जा मिला।  अब तेंदुओं ,घड़ियाल और गिद्धों की संख्या के मामले में राष्ट्रीय स्तर पर मध्य प्रदेश पहले पायदान पर आ चुका है।   प्रदेश की जलवायु  वन्य-जीवों की आदर्श आश्रय स्थली और प्रजनन के सर्वाधिक अनुकूल है।  इसे देखते हुए अब मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो अभयारण्य चीतों की दहाड़  से गुलजार होगा। यहां  लम्बे समय से  चीते लाने  के प्रयास किये जा रहे थे  जो अब रंग  लाए  हैं । 73 साल बाद चीतों की चहल-कदमी से  दुनिया के नक़्शे पर कूनो अभयारण्य नजर  आएगा।  


 टाइगर स्टेट मध्यप्रदेश 

2018 में हुई बाघों की गणना में 526 बाघ होने के साथ प्रदेश को टाईगर स्टेट का दर्जा मिला। इन बाघों में लगभग 60 फीसदी टाइगर रिजर्व के क्षेत्रों और 40 फीसदी बाघ अन्य वन क्षेत्रों में उपलब्ध हैं। बांधवगढ टाइगर रिजर्व में सर्वाधिक 124 बाघ मौजूद हैं। इस साल अक्टूबर माह में तीन चरणों में होने वाली बाघों की गणना  और प्रदेश के वन्य जीव संरक्षण में  ट्रैक रिकार्ड को देखते हुए  कहा जा सकता है कि बाघों की संख्या के मामले में मध्यप्रदेश  फिर से शिखर पर होगा। 

चीतों की दहाड़ सुनने के लिए कूनो तैयार   

कूनो  चीते  के स्वागत के लिये पूरी तरह तैयार है।  विलुप्त हो चुके  इस  चीते  का  नया आशियाना अफ्रीका से लाकर कूनो में  बनाया जा रहा है।  कूनो अभयारण्य  को चीतों  के  अनुकूल पाया गया है । इस अभयारण्य में वे सभी विशेषताएं हैं, जो इसे  दुनिया के  महत्वपूर्ण संरक्षित क्षेत्रों में शामिल कर सकती हैं।  प्रदेश  के श्योपुर जिले में स्थित कूनो नेशनल पार्क में 8 अफ्रीकन चीतों को  छोड़ा जाएगा। भारत में पिछले  कई वर्षों  से कोई चीता नहीं है।  1952 में चीतों को देश में लुप्त घोषित किया गया था और  कूनो   में अफ्रीकन चीतों को लाने की योजना पर काम किया जा रहा था। अंतिम चीते की मौत छत्तीसगढ़ में सन 1947 में हुई थी। भारत में एशियाई चीते पाए जाते थे जो अब पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं।  

28 जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने चीतों को भारत लाने की अनुमति दी थी। साथ ही, काेर्ट ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण को चीतों के लिए उपयुक्त जगह खोजने का आदेश दिया था। कई राष्ट्रीय उद्यानों पर विचार के बाद एक्सपर्ट्स ने पृथ्वी पर तेज जानवर की देश में वापसी के लिए मध्य प्रदेश के श्योपुर में कूनो पालपुर राष्ट्रीय उद्यान  का चयन किया गया।

अफ्रीकन चीतों की शिफ्टिंग को लेकर तैयारियां  जोरों पर

कूनो राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना 1981 को एक वन्य अभयारण्य के रूप में की गई थी जो भारत के मध्य प्रदेश राज्य में एक संरक्षित क्षेत्र है।  इसे  2018 में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया था।  कूनो नेशनल पार्क में चीतों के लिए सुरक्षा, शिकार और आवास की भरपूर जगह है, जो इनके लिए उपयुक्त है।  चीते के रहने के लिए 10 से 20 वर्ग किमी  क्षेत्र , उनके प्रसार के लिए  पर्याप्त है।  समतल  जंगल अफ्रीकी चीतों के सर्वथा अनुकूल है।  कूनो नेशनल पार्क करीब 750 वर्ग किलोमीटर में फैला है जो चीतों के रहने के लिए अनुकूल है। इस अभ्यारण में इंसानों की किसी भी तरह की बसाहट भी नहीं है । चीते को फिर से बसाने के लिए यहाँ  की भौगोलिक परिस्थितियां  अनुकूल हैं।  देश के  यहाँ  चीतों के लिए अच्छा शिकार भी मौजूद है, क्योंकि यहां पर चौसिंगा हिरण, चिंकारा, नीलगाय, सांभर एवं चीतल बड़ी तादाद में पाए जाते हैं। कूनो में अफ्रीकी चीतों के लिए 5 वर्ग किलोमीटर का एक बाड़ा तैयार किया गया है, जिसमें जंगल में छोडऩे से पहले कुछ माह तक चीतों का रखा जाएगा। हाईरेंज सीसीटीवी से इन चीतों पर नजर रखी जाएगी। हर 2 किलोमीटर पर वॉच टॉवर बनाए गए हैं।

 विलुप्त हुए चीते की फिर से  वापसी 

चीता दुनिया का सबसे तेज़ रफ़्तार से दौड़ने वाला जानवर है जो 100 किलोमीटर प्रति घंटे  से अधिक की रफ़्तार से दौड़ सकता है। आज पूरी दुनिया में सिर्फ़ अफ्रीका में गिने-चुने चीते  हैं । भारत समेत एशिया के कमोबेश हर देश से ये जानवर विलुप्त हो चुका है। इतने सालों बाद फिर से चीतों की वापसी हो रही है। 1947 में ली गई सरगुजा महाराज रामानुशरण सिंह के साथ चीते की तस्वीर को अंतिम मान लिया गया था। इसके बाद 1952 में देश को चीता लुप्त घोषित कर दिया गया था।  दौड़ते वक्त आधे से अधिक समय हवा में रहता है। चीता जब पूरी ताक़त से दौड़ रहा होता है तो सात मीटर तक लंबी छलांग लगा सकता है।

जन्मदिन पर पीएम मोदी देंगे देश को  चीतों की  सौगात

देश में विलुप्त हो चुके  चीते को फिर से आवास देने की कोशिशें  जारी है। आठ चीतों की शिफ्टिंग के लिए  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी 17 सितंबर को मध्य प्रदेश जाएंगे। अपने जन्मदिन के खास मौके पर प्रधानमंत्री मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित प्रसिद्ध कूनो नेशनल पार्क में आने वाले अफ्रीकन चीतों की शिफ्टिंग कार्यक्रम में शामिल होंगे।

मुख्यमंत्री शिवराज  ने दी जानकारी

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को मंत्रि-परिषद की बैठक में बताया कि 17 सितंबर को  अपने जन्म दिन के खास मौके पर प्रधानमंत्री  मोदी   श्योपुर जिले के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में दक्षिण अफ्रीका से लाए जा रहे चीतों का प्रवेश कराएंगे।  प्रदेश में  प्रधानमंत्री मोदी के प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर तैयारियां शुरू हो गई हैं।  प्रशासनिक अमला  इसकी तैयारी में जुट गया है। इसके लिए श्योपुर में 7 हेलीपैड बनाए जा रहे हैं। इसमें 3 नेशनल पार्क के भीतर और चार हेलीपैड बाहर बन रहे हैं।

 हेलीकॉप्टर से लाए जाएंगे चीते

मध्य प्रदेश के कूनो-पालपुर नेशनल पार्क में नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से 8 चीते लाए जा रहे हैं। इन्हें विमान से पहले दिल्ली और फिर ग्वालियर लाया जाएगा। ग्वालियर से उन्हें हेलीकॉप्टर के माध्यम से कूनो-पालपुर नेशनल पार्क में शिफ्ट किया जाएगा। चीतों की शिफ्टिंग के लिए पार्क के अंदर हेलीपैड बनाए जा रहे है। वीआईपी लोगों के लिए पार्क के बाहर हेलीपैड बन रहे हैं।  चीतों को नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से हवाई मार्ग से लाकर मप्र के कूनो पार्क में पूरी तैयारी के साथ उतारा जाएगा।

 मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में सतत वन्य प्राणी प्रबंधन के प्रयासों से प्रदेश में चीतों की आमद बढ़ाने की दिशा में कार्य हुआ है । विलुप्त हो चुकी प्रजाति के आठ चीते  कूनो  नेशनल  पार्क की ोतस्वीर को बदलेंगे । चीते के आने के  बाद  देश के मानचित्र में कूनो अपनी विशेष  पहचान  बनाने में सफल होगा।  ऐसा पहली बार हो रहा है जब चीते को एक महाद्वीप से दूसरे महाद्वीप ले जाया जा रहा है। चीतों के संरक्षण की दिशा में ये एक  महत्वपूर्ण  प्रोजेक्ट है  जिससे  भविष्य में  कूनो नेशनल पार्क में  चीतों की आमद बढ़ने  की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता ।