Sunday, March 31, 2013

बिछने लगी नेताजी की राजनीतिक बिसात ........

     क्या यू पी ए - २ अपना मौजूदा कार्यकाल सही से  पूरा कर पाएगी ? क्या आम लोक सभा  चुनाव  देश  में समय से ही होंगे ? क्या तृणमूल,  झारखण्ड विकास मोर्चा और द्रमुक  के बाद यू पी ए २ सरकार  से समर्थन वापस लेने वालो की जमात में कोई अन्य  सहयोगी तो शामिल  नहीं होंगे ? यह ऐसे सवाल हैं जो सियासी गलियारों में पिछले कुछ समय से सभी को परेशान  किये हुए हैं क्युकि  सैफई में होली मिलन कार्यक्रम के दौरान मुलायम सिंह ने  कांग्रेस  को लेकर  जिस  तरह की तल्ख़ भाषा  का इस्तेमाल किया उससे  यू पी ए २ का संकट  फिर  से गहराने   के आसार  दिखाई  दे रहे हैं ।  

नेताजी ने कांग्रेस को लेकर राजनीतिक लकीर खींचने की कोशिश यह कहते हुए खींची  कि  वह इस दौर में पीएम पद की  रेस  में नहीं हैं तो उन्होंने कांग्रेस पर हमला बोलते  हुए  कहा साथ देने वाले दोस्तों पर भी कांग्रेस को भरोसा नहीं रहता । यही नहीं तीन कदम आगे जाकर मुलायम ने कांग्रेस पर भय दिखाकर समर्थन लेने के आरोप लगाने के साथ ही इस बार कांग्रेस सरकार को घोटालो  की सरकार करार दे दिया  । यही नहीं सेकुलिरिज्म पर कांग्रेस के तमाशबीन होने के आरोपों की बौछार से यह सवाल गहरा गया है इन सबके पीछे नेता जी की मंशा आखिर क्या है ?  दरअसल अगले लोक सभा चुनावो  से पहले इसका एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस से दूरी बनाकर चलने के साथ ही राष्ट्रीय  राजनीती में सपा  को किंग मेकर बनाना और गैर कांग्रेसी ,  गैर भाजपाई मोर्चे की अगुवाई करना  हो सकता है ।  

 
 २ ० १ ४ से ठीक पहले नेताजी कुछ ऐसी खिचड़ी पकाना चाह रहे हैं जिससे भाजपा और कांग्रेस  दोनों  दलों से इतर एक नयी मोर्चाबंदी केंद्र  में शुरू हो जिसकी कमान वह खुद अपने हाथो में लेकर  सरकार बनाने का दावा  पेश कर सकें ।  १ १ ९ ६ में जब नरसिंहराव सरकार से लोगो का मोहभंग हो गया तो नेताजी ही वह शख्स  थे जिसने समाजवादियो , वामपंथियों, लोहियावादी विचारधारा के लोगो को एक साथ   लाकर उस दौर में शरद पवार के साथ मिलकर एक नई  बिसात केंद्र की राजनीती में चंद्रशेखर को  आगे लाकर बिछाई थी । उसी तर्ज पर अब नेताजी कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए अकेला चलो रे का राग अपना रहे हैं साथ में तीसरे मोर्चे के लिए भी हामी भरते दिख रहे हैं ।  १७  बरस बाद  नेताजी गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी मोर्चे के लिए अपनी शतरंजी बिसात बिछाने में लग गए हैं । अगर उत्तर प्रदेश में सपा पचास से अधिक लोक सभा सीट जीत जाती है तो नेताजी की कृष्ण मेनन मार्ग से ७ रेस  कोर्स की राह आसान  हो  सकती है ।  लेकिन असल परीक्षा तो यू पी में  है क्युकि  दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही गुजरता है । वर्तमान में सपा के 22   संसद हैं और नेताजी अपने सांसदों की संख्या आगामी लोक सभा चुनावो में बढाने के लिए अपना हर दाव  खेलने की तैयारी में दिखाई दे रहे हैं ।


जवानी में  पहलवानी के अखाड़े में अपना जोश दिखाने वाले नेताजी इस बार विपक्षियो को मात देने के लिये अपना हर दाव खेलने की तैयारी में हैं जिससे समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश के साथ अन्य  राज्यों में बदत मिल सके । नेताजी के निशाने पर अब आगामी लोक सभा चुनाव हैं यही वजह है उन्होंने पिछले कुछ समय से राष्ट्रीय राजनीती में अपनी पारिवारिक विरासत को स्थापित करने के लिए जोर आजमाईश शुरू कर दी थी । शिवपाल से लेकर रामगोपाल , धर्मेन्द्र यादव से लेकर डिंपल यादव  अगर आज राजनीती में हैं तो इसके पीछे नेताजी की राजनीतिक बिसात ही है जिसके बूते वह लोक सभा चुनावो में समाजवादी पार्टी की मजबूती चाह रहे हैं चाहे इसके लिए उन्हें अपने  पूरे परिवार को ही आगे क्यों ना करना पड़  जाए । 


मुलायम की मुश्किल इस समय यह है उत्तर प्रदेश सरीखे बड़े राज्यों के अलावा सपा का अन्य  राज्यों में कुछ ख़ास जनाधार नहीं है और वह इन राज्यों में कुछ करिश्मा भी अब तक नहीं कर पायी है । आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश में जहाँ उनकी  कोशिश लोक सभा की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना इस दौर में बन रही  है वहीँ अन्य  राज्यों को लेकर भी माथे पर चिंता की लकीरें हैं क्युकि  यू पी के अलावे अन्य  राज्यों   में सपा का संगठन लचर है । ऐसे में उनके सामने दो ही संभावनाये बन रही है या तो वह कांग्रेस के साथ  फिर जाए या फिर अपने बूते ही गैर भाजपा और गैर कांग्रेस के नारे के आसरे अपने लिए केन्द्र  की सत्ता का रास्ता साफ़ करें । मौजूदा दौर में कांग्रेस की पतली हालत के चलते सपा अपने बूते ही आगे  का रास्ता   तय करेगी लिहाजा कांग्रेस के साथ जाने का विकल्प तो बंद होता दिख रहा है । इन दिनों सपा के हर छोटे बड़े नेता की तरफ से जिस तरह यू पी ए  सरकार को कभी भी गिराने के बयान  सामने आ रहे हैं उससे यह संभावना भी बन रही है  यू  पी ए --२ सपा की बैसाखियों पर अब ज्यादा दिन नहीं चल सकती । नेताजी अपने 22   सांसदों के दम पर कभी भी मनमोहन सरकार को गिरा  सकते हैं ।
 
बीते दिनों ताबड़तोड़  अंदाज में केन्द्रीय मंत्री  बेनी प्रसाद ने  नेताजी को जिस तरह निशाने पर लिया है उससे सपा के हर कार्यकर्ता में नाराजगी बढ़  गई है और वह नेताजी के जरिये मनमोहन सरकार को गिराने का दबाव बना रहे हैं जिस पर मुलायम सिंह को फ्री हैण्ड मिल चुका  है । लोक सभा चुनाव की तैयारियों के चलते यह तो साफ़ ही लग रहा है नेताजी अब जल्द चुनावो का जुआ खेलना चाह रहे हैं । वह काग्रेस के भ्रष्टाचार के दागो को अब ज्यादा धो पाने की स्थिति में  भी नहीं दिख रहे हैं ।  ज्यादा समय तक कांग्रेस के साथ जाने से सपा के वोट बैंक को भारी  नुकसान उठाना पड़  सकता है । इस दौर में मुलायम सिंह जहाँ कांग्रेस से मेलजोल बढाने के बजाए सीधे उसे निशाने पर लेने के साथ ही दूरियां बना रहे हैं वहीँ इशारो इशारो में तीसरे मोर्चे का राग अलाप  रहे हैं । यही नहीं कांग्रेस को आईना  दिखाने की मुहिम  के तहत वह लाल कृष्ण आडवानी की तारीफों में कसीदे पड़ने से पीछे नहीं हट रहे हैं । अपनी राजनीतिक बिसात  के मद्देनजर  नेताजी अखिलेश सरकार को भी निशाने पर लेने से नहीं चूक रहे है क्युकि  एंटी इनकम्बेंसी के मिजाज  को मुलायम ने यू  पी में विपक्ष  में रहते हुए  महसूस   किया  हैं  यही  वजह है वह क़ानून व्यवस्था के नाम पर अपनी नाराजगी उत्तर प्रदेश को लेकर कई बार जाहिर कर चुके हैं ।   
 अभी कुछ दिनों पहले  सैफई में होली मिलन के दौरान नेताजी ने मध्यावधि चुनावो के लिए नवंबर तक का वक्त दे दिया जो बतलाता है सपा ने आगामी लोक सभा चुनावो के लिए कमर कस ली है । यही वजह है ५६  लोक सभा प्रत्याशी तय करने के बाद अब उनकी नजरे जल्द शेष बचे  प्रत्याशी घोषित करने की है जो एक दो महीने में शायद पूरी कर दी जाएँ । राजनीती संभावनाओ का खेल है और नेताजी बड़े दूरदर्शी नेता हैं वह जान रहे हैं यही समय है जब अगर कांग्रेस भाजपा अगर दो सौ  से कम में सिमट कर रह गए तो सपा की अगुवाई में तीसरा मोर्चा दिल्ली में अपनी दस्तक दे सकता है । वैसे वामपंथी साथियो को भी अभी भी मुलायम में तीसरे मोर्चे की उम्मीदें  दिख रहीं हैं जिसका इजहार वह कई बार बड़े मंचो से कर चुके हैं । आडवानी तो पिछले साल ही तीसरे मोर्चे में एक उम्मीद अपने ब्लॉग में देख चुके हैं जिसमे मुलायम  सिंह  कड़ी का काम कर सकते हैं ।  कुश्ती के अखाड़े की तर्ज पर नेताजी आने वाले दिनों में कुछ ऐसा गणित भी फिट कर सकते हैं जिससे अगले लोक सभा चुनाव में
कांग्रेस को   उन्हें समर्थन देने को मजबूर होना पड़े । यही वजह है इस दौर में मुलायम  कांग्रेस की सरकार गिराना नहीं चाह रहे हैं । वैसे भी इस समय भाजपा और वामपथी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के खिलाफ हैं । अगर सपा अपना बाहर  से समर्थन यू पी ए  २ से वापस ले लेती है तो सरकार गिराने का कलंक मुलायम को  खुद ढोना पड़ेगा जिससे जनता में अच्छा  सन्देश नहीं जायेगा इसलिए मुलायम राजनीती का हर दाव  इस तरह से चल रहे हैं ताकि सांप  भी मर जाए और लाठी भी न टूटे ।


वर्तमान समय में मुलायम की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा उत्तर प्रदेश में होनी है । अखिलेश उत्तर प्रदेश में अपने हर चुनावी वादे को पूरा करने में लगे हुए हैं । विपक्ष अखिलेश सरकार में कानून व्यवस्था बदहाल होने के आरोप लगा रहा है साथ ही बीते दिनों प्रतापगढ  में जो कुछ घटा उसमे राजा भैया सरीखे बाहुबलियों की ठसक से समाजवादी सरकार की छवि  पर बदनुमा दाग लग गया है । अगर यही सब चलता रहा  तो आगामी दिनों में सपा का उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन फींका पड़  सकता है और अगर ज्यादा दिनों तक मुलयम  मनमोहन सरकार के साथ खड़े   होते हैं तो कांग्रेस की खराब  होती सेहद का असर खुद उनकी पार्टी पर भी पड  सकता है ।  शायद इसी के चलते मुलायम सोच समझ कर समझ बूझ  के साथ  अपनी शतरंजी चाल चल  रहे हैं । वह ऍफ़ डी  आई पर मनमोहन सरकार की नैय्या  पार लगाते हैं तो वहीँ कांग्रेस को घोटालो की सरकार कहने के साथ ही समर्थन वापसी की घुड़की भी  समय समय पर देते हैं लेकिन मनमोहन सरकार को गिराने का खतरा मोल नहीं लेना चाहते क्युकि  दूरदर्शी नेता रहे नेताजी जानते हैं अगर पासा उल्टा पड़  गया और मनमोहन किसी नए सहयोगी के बूते आई सी यू से अपने को बाहर निकालने में कामयाब हो जाते हैं तो पूरे  प्रकरण में  किरकिरी सपा  की ही होगी और आगामी लोक सभा चुनाव  से ठीक पहले सपा  के लिए यह अपशकुन साबित होगा ही साथ ही नेताजी के प्रधानमंत्री बनने  के सपनो को  शायद इस बार भी पंख नहीं लग पाएं ।

Monday, March 25, 2013

सुरापान और कुमाऊं की होली ...

 होली आपसी प्रेम , भाईचारे और सदभाव का त्यौहार है ।  यह  मन में नई  उमंग और उत्साह का संचार करता है । जिस प्रकार पतझड़ के बाद बसंत  का आगमन  होता है उसी प्रकार फागुनी बयार के आते  ही एक उल्लास का माहौल हमें देखने को मिलता है । यूँ तो होली पूरे देश में और विदेश में उत्साह के साथ मनाई जाती है लेकिन इसे मनाये जाने के तौर तरीके भी अब समय  के साथ साथ बदल रहे हैं । होली मनाने के पीछे भी तमाम मान्यताये हैं । विष्णु को परम शत्रु मानने वाला हिरण्यकश्यप  जब किसी तरह प्रहलाद की प्रभु भक्ति में रुकावट नहीं  डाल  पाया तो उसने उसे मारने की ठानी ।  हिरण्यकश्यप की बहन होलिका जिसे वरदान मिला था वह जिसे भी गोद में बिठाएगी वह आग में भस्म हो जायेगा । होलिका ने भी प्रहलाद को गोद में बिठाया तो प्रहलाद तो बच गए होलिका भस्म हो गयी । तभी से होलिका दहन करने की परम्परा चल पड़ी । वैसे द्वापर युग में होली  का जिक्र आते ही राधा और कृष्ण की रास लीला भी सबकी जुबान पर आ जाती है जिसके आधार पर लोग बरसाने की तरह लोगो के बीच जाकर रंग डालते हैं । 
     

 देवभूमि उत्तराखंड की होली की पूरे देश में विशेष पहचान है । बसंत पंचमी से यहाँ पर होली की महफिले सजने लगती हैं ।  एकादशी से लगातार घर घर होली के मंगल गीत गाये जाने लगते हैं । होली  के छठे  दिन रंग की हिली खेली जाती है जिसे पहाडो में छरडी कहते हैं । होली के दिन घर घर जाकर लोग आलू के गुटके, ,गुजिया  सुपारी , सौंफ खाके गले मिलकर एक दूजे को बधाईया देते हैं और होली के गीतों की फुहार में झूमते हैं । पहाड़ो  में छरडी के अगले दिन देवर भाभी और जीजा साली का टिका होता है जिसमे सभी टीका लगाकर बधाई  देते हैं ।


 कुमाऊ में होली के अवसर पर घर घर में धूम देखी  जा सकती है ।  इसमें होलियार होली के गीत गाकर समाँ बांधते हैं तो वहीँ महिलाओ के स्वांग रचने के उदाहरण  भी देखने को मिलते हैं जहाँ  वह पुरुष वेश धारण कर खूब हसी और ठिठोली में डूबे रहते हैं ।  कुमाऊँ  अंचल में एकादशी के बाद से ही घर घर में महिलाओ की बैठकी होली शुरू हो जाती है । शहरों की अपेक्षा गावो में होली के मौके पर ख़ास चहल पहल देखने को मिलती है ।  मनी ऑर्डर  इकॉनमी पर आधारित पहाड़ में अधिकांश सैनिक जो देश की सेवा में दिन रात तत्पर रहते हैं वह भी होली के ख़ास मौके पर अपने गाव जाना नहीं भूलते जिसके चलते गावो में उनके आने से होली के त्यौहार में चार चाँद लग जाते हैं । होली और दिवाली पहाड़ में एक ऐसे त्यौहार हैं  हैं जब पूरा परिवार एकजुट रहता है । गावो में होली घर के आँगन में गाई  जाती है । आंगन  में लकडियो की धूनी जलाई जाती है जिसके पास एक व्यक्ति गले में ढोल बजाता है । पूरे गाँव के लोक गोल घेरे में झूमते हुए परिक्रमा करते हुए होली गाते हैं ।  गोल घेरे के मध्य में एक गाव का कोई बुजुर्ग पहले एक लाइन गाता है फिर उसका अनुसरण सभी लोग करते हैं । होली गाने वाले पहाड़ के ये सभी होलियार झूम झूमकर मस्ती से होली  करते हैं । एक ताल में जहाँ गीतों के बोल मिलते हैं वहीँ कदम भी एक साथ चलते, गिरते और उठते हैं । पहाड़ के गावो में खेली जाने वाली इस होली में गोल घेरे में महिलाये सम्मिलित नहीं होती बल्कि वह बैठकर पुरुषो की इस होली का आनंद लेती हैं ।


      पहाड़ में होली गायन  "सिद्धि को दाता  विघ्न विनाशन" गणेश वंदना से शुरू होता है । वही द्वादशी के दिन से रंग राग शुरू हो जाता है । मत जाओ पिया होली आय रही जैसे गीतों के जरिये जहाँ नायिका अपने पति को परदेश जाने से रोकती है वहीँ विरह की पीड़ा भी इस होली में "ठाडी जो हेरू बाट  म्यार सैय्या कब आवे" जैसे गीतों में होली का यह उत्साह चरम पर चला जाता है । पहाड़ो में अगर आप होली देखे तो यहाँ की होलिया ढलती  उम्र मे किसी भी व्यक्ति को युवावस्था की याद दिलाकर उसे अपने मोहपाश में जकड लेती हैं । कुमाऊं में छरडी  के पहले से ही  होली की जबरदस्त धूम घर घर में देखने को मिल जाती है । लोग अपना काम काज छोड़कर गाँवों में उत्साह के साथ होली के आयोजन में अपनी सहभागिता करते हैं । घर घर में होल्यारो की मंडलिया देर रात तक होली के गीतों में थिरकती रहती हैं ।  छरडी के दिन गले मिलकर लोग अपनी खुशियाँ बांटते हैं और नहाने धोने के बाद शाम को गाँवों में खड़ी  होली गायन करते हैं जो देर रात तक चलता है ।  अंत में लोग " केसरी रंग डारो  भिगावन को , सांवरी रंग डारो  भिगावन  को  " जैसे गीतों से परिवार के हर सदस्य को आशीष देते हैं ।


 उत्तराखंड में कई वर्षो पहले तक जो होली गाँवों में देखने को मिलती थी वह अब समाप्त होती जा रही है । हाल के वर्षो में रोजगार के अभाव में पहाड़ो से पलायन काफी बढ़ा है । खेती बाड़ी चौपट है तो जल जमीन जंगल के नाम पर लूट चल रही है । लोग महानगरो की तरफ रोजी रोटी की तलाश में बढ  रहे हैं जिससे होली जैसे त्यौहार भी अब  गावो में सिमटते जा रहे हैं क्युकि  इस दौर में समूची कवायद तो कॉर्पोरेट के आसरे विकास के चमचमाते सपने दिखाने में लगी हुई है और इन सबके बीच परम्परा को भी आधुनिकता का ग्रहण लग चुका  है । कुमाऊ  में गौरंग घाटी , चम्पावत, लोहाघाट और अल्मोड़ा की होली आज भी अपने अस्तित्व को बचाए हुए है  । एक दौर ऐसा भी था जब कुमाऊ  की इस होली की अलग पहचान थी और लोग इससे देखने के लिए लालायित रहते थे लेकिन अब माहौल पहले जैसा नहीं रहा । पहाड़  के गाव दिनों दिन खाली होते जा रहे हैं । युवा पीड़ी माल संस्कृति वाली हो गयी है । वह पहाड़ से जुड़ाव महसूस  नहीं करती  । शराब ने  नशा नहीं रोजगार दो के दौर में पहाड़ो को खोखला कर दिया था । अब होली के मौके पर भी सुरापान ट्रेंड अपने  चरम पर है । कच्ची शराब के कल कारखाने जहाँ  घर घर में फूलने लगे हैं वहीँ सूबे के मुखिया विजय बहुगुणा  ने शराब को बढ़ावा देने के लिए जिस तरह नीतिया यहाँ हाल के वर्षो में बनाई हैं उससे देवभूमि में अब हर चाय के ढाबे में  चाय कम सुरापान ज्यादा होने के आसार बन रहे  हैं । दस जनपथ की कृपा से  मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा कॉपरेट और सिंडिकेट के आसरे उत्तराखंड में नई  बोतल में पुरानी शराब घर घर तक पहुचाने में  गए हैं । ऐसे में सरकार की नीयत पर सवाल उठने  लगे हैं । ऊपर से होली सरीखे  बड़े त्योहारों में भी देवभूमि में शराब की गंगा बहनी अब तय ही दिख रही है । अगर ऐसा हुआ तो उत्तराखंड में होली के  मौके पर  रंग में भंग पड़ना तय है और शराब के रंग के आगे इस बार की  होली के रंग भी फीके ही रहेंगे ।

Sunday, March 3, 2013

कलह ने किया भाजपा को कमजोर .....


पार्टी विथ डिफरेंस जुमला भाजपा के बारे में जरुर कहा जाता है । इस पर अगर यकीन करें तो पार्टी में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ,और देश प्रेम का पाठ जोर शोर से हर कार्यकर्ता को ना केवल पढाया जाता है बल्कि संघ भी अपने अंदाज में राष्ट्रवाद के कसीदे पढ़कर दशको से एक नई लकीर अपने आसरे खींचता रहा है लेकिन आज भगवा खेमे में पहली बार हताशा का माहौल है । पार्टी में अब व्यक्ति की गिनती पहले होने लगी है । भगवा खेमे में इस बार हलचल ना केवल प्रधानमंत्री पद को पाने के लिए है बल्कि कांग्रेस से लगातार 2 लोक सभा चुनावो में हारने की कसक नेताओ में बरकरार है । अगर यही हालत रहे तो 2014 के लोकसभा चुनावो में भाजपा का प्रदर्शन फीका पड़ने के आसार अभी से ही दिखाई दे रहे हैं । जिस अनुशासन का हवाला देकर पार्टी अपने को दूसरो से अलग बताती थी आज वही अनुशासन पार्टी को अन्दर से कमजोर कर रहा है क्युकि अगले चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए जनता के बीच जाने के बजाए पार्टी प्रधानमंत्री के पद की किचकिच में उलझी है । उसे यह समझ नहीं आ रहा कैसे भाजपा की नैय्या 2014 में बिना अटल बिहारी के कैसे पार लगेगी ?


वर्तमान दौर में पहली बार भाजपा के अन्दर उथल पुथल है । यही कारण है बीते दिनों राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में पार्टी ने सुशासन ,संकल्प और विकल्प का नारा ही दे डाला । यह अलग बात है पार्टी में अभी भी कलह थमने का नाम नहीं ले रही और इन सबके बीच पार्टी में अरुण जेटली के अलावे विजय गोयल, सुधांशु मित्तल, नितिन गडकरी जैसे नेताओ की फ़ोन टेपिंग का साया इस राष्ट्रीय कार्यकारणी में भी देखने को मिला है जो कहीं ना कहीं भाजपा के अन्तर्विरोध को एक बार फिर सबके सामने ला रहा है । मजेदार बात यह है राजनाथ के अध्यक्ष बनने से ठीक पहले भाजपा के कई नेताओ के फ़ोन टेप होने का मसला सामने आने से यह मसला दिलचस्प बन गया है जो पार्टी के भीतर तमाम सवालों को पैदा कर रहा है । गडकरी की विदाई के बाद लोगो को उम्मीद थी कि राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बनने के बाद सब कुछ सामान्य हो जायेगा पर अभी तक वह अपनी टीम ही नहीं बना सके हैं । इस दौर में भाजपा के पास अपने अस्तित्व को बचाने की गहरी चुनौती है । उसके पुराने मुद्दे अब वोटर पर असर नहीं छोड़ पा रहे तो भावनात्मक मुद्दे भी लोगो को नहीं रिझा पा रहे । यू पी ए 2 की हर एक विफलता को भुनाने मे वह अब तक नाकामयाब ही रही है । हाल ही में उत्तराखंड , उत्तर प्रदेश और हिमांचल सरीखे राज्य उसके हाथ से निकल गए जहाँ वह अच्छा कर सकती थी वहीँ अन्य प्रदेशो में भी पार्टी बहुत अच्छी स्थितियों में नहीं है । हर राज्य में उसके छत्रप लगातार अपने दम पर मजबूत होते जा रहे हैं तो वही यही लोग अपने अंदाज में समय समय पर पार्टी को अपने अंदाज में ठेंगा भी दिखा रहे हैं । बीते कुछ समय पहले येदियुरप्पा और वसुंधरा राजे इसका नायाब उदाहरण रहे हैं वहीँ गुजरात में भाजपा नहीं मोदी लगातार जीत रहे हैं जो बतलाता है पार्टी में हर नेता अपने को पार्टी से बड़ा समझने लगा है जिसके चलते पार्टी 2014 में किसी नेता को प्रोजेक्ट करने से ना केवल डर रही है बल्कि मोदी को लेकर भी कमोवेश इस दौर में तस्वीर साफ़ होती नहीं दिख रही है क्युकि इससे एन डी ए के टूटने का खतरा बना हुआ है जबकि मोदी में ही पार्टी का बड़ा तबका 2014 में भाजपा के लिए नई उम्मीद देख रहा है ।

असल में भाजपा को सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर से ही मिल रही है । अटलबिहारी सरीखे करिश्माई नेता की कमी जहाँ भाजपा को इस दौर में खल रही है वहीँ 80 पार के आडवानी इस दौर में भी प्रधान मंत्री की कुर्सी का अपना मोह नहीं छोड़ पा रहे है । यह अलग बात है इशारो इशारो में आडवानी कहते रहे हैं पार्टी ने उन्हें बहुत कुछ दिया है अब किसी और चीज की चाह नहीं है लेकिन राजनीती का मिजाज ही कुछ ऐसा है व्यक्ति चाहकर भी इसका मोह नहीं छोड़ता । पिछले चुनाव मनमोहन को कमजोर बताने वाले आडवानी के नेतृत्व को देश का वोटर नकार चुका है लिहाजा पार्टी को आडवानी पर निर्भरता छोड़कर केवल उन्हें मार्गदर्शन तक सीमित रखतेहुए दूसरी पंक्ति के किसी नेता पर दाव 2014 में लगाना चाहिए लेकिन इस पर भी भाजपा से लेकर संघ में एका नहीं है क्युकि डी -4 की दिल्ली वाली चौकड़ी तो भागवत के निशाने पर उस दौर से ही है जिस दौर में गडकरी को महाराष्ट्र की राजनीती से पैराशूट की तर्ज पर दिल्ली में उतारा गया वहीँ सुषमा से लेकर जेटली , मोदी से लेकर राजनाथ सभी इस दौर में पीं एम् इन वेटिंग वाली आडवानी वाली लकीर पर चल निकले हैं लेकिन संघ के आशीर्वाद के बिना कोई भी इस पद को नहीं पा सकता । वहीँ इनका सपना भी तभी पूरा हो पायेगा जब 2014 के लोक सभा चुनावो में भाजपा 200 सीटें अपने दम पर पार करे जो इस समय दूर की गोटी ही दिख रही है । हमको तो यह बात हजम नहीं होती पिछले लोकसभा चुनावो में आडवानी ने कहा था अगर वह 2009 मे प्रधान मंत्री नहीं बन पाए तो वह राजनीती से सन्यास ही ले लेंगे लेकिन इस दौर में पार्टी आडवानी पर अपनी निर्भरता नहीं छोड़ पा रही । आडवानी ने चुनावो के बाद अपने को विपक्ष के नेता पद से दूर जरुर किया लेकिन सुषमा और जेटली को आगे कर अपना सबसे बड़ा दाव संघ के सामने ना केवल चला बल्कि जिस गडकरी को पिछली बार उन्होंने संघ के आसरे भाजपा के अध्यक्ष पद पर बिठाया था आज उन्ही को अपनी बिसात के जरिये दूसरा टर्म देने से रोका है जो आज भी साबित करता है आज भी भाजपा में आडवानी का सिक्का जोरो से चलता है । अब जैसे जैसे लोकसभा चुनाव पास आते जा रहे है आडवानी एक बार फिर से पुराने रंग में लौटते जा रहे हैं । हाल ही में उन्होंने पाकिस्तान को हैदराबाद बम धमाको में सीधा जिम्मेदार ठहराया है बल्कि समय समय पर बीते दौर में यू पी ए सरकार को भी अपने निशाने पर लिया है जो बताता है रेस कोर्स के लिए आडवानी आखरी जंग लड़ने के मूड में हैं और अगर खुद ना खास्ता भाजपा अच्छी सीटें नहीं ला पायी तो आडवानी का चेहरा ही ऐसा है जिस पर एन डी ए बिखरने से बच सकता है बल्कि अटल सरकार को छोड़कर गए पुराने पंछी भी फिर से जहाज पर सवार हो सकते हैं । लिहाजा आडवानी अंदरखाने अपने अंदाज में पार्टी के बीच अपना गणित बिठाने में लगे हुए हैं । वैसे भी आज भाजपा में आडवानी के रुतबे में कोई कमी नहीं आई है लिहाजा सुषमा,जेटली से लेकर शिवराज और रमन सिंह सरीखे मुख्यमंत्री उनकी उनकी सबसे बड़ी ताकत बने हुए हैं । पार्टी में आडवानी के नाम पर आज भी वैसी ही सर्व स्वीकार्यता है जैसी नेहरु गाँधी परिवार को लेकर कांग्रेस में है ।

बीते दौर को अगर याद करें तो दीनदयाल उपाध्याय , कुशाभाऊ ठाकरे, विजयराजे सिंधिया और अटल बिहारी सरीखे करिश्माई दिग्गज नेताओ का नाम जेहन में आता है जिनकी बदौलत भाजपा ने एक बड़ा मुकाम बनाया । उस दौर में पूरी पार्टी एकजुट थी । अहं का टकराव नहीं था लेकिन आज कैसा अंतर्कलह मचा हुआ है यह यशवंत सिन्हा द्वारा पार्टी फोरम से बाहर मोदी को पी एम बनाने , गडकरी को चुनौती देने के लिए खुद मैदान ए जंग में आने के बयानों से साफ झलका है ।वहीँ पार्टी अध्यक्ष द्वारा मीडिया में पी एम पद केलिए खुले तौर पर कुछ भी कहने से मनाही के बाद हर नेता पार्टी में अपने बयानों के नए तीर 2014 के चुनावो से पहले छोड़ रहा है जो बतलाता है भाजपा का मौजूदा संकट किस कदर गहराया हुआ है ? राजनाथ के आने के बाद भी पार्टी में आज कार्यकर्ताओ में वह जोश गायब है जो वाजपेयी वाले दौर में हमें देखने को मिलता था । पार्टी मे आज पंचसितारा संस्कृति हावी हो चुकी है । पार्टी का चाल,चलन और चेहरा आज बदल गया है । गडकरी के कार्यकाल में पार्टी के फंड मे सबसे ज्यादा रिकॉर्ड धन प्राप्त हुआ है जो बताता है भाजपा भी किस तरह इस दौर में कारपोरेट के आगे नतमस्तक है । कांग्रेस की तमाम बुराइया भाजपा ने आत्मसात जहाँ कर ली हैं वहीँ गुटबाजी में भी पार्टी ने कीर्तिमान ही तोड़ दिए हैं । पार्टी अपने मूल मुद्दों से भटक ही गई है । राम लहर पर सवार होकर उसने सत्ता सुख जरुर भोगा लेकिन अपने कार्यकाल में गठबंधन की मजबूरियां गिनाकर वह अपने एजेंडे से ही भटक गई । सत्ता की मलाई चाटते चाटते वह इतनी अंधी हो गई कि हिंदुत्व और एकात्म मानवतावाद रद्दी की टोकरी मे जहाँ चले गए वहीँ बाबूसिंह कुशवाहा सरीखे लोगो को उसने बीते दौर में ना केवल गले लगाया बल्कि येदियुरप्पा और निशंक सरीखे नेताओ के भ्रष्टाचार से आँखें मूँद ली । यही नहीं खंडूरी सरीखे जिस नेता को उन्होंने पिछले लोक सभा चुनावो में उत्तराखंड से हटा दिया और विधान सभा चुनावो से ३ माह पहले वापस बुलाकर अपनी भद्द ही कराई । बड़ा सवाल यह था अगर खंडूरी अच्छा काम उत्तराखंड में कर रहे थे तो उनको क्यों हटाया गया और फिर चुनाव पास आतेदेख पार्टी को उनकी याद क्यों आ गई ?यही बात वसुंधरा राजे केलिए भी लागू होती है । उनकी पिछली सरकार ने राजस्थान में अच्छा काम किया फिर भी राजनाथ ने अपने पहले कार्यकाल में उनको नेता प्रतिपक्ष पद से हटा दिया और संयोग देखिये अब राजस्थान में विधान सभा चुनावो में वही वसुंधरा पार्टी का बड़ा चेहरा होने जा रही हैं ?

भारतीय जनसंघ का दौर अलग था ।तब पार्टी के पास एक विजन था । 1977 में यह जनता पार्टी के साथ मिल गयी । इसके बाद १1979 में जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद 1980 मे भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ । 1984 में जहाँ पार्टी ने दो सीटें जीती वहीँ 1989 में 86 सीटो पर भगवा परचम लहराया । इसके बाद नब्बे का दशक आते आते पार्टी राम लहर में सवार हो गई जिसने 1996 में उसे सबसे बड़ी पार्टी बनाया । 1999 से 2004 तक भाजपा ने अटल के आसरे गठबंधन राजनीति की नई लकीर खींची जहाँ प्रमोद महाजन सरीखे नेता की मैनेजरी के जरिये भाजपा ने राजनीती में नई इबारत लिखी । पोखरण, कारगिल उस दौर की यादगार घटनाये रही । साथ ही संसद पर हमला ,आई सी 814 का अपहरण ,गोधरा पार्टी के लिए कलंक साबित हुआ जिसके दाग अभी तक नहीं छूट पाएं है । 2004 के लोकसभा चुनावो में इंडिया शाईनिंग के फब्बारे क़ी ऐसी हवा निकली जिसके जख्मो से वह लगातार पिछले दो लोक सभा चुनावो से नहीं उबर पायी है और इस बार भी चुनाव की बिसात बिछाने से ज्यादा पार्टी में प्रधान मंत्री पद को पाने के लिए सारी रस्साकसी चल रही है । कहीं यह 2014 में भाजपा की मिटटी पलीद नकार दे । बेहतर होगा वह पी एम पद के बजाए2014 में अपना प्रदर्शन सुधारने पर जोर दे । यह दौर ऐसा है जब जनता यू पी ए -2 की नीतियों से परेशान दिख रही है और कहीं का कहीं भ्रष्टाचार के मसले पर बीते कुछ समय से उसकी खासी किरकिरी भी हुई है जिसको भुनाने में भाजपा नाकामयाब ही रही है । सरकार को घेरने का हर मौका भाजपा चूकी है और भ्रष्टाचार की लड़ाई को कमजोर उसने गडकरी सरीखे नेता को बचाकर पूरा किया है जो बतलाता है भाजपा में साढे साती की यह दशा 2014 में भी कहीं उसका खेल कहीं खराब नहीं कर दे और शायद यही वजह है भाजपा पहली बार राजनाथ के अध्यक्ष बनाये जाने के बाद एकजुट होकर राष्ट्रीय कार्यकारणी के जरिये यह बतलाने की कोशिश का रही है 2014 के लिए वह कमर कस चुकी है लेकिन पार्टी का अंदरूनी कलह असंतोष के लावे को सबके सामने तो ला ही रहा है