Wednesday, 3 June 2026

सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु को समर्पित पुरुषोत्तम मास

साल 2026 में ज्येष्ठ माह में पुरुषोत्तम मास का योग बन रहा है। इसे अधिकमास भी कहते हैं। 17 मई 2026 प्रारंभ होकर यह 15 जून 2026 को समाप्त होगा। इसके तुरंत बाद निज ज्येष्ठ मास (शुद्ध ज्येष्ठ) शुरू होगा, जो 13 जुलाई 2026 तक चलेगा। इस भौतिक संसार में सभी जीव इन्द्रियतृप्ति में व्यस्त हैं। वे सब जीवन के अंतिम लक्ष्य को भूल चुके हैं इसलिए कृपया कुछ ऐसा समझाएं जो मेरे जैसे सन्यासी क्रम में गृहस्थों और ऋषियों दोनों के लिए सहायक हो, कुछ ऐसा जो हमें आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने और वापस भगवद की ओर लौटने में मदद करे। नारद के मधुर वचनों को सुनकर भगवान नारायण मुस्कुराए।

उन्होंने कहा, हे नारद, कृपया परम पुरुषोत्तम भगवान श्री कृष्ण की परम पवित्र लीलाओं के बारे में कथन सुनें, क्योंकि वे सभी पापपूर्ण प्रतिक्रिया को कम कर देंगे। नारद, आप पहले से ही सर्वोच्च भगवान की सभी गतिविधियों के बारे में जानते हैं, लेकिन दूसरों के लाभ के लिए आप मुझसे फिर से पूछ रहे हैं तो अब मैं आपको पवित्र पुरुषोत्तम महीने की महिमा के बारे में बताऊंगा, जो न केवल सभी भौतिक सुखों को प्रदान करने के लिए पूरी तरह से शक्तिशाली है बल्कि जीवन के अंत में भगवान को वापस लौटने के योग्य भी है।

पुरुषोत्तम मास का महत्व-सूर्य के धनु या मीन राशि में गोचर के दौरान जो समय रहता है उसे मलमास याँ खरमास कहते हैं लेकिन हर 3 साल में चंद्रमास के बढ़े हुए दिनों को सौरमास में समाहित करने के लिए एक अतिरिक्त मास या महीना जोड़ा जाता है जिसे अधिकमास कहते हैं। इसे पहले मलमास और बाद में पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा। इस मास में किए गए दान, पुण्य, स्नान आदि सभी धार्मिक आयोजन पुण्य फलदायी होने के साथ ही ये आपको दूसरे माहों की अपेक्षा करोड़ गुना अधिक फल देने वाले माने गए हैं। पुरुषोत्तम मास में सभी. नियम अपने सामथ्र्य अनुसार करना चाहिए। जितना हो सके उतना संयम यानी ब्रह्मचर्य का पालन, फलों का भक्षण, शुद्धता, पवित्रता, ईश्वर आराधना, एकासना, देवदर्शन, तीर्थयात्रा आदि अवश्य करना चाहिए। एक बार, बहुत पहले, श्री नारद मुनि भगवान नारायण ऋषि के निवास बद्रिका आश्रम पहुंचे। उनके चरण कमलों से अलकनंदा नदी बह रही थी। नारद ने नारायण को प्रणाम किया और प्रार्थना' की, हे, अ देवताओं के भगवान। हे दया के सागर! हे सृष्टि के स्वामी! आप । और इसलिए मैं आपको प्रणाम कर रहा हूं।

हे प्रभो। इस भौतिक संसार में सभी जीव इन्द्रिय तृप्ति में व्यस्त हैं। वे सब जीवन के अंतिम लक्ष्य को भूल चुके हैं इसलिए कृपया कुछ ऐसा समझाएं जो मेरे जैसे सन्यासी क्रम में गृहस्थों और ऋषियों दोनों के लिए सहायक हो। कुछ ऐसा जो हमें आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने और वापस भगवद की ओर लौटने में मदद करे। इस माह में अधिक मास के 33 देवताओं की पूजा का महत्व है-विष्णु, जिष्णु, महाविष्णु, हरि, कृष्ण, भधोक्षज, केशव, माधव, राम, अच्युत,पुरुषोत्तम, गोविंद, वामन, श्रीश, श्रीकांत, नारायण, मधुरिपु, अनिरुद्ध, त्रीविक्रम, वासुदेव, यगत्योनि, अनन्त, विश्वाक्षिभूणम्, शेषशायिन, संकर्षण, प्रद्युम्न, दैत्यारि, विश्वतोमुख, जनार्दन, धरावास, दामोदर, मोदर, मघार्दन एवं श्रीपति जी की पूजा से बड़ा लाभ होता है।

धर्म ग्रंथों के अनुसार श्री नृः सिंह भगवान ने इस मास को अपना नाम देकर कहा है कि अब मैं इस मास का स्वामी हो गया हूं और इसके नाम से सारा जगत पवित्र होगा। इस महीने में जो भी मुझे प्रसन्न करेगा, वह कभी गरीब नहीं होगा और उसकी हर मनोकामना पूरी होगी इसलिए इस मास के दौरान जप, तप, दान से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है।

पुरुषोत्तम मास की पौराणिक कथा में कहते हैं कि दैत्याराज हिरण्यकश्यप ने अमर होने के लिए तप किया। ब्रह्माजी प्रकट होकर वरदान मांगने का कहते हैं तो वह कहता है कि आपके बनाए किसी भी प्राणी से मेरी मृत्यु ना हो, न मनुष्य से और न पशु से। न दैत्य से और न देवताओं से। न भीतर मरूं, न बाहर मरूं। न दिन में न रात में। न आपके बनाए 12 माह में। न अस्त्र से मरूं और न शस्त्र से। न पृथ्वी पर न आकाश में। युद्ध में कोई भी मेरा सामना न कर सके। आपके बनाए हुए समस्त प्राणियों का मैं एक एकक्षत्र सम्राट हूं। तब ब्रह्माजी ने कहा-तथास्थु। फिर जब हिरण्यकश्यप के अत्याचार बढ़ गए और उसने कहा कि विष्णु का कोई भक्त धरती पर नहीं रहना चाहिए तब श्री हरि की माया से उसका पुत्र प्रहलाद ही भक्त हुआ और उसकी जान बचाने के लिए प्रभु ने सबसे पहले 12 माह को 13 माह में बदलकर अधिक मास बनाया। इसके बाद उन्होंने नृसिंह अवतार लेकर शाम के समय देहरी पर अपने नाखुनों से उसका वध कर दिया।

इसके बाद चूंकि हर चंद्रमास के हर मास के लिए एक देवता निर्धारित हैं परंतु इस अतिरिक्त मास का अधिपति बनने के लिए कोई भी देवता तैयार ना हुआ। ऐसे में' ऋषि-मुनियों ने भगवान विष्णु से आग्रह किया कि वे ही इस मास का भार अपने ऊपर लें और इसे भी पवित्र बनाएं तब भगवान विष्णु ने इस आग्रह को स्वीकार कर लिया और इस तरह यह मलमास के साथ पुरुषोत्तम मास भी बन गया।

ऐसी भी मान्यता है कि' स्वामीविहीन होने के कारण अधिकमास को मलमास कहने से उसकी बड़ी निंदा होने लगी। इस बात से दुखी होकर मलमास श्रीहरि विष्णु के पास गया और ठनको अपनी व्यथा-कथा सुनाई। तब श्रीहरि विष्णु उसे लेकर गोलोक पहुंचें।

गोलोक में भगवान श्रीकृष्ण ने मलमास की व्यथा जानकर उसे वरदान दिया अबसे मैं तुम्हारा स्वामी हूं। इससे मेरे सभी दिव्य गुण तुम में समाविष्ट हो जाएंगे। मैं पुरुषोत्तम के नाम से विख्यात हूं और मैं तुम्हें अपना यही नाम दे रहा हूं। आज से तुम मलमास के बजाय पुरुषोत्तम मास के नाम से जाने जाओगे इसीलिए प्रति तीसरे वर्ष में तुम्हारे आगमन पर जो व्यक्ति श्रद्धा-भक्ति के साथ कुछ अच्छे कार्य करेगा, उसे कई गुना पुण्य मिलेगा। हे जनार्दन, अब जब उसने मेरे गुणों को धारण कर लिया है तो मैं स्वयं इस पुरुषोत्तम महीने का पति और रक्षक बनूंगा और मेरे समान होने के कारण यह मास अन्य सभी मासों का स्वामी होगा।अब यह महीना सभी के लिए पूजनीय होगा। सभी को उनकी पूजा करनी चाहिए। यह महीना मेरे जैसा ही शक्तिशाली है जो अपने पर्यवेक्षक को किसी भी प्रकार का आशीर्वाद दे सकता है। मैं अन्य महीनों के विपरीत जो किसी न किसी इच्छा से भरे हुए हैं, इस महीने को इच्छा-मुक्त कर रहा हूं। इस महीने का उपासक अपने पिछले सभी पापों को भस्म करने में सक्षम होगा और भौतिक क्षेत्र में आनंदमय जीवन का आनंद लेने के बाद वह वापस भगवान के पास लौट आएगा।

इस प्रकार भगवान ने अनुपयोगी हो चुके अधिकमास को धर्म और कर्म के लिए बेहद उपयोगी बना दिया। अतः इस दुर्लभ पुरुषोत्तम मास में स्नान, पूजन, अनुष्ठान एवं दान करने वाले को कई पुण्य फल की प्राति होगी। दुर्भाग्यपूर्ण अज्ञानी व्यक्ति जो कोई जप नहीं करता, दान नहीं करता, भगवान श्री कृष्ण और उनके भक्तों का सम्मान नहीं करता, ब्राह्मणों के साथ ठीक से व्यवहार नहीं करता, दूसरों के साथ शत्रुता करता है और जो पुरुषोत्तम मास की निंदा करता है, वह असीमित अवधि के लिए नरक जाता है। भगवान श्री कृष्ण ने आगे कहा कोई व्यक्ति अपने जीवन को तब तक सफल कैसे बना सकता है जब तक कि वह इस पुरुषोत्तम महीने में भक्ति नहीं करता है? एक व्यक्ति जो पूरी तरह से इन्द्रियतृप्ति में लगा हुआ है और इस पवित्र महीने को कोई विशेष महत्व नहीं देता है, वह नरक के लिए सबसे अच्छा उम्मीदवार बन जाता है। अतः सभी मनुष्यों को इस पुरुषोत्तम माह में अपने मन में भक्तिभाव जगाना चाहिए और श्री हरि की भक्ति करनी चाहिए।

Tuesday, 2 June 2026

'इबोला' का कहर और खौफ के साये में भारत


कांगो में तेजी से फैल रहे इबोला वायरस ने पूरी दुनिया के सामने एक बार फिर से गहरी चिंता बढ़ा दी है। यह बीमारी अफ्रीका के जंगलों से निकलकर पूरी दुनिया को नई चेतावनी दे रही है। इस प्रकोप का मुख्य केन्द्र कांगो के इटुरी प्रांत में केंद्रित है, जहां अभी तक एक हजार से अधिक मामले सामने आए हैं और संक्रमण की चपेट में आने से 250 से अधिक लोगों की मौत हो गई है। कांगों में करीब 1000 से अधिक लोग संदिग्ध मरीज बताए जा रहे हैं। बीमारी के बढ़ते हुए प्रभाव को देखते हुए युगांडा में भी इबोला वायरस से जुड़े कई मामले दर्ज किए गए हैं। हालात कितने भयावह हैं यह इस बात से समझ सकते हैं कि इबोला अब सिर्फ कांगो, युगांडा और दक्षिणी सूडान तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि 10 अफ्रीकी देशों को भी अपने संक्रमण की चपेट में ले चुका है। इसी को देखते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबोला वायरस को ‘वैश्विक स्वास्थ्य आपातकाल’ घोषित कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की प्रतिनिधि ऐन एन्सिया ने चेतावनी दी है कि डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में इबोला ज्यादा तेजी से फैल रहा है। डॉ. एन्सिया ने बताया कि लगातार हो रही जांचों से यह साफ़ होता जा रहा है कि यह बीमारी दूसरे इलाकों में भी फैल रही है। इबोला का कहर दुनिया में पहले भी होता रहा है लेकिन तब  इसका इतना व्यापक स्तर पर प्रसार नहीं हुआ था लेकिन वैज्ञानिक  इसके नए स्ट्रेन पर चिंता जाहिर कर रहे हैं। 2014-16 में पश्चिम अफ्रीका में इबोला के चलते 28,000 से ज्यादा मामले और 11,000 से ज्यादा मौतें हुई थी। वर्तमान में बंडीबुग्यो स्ट्रेन के आने और वायरस के रूप बदलने से वैज्ञानिकों के माथे पर भी चिंता की लकीरें हैं  क्योंकि मौजूदा दौर में इसकी रोकथाम के  लिए कोई वैक्सीन भी नहीं है। 


भारत में अब तक  इबोला का कोई  मामला सामने  नहीं आया है, लेकिन दुनिया के अनुभवों को देखते हुए यहाँ भी इस दौर में खौफ का साया गहरा है। हवाई  अड्डों पर विशेष जांच और निगरानी की जारी है। संक्रमण के लक्षण पाए जाने के बाद आइसोलेशन का प्रोटोकॉल भी शुरू कर दिया गया है। स्वास्थ्य विभाग लगातार हालातों की मॉनिटरिंग कर रहा है लेकिन फिर भी भारत में चुनौतियां कम नहीं हैं। भारत कोरोना के अनुभव से सीख ले चुका है लिहाजा इस समय  स्क्रीनिंग,आइसोलेशन और जागरूकता अभियान चलाए जाने पर सरकार का विशेष जोर है।  नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी जैसे संस्थान  लगातार पल- पल की बदलती घटनाओं पर बारीकी से नजर रख रहे हैं और रैपिड रिस्पॉन्स टीमों के माध्यम से इबोला के प्रकोप को रोकने की दिशा में मजबूती के साथ कार्य कर रहे हैं।  बीते दिनों युगांडा से लौटी एक महिला बेंगलुरु में और गुजरात में एक अन्य यात्री के लक्षणों ने देश में हड़कंप मचा दिया था। दोनों संदिग्ध मामले नेगेटिव पाए गए लेकिन तभी से सरकार ने अपनी सतर्कता बढ़ा दी है।  पहली बार भारत-अफ्रीका फोरम समिट को इबोला के चलते स्थगित कर दिया गया है। एक तरफ जहाँ सरकार ने हवाई अड्डों पर स्क्रीनिंग सख्त कर दी है वहीँ अफ्रीकी देशों से आने वाले यात्रियों के लिए स्वास्थ्य एडवाइजरी जारी की जा रही है। लोगों को अनावश्यक यात्रा से बचने की सलाह भी दी गई है लेकिन  लोगों के जेहन  में  मौजूदा दौर में यह सवाल उठ रहा है क्या इबोला भारत पहुंच जाएगा? क्या यह कोरोना से भी खतरनाक साबित होगा?

इबोला वायरस फिलोविरिडे परिवार का सदस्य है। यह चमगादड़ जैसे जानवरों से मनुष्यों में फैलता है और फिर व्यक्ति-से-व्यक्ति संपर्क से फैलता है। तेज बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, उल्टी, दस्त और अंत में आंतरिक रक्तस्राव लक्षण दिखने में एक से तीन हफ्ते लग सकते हैं। इबोला वायरस और संक्रमण के अधिकतर लक्षण एक-समान लगते हैं। तेज बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द, त्वचा पर चकत्ते, उल्टी, दस्त, थकान, बेहद कमजोरी, गले में खराश आदि इबोला वायरस के शुरुआती लक्षण हैं। आंख, नाक, कान या मल-मूत्र के रास्ते आंतरिक और बाहरी रक्तस्राव होना भी महत्वपूर्ण लक्षण है। इबोला से संक्रमित जानवरों (चमगादड़ या बंदर) का मांस खाने से भी यह संक्रमण फैलता है। इसमें मृत्यु दर 25% से 90% तक है, जो वायरस के स्ट्रेन और इलाज की उपलब्धता पर निर्भर करती है। इसका संक्रमण इतना भयावह है कि पहली बार अनेक यूरोपीय देशों समेत  अमरीका, भारत आदि को ‘हाई अलर्ट’ घोषित  करना पड़ा है। कनाडा ने तो कुछ समय के लिए वीजा जारी करने पर ही रोक लगा दी है।  ख़ास बात ये है कि इबोला वायरस  जानवरों, मुख्य रूप से फल खाने वाले चमगादड़ों को संक्रमित करते हैं लेकिन अगर लोग उनके सीधे संपर्क में आते हैं तो वे भी संक्रमित हो सकते हैं। इस प्रकोप का कारण इबोला वायरस की बुडिचुग्यो प्रजाति है। यह उन तीन प्रजातियों में से एक है जिनके कारण संक्रमण फैलता है। इबोला वायरस की अन्य प्रजातियों के विपरीत बुडिचुग्यो के लिए कोई भी टीका या दवा उपलब्ध नहीं है। कुछ प्रायोगिक दवाएं अवश्य मौजूद हैं। वायरस के संक्रमण को पुष्टि करने वाले टेस्ट बहुत कारगर नहीं हैं। 

भारत की बड़ी आबादी, घनी बसावट ,स्वास्थ्य सुविधाओं की असमानता कोई भी वायरस फैलने पर मुश्किलें बढ़ा सकती है। अफवाहें, रीलबाजी का कल्चर  और सोशल मीडिया पर फैलने वाली गलत सूचनाएं मौजूदा दौर में खौफ को बढ़ा सकती हैं।  कोरोना काल को लोग अभी तक नहीं भूले हैं जहाँ फेक न्यूज के प्रसार ने कोरोना काल में समाज में भारी दहशत, अफवाहें और भ्रम की स्थिति पैदा कर दी थी। तब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे 'इन्फोडेमिक' यानी सूचना महामारी का नाम दिया था। कोरोना महामारी के दौरान  सोशल मीडिया और व्हाट्सएप पर बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के काढ़े, घरेलू नुस्खों और चमत्कारी इलाजों के दावे धड़ल्ले से वायरल हुए। सोशल मीडिया पर लगातार वायरल होने वाले फर्जी संदेशों ने लोगों में इतना भय भर दिया कि लोग मानसिक तनाव में आ गए। इस बार भी दुनिया में फैल रहे इबोला का सबसे बड़ा हथियार डर है। डर से लोग लक्षण छिपाते हैं, अस्पताल नहीं जाते और इलाज में देरी होती है। भय, तनाव, असहाय स्थितियां इसलिए भी हैं क्योंकि अभी तक इबोला लाइलाज है। दुनिया में एक भी टीका या गोली अथवा कैप्सूल ऐसा नहीं है, जो इबोला का इलाज कर सके। सीरम इंस्टीट्यूट, पुणे और ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी संयुक्त रूप से इबोला के टीके पर अभी शोध कार्य कर रहे हैं। भरोसा है कि आने वाले दिनों में एक टीका बाजार में उपलब्ध होगा। रूस का भी दावा है कि उसके डॉक्टर और शोधकर्ता भी इबोला के टीके की खोज कर चुके हैं और जल्द ही यह दुनिया के बाज़ार को उपलब्ध होगा। अफ्रीकी देशों में ही तीन बार इबोला वायरस का संक्रमण फैल चुका है जिनमें 11,000 से अधिक मौतें हुई। समस्या यह है कि कांगो, युगांडा, सूडान सरीखे देशों में स्वास्थ्य संबंधी बुनियादी ढांचा बेहद सीमित है, लिहाजा अस्पताल इबोला के संक्रमित या संदिग्ध मरीजों से पटे हुए हैं। कई अस्पतालों में मरीजों के भागने की खबरें भी सामने आई हैं क्योंकि अस्पतालों में  संतोषजनक इलाज ही उपलब्ध नहीं था। गौरतलब यह है कि इबोला वायरस किसी एक अंग तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि यह शरीर के इम्यून सिस्टम को कमजोर करता है। इसके मुख्य निशाने लिवर, गुर्दे , फेफड़े और रक्त वाहिकाएं आदि हैं। 

भारत सरकार ने परामर्श जारी किया है कि अफ्रीकी देशों की यात्रा से बचें। यदि बहुत जरूरी है, तो स्वास्थ्य संबंधी निर्देशों और नियमों का सख्ती से पालन करें। यदि ऐसा बचाव जारी रहेगा, तो देश एक और महामारी से बच सकेगा। वैज्ञानिकों को प्राथमिकता के साथ इस रोग का इलाज ढूंढना होगा।  सरकार को मजबूत सर्विलांस, बॉर्डर कंट्रोल और जन जागरूकता अभियान चलाने पर इस समय जोपर देना चाहिए। इबोला हमें याद दिलाता है कि संक्रामक रोगों के खिलाफ लड़ाई दुनिया में कभी खत्म नहीं होगी। खौफ के साये में जीने के बजाय हमें आने वाले दिनों में  सावधानी के साथ आगे बढ़ना होगा। भारत को सतर्क रहना चाहिए, घबराना नहीं चाहिए।  

Monday, 1 June 2026

'लोकमाता' देवी अहिल्याबाई होल्कर


भारत अपनी  गौरवशाली संस्कृति, इतिहास और परंपराओं के लिए दुनिया में जाना जाता है। यहाँ अनेक ऐसे योद्धा, शासक, शासिकाओं और वीरांगनाओं ने जन्म लिया है जिनका नाम  लोककल्याण जैसे  अनेक कार्यों में  आज भी गर्व के साथ लिया जाता है। इनमें से अहिल्याबाई होल्कर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। देश में जब भी किसी  महिला का जीवन आदर्श, वीरता, त्याग , राष्ट्रभक्ति के लिए सदा याद किया जाता है, उनमें रानी अहिल्याबाई होल्कर  अग्रणी हैं। वे 18वीं शताब्दी की एक ऐसी प्रेरणादायक महिला थी जिनका पूरा जीवन आज समाज के लिए बड़ी  प्रेरणा का स्रोत है। होल्कर राजवंश का इतिहास जितना समृद्ध रहा है, उतनी ही अहिल्याबाई होल्कर की विरासत लोककल्याण के कार्यों के लिए जानी जाती है।

 कुशल प्रशासन एवं कर्तव्यपरायणता जैसे अपने अनेक  मानवीय गुणों के कारण अहिल्याबाई होल्कर के द्वारा कराये गए अनेक कार्य देश में आज भी  बड़े गर्व और आदर  के साथ याद किये जाते हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में कभी कहीं कोई समझौता नहीं किया। पूरी कर्तव्यनिष्ठा व अनुशासन के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करते हुए  लोककल्याण एवं सामाजिक सरोकारों के प्रति संकल्पबद्ध होकर हर पल का सदुपयोग  ही किया शायद  यही वजह थी कि समाज के बीच उनकी एक अलग ही विशिष्ट पहचान और प्रतिष्ठा थी। भारतीय  संस्कृति एवं लोककल्याण के कार्यों  के प्रति उन उनका सम्मान का भाव उनके द्वारा किए गए अनेकानेक कार्यों में देखा जा सकता था।  हमारी संस्कृति के संरक्षण,  संवर्धन हेतु  जन -जन को प्रेरित व प्रोत्साहित करना उनका  स्वाभाविक गुण था।  सचमुच उनका जीवन आज समाज के लिए प्रेरणा व प्रोत्साहन का अविरल स्रोत है। ऐसी  महान धर्म प्रेमी, संस्कृति प्रेमी व मानवता प्रेमी कर्मयोगी  शासिका के जीवन से आज हर किसी को प्रेरणा लेने की  जरूरत है।

अहिल्याबाई होलकर  का जन्म 31 मई, 1725 को अहमदनगर, महाराष्ट्र के गाँव  छौंदी में एक साधारण  किसान  परिवार में हुआ था।  एक साधारण से किसान परिवार में जन्मी अहिल्याबाई होलकर छोटी उम्र से ही अपनी संस्कृति पर गर्व करती थी, साथ ही प्रजा में रह रहे आमजनों की  पीड़ा की अनुभूति भी करती थी। इनके पिता  मनकोजी राव शिन्दे  शिवभक्त थे।  पिता के  संस्कार बालिका अहिल्या पर भी पड़े। उनके पिता मानकोजी शिंदे खुद धनगर समाज से थे, जो गांव के पाटिल की भूमिका निभाते थे। अहिल्याबाई का जीवन भी बहुत साधारण तरीके से गुजर रहा था लेकिन एकाएक  किस्मत  ने पलटी खाई और वह 18वीं सदी में मालवा प्रांत की रानी बन गई। अहिल्याबाई होल्कर ने मालवा प्रांत की महारानी बनकर राजमाता के रूप में बड़ी लकीर खींची।  

युवा अहिल्यादेवी का चरित्र और सरलता ने मल्हार राव होल्कर को भी प्रभावित किया। वे पेशवा बाजीराव की सेना में एक कमांडर के तौर पर काम करते थे। उन्हें अहिल्या इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने उनकी शादी अपने बेटे खांडे राव से करवा दी। इस तरह अहिल्या बाई एक दुल्हन के तौर पर मराठा समुदाय के होल्कर राजघराने में पहुंची। उनके पति की मौत 1754 में कुंभेर की लड़ाई में हो गई थी। ऐसे में अहिल्यादेवी पर जिम्मेदारी आ गई। उन्होंने अपने ससुर के कहने पर न केवल सैन्य मामलों में बल्कि प्रशासनिक मामलों में भी रुचि दिखाई और प्रभावी तरीके से उन्हें अंजाम दिया। शादी के बाद उनका एक पुत्र और एक पुत्री हुई। वहीं कुछ सालों बाद ही अहिल्याबाई के पति का देहांत हो गया। इसके कुछ समय बाद ही 1766 में उनके ससुर मल्हारराव होल्कर की भी मृत्यु हो गई। जिसके बाद उन्होंने सत्ता को संभालने का भार अपने ऊपर ले लिया। शासन संभालने के कुछ दिनों बाद ही साल 1767 में उनके जवान पुत्र मालेराव की भी मृत्यु हो गई। पति, पुत्र , पुत्री , पुत्रवधू  और पिता समान ससुर को खोने के बाद भी उन्होंने जिस तरह साहस और धैर्य से अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया, वो सराहनीय है। इस संकटकाल में एक तपस्विनी की तरह से श्वेत वस्त्र धारण कर राजकाज चलाया और परिवार पर भीषण वज्रघात के बाद भी रानी अविचलित रहते हुए अपने कर्तव्यपथ पर हमेशा डटी रही। 

अहिल्याबाई एक विनम्र एवं उदार  वीरांगना थी  जिनके अंदर गरीबों और असहाय व्यक्ति के लिए दया और परोपकार की भावना भरी हुई थी। उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया था। मल्हारराव के निधन के बाद उन्होंने पेशवाओं की गद्दी से आग्रह किया कि उन्हें क्षेत्र की प्रशासनिक बागडोर सौंपी जाए। मंजूरी मिलने के बाद 1766 में रानी अहिल्यादेवी मालवा की शासक बन गईं। उन्होंने तुकोजी होल्कर को सैन्य कमांडर बनाया। उन्हें उनकी राजसी सेना का पूरा सहयोग मिला। अहिल्याबाई ने कई युद्ध का कुशल नेतृत्व भी  किया। वे एक साहसी योद्धा के साथ ही एक कुशल तीरंदाज भी थी जो  हाथी की पीठ पर चढ़कर लड़ती थी। हमेशा आक्रमण करने को तत्पर भील और गोंड्स से उन्होंने कई बरसों तक अपने राज्य को सुरक्षित भी  रखा। पड़ोसी राजा पेशवा राघोबा ने इन्दौर के दीवान गंगाधर यशवन्त चन्द्रचूड़ से मिलकर अचानक हमला बोल दिया। रानी ने धैर्य न खोते हुए पेशवा को एक मार्मिक पत्र लिखा।

रानी ने लिखा कि यदि युद्ध में आप जीतते हैं, तो एक विधवा को जीतकर आपकी कीर्ति नहीं बढ़ेगी और यदि हार गये, तो आपके मुख पर सदा को कालिख पुत जाएगी। मैं मृत्यु या युद्ध से नहीं डरती। मुझे राज्य का लोभ नहीं है, फिर भी मैं अन्तिम क्षण तक युद्ध करूंगी। इस पत्र को पाकर पेशवा राघोबा चकित रह गया। इसमें जहां एक ओर रानी अहल्याबाई ने उस पर कूटनीतिक चोट की थी, वहीं दूसरी ओर अपनी कठोर संकल्पशक्ति का परिचय भी दिया था। रानी ने देशभक्ति का परिचय देते हुए उन्हें अंग्रेजों  के षड्यन्त्र से भी सावधान किया था। अतः उसका मस्तक रानी के प्रति श्रद्धा से झुक गया और वह बिना युद्ध किये ही पीछे हट गया। रानी के जीवन का लक्ष्य राज्यभोग नहीं था। वे प्रजा को अपनी सन्तान समझती थी। वे घोड़े पर सवार होकर स्वयं जनता से मिलती थी। उन्होंने जीवन का प्रत्येक क्षण राज्य और धर्म के उत्थान में लगाया। एक बार गलती करने पर उन्होंने अपने एकमात्र पुत्र को भी हाथी के पैरों से कुचलने का आदेश दे दिया था पर फिर जनता के अनुरोध पर उसे कोड़े मार कर ही छोड़ दिया। 

अहिल्याबाई हमेशा अपनी प्रजा और गरीबों की भलाई के बारे में सोचती रहती थी। उन्होंने समाज में विधवा महिलाओं की स्थिति, महिलाओं की शिक्षा पर बेहतरीन काम किया किया। अपने जीवन में तमाम परेशानियां झेलने के बाद जिस तरह अहिल्याबाई ने अपनी नारी शक्ति का इस्तेमाल किया था, वो काफी प्रशंसनीय है। आज भी  अपने कार्यों और शासन के लिए  अहिल्याबाई को लोग याद करते हैं । रानी अहिल्याबाई अपनी राजधानी महेश्वर भी ले गई जहाँ पर उन्होंने 18वीं सदी का बेहतरीन और आलीशान अहिल्या महल बनवाया। पवित्र नर्मदा नदी के किनारे बनाए गए इस महल की नक्काशी हर किसी को प्रभावित करती थी। उस दौर में महेश्वर साहित्य, मूर्तिकला, संगीत और कला के क्षेत्र में एक गढ़ बन चुका था। मराठी कवि मोरोपंत, शाहिर अनंतफंडी और संस्कृत विद्वान खुलासी राम उनके कालखंड के महान व्यक्तित्व थे।  

अहिल्याबाई  हर दिन वह अपनी प्रजा से बात करती थी। उनकी समस्याएं सुनती थी। 1767-1795 के कालखंड में  रानी अहिल्याबाई ने ऐसे कई काम किए कि लोग आज भी उनका नाम बड़े गर्व  के साथ लेते हैं। वो एक ऐसी रानी थी जिन्होंने सत्ता का लोभ नहीं बल्कि समृद्धि को चुना। वो एक ऐसी महिला थीं जो 1700 की सदी में भी पढ़-लिखकर आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाती थी। अपने साम्राज्य को उन्होंने समृद्ध बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उन्होंने राजकोष का धन बड़े पैमाने पर  कई किले, विश्राम गृह, कुएं और सड़कें बनवाने पर खर्च किया। वह लोगों क  बीच जाना पसंद करती थी और मंदिरों को दान भी देती थी। एक महिला होने के नाते उन्होंने विधवा महिलाओं को अपने पति की संपत्ति को हासिल करने और बेटे को गोद लेने में भी मदद की। इंदौर को एक छोटे-से गांव से समृद्ध और सजीव शहर बनाने में उनकी भूमिका को नहीं नकारा जा सकता। 

उन्होनें हिमालय से लेकर दक्षिण भारत के कोने-कोने तक  मंदिरों के निर्माण में बड़ा धन खर्च किया साथ ही काशी, गया, सोमनाथ, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, द्वारका, बद्रीनारायण, रामेश्वर और जगन्नाथ पुरी के ख्यात मंदिरों में उन्होंने  अनेक  काम करवाए जो आज भी  बड़ी शान के साथ याद किये जाते हैं । धर्मपरायण  होने के कारण रानी ने अपने राज्य के साथ-साथ देश के अन्य तीर्थों में भी मंदिर, कुएं, बावड़ी, धर्मशालाएं आदि बनवाई। एक तरफ  काशी का वर्तमान काशी विश्वनाथ मंदिर 1780 में उन्होंने ही बनवाया  वहीँ  त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग में तीर्थयात्रियों के लिए विश्रामगृह बनवाया। अयोध्या और नासिक में भगवान राम के मंदिर का निर्माण हो या उज्जयिनी में चिंतामणि गणपति मंदिर का निर्माण  यह सब अहिल्याबाई  के कार्यों की आज भी जीती जागती मिसाल  हैं।  सोमनाथ के प्रसिद्ध  मंदिर का पुनर्निर्माण भी उन्हीं की बड़ी देन है जिसे 1024 में गजनी ने आक्रमण कर लूट लिया था।  

13 अगस्त, 1795 ई0 को 70 वर्ष की आयु में उनका देहान्त हुआ। उनका जीवन धैर्य, साहस, सेवा, त्याग और कर्तव्यपालन का प्रेरक उदाहरण है। उनके राज्य में कला, संस्कृति, शिक्षा, व्यापार, कृषि आदि सभी क्षेत्रों का भरपूर  विकास हुआ।  सही मायनों में अहिल्याबाई  व्यक्तित्व की  धनी हैं, जिनका जीवन  मानवता की सेवा और मानवीय मूल्यों के संरक्षण को  समर्पित रहा है। किसी भी तरह की मुश्किल में उन्होनें कभी धैर्य नहीं खोया और  जनसेवा और लोककल्याण के काम करना उनके  जीवन का मुख्य लक्ष्य रहा।  मानवीय मूल्य आधारित संकल्पना को धरातल में उतारना ही उनका हर समय  उद्देश्य रहता था। अहिल्याबाई होल्कर ने अपने जीवन और कार्यों से अनेक प्रेरणादायी शिक्षाएं समाज को प्रदान की हैं जिनसे समाज  के हर व्यक्ति को प्रेरणा लेने की जरूरत है। अहिल्याबाई होल्कर की जयंती भारतीय इतिहास में नारी शक्ति, सुशासन और धर्म-संरक्षण का अद्वितीय प्रतीक है।

Wednesday, 20 May 2026

यूसीसी की दिशा में आगे बढ़ते मोहन सरकार के कदम

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता को एक नीति  निर्देशक सिद्धांत के रूप में शामिल किया गया है, जो भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश देता है। इसका उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना और संपत्ति जैसे व्यक्तिगत मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू करना है, चाहे उनकी धार्मिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो। यह “एक देश, एक कानून” की अवधारणा को मजबूत करता है और लिंग समानता, राष्ट्रीय एकता तथा सामाजिक सुधार को बढ़ावा देता है।

मध्यप्रदेश में डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने हाल ही में यूसीसी लागू करने की दिशा में आगे कदम बढ़ाये हैं। सरकार ने इसके लिए 5 सदस्यीय हाईलेवल कमेटी का गठन किया है जिसमें रिटायर्ड जस्टिस रंजना देसाई को अध्यक्ष, सेवानिवृत्त आईएएस शत्रुघन सिंह, कानूनविद अनूप नायर, शिक्षाविद गोपाल शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता बुधपाल सिह को सदस्य बनाया गया है। वहीं अपर सचिव अजय कटेसरिया इस कमेटी के सदस्य सचिव रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली यह समिति विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे कानूनों की समीक्षा करेगी। कमेटी को 60 दिन के अंदर विस्तृत रिपोर्ट और ड्राफ्ट बिल सरकार को सौंपेगी।  

विधि व विधायी कार्य विभाग द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि वर्तमान परिस्थितियों में नागरिकों के बीच समानता, न्याय, सामाजिक समरसता और विधिक स्पष्टता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विवाह, विवाह-विच्छेद, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और लिव-इन संबंधों से जुड़े कानूनों की समीक्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसी के मद्देनजर यह समिति गठित की गई है। समिति को राज्य में लागू विभिन्न व्यक्तिगत एवं पारिवारिक विधियों का परीक्षण करने की जिम्मेदारी दी गई है। 

उत्तराखंड और गुजरात में अपनाए गए मॉडल और प्रक्रियाओं का अध्ययन, मध्यप्रदेश की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संतुलित कानूनी ढांचा सुझाना, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों और शिक्षाविदों से सुझाव लना, जनसुनवाई और परामर्श बैठकें आयोजित करना, महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों पर विचार करना, लिव-इन संबंधों के पंजीयन और उससे जुड़े अधिकारों पर सुझाव देना और प्रस्तावित कानून के विधिक और प्रशासनिक पहलुओं की समीक्षा करना शामिल हैं। समिति मध्यप्रदेश की स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुझाव देगी। यूसीसी के प्रावधानों का अध्ययन करने और संभावित चुनौतियों पर सुझाव देने को भी कहा गया है। मोहन सरकार ने इस प्रक्रिया को ज्यादा समावेशी बनाने के संकेत दिए हैं। समिति आम लोगों, धार्मिक संगठनों और विभिन्न वर्गों के विशेषज्ञों से सुझाव लेगी, ताकि प्रस्तावित कानून व्यावहारिक और संतुलित हो सके। इसके लिए प्रदेशभर में परामर्श बैठकों की भी कार्ययोजना  तैयार की जा आ रही है। 

अप्रैल 2026 में हुई कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने गृह विभाग को निर्देश दिए कि उत्तराखंड और गुजरात में लागू यूसीसी मॉडल का अध्ययन कर राज्य के लिए ड्राफ्ट तैयार किया जाए। मुख्यमंत्री के सीधे निर्देश पर गृह विभाग ड्राफ्ट बिल तैयार करने में जुट गया है। सरकार का लक्ष्य है कि दिवाली 2026 या वर्ष के अंत तक यूसीसी को लागू कर दिया जाए।

मोहन सरकार यूसीसी को लिंग न्याय, सामाजिक समानता और प्रशासनिक सुव्यवस्था से जोड़ रही है। इसमें बहुविवाह पर रोक, लड़कियों-बेटों को समान उत्तराधिकार, विवाह एवं लिव-इन संबंधों का अनिवार्य पंजीकरण, तलाक की प्रक्रिया को सरल और निष्पक्ष बनाना जैसी बातें शामिल हो सकती हैं। इससे महिलाओं को व्यक्तिगत कानूनों की जटिलताओं से मुक्ति मिलेगी और कानूनी विवादों में कमी आएगी। सरकार इसे राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने का कदम मान रही है। यूसीसी पर मोहन सरकार की सक्रियता से लगता है कि मध्यप्रदेश सबके लिए एक कानून की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी है इसलिए कांग्रेस समेत कुछ विपक्षी दलों ने चिंता जताई है कि यूसीसी आदिवासी रीति-रिवाजों और पहचान पर असर डाल सकता है। सरकार को इन संवेदनशील मुद्दों पर विशेष छूट या संतुलित प्रावधान रखने की जरूरत होगी। 

यूसीसी पर मोहन सरकार की बढ़ती सक्रियता निश्चित ही उत्तराखंड और गुजरात के बाद मध्यप्रदेश को यूसीसी लागू करने वाले तीसरे बड़े राज्य के रूप में स्थापित कर सकते हैं। एमपी की मोहन सरकार के ये कदम यूसीसी को मात्र चुनावी वादे से आगे ले जाकर व्यावहारिक रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। यह कदम न केवल कानूनी समानता सुनिश्चित करेगा, बल्कि सामाजिक सुधार और महिला सशक्तिकरण को भी नई गति देगा। 

Thursday, 14 May 2026

प्रोजेक्ट चीता की नई उड़ान, कूनो बन रहा है चीतों का नया किंगडम


भारत में विलुप्त हो चुकी चीता प्रजाति को वापस लाने की महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट चीता के तहत मध्यप्रदेश का कूनो नेशनल पार्क की आबोहवा अब चीतों को रास आने लगी है। 1952 में भारत से चीतों के विलुप्त होने के बाद सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को कूनो में छोड़कर इस ऐतिहासिक परियोजना की शुरुआत की। आज कूनो न केवल आयातित चीतों का आश्रय स्थल है, बल्कि दूसरी पीढ़ी के भारतीय चीतों के जन्म और प्राकृतिक प्रजनन का साक्षी भी बन गया है।

कूनो नेशनल पार्क श्योपुर जिला मध्यप्रदेश लगभग 74,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। कूनो अभयारण्य श्योपुर जिले के विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी के उत्तरी भाग में स्थित है। इसमें विविध शुष्क पर्णपाती वन, घास के मैदान और प्रचुर शिकार चितल, सांभर, नीलगाय, चिंकारा आदि भी उपलब्ध हैं। चीतों के लिए उपयुक्त खुले मैदान और कम मानवीय हस्तक्षेप इसे आदर्श स्थल बनाते हैं। सितम्बर 2022 में दक्षिण अफ्रीका से चीता प्रोजेक्ट के तहत नामीबिया से 9 चीते जहाँ एमपी में लाये गए वहीँ फरवरी 2023 में दक्षिण अफ्रीका से 12 चीते आये। बोत्सवाना से लाये गए नौ चीतों में 6 मादा और 3 नर शामिल हैं। कूनो में कई मादा गामिनी, ज्वाला आदि के शावकों को जन्म दिया और अब तक दर्जनों शावक यहाँ पैदा हो चुके हैं। यह ‘प्रोजेक्ट चीता’ के अंतर्गत तीसरा बड़ा अंतर्राष्ट्रीय चरण है। इस वर्ष बोत्सवाना से अतिरिक्त चीते आने से अब इनकी आबादी में इजाफे के आसार दिखाई दे रहे हैं। मोहन सरकार की वन्य जीव संरक्षण की मजबूत इच्छाशक्ति का परिणाम है कूनो की इस परियोजना ने मध्यप्रदेश में तेजी से प्रगति की है जिसके परिणाम अब धरातल पर दिखाई दे रहे हैं। 

अप्रैल 2026 में कूनो ने वन्य जीव संरक्षण में इतिहास रचा। गामिनी की बेटी केजीपी-2 ने खुले जंगल में चार शावकों को जन्म दिया। यह पहला मामला है जब भारत में जन्मी चीता ने जंगली परिवेश में संतान दी। इससे पहले शावक मुख्यतः बाड़े वाले क्षेत्रों में पैदा होते थे। इस सफलता के साथ भारत में चीतों की कुल संख्या 57 पहुंच गई है जिनमें से लगभग 37 भारत में जन्मे हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि परियोजना अब पुनर्वास से आगे बढ़कर स्थायी प्रजनन की ओर अग्रसर हो रही है। कूनो नेशनल पार्क देश में वन्यजीव संरक्षण और पारिस्थितिकी पुनर्स्थापना का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभर रहा है।कूनो में हिरण, चीतल, सांभर, नीलगाय और जंगली सुअरों की पर्याप्त संख्या चीतों  के लिए अनुकूल साबित हो रही है। यही वजह है कि  चीते  यहां आराम से रह रहे हैं। 

दिसंबर 2023 में मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद से एमपी के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वन्यजीव संरक्षण को सांस्कृतिक विरासत, जैव विविधता, पर्यटन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ने का कार्य किया है जिसके चलते मध्यप्रदेश में वन्य जीव संरक्षण और संवर्धन की दिशा में कई अभूतपूर्व निर्णय लिए गए। रातापानी टाइगर रिजर्व को देश का 8वां और प्रदेश का नया टाइगर रिजर्व घोषित करना मोहन का सबसे बड़ा मास्टर स्ट्रोक रहा। 2008 में नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी से अनुमति मिलने के बावजूद यह प्रस्ताव दशकों से लटका रहा लेकिन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल में इसे मंजूरी मिली। इतना ही नहीं पुरातत्वविद् विष्णु श्रीधर वाकणकर के नाम पर इसका नामकरण कर उन्होनें इसे सांस्कृतिक गौरव से भी जोड़ा। मार्च-2025 में माधव टाइगर रिजर्व को प्रदेश का 9वां टाइगर रिजर्व घोषित किया गया।

