कांगो में तेजी से फैल रहे इबोला वायरस ने पूरी दुनिया के सामने एक बार फिर से गहरी चिंता बढ़ा दी है। यह बीमारी अफ्रीका के जंगलों से निकलकर पूरी दुनिया को नई चेतावनी दे रही है। इस प्रकोप का मुख्य केन्द्र कांगो के इटुरी प्रांत में केंद्रित है, जहां अभी तक एक हजार से अधिक मामले सामने आए हैं और संक्रमण की चपेट में आने से 250 से अधिक लोगों की मौत हो गई है। कांगों में करीब 1000 से अधिक लोग संदिग्ध मरीज बताए जा रहे हैं। बीमारी के बढ़ते हुए प्रभाव को देखते हुए युगांडा में भी इबोला वायरस से जुड़े कई मामले दर्ज किए गए हैं। हालात कितने भयावह हैं यह इस बात से समझ सकते हैं कि इबोला अब सिर्फ कांगो, युगांडा और दक्षिणी सूडान तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि 10 अफ्रीकी देशों को भी अपने संक्रमण की चपेट में ले चुका है। इसी को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबोला वायरस को ‘वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रतिनिधि ऐन एन्सिया ने चेतावनी दी है कि डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला ज्यादा तेजी से फैल रहा है। डॉ. एन्सिया ने बताया कि लगातार हो रही जांचों से यह साफ़ होता जा रहा है कि यह बीमारी दूसरे इलाकों में भी फैल रही है। इबोला का कहर दुनिया में पहले भी होता रहा है लेकिन तब इसका इतना व्यापक स्तर पर प्रसार नहीं हुआ था लेकिन वैज्ञानिक इसके नए स्ट्रेन पर चिंता जाहिर कर रहे हैं। 2014-16 में पश्चिम अफ्रीका में इबोला के चलते 28,000 से ज्यादा मामले और 11,000 से ज्यादा मौतें हुई थी। वर्तमान में बंडीबुग्यो स्ट्रेन के आने और वायरस के रूप बदलने से वैज्ञानिकों के माथे पर भी चिंता की लकीरें हैं क्योंकि मौजूदा दौर में इसकी रोकथाम के लिए कोई वैक्सीन भी नहीं है।
भारत में अब तक इबोला का कोई मामला सामने नहीं आया है, लेकिन दुनिया के अनुभवों को देखते हुए यहाँ भी इस दौर में खौफ का साया गहरा है। हवाई अड्डों पर विशेष जांच और निगरानी की जारी है। संक्रमण के लक्षण पाए जाने के बाद आइसोलेशन का प्रोटोकॉल भी शुरू कर दिया गया है। स्वास्थ्य विभाग लगातार हालातों की मॉनिटरिंग कर रहा है लेकिन फिर भी भारत में चुनौतियां कम नहीं हैं। भारत कोरोना के अनुभव से सीख ले चुका है लिहाजा इस समय स्क्रीनिंग,आइसोलेशन और जागरूकता अभियान चलाए जाने पर सरकार का विशेष जोर है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी जैसे संस्थान लगातार पल- पल की बदलती घटनाओं पर बारीकी से नजर रख रहे हैं और रैपिड रिस्पॉन्स टीमों के माध्यम से इबोला के प्रकोप को रोकने की दिशा में मजबूती के साथ कार्य कर रहे हैं। बीते दिनों युगांडा से लौटी एक महिला बेंगलुरु में और गुजरात में एक अन्य यात्री के लक्षणों ने देश में हड़कंप मचा दिया था। दोनों संदिग्ध मामले नेगेटिव पाए गए लेकिन तभी से सरकार ने अपनी सतर्कता बढ़ा दी है। पहली बार भारत-अफ्रीका फोरम समिट को इबोला के चलते स्थगित कर दिया गया है। एक तरफ जहाँ सरकार ने हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग सख्त कर दी है वहीँ अफ्रीकी देशों से आने वाले यात्रियों के लिए स्वास्थ्य एडवाइजरी जारी की जा रही है। लोगों को अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह भी दी गई है लेकिन लोगों के जेहन में मौजूदा दौर में यह सवाल उठ रहा है क्या इबोला भारत पहुंच जाएगा? क्या यह कोरोना से भी खतरनाक साबित होगा?
इबोला वायरस फिलोविरिडे परिवार का सदस्य है। यह चमगादड़ जैसे जानवरों से मनुष्यों में फैलता है और फिर व्यक्ति-से-व्यक्ति संपर्क से फैलता है। तेज बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, उल्टी, दस्त और अंत में आंतरिक रक्तस्राव लक्षण दिखने में एक से तीन हफ्ते लग सकते हैं। इबोला वायरस और संक्रमण के अधिकतर लक्षण एक-समान लगते हैं। तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, त्वचा पर चकत्ते, उल्टी, दस्त, थकान, बेहद कमजोरी, गले में खराश आदि इबोला वायरस के शुरुआती लक्षण हैं। आंख, नाक, कान या मल-मूत्र के रास्ते आंतरिक और बाहरी रक्तस्राव होना भी महत्वपूर्ण लक्षण है। इबोला से संक्रमित जानवरों (चमगादड़ या बंदर) का मांस खाने से भी यह संक्रमण फैलता है। इसमें मृत्यु दर 25% से 90% तक है, जो वायरस के स्ट्रेन और इलाज की उपलब्धता पर निर्भर करती है। इसका संक्रमण इतना भयावह है कि पहली बार अनेक यूरोपीय देशों समेत अमरीका, भारत आदि को ‘हाई अलर्ट’ घोषित करना पड़ा है। कनाडा ने तो कुछ समय के लिए वीजा जारी करने पर ही रोक लगा दी है। ख़ास बात ये है कि इबोला वायरस जानवरों, मुख्य रूप से फल खाने वाले चमगादड़ों को संक्रमित करते हैं लेकिन अगर लोग उनके सीधे संपर्क में आते हैं तो वे भी संक्रमित हो सकते हैं। इस प्रकोप का कारण इबोला वायरस की बुडिचुग्यो प्रजाति है। यह उन तीन प्रजातियों में से एक है जिनके कारण संक्रमण फैलता है। इबोला वायरस की अन्य प्रजातियों के विपरीत बुडिचुग्यो के लिए कोई भी टीका या दवा उपलब्ध नहीं है। कुछ प्रायोगिक दवाएं अवश्य मौजूद हैं। वायरस के संक्रमण को पुष्टि करने वाले टेस्ट बहुत कारगर नहीं हैं।
भारत की बड़ी आबादी, घनी बसावट ,स्वास्थ्य सुविधाओं की असमानता कोई भी वायरस फैलने पर मुश्किलें बढ़ा सकती है। अफवाहें, रीलबाजी का कल्चर और सोशल मीडिया पर फैलने वाली गलत सूचनाएं मौजूदा दौर में खौफ को बढ़ा सकती हैं। कोरोना काल को लोग अभी तक नहीं भूले हैं जहाँ फेक न्यूज के प्रसार ने कोरोना काल में समाज में भारी दहशत, अफवाहें और भ्रम की स्थिति पैदा कर दी थी। तब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे 'इन्फोडेमिक' यानी सूचना महामारी का नाम दिया था। कोरोना महामारी के दौरान सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के काढ़े, घरेलू नुस्खों और चमत्कारी इलाजों के दावे धड़ल्ले से वायरल हुए। सोशल मीडिया पर लगातार वायरल होने वाले फर्जी संदेशों ने लोगों में इतना भय भर दिया कि लोग मानसिक तनाव में आ गए। इस बार भी दुनिया में फैल रहे इबोला का सबसे बड़ा हथियार डर है। डर से लोग लक्षण छिपाते हैं, अस्पताल नहीं जाते और इलाज में देरी होती है। भय, तनाव, असहाय स्थितियां इसलिए भी हैं क्योंकि अभी तक इबोला लाइलाज है। दुनिया में एक भी टीका या गोली अथवा कैप्सूल ऐसा नहीं है, जो इबोला का इलाज कर सके। सीरम इंस्टीट्यूट, पुणे और ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी संयुक्त रूप से इबोला के टीके पर अभी शोध कार्य कर रहे हैं। भरोसा है कि आने वाले दिनों में एक टीका बाजार में उपलब्ध होगा। रूस का भी दावा है कि उसके डॉक्टर और शोधकर्ता भी इबोला के टीके की खोज कर चुके हैं और जल्द ही यह दुनिया के बाज़ार को उपलब्ध होगा। अफ्रीकी देशों में ही तीन बार इबोला वायरस का संक्रमण फैल चुका है जिनमें 11,000 से अधिक मौतें हुई। समस्या यह है कि कांगो, युगांडा, सूडान सरीखे देशों में स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचा बेहद सीमित है, लिहाजा अस्पताल इबोला के संक्रमित या संदिग्ध मरीजों से पटे हुए हैं। कई अस्पतालों में मरीजों के भागने की खबरें भी सामने आई हैं क्योंकि अस्पतालों में संतोषजनक इलाज ही उपलब्ध नहीं था। गौरतलब यह है कि इबोला वायरस किसी एक अंग तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि यह शरीर के इम्यून सिस्टम को कमजोर करता है। इसके मुख्य निशाने लिवर, गुर्दे , फेफड़े और रक्त वाहिकाएं आदि हैं।
भारत सरकार ने परामर्श जारी किया है कि अफ्रीकी देशों की यात्रा से बचें। यदि बहुत जरूरी है, तो स्वास्थ्य संबंधी निर्देशों और नियमों का सख्ती से पालन करें। यदि ऐसा बचाव जारी रहेगा, तो देश एक और महामारी से बच सकेगा। वैज्ञानिकों को प्राथमिकता के साथ इस रोग का इलाज ढूंढना होगा। सरकार को मजबूत सर्विलांस, बॉर्डर कंट्रोल और जन जागरूकता अभियान चलाने पर इस समय जोपर देना चाहिए। इबोला हमें याद दिलाता है कि संक्रामक रोगों के खिलाफ लड़ाई दुनिया में कभी खत्म नहीं होगी। खौफ के साये में जीने के बजाय हमें आने वाले दिनों में सावधानी के साथ आगे बढ़ना होगा। भारत को सतर्क रहना चाहिए, घबराना नहीं चाहिए।