Tuesday, 30 December 2025

हजारों सवाल, एक खामोशी…गहरे सवाल छोड़ गए मनमोहन

डा. मनमोहन सिंह का नाम भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में अमिट स्थान रखता है।  डॉ. मनमोहन  ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिसने न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। उनकी सादगी, विद्वत्ता और दूरदर्शिता ने उन्हें एक असाधारण नेता बनाया। 1991 में जब भारत गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था, डा. मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के रूप में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था और देश कर्ज के बोझ तले दबा हुआ था। इस कठिन समय में, उन्होंने साहसिक निर्णय लेते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजारों के लिए खोला। उनके नेतृत्व में किए गए सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर और प्रतिस्पर्धी बनाया। लाइसेंस राज का खात्मा, विदेशी निवेश को प्रोत्साहन और निजीकरण को बढ़ावा देना उनके सुधारों के मुख्य स्तंभ थे। इन नीतियों ने न केवल आर्थिक संकट को टाला, बल्कि भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल कर दिया। 2008 में जब अमरीका और पश्चिमी देशों में आर्थिक मंदी आई, तब भारत भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा। उस समय डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और उनकी आर्थिक नीतियों ने भारत को इस संकट से बचाने में अहम भूमिका निभाई। उनकी सरकार ने वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए तत्काल कदम उठाए। सार्वजनिक निवेश बढ़ाने, रोजगार सृजन और ग्रामीण क्षेत्रों में मांग को बढ़ावा देने के लिए मनरेगा जैसी योजनाओं को लागू किया गया। इन नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मंदी के प्रभाव से उबरने में मदद की और ये साबित किया कि डा. सिंह न केवल एक कुशल अर्थशास्त्री हैं, बल्कि एक सक्षम संकट प्रबंधक भी। डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत ने अपने पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दिया।

सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) को सक्रिय बनाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, और श्रीलंका के साथ व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया। डा. सिंह का मानना था कि पड़ोसी देशों के साथ मजबूत संबंध क्षेत्रीय स्थिरता और विकास के लिए आवश्यक हैं। उनके कार्यकाल में भारत-पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता और सीमा पर तनाव को कम करने के प्रयास किए गए। डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत किया। उन्होंने भारत-अमरीका परमाणु समझौते को सफलतापूर्वक अंजाम दिया, जिसने भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। ये समझौता उनकी कूटनीतिक कुशलता और दृढ़ निश्चय का परिचायक था। इसके अलावा, उन्होंने जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और वैश्विक आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज को मजबूती से रखा। उनके नेतृत्व में भारत ने ब्रिक्स और जी-20 जैसे मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाई। डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों की स्थिति सुधारने के लिए कई प्रयास किए गए थे। उनका एक बड़ा कदम सच्चर आयोग का गठन था। यह आयोग भारतीय मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए बनाया गया था।

मनमोहक जीवन

डा. मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर, 1932 को पंजाब के चकवाल जिला के गाह (अब पाकिस्तान में) गांव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पाकिस्तान और फिर भारत में हुई। मनमोहन सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज से पढ़ाई की और यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड से डीफिल की पढ़ाई की। डा. सिंह ने अपने करियर की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संगठनों में की। राजनीति में आने से पहले वह सरकार में कई अहम प्रशासनिक पदों पर रहे, जिनमें मुख्य आर्थिक सलाहकार, रिजर्व बैंक के गवर्नर और योजना आयोग के उपाध्यक्ष जैसे अहम पद शामिल हैं।

राजनीतिक सफर

1980 के दशक में डा. सिंह का राजनीतिक सफर शुरू हुआ। वह 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री बने और इसके बाद 2004 से 2014 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। उन्होंने ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की। मनमोहन सिंह को आर्थिक उदारीकरण के साथ ही सूचना का हक कानून, मनरेगा, आधार कार्ड और आरटीई के साथ ही अमरीका के साथ ही असैन्य परमाणु समझौते के लिए हमेशा याद किया जाएगा। मनमोहन सिंह के परिवार की बात करें तो उनके परिवार में पत्नी गुरशरण कौर और तीन बेटियां और उनके परिवार शामिल हैं।

पांच ऐतिहासिक उपलब्धियां

1. आर्थिक उदारीकरण का सूत्रपात (1991)

2. आईटी और टेलीकॉम क्रांति

3. ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा)

4. भारत-अमरीका परमाणु समझौता (2008)

5. शिक्षा में सुधार

डा.मनमोहन सिंह के शांत स्वभाव और साधारण विचारों के कारण लोग इन्हें काफी पसंद करते थे। यही वजह थी कि प्रधानमंत्री रहते हुए भी इनके 2013 के एफिडेविट में सिर्फ एक कार  मारुति 800 पाई गई। मनमोहन सिंह के पास एक 1996 मॉडल की मारुति 800 कार रही। इस कार इन्हें इतना लगाव था कि बीएमडब्ल्यू को भी छोड़ दिया था। मनमोहन सिंह के पास को मारुति सुजुकी 800 कार थी, उसमें 796 सीसी का 3 सिलेंडर वाला इंजन मिलता थी जो 37 बीएचपी की पावर और 59 एनएम का टार्क जनरेट करने में सक्षम था।हालांकि 2004 से 2014 तक देश के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह बीएमडब्ल्यू 7 सीरीज कार भी थी, जोकि देश की सबसे ज्यादा सुरक्षित कार थी। योगी सरकार में मंत्री असीम अरुण ने डा. मनमोहन सिंह के साथ अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि डा. साहब की अपनी एक गाड़ी थी। प्रधानमंत्री आवास में मारुति 800 , चमचमाती काली बीएमडब्ल्यू के पीछे खड़ी रहती थी। वह बार-बार मुझसे कहते, ‘असीम, मुझे इस लग्जरी कार में चलना पसंद नहीं, मेरी गाड़ी तो यह मारुति 800 है। बता दें कि असीम एक जमाने में मनमोहन सिंह की एसपीजी टीम में बॉडीगॉर्ड थे।

उर्दू में लिखे होते थे भाषण

डा. मनमोहन सिंह के निधन पर उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारु ने पूर्व प्रधानमंत्री याद करते हुए उनसे जुड़े तमाम किस्से साझा किए। संजय बारू के मुताबिक मनमोहन सिंह को हिंदी पढऩा नहीं आता था। उनके भाषण या तो गुरुमुखी में या फिर उर्दू में लिखे होते थे। 2014 में अपनी किताब में भी संजय बारु ने इस बात का जिक्र किया था कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हिंदी नहीं पढ़ पाते हैं। उनके सभी भाषण भी उर्दू में लिखे होते थे। उन्होंने किताब में लिखा था कि मनमोहन सिंह हिंदी में बात तो कर सकते थे, लेकिन कभी देवनागरी लिपि या हिंदी भाषा में पढऩा नहीं सीखा। हालांकि, उर्दू पढऩा उन्हें बखूबी आता था। यही कारण था कि, मनमोहन सिंह अपने भाषण अंग्रेजी में दिया करते थे। उन्हें अपना पहला हिंदी भाषण देने के लिए तीन दिन तक प्रैक्टिस करनी पड़ी थी।

दादा-दादी ने पाला

डा. मनमोहन सिंह पाकिस्तान से विस्थापित होकर हल्द्वानी आए थे। बचपन में ही उनकी मां का निधन हो गया था। दादा-दादी ने ही उनके पालन पोषण किया। उन्होंने गांव में लालटेन की रोशनी में पढ़ाई की। पिता चाहते थे कि वह डाक्टर बनें, इसलिए प्री-मेडिकल कोर्स में दाखिला लिया। हालांकि, कुछ महीनों बाद ही उन्होंने कोर्स छोड़ दिया।

संसद के बाहर बोले थे, हजारों जवाबों से अच्छी मेरी खामोशी

किस्सा 27 अगस्त, 2012 का है, जब संसद का सत्र चल रहा था। मनमोहन सरकार पर कोयला ब्लॉक आबंटन में भ्रष्टाचार का आरोप लगा। तब मनमोहन सिंह ने कहा कि कोयला ब्लाक आबंटन को लेकर कैग की रिपोर्ट में अनियमितताओं के जो आरोप लगाए गए हैं, वे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और सरासर बेबुनियाद हैं। उन्होंने लोकसभा में बयान देने के बाद संसद भवन के बाहर मीडिया में भी बयान दिया। उन्होंने उनकी ‘खामोशी’ पर ताना कहने वालों को जवाब देते हुए शेर पढ़ा, ‘हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी’।

अकसर पहनते थे नीली पगड़ी

मनमोहन सिंह अकसर नीली पगड़ी पहनते थे। इसके पीछे क्या राज था, यह उन्होंने 11 अक्तूूबर, 2006 को कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में खोला था। उन्हें ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग, प्रिंस फिलिप ने डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया था। तब प्रिंस फिलिप ने अपने भाषण में कहा था कि आप उनकी पगड़ी के रंग पर ध्यान दे सकते हैं। इस पर मनमोहन सिंह ने कहा कि नीला रंग उनके अल्मा मेटर कैंब्रिज का प्रतीक है। कैंब्रिज में बिताए मेरे दिनों की यादें बहुत गहरी हैं। हल्का नीला रंग मेरा पसंदीदा है, इसलिए यह अकसर मेरी पगड़ी पर दिखाई देता है।

एक अनूठा गौरव

डा.मनमोहन सिंह को भारत में एक रुपए से 100 रुपए तक के करंसी नोटों पर हस्ताक्षर करने वाली एकमात्र हस्ती होने का अनूठा गौरव प्राप्त है। देश में एक रुपए के नोट पर वित्त सचिव और दो रुपए और उससे ऊपर के नोट पर आरबीआई गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं। डाक्टर ङ्क्षसह ने दोनों पदों पर कार्य किया था।17अक्तूबर, 2022 को कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में वोट डालने पहुंचे। 17 अक्तूबर, 2022 को ही कांग्रेस प्रेजिडेंशिल इलेक्शन हुआ था। इस दौरान 90 साल के मनमोहन सिंह चुनाव में वोट डालने कांग्रेस हैडक्वॉर्टर पहुंचे। इस दौरान गेट के अंदर दाखिल होते हुए वह लडख़ड़ा गए थे।

बतौर पीएम आखिरी प्रेस  कान्फ्रेंस तीन जनवरी, 2014

डा. मनमोहन सिंह ने तीन जनवरी, 2014 को बतौर पीएम आखिरी प्रेस कांफ्रेंस की थी। उन्होंने प्रेस कान्फ्रेंस कर अमरीका के साथ परमाणु करार की घोषणा की थी। आखिरी प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान उनके सामने 100 से ज्यादा पत्रकार-संपादक बैठे थे। यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई थी और सारे सवाल उसी से जुड़े थे। उस प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान डा. सिंह ने 62 अनस्क्रिप्टेड सवालों के जवाब दिए थे। तब मनमोहन सिंह ने खुद की आलोचना को लेकर कहा था कि उन्हें ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ कहा जाता है, लेकिन ‘मीडिया की तुलना में इतिहास उनके प्रति अधिक उदार रहेगा।’

बेटियों ने बनाई अपनी अलग पहचान

मनमोहन सिंह की तीन बेटियां उपिंदर सिंह, अमृत सिंह और दमन सिंह हैं। पूर्व पीएम की तीनों बेटियों का भी अपने-अपने क्षेत्र का बड़ा नाम हैं।  मनमोहन सिंह की एक  बेटी उपिंदर सिंह एक जानी-मानी इतिहासकार और अशोका विश्वविद्यालय की डीन हैं। पूर्व में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की प्रमुख भी रह चुकी हैं। हाल ही में इनकी  प्राचीन भारत की अवधारणा- धर्म, राजनीति और पुरातत्व पर  बेहतरीन किताब  आई है। ये किताब दक्षिण एशिया के शुरुआती इतिहास के पुनर्निर्माण में हाल के दृष्टिकोणों और चुनौतियों पर प्रकाश डालती है। वह देश से लेकर विदेश तक की यूनिवर्सिटी में पढ़ चुकी हैं, पढ़ा चुकी हैं। कई रिसर्च कर चुकी हैं। मनमोहन सिंह की दूसरी बेटी अमृत सिंह एक मशहूर मानवाधिकार वकील हैं और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के लॉ स्कूल में प्रैक्टिस ऑफ लॉ की प्रोफेसर हैं। अमृत सिंह रूल ऑफ लॉ इम्पैक्ट लैब की कार्यकारी निदेशक भी हैं। दमन सिंह लेखन जगत में सक्रिय हैं और उन्होंने ही मनमोहन सिंह के जीवन पर किताब स्ट्रिक्टली पर्सनल मनमोहन एंड गुरशरण, ए मेमोयर लिखी है। इस किताब में मनमोहन सिंह के निजी जीवन के बारे में काफी जानकारी दी गई है। इसके अलावा दमन सिंह ने द सेक्रेड ग्रोव और नाइन बाइ नाइन भी लिखी हैं।

अमरीका से परमाणु डील पर अड़ गए थे मनमोहन 

डा. मनमोहन सिंह 2004 में प्रधानमंत्री बने। वह गठबंधन यूपीए सरकार चला रहे थे। भारत-संयुक्त राज्य अमरीका असैन्य परमाणु समझौते का लेफ्ट पार्टियों ने कड़ा विरोध किया। इसके बावजूद वह इस पर अड़े रहे। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने मदद की। डा. सिंह कुछ दलों को मनाने में सफल रहे, जिन्होंने परमाणु समझौते के प्रति अपना विरोध वापस ले लिया। हालांकि, वामपंथी दलों ने इस सौदे का पुरजोर विरोध जारी रखा और सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। समाजवादी पार्टी ने पहले इसका विरोध करने में वाम मोर्चे का समर्थन किया था, लेकिन बाद में अपना रुख बदल दिया। मनमोहन सिंह की सरकार को विश्वास की परीक्षा से गुजरना पड़ा और वह 275-256 मतों से बच गई। डा मनमोहन सिंह और तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 18 जुलाई, 2005 को सौदे की रूपरेखा पर एक संयुक्त घोषणा की और यह औपचारिक रूप से अक्तूूबर 2008 में लागू हुआ। यह भारत के लिए एक बड़ी जीत थी, जिसे अमरीका द्वारा परमाणु अछूत माना जाता था। इस सौदे ने न केवल भारत को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया, बल्कि इसने अमरीका को नागरिक कार्यक्रमों के लिए प्रौद्योगिकी के साथ भारत की सहायता करने की भी अनुमति दी।

ओबामा ने कहा था, जब मनमोहन बोलते हैं तो दुनिया सुनती है

आर्थिक उदारीकरण में मनमोहन सिंह के विशेष योगदान के लिए उन्हें पूरी दुनिया में याद किया जाता है। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी एक बार मनमोहन सिंह की तारीफ करते हुए कहा था कि ‘जब मनमोहन सिंह बोलते हैं, तो पूरी दुनिया सुनती है।’ ओबामा ने अपनी किताब ‘ए प्रॉमिस लैंड’ में भी मनमोहन सिंह की जमकर तारीफ की थी। बराक ओबामा की यह किताब 2020 में आई थी।

किताब में ओबामा ने लिखा था कि मनमोहन सिंह भारत की अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण के इंजीनियर रहे हैं। उन्होंने लाखों भारतीयों को गरीबी के दुश्चक्र से बाहर निकाला है। ओबामा ने बताया था कि उनके और मनमोहन सिंह के बीच गर्मजोशी भरे रिश्ते थे। ओबामा ने लिखा कि मेरी नजर में मनमोहन सिंह बुद्धिमान, विचार और राजनीतिक रूप से ईमानदार व्यक्ति हैं। भारत के आर्थिक कायाकल्प के चीफ आर्किटेक्ट के रूप में पू्र्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मुझे विकास के प्रतीक के रूप में दिखे।  छोटे सिख समुदाय का सदस्य जिसे कई बार सताया भी गया जो कि इस देश के सबसे बड़े पद तक पहुंचा और वे एक ऐसे विनम्र टेक्नोक्रेट थे  जिन्होंने लोगों का विश्वास उनकी भावनाओं को अपील कर नहीं जीता बल्कि लोगों को उच्च जीवन स्तर देकर वे कामयाब हुए। 2010 में मनमोहन सिंह से मुलाकात के बाद ओबामा ने कहा था कि जब भारत के प्रधानमंत्री बोलते हैं तो पूरी दुनिया सुनती है। यह मुलाकात तब हुई थी जब डा. मनमोहन सिंह जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने टोरंटो पहुंचे थे।


Monday, 22 December 2025

राजनीति के अजातशत्रु ' अटल '

 

अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय राजनीति का भीष्म पितामह भी कहा जाता है।उन्होंने करीब 5 दशक तक सियासत पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। अटल भारतीय राजनीति के उन विरले राजनेताओं में से एक थे जिन्हें उनके विरोधी भी पूर्ण सम्मान देते थे। वे केवल एक प्रधानमंत्री नहीं बल्कि एक कवि, प्रखर पत्रकार, ओजस्वीवक्ता, दार्शनिक और एक संवेदनशील इंसान थे। उनका व्यक्तित्व इतना बहुआयामी था कि इसे एक लेख में समेटना असंभव है। उनकी सबसे बड़ी पहचान यह रही कि उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को एक क्षेत्रीय पार्टी से राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख राजनीतिक शक्ति के केंद्र के रूप में उभारा और भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।

अटल भारतीय राजनीति के एक अद्वितीय और प्रभावशाली नेता रहे। उनका जीवन सिद्धांतों, नैतिकता और समर्पण का प्रतीक था। उन्होनें न केवल भारतीय राजनीति में अपनी अलहदा पहचान बनाई बल्कि वैश्विक स्तर पर भी सम्मान अर्जित किया। सही मायनों में कहा जाए तो अटल को राजनीति का अजातशत्रु कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी से द्वेष नहीं रखा और हर विचारधारा का तहे दिल से सम्मान किया शायद यही वजह रही उनके दरवाजे पर हर नेता, कार्यकर्ता और आमजन की दस्तक हुआ करती थी।

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर 1924 को ग्वालियर, मध्यप्रदेश में हुआ। उनके पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी एक स्कूल शिक्षक थे जिन्होंने उन्हें शिक्षा और जीवन के मूल्यों की अहमियत सिखाई। अटल जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर से प्राप्त की और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने राजनीति विज्ञान में भी गहरी रुचि ली और एक अच्छे वक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई। उनकी बीए की शिक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में हुई इसके बाद 1945 में उन्होंने कानपुर के डीएवी कॉलेज में राजनीति शास्त्र से एमए में दाखिला लिया। 1947 में एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसी कॉलेज में एलएलबी में एडमिशन लिया। उनके पिता ने भी उनके साथ यहां एलएलबी में दाखिला लिया हालांकि इस कोर्स को वह बीच में छोड़कर पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए।

अटल को छात्र जीवन से ही राजनीति में गहरी रुचि थी। विक्टोरिया कॉलेज में पढ़ाई के दौरान अटल कॉलेज के संघ मंत्री और उपाध्यक्ष भी बने। उस दौर में उनकी सक्रियता ग्वालियर में आर्य समाज आंदोलन की युवा शाखा आर्य कुमार सभा से शुरू हुई।1944 में वह इस सभा के महासचिव भी बने। अटल जी का परिवार पहले से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से प्रेरित था यही वजह रही उस  छात्र दौर में में ही वह आरएसएस से जुड़ गए और तभी से तमाम भाषण , वाद -विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उस दौर को याद करें तो यही वह दौर था जब भारत ब्रिटिश उपनिवेश का दंश झेलने के बाद आजाद हुआ था और देश बंटवारे के त्रासदी से गुजर रहा था। बंटवारे के चलते दंगों के कारण उन्होंने कानून की पढ़ाई को बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने अपना करियर एक पत्रकार के रूप में शुरू किया। पत्रकार के रूप में उन्होंने लम्बे समय तक राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया। बाबा साहब आप्टे से प्रभावित होकर उन्होंने 1940 से 1944 के दौरान संघ के अधिकारी प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लिया और 1947 में प्रचारक बन गए। 1951 में वह भारतीय जनसंघ में शामिल हो गए। उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय सचिव नियुक्त किया गया। इसी वर्ष 21 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने दक्षिणपंथी राजनीतिक दल की नींव रखी थी। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं दीनदयाल उपाध्याय और प्रोफेसर बलराज मधोक इसके संस्थापक संघ थे। इस दौरान संघ ने ब्रिटिश राज के शासनकाल के दौरान शुरू किए गए अपने काम को जारी रखने और अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए एक राजनीतिक दल के गठन पर विचार करना शुरू कर दिया था। 1957 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए। सही मायनों में उनका राजनीतिक सफर भारतीय जनसंघ से जुड़कर शुरू हुआ। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से प्रेरित थे और उनकी विचारधारा को अपनाया। इसके बाद उनका राजनीतिक करियर लगातार उन्नति की ओर बढ़ता गया।

 वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे और पार्टी को एक नई दिशा देने में उनकी भूमिका अहम रही। वाजपेयी जी की सबसे बड़ी खूबी सहिष्णुता और समन्वय थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन से जुड़कर भी उन्होंने कभी हिंदुत्व को संकीर्ण अर्थों में नहीं लिया। अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व बहुत ही मिलनसार था। उनके विपक्ष के साथ भी हमेशा सम्बन्ध मधुर रहे। 1975 में आपातकाल लगाने का अटल बिहारी वाजपेयी ने खुलकर विरोध किया था। 1977 के लोकसभा चुनाव के बाद देश में पहली बार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी गैर कांग्रेसी सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने तो उन्होंने पूरे विश्व में भारत की छवि बनाई। विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण देने वाले देश के पहले वक्ता बने। अपनी भाषण कला से दुनिया का दिल जीत लिया। अटल जी के भाषण के मुरीद सब थे, फिर चाहे वे विपक्ष का नेता ही क्‍यों ना रहा हो। तत्कालीन प्रधानमंत्री  जवाहरलाल नेहरू भी उनसे खासा प्रभावित रहते थे। एक बार नेहरू ने जनसंघ की आलोचना की तो अटल ने कहा मैं जानता हूं पंडित जी रोजाना शीर्षासन करते हैं। वह शीर्षासन करें, मुझे उससे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन मेरी पार्टी की तस्‍वीर उल्‍टी ना देखें। यह सुनते ही जवाहर लाल नेहरू ठहाका मारकर हंस पड़ें। भले ही नेहरू राजनीत‍ि में अटल के विरोधी रहे हों, लेकिन उनके मुरीद भी थे। एक बार नेहरू ने भारत यात्रा पर आए एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री से वाजपेयी को मिलवाते हुए कहा था इनसे मिलिए, ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं। हमेशा मेरी आलोचना करते हैं लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूं। 1961 में जब नेहरू ने राष्‍ट्रीय एकता परिषद का गठन किया तो उसमें वाजपेयी को शामिल किया जबकि परिषद में में दिग्‍गज नेता और लोग शामिल थे। अटल उसमें सबसे युवा थे लोकसभा में चुनकर आये थे लेकिन 1962 में परिषद की पहली बैठक होनी थी तब वे लोकसभा के सदस्‍य नहीं रह गये थे। इसके बाद जब वाजपेयी बलरामपुर से चुनाव लड़े तो नेहरू उनके खिलाफ प्रचार करने नहीं गये। 29 मई 1964 मई 1964 में नेहरू के निधन के बाद वाजपेयी ने जो श्रद्धांजलि नेहरू को दी, उसे अपने आप में एक यादगार भाषण कहा जाता है। उनके भाषण से पूरा सदन भावुक ही हो गया था। 

उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे मजबूत व्यक्तित्वों के साथ काम किया और क्षेत्रीय क्षत्रपों को न केवल मजबूत किया बल्कि अपनी सरकार में हर किसी को काम करने की पूरी आज़ादी दी। 1998-2004 की एनडीए सरकार में 24 दलों का गठबंधन था जिसे पंचमेल खिचड़ी कहा गया लेकिन भारतीय राजनीती में गठबंधन युग को  उन्होंने कुशलता से संभाला। उनके कार्यकाल में भारत ने आर्थिक और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाई। स्वर्णिम चतुर्भुज योजना हो या टेलीकॉम क्रांति, भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र घोषित करना हर जगह उन्होनें अपने विजन से देश को नई दिशा देने का काम किया। सरकार और निजी क्षेत्र के बीच साझेदारी को बढ़ावा देने से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी और इंटरनेट क्रांति की नींव अटल ने अपने मजबूत कार्यकाल में रखकर दुनिया में भारत की धाक जमाई। 

अटल ने तीन बार देश के पीएम पद की कमान संभाली। 1996 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और अटल 13 दिन तक देश के प्रधानमंत्री रहे। 1998 में वाजपेयी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने। 13 महीने के इस कार्यकाल में अटल बिहारी वाजपेयी ने सम्पूर्ण विश्व को भारत की धमक का अहसास कराया। अमेरिका और यूरोपीय संघ समेत कई देशों ने भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए लेकिन उसके बाद भी भारत उनके कुशल नेतृत्व में भारत किसी के आगे नहीं झुका। अटल जी ने भारत-पाकिस्तान संबंधों में भी सकारात्मक बदलाव की कोशिश की। लाहौर बस यात्रा दुश्मन देश के साथ शांति की पहल का सबसे बड़ा उदाहरण है। मुशर्रफ के साथ पाक के साथ सम्बन्ध सुधारने की भरसक कोशिश अटल ने की। उन्होनें  1999 में पहली बार दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू कराई और पड़ोसी और आगरा समिट करवाकर पाक के साथ नए सम्बन्ध बनाने हेतु एक नए युग की शुरुआत की लेकिन ये मित्रता अधिक दिनों तक नहीं चल सकी। पाकिस्तानी सेना ने कारगिल क्षेत्र में बड़ी घुसपैठ की जहाँ  पाक को हार का सामना करना पड़ा। इस विजय का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी के खाते में गया जिसके बाद 1999 के लोकसभा के आम चुनावों में भाजपा फिर सबसे बड़ी पार्टी बनी और मिली जुली सरकार बनायी। कारगिल युद्ध के दौरान भी उन्होंने पाकिस्तान को संदेश दिया कि हम युद्ध नहीं चाहते, लेकिन अगर मजबूर किया गया तो जवाब देंगे।

अटल की विदेश नीति जबरदस्त रही। उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत ने कई वैश्विक मंचों पर अपनी ताकत दिखाई। उनके नेतृत्व में भारत वैश्विक राजनीति के केंद्र में स्थापित हुआ जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता मिली। अटलबिहारी वाजपेयी  गठबंधन की राजनीती के सबसे बड़े जनक रहे। दो दर्जन से अधिक दलों को साथ लेकर सरकार चलाना बहुत कठिन काम उस दौर में समझा गया लेकिन अटल जी ने अपनी दूरदृष्टि से यह संभव कर दिखाया। उनकी सरकार ने गठबंधन की राजनीति को एक नई राह दिखाई। अटल में सबको साथ लेकर चलने की जबरदस्त कला थी जो उन्होनें अपनी गठबंधन सरकार के कुशल नेतृत्व के माध्यम से पूरी दुनिया को दिखाया। अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व एक उदार चरित्र का प्रतीक था। उनके भाषणों में गहरी सोच और गहराई दिखाई देती थी साथ ही उनका कवि दिल इस भाषण की कला में चार चाँद लगा देता था। अटल समाज के वंचित और शोषित तबके की आवाज को मुखरता के साथ उठाया करते थे। उन्होनें अपने पूरे जीवन में राजनीति को जनसेवा के एक साधन के रूप में देखा। उनकी राजनीती में सुशासन,के गुण दिखाई देते थे। वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के प्रति भी सम्मान का भाव रखते थे शायद यही वजह रही कि उन्हें राजनीति के अजातशत्रु कहा गया। अटल ने भारत के चारों कोनों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए तत्कालीन केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री बी. सी. खंड़ूडी के नेतृत्व में स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की शुरुआत की। उनकी सरकार ने सुशासन को सही मायनों में साबित करके दिखाया और गाँव के अंतिम छोर तक विकास की किरण पहुंचाने का काम किया। अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता के लिए नहीं, बल्कि देश के लिए जीते थे।

उनके प्रधानमंत्रित्व काल में भारत-अमेरिका संबंधों में नया अध्याय जुड़ा जब 2000 में बिल क्लिंटन की भारत यात्रा हुई और 2001 में जॉर्ज बुश के साथ निकटता से संबंधों में बड़ी गर्मजोशी आई जिससे परमाणु समझौते की नींव पड़ी जो बाद में मनमोहन सरकार में पूर्ण हुआ। अटल की सरकार ने के रहते देश में हर क्षेत्र में विकास की नई गौरवगाथा लिखी गई। 2004 में जब लोकसभा चुनाव हुआ तब उनके नेतृत्व में शाइनिंग इंडिया और फील गुड फैक्टर का नारा देकर चुनाव लड़ा गया लेकिन इन चुनावों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी और भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति से सन्यास ले लिया।

अटल नेतृत्व क्षमता ने देश की राजनीति को एक नई ऊँचाई पर पहुंचाया। वे भारतीय राजनीति के ऐसे सितारे कहे जा सकते हैं जिनकी चमक और धमक देश की राजनीती में हमेशा बनी रहेगी। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2015 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में एक ऐसे नेता थे जिन्होंने कविता की भाषा में राजनीति की और राजनीति की भाषा में कविता की। उन्होंने कट्टरता से दूर रहकर समावेशी राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व किया। उनकी सबसे बड़ी विरासत यह रही कि उन्होंने भारत को वैश्विक मंच पर एक आत्मविश्वासी और सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।

अटल का 16 अगस्त 2018 को 93 साल की उम्र में दिल्ली के एम्स में इलाज के दौरान निधन हो गया। उनका व्यक्तित्व हिमालय के समान विराट था। विरोधी को भी साथ ले कर चलने की उनकी भावना का हर कोई मुरीद था। सही मायनों में अगर कहा जाए तो  अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष थे। देश अटल जी के योगदान को कभी भुला नहीं पायेगा। वाजपेयी जी एक संवेदनशील कवि, एक राष्ट्रवादी पत्रकार, जननेता, राष्ट्रनायक थे।आज जब हम राजनीति में नफरत, तिरस्कार और ध्रुवीकरण देखते हैं तब अटल का व्यक्तित्व संयम, गरिमा, मानवता और देशभक्ति का जीता-जागता प्रतीक बन जाता है। भारत ने कई प्रधानमंत्री देखे लेकिन अटल सरीखा दूसरा  नेता नहीं देखा।

 

