Thursday, 30 July 2026

किसानों की आवाज बनते मोहन गढ़ रहे हैं किसान हितैषी मुख्यमंत्री की नई छवि

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सत्ता संभालने के बाद से किसानों को प्राथमिकता देते हुए राज्य में किसान हितैषी मुख्यमंत्री की एक नई छवि गढ़ रहे हैं। वे न केवल योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित हैं, बल्कि खुद खेतों में उतरकर किसानों के साथ जुड़कर उनकी आय बढ़ाने के ठोस कदम उठाने के साथ ही किसान कल्याण वर्ष 2026 में और खेती को लाभकारी बनाने की दिशा में सतत रूप से आगे बढ़ते दिखाई देते हैं। वर्ष 2026 को ‘कृषक कल्याण वर्ष’ घोषित कर उन्होंने अपने इस संकल्प को और मजबूती प्रदान की है।

मोहन सरकार द्वारा किसानों की आय बढ़ाने और आधुनिक खेती को बढ़ावा देने के लिए बलराम कृषि महोत्सव 15 जुलाई 2026 को इंदौर से शुरु किया गया है जिसके तहत 13 नवंबर 2026 तक प्रदेश के सभी जिलों में बड़े आयोजन होंगे।

सीधी आर्थिक मदद और योजनाओं की निरंतरता

मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना के तहत किसानों के खातों में ब सीधे राशि पहुंचाना मध्यप्रदेश में मोहन सरकार की एक प्रमुख पहचान बन गया है। जुलाई 2026 में खंडवा के बलराम कृषि महोत्सव में उन्होंने सिंगल क्लिक से 82.70 लाख से अधिक किसानों के खातों में 3,300 करोड़ रुपये से अधिक की राशि ट्रांसफर की। किसानों को 2025-26 की तीसरी और 2026-27 की पहली किस्त के रूप में 4,000 रुपये मिले। इससे पहले भी पीएम-किसान और राज्य योजनाओं के माध्यम से हजारों करोड़ रुपये किसानों तक पहुंचाए जा चुके हैं।

सरकार ने लगभग 10,500 करोड़ रुपये की पांच प्रमुख किसान हितैषी योजनाओं प्रधानमंत्री राष्ट्रीय किसान कृषि विकास योजना, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन समेत अन्य को 31 मार्च 2031 तक जारी रखने का निर्णय लिया। पहली कृषि कैबिनेट में 27,000 करोड़ रुपये से अधिक के रोडमैप को मंजूरी दी गई, जिसमें सिंचाई, पशुपालन, डेयरी और सहकारिता पर विशेष ध्यान दिया गया।

भावांतर, बोनस और फसल सुरक्षा

सोयाबीन के बाद सरसों को भावांतर योजना में शामिल किया गया। उड़द पर न्यूनतम समर्थन मूल्य के अलावा 600 रुपये प्रति क्विंटल बोनस देने का ऐलान हुआ। धान उत्पादकों के लिए भी भावांतर योजना लागू करने की घोषणा की गई। कोदो-कुटकी जैसी श्रीअन्न फसलों पर 1,000 रुपये प्रति क्विंटल बोनस और सरकारी खरीद अभियान शुरू किया गया। गेहूं उपार्जन का लक्ष्य 78 लाख मीट्रिक टन से बढ़ाकर 100 लाख मीट्रिक टन कर दिया गया। यह सभी बड़े कदम किसानों को बाजार की अनिश्चितता से बचाते हुए किसानों को एक सुनिश्चित आय का आधार प्रदान करेंगे।

सिंचाई, ऊर्जा और आधुनिक खेती पर विशेष जोर

मुख्यमंत्री बनने के साथ ही डॉ. मोहन यादव ने किसानों के हितों के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए किसान कल्याण को अपना बड़ा विजन बनाया। डॉ. मोहन यादव ने प्रदेश की  सिंचाई क्षमता को 65 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने और आगे 100 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य रखा है। केन-बेतवा, पार्वती-कालीसिंध जैसी बड़ी परियोजनाओं से लाखों किसानों को लाभ प्रदान करने की दिशा में अपने कार्यकाल में उन्होनें एक नई लकीर खींचने का काम किया है। अगले तीन वर्षों में 30 लाख सोलर पंप लगाने का लक्ष्य बनाया है जिससे प्रदेश के किसान ऊर्जा आत्मनिर्भर बनेंगे। आज प्रदेश में उनके कार्यकाल में कृषक मित्र योजना के तहत 90 प्रतिशत सब्सिडी पर सोलर सिंचाई पंप दिए जा रहे हैं। इसी तरह माइक्रो इरिगेशन, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम पर अनुदान जारी रखा गया है।

प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावामध्य प्रदेश जैविक खेती के मामले में देश में अग्रणी राज्य है जहाँ 16 लाख हेक्टेयर से अधिक प्रमाणित जैविक कृषि क्षेत्र है और सरकार राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के तहत 50 प्रतिशत तक अनुदान देती है। सरकार द्वारा प्रदेश में प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है। कृषि यंत्रीकरण के लिए 2,868 करोड़ रुपये का प्रावधान और देश में सर्वाधिक कस्टम हायरिंग सेंटर स्थापित किए गए हैं।

किसानों की आय दुगनी करने का संकल्प

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव किसानों के साथ खेत में उतरकर खुद धान की रोपाई करने में भी पीछे नहीं रहे। बलराम कृषि महोत्सव जैसे कार्यक्रमों में वह किसानों से सीधा संवाद करते देखे जा सकते हैं। उनके दूरदर्शी विजन में 17 विभागों को मिलाकर खेती, डेयरी, फूड प्रोसेसिंग और ग्रामीण पर्यटन पर मास्टर प्लान तैयार किया गया है। भूमि अधिग्रहण पर बाजार दर का चार गुना मुआवजा, उर्वरक की उपलब्धता पर एसएमएस अलर्ट, ऑनलाइन किसान क्रेडिट कार्ड पोर्टल जैसी सुविधाओं ने आज मध्यप्रदेश के लाखों किसानों को लाभ पहुंचाने का काम किया है।

किसानों के बड़े आंदोलन को बातचीत से सुलझाया

मध्यप्रदेश में मूंग की खरीद को लेकर पिछले दो दिनों से किसानों का बड़ा आंदोलन चल रहा था जिससे आम जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित हुआ। किसानों ने एमएसपी पर खरीद, ई-टोकन सिस्टम खत्म करने और खाद की उपलब्धता जैसी मांगों पर भोपाल कूच किया। 19 संगठनों के तहत संयुक्त किसान मोर्चा के किसान नर्मदापुरम से मार्च करते हुए बैरिकेड तोड़ते हुए सीएम आवास के से करीब 1 किलोमीटर दूर पहुंच गए थे। इससे सड़कों पर जाम और तनाव की स्थिति बन गई थी।

मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने किसानों के बड़े आंदोलन को देखते हुए तत्काल मंत्रियों की एक समिति गठित की। कृषि मंत्री ऐदल सिंह कंसाना समेत अन्य मंत्रियों ने किसानों से बात की और मंत्रालय में मोर्चा संभाला। मंत्रालय से लेकर पुलिस और प्रशासन को सक्रिय किया। सरकार ने मूंग खरीद की सीमा 25% से बढ़ाकर 60% करने का बड़ा एलान कर किसानों का दिल जीत लिया। खरीद समय-सीमा बढ़ाने के बड़े एलान के साथ ही खाद वितरण का ई-टोकन सिस्टम स्थगित कर समीक्षा के लिए समिति बनाई गई। इसके बाद अधिकांश किसान संगठनों ने आंदोलन वापस ले लिया और सड़कें खुल गई।

मूंग उपज का 60 प्रतिशत उपार्जन किया जाएगा

किसानों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए सरकार ने स्लॉट बुकिंग की अवधि भी 10 दिन बढ़ाने का निर्णय लिया। अब किसान 30 जुलाई के स्थान पर 10 अगस्त तक स्लॉट बुकिंग कर सकेंगे। इसी प्रकार उपार्जन की अंतिम तिथि भी 10 अगस्त से बढ़ाकर 20 अगस्त की जा रही है। सरकार द्वारा यह निर्णय तत्काल प्रभाव से लागू किया जिससे अधिक से अधिक किसानों को इसका लाभ मिले।

ई-टोकन व्यवस्था में सुधार के लिये समिति गठित होगी

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्णय लिया। यह समिति ई-टोकन व्यवस्था से जुड़ी सभी समस्याओं का परीक्षण कर राज्य सरकार को अपनी अनुशंसाएं प्रस्तुत करेगी। समिति की अनुशंसाओं के आधार पर आवश्यक सुधार तत्काल किए जाएंगे। सुझाव प्राप्त होकर सुधार होने तक ई-टोकन से खाद वितरण की व्यवस्था तत्काल प्रभाव से स्थगित की जा रही है।

मिशन मोड में लागू कर रहे योजनाएँ

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव अपने ठोस निर्णयों के लिए जाने जाते हैं। वह केवल घोषणाओं तक सीमित नहीं रहते। वह अपनी सभी योजनाओं को मिशन मोड में लागू कर रहे हैं और किसानों से सीधा जुड़ाव बना रहे हैं। यही नहीं केंद्र की सभी योजनाओं को प्रदेश स्तर पर मजबूती से लागू कर रहे हैं।

आज दलहन, तिलहन, मक्का और टमाटर उत्पादन में मध्यप्रदेश देश में अग्रणी राज्य बना गया है। सोलर ऊर्जा, मूल्य समर्थन, सिंचाई की बेहतर सुविधाओं और आधुनिक तकनीक के संयोजन से वे किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में दिन रात काम कर रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का मानना है कि राज्य सरकार कृषक कल्याण वर्ष में सभी अन्नदाता बंधुओं के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उनकी सरकार किसानों की बेहतरी के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगी।

किसान हितैषी मुख्यमंत्री के रूप में डॉ. मोहन यादव की यह नई छवि भविष्य में मध्य प्रदेश की कृषि अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई पर ले जाएगी। आज उनके सफल प्रयासों से न केवल प्रदेश के किसानों की आय बढ़ रही है, बल्कि खेती को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप ढालने का नया कार्य भी हो रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने बेहतर संवाद से किसान संगठनों की मांगों पर सकारात्मक रुख दिखाकर सही मायनों में अपनी बेहतर राजनीतिक परिपक्वता को दिखाने का कार्य किया है। भले ही प्रदेश का विपक्ष इसे किसानों के पक्ष में एक अधूरी मांग बता रहा है लेकिन मध्यप्रदेश में एक बड़े किसान आंदोलन का जल्द समाप्त होना मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के लिए एक बड़ा सकारात्मक संदेश माना जा रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किसान आंदोलन के शुरू होते ही सीधा हस्तक्षेप कर संवाद के रास्ते खोलकर एक बड़ा मास्टर स्ट्रोक खेला और स्थिति को बेहतर ढंग से संभाला जिससे विपक्ष चारों खाने चित्त हुआ है और किसानों के बीच उनकी मजबूत छवि बनी है। अपने कार्यों और ठोस निर्णयों से अब वह प्रदेश की राजनीति में स्थापित होते नजर आ रहे हैं।

Wednesday, 29 July 2026

‘टाइगर स्टेट’ एमपी में लगातार बढ़ता जा रहा है बाघों का कुनबा


मध्यप्रदेश को प्रकृति ने न केवल मुक्त हस्त से संवारा है बल्कि नैसर्गिक सौंदर्य और हरियाली से आच्छादित किया है, वहीं प्रदेश सरकार ने भी वन्य प्राणी संरक्षण एवं प्रबंधन पर विशेष ध्यान देकर इसे वन्य प्राणी समृद्ध प्रदेश बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। पिछले डेढ़ दशक के दौरान श्रेष्ठ और सतत वन्य प्राणी प्रबंधन के प्रयासों के चलते आज मध्यप्रदेश देश और दुनिया में अग्रणी प्रदेश बना है। मध्यप्रदेश को भारत का ‘टाइगर स्टेट’ कहा जाता है और वन्य जीव संरक्षण की दिशा में देश के हृदयप्रदेश मध्यप्रदेश की  प्रतिबद्धताओं के चलते यह खिताब आज पहले से कहीं अधिक मजबूत हो चुका है। यह गर्व की बात है कि मध्यप्रदेश के जंगलों में टाइगर की दहाड़ लगातार गूंज रही है। वर्ष 2022 में हुई बाघों की गणना के अनुसार प्रदेश में 785 बाघ थे, जो देश में सबसे अधिक हैं। अब वन्य अधिकारी और विशेषज्ञ यह अनुमान लगा रहे हैं कि यह संख्या एक हजार के पार पहुँच चुकी है जो बाघों के संरक्षण और संवर्धन कि दिशा में एक बड़ी सफलता है।

 

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाघों की जातियों की घटती संख्या, उनके अस्तित्व और संरक्षण संबंधी चुनौतियों के प्रति जन-जागृति के लिए अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस  29 जुलाई को प्रतिवर्ष  मनाया जाता है।  विश्व बाघ दिवस 29 जुलाई को मनाए जाने का निर्णय वर्ष 2010 में सेंट पीटर्सबर्ग बाघ सम्मेलन में किया गया था।  इस सम्मेलन में बाघ की आबादी वाले देशों ने वादा किया था कि बहुत जल्द वे बाघों की आबादी दोगुनी कर देंगे।  इस लक्ष्य को प्राप्त करने में मध्यप्रदेश ने तेजी से काम किया और प्रबंधन में निरंतरता दिखाते हुए पूरे देश में वन्यजीवों के संरक्षण और संवर्धन में अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति करने में सफलता पाई है।  मध्यप्रदेश में 2022 में हुई पिछली गणना के अनुसार 785  बाघ हैं, जो देश में सर्वाधिक  हैं। इसके बाद 563 बाघों के साथ कर्नाटक दूसरे और 560 बाघों के साथ उत्तराखंड तीसरे नंबर पर है।  2010 में मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या मात्र 257 थी। 2014 में यह 308, 2018 में 526 और 2022 में 785 हो गई। 2014 से 2022 के बीच लगभग 155 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। भारत में कुल बाघों की संख्या 2022 में 3,682 आँकी गई थी, जिसमें मध्यप्रदेश का सबसे बड़ा योगदान रहा। अभी 2026 की नई गणना चल रही है। इस बार प्रदेश में पहली बार कुछ नए टाइगर रिजर्व भी शामिल किए गए हैं जिसके बाद से यहाँ पर बाघों की संख्या बढ़ाने का सहज ही अनुमान लगाया जा रहा है।यह बढ़ोतरी संयोग नहीं, बल्कि वन्य जीव संरक्षण की दिशा में प्रदेश सरकार द्वारा किए गए निरंतर प्रयासों का प्रतिफल है। मध्यप्रदेश के टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्रों से दो सौ से अधिक गाँवों का पुनर्वास किया गया। इससे बाघों को बिना मानव हस्तक्षेप के घूमने और शिकार करने का बड़ा क्षेत्र मिला। पुराने खेत घास के मैदान बन जाने से जंगलों में शिकार की उपलब्धता बढ़ी।पिछले वर्षों में वन विभाग ने सैकड़ों शिकारियों को भी पकड़ा। कैमरा ट्रैप, डीएनए तकनीक और आधुनिक निगरानी व्यवस्था सरीखी अत्याधुनिक तकनीकों ने बाघों की गणना और सुरक्षा दोनों को मजबूत करने का काम किया है। बाघ की दहाड़ अब प्रदेश के टाइगर रिजर्व के बाहर भी सुनाई दे रही है। राजधानी भोपाल के शहरी इलाकों में भी बाघों की आवाजाही अब देखी जा सकती है। बाघों को मध्यप्रदेश की आबोहवा इस कदर रास आ रही है कि आने वाले दिनों में इनकी टेरिटरी बढ़ने की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता।

 

प्रदेश का पहला टाइगर रिजर्व 1973 में कान्हा टाइगर बना। मध्यप्रदेश में 9 टाइगर रिजर्व हैं, जिसमें कान्हा किसली, बांधवगढ़, पेंच, पन्ना बुंदेलखंड, सतपुड़ा नर्मदापुरम, संजय दुबरी सीधी, नौरादेही, माधव नेशनल पार्क और डॉ. विष्णु वाकणकर टाइगर रिजर्व (रातापानी) शामिल हैं। मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में सबसे अधिक बाघ हैं। यह रिजर्व मध्यप्रदेश का सबसे प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व है। बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान उमरिया जिले में स्थित पार्क है जो देश में सर्वाधिक बाघ घनत्व के लिए प्रसिद्ध है। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व एक ऐसी जगह है, जहां बाघों की भरमार है और आसानी से पर्यटक इनका दीदार कर सकते हैं। यही वजह है कि बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में पर्यटक काफी तादात में आते हैं और साल दर साल पर्यटकों की संख्या को लेकर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व नए-नए कीर्तिमान बनाता जा रहा है।

 

