Friday, 13 May 2022

लाड़ली लक्ष्मी के जरिए बेटियों को आत्मनिर्भर बनाने में जुटे मुख्यमंत्री शिवराज


 


मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में प्रदेश लगातार विकास के पथ पर अग्रसर हो रहा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने हर कार्यकाल में बेटियों के सशक्तीकरण के लिए कई कदम उठाये हैं। मध्य प्रदेश सरकार ने बेटियों के जन्म के प्रति जनता में सकारात्मक सोच, लिंगानुपात में सुधार, बालिकाओं की शैक्षणिक स्थिति और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार लाने तथा उनके अच्छे भविष्य की आधारशिला रखने के उद्देश्य से 1 अप्रैल, 2007 को लाड़ली लक्ष्मी योजना को लागू किया । इसके साथ ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने लाड़ली लक्ष्मी योजना 2.0 ‘आत्मनिर्भर लाड़ली ’ को बीते दिनों शुरू किया है जिससे प्रदेश की हर बेटी सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त हो सकेगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्राथमिकता के केंद्र में प्रदेश की बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य- सुविधा, स्वावलंबन, समृद्धि और उनका सम्मान है। मुख्यमंत्री लाड़लियों के आर्थिक सशक्तीकरण से लेकर उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण देने पर कार्य कर रहे हैं ।

मुख्यमंत्री चौहान द्वारा शुरू की गई लाड़ली लक्ष्मी योजना एक ऐसी योजना है जिसने पूरे देश में अपनी छाप छोड़ी है। यही वो योजना है जिसने शिवराज को बेटियों का मामा बना दिया और पूरे प्रदेश में शिवराज की लोकप्रियता बढ़ गई। आज प्रदेश में जहाँ 42.14 लाख लाड़लियों को इसके दायरे में लाया जा चुका  है वहीँ देश के 8 राज्यों ने भी मुख्यमंत्री शिवराज  की इस योजना को सराहा और इसे अपने राज्यों में लागू किया। 2007 से लेकर आज तक इस योजना को सार्थक बनाने के लिए सरकार द्वारा समय -समय पर कई बदलाव किये गए लेकिन इसके बाद भी बेटियां बड़ी संख्या में इस योजना में पंजीकृत हो होकर लाभान्वित हो रही हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के दूरदर्शी नेतृत्व में मध्यप्रदेश ने महिलाओं के सशक्तीकरण के क्षेत्र में नया इतिहास रचा है। आज बेटियों के प्रति समाज की सोच में जहाँ बदलाव आया है वहीँ लाड़ली लक्ष्मी जैसी योजनाओं के माध्यम से बेटियों की उम्मीदों को नए पंख लगे हैं। मुख्यमंत्री शिवराज की योजनाओं का प्रतिफल है प्रदेश के लिंगानुपात के स्तर में भी तेजी से सुधार हो रहा है। आज प्रदेश में बेटियों का लिंगानुपात बढ़ हो गया है। प्रदेश में ये बड़ा बदलाव है। लाड़ली लक्ष्मी जैसी योजनाओं ने बेटियों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया है वहीँ उनमें पठन -पाठन को लेकर एक नई ललक भी जगी है। प्रतिभाशाली बेटियों के लिए मुख्यमंत्री शिवराज की ये योजना नई उम्मीद बनकर आई हैं। अब मेडिकल , आईआईटी , आईआईएम या किसी भी संस्थान में प्रवेश का पूरा शुल्क सरकार वहन करेगी साथ ही जरुरत पड़ने से लाड़ली ई -संवाद के जरिये सीधे मुख्यमंत्री से कनेक्ट कर सकती हैं। बेटियों के सर्वांगीण विकास के लिए लाड़ली लक्ष्मी योजना को स्वास्थ्य और पोषण से भी जोड़ा गया है। लाड़ली लक्ष्मी के माता - पिता को बेटियों के कल्याण के लिए संचालित सुकन्या समृद्धि जैसी योजनाओं में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित कर उनमें प्रतिदिन बचत के संस्कार भी डाले जा रहे हैं । बेटियों के बेहतर लिंगानुपात को सुनिश्चित करने के लिए शहरी स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों को पुरस्कृत करने की योजना भी बनी है।

इस योजना में अब तक छठवीं , नवीं , 11 वीं , 12 वीं में प्रवेश लेने वाली 9. 05 लाख बेटियों को 231. 07 करोड़ की छात्रवृत्ति का वितरण किया गया है वहीँ समाज की सोच में बदलाव आने के चलते बाल विवाह में भी तेजी से कमी आई  है। 2011 की जनगणना के समय प्रदेश में बेटियों का लिंगानुपात 919 था जो आज 956 हो गया है। एक तरफ जहाँ चम्बल , बुंदेलखंड और ग्वालियर सरीखे इलाकों में भी लिंगानुपात का स्तर सुधरा है वहीँ प्रदेश में घरेलू हिंसा के मामलों में भी कमी देखी जा सकती है। इस योजना के माध्यम से स्कूलों में दाखिला लेने वाली बेटियों की संख्या में भी तेजी के साथ इजाफा हुआ है। यही नहीं प्रदेश में बेटियों में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाली बेटियों की संख्या भी बढ़ी है। लाड़ली लक्ष्मी योजना का लाभ लेने के लिए भी आज लोग अपने बेटियों की पढ़ाई का जारी रखना चाहते हैं साथ ही 18 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद उसका विवाह करना चाहते हैं। यह प्रदेश में एक बड़ा बदलाव है जो मुख्यमंत्री शिवराज के रहते सम्भव हो पाया है।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लाड़लियों को सशक्त बनाने के प्रयासों में पूरी ऊर्जा के साथ जुटे हुए हैं । इसी पहल को आगे बढ़ाते हुए कटनी जिले के ढीमरखेड़ा विकासखंड के कोठी गांव की लाड़ली लक्ष्मी योजना कोठी गांव की लाड़ली लक्ष्मी योजना के 92 हितग्राहियों के अब लाड़लियों के नाम से ही जाने जाएंगे। सभी बेटियों के घरों के बाहर नाम दर्ज किये जाने से लाड़लियों के साथ ही उनके परिजनों के चेहरों में जश्न है। इससे ज्यादा ख़ुशी क्या हो सकती है अब उनके घरों की पहचान उनकी बेटियों के नाम से होगी। इस पहल के पूरे प्रदेश में बेटियों को लेकर आने वाले दिनों में बदलाव आएंगे।लाल परेड मैदान पर लाड़ली लक्ष्मी उत्सव में मुख्यमंत्री शिवराज ने कहा कि डॉक्टर बनने में प्राइवेट मेडिकल कॉलेज में 7-8 लाख रुपये फीस लगती है। अब मेडिकल, आईआईटी, आईआईएम या किसी भी संस्थान में प्रवेश लेने पर लाड़ली लक्ष्मी की पूरी फीस राज्य सरकार भरेगी। 12वीं पास कर कॉलेज में प्रवेश लेने वाली लाड़ली लक्ष्मियों को 25 हजार रुपये दो किस्तों में अलग से दिए जाएंगे। साथ ही हर साल 2 मई से 12 मई तक लाड़ली लक्ष्मी उत्सव मनाया जाएगा। मुख्यमंत्री चौहान ने बेटियों से सीधे संवाद करने के लिए लाड़ली ई-संवाद ऐप भी बनाया है जिससे बेटियों का बेटियों की जिंदगी संवारेगी। मुख्यमंत्री ने कहा जिस पंचायत में लाड़लियों का सम्मान होगा, जहां एक भी बाल विवाह नहीं होगा, शालाओंं में लाड़लियों का शत-प्रतिशत प्रवेश होगा, कोई लाड़ली कुपोषित नहीं होगी और कोई भी बालिका अपराध घटित नहीं होगा, ऐसी ग्राम पंचायतों को लाड़ली लक्ष्मी पंचायत घोषित किया जाएगा।

मुख्यमंत्री शिवराज को प्रदेश भर की बेटियों ने पत्र लिखकर जिस अंदाज में अपना आभार व्यक्त किया है उसकी पूरे देश में चर्चा हो रही है। मुख्यमंत्री चौहान ने कहा है कि, बेटियों, मेरे रहते हुए तुम्हारी पढ़ाई की राह में कोई बाधा नहीं आ पायेगी। तुम पढ़ो, आगे बढ़ो, मेरी शुभकामनाएं, आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री चौहान को मयरीन खान नाम की बेटी ने भी पत्र लिखा, जिससे चौहान ने फोन पर बात भी की। मायरीन ने अपने पत्र में बेटियों पर स्वलिखित कविता और योजना के बाद समाज में आये बदलाव की चर्चा की। मुख्यमंत्री चौहान ने मायरीन से दूरभाष पर बात की और उसका हालचाल भी जाना। मुख्यमंत्री ने कहा कि योजना में ऐसी बेटियां को शामिल किया जा रहा है जिन्हें कहीं कोई छोड़ गया या जिनका कोई नहीं है,उन्हें भी लाड़ली लक्ष्मी माना जाएगा और लाड़ली लक्ष्मी योजना का लाभ दिया जाएगा।

विधानसभा चुनावों की उलटी गिनती शुरू होने के साथ ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी पूरी सक्रियता के साथ मैदान में जुट गए हैं। 2023 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए मध्य प्रदेश सरकार लाड़ली योजना के हितग्राहियों कप अपने पाले में लाकर अपनी चुनावी बिसात बिछाने जा रही है। 2007 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने जब ये योजना शुरू की थी तो इसी के जरिये उन्होंने चुनावों में सरकार के पक्ष में माहौल बनाया था। अब एक बार फिर लाड़ली लक्ष्मी योजना 2.0 के जरिये वह सरकार लाड़ली योजना के हितग्राहियों के साथ ही उनके परिवारों को भी रिझाने की कोशिशों में जुट गई है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की नजरें पहली बार वोटर बनने वाली लाड़लियों पर भी है जिससे सरकार के संगठन के पक्ष में लामबंदी सुनिश्चित की जा सके। लाड़ली लक्ष्मी योजना में बेटियों का जिस तेजी से पंजीकरण हुआ है उससे मुख्यमंत्री शिवराज की बांछें खिली हुई हैं। यही लाड़ली लक्ष्मी योजना 2023 के चुनाव में गेम चेंजर साबित हो सकती हैं। विधान सभा चुनावों के ठीक बाद 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों में भी यह योजना अपना असर छोड़ सकती है शायद यही वजह है सरकार की पूरी कोशिश इस माहौल को अपने अनुकूल बनाने में जुट गई है।

बेटियों के सशक्तीकरण को लेकर प्रदेश सरकार बेहद संजीदा हैं और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में इस दिशा में लगातार सार्थक प्रयास किये जा रहे हैं। एक समय था जब प्रदेश में बेटियों को बोझ समझा जाता था। समाज की इस मानसिकता को अपनी लाड़ली लक्ष्मी सरीखी योजनाओं के माध्यम से बदलने का काम मुख्यमंत्री शिवराज ने बखूबी किया है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की सोच के कारण बेटियों का सम्मान बढ़ा हैं। यह साधारण बात नहीं है उनकी बनाई गई यह लाड़ली लक्ष्मी योजना आज देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक मिसाल है।

Monday, 2 May 2022

पर्यावरण प्रेमी मुख्यमंत्री शिवराज !


 


उनकी आत्मा नर्मदा में बसती है ।  वृक्षारोपण के अपने कार्यों  के साथ ही वह  पूरे प्रदेश को हरियाली से आच्छादित कर देना चाहते हैं। जनसरोकारों के विचार पथ पर चलते हुए वह प्रकृति को भी  अपना अनुपम उपहार मानते हैं।  अपने पर्यावरण संरक्षण के नए मिशन पर  चलते  हुए वो  पर्यावरण को बचाने का संकल्प लिए  प्रतिदिन नई  ऊर्जा से सरोबार रहते हुए जन -जन को इस अभियान से जोड़ने का काम कुशलता के साथ करते नजर आते हैं । पेड़ों की जिस अंदाज में आज कटाई हो रही है और वनों की संख्या में  गिरावट आ रही है  उसने मनुष्य के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है क्योंकि अगर पर्यावरण रहेगा तभी मनुष्य का अस्तित्व  बचा रहेगा इसे आज भी लोग नहीं समझ पा रहे हैं । जिस तेजी से आज के दौर में पेड़ काटे जा रहे हैं उसी अनुपात में लगाए नहीं जा रहे जो बड़ी चिंता का विषय बना हुआ  है। वृक्षारोपण  जैसे कार्यक्रमों पर आज के दौर में किसी भी सरकार की नजर नहीं गई  शायद आज  हम उन परम्पराओं को भी  भूल चुके हैं जिसमें नदी को प्रणाम करना सिखाया जाता है। सही मायनों में पर्यावरण को  बचाने के उपाय तो  इन्हीं रीति रिवाजों में छिपे  हुए हैं जिसके  सन्देश को भी हम अब तक समझ पाने में कामयाब नहीं हो पाए  हैं ।   

हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के  जनहितैषी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की, जिनकी जनसरोकारों की  साधारणता में असाधारणता छिपी हुई है। सुरक्षित  और स्वच्छ पर्यावरण को अपनी प्राथमिकता बताते हुए  जनता के बीच प्रदेश  के मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह  चौहान  ने अपना हर दिन पर्यावरण को समर्पित कर पूरे देश में नई  मिसाल कायम की है । उनका  पेड़ -पौंधे लगाने का प्रेम दिन -ब - दिन  बढ़ता  ही जा रहा है। असल में विकास का सपना दिखाकर जिस तरीके से प्राकृतिक संसाधनों का  अंधाधुंध  दोहन देश में  किया जा रहा  है  वो किसी भी  सरकार  के ऐजेंडे में नहीं है लेकिन  प्रदेश के  जनप्रिय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  ने पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अपनी  अभिनव पहल  के माध्यम से  पूरे देश में  मध्य प्रदेश का नाम गर्व से ऊँचा किया है । बीते  बरस में  अमरकंटक  में  साल भर कम से कम एक पौधा प्रतिदिन रोकने के संकल्प के साथ ही  शिवराज सिंह चौहान के नाम के  साथ  पर्यावरण प्रेमी मुख्यमंत्री का तमगा भी जुड़ गया । 19  फरवरी 2021 को  नर्मदा जन्मोत्सव के शुभ अवसर   पर अमरकंटक में एक साल तक प्रतिदिन वृक्षारोपण करने का संकल्प अभियान चलाया  था जो आज भी अनरवत रूप से जारी है। नर्मदा जयंती के अवसर पर अमरकंटक के शंभुधारा क्षेत्र में रूदाक्ष और साल का पौधा लगाकर प्रतिदिन एक पौधा लगाने की शुरूआत  मुख्यमंत्री के कर कमलों से  शुरू हुई थी। उन्होंने  वृक्षरोपण को  उस समय पवित्र कार्य  बताया था और सभी नागरिकों  को पर्यावरण-संरक्षण के साथ  उनकी सुरक्षा करने का आह्वान भी किया था ।  जनभागीदारी  के माध्यम से  उन्होनें  आम आदमी से  भी पेड़ों की सुरक्षा करने की अपील की थी।  

पर्यावरण-संरक्षण के लिए समर्पित मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सवा साल की लम्बी अवधि  के दौरान कोई भी दिन अब तक ऐसा नहीं रहा है जब वे पेड़ लगाना भूल गए हों । अपने व्यस्त  कार्यक्रम  से समय निकालते हुए मुख्यमंत्री अपने इस अनूठे अभियान में  तमाम पर्यावरण प्रेमी, सामाजिक  संस्थाओं और स्वयंसेवियों को भी मुहिम  में साधते हैं इसी बड़ी बात क्या हो सकती है। मुख्यमंत्री चौहान की पर्यावरण को लेकर की गयी इस अभिनव पहल से  प्रदेश की जनता में भी पर्यावरण को लेकर  एक  नई  जागरूकता  पैदा हुई है । खुद  मुख्यमंत्री शिवराज चौहान का मानना है हर नागरिक प्रतिदिन नहीं तो माह में एक और अपने मांगलिक कार्यक्रमों के अवसर पर एक पौधा अवश्य लगाये जिसके  माध्यम से हम  आने वाली पीढ़ी को एक बड़ी सौगात दे सकते हैं।  उनका  ये भी कहना रहा है कि पिछले वर्ष कोरोना काल में हमने जो परेशानियाँ झेली हैं, उसमें ऑक्सीजन की कमी भी एक महत्वपूर्ण पहलू रहा है। पेड़-पौधे हमें न सिर्फ नि:शुल्क प्राकृतिक ऑक्सीजन देते हैं, बल्कि दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग से भी बचाते हैं।

उल्लेखनीय है कि पर्यावरण के प्रति मुख्यमंत्री चौहान शुरू से ही संवेदनशील रहे हैं। मध्यप्रदेश की जीवनवाहिनी नर्मदा नदी के संरक्षण के लिए नमामि देवी नर्मदे यात्रा कर उन्होंने न केवल नर्मदा जल को स्वच्छ बनाए रखने में अपना बड़ा योगदान दिया है  बल्कि नर्मदा मैया के दोनों तटों पर वृक्षारोपण कर प्रकृति  के लिए व्यापक जन-भागीदारी भी जुटाई।  उनकी नर्मदा यात्रा से विकास के साथ जलवायु परिवर्तन में समाज को सरकार के साथ खड़ा करने में सफलता मिली है। साथ ही कई जिलों में जन-भागीदारी से पौध-रोपण कर हरियाली को बढ़ाया गया है। मुख्यमंत्री की पहल पर पर्यावरण के क्षेत्र में जन-भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए प्रदेशव्यापी "अंकुर अभियान" का शुभारम्भ  भी किया गया है जिसके माध्यम से 4 लाख  से अधिक लोगों ने ऑनलाइन पंजीयन कराकर 67 हजार पौधे रोपे हैं।  कार्यक्रम में 10 लाख 19 हजार पौध-रोपण का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह अभियान जन-भागीदारी के साथ आज भी  सतत  रूप के  साथ जारी है। शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में भी हरियाली को बढ़ावा देने के लिए मुख्यमंत्री ने पौध-रोपण की योजना बनाई है जिसकी मिसाल अब तक देखने को नहीं मिली है । नगरीय निकाय द्वारा नये घरों के निर्माण की अनुमति  देते समय आवास परिसर में वृक्षारोपण की शर्त रखी गई है। इसी प्रकार ग्रामीणों को भी हर दिन वृक्षारोपण  के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते  प्रदेश  आज एक  एक खास मुकाम पर  पहुँच गया  है। 2017 में एक दिन में करोड़ों पौधे रोकने का विश्व रिकॉर्ड भी शिवराज सिंह चौहान के नाम  दर्ज  है। शिवराज सिंह चौहान के प्रतिदिन अपने  वृक्षारोपण कार्यक्रम में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि ऐसे वृक्ष लगाए जाए  जिन्हें  अधिक पानी व देखरेख की आवश्यकता हो।  मध्य प्रदेश की सरकार  हर दिन आम लोगों को  वृक्षारोपण के लिए प्रेरित कर रही है। पंचायत और स्कूल भवनों में वृक्षारोपण सहित अपने पूर्वजों की स्मृति में वृक्ष लगाने का अभियान भी शिवराज सिंह चौहान की देन ही है। इस  वृक्षारोपण अभियान से प्रदेश  के हर नागरिक में  भी  प्रकृति  को लेकर प्रेम करने का भाव मन में जगा है। मध्य प्रदेश के मुखिया की प्रदेश की जनता से वृक्षारोपण के लिए की गयी  ये अपील  आमजन को इस अभियान से जुड़ने के लिए हर दिन प्रेरित कर रही है जिसके प्रदेश में  सकारात्मक  परिणाम  सामने आ रहे हैं । चिलचिलाती धूप और हीट वेव की तमाम आशंकाओं  के बीच मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  के माथे पर किसी तरह की कोई शिकन नहीं दिखती।  वह एक तरफ जहाँ लोगों से दो पेड़ लगाने की बात कहते हैं वहीँ खुद भी पेड़  लगाने से पीछे नहीं रहते हैं।  मुख्यमंत्री के  पर्यावरण के प्रति जज्बे को इस बात से समझ सकते हैं बीते सवा साल में 445 पेड़ वह खुद लगा चुके हैं।  उनकी ऐसी जिजीविषा को  देखकर हर किसी को उन पर रश्क ही हो जाये। मुख्यमंत्री शिवराज आज प्रदेश के अन्य नेताओं के बीच भी एक रोल  मॉडल के रूप में  लोकप्रिय हुए हैं जिनकी पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन की चेतना  आम जान में नई  स्फूर्ति का संचार कर रही है।  

आंचलिकता और क्षेत्रीयता की महक मध्य प्रदेश की माटी में महसूस की जा सकती है। यह कहने में कोई अतिश्योक्ति  नहीं मध्यप्रदेश को शिवराज सिंह चौहान ने एकता के सूत्र में पिरोने का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है । उन्होंने यहां के नागरिकों में एक ऐसा भाव पैदा किया जिसके चलते न उनमें अपनी माटी के प्रति प्रेम पैदा हुआ बल्कि उनमें इस जमीन पर वृक्षारोपण करने की अनूठी  ललक भी  जगी है। इस मामले  में शिवराज  एक आशावादी  विकासवादी और पर्यावरणप्रेमी  राजनेता के रूप में सामने आते हैं।  पर्यावरण को लेकर मुख्यमंत्री चौहान के संकल्पों  से प्रदेश में  एक नई चेतना  और स्फूर्ति  का संचार हुआ है । आत्मनिर्भर मध्य प्रदेश के  अपने नव संकल्पों  के साथ अब  मुख्यमंत्री शिवराज  सिंह  चौहान  मध्य प्रदेश को  हरियाली से भर देना  चाहते  हैं।  शिवराज की नर्मदा नदी की सेवा यात्रा की जितनी सराहना की जाए उतनी कम है।  इस यात्रा के माध्यम से जहाँ नदियों के संरक्षण की दिशा में कदम बढे हैं वहीँ आम आदमी  की भागीदारी से यह जनांदोलन का रूप ले सकता है। मुख्यमंत्री शिवराज जनता के बीच रहने वाले और जनता की भावनाओं से खुद को  सीधे कनेक्ट  करने  वाले जननेता  हैं।  सूबे का मुखिया अगर संवेदनशील है और जनता के बीच कार्य करने की ललक उसमें हर पल है तो वह जनता के हर दर्द में सहभागी हो सकता है। वह  इस बात को बखूबी समझते हैं कोई भी बड़ा अभियान जनता के सहयोग से सफल नहीं हो सकता। उनका यह भी कहना रहा है कि पिछले वर्ष कोरोना काल में हमने जो परेशानियाँ झेली हैं, उसमें ऑक्सीजन की कमी भी एक महत्वपूर्ण पहलू रहा है। पेड़-पौधे हमें न सिर्फ नि:शुल्क प्राकृतिक ऑक्सीजन देते हैं, बल्कि दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग से भी बचाते हैं। 

भारतीय संस्कृति में पेड़-पौधों की पूजा की परंपरा सदियों पुरानी रही है। हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भी वृक्षों की महिमा का वर्णन मिलता है। वृक्षों की पूजा और प्रार्थना के नियम बनाए गए है। औषधय: शांति वनस्पतय: शांति: जैसे वैदिक मंत्रों से वृक्षों और वनस्पतियों की पूजा की जाती है।  प्राचीन आयुर्वेद विज्ञान प्रकृति की इसी देन पर आधारित है। हमारे ऋषियों द्वारा वन में रहते हुए धर्मग्रंथों की रचना करने का यही कारण है कि वहां का शांत और सुरम्य वातावरण उनके अनुकूल था, जो उनके मन को एकाग्र रखने में सहायक होता था। भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है और यूँ ही  इस संस्कृति में पेड़ पौधों को विशेष महत्व देते हुए देवों  का दर्जा दिया गया है। भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति है और इस संस्कृति में पेड़ पौधों को विशेष महत्व देते हुए  उसे देवों  का दर्जा दिया गया है। इसीलिये पेड़ पौधों की पूजा भी भारतीयों द्वारा की जाती है। पौधों को जीवन रक्षक समझा जाता है क्योंकि ये ऑक्सीजन प्रदान करते हैं व कार्बन-डाइ-ऑक्साइड को सोखते हैं ।

नर्मदा परिक्रमा यात्रा के समापन के अवसर पर सीहोर में बीते दिनों मुख्यमंत्री शिवराज ने कहा नर्मदा के डूब क्षेत्र में जहाँ यूकिलिप्टस के पेड़ लगे होंगे उन्हें हटाना होगा क्योंकि ये पानी को लगातार अवशोषित कर उसे बंजर बना देते हैं ।  मुख्यमंत्री  चौहान ने कहा  साल के पेड़ अधिक से अधिक इस क्षेत्र में लगाए जायेंगे क्योंकि ये अपनी जड़ों से पानी छोड़ते हैं जो छोटी धाराओं के रूप में नर्मदा में मिलता है जो इसकी धार को अविरल बनाता है।  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  मानते हैं कोई भी सरकार अकेले  पर्यावरण और नदियों का संरक्षण नहीं कर सकती।  इसके लिए समाज को आगे आना होगा।  नर्मदा के संरक्षण के लिए उन्होनें मैकाल पर्वत पर नए निर्माण पर रोक लगाने की बात कहते हुए एक नई  लकीर खींचने  की कोशिश की है जिसके आने वाले समय में सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे।  आज़ादी के अमृत महोत्सव के खास मौके पर शिवराज सरकार ने नर्मदा के किनारे अधिकाधिक जल सरोवर बनाने का फैसला किया है जिससे नदी के भू जल स्तर  को बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।   मुख्यमंत्री शिवराज सिंह  चौहान  की एक खूबी ये भी है वे न सिर्फ  वृक्षारोपण कर रहे  हैं, बल्कि  पेड़ -पौंधों की  देख-रेख भी करते हैं। सूबे के मुखिया का इस प्रकार प्रतिदिन पौधा रोपने का संकल्प प्रदेशवासियों के लिए पर्यावरण-सरंक्षण  की दिशा में नवाचार  का एक संदेश है । ऐसे दृश्य भारतीय राजनीति में कम से कम  दुर्लभ हैं। 

Wednesday, 27 April 2022

मध्य प्रदेश में नई ऊँचाइयों पर शिवराज का नायकत्व






हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है
जिस तरफ भी चल पड़ें रास्ता बन जाएगा

सही मायनों में अगर किसी ने मध्य प्रदेश में सुशासन  की बयार बहाई है तो बेशक वो शिवराज सिंह चौहान ही हैं ।  सूबे में सबसे ज्यादा समय तक गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बनने का तो कीर्तिमान उन्होंने बना ही लिया है और अब मुख्यमंत्री के रूप में 15 बरस पूरे कर लेने के बाद प्रदेश में शिवराज का नायकत्व उन्हें सफल मुख्यमंत्री की कतार में लाकर खड़ा कर रहा है । विषम परिस्थितियों में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले शिवराज सिंह चौहान ने जिस अंदाज में मध्य प्रदेश को बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर निकालने में सफलता पाई है वह उनके दूरदर्शी नेतृत्व की मिसाल है। पिछले कुछ समय से  शिवराज ने भाजपा की अंदरुनी उठापठक को शांत करने के साथ-साथ विकास की नई लकीर भी खींची जिसकी परिणति चुनाव दर चुनाव  भाजपा की सत्ता में वापसी के रूप में हुई । ऐसे समय में शिवराज सिंह चौहान  ने सत्ता और संगठन के साथ बेहतर तालमेल कायम कर मध्य प्रदेश में चुनाव जीतकर भाजपा की उम्मीदों को नए पंख लगा दिए हैं । प्रदेश में पिछले कुछ समय से  भाजपा का मतलब शिवराज सिंह चौहान अगर रहा है तो इसका बड़ा कारण उनका  बेहतर संगठनकर्ता होने के साथ ही जनता के सरोकारों की राजनीति करने वाला नेता होना रहा। शिवराज सिंह चौहान  की राजनीती लोगों को आपस में जोड़ने की रही है और उनकी जीत का मूल मंत्र विकास और निर्विवाद रूप से साफ़ छवि रही  है और उनके शासन में हुए विकास कार्यों का प्रभाव  मध्य प्रदेश में धरातल में दिखलाई भी देता है।  शिवराज सिंह चौहान  ने  मध्य प्रदेश के लोगों  के बीच अगर बेहतर मुख्यमंत्री की छवि बनाई है तो इसका कारण राजनीती के प्रति उनका समर्पण और जनता के सरोकारों से खुद को जोड़ने वाला नेता रहा है ।  

शिवराज चौहान का जन्म पांच मार्च, 1951  को एक किसान परिवार में हुआ।  शिवराज ने भोपाल के बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर में स्वर्ण पदक प्राप्त किया। कॉलेज जीवन से ही चौहान की दिलचस्पी राजनीति में थी। वे 1975  में मॉडल सेकेंडरी स्कूल छात्रसंघ  के नेता रहे। 1975  में आपातकाल लगा जिसके विरोध में शिवराज आगे आये और 1976-77 में भोपाल जेल में बंद भी रहे। इसके बाद 1977  में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ  से जुड़े। इसके बाद भाजपा के साथ इनका सफर चल पड़ा। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता युवा मोर्चा के विभिन्न पदों पर काम किया। चौहान पहली बार 1990  में बुधनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। 1991  से लगातार  पांच बार विदिशा लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए। सांसद रहते उन्होंने कई महत्वपूर्ण समितियों में काम भी किया। विरोधियों को चुप्पी के साथ दरकिनार करने और अनर्गल बयानबाजी से बचने वाले चौहान को 2005  में मध्यप्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था। उस समय संगठन में भारी उथल-पुथल के साथ गुटबाजी चल रही थी। उमा भारती के जाने के बाद प्रदेश में भाजपा काफी कमजोर हो गई थी। ऐसे समय में इन्हें मुख्यमंत्री बनाया  गया।  उनके सामने सूबे के  विधानसभा चुनाव में अच्छे परिणाम हासिल करने की  बड़ी चुनौती थी जिस पर शिवराज सिंह चौहान पूरी तरह खरे उतरे और भाजपा को जीत दिलाई और  तब से मध्य प्रदेश में लगातार  बेहतरीन काम भी कर रहे हैं शायद यही वजह है मध्य प्रदेश भाजपा के पास शिवराज सिंह चौहान  से बेहतर कोई विकल्प अब भी नहीं है जो 2023 में भाजपा की चुनावी  वैतरणी को पार लगा सके ।  

 शिवराज ने प्रदेश में 15  बरस मुख्यमंत्री के रूप में पूरे कर लिए हैं । मध्यप्रदेश की जनता के लिए अभिशाप ही रहा कि यहाँ पर जो भी शासन में रहा मूल समस्याओं पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और वे आपसी खींचतान में लगे रहे लेकिन शिवराज सिंह चौहान ने न केवल मामा बन महिलाओं और बेटियों के दिलों में राज किया बल्कि जन -जन तक अपनी पैठ विकास कार्यों से बनाई । आज  मध्य प्रदेश में  सशक्त , यशस्वी और जननेता  मुख्यमंत्री की छवि बनाकर  शिवराज सिंह चौहान  ने  मध्य प्रदेश की राजनीति में  अपने  कद को  नई बुलंदियों  पर  पहुंचाने का काम किया है। अपने विकास कार्यों से  शिवराज सिंह ने मामा  के रूप में  हर दिन जनता का भरपूर प्यार और दुलार भी पाया है। शिवराज सिंह चौहान ने  मध्यप्रदेश को स्थायी सरकार न केवल दी बल्कि अपनी दूरगामी योजनाओं  के आसरे लोगों के दिलों  में नई आस कायम की। शिवराजसिंह चौहान खुद किसान परिवार से रहे हैं , लिहाजा  किसानों और आम आदमी के  सरोकारों  के प्रति वह काफी संवेदनशील रहे हैं। अपने अब तक के कार्यकाल में उन्होंने आम आदमी से जुडी कई योजनाओं को न केवल धरातल पर उतारने में सफलता पाई  बल्कि अन्य राज्यों को कन्याधन और लाडली लक्ष्मी सरीखी योजना लागू करवाने के लिए मजबूर किया। यही नहीं प्रदेश में कई औद्योगिक ईकाईयों की स्थापना कर यह साबित भी कर दिखाया अगर आप एक निश्चित विजन के साथ आगे बढ़े तो राज्य को विकास के पथ पर आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।  मुख्यमंत्री  द्वारा प्रदेश में शुरू की गई  मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन, लाड़ली लक्ष्मी , मुख्यमंत्री कन्यादान, लक्ष्मी उत्सव सरीखी  अनगिनत  योजनाओं  ने शिवराज सिंह के बारे में यह धारणा पुख्ता कर दी कि वह आम आदमी के मुख्यमंत्री है। यही नहीं विभिन्न प्रदेशो की सरकारें जहाँ महिलाओं को आरक्षण देने की हवाई बयानबाजी करने से बाज नहीं आई वहीँ  शिवराजसिंह चौहान ने प्रदेश में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण  देकर अपनी कथनी और करनी को साकार किया । मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने समावेशी विकास का खाका खींचकर यह भी साबित किया कि उनकी नीतियों के केंद्र में आम आदमी है शायद यही वजह है शिवराज को आम इंसान ने खूब  दुलार दिया। आत्मनिर्भर   मध्य प्रदेश  बनाने की दिशा में सरकार ने कई कदम  इस तरफ बढ़ाये हुए हैं ।  अपने आत्मनिर्भर मधय प्रदेश के संकल्प में शिवराज सिंह चौहाँ ने बुनियादी संरचना, शिक्षा ,स्वास्थ्य  , अर्थव्यवस्था ,  सुशासन  और रोजगार  को प्राथमिकता  दी है तभी मधय प्रदेश सुशासन में मॉडल बनकर उभरा है । जनभागीदारी को मुख्यमंत्री ने अपनी पहली प्राथमिकता बताया है जिसके सार्थक परिणाम  अब सबके सामने आये हैं । आज मध्य प्रदेश देश की अर्थव्यवस्था में 4. 6 फीसदी का योगदान दे रहा है जिसमें  मुख्यमंत्री शिवराज के संकल्पों और अथक परिश्रम के योगदान को नहीं भुलाया जा सकता । स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में मुख्यमंत्री ने नई अलख जगाई है । वह हर दिन न केवल  पेड़ -पौधे  लगा रहे हैं और जन -जन को भी प्रेरित कर रहे हैं ।

 शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के  ऐसे लोकप्रिय   मुख्यमंत्री हैं  जिन्होनें  जनता के बीच लोगों की समस्याओं को न केवल  सुना है  बल्कि किसानों की समस्याओं का समाधान करने की दिशा में कोई कसर नहीं  छोड़ी है।  बीते 2  बरसों  में कोरोना की विषम परिस्थितियों  और चुनौतियों  में भी शिवराज सिंह ने धैर्य नहीं छोड़ा और लोगों के बीच जाकर हर  दुःख में सहभागी बने । पिछले कुछ  समय से  मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पूरी सरकारी मशीनरी के साथ खेती की तमाम समस्याओं का निदान खोजने में लगे हैं ,वह अभूतपूर्व है। किसानों के दर्द के प्रति संवेदना जगाने का ये प्रयास मुख्यमंत्री अपने अंदाज में कर रहे हैं। खेती को लाभ का सौदा बनाने में की दिशा में वो शिद्दत के साथ जुटे हुए हैं। किसी भी मुख्यमंत्री द्वारा किसानों के दर्द में इस प्रकार के फैसले लेना और किसानों के हिट में तमाम समस्याओं के समाधान में खुद की रूचि लेना  एक बड़ी मिसाल है। मध्यप्रदेश ने 7 बार राष्ट्रीय स्तर पर कृषि कर्मण अवार्ड लेकर कृषि के क्षेत्र में अपनी शानदार उपलब्धियां हासिल कर पूरे देश में अपना मान बढ़ाया है । यह मुख्यमंत्री शिवराज की किसानों की समस्याओं के प्रति गहरी समझ और किसानों के प्रति संवेदनशीलता का ही परिचायक है कि वे दिन –रात किसानों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने की दिशा में रहकर सारे प्रयास कर रहे हैं। कोरोना काल की विषम चुनौतियों के बीच प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह  चौहान ने किसानों के चेहरों पर  सही मायनों में  मुस्कुराहट लाने का काम किया है। किसान पुत्र मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  की कृषि को लेकर दिखाई गई विशेष दिलचस्पी के चलते आज प्रदेश का किसान जहां खुशहाल नजर आता है वहीं उसे फसलों का सही मूल्य भी मिल रहा है।

 बीते साल कोविड कोरोना लॉकडाउन के कारण प्रदेश की अर्थव्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। किसानों की फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदना बहुत बड़ी चुनौती थी। कोरोना संक्रमण उस समय चरम पर था। दिन पर दिन कोरोना के  केस बढ़ते जा रहे थे, ऐसे में कोरोना से बीच बचाव करते हुए फसलें खरीद लेने और उन्हें मंडी तक लाने की विकराल चुनौती सरकार के सामने खड़ी थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी मुख्यमंत्री ने किसानों के साथ खड़ा होकर उन्हें सरकार का समर्थन दिलवाया।एक ओर किसानों के  ट्रैक्टर , फसल कटाई, , हार्वेस्टर, कृषि उपकरणों के सुधार  आदि की  पहल सरकार द्वारा  की गई वहीं हर दिन किसानों को एस.एम.एस भिजवाकर खरीदी केंद्रों पर सोशल डिस्टेंसिंग, सेनेटाईजेशन आदि करवाकर समर्थन मूल्य पर खरीदी का कार्य शुरू किया गया। इतनी विषम परिस्थिति में भी मध्यप्रदेश ने गेहूं का ऑलटाइम रिकार्ड उपार्जन किया। मध्यप्रदेश ने पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य को भी गेहूं खरीदी में पीछे छोड़ दिया।किसान हितैषी मुख्यमंत्री के प्रयासों से प्रदेश के किसान का डंका आज पूरे देश में बज रहा है । 1 करोड़ 29 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उपार्जन कर प्रदेश का किसान आज उत्पादन के मामले में मध्य प्रदेश, हरित क्रांति के अगुवा राज्य पंजाब को पीछे छोड़ चुका है । आज मध्य प्रदेश का गेहूं विदेशों को निर्यात किया जा रहा है वहीँ सिंचाई का रकबा 43 लाख हेक्टेयर से अधिक हो गया है वहीँ बिजली का उत्पादन 5 हजार मेगावाट से बढ़कर 21 हजार मेगावाट तक पहुँच गया है ।

 पिछले साल सत्ता में आते ही उन्होंने जिस तरह ताबड़तोड़ फैसले  प्रदेश  के हित में लिए हैं उसने यह साबित किया कि वे मुश्किल समय में अपना धैर्य नहीं खोते। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  की यही पहचान अन्य नेताओं से उनको अलग करती है।  यूँ ही मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान किसान हितैषी सी एम के तौर पर पूरे देश में नहीं जाने जाते हैं। राज्य को कृषि क्षेत्र में  नित ऊंचाईयों पर ले जाने का श्रेय निश्चित ही उन्हें जाता है। पिछले दिनों देश के गृह मंत्री अमित शाह ने भी शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में प्रदेश के आगे बढ़ने की बात को स्वीकारते हुए जिस तरीके से उनके तारीफों के पुल बांधें हैं उसने शिवराज को सफल मुख्यमंत्री की श्रेणी में लाकर खड़ा किया है।  शिवराज सिंह चौहान  के दूरदर्शी नेतृत्व में  प्रदेश न केवल बीमारू राज्यों की श्रेणी  से बाहर  निकला है बल्कि घर- घर बिजली और पानी पहुंचाने का काम भी हुआ है । आदिवासियों  के हितों के संरक्षण हेतु  जो कदम शिवराज सरकार के इस कार्यकाल में उठाये गए हैं वह अप्रत्याशित हैं । देश में एकमात्र शिवराज सरकार है जो आदिवासियों को जंगल का मालिक बना रही है । पिछले दिनों जंगलों से होने वाली कमाई का 20  फीसदी हिस्सा वन समितियों के हाथ सौंपकर सरकार ने आदिवासियों का दिल जीतने का काम किया है । बीते दस बरसों में सकल घरेलू उत्पाद पर प्रदेश ने 200  फीसदी की वृद्धि दर्ज की है । यही नहीं शिवराज सरकार  ने अपनी योजनाओं के माध्यम  से युवाओं को स्वरोजगार से जोड़ने की बेहतर पहल की है जिसके तहत सरकार उद्यमी युवाओं को ऋण की सुविधा प्रदान कर रही है।   युवाओं के स्वरोजगार हेतु  सरकार  ने हाल ही में मुख्यमंत्री उद्यम क्रांति योजना शुरू की है जिसके तहत प्रदेश के 1815 युवाओं को 112 करोड़ के ऋण स्वीकृत किये गए हैं ।  पानी के संचय के लिए आज़ादी के अमृत महोत्सव के मौके पर 5534  अमृत सरोवरों के निर्माण का कार्य सरकार  द्वारा युद्ध स्तर  पर किया जा रहा है । प्रदेश 2021 -22 में 19. 7 फीसदी की विकास दर हासिल करने में सफल रहा है ।  

राज्य की प्रति व्यक्ति आय बढ़कर अब 1 लाख 24  हजार रुपये प्रतिवर्ष हो गयी है । 2020 -21 में पूंजीगत व्यय बढ़कर 31 हजार 586 करोड़ रुपये और वर्ष 2021 -22 में पूंजीगत व्यय 40 हजार 415 करोड़ रुपये तक पहुँच गया जो राज्य के इतिहास में अब तक सर्वाधिक है । 2007 से 2020 तक बीते 14 बरसों में मध्य प्रदेश का कुल निर्यात 2. 9 बिलियन डालर से बढ़कर 6. 4 बिलियन डालर हो गया है । यही नहीं प्रदेश की अर्थव्यवस्था में स्वसहायता समूहों का योगदान भी बढ़कर 20 हजार करोड़ तक जा पहुंचा है । इतना ही नहीं प्रदेश में अब तक 1900 स्टार्ट अप स्थापित किये जा चुके हैं जो नवाचार की भावना को प्रोत्साहित करने का काम कर रहे हैं । मध्य प्रदेश में कानून व्यवस्था को सर्कार ने चुस्त दुरुस्त किया है । भूमाफियाओं , चिटफंड माफियाओं , रेत  माफियाओं , मिलावट माफियाओं , राशन माफियाओं और शराब माफियाओं पर शिंकजा कसा गया है और इन सबके खिलाफ कड़ी कार्यवाही की गयी है। इस बार मामा के राज में बुलडोज़र ने सभी माफियाओं के होश फाख्ता किये हुए हैं । मध्य प्रदेश में बुलडोजर तो पहले भी चल रहे थे  लेकिन  चर्चा इस बार की पारी में हो रही है।  खुद मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह कहते हैं उन्होनें ये संकल्प लिया था कि मध्यप्रदेश की धरती पर या तो डाकू रहेंगे या शिवराज सिंह चौहान। सारे डकैत समाप्त कर दिए गए, मार दिए गए या मध्य प्रदेश के बाहर चले गए।  ऐसे लोगों को कानून तो सजा देगा ही लेकिन बुलडोजर भी चलेंगे। मध्य प्रदेश में भू माफिया, गुंडों और अवैध कब्जाधारियों के विरुद्ध एक्शन के चलते 1  जनवरी से 31  मार्च तक 1   हजार 791 मामले  दर्ज किये गए हैं और अब तक 3  हजार 814  अवैध  अतिक्रमण तोड़कर 2  हजार 244  एकड़ जमीन मुक्त कराई है जिसकी लागत 671  करोड़ रुपये है । सीहोर में सबसे अधिक 309 और ग्वालियर में 281 एकड़ जमीन मुक्त कराई है ।  प्रदेश में खनन माफिया के खिलाफ भी  कार्रवाई की जा रही है । प्रदेश सरकार ने अवैध राइट परिवहन और उत्खनन के 3 हजार 531  मामलों  में कार्यवाही  करते हुए 857 आरोपियों को गिरफ्तार किया है । प्रदेश में 1 लाख 25 हजार गहन मीटर रेट और 3490  चार पहिया वाहन जब्त किये गए हैं । इसी तरह से अवैध शराब के  खिलाफ जनवरी 2022  से मार्च 2022  तक 63665 मामले दर्ज  किये गए हैं । इस दौरान 5 ,64469 लीटर अवैध शराब भी जब्त हुई है। 5 आरोपियों के खिलाफ रासुका और 134  के खिलाफ जिला बदर की कार्रवाई  की गयी है । अपहरण और डकैती के मामलों में भी सरकार द्वारा  कोई न कोई  कठोर एक्शन लिया जा रहा है।  इसी दौरान  मिलावटखोरों पर शिंकजा कसते  हुए नकली खाद्य पदार्थ बेचते हुए कई लोगों पर  कार्यवाही भी हुई है।  इसी बरस  जनवरी से मार्च 2022 के बीच 81 केस मिलावटखोरों पर  दर्ज किये गए हैं । मिलावट के जहर से मुक्ति के लिए नकली मावा , दूध और मिलावटी खाद्य सामग्री बेचने वालों पर हर दिन ताबड़तोड़  कार्रवाई  की जा रही है ।

मध्य प्रदेश की पुलिस ने तमाम नक्सल विरोधी अभियानों में भी अनेक सफलताएं हासिल की हैं । केंद्र सरकार द्वारा चलायी जा रही तमाम योजनाओं में भी मध्य प्रदेश की सफलता का सक्सेज रेट बेहतरीन है । आवास योजना से लेकर प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना और स्वामित्त्व योजना में मध्य प्रदेश अन्य राज्यों के मुकाबले बेहतर स्थिति में है । ख़ास बात यह रही  कार्यकाल में चुनाव दर चुनाव में विजय पताका फहराने वाले शिवराजसिंह चौहान ने सत्ता में कभी अपनी ठसक हावी नहीं होने दी। हंसी ठिठोली के साथ वह सत्ता और संगठन में अपनी कदमताल करते रहे और  विनम्र बनकर जनता जनार्दन को अपनी सबसे बड़ी ताकत बताते रहे । सत्ता को सेवा का माध्यम और खुद को पार्टी का अदना सा सेवक मानने वाले शिवराज सिंह चौहान  ने  मध्य प्रदेश को भगवा रंग में रंग डाला है। अब उनकी नजरें जन- जन तक अपनी विकास यात्रा को पहुंचाने की तरफ लगी हुई हैं क्युकि लोकतंत्र में जनता से बढ़कर कुछ नहीं है ।  खुद शिव का दर्शन भी यह कहता है लोकतंत्र में हार-जीत होती रहती है। महत्वपूर्ण यह है कि हार से सबक लेकर हमें यह देखना चाहिए कि जनता में यदि कोई विपरीत भाव पैदा हुआ है तो उसे कैसे दूर किया जाए?    

 आने वाले समय में अगर एंटी इनकम्बेंसी के बीच उन्हें भाजपा का विजयरथ जारी रखना है तो अपने इस मध्य प्रदेश के  विकास मॉडल को गाँव के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाना पड़ेगा । देश का मिजाज बदल रहा है और राज्यों के चुनाव और केंद्र के चुनाव में अब विकास सबसे बड़ी प्राथमिकता है। लिहाजा शिवराज सिंह चौहान  को भी समझना होगा वह विकास का मूल मंत्र आम लोगों तक कैसे पहुंचाएं इसकी चिंता जरूर सीएम को होनी चाहिए। भाजपा का विशाल  संगठन इसमें प्रभावी भूमिका निभा सकता है  जिससे  आने वाले विधानसभा चुनावों में भी भाजपा अपना विजयरथ जारी रख सकेगी। समाज के अंतिम  छोर पर खड़े  व्यक्ति के जीवन  में विकास को प्राथमिकता में रख कर यदि उन्होंने अंतिम व्यक्ति के लिए फैसला किया तो मध्य प्रदेश में भाजपा के सामने भविष्य में कोई मुश्किल नहीं होगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आलाकमान की नज़रों में भी भाजपा शासित राज्यों के सफल मुख्यमंत्री बन गए हैं और  उनके कार्यकाल में मध्य प्रदेश में शिवराज  का परचम हर दिन  नई बुलंदियों को छू रहा है।  शिवराज सिंह चौहान  निष्कंटक होकर फिलहाल अपनी सारी उर्जा मध्य प्रदेश के विकास को नई गति देने में लगाना चाहते है इससे अच्छी बात प्रदेश के लिए कुछ नहीं हो सकती ।

Wednesday, 20 April 2022

'बुलडोजर' के सहारे माफियाओं को नेस्तनाबूद करने में जुटे शिवराज


 

मध्य प्रदेश शिवराज सिंह  चौहान के कुशल और प्रभावी नेतृत्व में प्रदेश  सुशासन के संकल्प के साथ निरंतर  नए आयाम गढ़ रहा है। कानून व्यवस्था सुदृढ़ करने के साथ ही अपनी जनकल्याण की योजनाओं के द्वारा आम आदमी के जीवन को बदलना सरकार की प्रमुख प्राथमिकता है। 


 श्योपुर में 17 मार्च को आदिवासी समुदाय की एक नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप की घटना के बाद पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार किया जिसके बाद प्रशासन ने  गैंगरेप के आरोपियों  के घरों पर बुलडोजर चला दिया। शिवराज सरकार के बुलडोजरों ने इसी तरह की सख्त कार्रवाई रायसेन जिले में भी की। रायसेन जिले  में  18 मार्च को आदिवासी और मुस्लिम समुदाय के कुछ लड़कों के बीच कहासुनी के बाद झगड़ा बढ़ गया । बात मामूली से झगड़े से शुरू हुई और खूनी संघर्ष तक जा पहुंची। आदिवासी समुदाय के लोगों पर फायरिंग और उन्हें ट्रैक्टर से कुचलने की कोशिश की गई। इस हिंसा में एक आदिवासी की मौत हो गई  और कई लोग घायल हुए ।  मुख्यमंत्री शिवराज  ने तुरंत एक्शन लेते हुए तत्काल इस घटना में शामिल  लोगों पर केस दर्ज किया और आरोपियों को गिरफ्तार  करवाया । अपराधियों, गुंडों और उपद्रवियों के मन में कानून का खौफ रहे इसलिए शिवराज सरकार ने उस समय  बुलडोजर चलवाने में भी देर नहीं की। अभी हिंसा पूरी भी नहीं हुई थी ,प्रशासन  के बुलडोजर आरोपियों के अवैध ढंग से बने घरों और दुकानों को गिराने पहुंच गए। पुलिस और प्रशासन की टीम ने  घरों और  दुकानों को बुलडोजर चलाकर मिट्टी में मिला दिया। यह तो  'बुलडोजर मामा'  के प्रदेश मध्य प्रदेश की  बानगी भर है।  

  मुख्यमंत्री शिवराज किसी भी कीमत पर  दबंग , माफिया , अपराधियों और असामाजिक  तत्वों का मनोबल तोडना चाहते हैं जिससे आम आदमी का हौंसला इस प्रदेश में  बढ़े और वह सरकार के साथ कदमताल कर सके ।  इन्हीं  बढ़ते कदमों के मद्देनजर  मध्य प्रदेश में  ' मामा का बुलडोजर ' जोर- शोर के साथ  चलने लगा है। मध्य प्रदेश के मख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब से ये  ऐलान किया है कि अब अपराधियों के घर पर लड़कियों  के साथ ज्यादती करने वालों के मकानों को मिट्टी में मिला दिया जाएगा तब से माफियाओं और अपराधियों के होश  फाख्ता  हो  गए हैं ।  

सीएम  शिवराज द्वारा प्रदेश के कोने -कोने में की जा रही इस तरह के कठोर एक्शन से  अपनी सरल और सौम्य  छवि से इतर एक सख्त  मुख्यमंत्री  की छवि गढ़ने में सफलता हासिल की है ।  इस बार मध्यप्रदेश में अपने नए अवतार में  'बुलडोजर मामा'  के रूप में पूरे देश में शिवराज की नई  एंट्री हुई है । दरअसल   'बुलडोजर मामा'   ने हाल में  अपराधियों के मकानों पर बुलडोजर चलाकर  ध्वस्त करने की कार्रवाई पूरे प्रदेश में शुरू की है । बीते कुछ महीनों में मुख्यमंत्री द्वारा जहाँ कई  अपराधियों के घर को  जमीदोंज किया गया वहीँ  बुलडोजर की ताबड़तोड़ कार्रवाई के बाद  से  दबंग माफिया और अपराधियों के हौंसले पस्त पड़े  हुए हैं ।  हालांकि अपराधियों पर बुलडोजर की कार्रवाई शिवराज के दौर में पहले भी हो रही थी, लेकिन इस बार  जीरो टालरेंस नीति पर चलते हुए मध्य प्रदेश के हर कोने में  जगह-जगह बुलडोजर चल रहे हैं।

 मध्य प्रदेश में बुलडोजर तो पहले भी चल रहे थे  लेकिन  चर्चा इस बार की पारी में हो रही है।  खुद मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह  कहते हैं उन्होनें ये संकल्प लिया था कि मध्यप्रदेश की धरती पर या तो डाकू रहेंगे या शिवराज सिंह चौहान। सारे डकैत समाप्त कर दिए गए, मार दिए गए या मध्य प्रदेश के बाहर चले गए। बेटियों, बहनों की तरफ गलत नजर से देखने वालों के लिए सामान्य सजा काफी नहीं है। ऐसे लोगों के को कानून तो सजा देगा ही लेकिन बुलडोजर भी चलेंगे। 

मध्य प्रदेश में भू माफिया, गुंडों और अवैध कब्जाधारियों के विरुद्ध एक्शन के चलते 1  जनवरी से 31  मार्च तक 1   हजार 791 मामले  दर्ज किये गए हैं और अब तक 3  हजार 814  अवैध  अतिक्रमण तोड़कर 2  हजार 244  एकड़ जमीन मुक्त कराई है जिसकी लागत 671  करोड़ रुपये है । सीहोर में सबसे अधिक 309 और ग्वालियर में 281 एकड़ जमीन मुक्त कराई है ।  प्रदेश में खनन माफिया के खिलाफ भी  कार्रवाई की जा रही है  । प्रदेश सरकार ने अवैध राइट परिवहन और उत्खनन के 3 हजार 531  मामलों  में कारवाही करते हुए 857 आरोपियों को गिरफ्तार किया है । प्रदेश में 1 लाख 25 हजार गहन मीटर रेट और 3490  चार पहिया वाहन जब्त किये गए हैं । इसी तरह से अवैध शराब के  खिलाफ जनवरी 2022 से मार्च 2022  तक 63665 मामले दर्ज  किये गए हैं । इस दौरान 5 ,64469 लीटर अवैध शराब भी जब्त हुई है।5 आरोपियों के खिलाफ रासुका और 134  के खिलाफ जिला बदर की कार्रवाई  की गयी है । अपहरण और डकैती के मामलों में भी सरकार द्वारा  कोई न कोई  कठोर एक्शन लिया जा रहा है।  इसी दौरान  मिलावटखोरों पर शिंकजा कसते  हुए नकली खाद्य पदार्थ बेचते हुए कई लोगों पर  कार्रवाई भी हुई है।  इसी बरस  जनवरी से मार्च 2022 के बीच 81 केस मिलावटखोरों पर  दर्ज किये गए हैं । मिलावट के जहर से मुक्ति के लिए नकली मावा , दूध और मिलावटी खाद्य सामग्री बेचने वालों पर हर दिन ताबड़तोड़  कार्रवाई  की जा रही है । 

 जनता की मेहनत  का पैसा डकारने वाली तमाम चिटफंड कंपनियों पर कार्रवाई  करते हुए जनवरी से मार्च 2022 तक 11  हजार 547  निवेशकों को सरकार द्वारा 33  करोड़ 73  लाख रुपये वापस दिलाये गए हैं । प्रदेश में विभिन्न प्रकार के माफियाओं को चिन्हित करते हुए अब तक  उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई  की  गई है। जमीनी स्तर  पर अपराधियों और माफियाओं के खिलाफ हो रही  मुख्यमंत्री  की कार्रवाई  का  सख्त सन्देश जनता के बीच जा  रहा है ।मुख्यमंत्री  द्वारा  तय  की गयी रणनीति  का असर भी अब  धरातल पर दिखने लगा है।  अपने पिछले कार्यकालों में भी  सीएम शिवराज ने कानून व्यवस्था को लेकर अपनी प्रतिबद्धता को जताते हुए कहा था  अपराधियों और माफियाओं के लिए इस प्रदेश में कोई जगह नहीं है  जिसके खिलाफ उन्होनें समय समय पर कठोर एक्शन लिए हैं । 

 कानून व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए सख्त कार्रवाई की जा रही है ताकि कानून का खौफ हर किसी में रहे । इस बार की पारी में शिवराज एक्शन माड में हैं।  वो लगातार भू माफियाओं पर कार्रवाई  कर रहे हैं । यही नहीं अब तक भूमाफियाओं से 18  हजार करोड़  से भी अधिक की जमीनें अवैध कब्जे से छुड़ाई  जा चुकी हैं।  मुख्यमंत्री शिवराज का कहना है मध्य प्रदेश में जितने भी गुंडे और अपराधी हैं , वे सुन लें कि  अगर किसी गरीब और कमजोर की तरफ हाथ उठाया तो वो मकान खोदकर मैदान बना लेंगे ।  रेट माफिया , भू माफिया या संगीन अपराध करने वाला हो किसी को भी  छोड़ना नहीं है। 'बुलडोजर मामा की छवि जनता  के बीच उनकी लोकप्रियता में दिन दूना रात चौगुना इजाफा कर रही है ।

Sunday, 13 March 2022

उत्तराखंड में खिला कमल , पुष्कर सिंह धामी ही होंगे नए सीएम


                                     हार के बाद भी पुष्कर सिंह धामी  भाजपा के लिए जरूरी 

                                      2022 का उत्तराखंड विधानसभा भाजपा के लिए शुभ साबित हुआ है । पहाड़ से लेकर मैदान तक चले मोदी मैजिक ने यहाँ उसकी फिर से एक बार सरकार बना दी है ।  राज्य गठन के बाद से ही इस राज्य में हर पांच साल में सत्ता बदलती रही है लेकिन इस बार ये परंपरा टूट गई है । सूबे के विधान सभा चुनावों में स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों का असर साफ़ दिखाई दिया ।पहाड़ में मोदी की प्रचंड आंधी जहाँ चली है वहीँ मैदानी इलाकों में महंगाई और किसान आन्दोलन जैसे मुद्दों ने अपना आंशिक  असर दिखाया है । प्रदेश में एक बार फिर भाजपा अपनी वापसी कर रही है लेकिन भाजपा के जहाज के असली सेनापति पुष्कर सिंह धामी चुनाव हार गए हैं ।  धामी को कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष भुवन कापड़ी के हाथों पराजय का मुंह देखना पड़ा है ।

 

सिटिंग सी एम के कुर्सी बचाने का मिथक नहीं टूटा

मुख्यमंत्री पुष्कर धामी सिटिंग सी एम के कुर्सी बचाने के मिथक को नहीं तोड़ पाए ।  पहले बी सी खंडूडी फिर हरीश रावत और अब पुष्कर सिंह धामी मुख्यमंत्री की कुर्सी में रहते हुए चुनाव हार गए । पुष्कर ऐसे तीसरे मुख्यमंत्री हैं जो कुर्सी में रहते हुए चुनाव हारे हैं । इससे पहले भाजपा ने 2012 में खंडूडी हैं जरूरी के नारों के साथ चुनाव लड़ा। उन्होनें भी भाजपा को जीत के करीब पहुँचाया लेकिन खुद कोटद्वार सीट बचाने में कामयाब नहीं हो पाए । इसी तरह 2017 में हरीश रावत की अगुवाई में कांग्रेस ने अपना चुनाव लड़ा और वह दो सीट से चुनाव लड़े लेकिन दोनों सीटों से उनको पराजय का सामना करने पर मजबूर होना पड़ा ।  अब इस बार  भी भाजपा ने पुष्कर सिंह धामी के नाम के साथ चुनाव लड़ा और कम समय में उनके द्वारा किये गए कामों को अपना आधार बनाया जिसमें वह पूरी तरह से सफल भी हुई  लेकिन उसके सिटिंग सीएम को खटीमा से हार का मुंह देखना पड़ा । 2017 के चुनावों में भाजपा प्रचंड बहुमत से चुनाव जीतकर आई थी ।  तब त्रिवेन्द्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया गया था लेकिन अपने कार्यकाल से पहले ही उन्हें पार्टी ने चलता किया जिसके बाद 10 मार्च 2021 को पौड़ी गढ़वाल से सांसद तीरथ सिंह रावत को राज्य की बागडोर सौंपी गई थी लेकिन वे भी तीन महीनों तक इस पद पर बने रहे ।  इसके बाद 3 जुलाई को पुष्कर सिंह धामी की ताजपोशी की गई थी । 

 

कई मिथक टूटे तो कुछ मिथक बरकरार

इस बार के चुनाव ने कई दिग्गजों को आईना दिखाने का काम किया वहीँ अब तक के कई मिथकों को तोड़ने का काम किया है । सरकार फिर से रिपीट न होने का मिथक जहाँ टूटा है वहीँ बदरीनाथ , गंगोत्री , कोटद्वार , रानीखेत के मिथक भी टूटे हैं । देखा गया है इन जगहों से जिस पार्टी का विधायक निर्वाचित होता है, उत्तराखंड में  उसी की सरकार बनती है । इसी तरह राज्य गठन के बाद ये देखा गया है शिक्षा मंत्री और पेयजल मंत्री दुबारा चुनाव नहीं जीत पाते हैं लेकिन अरविन्द पाण्डे और  बिशन सिंह चुफाल की जीत ने इस मिथक को भी तोड़ डाला है। हरक सिंह रावत को राज्य में सबसे बड़ा मौसम विज्ञानी कहा जाता है । इस बार तो उन्होनें ऐलान भी कर दिया था भाजपा उत्तराखंड से जा रही है । वो हवा का रुख भांप लिया करते हैं ऐसा गाहे –बगाहे कहा जाता रहा है लेकिन इस बार भाजपा से निष्कासित होने के बाद उन्होनें कांग्रेस की शरण ली लेकिन अपनी बहू अनुकृति को कांग्रेस के टिकट पर  जिताने में कामयाब नहीं हो सके ।

 

हरीश रावत के लिए जोर का झटका

पूर्व सी एम हरीश रावत के लिए भी इस बार का चुनाव बड़ा झटका है । उनको कांग्रेस ने अपनी कैम्पेन कमेटी का चेयरमैन बनाया था । वह अपनी सीट लालकुआँ को बचाने में कामयाब नहीं हो सके ।  2017 के चुनावों में भी रावत को हरिद्वार ग्रामीण और किच्छा से हार का सामना करना पड़ा था ।

इस बार भी कांग्रेस पार्टी के सीएम पद के चेहरे के रूप में  उन्हें देखा जा रहा था ।  पहले कांग्रेस ने उन्हें रामनगर से प्रत्याशी बनाया था । बाद में उनकी सीट बदल दी और उन्हें लालकुंआ से प्रत्याशी बनाया गया था लेकिन यहाँ भी उनको हार का मुंह देखा पड़ा । इससे पहले हरदा लोक सभा चुनावों में भी अपनी सीट नहीं बचा पाए थे । कांग्रेस के टिकट पर वह नैनीताल से लोकसभा चुनाव भी  लड़े जहाँ अजय भट्ट ने उनको पराजित किया । 

ऋतु खंडूडी ने लिया जनरल की हार का बदला

ऋतु यमकेश्वर विधान सभा सीट से 2017 में विधायक निर्वाचित हुई । वो पूर्व मुख्यमंत्री जनरल बी सी खंडूडी की बेटी हैं । भाजपा ने पहले तो उनको यमकेश्वर से टिकट नहीं दिया लेकिन अंतिम समय में कोटद्वार से अपना प्रत्याशी बनाया जहाँ उनके सामने बड़ी चुनौती थी । 2012 में उनके पिता को कांग्रेस के सुरेन्द्र नेगी के हाथों पराजित होना पड़ा था । ऐसे में इस बार उनके लिए यह चुनाव ख़ास रहा जहाँ उन्होंने अपनी पिता की हार का बदला लिया ।

 

अनुपमा रावत ने भी हरिद्वार हार का लिया बदला

पूर्व सीएम हरदा लालकुँआ से खुद तो चुनाव हार गए लेकिन हरिद्वार ग्रामीण सीट से उनकी बेटी अनुपमा रावत  ने चुनाव जीतकर उनके पिता की हार का बदला ले लिया । 2017 में भाजपा ने यतीश्वरानंद ने उनके पिता हरीश रावत को इस सीट से पराजित किया था । यतीश्वरानंद पुष्कर धामी की सरकार में कैबिनेट  मंत्री रहे लेकिन इस बार अपनी सीट बचाने में कामयाब नहीं हो सके।

पुष्कर धामी ही फिर से संभालेंगे उत्तराखंड की कमान

उत्तराखंड में भाजपा तो जीत गई लेकिन सीएम पुष्कर धामी चुनाव हार गए जिसके बाद से नए सीएम को लेकर चर्चाएं और दावेदारों की रस्साकसी शुरू हो गई है । फिलहाल भाजपा में जैसे संकेत दिल्ली से मिल रहे हैं उसके मुताबिक पीएम मोदी और अमित शाह इस पद पर अपने भरोसेमंद नेता को कमान देने के इच्छुक बताये जा रहे हैं । अपनी चुनावी रैलियों में भी इन सभी नेताओं ने पुष्कर के ही भाजपा के अगले मुख्यमंत्री होने का ऐलान किया था। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है भाजपा फिर से धामी पर दांव लगा रही है ।   भाजपा में पुष्कर सिंह धामी की हार के बाद जिस तरह एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति उत्पन्न हुई है और दावेदारों की सक्रियता तेज हुई है, उसके मद्देनजर आलाकमान पुष्कर सिंह धामी को दुबारा कमान देने का मूड लगभग बना चुका है । वह यहाँ पूर्व में घटित हुए घटनाक्रमों से सबक लेते हुए इस बार इस राज्य को प्रयोगशाला बनाने से बचना चाह रहा है । राज्य के प्रभारी प्रहलाद जोशी भी चुनावों में मिली शानदार जीत के लिए पुष्कर धामी  की पीठ थपथपा चुके हैं । उन्होंने इस जीत के लिए युवा  धामी की मेहनत और 6 माह में उनके कार्यकाल के दौरान जनता के हित में लिए कई फैसलों को जिम्मेदार बताया है जिसकी सार्वजनिक मंच से सराहना भी की है । इन संकेतों को डिकोड करें तो लगता है भाजपा आलाकमान चाहकर भी पुष्कर धामी को नजरअंदाज नहीं कर सकता क्योंकि त्रिवेन्द्र सिंह रावत के दौर में गर्त में जाती भाजपा को उन्होनें अपने साहसिक फैसलों और नीतियों से नया जीवन देने का काम किया है। भाजपा को ख़राब दौर से उबारने में पुष्कर धामी की मेहनत और व्यक्तित्व की बड़ी भूमिका रही है । उन्होनें सभी विधानसभा सीटों पर भाजपा के प्रत्याशियों के लिए पसीना बहाया और दिन रात एक किया जिसकी बदौलत ही भाजपा आज यहाँ तक पहुँच पायी है । ऐसा देखा गया है भाजपा में पार्टी के भीतर पुराने दिग्गज नेताओं का एक ऐसा गठबंधन बना हुआ है जो पुष्कर की लोकप्रियता से बहुत चिंतित है क्योंकि कम समय में पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह , राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा  के साथ ही राज्य के प्रभारी प्रहलाद जोशी का दिल जीतकर पुष्कर सिंह धामी ने उनके सियासी भविष्य और मुख्यमंत्री बनने के सपनों पर ग्रहण लगाने का काम किया है जिसके चलते पुष्कर उनके लिए बड़ा सरदर्द बन चुके है इसलिए राज्य भाजपा के कुछ दिग्गज नेता उन्हें निबटाना चाह रहे थे । इन नतीजों के आने के बाद शायद भीतरघातियों और बड़े नेताओं पर पार्टी शायद कुछ न कुछ बड़ा एक्शन जरूर लेगी। 

इधर चम्पावत से भाजपा विधायक कैलाश गहतोड़ी ने अपनी सीट धामी के लिए छोड़ने का ऐलान सार्वजनिक रूप से कर इस सम्भावना को जिन्दा रखा है जीत का असली सेनापति धामी हैं । विधायक गहतोड़ी ने कहा है मुख्यमंत्री धामी दुर्भाग्य से चुनाव हारे हैं लेकिन भाजपा को बहुमत में लाने में उनकी बड़ी भूमिका है। धामी को 6 महीने का छोटा सा कार्यकाल मिला लेकिन उनकी नीतियों ने आज भाजपा को विजयश्री दिलवाई है ।

 जिस सेनापति के कारण भाजपा आज यहाँ तक पहुंची है और उस सेनापति ने भाजपा का किला बचाने में सफलता पाई है उसे शायद पार्टी एक मौका और देकर पार्टी में मुख्यमंत्री पद के अन्य सभी सक्रिय दावेदारों की दावेदारी एक झटके में खत्म कर दे ऐसी संभावनाएं अभी भी जिन्दा हैं । वैसे भी राजनीती संभावनाओं का खेल है । वैसे भी भाजपा के पास बहुमत से कई अधिक सीटें इस समय हैं,  साथ ही उसकी नजर निर्दलियों पर भी टिकी हैं । भाजपा किसी निर्दलीय विधायक को पार्टी में शामिल करवाकर वहां से धामी को उपचुनाव भी लड़ा सकती है । ऐसी सूरत में  6 माह के अन्दर पुष्कर सिंह धामी को चुनाव जीतना पड़ेगा जो बहुत मुश्किल आज की सूरत में नहीं है । बड़े पैमाने पर भाजपा में विधायकों का एक तबका इस समय युवा पुष्कर धामी के साथ चट्टान की तरह खड़ा है । अगर केंद्र से भेजे गए आब्जर्वरों के रायशुमारी की नौबत भी आती है तो वे सभी पुष्कर सिंह  धामी के साथ खड़े होंगे ऐसे संकेत मिल रहे हैं । पुष्कर का काम आज बोल रहा है । असल समस्या भाजपा के दिग्गज नेताओं की तरफ से आ रही है जो किसी भी कीमत पर पुष्कर सिंह धामी की राह फिर एक बार फिर से रोकने का काम कर सकते हैं ।

भीतरघातियों का कुछ होगा

इस चुनाव में मतदान सम्पन्न होने के बाद से भाजपा और कांग्रेस में भीतरघात की बातें जोर शोर के साथ उठी हैं । पुष्कर सिंह धामी की खटीमा सीट पर भी ये आशंका है यहाँ उन्हीं की पार्टी के कई बड़े दिग्गज नेताओं ने ऐसा जाल बुना जिससे वो खटीमा में पराजित हो जाएँ । हरिद्वार ग्रामीण में भी उनके करीबी यतीश्वरानंद को हार का सामना करना पड़ा । इसी तरह उनके करीबी किच्छा से राजेश शुक्ला , संजय गुप्ता भी इस चुनाव में हार गए जिसके बाद से यह देखा जा रहा है भाजपा में कुछ नेताओं के निशाने पर पुष्कर धामी और उनके करीबी थे । ये नेता किसी भी कीमत पर उन्हें और उनके करीबियों को जीतता हुआ नहीं देखना चाहते थे । ये तो कुछ सीटों की बात है । ऐसा खेला राज्य की कई विधान सभा सीटों पर जमकर हुआ है । यही हाल कांग्रेस का भी है । रानीखेत , जागेश्वर , लालकुआँ, नैनीताल  सरीखी कई सीटों पर कांग्रेस की कहानी भी इससे जुदा नहीं है । ऐसी कई सीटें पहाड़ से लेकर मैदान तक हैं जहाँ  दोनों पार्टियाँ पार्टी हारी नहीं बल्कि यहाँ हरवाने के लिए भीतरघाती सक्रिय रहे । इन सबके चलते यह भी देखना होगा क्या चुनाव निपटने के बाद दोनों पार्टियाँ आत्ममंथन करते हुए भीतरघातियों पर कोई एक्शन लेंगी ?

पहाड़ में चला मोदी मैजिक

कुमाऊँ की 29 में से 18 सीटें अपने नाम कर भाजपा ने फिर एक बार साबित किया यहाँ के वोटरों पर आज भी मोदी का जादू चलता है । कांग्रेस को पिछली बार कुमाऊँ में केवल 4 सीट ही मिल पाई थी इस बार उसकी 6 सीटें बढ़कर 10 हुई हैं । पिथौरागढ की 4 सीटों में से 2 भाजपा और 2 कांग्रेस के नाम रही । अल्मोड़ा में 3 भाजपा तो 1 कांग्रेस के पास गई ।  बागेश्वर में दो सीटें भाजपा के पास वहीँ चम्पावत में 1 सीट भाजपा तो एक कांग्रेस ने अपने नाम की ।  नैनीताल में भी भाजपा का बेहतर प्रदर्शन रहा ।  उधमसिंह नगर में भाजपा की संभावनाओं पर ग्रहण लगाने का काम किसान आन्दोलन ने किया ।  जसपुर , बाजपुर , किच्छा, नानकमत्ता कांग्रेस के खाते में गई । 

 मनहूस बंगले का हर सी एम को अभिशाप

उत्तराखंड का जो भी मुख्यमंत्री  न्यू कैंट रोड स्थित 10 एकड़ में फैले  इस आवास में अपना आशियाना बनाता है वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया।  नारायण दत्त तिवारी के दौर में गढ़ी कैंट में पहाड़ी शैली के आलीशान भव्य बंगले का निर्माण किया गया । इसमें एक बैडमिन्टन कोर्ट , स्विमिंग पूल , कई लान , सीएम और उनके स्टाफ के लिए कार्यालय और कई लान मौजूद हैं।

2007 में कांग्रेस के हाथ से सत्ता निकली तो बी सी खंडूडी ने भी इस बंगले को अपना आशियाना बनाया लेकिन ढाई बरस में ही सी एम की कुर्सी गंवानी पड़ी । इसके बाद निशंक ने भी इसी बंगले से अपनी बिसात बिछाई वह भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए । 2012 में कांग्रेस सत्ता में आई तो विजय बहुगुणा को भी यह बंगला भाया लेकिन इस बंगले ने उन्हें भी पूर्व सी ऍम बनाने में देरी नहीं की । तंत्र , मंत्र में भरोसा रखने वाले हरदा तो डर के मारे इस बंगले में नहीं घुसे और बीजापुर गेस्ट हाउस से ही अपना कामकाज चलाया फिर भी उनकी कुर्सी सलामत नहीं रही और वह भी दो सीटों से पराजित हुए । 2017 में काफी ना- नुकुर के बाद त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी  इस बंगले में गए । वहां जाने से पहले उन्होनें हवन के कार्य किये और गाय की पूजा तक की । साढ़े 4 साल तक तो सब ठीक- ठाक रहा लेकिन ये बंगला उनकी कुर्सी भी बीच कार्यकाल में खा गया । उसके बाद गढ़वाल सांसद तीरथ सिंह रावत को सूबे की कमान भाजपा ने सौंपी । उनको भी इस बंगले का का भय था लिहाजा उन्होनें भी बीजापुर गेस्ट हाउस से ही अपनी सरकार चलाना ठीक समझा । फिर एकाएक रामनगर में पार्टी के अधिवेशन के चलते समय उनको दिल्ली तलब कर लिया गया और दिल्ली से वापसी के बाद उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी भी चली गई । 6 माह पूर्व पुष्कर धामी को जब मुख्यमंत्री बनाया गया तो उन्होंने खुद को आशावादी और सकारात्मक बताया और इस बंगले के वास्तु दोषों तक को कई दिनों तक दूर किया । इसके साथ ही हवन और पूजा -पाठ भी करवाई । लग रहा था इसके बाद इस बंगले का अभिशाप अब मानो खत्म हो गया है लेकिन मुख्यमंत्री  पुष्कर सिंह धामी को  भी  राजनीती की पिच पर इस बंगले ने क्लीन बोल्ड कर दिया है।

 

 

 

 

 

 

 

Friday, 11 February 2022

राष्ट्रीय ध्वज के जनक पिंगली वैंकैया


 

अंग्रेजों की गुलामी से आज़ाद होने के लिए असंख्य लोगों ने अपना बलिदान दिया । उनमें से अनेक लोगों को आज हम विस्मृत कर चुके हैं । देश की आन , बान और शान तिरंगा किस तरह वजूद में आया ये भी आज शायद गिने  चुने लोगों को याद होगा ।


 तिरंगे झंडे का जब भी जिक्र आएगा तो पिंगली वैंकैया के नाम का नाम स्मरण किए बिना शायद वो अधूरा रहे । भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की एक बैठक 1921 में विजयवाड़ा में हुई तो उसमें महात्मा गांधी जी ने पिंगली वैंकैया द्वारा तैयार किए गए राष्ट्रीय ध्वज के चित्रों की जानकारी दी । इसी बैठक में पिंगली द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय ध्वज की डिजाइन को महात्मा गांधी ने मान्यता दी ।

 राष्ट्रीय ध्वज की डिजाइन तैयार करने वाले पिंगली का जन्म आंध्र प्रदेश के कृष्णा जिले की दीवी तहसील के भताला पेनमरु गाँव में 2 अगस्त 1878 को हुआ था । प्रारम्भिक शिक्षा भटाला पेनमरु एवं मछलीपट्टनम से प्राप्त करने के बाद 19 वर्ष की उम्र में वो मुंबई चले गए । वहाँ जाकर उन्होनें सेना में नौकरी कर ली जहां से उनको दक्षिण अफ्रीका भेज दिया गया । 1899 से 1902 के बीच उन्होनें अफ्रीका के बायर युद्ध में भाग दिया वहीं पर उनकी मुलाक़ात महात्मा गांधी जी से हुई और वे उनके विचारों से बहुत अधिक प्रभावित हुए । स्वदेश वापस लौटने पर मुंबई में गार्ड की नौकरी में लग गए । इसी बीच मद्रास में प्लेग के चलते कई लोगों की मौत हो गई इससे उनका मन बहुत अधिक व्यथित हुआ और उन्होनें वह नौकरी छोड़ दी । वहाँ से मद्रास में प्लेग रोग उन्मूलन में इंस्पेक्टर के पद पर तैनात हो गए । पिंगली की संस्कृत, उर्दू और हिन्दी भाषा में अच्छी पकड़ थी । इसके साथ ही वो भू विज्ञान और कृषि के भी अच्छे जानकार थे। बात 1904 की है जब जापान ने रूस को हरा दिया । इस समाकर को सुनकर वो इतना प्रभावित हो गए कि उन्होनें जापानी भाषा सीख ली ।

उधर महात्मा गांधी का खेड़ा सत्याग्रह चल रहा था । इस आंदोलन ने पिंगली का मन बदल दिया । उसी दौरान उन्होनें अमरीका से कंबोडिया नामक कपास के बीज का आयात किया और इस बीज को भारत के कपास के बीज के साथ अंकुरित कर भारतीय संकरित कपास का बीज तैयार किया जिसे (उनके इस शोध कार्य के लिए ) बाद में वैंकैया कपास के नाम से भी जाना जाने लगा । उधर ब्रिटिश सरकार ने पिंगली वैंकैया को रायल एग्रीकल्चर  सोसायटी आफ लंदन के सदस्य के रूप में मनोनीत कर उनका गौरव बढ़ाया ।

1906 में भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस का अधिवेशन कलकत्ता में हुआ जिसकी अध्यक्षता दादा भाई नौराजी ने की थी । इस सम्मेलन में दादाजी ने पिंगली के कार्यों की सराहना की । बाद में उन्हें राष्ट्रीय काँग्रेस का सदस्य मनोनीत कर दिया गया । काँग्रेस के इस अधिवेशन में यूनियन जैक फहराया गया जिसे देखकर पिंगली वैंकैया का मन द्रवित हो उठा । उसी दिन से वे भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की संरचना में लग गए । 1916 में उन्होनें ए नेशनल फ्लैग आफ़ इंडिया नामक पुस्तक प्रकाशित की जिसमें उन्होनें राष्ट्रीय ध्वज के 30 नमूने प्रकाशित किए थे । पाँच साल बाद भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की बैठक 1921 में विजयवाड़ा में हुई तो उसमें गांधी जी ने सभी को पिंगली के द्वारा तैयार राष्ट्रीय ध्वज के चित्रों की जानकारी दी । इसी बैठक में गांधी जी ने पिंगली के द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय ध्वज को मान्यता दी । इस संदर्भ में महात्मा गांधी के ‘यंग इंडिया ’ में अपने संपादकीय में ‘अवर नेशनल फ़्लैग ’ शीर्षक से लिखा राष्ट्रीय ध्वज के लिए हमें बलिदान देने को तैयार रहना चाहिए । मछलीपट्टनम के आंध्र कालेज के पिंगली ने देश के झंडे के संदर्भ में एक पुस्तक भी प्रकाशित की जिसमें उन्होनें राष्ट्रीय ध्वज से संबन्धित अनेक चित्र प्रकाशित किए ।

गांधी जी ने अपने संपादकीय में आगे लिखा ‘जब मैं विजयवाड़ा के दौरे में था उस दौरान पिंगली ने मुझे हरे और लाल रंगों से बने  बिना चरखे वाले कई चित्र बनाकर दिये थे । हर झंडे की रूप रेखा पर उन्हें कम से कम 3 घंटे तो लगे ही थे । मैंने उन्हें एक झंडे के बीच में सफ़ेद रंग कि पट्टी डालने कि सलाह दी जिसका उद्देश्य था कि सफ़ेद रंग सत्य व अहिंसा का होता है । उन्होनें इसे तुरंत मान लिया’ । इसी के बाद पिंगली द्वारा तैयार किए गए झंडे का नाम झण्डा वैंकैया लोगों के बीच  लोकप्रिय हो गया । 4 जुलाई 1963 को पिंगली का निधन हो गया । भारतीय डाक विभाग ने 12 अगस्त 2009 को पूरे 46 बरस बीतने के बाद पिंगली पर 5 रू का डाक टिकट जारी किया ।
 

Sunday, 6 February 2022

अलविदा 'स्वर कोकिला '


 


स्वर कोकिला  लता मंगेशकर आज सुबह हमसे  दूर चले गई। मुंबई के अस्पताल में सुबह उन्होनें अपनी अंतिम सांस ली ।  उनकी मखमली और जादुई आवाज की दुनिया दीवानी थी । उनकी आवाज़ दिल को छूती नहीं, बल्कि दिल में बस जाती थी, हर दिल अजीज लता मंगेशकर ने अपनी आवाज से हिंदी सिनेमा की गायकी में ऐसे चार चाँद लगाए कि हर कोई उनका मुरीद हुए बिना नहीं रह पाया । सही मायनों में  हिंदी सिनेमा की गायकी की दुनिया को लता ने अपने मधुर स्वर से नई दिशा देने का काम किया  । लता दीदी की वो आवाज हर किसी के  दिल के तारों को आज भी  झंकृत कर देती है । हिंदी सिनेमा के 100 बरस से अधिक के सफ़र में लता दीदी की गायकी सिल्वर स्क्रीन पर चार चाँद लगा देती है ।  ऐसी  आवाज हिन्दी फ़िल्म संगीत में हमेशा के लिए अमर रहेगी । 

लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में पंडित दीनानाथ मंगेशकर के मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। लता पांच भाई बहनों में सबसे बड़ी थी ।  लता मंगेशकर का जन्म के वक्त नाम 'हेमा' रखा गया था  लेकिन कुछ साल बाद अपने थिएटर के एक पात्र 'लतिका' के नाम पर, दीनानाथ जी ने उनका नाम 'लता' रखा ।

लता मंगेशकर के पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर एक क्लासिकल सिंगर और थिएटर आर्टिस्ट थे । लता की तीन बहनें मीना, आशा, उषा और एक भाई हृदयनाथ मंगेशकर थे । पांच साल की उम्र में ही लता जी ने अपने पिता से संगीत की शिक्षा लेनी शुरू कर दी थी और थिएटर में एक्टिंग किया करती थी । जब वो स्कूल गयी तो वहां के बच्चों को संगीत सिखाने लगी लेकिन जब लता जी को अपनी बहन 'आशा' को स्कूल लाने से मना किया गया तो उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया ।
 
सुरों की मल्लिका लता मंगेशकर का भी बॉलीवुड में सफर इतना आसान नहीं था ।  काफी समय तक उन्हें कोई प्रोजेक्ट नहीं मिला । प्रोजेक्ट नहीं मिलने की दो वजहें थीं।  एक तो साल 1940 के दौर में जब उन्होंने फिल्मी दुनिया में एंट्री ली बॉलीवुड में नूर जहां और शमशाद का दबादबा था और दूसरा लता की आवाज़ की पिच काफी हाई थी और आवाज़ पतली, ऐसे में उस दौर के चलन में चल रहे गानों के मुताबिक आवाज भी फिट नहीं बैठती थी।  
 
प्रोड्यूसर सशधर मुखर्जी ने लता मंगेशकर की आवाज को 'पतली आवाज' कहकर अपनी फिल्म 'शहीद' में गाने से मना कर दिया था ।  फिर म्यूजिक डायरेक्टर गुलाम हैदर ने लता मंगेशकर को फिल्म 'मजबूर' में 'दिल मेरा तोडा, कहीं का ना छोड़ा' गीत गाने को कहा जो काफी सराहा गया । लता मंगेशकर के पिता नहीं चाहते थे कि वो फ़िल्मों के लिये गाने गाये लेकिन लता मंगेशकर बचपन से ही गायक बनना चाहती थीं।  लता ने वसंग जोगलेकर द्वारा निर्देशित एक फ़िल्म कीर्ती हसाल के लिये पहली बार गाना गाया था लेकिन उनके पिता नहीं चाहते थे कि लता फ़िल्मों के लिये गाये इसलिये इस गाने को फ़िल्म से निकाल दिया गया लेकिन वसंत जोगलेकर लता की प्रतिभा से काफी प्रभावित हुये। साल 1942 में उनके पिता इस दुनिया को छोड़ गए और लता मंगेशकर के कंधों पर परिवार को संभालने की सारी ज़िम्मेदारी आ गई ।
 
पिता की मौत के बाद लता को पैसों की बहुत किल्लत झेलनी पड़ी और काफी संघर्ष करना पड़ा ।  इसी वज़ह से लता मंगेशकर ने 1942 से लेकर 1948 तक करीब 8 हिंदी और मराठी फिल्मों में काम किया । 40 के दशक में लता मंगेशकर जब फिल्मों में गाना शुरू किया तो वो लोकल पकड़कर अपने घर मलाड जाती थी। वहां से उतरकर पैदल स्टूडियो बॉम्बे टॉकीज जाती। रास्ते में किशोर दा भी मिलते लेकिन वो एक दूसरे को नहीं पहचानते थे। किशोर कुमार लता मंगेशकर की ओर देखते रहते। कभी हंसते। कभी अपने हाथ में पकड़ी छड़ी घुमाते रहते। लता मंगेशकर को किशोर कुमार की ये हरकत अजीब लगती थी ।हिंदी सिनेमा में उन्होंने पहला गाना साल 1943 में गाया ।   ये गाना था फिल्म 'गजाभाऊ' का और इसके बोले थे माता एक सपूत की दुनिया बदल दे तू ।हालांकि इस गाने से लता को कुछ खास पहचान नहीं मिली ।  लता मंगेशकर खेमचंद प्रकाश की एक फिल्म में गाना गा रही थी। एक दिन किशोर दा भी उनके पीछे-पीछे स्टूडियो पहुंच गए। लता मंगेशकर ने किशोर कुमार की खेमचंद से शिकायत की। तब खेमचंद ने लता को बताया कि किशोर कुमार अशोक कुमार के छोटे भाई हैं।
 
1948 में म्यूज़िक कंपोज़र गुलाम हैदर ने लता के बड़ा ब्रेक दिया, जिसके बाद उनका संघर्ष का दौर खत्म हुआ और फिल्मी दुनिया में ऐसा सिक्का चला कि लोग उनकी आवाज के दीवाने हो गए । आज भी लता की गायकी सिल्वर स्क्रीन में चार चाँद लगा देती है |  फिल्म 'मजबूर' में लता मंगेशकर ने 'दिल मेरा तोड़ा मुझे कहीं का न छोड़ा' गाना गया । 1949 में उन्होंने फिल्म 'महल' में गाया उनका गाना 'आएगा आनेवाला' बेहद पसंद किया गया।  इसके बाद उन्होंने 'दुलारी', 'बरसात' और 'अंदाज़' में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा । चंद महीनों में ही लता के प्रति लोगों का नजरिया बदला और उन्होंने अपनी अलग पहचान बना ली और फिर इसके बाद उन्हें मुड़कर पीछे नहीं देखना पड़ा । लता मंगेशकर ने फिल्म इंडस्ट्री के सभी दिग्गज म्यूज़िक डायरेक्टर्स और सिंगर्स के साथ काम किया ।1942 से अब तक वो 1000 से भी ज्यादा हिंदी फिल्मों और 36 से भी ज्यादा भाषाओं में गाना गा चुकी हैं । लता मंगेशकर ने 1950 के दौर में कई सुपरहिट फिल्मों में अपनी रूहानी आवाज़ का जादू बिखेरकर सुनने वालों को सुकून पहुंचाया । लता मंगेशकर ने 1950 के दौर में कई सुपरहिट फिल्मों में अपनी रूहानी आवाज़ का जादू बिखेरकर सुनने वालों को सुकून पहुंचाया । उस दौरान उन्होंने बैजू बावरा, मदर इंडिया, देवदास और मधुमति जैसी हिट फिल्मों में गाने गाए. फिल्म 'मधुमति' के गाने 'आजा रे परदेसी' के लिए 1958 में लता मंगेशकर को पहला फिल्मफेयर मिला ।
 
60, 70 और 80 के दशक में गाए गए लता मंगेशकर के ज्यादातर गाने ऑल टाइम हिट्स की कैटगरी में आते हैं । कहा जाता है कि बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स, म्यूज़िक डायरेक्टर्स और एक्टर्स उनके साथ काम करने के लिए होड़ लगाया करते थे । साल 1977 में आई फिल्म 'किनारा' में लता मंगेशकर 'नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज़ ही, पहचान है, गर याद रहे' गीत गाया । लता मंगेशकर की ये लाइनें उनके हर चाहने वाले को हमेशा याद रहेंगी । लता मंगेशकर ने 1950 के दौर में कई सुपरहिट फिल्मों में अपनी रूहानी आवाज़ का जादू बिखेरकर सुनने वालों को सुकून पहुंचाया । उस दौरान उन्होंने बैजू बावरा, मदर इंडिया, देवदास और मधुमति जैसी हिट फिल्मों में गाने गाए ।फिल्म 'मधुमति' के गाने 'आजा रे परदेसी' के लिए 1958 में लता मंगेशकर को पहला फिल्मफेयर मिला ।
 
 60, 70 और 80 के दशक में गाए गए लता मंगेशकर के ज्यादातर गाने ऑल टाइम हिट्स की कैटगरी में आते हैं । कहा जाता है कि बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स, म्यूज़िक डायरेक्टर्स और एक्टर्स उनके साथ काम करने के लिए होड़ लगाया करते थे । साल 1977 में आई फिल्म 'किनारा' में लता मंगेशकर 'नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज़ ही, पहचान है, गर याद रहे' गीत गाया । लता मंगेशकर की ये लाइनें उनके हर चाहने वाले को हमेशा याद रहेंगी।उस दौरान उन्होंने बैजू बावरा, मदर इंडिया, देवदास और मधुमति जैसी हिट फिल्मों में गाने गाए । फिल्म 'मधुमति' के गाने 'आजा रे परदेसी' के लिए 1958 में लता मंगेशकर को पहला फिल्मफेयर मिला ।
 
  लता मंगेशकर को साल 2001 में 'भारत रत्न' से भी नवाजा गया था । लता दीदी को इसके पहले पद्म भूषण (1969), पद्म विभूषण(1999) और दादा साहब फाल्के अवार्ड (1989) पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है । सुर साम्राज्ञी के बर्थडे लता मंगेशकर ने ताउम्र शादी नहीं की । इसकी वजह बताते हुए वो कहती थी  कि पिता की मौत के बाद घर के सभी सदस्यों की जिम्मेदारी उन पर थी। ऐसे में कई बार शादी का ख्याल आता भी तो उस पर अमल नहीं कर सकती थी। बेहद कम उम्र में ही वो काम करने लगी थी। बहुत ज्यादा काम उनके पास रहता था। सोचा कि पहले सभी छोटे भाई बहनों को व्यवस्थित कर दूं। फिर कुछ सोचा जाएगा। फिर बहन की शादी हो गई। बच्चे हो गए। तो उन्हें संभालने की जिम्मेदारी आ गई। और इस तरह से वक्त निकलता चला गया।  
 
लता ही एकमात्र ऐसी जीवित व्यक्ति थी जिनके नाम से पुरस्कार दिए जाते हैं। कई राज्य सरकारें उनके नाम से पुरस्कार देती हैं । मध्यप्रदेश सरकार ने 1984 में लता मंगेशकर पुरस्कार शुरू किया। इस पुरस्कार के लिए चयनित कलाकारों को दो-दो लाख रूपए की राशि, सम्मान पट्टिका, शाल-श्रीफल से अलंकृत किया जाता है । राष्ट्रीय लता मंगेशकर सम्मान मध्य प्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा विभिन्न कलाओं और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाता है। ‘लता मंगेशकर सम्मान’ ‘सुगम संगीत’ के लिए दिया जाने वाला राष्ट्रीय अलंकरण है।
 
1992 से शुरू होने वाले महाराष्ट्र सरकार द्वारा जारी एक लता मंगेशकर पुरस्कार भी है। यह आधिकारिक रूप से "जीवनकाल में उपलब्धि के लिए लता मंगेशकर पुरस्कार" के रूप में भी जाना जाता है। आंध्र प्रदेश सरकार द्वारा एक और पुरस्कार दिया जाता है। लता यूँ ही सबकी हर दिल अजीज नहीं थी।  


उन पुरस्कारों पर एक नज़र डालें जिनसे उन्हें सम्मानित किया गया था-

1959: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार (मधुमति)
1963: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार (बीस साल खराब)
1964-91: 15 बंगाल फिल्म पत्रकार संघ पुरस्कार
1966: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक (खानदान) के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार
1966: ‘आनंदघन’ नाम के तहत साध मानस (मराठी) के लिए सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक
1966: साध मनसा के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका
1969: पद्म भूषण
1970: सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक का फिल्मफेयर पुरस्कार (जीने की राह)
1972: फिल्म परिचय के गीतों के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार।
1974: वह रॉयल अल्बर्ट हॉल में प्रदर्शन करने वाली पहली भारतीय बनीं।
1974: लता मंगेशकर ने 1974 में गिनीज रिकॉर्ड में भारतीय संगीत के इतिहास में सबसे अधिक दर्ज की गई कलाकार होने का गौरव प्राप्त किया।
1974: फिल्म कोरा कागजी के गीतों के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
1977: जैत रे जैतो के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक
1980: जॉर्ज टाउन, गुयाना, दक्षिण अमेरिका के शहर की प्रस्तुत कुंजी
1980: सूरीनाम गणराज्य, दक्षिण अमेरिका की मानद नागरिकता
1985: टोरंटो, ओंटारियो, कनाडा में उनके आगमन के सम्मान में 9 जून को एशिया दिवस के रूप में घोषित किया गया
1987: ह्यूस्टन, टेक्सास में संयुक्त राज्य अमेरिका की मानद नागरिकता
1989: लता मंगेशकर को 1989 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
1989: पद्म विभूषण
1990 – श्री राजा-लक्ष्मी फाउंडेशन, चेन्नई द्वारा राजा-लक्ष्मी पुरस्कार
1990: फिल्म लेकिन के गीतों के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार।
1993: लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
1994: फ़िल्मफ़ेयर विशेष पुरस्कार
1996: स्टार स्क्रीन लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड।
1996 – राजीव गांधी राष्ट्रीय सद्भावना पुरस्कार
1997: राजीव गांधी पुरस्कार
1997: महाराष्ट्र भूषण पुरस्कार
1998 – साउथ इंडियन एजुकेशनल सोसाइटी द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
1998: साउथ इंडियन एजुकेशनल सोसाइटी द्वारा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
1999: लाइफटाइम अचीवमेंट्स के लिए ज़ी सिने अवार्ड
1999: एनटीआर राष्ट्रीय पुरस्कार
2000: आईफा लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड
2001: हीरो होंडा और फ़ाइल पत्रिका “स्टारडस्ट” द्वारा मिलेनियम (महिला) की सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका
2001: उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
2001: महाराष्ट्र रत्न (पहला प्राप्तकर्ता)
2002: आशा भोंसले पुरस्कार (प्रथम प्राप्तकर्ता)
2002: वर्ष के ‘स्वर रत्न’ के लिए सह्याद्री नवरत्न पुरस्कार।
2004: फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा लिविंग लीजेंड अवार्ड
2004: फ़िल्मफ़ेयर विशेष पुरस्कार
2004: फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (फिक्की) द्वारा लिविंग लीजेंड अवार्ड।
2007: फ्रांस सरकार ने उन्हें 2007 में अपने सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार (ऑफिसर ऑफ द लीजन ऑफ ऑनर) से सम्मानित किया।
2008: लाइफटाइम अचीवमेंट के लिए वन टाइम अवार्ड
2009: एएनआर राष्ट्रीय पुरस्कार
2011: पुणे नगर निगम द्वारा स्वरभास्कर पुरस्कार (प्रथम प्राप्तकर्ता)
2019: भारत सरकार ने सितंबर 2019 में उनके 90वें जन्मदिन पर उन्हें डॉटर ऑफ द नेशन अवार्ड से सम्मानित किया

इसमें कोई दो राय नहीं दिल को छू जाने वाली आवाज की मलिका और भारतरत्न लता मंगेशकर ने भारतीय सिनेमा को संगीत के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान दिया है। एक से बढ़कर एक सुपरहिट गाने देने वाली लता आज भी सभी सिंगर और सिंगिंग की दुनिया में करियर बनाने वालों के लिए आदर्श हैं।  आज भले ही वो हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज का जादू लम्बे समय तक भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में रंग भरता रहेगा । मेरी अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि ,शत शत नमन !


Saturday, 5 February 2022

खेती बनी वरदान, शिव के 'राज ' में मुस्कुराया अन्नदाता किसान

 





 मध्य प्रदेश की बड़ी आबादी आज भी गाँवों में बसती है जिसकी जीविका कृषि , पशुधन और कृषि से सम्बद्ध अन्य क्षेत्रों पर निर्भर है। जो कृषि आज प्रदेश में रोजगार का बड़ा माध्यम बनी है वो कृषि पिछली सरकारों में अनेक विसंगतियों का शिकार रही है। नीति नियंताओं की अदूरदर्शी नीतियां प्रदेश में किसानों पर बोझ बन गई थी जिसके चलते कृषि की तमाम समस्याओं का हल खोज पाने में हम कामयाब नहीं हो पाए।


राजनीति में किसानों के हर दुःख और दर्द में सहभागी बनने की कोई परंपरा भी देखने को नहीं मिलती लेकिन पिछले कुछ महीनों में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पूरी सरकारी मशीनरी के साथ खेती की तमाम समस्याओं का निदान खोजने में लगे हैं ,वह अभूतपूर्व है। किसानों के दर्द के प्रति संवेदना जगाने का ये प्रयास मुख्यमंत्री अपने अंदाज में कर रहे हैं। खेती को लाभ का सौदा बनाने में की दिशा में वो शिद्दत के साथ जुटे हुए हैं। किसी भी मुख्यमंत्री द्वारा किसानों के दर्द में इस प्रकार के फैसले लेना एक बड़ी मिसाल है। मध्यप्रदेश ने 7 बार राष्ट्रीय स्तर पर कृषि कर्मण अवार्ड लेकर कृषि के क्षेत्र में अपनी शानदार उपलब्धियां हासिल कर पूरे देश में अपना मान बढ़ाया है । यह मुख्यमंत्री शिवराज की किसानों की समस्याओं के प्रति गहरी समझ और किसानों के प्रति संवेदनशीलता का ही परिचायक है कि वे दिन –रात किसानों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने की दिशा में रहकर सारे प्रयास कर रहे हैं।


कोरोना काल की विषम चुनौतियों के बीच प्रदेश के मुखिया शिवराज ने किसानों के चेहरों पर  सही मायनों में  मुस्कुराहट लाने का काम किया है। किसान पुत्र मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की कृषि को लेकर दिखाई गई विशेष दिलचस्पी के चलते आज प्रदेश का किसान जहां खुशहाल नजर आता है वहीं उसे फसलों का सही मूल्य भी मिल रहा है। बीते साल कोविड कोरोना लॉकडाउन के कारण प्रदेश की अर्थव्यवस्था की स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। किसानों की फसलों को समर्थन मूल्य पर खरीदना बहुत बड़ी चुनौती थी। कोरोना संक्रमण उस समय चरम पर था। दिन पर दिन कोरोना के  केस बढ़ते जा रहे थे, ऐसे में कोरोना से बीच बचाव करते हुए फसलें खरीद लेने और उन्हें मंडी तक लाने की विकराल चुनौती सरकार के सामने खड़ी थी। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी मुख्यमंत्री ने किसानों के साथ खड़ा होकर उन्हें सरकार का समर्थन दिलवाया ।


एक ओर किसानों के  ट्रैक्टर , फसल कटाई, , हार्वेस्टर, कृषि उपकरणों के सुधार  आदि की  पहल सरकार द्वारा  की गई वहीं हर दिन किसानों को एस.एम.एस भिजवाकर खरीदी केंद्रों पर सोशल डिस्टेंसिंग, सेनेटाईजेशन आदि करवाकर समर्थन मूल्य पर खरीदी का कार्य शुरू किया गया। इतनी विषम परिस्थिति में भी मध्यप्रदेश ने गेहूं का ऑलटाइम रिकार्ड उपार्जन किया। मध्यप्रदेश ने पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य को भी गेहूं खरीदी में पीछे छोड़ दिया। प्रदेश में एक करोड़ 29 लाख 34 हजार 500 मीट्रिक टन गेहूं की खरीदी 16 लाख किसानों से की गई और  उन्हें करीब 24 हजार करोड़ रूपये का भुगतान किया गया। किसानों के लिए सरकार ने शून्य प्रतिशत ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराने की सुविधा प्रारंभ कराई । साथ ही पिछले वर्षों की फसल बीमा की लगभग 2990 करोड़ रुपये की राशि किसानों के खातों में अंतरित की गई।किसानों को उनकी उपज का अधिकतम मूल्य दिलाए जाने के लिए मंडी अधिनियम में संशोधन किया गया, जिससे किसानों को मंडी और सौदा पत्रक के माध्यम से अपनी फसल बेचने की सुविधा दी गई । राज्य में किसान उत्पादक संगठन  को स्व-सहायता समूहों की तरह सशक्त बनाने की भी तैयारी भी उनके द्वारा की गई। गरीब तबके को हर प्रकार की सहायता देने के लिए संबल योजना पुन: प्रारंभ की गई जो आज गरीबों का सुरक्षा कवच बनकर सामने आई है।


किसान हितैषी मुख्यमंत्री के प्रयासों से प्रदेश के किसान का डंका आज पूरे देश में बज रहा है । 1 करोड़ 29 लाख मीट्रिक टन गेहूं का उपार्जन कर प्रदेश का किसान आज उत्पादन के मामले में मध्य प्रदेश, हरित क्रांति के अगुवा राज्य पंजाब को पीछे छोड़ चुका है वहीं कोविड के दौर में 5.11 लाख हेक्टेयर मूंग, उड़द और धान आदि की बोवनी करा चुका है। इसी दौरान  मूंग के  5.76 लाख मीट्रिक टन उत्पादन और किसानों को दी मंडियों के बाहर सौदा पत्रक से उपज बेचने की सुविधा भी दी गयी जिसके परिणाम बेहतरीन रहे हैं । समर्थन मूल्य पर उपार्जन हेतु एक दिन में किसान से खरीदी की अधिकतम सीमा 25 क्विटंल को समाप्त कर असीमित खरीदा जाना भी  शिवराज सरकार की एक बड़ी उपलब्धि रही है । एक ही बार में पूरी उपज का सौदा  होने से किसान के  समय और धन दोनों की हुई बचत हो रही है और उसे बेवजह  मंडियों के चक्कर नहीं काटने पड़ रहे हैं । पिछले साल अतिवृष्टि और कीट प्रकोपों से जब प्रदेश प्रभावित हुआ तो सरकार द्वारा राहत राशि के रूप में 3 हजार 500 करोड़ रुपये की सहायता किसानों को दे गई। सरकार ने सहकारी बैंकों की सेहत में सुधार के लिए 800 करोड़ की सहायता भी दी। प्रधानमन्त्री किसान सम्मान निधि , प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना , किसान क्रेडिट कार्ड योजना को प्रदेश में बेहतरीन ढंग से लागू किया गया है ।प्रधानमंत्री किसान कल्याण योजना के माध्यम से अब तक 111 हजार 889 करोड़ रु का भुगतान किसानों को किया जा चुका है।  शून्य ब्याज दर पर ऋण देने वाले प्रदेशों में आज  मध्य प्रदेश का नाम शुमार हुआ है । अब तक 26000 करोड़ से अधिक का ऋण किसानों को दिया गया है ।  


 किसानों के प्रति मुख्यमंत्री की दूरगामी नीतियों का असर ही रहा, उनके रहते प्रदेश में हर स्तर पर किसानों की समस्याओं को सुना गया और विभिन्न फसलों के बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने और पहली बार प्रदेश में किसानों की विभाग से संबंधित समस्याओं के निराकरण के लिये 'कमल सुविधा केंद्र'  की स्थापना सुनिश्चित की गयी  जहां पर  शिकायतों का  त्वरित निराकरण हुआ।  अब तक कई हजार समस्याओं का निराकरण बेहद कम समय में पूरा हुआ है। प्रधानमंत्री मोदी के मार्गदर्शन में केन बेतवा परियोजना का निर्माण शुरू हुआ है।  ये परियोजना प्रदेश में सिंचाई व्यवस्था को मजबूत बनाने का काम भविष्य में करेगी।  आज भी कृषि के क्षेत्र में एग्रीकल्चर इन्फ्रास्टेक्चर फंड परियोजना के माध्यम से कृषि में बुनियादी सुधारों को अमली जामा पहनाया जा रहा है। 150 नए ऍफ़.पी. ओ के गठन से प्रदेश में किसानों के लिए नई लकीर खींचने की कोशिशें शुरू हुई हैं। आज प्रदेश में कृषि विकास दर जहाँ दहाई के अंक में पहुँच चुकी है वहीँ प्रदेश का कुल कृषि उत्पादन बढ़कर 6 करोड़ मीट्रिक टन पार कर चुका है। पिछले 17 बरस में सिंचित क्षेत्र भी 42 लाख हेक्टेयर तक पहुँच गया है ।  इस दौर में प्रदेश सरकार ने किसानों को बिजली के कनेक्शन देने के लिए 20 हजार करोड़ रुपये से अधिक का अनुदान भी दिया है ।    


शिवराज सरकार का एकमात्र संकल्प प्रदेश के किसानों की समृद्धि है ।  इसी को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2018 में 9.51 लाख किसानों को खरीफ का 1987.27 करोड़ रु. वर्ष 2018-19 में 8.94 लाख किसानों को रबी का 1241 करोड़ रु.,  खरीफ 2019 का 24.54 लाख किसानों को 5,531  करोड़ रुपये की बीमा राशि का भुगतान कराया गया। इस प्रकार कुल  44 लाख किसानों को 8,891 करोड़ रु. की राशि का भुगतान बीमा कंपनियों द्वारा कराया गया। कोरोना के बढ़ते संक्रमण को देखते  हुए खरीफ वर्ष 2020-21 के लिए फसल बीमा की अंतिम तारीख 31 जुलाई के स्थान पर  पिछले साल एक माह बढ़ाकर 31 अगस्त की गई । बाढ़ प्रभावित पांच जिलों के लिए तारीख आगे बढ़ाकर 7 सितंबर तक  की गई जिससे प्रदेश में खरीफ फसल के लिए 44 लाख 53 हजार से ज्यादा किसानों ने बीमा पंजीयन कराया।प्रदेश में मूंग फसल क्षेत्र 2021 में बढ़कर 8.35 हेक्टेयर पहुँच चुका है जिसमें पिछले साल के मुकाबले दुगनी वृद्धि हुई है ।


भारत सरकार द्वारा माह दिसम्वर 2018 से प्रधानमंत्री किसान सम्मान  निधि योजना प्रारंभ की गई जिसमें  प्रतिवर्ष कृषकों को एक वर्ष में तीन समान किश्तों  में कुल राशि 6 हजार का भुगतान किया जाता है। इस योजना अंतर्गत  अब तक प्रदेश में 81 लाख 49 हजार  किसानों को 1492  करोड़ रूपये की राशि का वितरण किया गया है। मुख्य्मंत्री किसान कल्याण योजना प्रदेश में  22 सितम्वर 2020 से  शुरू हुई जिसके तहत वित्तीय वर्ष में 2 समान किश्तों  में पात्र किसानों को 4 हजार रूपये का भुगतान किया जाता है। मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना के अंतर्गत 2020-21 में जहाँ 74 लाख 50 हजार किसानों के खातों में लगभग 1 हजार 492 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान किया गया है वहीँ 2021-22 के लिए पहली किश्त के रूप में 75 लाख किसानों को 1 हजार 500 करोड़ रुपये वितरित किये जा चुके हैं। वर्ष 2021-22 में प्रस्तु त बजट में मुख्यमंत्री किसान कल्यानण योजना अंतर्गत 3200.00 करोड़ रूपये राशि का प्रावधान किया गया है।   इसी प्रकार वन ग्रामों को राजस्व ग्राम में शामिल कराकर वन अधिकार पट्टेधारियों को फसल बीमा योजना का लाभ दिलाया गया है। पूर्व में सरसों का उपार्जन 13 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के मान से तथा चना का उपार्जन 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर . के मान से किया जा रहा था, जिसे बढ़ाकर प्रदेश सरकार के द्वारा 'जितना उत्पादन-उतना उपार्जन' के मान से 20-20  क्विंटल   प्रति हेक्टेयर तक चना तथा सरसों की उपार्जन मात्रा नियत  किया गया। इससे चना एवं सरसों उत्पादक किसानों को अपनी उपज के बेहतर मूल्य प्राप्त हुए हैं। समर्थन मूल्य पर उपार्जन हेतु एक दिन में एक किसान से खरीदी की अधिकतम सीमा 25 क्विंटल को समाप्त कर असीमित  पंजीयन अनुसार एक साथ असीमित खरीदा जाना निश्चित किया गया जिससे किसान  के धन और समय की एक साथ बचत हुई है। बीज ग्राम कार्यक्रम किसानों को नई किस्मों के बीज दिलाने के लिए भारत सरकार  के सहयोग से चलाया जा रहा है । 2021-22 में रबी की फसल हेतु मसूर, सरसों , अलसी बीज का मिनी किट बीज का वितरण  प्रदेश में निशुल्क किया जा रहा है । मोटे अनाजों के मूल्य संवर्धन हेतु अनुसूचित जनजाति क्षेत्रों के लिए मिलेट मिशन योजना चलाई जा रही है जिससे किसानों की आय निश्चित रूप से बढ़ेगी ।कृषि अधोसंरचना निधि के अंतर्गत वर्ष 2020-21 में  प्रदेश को 7500 करोड़ रूपये का आवंटन प्राप्त हुआ है। इसका उपयोग आधुनिक मंडियों की स्थापना, फूड पार्क, शीत गृहों की श्रृंखला स्थापित करने के साथ-साथ साइलोस एवं वेयर हाउस के निर्माण में किया जाएगा । रबी विपणन बर्ष 2021-22 हेतु चना, मसूर, सरसों का उपार्जन गेहूं के उपार्जन से पहले किए जाने का निर्णय भी प्रदेश सरकार के द्वारा किया गया ।


प्रदेश के सभी 52 जिलों में भूमि के भू अभिलेख आनलाइन प्रदान करने की सुविधा भी प्रदेश सरकार ने शुरू की है। प्रदेश में कोर्स तकनीक के माध्यम से किसी भी मौसम में सटीकता के साथ सर्वेक्षण और सीमांकन करने की सुविधा भी दी गई है । नए सीमांक एप के माध्यम से स्मार्टफोन के माध्यम से भूखंड को नापकर राजस्व अभिलेख के माध्यम से उसका मिलान किया जा सकता है । इस एप की प्रदेश में लोकप्रियता अपने चरम पर है ।केंद्र सरकार के द्वारा देश के समस्त किसानों के लिए वन स्टाप पोर्टल का निर्माण किया गया है । इसी तर्ज पर प्रदेश सरकार ने किसानों को एकल खिड़की उपलब्ध कराई है, जहाँ सभी समस्याओं का समाधान निकालने की कोशिशे हो रही हैं । साथ ही सरकारी प्रयासों की निगरानी के लिए एक पारदर्शी निगरानी तंत्र की व्यवस्था सरकार ने सुनिश्चित की है  सरकारी नीतियों को लागू करते समय किसानों की राय को भी लिया जाता है जिसके चलते अन्नदाताओं की तमाम समस्याओं का बेहतर निदान किया जा सका है। सरकारी नीतियों का निर्माण लोक मंगल की भावनाओं के साथ किया जा चाहिए। अच्छी बात ये है मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने इस कार्यकाल में किसानों के हितों के लिए बड़े फैसले लेने से नहीं हिचकिचा रहे हैं और उनकी प्राथमिकताओं के केंद्र में सत्ता सँभालने के पहले दिन से ही प्रदेश के किसान हैं ।

 प्रदेश सरकार की इस उपलब्धि में किसानों की अथक मेहनत के साथ ही कृषि मंत्री  कमल पटेल ने भी किसानों के हित में हर वो जतन किया है जिससे किसानों की आर्थिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त हो। इन्ही प्रयासों से तरक्की और उन्नति की नई इबारत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से किसानों के हित में चलाई जा रही योजनाएँ प्रदेश के करोड़ों किसानों की आँखों में खुशी , जिंदगी में खुशहाली की गारंटी हैं । मुख्यमंत्री शिवराज खुद किसान हैं लिहाजा उनके पास किसानों का ऐसा सुरक्षा कवच है जो दशकों से बिचौलियों के चंगुल में फंसे किसानों को आजादी दिलाने में मील का पत्थर साबित होंगे । आज राज्य में खेती का रकबा जहाँ बढ़ा है वहीँ किसानों को सिंचाई की बेहतर सुविधाएं भी मिल रही हैं।  पहले की अपेक्षा उन्हें आज 24 घंटे बिजली पूरे प्रदेश में मिल रही है।

मध्यप्रदेश के अन्नदाता का मान  शिवराज सरकार के आने से बढ़ा है। आज मध्यप्रदेश अनाज के उत्पादन में सर्वश्रेष्ठ राज्य बन गया है । वैसे भी शिवराज सिंह चौहान किसानों के प्रति सदैव संवेदना से भरे रहे हैं। वे खुद को भी किसान परिवार का बेटा बताने में पीछे नहीं रहे हैं। अन्नदाता की हर समस्या को लेकर वो पूरी सक्रियता से काम को अंजाम तक पंहुचा रहे हैं । किसानों को  कोई कष्ट न हो इसके लिए  उनकी सरकारी मशीनरी हर समय तत्पर रहती है पिछले साल सत्ता में आते ही उन्होंने जिस तरह ताबड़तोड़ फैसले  किसान हित में लिए हैं उसने यह साबित किया कि वे मुश्किल समय में अपना धैर्य नहीं खोते मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान  की यही पहचान अन्य नेताओं से उनको अलग करती है । मुख्यमंत्री शिवराज किसान हितैषी सी एम के तौर पर पूरे देश में जाने जाते हैं। राज्य को कृषि क्षेत्र में  नित ऊंचाईयों पर ले जाने का श्रेय निश्चित ही उन्हें जाता है।