Sunday, 7 December 2025

मोहन के विरासत से विकास मंत्र से अब बुंदेलखंड को मिलेगी नई रफ्तार

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जब से प्रदेश की कमान संभाली है, तब से उनकी कार्यशैली और दूरदर्शिता ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। जल की कमी, खराब सड़कें और औद्योगिक पिछड़ापन दशकों से बुंदेलखंड की सबसे बड़ी त्रासदी रहे हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पद संभालते ही प्रदेश के हर क्षेत्र को समान रूप से विकसित करने का संकल्प लिया है। डॉ. मोहन यादव ने सत्ता संभालते ही बुंदेलखंड को अपनी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखा। बुंदेलखंड क्षेत्र, जो दशकों से उपेक्षा और पिछड़ेपन का दंश झेलता आ रहा था, अब मोहन के नेतृत्व में एक नई उड़ान भरने को तैयार है।


बुंदेलखंड की सबसे बड़ी समस्या जल संकट रहा है। इसे प्राथमिकता देते हुए मोहन सरकार ने अपने कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को गति दी है। एक तरफ केन-बेतवा लिंक परियोजना को अभी तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है वहीँ दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह और सागर जिलों में कई सिंचाई योजनाओं को मंजूरी दी गई है। इसी प्रकार नदियों और तालाबों के जीर्णोद्धार के साथ-साथ जल संग्रहण संरचनाओं का निर्माण भी तेज हुआ है। पिछले दो वर्षों में सरकार ने न केवल केंद्रीय योजनाओं को गति दी, बल्कि राज्य स्तर पर अभूतपूर्व प्रयास किए हैं। 2024 में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना सरीखी राष्ट्रीय परियोजना को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने केंद्र और राज्य स्तर पर समन्वय स्थापित कर तेजी से आगे बढ़ाया है। इस परियोजना से बुंदेलखंड के 13 जिलों में 10.62 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। आने वाले दिनों में नर्मदा-सोनार लिंक परियोजना भी बुंदेलखंड के लिए वरदान साबित होगी जिससे यहाँ का जलसंकट हमेशा के लिए दूर हो जाएगा। सोनार नदी को नर्मदा से जोड़ने का सर्वे जल्द शुरू होगा। इससे बुंदेलखंड की सूखी नदियां कभी न सूखेंगी और क्षेत्र की धरती पहले से कहीं अधिक उपजाऊ बनेगी। इसी तरह से पार्वती-कालीसिंध-चंबल नदी जोड़ो परियोजना और ताप्ती बेसिन मेगा रिचार्ज परियोजना भी बुंदेलखंड के पानी के संकट को समाप्त कर देंगी। महाराष्ट्र के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर हो चुके हैं जिससे बुंदेलखंड के समूचे अंचल में पेयजल और सिंचाई की समस्या हल हो जाएगी। 

बुंदेलखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी रही है कि यहां पहुंचना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसका कायाकल्प करने की ठानी दशकों से सूखा और पिछड़ापन इस क्षेत्र की पहचान बने थे अब इस क्षेत्र में पिछले डेढ़ वर्षों में सड़क, रेल और हवाई संपर्क ने अभूतपूर्व विकास किया है। ख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बुंदेलखंड को कनेक्टिविटी की नई गति दी है। सागर-दमोह-कटनी-लखनादौन को जोड़ने वाली चार लेन सड़क परियोजना को मंजूरी हो या टीकमगढ़ से सागर तक नई रेल लाइन और छतरपुर-टीकमगढ़-झांसी रेल लाइन का विस्तार कनेक्टिविटी में अब बुंदेलखंड किसी भी तरह से पीछे नहीं है। खजुराहो,दतिया सागर और ग्वालियर एयरपोर्ट के उन्नयन और नए हवाई अड्डों की कार्ययोजना ने बुंदेलखंड की हवाई कनेक्टिविटी को मजबूत किया है। डेढ़ दशक से रुके प्रोजेक्ट अब रिकॉर्ड समय में पूरे हो रहे हैं। बुंदेलखंड की कनेक्टिविटी बेहतर होने से यहाँ पर्यटन, उद्योग और रोज़गार के नए द्वार खुल रहे हैं। बेहतर कनेक्टिविटी होने से यहाँ पर अब परियोजनाएं न केवल आवागमन को आसान बनाएंगी, बल्कि पर्यटन और व्यापार को भी बढ़ावा देंगी।

 मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की दूरदर्शिता और दृढ़ संकल्प ने बुन्देलखंड में शिक्षा, स्वास्थ्य क्षेत्र में कई ऐतिहासिक पहल की हैं। चिकित्सा महाविद्यालयों में एमबीबीएस और पीजी मेडिकल सीटों की संख्या में वृद्धि से लेकर तकनीकी रूप से उक्त स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार तक राज्य ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। एक तरह जहाँ पन्ना, दमोह और टीकमगढ़ में नए मेडिकल कॉलेज शुरू हुए हैं वहीँ सागर में कैंसर हॉस्पिटल की घोषणा के साथ ही हर जिले में उच्च स्तरीय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना जैसे कदम बुंदेलखंड के युवाओं को को घर के पास ही अच्छी शिक्षा और इलाज की सुविधा देंगे।प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत के मिशन के साथ कदम से कदम मिलाते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बुंदेलखंड को शिक्षा, स्वास्थ्य क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए जो कार्य कर रहे  हैं, वे आने वाले वर्षों में  बुंदेलखंड की सूरत को बदलकर रख देंगे।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बुंदेलखंड को निवेश के लिए आकर्षक गंतव्य बनाने पर जोर दे रही है। इसी कड़ी में सागर में रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव आयोजित किया जा चुका है। प्रदेश में औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करना और निवेशकों को आकर्षित करना इस आयोजन का मुख्य लक्ष्य था। इस कॉन्क्लेव में लगभग 23,000 करोड़ के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए और 27,800 से अधिक रोजगार के अवसर पैदा हुए। डिफेंस कॉरिडोर के तहत टीकमगढ़ और झांसी में कई बड़े प्रोजेक्ट पर कार्य प्रगति पर है वहीँ खजुराहो, ओरछा, पन्ना टाइगर रिजर्व और चंदेरी के पर्यटन सर्किट को विश्वस्तरीय बनाने की कार्ययोजना पर राज्य सरकार काम कर रही है। बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे जैसे बड़े प्रोजेक्ट से यह क्षेत्र दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर से जुड़ेगा जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और पलायन की समस्या कम होगी।

विरासत से विकास के अपने मिशन और सांस्कृतिक धरोहरों को नई ऊंचाइयों पर ले जाते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अगुवाई में राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक 9 दिसंबर को खजुराहो में आयोजित होगी। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में विख्यात खजुराहो की प्राचीन मंदिर वास्तुकला और चंदेल राजवंश की अमर विरासत के बीच होने वाली यह बैठक न केवल प्रशासनिक समीक्षा का मंच बनेगी, बल्कि 'विरासत से विकास' के संकल्प को मजबूत करने का प्रतीकात्मक संदेश भी देगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'विरासत भी और विकास भी' के दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में यह कदम मध्य प्रदेश सरकार की प्रतिबद्धता को उजागर करता है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पूर्व की बैठकों में बार-बार जोर दिया है कि राज्य का विकास प्राचीन गौरव को नष्ट किए बिना ही संभव है। पचमढ़ी और इंदौर जैसी पिछली कैबिनेट बैठकों की तर्ज पर खजुराहो में भी सांस्कृतिक पुनरुत्थान और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के संयोजन पर विशेष फोकस होगा। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए और स्थानीय कारीगरों के लिए कौशल विकास योजनाओं पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं। यह आयोजन न केवल प्रशासनिक दक्षता को परखेगा, बल्कि मध्य प्रदेश को 'विरासत से विकास' की मिसाल के रूप में स्थापित करेगा।मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का बुंदेलखंड के प्रति विशेष लगाव और संवेदनशीलता साफ दिखाई देती है। वे स्वयं अधिकारियों को समय-सीमा में इस इलाके की कई परियोजनाएं पूरी करने के निर्देश दे रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की दूरगामी सोच और त्वरित निर्णय लेने की शैली ने यह विश्वास जगाया है कि अब बुंदेलखंड पिछड़ापन का पर्याय नहीं रहेगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में यह क्षेत्र न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए विकास का नया मॉडल बनेगा।



Sunday, 16 November 2025

मोहन यादव का बिहार विधानसभा चुनावों में चला जादू, एनडीए जबरदस्त बढ़त की ओर

एनडीए के लिए  'लकी चार्म'  साबित हुए डॉ. मोहन यादव


भारतीय राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे उभरते हैं जो न केवल आम कार्यकर्ता की भांति जहाँ अपनी पार्टी की कमान संभालते हैं बल्कि  स्टार प्रचारक बनकर पूरी चुनावी बिसात को बदलकर रख देते हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव एक ऐसा ही नाम हैं जिसने बिहार  विधानसभा चुनावों में खुद की उपयोगिता को  साबित कर दिखाया है।  बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के लिए डॉ. मोहन यादव ' लकी चार्म'  साबित हुए हैं। जहां जहां उनकी सभाएं हुई, वहां एनडीए के पक्ष में जबरदस्त  लहर दिखाई दे रही है। यह जादू केवल वोटों का नहीं, बल्कि बिहार की जनता के मन में एनडीए सरकार के प्रति  अटूट  विश्वास का प्रतीक है ।एमपी सीएम डॉ. मोहन यादव ने बिहार की  25 विधानसभा सीटों में प्रचार किया जिसमें से  21  पर एनडीए आगे दिख रहा है ।

 तूफानी प्रचार के साथ  सांस्कृतिक जुड़ाव बनी मोहन की बड़ी यूएसपी 

 मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने  अक्टूबर से नवंबर तक बिहार के कोने-कोने में धुंआधार प्रचार किया। पटना की कुम्हार ,बिक्रम , मनेर से लेकर मधेपुरा, गया, मधुबनी, बांका, सिकटा , बगहा , सहरसा , मनेर , बाकीपुर , पिपरा ,मोतिहारी, बोधगया  और मधेपुरा तक कुल 25  से अधिक सीटों पर उनकी रैलियां, जनसभाएं  और रोड शो किये।  उनकी सभाओं का आकर्षण उनकी सहजता और सांस्कृतिक जुड़ाव रहा । यादव समुदाय के वोट बैंक को लक्षित करते हुए उन्होंने बिहार की माताओं-बहनों को शराबबंदी और 10 हजार रुपये की सहायता योजना की उपलब्धियां गिनाई। मोहन ने  मोदी सरकार की उपलब्धियों को  जनता के बीच रखा और सबका साथ -सबका विश्वास उनका मूल  मंत्र था। 

पश्चिम चंपारण के बगहा, सहरसा और सिकटा में  मोहन ने  लालू प्रसाद यादव पर 'कंस' की उपमा देकर तीखा प्रहार किया। "बिहार को लूटने वालों को घर में घुसकर घोड़ा पछाड़ देंगे" उनकी यह ललकार सोशल मीडिया पर वायरल हो गई  साथ ही बिहार चुनाव परिवारवाद बनाम राष्ट्रवाद की जंग है," उनका ये  नारा भी खूब वायरल हुआ। छठ महापर्व को 'ड्रामा' बताने वालों पर  मोहन ने तीखा प्रहार किया वहीँ नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर सीधा निशाना साधने से मोहन नहीं चूके।  चुनाव बिहार में, लेकिन पप्पू पचमढ़ी में  कहकर उन्होंने नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की चुटकियां ली । कांग्रेस की हालत  उन्होंने बिन दूल्हे की बारात जैसी बताई।  यह प्रचार केवल भाषणों तक सीमित न रहा। मोहन यादव की सभाओं में जनसैलाब उमड़ा।  खासतौर पर यादव वोटरों का रुख बदलने में उनका  बड़ा योगदान रहा।  देश के एकमात्र यादव मुख्यमंत्री के रूप में उनकी एंट्री ने न सिर्फ एनडीए के प्रचार अभियान को नई गति दी  बल्कि विपक्ष के यादव वोटबैंक में सेंध लगाई। 

रुझानों  में दिखा 'मोहन फैक्टर'


बिहार विधानसभा चुनावों के परिणामों में एनडीए दो-तिहाई बहुमत की ओर अग्रसर है। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बन चुकी है और जनता दल (यूनाइटेड) इसकी मजबूत साथी। मोहन यादव का 'जादू' आंकड़ों में झलक रहा है।  जहाँ - जहां उन्होंने प्रचार किया वहां एनडीए प्रत्याशी आगे चल रहे हैं। कटोरिया, नाथनगर, आलमनगर, पिपरा, बेलहर जैसी सीटें इसका प्रमाण हैं।  बिहार में यादव वोटों का दबदबा है और रुझान बता रहे हैं लालू-तेजस्वी की पार्टी पर सेंध लगाने के लिए यादव सीएम मोहन यादव  का चेहरा सबसे कारगर साबित हो रहा है। मिशन बिहार  के तहत डॉ. मोहन यादव, यादव और ओबीसी  बाहुल्य सीटों पर अपनी हुंकार भरी । स्टार प्रचारक के तौर पर वह दिल्ली,  उत्तर प्रदेश, हरियाणा, जम्मू और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ओबीसी समुदाय को बड़ा संदेश देने में सफल रहे हैं और अब बिहार चुनावों में भी उन्होनें खुद को साबित कर दिखाया है।  

रुझानों  पर बोले  मोहन :  पीएम मोदी  के नेतृत्व में भाजपा और एनडीए की लहर चल रही है

एमपी सीएम  डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम के रुझान वास्तव में उत्साहवर्धन करने वाले है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश ने 2014 के बाद नए प्रकार की विकासपरक राजनीति का दौर देखा है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में एक-एक करके तीनों लोकसभा चुनाव में एनडीए को प्रचंड बहुत मिला।भाजपा ने दिल्ली में भी अपनी सरकार बनाई है। उसी सिलसिले को जारी रखते हुए तीसरी बार बिहार में फिर एनडीए सरकार की वापसी हो रही है।पूर्ववर्ती समय में हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली और अब बिहार यह बता रहा है कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भाजपा और एनडीए की लहर चल रही है।मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने न केवल देश के विकास बल्कि देश की सुरक्षा के लिए जो नीतियां लागू की है, वह वाकई हम सभी का मनोबल बढ़ाने वाली है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि बिहार चुनाव में ऐतिहासिक जीत के साथ भाजपा ने अपनी अलग पहचान बनाई है। भाजपा सबसे ज्यादा सीटें जीतकर नंबर वन पार्टी बनी है। दूसरा हमारा सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड है।

बिहार की राजनीति हमेशा से ही जातिगत समीकरणों पर आधारित रही है। डॉ. मोहन यादव की स्टार प्रचारक भूमिका एनडीए के लिए  लाभ का सौदा  साबित हुई  है। मोहन यादव ने बिहार चुनावों में  न केवल यादव वोटों को एकजुट किया, बल्कि पूरे एनडीए को मजबूत बनाया। आज जब रुझान एनडीए की तीसरी लगातार जीत की  पटकथा  लिख रहे हैं, तो एमपी सीएम डॉ. मोहन यादव का  का कद राष्ट्रीय राजनीती में तेजी से बढ़ गया है। उनकी स्टार प्रचारक की  भूमिका न केवल भाजपा को मजबूती देगी, बल्कि राष्ट्रीय फलक पर  एक नया आयाम भी जोड़ेगी।

Monday, 3 November 2025

एनडीए का मिशन बिहार, एमपी सीएम मोहन करेंगे कामयाब

6 और 11 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) अपनी रणनीति को मजबूत करने में जुटा है। एनडीए के इस मिशन बिहार के केंद्र में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव आ गए हैं।  डॉ. मोहन यादव इन दिनों बिहार की यादव बिरादरी को लुभाने के साथ-साथ पीएम मोदी के विकास कार्यों, एनडीए की विकास-केंद्रित छवि को मजबूत करने में लगे हैं। उनकी सभाओं में उमड़ती जनता की विशाल भीड़ और जोशीले भाषण बिहार में एनडीए की हैट्रिक लगाने का दावा मजबूती से कर रहे हैं।

स्टार प्रचारक मोहन के रंग में रंगा बिहार चुनाव

मध्यप्रदेश  के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को भाजपा ने स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल किया है। प्रदेश के सीएम डॉ.मोहन यादव  बिहार जाकर पहले चरण की तीन विधानसभा सीटों पर एनडीए के लिए वोट मांग चुके हैं  साथ ही तेजस्वी यादव और लालू प्रसाद पर सीधा हमला करने से नहीं चूके हैं। इस बार के बिहार चुनाव में  मध्यप्रदेश के मोहन एनडीए के 'ट्रंप कार्ड' साबित हो रहे हैं। यादव समुदाय के एक प्रमुख नेता के रूप में वे बिहार के यादव वोट बैंक के साथ ओबीसी के बड़े वोट बैंक को एनडीए की ओर मोड़ने का प्रयास कर रहे।  एक ऐसा वोट बैंक जो परंपरागत रूप से आरजेडी का दशकों तक गढ़ रहा है।

बिहार का दंगल ..एमपी सीएम 'मोहन' करेंगे 'मंगल'

डॉ.मोहन यादव का बिहार में प्रचार एनडीए की एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। उत्तर प्रदेश, दिल्ली,  हरियाणा, जम्मू , झारखण्ड , महाराष्ट्र के चुनावों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के बाद अब बिहार चुनाव में भी मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को एक बड़ी जिम्मेदारी मिली है। मिशन बिहार  के तहत डॉ. मोहन यादव, यादव और ओबीसी  बाहुल्य सीटों पर  अपनी हुंकार भरते देखे जा सकते हैं। स्टार प्रचारक के तौर पर वह दिल्ली,  उत्तर प्रदेश, हरियाणा, जम्मू और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ओबीसी समुदाय को बड़ा संदेश देने में सफल रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनावों में डॉ. मोहन यादव की इंट्री से समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। एनडीए ने जीत के लिए विशेष रणनीति तैयार की है जिसमें मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का नाम भी स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल है। अब बिहार की यादव बाहुल्य 50 से अधिक सीटों पर एनडीए को जीत दिलाने की जिम्मेदारी डॉ. मोहन यादव के कन्धों पर है।

यादव वोट बैंक में 'मोहन' की सेंधमारी

एनडीए की रणनीति यादव, राजपूत और अन्य पिछड़ा वर्ग के वोटों को एकजुट कर महागठबंधन को कमजोर करना है। बिहार के राजनीतिक अखाड़े में फिलहाल 'मोहन' अपना दम दिखाते नजर आ रहे हैं। डॉ. मोहन यादव की ललकार बिहार की राजनीति में एक टर्निंग पाइंट साबित हो रही है जो आने वाले दिनों में कहीं न कहीं राजद में  लालू यादव और तेजस्वी यादव के यादव वोट बैंक में मोहन सेंधमारी कर सकती है। डॉ.मोहन यादव उसी यादव बिरादरी से हैं जहाँ की राजनीति में मुस्लिम के साथ यादव फैक्टर सबसे असरदार है। बिहार की राजनीति 14 फीसदी यादवों का वोट है और ओबीसी का 64 फीसदी। मोहन यादव इस बड़े वोट बैंक पर अपना असर छोड़ सकते हैं। इसी रणनीति के तहत डॉ. मोहन यादव को उन सीटों पर प्रचार के लिए उतारा जा रहा है जहाँ यादवों तादात अधिक है जो आरजेडी का कोर वोट बैंक है।  

90 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने मुस्लिम-यादव (एम-वाई) समीकरण के बल पर सत्ता का किला मजबूत किया। तीन दशक तक बिहार की राजनीती में आरजेडी अपने मुस्लिम और यादव यानी 'माई ' समीकरणों के जरिए राज करती रही। उस दौर में जंगलराज के लिए बिहार जाना जाता था। यह किला इतना अटूट लगता था कि विपक्षी दलों के लिए इसे भेदना असंभव-सा था लेकिन नीतीश कुमार ने 2005 में सत्ता हासिल करते हुए इस किले को ध्वस्त करने का ऐतिहासिक काम किया। उन्होंने लव-कुश समीकरण यानी कुर्मी (लव) और कोइरी-कुशवाहा (कुश) जातियों का गठबंधन के सहारे न केवल लालू की जातीय राजनीति को चुनौती दी बल्कि बिहार में 'सुशासन'  की लहर पर सवार होकर विकास की नई गौरवगाथा लिखने का काम किया। लव-कुश समीकरण के दम पर नीतीश ने लालू की जातिवादी राजनीति को नकारते हुए विकास का एजेंडा चलाया। एक तरफ साइकिल योजना, महिलाओं को 50% पंचायत आरक्षण, सड़क-बिजली-पानी जैसी बुनियादी योजनाओं ने पिछड़ी जातियों को नीतीश ने  लाभ पहुंचाया वहीँ दूसरी तरफ कुर्मी-कोइरी समुदायों को शिक्षा, कौशल विकास और छात्रवृत्ति योजनाओं से सशक्त किया।  परिणामस्वरूप  2005 से 2020 तक जेडीयू का वोट शेयर स्थिर रहा जबकि आरजेडी हाशिए पर चली गई। नीतीश ने लालू की जातीय राजनीती के  मिथक को बिहार में तोड़ा और बिहार को अपने विकास कार्यों से नई  दिशा दी। हालांकि 2015 में महागठबंधन ने जेडीयू के साथ अस्थायी रूप से गठबंधन कर लिया लेकिन 2017 में नीतीश ने फिर लव-कुश को मजबूत रखते हुए एनडीए का रुख किया। 

 'एमवाई फैक्टर' पर भारी 'वाई ' यानी मोहन फैक्टर

बिहार में 'वाई'  यादव समाज 14 फीसदी है। यह वोट बैंक हमेशा से चुनावी हार जीत के समीकरणों  का केंद्र रहा है। 2020 के चुनाव में आरजेडी ने यादव वोटों के दम पर 75 सीटें जीतीं  जबकि भाजपा को 74 मिली।  2024 के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने हिंदुत्व, विकास और केंद्रीय योजनाओं के सहारे यादवों का एक हिस्सा खींच लिया। जन सुराज पार्टी भी इस बार यादव-मुस्लिम (एमवाई) समीकरण को चुनौती दे रही है लेकिन मुख्य लड़ाई एनडीए और महागठबंधन के बीच है। इस बार 'वाई फैक्टर' की सफलता एनडीए के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यादव समाज में सेंध लगाने से आरजेडी का कोर वोटबैंक कमजोर पड़ सकता है। एनडीए ने ‘वाई फैक्टर’ को कैश करने के लिए डॉ.मोहन यादव जैसे चेहरे को स्टार प्रचारक बनाकर एक बड़ा सन्देश पूरे बिहार में देने का काम किया है।

एनडीए का तुरूप का इक्का साबित होंगे 'मोहन'

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इस बार के बिहार विधानसभा चुनावों में एनडीए  का 'ट्रंप कार्ड' बने हुए हैं। अभी तक डॉ. मोहन यादव बिहार की तीन विधान सभाओं का दौरा कर चुके हैं। सीएम मोहन 16 अक्टूबर को कुम्हार और विक्रम विधानसभा सीटों पर संजय गुप्ता और सिद्धार्थ सौरभ के पक्ष में विशाल जनसभा को सम्बोधित किया। 17 अक्टूबर को भी सीएम मोहन ने गया टाउन से डॉ. प्रेम कुमार  हिसुआ से अनिल सिंह के पक्ष में जनसभा किया। 24 अक्टूबर को बगहा, सिकरा  और सहरसा विधानसभा में भी अपनी हुंकार भरी। कुम्हरार और बिक्रम विधानसभा क्षेत्र की जनसभा में उन्होंने कहा, "बिहार अब नई सुबह की ओर अग्रसर है। एनडीए सरकार ही विकास का माध्यम है।" उन्होंने कहा हमारी पार्टी में चाय बेचने वाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है, क्योंकि यहां लोकतंत्र है। डॉ.यादव ने महागठबंधन पर तीखा प्रहार करते हुए महागठबंधन को 'महाठगबंधन' कहकर निशाना साधा और महागठबंधन को लोकतंत्र के दुश्मन करार दिया और कहा एनडीए को वोट देकर बिहार को मजबूत बनाएं।" पश्चिम चंपारण के बगहा, सहरसा और सिकटा पहुंचे जिन्होनें एआरजेडी चीफ लालू प्रसाद यादव पर 'कंस' की उपमा देकर तीखा प्रहार किया। "बिहार को लूटने वालों को घर में घुसकर घोड़ा पछाड़ देंगे"।  उनकी यह ललकार सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। 

29 अक्टूबर को बांका के कटोरिया, भागलपुर के नाथनगर और मधेपुरा के आलमनगर में उन्होंने तीन सभाएं कीं। यहां उन्होंने कांग्रेस पर 'हिंदू-मुस्लिम बंटवारे' का आरोप लगाते हुए कहा, "सालों तक अयोध्या पर सियासत की, लेकिन राम मंदिर बना तो एक चींटी भी नहीं मरी। मथुरा में भी यही होगा।" मध्य प्रदेश और बिहार के ऐतिहासिक रिश्ते का जिक्र करते हुए उन्होंने भगवान कृष्ण के उज्जैन से बिहार के सूर्य मंदिर तक के कनेक्शन को जोड़ा।31 अक्टूबर को पटना के मानेर और दीघा में सभाएं हुईं, जहां जनसैलाब उमड़ा। "बिहार चुनाव परिवारवाद बनाम  राष्ट्रवाद की जंग है उनका यह नारा  सबकी  जुबान पर चढ़ा । 

 2 नवंबर को मधुबनी के फुलपरास और पटना के फतुहा में रोड शो के साथ सभाएं कीं। फुलपरास में जेडीयू प्रत्याशी शीला मंडल के समर्थन में उन्होंने मधुबनी पेंटिंग की तारीफ की और कांग्रेस को ललकारा, "जब घर आएं तो पूछो, मथुरा में कृष्ण मंदिर का समर्थन क्यों नहीं?" 

बिहार में यादव वोटों का दबदबा है, और लालू-तेजस्वी की पार्टी पर सेंध लगाने के लिए मोहन यादव  का चेहरा सबसे कारगर साबित हो रहा है।'वाई फैक्टर' बिहार में कामयाब हो सकता है अगर डॉ. मोहन यादव यादव समाज के बड़े वोट खींच लें  जो एनडीए की जीत सुनिश्चित कर देगा। उनका जादू हिंदुत्व, विकास और जातिगत अपील का मिश्रण है जो बिहार के यादव बहुल इलाकों में असर दिखा रहा है।

विकास कार्यों को जीत की गारंटी बना रहे ‘मोहन’  

बिहार की जनसभाओं में डॉ. मोहन यादव के भाषणों का केंद्र बिंदु विपक्ष की कमियां रही हैं। वह यह कहने से नहीं चूक रहे महागठबंधन विकास नहीं, केवल जातिवाद और भ्रष्टाचार की राजनीति करता है। आरजेडी को 'जंगलराज' का प्रतीक बताते हुए वह कांग्रेस को 'परिवारवाद' का दोषी ठहराने से नहीं कतरा रहे। "एक परिवार से पीएम क्यों? हमारा लोकतंत्र सबका है जैसे उनके सधे हुए बयान बिहार में पहली बार वोट डालने जा रही नई युवा पीढ़ी को अपनी तरफ आकर्षित कर रहे हैं साथ ही वे बिहार की सांस्कृतिक विरासत को भगवान राम और कृष्ण से जोड़ते दिखाई देते हैं जो एनडीए की हिंदुत्व-केंद्रित अपील को मजबूत कर रहा है। मोहन यादव के दौरे जहां  एनडीए के पक्ष में जा रहा है वहीं विपक्ष में हड़कंप मचा है।

एनडीए की बिहार चुनावों की नई बिसात के केंद्र में डॉ. मोहन यादव है जो यादव समाज की जातीय गोलबंदी को तोड़कर महागठबंधन के मंसूबों पर पानी फेर सकते हैं। बेहद कम समय में अपने कामकाज के माडल से पूरे देश में डॉ. मोहन यादव ने एक नई पहचान बनाई है। समाज के ओबीसी तबके में उनकी सर्वस्वीकार्यता और लोकप्रियता हाल के दिनों में तेजी से बढ़ी है। एनडीए उनकी इस लोकप्रियता को उन राज्यों में भुनाने की तैयारी में है जहां यादव वोट निर्णायक है। इसके जरिए एनडीए महागठबंधन के जातीय राजनीती के दांव को चित करना चाहती है। डॉ. मोहन यादव की जनसभाओं में उमड़ने वाला सैलाब एनडीए की एकजुटता और बिहार को विकास की नई रफ़्तार पर ले जाने का संकल्प ले रहा है।

Saturday, 27 September 2025

नवरात्र : शक्ति की आराधना का महापर्व


नवरात्र भारतीय संस्कृति में एक पवित्र पर्व है जो दैवीय शक्ति की विजय का प्रतीक माना जाता है। यह नौ रातों और दस दिनों का उत्सव माँ दुर्गा की पूजा और उनके नौ रूपों के सम्मान में मनाया जाता है। नवरात्र का अर्थ है नौ रातें और यह पर्व वर्ष में दो बार चैत्र मार्च-अप्रैल और शारदीय सितंबर-अक्टूबर में उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह उत्सव न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है जो बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है। 

 
एक ही परम तत्व परमपुरुष पराशक्ति के रूप में सर्वत्र व्यापक है।  शास्त्रकारों ने एक ही  शक्ति को कभी पुरुष के रूप में तो कभी देवी के रूप में स्वीकारा है। सब के घट में एक समान विराजमान वह  दिव्य शक्ति प्रकाश के रूप में हमेशा मौजूद रहती है जिसे जीवन शक्ति कहा जाता है और उसका दर्शन होना ही शक्ति की आराधना है। दुष्टों का  संहार करके भक्तों की रक्षा करने हेतु कभी काली तो कभी दुर्गा  के रूप में उस शक्ति का अवतरण इस धरा पर हुआ है। दुर्गा जी की पूजा  अर्चना का विधान वेद, पुराण, उपनिषदों हिन्दुओं के अन्य धर्मशास्त्रों में भी मिलता है। वेद में 'एकोएहं बहुस्याम' और 'अजाय मानों बहुधा  ब्यजायत ' के रूप में और देवी पुराण में 'सा वाणी साच सावित्री विप्राधिष्ठात' वहां सर्व दुर्गा के रूप में संस्थापित है। मार्कण्डेय पुराण में स्वयं मान जएकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का ममापरा। पश्यैता दुष्ट मय्येव विशन्त्यो मद्विभूतयः अर्थात मैं ही दुर्गा हूँ , सर्वशक्ति स्वरूपा हूँ और मुझमें ही पूरी सृष्टि विलीन है। आशय यह है कि यह विशाल सृष्टि उत्पन्न होती है, बढ़ती है और विभिन्न रूपों में परिवर्तित होकर  अंत में विनिष्ट हो जाती है। 
 
देवी पुराण में एक बड़े रोचक कथा प्रसंग की चर्चा की गयी है। अक्सर भ्रम में पड़  जाने वाले देवर्षि नारद को एक बार भ्रम हो गया।  ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों सर्वश्रेष्ठ हैं तो भला ये तीनों किस महाशक्ति का स्मरण करते हैं ? नारद जी अपने सन्देश निवारण हेतु शिव के पास गए और बोले मुझे ब्रह्मा, विष्णु और महेश से बढ़कर कोई अन्य देवता नहीं दिखाई देता है फिर आप तीनों से ऊंचा कौन है जिसकी उपासना और स्मरण आप करते हैं ? शिव मुस्कुराये और बोले  हे ऋषिवर सूक्ष्म और शूल शरीर से परे जो महाप्राण आदिशक्ति जगदम्बा  है वही तो परब्रह्म स्वरुप है। वह केवल अपनी इच्छा मात्र से ही  सृष्टि की रचना, पालन और संहार करने में समर्थ है। वस्तुतः वह आदिशक्ति दुर्गा निर्गुण स्वरूप है परन्तु उसे किसी भी रूप मे मन समय -समय पर धर्म की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए साकार होना पड़ता है। इसी  समय-समय पर पार्वती,दुर्गा,काली, चंडी, सरस्वती आदि अवतार धारण किये हैं।  इसी जगत जननी का सभी देव भी स्मरण करते हैं। वैसे भी आदिशक्ति स्वरुप दुर्गा में सभी  देवताओं का कुछ न कुछ अंश शामिल है।

दुर्गाशप्तशती के दूसरे अध्याय में देवी स्वरुप का वर्णन करते हुए बतलाया गया है भगवान शंकर के तेज से उस देवी का मुख प्रकट  हुआ। यमराज के तेज से मस्तक के केश, विष्णु के तेज से भुजाएं, चन्द्रमा के तेज से स्तन, इंद्रा के तेज से कमर, वरुण के तेज से जंघा, पृथ्वी के तेज से  नितम्ब, ब्रह्म के तेज से चरण, सूर्य के तेज से दोनों पैरों की अंगुलियां, वसुओं के तेज से दोनों हाथों की अंगुलियां, प्रजापति के तेज से सम्पूर्ण दांत, अग्नि के तेज से दोनों नेत्र, संध्या के तेज से भौहें, वायु के तेज से कान, अन्य देवताओं के तेज से देवी के भीं- भीं अंग बने।  इसी प्रकार सभी अमोघ शक्तियों से दुर्गा के रूप में एक आदिशक्ति का सृजन किया  गया इसलिए यह स्वरुप सभी देवताओं के लिए स्मरणीय हो गया।  आज दो नवरात्रि के रूप में माँ जगदम्बा की पूजा शारदीय और वासंतीक दोनों नवरात्र दोनों में जारी है। शारदीय नवरात्र आश्विन मास में और वासंतिक नवरात्र अभी चैत्र माह में होते हैं। चैत्र वर्ष प्रतिपदा से हिन्दुओं का नया संवत्सर शुरू होता है।  दोनों नवरात्र का समान  महत्व  है। नौ दिन और नौ रातों तक  माँ दुर्गा के नौ अलग -अलग रूपों की पूजा की जाती है।  यह आज तक रहस्य बना हुआ है।  दुर्गा की पूजा सबसे  पहले राम ने की या किसी अन्य ने लेकिन इतना तय है लंका पर चढ़ाई और रावण वध से पहले राम ने आदिशक्ति स्वरूप मानकर दुर्गा जी  की पूजा की। यह स्थान भी रामेश्वरम के नाम से जाना जाता है। नवरात्र महोत्सव आसुरी शक्ति पर दैवीय शक्ति की विजय का प्रतीक है। नवरात्र में प्रथमा से लेकर नवमी तक शक्ति के 9 स्वरूपों की पूजा -अर्चना होती है। ये नौ शक्तियां बहनों का स्वरुप हैं और इन नौ शक्तियों के विभिन्न नाम रूप के कारण शारदीय  नवरात्र  उत्सव का उल्लास  देखते ही बनता  है।

 9 दिनों  में लोगों की भक्ति भावना, आस्था और शक्ति देखते ही बनती है। माता की  नौ शक्तियों के नाम हैं शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धदात्री। प्रत्येक दिन माँ दुर्गा के एक अलग रूप की पूजा की जाती है।जैसे प्रथम दिन  शैलपुत्री, दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन चंद्रघंटा, चौथे दिन  कुष्मांडा, पांचवे दिन स्कंदमाता,छठे दिन  कात्यायनी, सातवें दिन कालरात्रि, आठवें दिन महागौरी और नवें दिन सिद्धिदात्री। ये नौ रूप नारी शक्ति के विभिन्न पहलुओं को भी  दर्शाते हैं। नवरात्र में अंतिम दिन पर कन्या पूजा का विशेष महत्व होता है। इस दिन नौ कुमारी कन्याओं को देवी स्वरुप मानकर लोग उनका विशेष पूजन  भोजन, उपहार देकर करते हैं। कन्या पूजन में दो वर्ष से लेकर 10 वर्ष तक की कन्याओं को पूजा जाता है। दस वर्ष से अधिक वर्ष की कन्याओं  का पूजन वर्जित है।  दो वर्ष की कन्या कन्याकुमारी , तीन वर्ष की त्रिमूर्तिनी, चार वर्ष की कल्याणी , पांच वर्ष की रोहिणी, छह वर्ष की ;काली, सात वर्ष की चंडिका, आठ वर्ष की शम्भवी,  नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष की सुभद्रा स्वरूपा मानी गयी है।  पौराणिक कथाओं के अनुसार माँ दुर्गा ने नौ दिनों तक राक्षस महिषासुर से युद्ध किया और दसवें दिन उसका वध कर बुराई पर विजय प्राप्त की। यह विजय पर्व दशहरा के रूप में मनाया जाता  है। 

नवरात्र का उत्सव भारत के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। गुजरात में गरबा और डांडिया नृत्य इस पर्व का मुख्य आकर्षण हैं जो सामूहिक उत्सव और एकता का प्रतीक हैं। पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा के रूप में यह पर्व भव्य पंडालों और मूर्ति पूजा के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में रामलीला और दशहरा इस उत्सव का हिस्सा है जो भगवान राम की रावण पर विजय को दर्शाते हैं। नवरात्र की पूरे देश में विशेष धूम रहती है। नवरात्र केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है।  यह सामाजिक एकता को भी  बढ़ावा देता है। लोग एक साथ इकट्ठा होकर नृत्य, गीत और भक्ति में लीन हो जाते हैं। यह पर्व नारी शक्ति के सम्मान का भी प्रतीक है जो समाज में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करता है। नवरात्र का पर्व हमें आंतरिक शुद्धता और आत्म-नियंत्रण का महत्व भी सिखाता है। यह समय आत्म-चिंतन, उपवास और भक्ति के लिए उपयुक्त माना जाता है। उपवास के माध्यम से लोग अपने शरीर और मन को शुद्ध करते हैं जबकि माँ दुर्गा की पूजा से वे दैवी शक्ति और सकारात्मकता की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं, सत्य और धर्म की शक्ति से हर बुराई पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
 
  नवरात्र में की गई पूजा मानव मन की मलिनता को दूर करके भगवती दुर्गा के चरणों में लीन  होकर जीवन में सुख, शांति और ऐश्वर्य की समृद्धि लाती है। कन्या पूजन से अनेक व्याधियों से मुक्ति होने की वैज्ञानिक पुष्टि भी होती है। उस शक्ति स्वरूपा का दर्शन  नवरात्र में करना  हर किसी के  जीवन का लक्ष्य  होना चाहिए । नवरात्र अर्थात शक्ति की आराधना का महापर्व है जिससे धर्म, अर्थ , काम, मोक्ष का पुरुषार्थ भी सफल होता है।  नवरात्र न केवल एक धार्मिक उत्सव है बल्कि यह एक ऐसा अवसर है जो हमें शक्ति, साहस और भक्ति की प्रेरणा देता है। यह पर्व हमें यह विश्वास दिलाता है कि दैवीय शक्ति हमेशा हमारे साथ है जो हमें जीवन की हर चुनौती का सामना करने की ताकत देती है। नवरात्र हमें जीवन में सकारात्मकता की ओर ले जाती  है। 

Wednesday, 17 September 2025

मोहन के नेतृत्व में अब 'कॉटन कैपिटल' बनने की राह पर मध्यप्रदेश


मध्यप्रदेश अपनी समृद्ध कृषि विरासत के लिए जाना जाता है। यहां की उपजाऊ भूमि और विविध जलवायु ने इसे कपास उत्पादन का प्रमुख केंद्र बना दिया है लेकिन अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कुशल नेतृत्व में राज्य न केवल देश का प्रमुख कपास उत्पादक बनेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर 'कॉटन कैपिटल' के रूप में उभरेगा। यह यात्रा केवल कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि टेक्सटाइल उद्योग, सस्टेनेबल प्रोडक्शन और अंतरराष्ट्रीय निवेश को जोड़कर एक नई आर्थिक क्रांति की पटकथा को तैयार कर रहा है। देश का हृदय प्रदेश मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कुशल नेतृत्व में अब निवेश और रोजगार की दृष्टि से तेजी से उड़ान भर रहा है। धार जिले के बदनावर में  धार जिले के भैंसोला गांव में  प्रदेश का नया  टेक्सटाइल हब स्थापित होने जा रहा है। यह परियोजना न केवल मध्यप्रदेश की आर्थिक तस्वीर को बदलेगी बल्कि लाखों लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी खोलेगी।


मध्यप्रदेश पहले से ही भारत का एक प्रमुख कपास उत्पादक राज्य है। राज्य के मालवा-निमाड़ क्षेत्र विशेष रूप से खरगोन, बुरहानपुर, धार और झाबुआ जिलों में कपास की खेती बड़े पैमाने पर होती है। यहां की काली मिट्टी कपास के लिए आदर्श है जो फसल को प्राकृतिक पोषण प्रदान करती है। मध्यप्रदेश के लगभग 18 जिलों  में कपास की खेती होती  है। करीब 6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हर साल लगभग 24 लाख टन कपास पैदा होता है।  देश का लगभग 40 प्रतिशत कपास  मध्यप्रदेश से आता है शायद यही वजह है कि वस्त्र उद्योग के लिए मध्यप्रदेश सबसे मुफीद साबित हुआ है और धार के पीएम मित्रा पार्क की दिशा में एमपी के कदम तेजी से बढे हैं। पीएम मित्रा पार्क इस क्षेत्र के किसानों को उनके उत्पाद के लिए बेहतर मूल्य और स्थायी बाजार उपलब्ध कराएगा। परियोजना के तहत स्थापित होने वाली वस्त्र इकाइयां कटाई, बुनाई, रंगाई, छपाई और परिधान निर्माण जैसी सभी गतिविधियों को एकीकृत करेंगी। इससे न केवल किसानों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर औद्योगिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा।

राज्य में ऑर्गेनिक कॉटन का उत्पादन भी तेजी से बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के जिलों में सबसे ज्यादा कपास उत्पादन होता है। इनमें प्रमुख रूप से इंदौर, धार, झाबुआ, अलीराजपुर, खरगौन, बड़वानी, खण्डवा और बुरहानपुर शामिल हैं। पिछले तीन वर्षों में कपास उत्पादन की स्थिति अच्छी रही है। वर्ष 2022-23 में 8.78 लाख मीट्रिक टन, 2023-24 में 6.30 लाख मीट्रिक टन और 2024-25 में 5.60 लाख मीट्रिक टन कपास उत्पादन हुआ। मध्यप्रदेश से वर्ष 2024-25 में 9,200 करोड़ रुपये से अधिक का टेक्सटाइल निर्यात हुआ है।  इसके अतिरिक्त प्रदेश के अन्य जिलों में भी कपास की अच्छी फसल ली जाती है। देश में ऑर्गेनिक कॉटन उत्पादन में मध्यप्रदेश अग्रणी है। यही वजह है कि वस्त्र उद्योग के लिए मध्यप्रदेश सबसे उपयुक्त राज्य साबित हुआ है। इसी पृष्ठभूमि के आधार पर धार को पीएम मित्रा पार्क की स्थापना के लिए चुना गया है। यह न केवल किसानों की आय बढ़ाएगा बल्कि वैश्विक ब्रांड्स के लिए एमपी को ग्लोबल हब  बनाएगा। सीएम बनते ही डॉ. मोहन यादव ने  निवेश को लगातार प्रोत्साहित कर रहे हैं जिससे निवेशकों का भरोसा मध्यप्रदेश की तरफ बढ़ रहा है।  

भारत सरकार ने देश के 7 राज्यों में पीएम मित्रा पार्क यानी  पीएम मेगा इंडीग्रेटेड टेक्सटाइल रीजन एंड अपरैल की स्थापना को अंतिम रूप दिया है जिसमें  तमिलनाडु के विरुद्धनगर, तेलंगाना के वारंगल, गुजरात के नवसारी, कर्नाटक के कलबुर्गी, उत्तर प्रदेश के लखनऊ, मध्यप्रदेश के धार और महाराष्ट्र के अमरावती में पीएम मित्रा पार्क स्थापित होने जा रहे हैं जिसका उद्देश्य 70 हजार करोड़ रुपए का निवेश लाना और करीब 20 लाख रोजगार देना है। पीएम मित्रा पार्क प्रधानमंत्री के 5 एफ विजन फार्म टू फाइबर, फाइबर टू फैक्ट्री, फैक्ट्री टू फैशन, और फैशन टू फॉरेन पर आधारित है। करीब 2,158 एकड़ में विकसित हो रहा यह पार्क विश्व स्तरीय सुविधाओं से सुसज्जित है। यहां 20 एमएलडी  का कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट, 10 एमवीए  का सौर ऊर्जा संयंत्र, पानी और बिजली की पुख्ता आपूर्ति, आधुनिक सड़कें और 81 प्लग-एंड-प्ले यूनिट्स जैसी व्यवस्थाएँ विकसित की जा रही हैं। श्रमिकों और महिला कर्मचारियों के लिए आवास और सामाजिक सुविधाएं इसे केवल औद्योगिक क्षेत्र नहीं, बल्कि आदर्श औद्योगिक नगर का रूप देती हैं। धार में स्थापित हो रहे देश के पहले पीएम मित्रा पार्क के शिलान्यास के पहले ही देश की अग्रणी 114 टेक्सटाइल कम्पनियों से 23 हजार करोड़ रूपये से अधिक के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हो चुके है। इन प्रस्तावों में से 91 कम्पनियों और इकाइकों के आवेदन स्वीकृत किये जाकर 1294 एकड़ से अधिक भूमि आवंटित किये जाने की अनुशंसा की जा चुकी है। देश की जिन अग्रणी टेक्सटाइल कंपनियों को पीएम मित्रा पार्क में भूमि आवंटित की गई है उनके द्वारा बड़े स्तर पर निवेश के प्रस्ताव दिए गये हैं।  कॉटन  इंडस्ट्री से जुड़े  कई दिग्गज उद्योग समूह यहां आकर निवेश की रुचि दिखा चुके हैं। इससे न केवल प्रदेश को औद्योगिक लाभ मिलेगा बल्कि निर्यात को भी नई दिशा मिलेगी। धार से तैयार वस्त्र और परिधान अब सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचेंगे और मध्यप्रदेश वैश्विक टेक्सटाइल हब के रूप में अपनी अलग पहचान बनाएगा। धार जिले का भैसोला क्षेत्र जो कपास उत्पादन के लिए जाना जाता है अब  इस परियोजना के माध्यम से आर्थिक समृद्धि का नया अध्याय लिखेगा। इन प्राप्त निवेशों से यार्न, फैब्रिक और गारमेंट उत्पादन की संपूर्ण वैल्यू चेन यहीं विकसित होगी जिससे प्रदेश का टेक्सटाइल उद्योग वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकेगा। पीएम मित्रा पार्क में भूमि आवंटन की प्रक्रिया भी तेजी से आगे बढ़ रही है और शेष भूमि भी चरणबद्ध तरीके से उपलब्ध कराई जा रही है। 

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव  ने राज्य को 'कॉटन कैपिटल' बनाने का स्पष्ट विजन प्रस्तुत किया है। उनका नेतृत्व किसान-केंद्रित नीतियों और निवेश-अनुकूल माहौल पर आधारित है। इस वर्ष स्पेन की यात्रा के दौरान  उन्होंने इंडीटेक्स के अधिकारियों से मुलाकात की और मध्यप्रदेश को ऑर्गेनिक कॉटन का वैश्विक हब बताया। इस मुलाकात में धार जिले में पीएम मित्रा पार्क का भी  जिक्र किया।  इसी तरह में जापान यात्रा के दौरान उन्होनें यूनिक्लो  के संस्थापक तादाशी यानाई से कपास खेती और उद्योग विस्तार पर चर्चा की। उन्होंने यूनिक्लो को मध्यप्रदेश में उत्पादन और वितरण इकाइयां स्थापित करने का न्योता दिया। यह प्रयास राज्य के टेक्सटाइल निर्यात को बढ़ावा देंगे बल्कि यूरोप जैसे देशों में एमपी को बड़ा बाजार उपलब्ध कराएँगे। मोहन सरकार की 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' नीतियां निवेशकों को आकर्षित कर रही हैं। हाल ही में कोलकाता में हुए  निवेशक सम्मेलन में भी टेक्सटाइल सेक्टर को प्रमुखता दी गई, जहां 14600 करोड़ के निवेश प्रस्ताव मिले।  इसके अलावा राज्य सरकार कॉटन-टू-कार्बन फाइबर जैसे इनोवेटिव क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा दे रही है जो टेक्सटाइल को हाई-टेक बनाएगा। मोहन सरकार ने पर्यावरण-अनुकूल खनन और ग्रीन एनर्जी जैसी नीतियों के साथ टेक्सटाइल सेक्टर को जोड़ा है। धार में पीएम मित्रा पार्क एनवायरनमेंटल, सोशल, गवर्नेंस के  मानकों पर आधारित होगा जो  आने वाले  दिनों में किसानों को ट्रेनिंग और मार्केट लिंकेज प्रदान कर राज्य आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करेगा। एमपी में  पहले से ही ट्राइडेंट ग्रुप, वर्धमान, ग्रासिम, नाहर, रेमंड, प्रतिभा सिन्टेक्स, गोकलदास एक्सपोर्ट, महिमा ग्रुप और सागर ग्रुप जैसे बड़े औद्योगिक समूह है। इन कंपनियों की उपस्थिति से यार्न, फैब्रिक, गारमेंट और मशीनरी निर्माण की संपूर्ण वैल्यू चेन पहले से मौजूद है जिसे पीएम मित्र पार्क और मजबूत करेगा। पीएम मित्रा पार्क से विशेष रूप से आदिवासी अंचल के लिए लाभकारी होगा साथ ही धार और आसपास के जिलों में रहने वाले लाखों लोगों के जीवन स्तर में सुधार होगा।  यह परियोजना स्थानीय युवाओं को कौशल विकास और रोजगार के अवसर प्रदान करेगी जिससे क्षेत्र में बेरोजगारी की समस्या में कमी आएगी। इस पार्क में कपास से धागा, धागे से कपड़े और तैयार कपड़े की बिक्री और निर्यात तक का काम एक ही स्थान से किया जा सकेगा यानी यहां कटाई, बुनाई, प्रोसेसिंग, रंगाई, छपाई और परिधानों के निर्माण जैसे सभी काम होंगे।  इस सौगात को मध्यप्रदेश के कपड़ा उद्योग के नए युग की शुरूआत माना जा रहा है।

मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अपने जन्मदिन के अवसर पर मध्यप्रदेश पधार रहे हैं।  प्रदेश में स्थापित होने जा रहे पीएम मित्रा पार्क से टेक्सटाइल और गारमेंट सेक्टर को नई ऊंचाइयां मिलेंगी। मुख्यमंत्री ने कहा कि मध्य प्रदेश में निवेश केवल व्यावसायिक विस्तार नहीं, बल्कि सतत विकास और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में भागीदारी है। यह पखवाड़ा प्रधानमंत्री के स्वस्थ समाज, सशक्त राष्ट्र के संकल्प को साकार करने का महत्वपूर्ण कदम होगा। प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया और विकसित भारत के संकल्प को पूरा करने में प्रदेश न केवल  हर संभव योगदान देगा बल्कि  विकसित भारत 2047 के मिशन में भी हमारे प्रदेश की  महत्वपूर्ण भूमिका होगी। डॉ.मोहन यादव के कुशल नेतृत्व में मध्यप्रदेश न केवल कपास का उत्पादक बनेगा बल्कि वैश्विक टेक्सटाइल चेन का अभिन्न अंग भी आने वाले दिनों में बनेगा। किसानों की समृद्धि, रोजगार सृजन और आर्थिक विकास देश के ह्रदय प्रदेश मध्यप्रदेश को  कॉटन कैपिटल बनने की दिशा में भी अग्रसर करेगी। यह केवल एक आर्थिक बदलाव नहीं, बल्कि मोहन के बनते संवरते  मध्यप्रदेश की नई पहचान है।