 चीतों का पुनर्वास घास के मैदानों के पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करता है, शिकार प्रबंधन में मदद करता है और अन्य वन्यजीवों के लिए भी लाभ पैदा करता है। कूनो में चीतों की आमद बढ़ने के साथ ही इसे अब  पर्यटन स्थल के रूप में भी विकसित किया जा रहा है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। प्रोजेक्ट चीता’ की अपार सफलता के बाद भारत में दशकों बाद चीतों की वापसी ने यह संदेश दिया है कि यदि सही वैज्ञानिक प्रबंधन और राजनीतिक प्रतिबद्धता हो तो विलुप्त प्रजातियों का पुनर्वास संभव है। चीतों को क्वारंटीन एवं अनुकूलन प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद गांधी सागर एवं नौरादेही जैसे अन्य अभयारण्यों में भी बसाने की भी सरकार ने पूरी तैयारी की जा रही है। अब कूनो को ग्लोबल ब्रीडिंग सेंटर के रूप में विकसित करने की दिशा में तेजी से कार्य चल रहा है। इसके साथ ही गांधी सागर वाइल्डलाइफ सेंचुरी को चीतों के दूसरे आवास और नौरादेही वाइल्डलाइफ सेंचुरी को तीसरे बड़े चीता लैंडस्केप के रूप में भी विकसित किया जा रहा है। बीते दिनों श्योपुर में कूनो नेशनल पार्क के क्वारंटीन बाड़े से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव ने दो मादा चीतों को कूनो नदी के समीप स्थित साइट से खुले जंगल में मुक्त किया जिसने मध्यप्रदेश के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने का काम किया है। ये चीते भी अब कूनो के वातावरण में तेजी से घुल-मिल जाएंगे।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि मध्यप्रदेश की धरती ने चीतों को अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराकर उन्हें पुनर्स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य कर अपने परिवार का हिस्सा बनाया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लगभग साढ़े तीन वर्ष पहले कूनो में चीता प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी।  मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका और अब बोत्सवाना से लाए गए चीतों के पुनर्स्थापन को निरंतर सफलता मिल रही हैं और आज प्रदेश ने देशभर में चीता स्टेट के रूप में पहचान बनाई है। कूनो में इन चीतों के सफल प्रजनन से भरोसा बढ़ा है कि यह परियोजना न केवल वन्यजीव संरक्षण का प्रतीक है, बल्कि भारत की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता और वैश्विक सहयोग का उदाहरण अनुपम उदाहरण भी पूरे देश के सामने प्रस्तुत करता है। कूनो में प्रोजेक्ट चीता की सफलता हर नए शावक के जन्म के साथ मध्यप्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और पर्यटन को नई गति देगी।

Sunday, 19 April 2026

एकात्म धाम बन रहा है एकात्मता का दिव्य केंद्र

भारत की आध्यात्मिक भूमि पर ऐसे अनेक तीर्थ स्थल हैं, जहाँ प्राचीन ज्ञान और आधुनिक संकल्प एक साथ जुड़कर मानवता को नई दिशा देते हैं। इन्हीं में से एक है एकात्म धाम, जो मध्यप्रदेश के पावन ओंकारेश्वर में स्थित है। यह धाम आदि गुरु शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत दर्शन और “एकात्मता” के सार्वभौमिक संदेश को समर्पित है। नर्मदा नदी के किनारे मांधाता पर्वत पर स्थित यह स्थल न केवल एक तीर्थ है, बल्कि सांस्कृतिक एकता, आध्यात्मिक जागरण और वैश्विक सद्भाव का प्रतीक भी बन रहा है।

12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का विशेष स्थान है। नर्मदा नदी के बीच स्थित यह ओमआकार का द्वीप प्राचीन काल से ही तीर्थयात्रियों का प्रमुख केन्द्र रहा है। किंवदंती है कि विन्ध्य पर्वत ने यहां शिव की आराधना की और शिव स्वयं ओमकारेश्वर रूप में प्रकट हुए। 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य का जीवन से इस स्थल का गहरा संबंध है। यहीं गुरु गोविंद भगवत्पाद से दीक्षा पाने के साथ ही उन्होंने अद्वैत दर्शन की गहराई प्राप्त की। शंकराचार्य ने पूरे भारत में चार मठों की स्थापना कर सनातन धर्म का पुनरुत्थान किया और “ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या” जैसे महान सिद्धांत दिए। एकात्म धाम इसी योगदान को याद दिलाता है और इन दिनों उनके दर्शन को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बन रहा है।

मध्यप्रदेश सरकार की एक महत्वाकांक्षी परियोजना के रूप में आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास के तहत एकात्म धाम का इन दिनों विकास किया जा रहा है। इसका उद्देश्य अद्वैत वेदांत को वैश्विक स्तर पर प्रसारित करना, सांस्कृतिक एकता को मजबूत करना और मानवता में एकत्व का भाव जगाना है।

आचार्य शंकर ने भारतवर्ष का भ्रमण कर सम्पूर्ण राष्ट्र को सार्वभौमिक एकात्मता से आलोकित किया। आचार्य शंकर की एकात्मता की प्रतिमा 108 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा बहुधातु से निर्मित है। यह आदि शंकराचार्य को समर्पित है और एकात्मता का सन्देश दे रही है। 21 सितंबर 2023 को इसका अनावरण हुआ था। नर्मदा नदी और मांधाता पर्वत के सुरम्य वातावरण में यह प्रतिमा दूर से ही दर्शन देती है। यहाँ स्थित अद्वैत लोक एक आधुनिक संग्रहालय है, जिसमें आचार्य शंकर के जीवन, उनके दर्शन, शास्त्रार्थ और सनातन धर्म की विभिन्न वीथिकाएं, लेजर-लाइट शो, फिल्म और प्रदर्शनियां होंगी। यहां सृष्टि की एकता को समझाने वाले केंद्र भी बनाए जा रहे हैं। आचार्य शंकर अंतर्राष्ट्रीय अद्वैत वेदांत संस्थान में वेदांत दर्शन, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और कला पर शोध केंद्र, शंकर कलाग्राम, नर्मदा विहार,ध्यान केंद्र, ग्रंथालय, गुरुकुल और विस्तार केंद्र शामिल हैं। मोहन सरकार द्वारा इसे महाकाल लोक की तर्ज पर विकसित किया जा रहा है। 2028 तक मुख्य निर्माण कार्य पूरे होने की उम्मीद है।

एकात्मधाम के अंतर्गत दूसरे चरण में 2195 करोड़ रूपये की लागत से आचार्य शंकर के जीवन और दर्शन पर केंद्रित अद्वैत लोक संग्रहालय का निर्माण किया जा रहा है। इसका उद्देश्य आचार्य शंकर के जीवन, उनके भाष्यों, पांडुलिपियों, दर्शन एवं सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित व प्रदर्शित करना है। परियोजना में संग्रहालय, शोध-केंद्र, शैक्षिक सुविधाएँ तथा तीर्थ और सांस्कृतिक पर्यटन संबंधी बुनियादी ढांचे का विकास शामिल करने की रूपरेखा रखी गयी है जिससे न केवल आध्यात्मिक-अध्ययन को बल मिलेगा बल्कि स्थानीय पर्यटन और अर्थव्यवस्था को भी बढ़ावा मिलेगा। 17 अप्रैल से 21 अप्रैल तक  यहां पांच दिवसीय अनुष्ठान का बड़ा आयोजन हो रहा है जहां 700 से अधिक शंकर दूत के रूप में दीक्षा लेकर एकात्मता के संदेश को रेखांकित कर रहे हैं। इस अनुष्ठान में भारत की दिव्य संन्यास परंपरा के अनेक शीर्ष संत, आर्ष चिंतक और विशिष्टजन की विशेष सहभागिता हो रही है। 

मौजूदा दौर में जब पूरी दुनिया में भेदभाव, संघर्ष और अलगाव बढ़ रहा है ऐसे में एकात्म धाम यह बताता है कि आत्मा की एकता से ही समाज, राष्ट्र और विश्व की एकता संभव है। मोहन सरकार एकात्म धाम के माध्यम से आचार्य शंकर के दर्शन को वैश्विक फलक पर स्थापित करने के प्रयासों में जुटी हुई है। एकात्म धाम के माध्यम से एमपी सरकार संतों, विद्वानों और आमजन को एक मंच पर लाने का अनुपम कार्य कर रही है जहां युवाओं की बड़ी संख्या में सहभागिता हो रही है। एमपी की मोहन सरकार के प्रयासों से यह धाम जल्द ही सनातन धर्म की अमर विरासत को संजोते हुए वैश्विक एकता का बड़ा केन्द्र बनेगा।

Friday, 10 April 2026

मोहन के विजन से अब एमपी-यूपी सहयोग को मिलेगी बूस्टर डोज

 एमपी यूपी महासम्मेलन ने लिखी विकास की नई इबारत 

डॉ. मोहन यादव के विजन से एमपी-यूपी के बीच औद्योगिक, पर्यटन और ऊर्जा सहयोग को नई रफ्तार मिल रही है। 2026 को वाराणसी में आयोजित ‘एमपी-यूपी सहयोग सम्मेलन 2026’ ने अंतरराज्यीय साझेदारी को विकास, निवेश, पर्यटन, कृषि, ऊर्जा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने का कार्य किया है। यह सम्मेलन मात्र दो राज्यों के साझा संकल्प नहीं बल्कि ‘विकसित भारत’ का जीवंत प्रतीक बना है।

साझा विरासत और सहयोग का मिलेगा  लाभ

मध्यप्रदेश-उत्तर प्रदेश सहयोग सम्मेलन 2026 में दोनों राज्यों ने विकास, निवेश, लघु उद्योग और धार्मिक पर्यटन को लेकर नई दिशा तय की। मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा भौगोलिक रूप से गहराई से जुड़े हुए हैं। काशी और उज्जैन जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र दोनों राज्यों को जोड़ते हैं।  दोनों राज्यों में  समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं और विशाल श्रम शक्ति मौजूद है। डॉ. मोहन यादव ने इस सम्मेलन में जोर दिया कि दोनों राज्य मिलकर आर्थिक प्रगति के नए मॉडल की गौरवगाथा लिख सकते  हैं। सम्मेलन में काशी विश्वनाथ धाम और महाकाल कॉरिडोर के बीच एमओयू का आदान-प्रदान हुआ, जो धार्मिक पर्यटन को नई गति देगा।

वन-टू-वन बैठकें, अनेक समझौतों से आकर्षित होगा निवेश और रोजगार सृजन 

दोनों राज्यों के स्थानीय शिल्प, जीआई  टैग उत्पादों और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए सहयोग का ढांचा तैयार किया गया। इससे कारीगरों को नई बाजार पहुंच मिलेगी, निर्यात बढ़ेगा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। उज्जैन में 284 करोड़ रुपये के निवेश से यूनिटी मॉल बनाने की घोषणा की गई, जो ओ ओडीओपी  उत्पादों का प्रमुख प्रदर्शन केंद्र बनेगा। एमपी यूपी महासम्मेलन में तमाम उद्योगपतियों के साथ वन-टू-वन बैठकें हुईं। दोनों राज्यों की औद्योगिक क्षमताओं का साझा उपयोग कर निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजन पर जोर दिया गया। मुरैना में 2000 मेगावाट की संयुक्त सोलर परियोजना पर काम आगे बढ़ रहा है, जिससे किसानों को सस्ती और हरित ऊर्जा उपलब्ध होगी। केन-बेतवा लिंक परियोजना से बुंदेलखंड क्षेत्र के किसानों की किस्मत बदलेगी। धार्मिक स्थलों के विकास, पर्यटकों की सुविधा और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से दोनों राज्यों के बीच पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। ध्यप्रदेश में भी चंदेरी और महेश्वरी साड़ियों सहित पारंपरिक लघु उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है।प्रयागराज कुंभ के बाद उज्जैन में होने वाले सिंहस्थ को देखते हुए व्यवस्थाओं को और ज्यादा सुगम बनाने पर फोकस रहेगा। मध्यप्रदेश में सिंहस्थ के आयोजन के लिए बेहतर प्रबंधन की तैयारियां जोर शोर से  चल रही है। प्रयागराज में ऐतिहासिक महाकुंभ के आयोजन की व्यवस्थाओं के अध्ययन से अब  सिंहस्थ के बेहतर प्रबंधन में मदद मिलेगी।

रोजगार और समृद्धि की दिशा में बढे कदम 

सीएम डॉ. यादव ने बताया कि इस दौरे का उद्देश्य युवाओं को रोजगार, गरीबों को बेहतर जीवन और उत्पादों को सही मूल्य दिलाने के प्रयासों को आगे बढ़ाना भी है। इसके लिए लघु उद्योगों के बीच समन्वय और साझा रोड शो की योजना बनाई जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्यों के बीच टकराव का दौर खत्म हो चुका है और अब सहयोग के जरिए विकास की नई इबारत लिखी जा रही है।

‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशन को मिलेगी मजबूती 

डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में यह सम्मेलन अंतरराज्यीय सहयोग को नई दिशा देने वाला साबित हुआ है जिससे छोटे उद्यमियों, कारीगरों और किसानों को भी सीधा लाभ पहुंचेगा। इस बार ओडीओपी , जीआई टैग, सोलर ऊर्जा, धार्मिक पर्यटन और औद्योगिक साझेदारी जैसे क्षेत्रों पर ठोस कार्य होने की बड़ी पहल शुरू हुई है। 

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने स्पष्ट कहा कि यूपी और एमपी अब  मिलकर विकास के नए आयाम स्थापित करेंगे, जिसमें निवेश, रोजगार, निर्यात और सांस्कृतिक समृद्धि शामिल हैं। यह पहल ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। 

मुख्यमंत्री डॉ. यादव के नेतृत्व में आयोजित  इस सम्मेलन निवेश आकर्षण, निर्यात संवर्धन, रोजगार सृजन और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करते हुए क्षेत्रीय विकास का एक सशक्त मॉडल प्रस्तुत किया है। “एमपी-यूपी सहयोग सम्मेलन 2026” के माध्यम से मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के बीच सहयोग को एक स्थायी, व्यावहारिक और परिणामदायी स्वरूप मिलेगा, जो दोनों राज्यों की अर्थव्यवस्था को नई गति प्रदान करेगा। डॉ. मोहन यादव के विजन के तहत दोनों राज्य अब न केवल सांस्कृतिक रूप से जुड़ेंगे, बल्कि आर्थिक और सामाजिक रूप से भी एक-दूसरे के पूरक बनेंगे। मोहन यादव के नेतृत्व में  दो राज्य, विकसित भारत का संकल्प अब  साकार होता दिख रहा है।  मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बीच यह सहयोग पूरे देश के लिए प्रेरणादायी उदाहरण साबित होगा।