कान्हा राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश का सबसे बड़ा और पहला राष्ट्रीय उद्यान है जो मंडला और बालाघाट जिलों में फैला है। माधव राष्ट्रीय उद्यान शिवपुरी जिले में स्थित है। पेंच राष्ट्रीय उद्यान सिवनी और छिंदवाड़ा जिलों में स्थित है जो रुडयार्ड किपलिंग की जंगल बुककी प्रेरणा बना। पन्ना राष्ट्रीय उद्यान पन्ना और छतरपुर जिलों में फैला हुआ बाघ आरक्षित क्षेत्र है। सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान नर्मदापुरम जिले में स्थित घने जंगलों वाला क्षेत्र है। संजय-दुबरी राष्ट्रीय उद्यान सीधी और सिंगरौली जिलों में स्थित है। कूनो राष्ट्रीय उद्यान श्योपुर जिले में स्थित है जो वर्तमान में अफ्रीका से लाए गए चीतों के पुनर्वास के कारण पूरी दुनिया में चर्चाओं के केन्द्र में है। इसके अलावा मध्यप्रदेश में 24 अभयारण्य हैं। अभयारण्य के रूप में पचमढ़ी, पनपथा, बोरी, पेंच-मोगली, गंगऊ, संजय- दुबरी, बगदरा, सैलाना, गांधी सागर, करेरा, नौरादेही, राष्ट्रीय चम्बल, केन, नरसिहगढ़, रातापानी, सिंघोरी, सिवनी, सरदारपुर, रालामण्डल, केन घड़ियाल, सोन चिड़िया अभयारण्य घाटीगांव, सोन घड़ियाल अभयारण्य, ओरछा और वीरांगना दुर्गावती अभयारण्य अपनी विशिष्ट पहचान के लिए देश में जाने जाते हैं। भारत में सबसे अधिक राष्ट्रीय उद्यान मध्य प्रदेश में ही स्थित हैं, जिसके कारण इसे वन्य जीव पर्यटन का प्रमुख केन्द्र और टाइगर स्टेट भी कहा जाता है।

 

यह सुखद है कि अब मध्यप्रदेश के भीतर बाघों की संख्या टाइगर रिजर्व की सीमाओं के बाहर भी तेजी से बढ़ रही है और बाघों की हलचल शहरी इलाकों की इंसानी आबादी के बीच भी महसूस की जा रही है। सतना से लेकर सीधी, शहडोल से अमरकंटक ,डिंडौरी के लेकर मंडला तक में भी बाघों का कुनबा नई चहलकदमी कर रहा है। तीन बार टाइगर स्टेट का दर्जा हासिल करने के साथ ही राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन में भी देश में सबसे आगे है। इन राष्ट्रीय उद्यानों में कुशल प्रबंधन और अनेक नवाचारी तौर तरीकों को अपनाया गया है। प्रदेश के टाइगर रिजर्व क्षेत्रों और चिड़ियाघरों में भी बाघ हैं, जहां इनका संरक्षण और प्रजनन होता है। जहाँ एक तरफ हाल के वर्षों में प्रदेश सरकार ने ईको विकास समितियों को प्रभावी ढंग से पुनर्जीवित किया है वहीँ वाटरहोल बनाने और घास के मैदानों के रखरखाव और वन्य-जीव निवास स्थानों को रहने लायक बनाने के अनेक कार्यक्रम समय- समय पर भी चलाये हैं जिसका जमीनी असर अब दिखाई दे रहा है।

 

मध्यप्रदेश राष्ट्रीय उद्यानों और संरक्षित क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन में भी देश में आगे है। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को यूनेस्को की विश्व धरोहर की संभावित सूची में शामिल किया गया है। भारत सरकार द्वारा समय- समय पर जारी की जाने वाली टाइगर रिज़र्व के प्रबंधन की प्रभावशीलता मूल्यांकन रिपोर्ट में एमपी ने देश में नया मुकाम हासिल किया है। बांधवगढ़, कान्हा, पेंच टाइगर रिजर्व,संजय और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को सर्वश्रेष्ठ प्रबंधन वाला टाइगर रिजर्व माना गया है। इन सभी राष्ट्रीय उद्यानों में अनुपम प्रबंधन योजनाओं और नवाचारी तरीकों को अपनाया गया है। खुली जगह के साथ ही वन्यजीवों को तनावमुक्त वातावरण और उचित आहार की भी जरूरत होती है जिस दिशा में प्रदेश में बेहतरीन कार्य हुआ है जिसके चलते मध्यप्रदेश में बाघों की संख्या तेजी से बढ़ी है। जहाँ एक तरफ हाल के वर्षों में प्रदेश सरकार ने बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व ने बाघ पर्यटन द्वारा प्राप्त राशि का उपयोग कर ईको विकास समितियों को प्रभावी ढंग से पुनर्जीवित किया है वहीँ वाटरहोल बनाने और घास के मैदानों के रखरखाव और वन्य-जीव निवास स्थानों को रहने लायक बनाने का कार्यक्रम भी चलाया है। कान्हा-पेंच वन्य-जीव विचरण कारीडोर भारत का पहला ऐसा कारीडोर है, जिसमें कारीडोर का प्रबंधन स्थानीय समुदायों, सरकारी विभागों, अनुसंधान संस्थानों और नागरिक संगठनों द्वारा सामूहिक रूप से किया जाता है। प्रदेश में बाघों की संख्या बढ़ाने में इन सभी राष्ट्रीय उद्यानों के बेहतर प्रबंधन की मुख्य भूमिका है। राज्य शासन की सहायता से कई सौ गाँवों का विस्थापन किया गया जिससे बहुत बड़ा भू-भाग जैविक दबाव से मुक्त हुआ है। संरक्षित क्षेत्रों से गाँवों के विस्थापन के फलस्वरूप वन्य-प्राणियों के रहवास क्षेत्र का विस्तार हुआ है। कान्हा, पेंच और कूनो पालपुर के कोर क्षेत्र से सभी गाँव को विस्थापित किया जा चुका है।

 

बाघों की सुरक्षा के प्रति भी मध्यप्रदेश सरकार संवेदनशील है। वन्य जीवों के संरक्षण के लिए सरकार अनेक नवाचारी डिजिटल तकनीक का प्रयोग कर रही है जिससे बाघों की हर गतिविधि पर नजर रखी जा रही है। बाघ संरक्षण में अत्याधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करने की पहल करते हुए प्रदेश के टाइगर रिजर्व ने “ड्रोन स्क्वाड” का संचालन किया है जिसके माध्यम से निगरानी रखने, वन्यजीवों की खोज और बचाव करने, जंगल की आग का पता लगाने और उससे रक्षा करने और मानव-पशुओं के संघर्ष को कम करने के लिये की गई है जिससे जैव-विविधता के दस्तावेज़ीकरण में भी मदद मिल रही है। बांधवगढ़, कान्हा, पेंच, संजय और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व राष्ट्रीय उद्यानों में अनुपम प्रबंधन योजनाओं और नवाचारी तरीकों को अपनाया गया है। बाघों की सुरक्षा के लिए बघीरा एप की सहायता से जंगल में सफारी की गतिविधि को ट्रैक किया जाता है। टाइगर रिजर्व में अनूठी प्रबंधन रणनीतियों को अपनाया जाता है। यहाँ पर आधुनिक तकनीकों का भी उपयोग हो रहा है। ड्रोन सर्विलांस, कैमरा ट्रैप और सैटेलाइट मॉनिटरिंग से अब हर बाघ की गतिविधि पर नजर रखी जाती है। इसके अलावा, जंगल में आग और शिकार की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए वन विभाग लगातार गश्त भी करता है। वन्य जीव संरक्षण में अत्याधुनिक तकनीकी का इस्तेमाल करने की पहल करते हुए प्रत्येक महीने “ड्रोन स्क्वाड” संचालन की मासिक कार्ययोजना तैयार की जाती है। इससे वन्य जीवों की खोज, उनके बचाव, जंगल की आग का स्त्रोत पता लगाने और उसके प्रभाव की तत्काल जानकारी जुटाने, संभावित मानव-पशु संघर्ष के खतरे को टालने और वन्य जीव संरक्षण संबंधी कानूनों का पालन करने में मदद मिल रही है।

 

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रदेश के राष्ट्रीय उद्यानों में बेहतर प्रबंधन से जहाँ एक ओर वन्य प्राणियों को संरक्षण मिलता है, वहीं बाघों के प्रबंधन में लगातार सुधार भी हुए हैं। मुख्यमंत्री डॉ.यादव ने अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस पर जंगलों में बाघों के भविष्य को सुरक्षित करने और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने के लिए एकजुट होकर कार्य करने की प्रतिबद्धता को दोहराया है। बाघों की उपस्थिति सिर्फ जैव विविधता के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी बेहद जरूरी है। बाघ जितने स्वस्थ रहेंगे, उतना ही हमारा पर्यावरण और जंगल सुरक्षित रहेंगे। यही कारण है कि एमपी में बाघों की निगरानी की मजबूत व्यवस्था बनाई गई है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पहल पर मध्यप्रदेश में बाघों के संरक्षण के लिये कई नवाचार किये जा रहे हैं। मध्यप्रदेश में बाघों की जीन टेस्टिंग करने की योजना है, जिससे उनकी सटीक पहचान की जा सकेगी। गुजरात के बनतारा जू और रेस्क्यू सेंटर की तर्ज पर प्रदेश में उज्जैन और जबलपुर में रेस्क्यू सेंटर बनाये जा रहे हैं।

 

मध्यप्रदेश ने साबित कर दिया है कि बेहतर ढंग से प्रबंधन, स्थानीय लोगों के सहयोग और प्रशासन के सहयोग से बाघों का कुनबा बढ़ सकता है। बाघ सिर्फ जंगल का राजा नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संकेतक है। जब बाघ सुरक्षित होंगे, तो जंगल भी हरे-भरे रहेंगे और स्थानीय अर्थव्यवस्था को पर्यटन से भी लाभ मिलेगा। मध्य प्रदेश अपने नवाचारों के माध्यम से आज पूरी दुनिया के सामने बाघ संरक्षण और संवर्धन की अनुपम मिसाल पेश कर रहा है।

Tuesday, 28 July 2026

अब एमपी में हर शुक्रवार को चलेगा 'जन विश्वास अभियान' , सीधे जनता के द्वार पहुंचेगी मोहन सरकार

 मध्यप्रदेश  सरकार ने जन समस्याओं के त्वरित समाधान और सरकारी योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में प्रदेश में ' जन विश्वास अभियान' की शुरुआत हो रही है। यह अभियान 7 अगस्त से पूरे प्रदेश में चलेगा और प्रत्येक शुक्रवार को आयोजित किया जाएगा। अधिकारी गांवों व शहरी वार्डों में पहुंचकर सरकारी योजनाओं और सेवाओं की जमीनी हकीकत जांचेंगे।

'जन विश्वास अभियान' का मूल उद्देश्य सरकार को जनता के द्वार तक ले जाना है। इसमें मुख्यमंत्री से लेकर कलेक्टर, मंत्री, जनप्रतिनिधि और अधिकारी हर शुक्रवार मैदान में उतरकर आम लोगों की समस्याएं सुनेंगे और मौके पर ही उनका समाधान करने का प्रयास करेंगे। विभिन्न योजनाओं के जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की निगरानी भी इसी अभियान का हिस्सा होगी।

शुक्रवार को फील्ड पर सरकार और प्रशासन का फोकस 

 खास बात यह है कि अब प्रदेश में हर शुक्रवार को अधिकारियों की नियमित बैठकें नहीं होंगी, बल्कि उनका फोकस फील्ड  पर रहेगा। मंत्री अपने प्रभार वाले जिलों से शुरुआत करेंगे। प्रशासनिक अधिकारी और जनप्रतिनिधि गांवों, वार्डों और पंचायतों में पहुंचकर जनता से सीधे संवाद करेंगे। मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने इस अभियान की शुरुआत की जानकारी आज कैबिनेट बैठक के दौरान दी। उन्होंने सरकार के अभियान की जानकारी मंत्रियों को देते हुए कहा कि जन विश्वास अभियान के जरिए सरकार की अलग-अलग विभागों की योजनाओं की सीधे तौर पर मॉनिटरिंग होगी। सभी जनप्रतिनिधि, मंत्री विधायक मैदान में जाकर लोगों की समस्या सुनेंगे। इसमें अधिकारियों की पूरी टीम भी जाएगी। शुक्रवार को मंत्रालय और जिला व संभाग स्तर पर कोई बड़ी बैठक नहीं होगी। जिलों में कलेक्टर भी फील्ड में जाएंगे।

सुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम : कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह

कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह ने भी इस पहल को सुशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। कैबिनेट के फैसलों की जानकारी देते हुए लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह ने कहा कि  यह अभियान सरकार और जनता के बीच विश्वास बढ़ाने का माध्यम बनेगा। मंत्री  राकेश  सिंह ने आज कैबिनेट के फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि मंत्री पहले प्रभार के क्षेत्र में जाएंगे। उन्होनें  बताया कि अभियान के दौरान यदि गड़बड़ी या भ्रष्टाचार से जुड़े मामले सामने आते हैं तो उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। अभियान में संवाद, समाधान, संवेदनशीलता और सादगी पर फोकस होगा। अभियान के लिए अतिरिक्त राशि खर्च नहीं होगी। कोई  बड़े टेंट नहीं लगाए जाएंगे। 

आमजन के लिए संदेश, जनता का सीधे सरकार से जुड़ाव 

एमपी में अब हर शुक्रवार कोई भी बैठक नहीं होगी, बल्कि सरकार और जनता के बीच संवाद और समाधान का दिन होगा।मोहन सरकार ने प्रदेश के नागरिकों से अपील है कि वे इस अभियान का लाभ उठाएं। अपनी समस्याएं, शिकायतें और सुझाव अधिकारी और जनप्रतिनिधियों के सामने रखें। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की इस पहल को जनहित में एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। ‘जनता के द्वार सरकार’ की भावना को साकार करने वाला यह अभियान मध्य प्रदेश में सुशासन को नई ऊंचाई देने वाला साबित हो सकता है। 

मध्य प्रदेश सरकार पिछले कुछ वर्षों से जनकल्याण शिविरों जैसी पहलों के माध्यम से सरकार की तमाम योजनाओं को जनता  तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है। जन विश्वास अभियान इन प्रयासों को और मजबूत बनाएगा। कई बार योजनाओं के लाभ सही समय पर नहीं पहुंच पाते या समस्याएं लंबित रह जाती हैं।  ऐसे में हर शुक्रवार  सरकार का यह 'जनविश्वास अभियान'  जनता के लिए मददगार साबित होगा। सरकार का मानना है कि जब प्रशासन खुद जनता के बीच जाएगा, तो न केवल समस्याओं का समाधान तेज होगा, बल्कि शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ेगी।

Tuesday, 21 July 2026

'नमो' और 'मोहन' सरकार एमपी में लिख रही है सहकारिता का नया अध्याय


पीएम नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व और डॉ.मोहन यादव की संकल्पशील सरकार मध्य प्रदेश में सहकारिता का स्वर्णिम अध्याय लिख रही है। यह विकास का ऐसा मॉडल है जो समावेशी, टिकाऊ और किसान-केंद्रित है। मोहन सरकार की सहकारिता नीतियाँ विकास का प्रगतिशील मॉडल प्रस्तुत कर रही हैं, जहाँ तकनीक, पारदर्शिता और जन-भागीदारी एक साथ काम कर रही हैं।

भारत में सहकारिता आंदोलन को नई दिशा देने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में मध्यप्रदेश की मोहन यादव सरकार ने एक नया इतिहास रचा है। “सहकार से समृद्धि” के मंत्र को साकार करते हुए केंद्र और राज्य की यह साझेदारी किसानों, ग्रामीणों, युवाओं और छोटे उद्यमियों को सशक्त बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। मध्य प्रदेश में सहकारिता क्षेत्र अब केवल ऋण और कृषि तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह बहु-उद्देशीय विकास, रोजगार सृजन और आर्थिक समावेशन का प्रमुख माध्यम बन रहा है। यह मॉडल देश अन्य राज्यों के लिए भी प्रेरणादायी है।


मोदी सरकार का दूरदर्शी विजन सहकारिता

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना कर इस क्षेत्र को नई ऊर्जा दी। केन्द्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में चल रहे सुधारों ने सहकारी संस्थाओं को मजबूत बनाया है। देश भर में लगभग 70,000 प्राथमिक कृषि ऋण समितियों का कंप्यूटरीकरण, बहु-राज्य सहकारी समितियों का गठन और निर्यात के नए प्लेटफॉर्म किसानों को उचित मूल्य दिला रहे हैं।

अप्रैल 2025 में भोपाल में आयोजित सहकारिता सम्मेलन में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड और मध्य प्रदेश सहकारी डेयरी फेडरेशन  के बीच महत्वपूर्ण एमओयू पर हस्ताक्षर किए जिससे राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में में सहकारी डेयरी को बढ़ावा मिल रहा है। वर्तमान में केवल 17% गांवों में दूध संग्रहण व्यवस्था है, जिसे 83% तक विस्तारित करने का लक्ष्य पर मोहन नजर आ रहे हैं। इससे किसानों को दूध का बेहतर मूल्य मिलेगा और प्रसंस्करण क्षमता कई गुना बढ़ेगी।

सहकारिता से समृद्धि” बना मोहन सरकार का मंत्र

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सहकारिता को राज्य की समृद्धि का मुख्य आधार बना रहे हैं। मोहन सरकार ने सहकारिता क्षेत्र को मजबूत बनाने, पारदर्शी और आधुनिक बनाने के लिए अभूतपूर्व प्रयास किए हैं।“सहकारिता से समृद्धि” के मंत्र को आत्मसात करते हुए मोहन सरकार ने सहकारी संस्थाओं को किसानों, ग्रामीणों और युवाओं की आर्थिक उन्नति का प्रमुख माध्यम बनाया है। इस क्षेत्र में हुई उपलब्धियाँ न केवल प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ताकत दे रही हैं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी मिसाल बन रही हैं।

दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार गांव-गांव में प्राथमिक दूध उत्पादक समितियां स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है। पीएम मोदी के विजन के अनुरूप बहु-उद्देश्यीय सहकारी समितियों का गठन किया जा रहा है जिसमें कृषि, डेयरी, उद्योग और सेवाएं शामिल हुई हैं जिससे सहकारिता के माध्यम से युवाओं को उद्यमिता और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम होगा। जल्द ही मोबाइल ऐप के जरिए ट्रांजेक्शन भी किया जा सकेगा।

पैक्स का पूर्ण कंप्यूटरीकरण और डिजिटलीकरण

 मोहन सरकार की एक बड़ी उपलब्धि सभी 4,536 प्राथमिक कृषि साख समितियोंका कंप्यूटरीकरण पूरा करना है। इससे मध्य प्रदेश देश के अग्रणी राज्यों में शामिल हो गया है। किसान कल्याण वर्ष में पहली बार प्रदेश के किसानों के चेहरे पर ख़ुशी दिखाई दे रही है। आज किसानों को घर बैठे सेवाएँ मिल रही हैं। मोबाइल ऐप के माध्यम से खेती में नवाचार हो रहे हैं और फसल के बारे में कई जानकारी मिल रही है। एक वर्ष में सवा लाख नए किसान क्रेडिट कार्ड स्वीकृत करने का निर्देश दिया गया है। 1102 नई दुग्ध समितियों का गठन कर 5562 दुग्ध समितियों तथा वित्तीय समावेशन के लिए 76 हजार सदस्यों के खाते जिला सहकारी बैंक में खोले गए हैं जिससे किसान सहकारिता की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं।

 इसी तरह कमजोर सहकारी बैंकों को कई करोड़ रुपये की सहायता देकर सशक्त बनाया गया है। ढाई वर्षों में 18 कमजोर जिला बैंकों में से 6 की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। प्रदेश की सभी 4536 पैक्स को केंद्र प्रायोजित कंप्यूटराइजेशन योजना अंतर्गत कंप्यूटरीकृत कराया गया है। शत-प्रतिशत कंप्यूटराइजेशन से योजना क्रियान्वयन में प्रदेश देश में अग्रणी है।

दुग्ध क्रांति 2.0 और पशुपालन को बढ़ावा

 मोहन सरकार सांची ब्रांड को बड़ा ब्रांड बनाने की दिशा में काम कर रही है। नई दुग्ध क्रांति के तहत दुग्ध सहकारिता समितियों को लगातार मजबूत किया जा रहा है। 1,102 नई समितियाँ और 5,562 दुग्ध समितियाँ स्थापित की गई हैं। किसानों और गौपालकों को बोनस देकर लाभ पहुँचाने की योजना है। सहकारी समितियों को पेट्रोल पंप, एग्रो-स्टोर आदि विविध व्यवसायों से जोड़ा जा रहा है। सहकारी ऑडिट में मध्यप्रदेश देश में प्रथम स्थान पर है। भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड के साथ प्रदेश के सहकारी बीज संघ ने एमओयू किया है जिससे 17 करोड़ रूपये का व्यवसाय और 844 पैक्स द्वारा सदस्यता प्राप्त हुई है। बीज उत्पादक सहकारी संस्थाओं के माध्यम से गत 2 वर्षों में 14 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज का उत्पादन एवं विपणन हुआ है ।

सहकारिता में ग्रामीणों की सशक्त भागीदारी

 सहकारिता को जन-आंदोलन का स्वरूप देते हुए युवाओं को इसमें भागीदारी दी जा रही है। एक तरफ जहां प्रदेश में ‘सारथी दीदी’ जैसी सेवाएँ शुरू की गई हैं वहीं स्वामित्व योजना के तहत ग्रामीण संपत्ति अधिकारों को मजबूत किया जा रहा है। इन उपलब्धियों से किसानों की आय बढ़ रही है, ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है और पीएम मोदी के आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को गति मिल रही है। मोहन सरकार का विजन सहकारिता को पारदर्शी, तकनीकी रूप से सक्षम और लाभकारी बनाकर हर गांव को समृद्ध बनाना है।

सहकारिता से समृद्धि की ओर

 मध्यप्रदेश में सहकारिता अब “परस्पर स्वावलंबन” का प्रतीक बन गई है। मोदी सरकार के राष्ट्रीय ढांचे और मोहन यादव सरकार की राज्य-स्तरीय ऊर्जा से सहकारिता क्षेत्र का परिदृश्य अब तेजी से बदल रहा है। किसान अब मध्यस्थों के चंगुल से मुक्त होकर सीधे बाजार से जुड़ रहे हैं, छोटे उद्यमी नई संभावनाएं तलाश रहे हैं और गांव आत्मनिर्भर बन रहे हैं। 

मोहन सरकार “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के मंत्र को सहकारिता के क्षेत्र में जीवंत कर रही है। सहकारिता से समृद्ध मध्य प्रदेश की यह यात्रा सशक्त मध्यप्रदेश और पीएम नरेंद्र मोदी के विकसित भारत के विजन को साकार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

Sunday, 5 July 2026

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी : भारतीय जनसंघ के संस्थापक राष्ट्रवादी चिंतक


डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी आधुनिक भारत के उन विराट व्यक्तित्वों में से एक थे जिन्होंने शिक्षा, कानून, राजनीति और राष्ट्रवाद के क्षेत्र में अप्रतिम योगदान दिया। वे एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, बैरिस्टर, कुशल प्रशासक, प्रखर वक्ता और सशक्त राष्ट्रवादी नेता थे। अल्पायु में ही उन्होंने देश की सेवा में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया और अंततः जम्मू-कश्मीर की पूर्ण एकीकरण की लड़ाई में शहीद हो गए।

 

6 जुलाई 1901को कलकत्ता के अत्यन्त प्रतिष्ठित परिवार में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी  का जन्म हुआ। उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे जो एक प्रखर शिक्षाविद के रूप में विख्यात थे। डॉ.मुखर्जी ने 1917 में मैट्रिक किया तथा 1921 में बी०ए० की उपाधि प्राप्त की। 1923 में लॉ की उपाधि अर्जित करने के पश्चात वह विदेश चले गये और 1926 में इंग्लैण्ड से बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे। अपने पिता का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी अल्पायु में ही विद्याध्ययन के क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलताएँ अर्जित कर ली थी। 1934 में मात्र 33 वर्ष की आयु में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा कुलपति भी बने। इस पद पर रहते हुए  उन्होंने उच्च शिक्षा के विस्तार और सुधार के लिए महत्वपूर्ण कार्य किए। वे एक प्रखर विचारक और लेखक भी थे। उनकी आत्मकथा लीव्स फ्रॉम ए डायरी  और अन्य लेखन भारतीय इतिहास तथा शिक्षा व्यवस्था पर गहरी अंतर्दृष्टि रखते हैं। एक विचारक और शिक्षाविद  के रूप में उनकी ख्याति निरन्तर आगे बढ़ती गई।

 

मुखर्जी की राजनीतिक यात्रा देश 1930 के दशक में शुरू हुई। वे शुरू में कांग्रेस से जुड़े लेकिन हिंदू महासभा के माध्यम से सक्रिय हुए। पत्नी सुधा देवी की 1934 में मृत्यु के बाद उन्होंने पुनर्विवाह नहीं किया और पूर्ण रूप से देशसेवा में लगे रहे। 1943 से 1946 तक वे अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी रहे। बंगाल के अकाल (1943) के दौरान उन्होंने बड़े पैमाने पर राहत कार्य संगठित किए।

 

डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने स्वेच्छा से अलख जगाने के उद्देश्य से राजनीति में प्रवेश किया था। डॉ.मुखर्जी सच्चे अर्थों में मानवता के उपासक और सिद्धान्तवादी थे। उन्होंने बहुत से गैर कांग्रेसी हिन्दुओं की मदद से कृषक प्रजा पार्टी से मिलकर प्रगतिशील गठबन्धन का निर्माण किया। इस सरकार में वे वित्त मन्त्री बने। इसी समय वे सावरकर के राष्ट्रवाद के प्रति आकर्षित हुए और हिन्दू महासभा में सम्मिलित हुए। मुस्लिम लीग की राजनीति से बंगाल का वातावरण दूषित हो रहा था। वहाँ साम्प्रदायिक विभाजन की नौबत आ रही थी। साम्प्रदायिक लोगों को ब्रिटिश सरकार प्रोत्साहित कर रहा था। ऐसी विषम परिस्थितियों में उन्होंने यह सुनिश्चित करने का बीड़ा उठाया कि बंगाल के हिन्दुओं की उपेक्षा न हो। अपनी विशिष्ट रणनीति से उन्होंने बंगाल के विभाजन के मुस्लिम लीग के प्रयासों को पूरी तरह से नाकाम कर दिया।  


डॉ.मुखर्जी इस धारणा के प्रबल समर्थक थे कि सांस्कृतिक दृष्टि से हम सब एक हैं इसलिए धर्म के आधार पर वे विभाजन के कट्टर विरोधी थे। वे हिंदुत्व विचारधारा से प्रेरित जरूर थे, लेकिन सभी धर्मों के प्रति सम्मान रखते थे। उन्होंने बंगाल विभाजन के समय पश्चिम बंगाल को भारत में बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे मानते थे कि विभाजन सम्बन्धी उत्पन्न हुई परिस्थिति ऐतिहासिक और सामाजिक कारणों से थी। वे मानते थे कि आधारभूत सत्य यह है कि हम सब एक हैं। हम सभी में कोई अन्तर नहीं है। हम सब एक पर विशेष हो रक्त के हैं। एक ही भाषा, एक ही संस्कृति और हमारी विरासत भी एक है परन्तु उनके इन विचारों को अन्य राजनैतिक दल के तत्कालीन नेताओं ने अन्यथा रूप से प्रचारित-प्रसारित किया बावजूद इसके लोगों के दिलों में उनके प्रति अधाह प्यार और समर्थन बढ़ता गया।

 

अगस्त, 1946 में मुस्लिम लीग ने जंग की राह पकड़ ली और कलकत्ता में भयंकर बर्बरतापूर्वक अमानवीय मारकाट हुई। उस समय कांग्रेस का नेतृत्व सामूहिक रूप से राष्ट्रसेवा था। ब्रिटिश सरकार की भारत विभाजन की गुप्त योजना और षड्यन्त्र को एक कांग्रेस के नेताओं ने अखण्ड भारत सम्बन्धी अपने वादों को ताक पर रखकर स्वीकार कर लिया। उस समय डॉ. मुखर्जी ने बंगाल और पंजाब के विभाजन की बड़ी माँग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया और आधा बंगाल और आधा पंजाब खण्डित भारत के लिए बचा लिया। गांधी और सरदार पटेल के अनुरोध पर वे भारत के पहले मन्त्रिमण्डल में शामिल हुए जहां उन्हें उद्योग और आपूर्ति मंत्री जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई। इस दौरान उन्होंने स्वतंत्र भारत की औद्योगिक नीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसने देश के आर्थिक विकास की नींव रखी। हालांकि, पाकिस्तान के प्रति नेहरू की तुष्टिकरण नीति से असहमत होकर उन्होंने 1950 में अपना इस्तीफा देने में भी देरी नहीं की। संविधान सभा और प्रान्तीय संसद के सदस्य और केन्द्रीय मंत्री के नाते उन्होंने शीघ्र ही अपना विशिष्ट स्थान बना लिया किन्तु उनके राष्ट्रवादी चिन्तन के चलते अन्य नेताओं से मतभेद बराबर बने रहे। राष्ट्रीय हितों को प्रतिबद्धता को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानने के कारण उन्होंने मन्त्रिमण्डल से त्यागपत्र दे दिया जिसके बाद उन्होंने एक नई पार्टी बनाई जो उस समय विरोधी पक्ष के रूप में सबसे बड़ा दल था।

 

उनका सबसे बड़ा योगदान 21 अक्टूबर 1951 को भारतीय जनसंघ की स्थापना करना था, जिसके वे संस्थापक अध्यक्ष भी बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहायता से गठित यह पार्टी बाद में भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती बनी। जनसंघ का उद्देश्य सांस्कृतिक राष्ट्रवाद,  एकात्म भारत और मजबूत राष्ट्रीय सुरक्षा पर आधारित वैकल्पिक राजनीति प्रस्तुत करना था और 1952 के आम चुनावों में पार्टी ने तीन सीटें भी जीती। डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी जम्मू कश्मीर को भारत का पूर्ण और अभित्र अंग भी बनाना चाहते थे। उस समय जम्मू कश्मीर का अलग झंडा और अलग संविधान था। वहाँ का मुख्यमंत्री वजीरे आलम अर्थात प्रधानमन्त्री कहलाता था। संसद में अपने भाषण में मुखर्जी ने धारा-370 को समाप्त करने की भी जोरदार वकालत की। डॉ. मुखर्जी भारत की अखंडता के प्रबल पक्षधर थे। उन्होंने अनुच्छेद 370 का घोर विरोध किया जो जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देता था। उनका प्रसिद्ध नारा था “एक देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान नहीं चलेंगे।”

 

अगस्त 1952 में जम्मू की विशाल रैली में उन्होंने अपना संकल्प व्यक्त किया था कि या तो मैं आपको भारतीय संविधान प्राप्त कराऊँगा या फिर इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा। उन्होंने तत्कालीन नेहरू सरकार को चुनौती दी तथा अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। अपनी मजबूत संकल्प शक्ति से 1953 में वे कश्मीर घाटी में प्रवेश करने के लिए सत्याग्रह पर उतरे। जम्मू-कश्मीर सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया। तभी जेल में उनकी तबीयत बिगड़ी और 23 जून 1953 को मात्र 51 वर्ष की आयु में उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। उनका बलिदान कश्मीर को पूर्ण रूप से भारत में समाहित करने के संकल्प का एक बड़ा प्रतीक बन गया। डॉ. मुखर्जी का जीवन संदेश देता है कि सच्चा राष्ट्रवाद केवल शब्दों में नहीं, बल्कि बलिदान में प्रकट होता है।

Friday, 3 July 2026

एमपी की राजनीति में ‘एम फैक्टर’ की छाया में सिमटते कैलाश विजयवर्गीय

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में भाजपा सरकार की मजबूत पकड़, विकास परियोजनाओं पर उनका सीधा नियंत्रण और संगठनात्मक स्तर पर बढ़ती निर्णायक पकड़ ने भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं के लिए मौजूदा दौर में चुनौती खड़ी कर दी है। इसी कड़ी में एक बार फिर प्रदेश के नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का नाम जुड़ा है जो कई सार्वजनिक मंचों पर पार्टी के नेतृत्व को सार्वजनिक रूप से असहज करते जा रहे हैं।  

विजयवर्गीय का लैटर बम

हाल ही में कैलाश विजयवर्गीय ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को एक पत्र लिखा जिसमें उन्होंने अपने गृह जिले इंदौर की उपेक्षा का सीधा आरोप लगाया। पत्र में उन्होंने दावा किया कि मोहन सरकार में पिछले ढाई वर्षों से उन्हें केवल असहयोग और उपेक्षा ही मिल रही है। कथित पत्र में मास्टर प्लान में देरी, मेट्रोपालिटन सिटी योजना में इंदौर का नाम पीछे किए जाने, एयरपोर्ट विस्तार के लिए जमीन उपलब्ध नहीं कराने, राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के विभाजन में इंदौर की अनदेखी, औद्योगिक क्षेत्र पीथमपुर में सुविधाओं के अभाव और सिंहस्थ के कार्यों में इंदौर को शामिल नहीं किए जाने सहित कई मुद्दे उठाए जाने की बात कही है जिसके बाद पूरे प्रदेश में राजनीतिक हलचल तेज है। पत्र में कथित तौर पर कैलाश विजयवर्गीय ने यह भी लिखा है कि उन्हें ढाई वर्ष से सिर्फ असहयोग, उपेक्षा और विरोध ही मिला है और वह उपेक्षा से आहत हैं। यदि इन विषयों का समाधान नहीं हुआ तो इंदौर की जनता की आवाज को सार्वजनिक मंच पर उठाना उनकी विवशता होगी। इस लैटर बम ने सत्ता पक्ष के साथ ही विपक्ष में भी हड़कंप मचा दिया है।

‘कैलाश’ के तीर घाव करे गंभीर

कैलाश विजयवर्गीय का नाम भाजपा के उन वरिष्ठ नेताओं में शुमार है जो अपनी बात किसी भी सार्वजनिक मंच में आगे रखने से नहीं हिचकिचाते। अपनी ही सरकार पर नाराजगी जताने और सदन में अपने तीखे बयानों के लिए मशहूर कैलाश विजयवर्गीय  मध्यप्रदेश में मोहन सरकार के अब सबसे चर्चित चेहरे बन चुके हैं।  

जब भी कैलाश विजयवर्गीय बोलते हैं बिना लाग-लपेट के बोलते हैं। इंदौर के भगीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी से मौतों के मामले में मीडिया के सवालों पर कैलाश ने गुस्से में आपा खो दिया और पत्रकार को ‘औकात’ में रहने को कहा था जिसके बाद सूबे की सियासत में बवाल मच गया। बाद में सफाई देते हुए उन्होंने माफी मांगी, लेकिन विपक्ष ने इसे लेकर मोहन सरकार की घेराबंदी करने में जुट गया और उनके इस्तीफे की मांग कर डाली। मजबूर होकर मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव को सदन में माफी मांगनी पड़ी।  

सदन में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार के साथ बहस में उन्होंने असंसदीय शब्दावली का इस्तेमाल किया, जिस पर फिर से मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को सदन में माफी मांगने पर मजबूर होना पड़ा। यही नहीं कैबिनेट की महत्वपूर्ण बैठकें छोड़ने में भी कैलाश विजयवर्गीय पीछे नहीं रहते। अभी कुछ समय पहले इंदौर में केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर की उपस्थिति में हुए एक लोकार्पण कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव मंच पर बैठे थे लेकिन कैलाश विजयवर्गीय दूर कुर्सी पर बैठे थे। उनको इस तरह से अकेले बैठे देखकर मंत्री तुलसी सिलावट ने उनका हाथ पकड़कर कुर्सी से उठाया। तब भी विजयवर्गीय के इस व्यवहार ने सभी का ध्यान अपनी तरफ खींचा था।

हाल ही में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के साथ सार्वजनिक मंच शेयर करते हुए उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार आने के बाद कई अधिकारी खुलकर आरएसएस से जुड़ने का दावा करने लगे हैं। उन्होंने संगठन में अच्छे कार्यकर्ताओं की कमी का भी जिक्र किया जिसने आरएसएस समर्थकों और पार्टी के अंदरूनी हलकों में असहजता पैदा करने का काम किया है। यह सभी घटनाएं दिखाती हैं कि विजयवर्गीय की "मुंहफट "बोलने की आदत सरकार के लिए परेशानी का सबब बन रही है। एक तरफ यह सत्तारूढ़ पार्टी की परेशानियों को बढ़ाने का काम करती है वहीँ दूसरी तरफ विपक्ष को सरकार के प्रति हमलावर होने का मौका मिल जाता है।

एमपी की राजनीति के केंद्र में अब ‘एम’ फैक्टर

मध्यप्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ समय से एक नए ‘एम फैक्टर’ यानी मोहन फैक्टर’ की बड़ी चर्चा है। दिसंबर 2023 मे मुख्यमंत्री बनने के बाद से डॉ. मोहन यादव मध्यप्रदेश की राजनीति में छाए हुए हैं। उनकी छवि सरकार और संगठन में बेहतर तालमेल बनाने वाले,पारदर्शी प्रशासन देने वाले, त्वरित निर्णय लेने वाले आम जनता के मुख्यमंत्री की बनती जा रही है। देश के विभिन्न राज्यों के चुनाव प्रचार के दौरान उनकी निर्णायक भूमिका रही है। मध्यप्रदेश में उनकी विजनरी नेतृत्व और पीएम मोदी के मार्गदर्शन में विकास योजनाओं का तेजी से क्रियान्वयन हो रहा है। हाल ही में हुए राज्यसभा चुनावों में भाजपा की तीनों सीटों पर जीत ने उनके कद को पूरे देश में तेजी से बढ़ाने का काम किया है। इंदौर समेत मालवा-निमाड़ क्षेत्र में उनकी दिनों- दिन मजबूत होती पकड़ के साथ ही ‘मोहन फैक्टर’ एमपी में अब केवल विकास का पर्याय नहीं, बल्कि सत्ता के वितरण और ठोस निर्णय लेने वाली प्रक्रिया में केंद्रीकरण का प्रतीक भी बन गया है जिससे भाजपा के कई पुराने दिग्गज नेताओं की सरकार से लेकर संगठन में पकड़ कमजोर होती जा रही है। प्रदेश के नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का लैटर बम भी आज इसकी बखूबी तस्दीक करता है। 

हिलोरें मारती सीएम बनने की हसरतें और बगावत की धमकी

भाजपा में उमा भारती के सत्ता से हटने के बाद कैलाश विजयवर्गीय मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनना चाहते लेकिन शिवराज सिंह चौहान की दिल्ली से हुई ताजपोशी ने उनका खेल खराब कर दिया। शिवराज सरकार में उनकी गिनती एक दौर में नंबर दो के तौर पर होने लगी थी लेकिन शिवराज सिंह चौहान की कुर्सी को अस्थिर करने में भी उन्होनें कोई कसर नहीं छोड़ी। अपने पक्ष में तेजी से विधायकों की लाबिंग होते देख पार्टी आलाकमान ने उन्हें प्रदेश की राजनीति से केंद्र की राजनीति में भेज दिया  जिसके बाद उन्होनें हरियाणा में भाजपा के पक्ष में माहौल बनाया और वहाँ पहली बार भाजपा की सरकार बनाई। इसके बाद वह पश्चिम बंगाल भी भेजे गए लेकिन वहाँ भाजपा की सरकार बनाने में सफल नहीं हो सके जिसके बाद पार्टी आलाकमान ने उनकी घर वापसी कर दी और 2023 के विधानसभा चुनाव में इंदौर-1 सीट से प्रत्याशी बनाया। इंदौर-1 सीट से प्रत्याशी बनाए जाने के बाद कैलाश विजयवर्गीय ने ऐसे बयान दिए जो काफी चर्चा में रहे। कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने दावा किया था कि यदि वह चुनाव जीते तो सिर्फ एक विधायक नहीं रहेंगे, बल्कि पार्टी उन्हें कोई बड़ी जिम्मेदारी देगी। प्रचंड बहुमत हासिल करने के बाद शिवराज सिंह चौहान को भाजपा ने जब मुख्यमंत्री नहीं बनाया तो कैलाश विजयवर्गीय खुद को सीएम के बड़े चेहरे के तौर पर देखने लगे। जब आलाकमान ने डॉ. मोहन यादव के नाम पर अंतिम मुहर लगाई तो सबसे अधिक इमोशनल अत्याचार कैलाश विजयवर्गीय पर हुआ और सीएम बनने की उनकी हसरतें ध्वस्त हो गई।   

मौजूदा दौर में मध्यप्रदेश के सबसे मजबूत चेहरे के रूप में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव  अपने विकास कार्यों से जन-जन में लोकप्रिय हो रहे हैं। पारदर्शी सरकार, त्वरित निर्णय, सुशासन और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन से उनका कद न केवल राज्य बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी तेजी से बढ़ रहा है। उनके दूरदर्शी नेतृत्व में न केवल मध्यप्रदेश का चहुमुंखी विकास हो रहा है बल्कि प्रदेश के हर तबके के लिए उनकी सरकार काम कर रही है।मध्यप्रदेश की राजनीति में डॉ. मोहन यादव एक पावरफुल केन्द्र  बन चुके हैं  जो सरकार और संगठन के साथ बेहतरीन ढंग से कदमताल करते नजर आते हैं। डॉ.मोहन यादव की बढ़ती लोकप्रियता मध्यप्रदेश के पुराने दिग्गज नेताओं को रास नहीं आ रही है। मोहन का बढ़ता कद भाजपा के कैलाश विजयवर्गीय जैसे पार्टी के कई पुरानी पीढ़ी के नेताओं को हजम नहीं हो रहा है और उनकी कुर्सी को अस्थिर करने के लिए ‘लैटर बम’ के सहारे वार किए जा रहे हैं।   

Monday, 29 June 2026

मोहन के नेतृत्व में एमपी का धार्मिक और सांस्कृतिक अभ्युदय

 

देश का का हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, मंदिरों, नदियों और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के 12 वर्षों के सफल कार्यकाल में देश के भीतर धार्मिक और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की एक विशेष लहर देखने को मिली है। सही मायनों में कहा जाए तो मोदी सरकार के 12 साल मध्यप्रदेश के लिए भी धार्मिक और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का काल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में एमपी धार्मिक और सांस्कृतिक अभ्युदय का नया अध्याय लिख रहा है। उनकी सरकार ने “विरासत से विकास” के मंत्र को अपनाते हुए आस्था, संस्कृति और आर्थिक समृद्धि को एक सूत्र में पिरोया है। 'विरासत से विकास' के मंत्र के साथ मोहन सरकार सनातन संस्कृति को संरक्षित करते हुए धार्मिक पर्यटन को आर्थिक समृद्धि से जोड़ने का उल्लेखनीय कार्य कर रही है।  उज्जैन के महाकाल लोक से लेकर ओरछा के राम राजा लोक तक, श्री राम गमन पथ से श्री कृष्ण पाथेय से भोजशाला, चित्रकूट  से लेकर एकात्म धाम तक प्रदेश में आस्था,आधुनिकता और विकास  का अनूठा संगम देखने को मिल रहा है।  डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल में धार्मिक स्थलों के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। महाकाल लोक की सफलता के बाद कई अन्य स्थानों पर इसी तर्ज पर नए 'लोक' पूरे प्रदेश में विकसित किए जा रहे हैं। उज्जैन में महाकाल लोक परिसर का विकास एक मील का पत्थर साबित हुआ है। यहां वॉटर स्क्रीन, फाउंटेन शो, मिलेट से बने श्री अन्न लड्डू प्रसादम और महाकालेश्वर बैंड जैसी अनूठी सुविधाएं शुरू की गई हैं। महाकालेश्वर मंदिर के आसपास भक्त निवास, 11 प्राचीन मंदिरों का जीर्णोद्धार और अन्य सुविधाओं का विस्तार हो रहा है।

ओरछा में राम राजा लोक के द्वितीय चरण का निर्माण शुरू हो चुका है।  श्री राम राजा लोक, ओरछा, राम वन गमन मार्ग को भी  विकसित किया जा रहा है। मोहन सरकार के प्रयासों से ओरछा में 500 वर्ष पुराना श्रीराजा राम का वैभव एक बार फिर जीवंत हो रहा है। चित्रकूट को अयोध्या की तर्ज पर विकसित किया जा रहा है। इसके साथ ही, लगभग 1,450 किलोमीटर लंबे 'राम वन पथ गमन' मार्ग को एक भव्य धार्मिक केंद्र के रूप में विकसित करने की पूरी कार्ययोजना लागू की गई है। इसी तरह से मोहन का बड़ा ड्रीम प्रोजेक्ट श्री कृष्ण पाथेय है। कृष्ण से जुड़े स्थानों को जोड़ने वाली योजना के तहत इसे भी भारी भरकम बजट आवंटित किया गया है और श्री कृष्ण पाथेय ट्रस्ट का गठन हुआ है। इसके साथ ही उज्जैन, जानापाव जैसे भगवान श्रीकृष्ण के लीला स्थलों को भी तीर्थ के रूप में विकसित करने की बड़ी कार्ययोजना पर काम चल रहा है। यूनेस्को के विश्व हेरिटेज सेंटर द्वारा प्रदेश की 6 धरोहरों को सम्मिलित किया गया है जिनमें ग्वालियर किला, धमनार का ऐतिहासिक समूह, भोजपुर का भोजेश्वर महादेव मंदिर, चंबल घाटी के रॉक कला स्थल, खूनी भंडारा बुरहानपुर और रामनगर, मंडला का गौंड स्मारक शामिल है। लगभग 900 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से 20 से ज्यादा भव्य 'लोकों  का निर्माण कार्य भी प्रगति पर है। एमपी आने वाले पर्यटकों को हवाई यात्रा की सुविधा उपलब्ध कराने के लिये पीएम श्री पर्यटन वायु सेवा एवं पीएम श्री धार्मिक पर्यटन हेली सेवा से कई लोग लाभान्वित हुए हैं।

मोहन सरकार ने प्रदेश में आध्यात्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन के विकास पर विशेष जोर दिया है और अब वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सांस्कृतिक अभ्युदय के संकल्प को मध्यप्रदेश में पूरा करने की ओर मजबूती से कदम बढ़ा रही है। मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव प्रदेश के  सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और सनातन परंपरा के गौरव को संरक्षित करने की दिशा में लगातार कई ठोस निर्णय ले रहे हैं जो भविष्य में  धार्मिक और सांस्कृतिक अभ्युदय की नई लकीर खींचेंगे। मोहन सरकार ने धार्मिक पर्यटन को आर्थिक विकास का इंजन बनाया है। हेलीकॉप्टर सेवाएं, एयर एंबुलेंस और बेहतर कनेक्टिविटी से श्रद्धालु अब अधिक आसानी से पहुंच रहे हैं। अयोध्या में आस्था भवन का निर्माण भी इस दिशा में महत्वपूर्ण है। ये प्रयास न केवल सनातन परंपराओं को मजबूत कर रहे हैं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति दे रहे हैं। गौ-पालन को बढ़ावा, गौ-दुग्ध पर बोनस और गौशालाओं को समर्थन देकर सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित भी  भी दिया जा रहा है। वैष्णो देवी मॉडल अपनाते हुए प्रदेश के प्रमुख धार्मिक स्थलों को बेहतर सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। ओरछा में श्री राम राजा लोक का पुनर्विकास, चित्रकूट विकास प्राधिकरण की स्थापना और स्वदेश दर्शन योजना 2.0 के तहत कई केंद्रों की स्थापना की जा रही है। 

बीते दिनों  मध्यप्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला एक ऐतिहासिक क्षण की साक्षी उस समय बनी, जब सीएम डॉ. मोहन यादव मंदिर पहुंचे और मां वाग्देवी के दर्शन कर विधिवत पूजा-अर्चना की। पद पर रहते हुए भोजशाला पहुंचने वाले डॉ. मोहन यादव मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने।15 मई को इंदौर खंडपीठ द्वारा दिए गए महत्वपूर्ण निर्णय के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने हिंदू पक्ष को वर्षभर पूजा-अर्चना की अनुमति दी। इस फैसले के बाद पहली बार प्रदेश के किसी मुख्यमंत्री का भोजशाला पहुंचना राजनीतिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अहम माना जा रहा है। धार में माता सरस्वती लोक की बड़ी घोषणा हुई जिसके बाद धार पुरातत्व का पर्यटन का भी केन्द्र बनेगा। यहीं पर राजा भोज शोध संस्थान भी बनेगा। इन बड़ी घोषणाओँ को मोहन सरकार की गंभीरता और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता से भी जोड़कर देखा जा रहा है। 

​2028 में  उज्जैन सिंहस्थ आयोजन हेतु प्रदेश में  व्यापक तैयारी चल रही है। यहाँ पर राज्य सरकार व्यापक स्तर पर तीर्थयात्रियों के लिए विश्व-स्तरीय सुविधाएं और अधोसंरचना विकसित कर रही है। शिप्रा घाटों का विकास, आधारभूत संरचना मजबूत करना और आध्यात्मिक अनुभव को बेहतर बनाने की दिशा में तेजी से कार्य चल रहा है। सरकार ने धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग के माध्यम से कई मंदिरों के जीर्णोद्धार, परिसर विकास और सुविधाओं के विस्तार का बड़ा रोडमैप तैयार किया है। यही नहीं  वैष्णो देवी यात्रा से प्रेरित होकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदेश के धार्मिक स्थलों को और अधिक भव्य, आकर्षक तथा व्यवस्थित बनाने की दिशा में सतत रूप से प्रयत्नशील नजर आते हैं। डॉ. मोहन यादव के दूरदर्शी नेतृत्व में मध्यप्रदेश न केवल धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से जागृत हो रहा है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सनातन परंपरा का वैश्विक केंद्र बनने की राह पर है। विरासत को संजोते हुए विकास की यह यात्रा प्रदेशवासियों के लिए गर्व का विषय है। भविष्य में सिंहस्थ 2028 और अन्य बड़े आयोजन इस अभ्युदय को नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगे।