गुरुवार, 28 जनवरी 2016

कटीली राह पर भाजपा के ‘शहंशाह’


18 महीने के कार्यकाल को पूरा करने के बाद नए बरस अमित शाह दूसरी बार भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिए गए हैं | इसमें शायद ही किसी को संदेह रहा होगा कि नए बरस में शाह को पार्टी फिर से जिम्मेदारी देने जा रही है | असल में जलगाँव में संघ के सरकार्यवाह और प्रान्त प्रचारक जिस तरीके से संगठन को मथने एकजुट हुए उसी समय शाह की वापसी का रास्ता साफ़ हो गया था | हालाँकि अमित शाह  की अगुवाई  में दिल्ली के बाद बिहार में मिली करारी हार के बाद से वह  भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के निशाने पर हैं | गाहे बगाहे पार्टी के ऐसे नेता भी डॉ जोशी और आडवाणी के कैम्प में नजर आये हैं  जिनको मोदी कैबिनेट में या तो जगह नहीं मिल सकी और बिहार चुनावों में ऐसे कई नेता हाशिये पर चले गए थे  लेकिन बिहार चुनावों के बाद पार्टी में शाह के खिलाफ जिस तरह गोलबंदी  शुरू हुई और हार के मंथन के लिए जवाबदेही तय किये जाने की बात दोहराई जाने लगी उससे शाह की दूसरी पारी को लेकर सस्पेंस कायम था | संघ के वरदहस्त के चलते शाह को अभयदान मिल गया| प्रधानमन्त्री मोदी पहले ही सर संघचालक  मोहन भागवत के सामने अमित शाह को लेकर रजामंदी जाता चुके थे लिहाजा 11 अशोका रोड में नामांकन की  सिर्फ औपचारिकताएं ही बची थी | 


 2014 में भाजपा को प्रचंड जीत दिलाने वाले अमित शाह फिर से भाजपा के अध्यक्ष चुन लिए गए | अब इसके साथ ही भाजपा और सरकार पर नरेंद्र मोदी की पकड़ पूरी हो गई है। भारत की सबसे बड़ी पार्टी पर अब दो गुजरातियों के हवाले जरूर है लेकिन अमित शाह की दूसरी पारी चुनौतियों भरी रहने के आसार हैं | 2014 में लोक सभा चुनावों में जहाँ उन्होंने भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाया तो वहीँ हरियाणा, महाराष्ट्र, जम्मू, झारखंड में भाजपा को सत्तासीन करवाया और 2015 जाते जाते दिल्ली और बिहार की करारी हार ने पार्टी के भीतर अमित शाह के विरोध का लावा पार्टी में बाहर निकाल दिया | दबे सुर में कार्यकर्ताओं के बीच यह जुमला कहा जाने लगा अब पोटली और ब्रीफकेस के सहारे राजनीति करने वालों की नींद उड़ गई है लेकिन शाह ने जिस तरीके से मनमाने ढंग से चुनावी बिसात बिहार और दिल्ली में बिछाई उससे उनकी पार्टी  सहयोगियों और विपक्षियों  के बीच खूब भद्द पिटी |

 साइंस से स्नातक अमित शाह कॉलेज में छात्र नेता रहे। संघ की शाखाओं में बचपन से ही जाते थे और राजनीति में आने से पहले एक स्टॉक ब्रोकर थे।  जानकार बताते हैं कि एक वरिष्ठ संघ प्रचारक ने युवा शाह को उस समय संघ और भाजपा में अपनी पैठ बना चुके नरेंद्र मोदी से मिलवाया था।  मोदी उन दिनों अपनी टीम बना रहे थे। उन्हें युवा शाह के आत्मविश्वास ने काफी प्रभावित किया। शाह ने मोदी से लालकृष्ण आडवाणी का चुनाव प्रचार संभालने की इच्छा जताई। जिम्मेदारी मिल जाने के बाद शाह ने उसे बखूबी निभाया । आडवाणी के उस चुनाव के बाद शाह ने पार्टी में अच्छी पहचान बना ली। भाजपा और गुजरात की राजनीति को करीब से देखने वाले कई लोग मोदी और शाह के रिश्ते को 80-90 में आडवाणी और मोदी के रिश्ते जैसा बताते हैं। शायद यही कारण है कि मोदी को शाह में अपने उस युवा जोश की झलक दिखी और उन्होंने अपना अभिन्न सहयोगी बना लिया। जब केशुभाई पटेल को हटाकर मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो उससे पहले ही उन्होंने अमित शाह को एक कद्दावर नेता बना दिया था। 

2002   में जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की दोबारा सरकार बनी तो शाह  की  सूझबूझ और वफादारी देखते हुए  सबसे कम उम्र के शाह को गृहराज्य मंत्री बनाया गया। शाह को सबसे अधिक  मंत्रालय दिए गए और उन्हें दर्जनों कैबिनेट समितियों का सदस्य बनाया गया।  शाह सरीखी माइक्रो मैनेजमेंट की क्षमता कम ही लोगों में है। जब लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा रणनीति बना रही थी तब शाह जानते थे कि यूपी जीते बिना दिल्ली नहीं जीता जा सकता है । पार्टी की यूपी की कमान संभालते ही शाह एक राज्य के नेता से राष्ट्रीय नेता बन गए और मोदी लहर ने शाह को सबसे बड़ा शहंशाह बना डाला । 

 दूसरी बार अब कमान शाह  के हाथ आई है । वह एक सुलझे हुए नेता है और गुजरात की उस नर्सरी से आते हैं जहाँ भाजपा ने हिंदुत्व का परचम एक दौर में फहराकर सरकार बनाने में सफलता हासिल की थी । लेकिन इस बार अपनी दूसरी पारी में अमितशाह के पास  बहुत कम समय बचा है । पार्टी को इस बरस 5 राज्यों बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी के चुनावी समर में कूदना है जहाँ पर भाजपा का कोई नामलेवा नहीं है | भाजपा असम से बहुत उम्मीद लगाये है तो वहीँ केरल में भी पार्टी संघ के संगठन के बूते थोड़ी बहुत आस लगाये बैठी है | इसके अलावे कोई ऐसा राज्य नहीं है जहाँ भाजपा चमत्कार करने जा रही है | भाजपा की असल मुश्किल बंगाल, तमिलनाडु, पुदुचेरी, केरल है जहाँ पार्टी का कोई मजबूत कैडर नहीं है और इन राज्यों में जिस तरह  छत्रप दिनों दिन मजबूत होते जा रहे हैं उससे आगामी चुनावो में भाजपा के लिए  सबसे बड़ा संकट खड़ा  हो गया है ।

 शाह की सबसे बड़ी परीक्षा 2017 में यूपी में होगी | यू पी में भारतीय जनता पार्टी एक दशक से भी अधिक समय से वेंटिलेटर पर लेकिन लोकसभा में मोदीलहर के चलते उसे अभूतपूर्व सफलता मिली थी अब वैसे करिश्मे की उम्मीद बेमानी ही लगती है लेकिन भारतीय जनता पार्टी यह जरूर चाहेगी कि वह यू पी में किंगमेकर की भूमिका में रहे जिससे बसपा के साथ सौदेबाजी कर किसी तरह सरकार चलाई जा सके | वैसे यू पी की मुख्य लड़ाई सपा और बसपा के इर्द गिर्द ही घूमती रही है लिहाजा भाजपा के लिए यहाँ नाक बचाना मुश्किल है |वैसे लोकसभा चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में हुए पंचायत चुनावों में भाजपा का सूपड़ा साफ़ रहा था | कोई बड़ा चमत्कार ही यू पी में भाजपा के जहाज को बचा सकता है | फिर यू पी में भाजपा के पास कल्याण सिंह सरीखे चेहरे का भी अभाव है और बिना सर्वमान्य नेता के अभाव में पार्टी की गत बिहार और दिल्ली सरीखी होने के आसार हैं |  2016 के बाद शाह को बड़ी चुनौती मिलने जा रही है | इसके अलावा उत्तराखंड, पंजाब,  मणिपुर, हिमाचल और गुजरात में भी भाजपा की प्रतिष्ठा सीधे सीधे  दाव पर रहेगी जहाँ भाजपा सीधी लड़ाई में है और यहीं पर शाह को अग्निपरीक्षा से गुजरना पड़ेगा | अगर भाजपा 2017 में बहुत अच्छा कर लेती है तो 2018 में मध्य प्रदेश , राजस्थान,कर्नाटक, छत्तीसगढ़ सरीखे राज्यों में पार्टी की जीत की संभावनाएं बढ़ जाएगी| इसके अलावा अमित शाह की  सबसे बड़ी मुश्किल कार्यकर्ताओं और संगठन के नेताओं से परस्पर संवाद बन गया है | 
आडवाणी भले ही संघ प्रमुख भागवत के निर्देशों के बाद मोदी सरकार के खिलाफ कोई बयान देने से बच रहे हैं लेकिन डॉ जोशी पार्टी की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट नेताओं को साधकर नई गोलबंदी की तरफ  तेजी से बढ़ते दिखाई दे रहे हैं । अगर शाह की बिहार वाली कार्यप्रणाली में सुधार नही हुआ तो भाजपा की 2017 में मुश्किलें बढ़ सकती हैं । उत्तर प्रदेश में शाह को सबसे अधिक ध्यान देने की जरूरत होगी जहाँ पर लोक सभा चुनावों की सफलता को दोहराना सबसे बड़ी चुनौती होगी क्युकि इसके बाद ही मोदी लहर भावी लोकसभा चुनावों में  भाजपा का रास्ता तय करेगी और शाह के चुनावी प्रबंधन की असल परीक्षा होगी क्युकि दिल्ली का रास्ता बिहार से ही होकर जाता है और यू पी ही मोदी सरकार की भावी दिशा और दशा को तय करेगा ।   

अमित शाह प्रधानमंत्री खासमखास हैं। इसके कारण ही मोदी ने उन पर भरोसा जताया है  । 2017  और 2018 में अगर शाह की कप्तानी में भाजपा अच्छा प्रदर्शन करती है तो आगामी 2019 के  लोकसभा चुनाव में माहौल भाजपा के पक्ष में जाना तय  है लेकिन  मौजूदा हालात भाजपा के पक्ष में नहीं हैं । रूपया लगातार लुढक रहा है । आर्थिक सुधारो  को गति नहीं मिल पा रही है । औद्योगिक विकास दर भी रुकी हुई है । महंगाई की मार  आम जनता पर पड़ रही है लेकिन सरकार कुछ नहीं कर पा रही है ।  शाह को चाहिए वह ऐसा कुछ करें जिससे आम आदमी सरकार के करीब आये ।  इसके लिए पार्टी के मंत्रियों को पार्टी  मुख्यालय पर बैठाना अनिवार्य करना चाहिए जिससे कार्यकर्ताओं की समस्याओं के साथ जनता की समस्याओं से रूबरू होने का मौका मिल सके ।  पश्चिम बंगाल, केरल में अगर भाजपा को कुछ सीटें मिल गई तो यह शाह की उपलब्धि मानी जाएगी। 2017 सही मायनों में अमित शाह के लिए बड़ी चुनौती लेकर आएगा ।  उत्तर प्रदेश में कमल अगर विधान सभा चुनाव में कमल खिल गया तो पार्टी के लिए उसे भुनाने का भरपूर मौका मिल जाएगा । मौजूदा हालात शाह के लिए अच्छे नहीं हैं । गुजरात , यू  पी के  कई पंचायत चुनाव  में भाजपा  को मुह खानी पड़ी है  वहीँ शिवराज   भी मध्य प्रदेश के चुनावों में कुछ ख़ास सफलता नहीं पा सके हैं । छत्तीसगढ़  में चावल वाले बाबाजी का जलवा भी अब बेअसर है   जिसके बाद भाजपा बैकफुट पर आ  गयी है ।  

 नई  पारी में नए राज्यों में शाह को चाहिए वह गठबंधन की राजनीती के माध्यम से नए दलों  को  जोड़ें तो  भाजपा को लाभ  मिल सकता  है ।शाह को दक्षिण में भाजपा के दुर्ग को मजबूत करना होगा साथ ही नए सहयोगी से गठबंधन के लिए नए विकल्प ढूँढने  होंगे । इस बार निश्चित ही शाह के लिए बदली परिस्थितिया हैं । लोग मोदी में अभी भी उम्मीद देख रहे हैं लेकिन पार्टी की गुटबाजी आगामी चुनाव में उसका खेल खराब कर सकती है । शाह  को इस पर ध्यान  देना होगा । सभी को एकजुट करने की भी बड़ी चुनौती उनके सामने है ।  मोदी का हनीमून  पीरियड अब ख़त्म है और मंत्रियों  के परफॉरमेंस का आंकलन होना अब जरूरी है ।  वहीँ संघ को भी बदली परिस्थियों के अनुरूप भाजपा के लिए बिसात बिछाने की  जिम्मेदारी  शाह  के कंधो पर देनी होगी  ।  


संघ की सबसे बड़ी दिक्कत यह है वह बहुत जल्द इस दौर में सीनियर नेताओं को किनारे कर  शाह  की टीम  पर भरोसा कर रहा है और कहीं ना कहीं संगठन को लेकर भी बहुत जल्दबाजी दिखा रहा है । अब संघ की कोशिश इसी व्यक्तिनिष्ठता को  खत्म  करने की होनी चाहिए और यही चुनौती से  असल में शाह  को भी अब  झेलनी  है । आज भाजपा को दो नावो में सवार होना है । गुजरात में मोदी की तर्ज पर राष्ट्रीय स्तर  पर अपना दक्षिणपंथी चेहरा विकास की तर्ज  पर और  उम्मीद के रूप में पेश करना  होगा जहाँ विकास के मसले पर देश के जनमानस को एकजुट करना होगा जिसकी डगर मुश्किल दिख रही है क्युकि गुजरात की परिस्थितिया अलग थी । वहां मोदिनोमिक्स माडल को हिंदुत्व के समीकरणों और खाम रणनीति के आसरे मोदी ने  नई  पहचान अपनी विकास की लकीर खींचकर दिलाई लेकिन केंद्र में गठबंधन राजनीती में ऐसी परिस्थितिया नहीं हैं । सरकार के अपने नेतागण आये दिन राम मंदिर , लव जेहाद, ध्रुवीकरण , को लेकर तीर छोड़ते रहते हैं और प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहते हैं जिससे जनता में  गलत सन्देश जाता है और मोदी के सबका साथ सबका विकास के नारों की हवा निकल जाती है । ऐसी मुश्किलों से पार्टी को बाहर निकालना होगा ।  लिहाजा  शाह  की राह में कई  कटीले शूल दिख रहे हैं जिनसे जूझ पाने की गंभीर  चुनौती अब  उनके सामने है । देखते हैं मोदी के लाडले अमित शाह  दूसरी पारी में क्या करिश्मा  कर पाते हैं  ?

बुधवार, 6 जनवरी 2016

पठानकोट के बाद भारत पाक का रास्ता

 
 
 
 
 
बीते बरस के आखिर में मोदी ने अपने रूस दौरे से लौटते समय पाक की यात्रा कर पूरी दुनिया में  भारत पाक  के करीब आने  को लेकर जहाँ सुर्खियाँ बटोरी वहीँ किसे पता था कि इस 16 वे बरस की शुरुवात में ही भारत पाक का करीब आना वहां के आतंकियों को रास नहीं आएगा ? पठानकोट स्थित एयरफोर्स बेस पर हुए आतंकी हमले में शामिल सभी छह आतंकवादियों को भले ही मार गिराया जा चुका हो लेकिन  इसके बावजूद सात जवानों को शहीद होने से नहीं बचाया जा सका । पठानकोट के बाद अब भारत पाक दोस्ती में आतंक की ऐसी दीवार खड़ी हो गयी है जिसके बाद  15 जनवरी से होने वाली  विदेश सचिवों की बातचीत पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं । 

पठानकोट की इस घटना के तार भी हमेशा की तरह पाक से जुड़ रहे हैं । यह लगभग साफ़ हो चुका  है कि गुरदासपुर की तरह पठानकोट में भी सुरक्षा और ख़ुफ़िया एजेंसियों में तालमेल की भारी कमी दिखाई दी जिसके चलते इतनी बड़ी साजिश को जैश ए  मोहम्मद के आतंकियों ने अंजाम दिया । आतंकियों ने पाक के एयरबेस कैम्पों में ना केवल ट्रेनिंग ली बल्कि पठानकोट के हर इलाके के बारे में जानकारी ली । आतंकी हमला होने के कुछ घंटे पहले तक पाक से निर्देश भी लेते रहे जो पाक के चेहरे को बेनकाब करने के लिए काफी है । लेकिन हमारी सरकार के लिए यह  हैरानी की बात है कि कुछ महीने पहले गुरदासपुर के पुलिस स्टेशन पर हमला करने वाले आतंकी पंजाब और जम्मू-कश्मीर से सटी सीमा के जिस क्षेत्र से आए थे पठानकोट  हमले को अंजाम देने वाले आतंकियों ने भी उसी रास्ते को अगर चुना है तो यह हमारी सुरक्षा व्यवस्था में बड़ी चूक की तरफ इशारा करता है। रक्षा  मंत्री मनोहर परिक्कर ने  भी माना है कि पठानकोट एयरबेस में हुआ हमला चिंता का विषय है । उन्होंने कहा कि  कुछ कमियां हमें इस पूरे मामले में नज़र आईं जिन्हें  हम भविष्य में उन्हें दुरुस्त करेंगे जो कहीं  न कहीं हमारी गंभीर लापरवाही की तरफ इशारा करता है और यह बताता है कि  गुरदासपुर के हमलों से हमने कोई सबक नहीं लिया । 

मोदी और शरीफ ने इस घटना के तुरंत बाद टेलीफ़ोन में बात कर घटनाक्रम पर अपनी प्रतिक्रिया जारी भी की । पाक के प्रधानमंत्री नवाज ने तो इसके दोषियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही का भरोसा इस बार भी मोदी को दे  दिया  लेकिन बड़ा सवाल यह है क्या शरीफ सरकार इस बार हमारे सबूतों के आधार पर कोई ठोस  कार्यवाही करेगी  या वह भी उसी तरह का रवैया अपनाने से परहेज नहीं करेगी जो उन्होंने 2008 में मुंबई और बीते बरस गुरदासपुर हमले के बाद अपनाया था ।  भारत  ने इस हमले से संबंधित सुबूत पाकिस्तान को इस बार भी सौंपे  हैं, लेकिन ऐसा तो 26/11 हमले को लेकर भी किया गया था और उसके बाद पाकिस्तान को 5 डोजियर भी सौंपे गए थे लेकिन इन सब पर पाक ने कोई कार्यवाही नहीं की । इस बार पठानकोट होने के चंद घंटों बाद पाक के विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया संतुलित थी । विदेश मंत्रालय ने कहा पाक दक्षिण एशिया में भारत को आतंकवाद के समूल नाश के लिए भारत का सहयोगी बनना चाहता है लेकिन सहसा इस बात पर यकीन करना  थोड़ा मुश्किल है क्युकि  वहां पर नवाज की सत्ता तो कहने भर को लोकतान्त्रिक है असल नियंत्रण तो सेना और आई एस  आई  का है जिसके बिना पत्ता भी नहीं हिलता ।   

भारत की तरफ से सचिव स्तर की वार्ता रद्द किए जाने के बाद सुषमा स्वराज की यात्रा के बाद जब दोनों देशों के रिश्तों में जमी बर्फ कुछ पिघलने लगी और पी एम मोदी ने 12  बरस के बाद पाक से दोस्ती का हाथ बढ़ाने की कोशिश की तो आतंकियों को शायद यह बात नागवार गुजरी है जिसकी परिणति पठानकोट के एयरबेस कैम्प में हमले के रूप में सामने आई है ।  अपनी करतूतों से पाकिस्तान में ट्रेनिंग लेकर आतंकियों  ने एक बार फिर अपना घिनौना  चेहरा पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया है ।   अपनी बर्बर कार्यवाही से आतंकी  फिर से कश्मीर को लेकर एक नई किस्सागोई करने में लगे हुए हैं  क्युकि पाकिस्तान के अन्दर नवाज शरीफ सरकार के सामने जैसा संकट अभी खड़ा है उससे उनका बाहर निकलना मुश्किल दिख रहा है और कश्मीर को ढाल बनाकर पाकिस्तान एक बार फिर अपना बरसो पुराना वही राग अलाप रहा है जिसमे कश्मीर को केंद्र में लाकर हमेशा से नई परिस्थिति सामने लायी जाती रही है  ।  सीमा पार पर अपनी  बर्बर कार्यवाही से जहाँ  पाक में बैठे आतंकी कश्मीर को लेकर किसी तरह की सौदेबाजी करने के मूड में नहीं दिखाई देते  वहीँ कश्मीर को केंद्र में रखकर पाक सरकार  भारत से बातचीत का राग  हर दफे दोहराती  रही   है लेकिन बीते दिनों मोदी ने जिस तरीके से बरसों से  विदेश सचिवो की बातचीत शुरू करने की दिशा में मजबूती से  कम्पोजिट डायलॉग प्रोसेस को आगे बढ़ाया  उसने पहली बार इन सवालों को भी खड़ा किया है क्या मोदी पहली बार नेहरु की नीतियों के आगे बेबस ना होते हुए खुद अपनी बनाई नीतियों तले पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तान को हुर्रियत की छतरी से इतर आमने सामने लाने में सफल होते दिख रहे हैं । 

बातचीत शुरू होने की प्रक्रिया के बीच पठानकोट हमला  दोनों देशों के  द्विपक्षीय संबंधों के लिए बहुत अनुकूल नहीं हैं। सत्ता में आने से पहले  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भावी वार्ता के लिए  कहा था किसी भी सार्थक द्विपक्षीय वार्ता के लिए आवश्यक रूप से एक ऐसा माहौल जरूरी है जो आतंकवाद एवं हिंसा से मुक्त हो लेकिन पठानकोट के हालिया हमले से ऐसा माहौल पैदा हो रहा है जो दोनो देशों के बीच संबंधों के लिए बहुत सहायक नहीं रहने वाला | मोदी सरकार के दौर में  पाकिस्तान द्वारा संघर्षविराम का कई बार  उल्लंघन किया गया। इस दौरान कई  बेक़सूर लोग  मारे गये और कई  जवानों सहित लोग  घायल हो गये लेकिन इसके बाद भी सरकार इस उधेड़बुन में उलझी ही रही की पाक से क्या बातचीत को आगे बढ़ाया जाए ? 

पठानकोट अब देश के सामने बड़ा सवाल है ।  अब पाक  के साथ  किस मुह से हम दोस्ती का हाथ बढ़ाये ? पकिस्तान के साथ दोस्ती का आधार क्या हो वह भी तब जब वह लगातार भारत की पीठ पर छुरा भौंकते  हुए लगातार विश्वासघात ही करता जा रहा है । भारतीय नीति नियंताओ से अब हमारा सीधा   सवाल है कि अब समय आ गया है जब पाकिस्तान  को कूटनीति के मोर्चे पर मौत दी जाए ।  मोदी सरकार पाकिस्तान की लोकतांत्रिक सरकार और वहां के सैन्य तंत्र को दो अलग सत्ता केंद्र के रूप में बेनकाब करने में सफल होती है तो यह  इस जनतांत्रिक सरकार की  बड़ी कामयाबी होगी । पठानकोट  का सबसे बड़ा सबक यह है कि सुरक्षा में लगी तमाम एजेंसियों के बीच समन्वय को पुख्ता किया जाए और ऐसे मामलों में किसी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जानी चाहिए। इसमे पंजाब सरकार भी अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकती क्योंकि आतंकियों ने हमले के लिए जगह  को चुना वह पंजाब से सटा  है और पाकिस्तान की सीमा से लगने के कारण यह मानना सही नहीं होगा कि भविष्य में इस तरह के हमलों की पुनरावृत्ति  नहीं होगी । 

     असल में  कारगिल के दौर में भी पाक  ने भारत के साथ गलत सलूक किया था  ।  हमारे प्रधानमंत्री वाजपेयी रिश्तो  में गर्मजोशी लाने लाहौर बस से गए लेकिन  नवाज  शरीफ  को अँधेरे में रखकर मिया मुशर्रफ  कारगिल की पटकथा तैयार करने में लगे रहे । इस काम में उनको पाक की सेना का पूरा सहयोग मिला था । इस बार की कहानी भी पिछले बार से जुदा नहीं है । नवाज के दौर में भी  आई एस आई पाकिस्तान के आंतरिक और बाह्य मामलो में अपना सिक्का दिनों दिन  मजबूत कर रही है | पाकिस्तान में यह सच शायद ही छुपा है कि आई एस आई के बिना पाकिस्तान में पत्ता भी नहीं खड़कता और सेना  भारत के साथ रिश्तो को सुधारने के बजाए बिगाड़ना ही चाहती है । अंतर्राष्ट्रीय जानकारों का मानना है भारत विरोधी गतिविधियों  में  अक्सर आतंकियों  को पाक के सैनिको को  पूरा समर्थन मिलता  रहा है ।  पाक में सरकार तो नाम मात्र की है वहां पर चलती सेना की ही है और बिना सेना के वहां पर पत्ता भी नहीं हिला हिलता  ।   

कट्टरपंथियों की बड़ी जमात वहां ऐसी है जो भारत के साथ सम्बन्ध सुधरते नहीं देखना चाहती है ।  ऐसी सूरत में अगर हम बार बार उससे दोस्ती का राग  छेड़ते है  तो यह हजम नहीं होता क्युकि  छलावे के सिवा यह कुछ भी नहीं है । ऐसे में मोदी सरकार द्वारा पाक से बातचीत शुरू करने की पहेली काम से काम पठानकोट के बाद तो किसी के गले नहीं उतर  रही ।   आखिर कब तक हम पाक के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाते रहेगे  और बातचीत से मेल मिलाप बढ़ायेंगे जबकि हर मोर्चे पर वह हमको धोखा ही धोखा देता आया है । इस घटना के बाद हमारे नीतिनियंताओ को यह सोचना पड़ेगा  अविश्वास की खाई  में दोनों मुल्को की दोस्ती में दरार पडनी  तय है । अतः अब समय आ गया है जब हम पाक के साथ इजराइल सरीखी आक्रामक रणनीति के साथ काम करें  ताकि पाक के चेहरे को पूरी दुनिया में बेनकाब किया जा  सके ।

  मुंबई  में 26/11 के हमलो में भी पाक की संलिप्तता पूरी दुनिया के सामने ना केवल उजागर हुई थी बल्कि पकडे गए आतंकी कसाब ने  यह खुलासा  भी किया हमलो की साजिश पाकिस्तान में रची गई जिसका मास्टर माइंड हाफिज मोहम्मद  सईद  था । हमने मुंबई हमलो के पर्याप्त सबूत पाक को ना केवल सौंपे बल्कि 5  डोजियर  सौंपे लेकिन आज तक वह इनके दोषियों पर कोई कार्यवाही नहीं कर पाया है । आतंक का सबसे बड़ा मास्टर माईंड हाफिज पाकिस्तान में खुला घूम रहा है और  भारत  के खिलाफ लोगो को जेहाद छेड़ने के लए उकसा भी रहा है लेकिन आज तक हम पाक को हाफिज के मसले पर ढील ही देते रहे हैं  यही कारण  है वहां की सरकार  उसे पकड़ने में नाकामयाब रही है ।  2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हमले के बाद उसके जमात उद  दावा ने  कश्मीर के ट्रेंनिग कैम्पों में घुसकर युवको को  जेहाद के लिए प्रेरित किया । अमेरिका द्वारा उसके संगठन  को प्रतिबंधित  घोषित  करने  और उस पर करोडो डालर के इनाम रखे जाने के बाद भी पाकिस्तान  सरकार  ने उसे कुछ दिन लाहौर की जेल में पकड़कर रखा और जमानत पर रिहा कर दिया । आज  पाकिस्तान   उसके  पाक में होने को सिरे से नकारता रहा है जबकि असलियत यह है पुंछ  में हाफिज की संलिप्तता कई बार  उजागर भी  हुई है । पाकिस्तान के कब्जे वाले पी ओ  के में हाफिज का जबरदस्त प्रभाव है जो अभी  पाकिस्तान के कट्टरपंथियों के साथ भारत में घुसपैठ बढाने की  बड़ी कार्ययोजना को तैयार भी  कर रहा है ।  

भारतीय गृह मंत्रालय भी अब सीमा पार हो रही गोलाबारी को लेकर चिंतित ही नहीं चौकन्ना हो गया है शायद यही वजह थी मोदी ने अपनी विदेश नीति को लेकर पहली बार नई लकीर यह कहते हुए खींची कि घुसपैठ और गोलाबारी के बीच दोनों देशो के बीच बातचीत नहीं हो सकती साथ ही उन्होंने किसी तीसरे पक्ष के साथ मध्यस्थता से भी साफ़ इनकार कर दिया जिसको मोदी की बड़ी कूटनीति माना जा सकता है लेकिन एक बार फिर पाकिस्तान के साथ दोस्ती  बातचीत के अंदाज में शुरू करने की प्रक्रिया जब परवान चढाने की कोशिशे की जा रही थी तब पठानकोट के हमले ने साबित कर दिया है आतंकवाद से लड़ने के पाक के दावे महज खोखले ही साबित हुए हैं ।  अब ऐसे हालातो में पाक हमसे  बेहतर सम्बन्ध कैसे बना सकता है  ? 

 26 / 11 के हमलो के बाद भारत ने  जहाँ कहा था जब तक 26 /11 के दोषियों पर पाक  कार्यवाही नहीं करेगा तब तक हम उससे कोई बात  नहीं  करेंगे लेकिन आज तक उसके द्वारा दोषियों पर कोई कार्यवाही ना किये जाने के बाद भी हम 200 बिलियन व्यापार , वीजा  नियमो में ढील , क्रिकेट और विदेश सचिवो  के आसरे अगर इस दौर में निकटता बढाने कि सोच  रहे हैं तो यह हमारी लुंज पुंज विदेश नीति वाले रवैये को उजागर करता है । एक बार   भारत दौरे पर आये रहमान मालिक से जब 26 /11 के बारे में हमने पूछा तो उन्होंने कहा इवाइडेंस और आरोपों में भेद होता है । अगर भारत सबूत पेश करता है तो पाक 26/11 के दोषियों को सजा देगा । लेकिन यह कैसा सफ़ेद झूठ  है । भारत तो पहले  ही पाक को सभी सबूत पेश कर  चुका  है लेकिन पाक उस पर कोई कार्यवाही  क्यों नहीं करता ?  अब तो  हर घटना में अपना  हाथ होने से इनकार करना और दोषियों पर कार्यवाही का झुनझुना थमाना  पाक का शगल ही बन गया है । लाइन ऑफ़ कंट्रोल पर युद्ध विराम तो नाम मात्र का है इसके बावजूद भी उस पूरे इलाके में सैनिको के बीच अकसर तनाव देखा जा सकता है और फायरिंग की घटनाएं आये  दिन होती रहती हैं । भारतीय सेना में घुसपैठ की कार्यवाहियां अब पाक की सेना  ही कर  रही है  क्युकि  पाक  का पूरा ध्यान अपने अंदरूनी झगडो  और तालिबान में लगा रहा है । उसे लगता है अगर ऐसा ही जारी रहा तो आने वाले दिनों में कश्मीर उसके हाथ से निकल जायेगा । अतः ऐसे हालातो में वह अब  जैश ऐ मोहम्मद,  लश्कर और हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनो को पी ओ  के  में भारत के खिलाफ एक  बड़ी जंग लड़ने के लिए उकसा रहा  है जिसमे कई कट्टरपंथी संगठन उसे मदद कर रहे हैं । पाक की राजनीती का असल सच किसी से छुपा नहीं है । वहां पर सेना कट्टरपंथियों का हाथ की कठपुतली ही  रही है । नवाज  सरकार तो नाम मात्र की लोकत्रांत्रिक है  असल नियंत्रण तो सेना का हर जगह है ।  पाक इस बार यह महसूस कर रहा है अगर समय रहते उसने भारत के खिलाफ अपनी जंग शुरू नहीं की तो कश्मीर का मुद्दा ठंडा पड  जायेगा । अतः वह भारतीय सेना को अपने निशाने पर लेकर कट्टरपंथियों की पुरानी  लीक पर चल निकला है । 

कश्मीर का राग पाक का पुराना राग है जो दोस्ती के रिश्तो में सबसे बड़ी दीवार है । ऐसे दौर में हमें पाक पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है । हमारी सेना को ज्यादा से ज्यादा अधिकार सीमा से सटे इलाको में मिलने चाहिए । सीमा पार खराब हालातो के चलते  अब भारत को पाक के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए । उसे किसी तरह की ढील नहीं मिलनी चाहिए । पाक  हमारे धैर्य  की परीक्षा ना ले अब ऐसे बयान देकर काम नहीं चलने वाला क्युकि हाल के बरसों में  सीमा पार की गोलाबारी की घटनाओ ने  हमारे  सैनिकॊ  के मनोबल को   गिराने का काम किया है । पाक के साथ भारत को अब किसी तरह की नरमी नहीं बरतनी चाहिए और कूटनीति के जरिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर  पर उसके खिलाफ माहौल बनाना  चाहिए  साथ ही अमेरिका सरीखे मुल्को से बात कर यह बताना  चाहिए  आतंक के असल सरगना पकिस्तान में  पल रहे हैं और आतंकवाद के नाम पर दी जाने वाली हर मदद का इस्तेमाल पाक दहशतगर्दी फैलाने में कर रहा है । इस समय पाक को  तकरीबन 3 अरब से ज्यादा की सालाना  इमदाद अमेरिका के आसरे मिल रही है जिससे पाक की माली हालत कुछ सुधरी है अन्यथा वहां की अर्थव्यवस्था तो पटरी से उतर चुकी है । आर्थिक विकास  दर  जहाँ लगातार घट रही है वहीँ आतंक के माहौल के चलते कोई नया निवेश नहीं हो पा रहा है । घरेलू गैस से लेकर तेल की बड़ी कीमतों ने संकट बढाया  है |   अगर पाक को विदेशो से मिलने वाली मदद इस दौर में बंद हो जाए तो उसका दीवाला निकल जायेगा । ऐसी सूरत में कट्टरपंथियों के हौंसले भी पस्त हो जायेंगे । तब भारत  पी ओ के में चल रहे आतंकी शिविरों को अपना निशाना बना सकता है ।  माकूल कार्यवाही के लिए यही समय बेहतर होगा ।  अब समय आ गया है जब पाक के खिलाफ भारत बातचीत के विकल्पों से इतर कोई बड़ी कार्यवाही की रणनीति  अख्तियार करे क्युकि एक के बाद एक झूठ  बोलकर पाक हमें धोखा दे रहा है और कश्मीर के मसले के अन्तरराष्ट्रीयकरण  के पक्ष में खड़ा है । 

 आज तक हमने पाक के हर हमले का जवाब बयानबाजी से ही दिया है । भारत सरकार धैर्य , संयम  की दुहाई देकर हर बार लोगो के सामने सम्बन्ध सुधारने की बात दोहराती रहती है ।  इसी नरम रुख से पाक का दुस्साहस इस कदर बढ  गया है  कभी वह हमारे जवानो के शव धड से अलग कर अंतरराष्ट्रीय नियमो का उल्लंघन करता है तो कभी गुरदासपुर और पठानकोट के जरिये हमारे मनोबल को गिराने की कोशिश करता है  । यह साफ़ है कि  गुरदासपुर और पठानकोट जैसे हमलों को बिना सघन तैयारी के अंजाम नहीं दिया जा सकता । चूँकि इन दोनों हमलों पर भारतीय सेना को सीधा निशाना बनाया गया जिससे यह बात तो साफ़ हो चुकी है इन हमलों का सीधा मकसद भारतीय सैन्य ताकत को सीधी  चुनौती देना था । 
 
यह दौर नमो सरकार के लिए भी  असली परीक्षा का है  क्युकि  उसी की नीतियां अब पाक के साथ भारत के भविष्य को ने केवल तय कर सकती है बल्कि अंतरराष्ट्रीय  मोर्चे पर यह मामला उसकी कूटनीति के आसरे दुनिया तक पहुच सकती  है । | प्रचंड जनादेश हासिल कर मोदी  गदगद हैं | वह पूरी दुनिया घूमकर भारत के अनुकूल नीतियों को बनाने में लगे हैं | उनकी विदेश नीति  पर इस बार पूरी दुनिया की नजर  है |  ऐसे में पाकिस्तान को लेकर अब पठानकोट के बाद  उनकी नीतियों पर  सबकी  नजर है ।   अब देखना होगा भारत  सरकार कश्मीर  को लेकर अपना क्या रुख आने वाले दिनों में अपनाएगी ताकि सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे ?