रविवार, 26 जुलाई 2009

कलह ने किया कमजोर............





"अस्सी पार के इस पड़ाव में आडवाणी का सक्रिय राजनीती में बने रहना एक त्रासदी की तरह है...|क्युकि पार्टी मेंजितना योगदान उनको देना था वह दे चुके ...|अब उनकी रिटायर मेंट की एज हो गई है... बेहतर होगा वह अबआराम करे और युवा पीड़ी के हाथ कमान सौप दे.... पर आडवानी का बने रहना यह बताता है भाजपा का संकटअभी खत्म नही हुआ है .......|"
ऊपर का यह बयान भाजपा की सूरते हाल को सही से बताने के लिए काफ़ी है ...|यह बयान कभी भाजपा के थिकटेंक की रीद रहे के एन गोविन्दाचार्य का है जिन्होंने लंबे अरसे से भाजपा को करीब से देखा है ...|वर्तमान में वह भाजपा छोड़ चुके है और राष्ट्रीय स्वाभिमान आन्दोलन के संयोजक भी है ...| भाजपा में आज कुछ भी सही नही चलरहा है...| अनुशासन के नाम पर जो पार्टी अपने को दूसरो से भिन्न मानती थी आज वही अनुशासन पार्टी को अन्दर से कमजोर कर रहा है...| चारो ओर हताशा का माहौल है ...| उनतीस सालो के लंबे इतिहास में यह पहला संकट हैजब पार्टी में व्यक्ति की लड़ाई अहम हो गई है...|
पार्टी में अभी भारी उथल पुथल मची हुई है ...|वर्तमान दौर ऐसा है जब भाजपा के पास अपने अस्तित्व को बचाने की गहरी चुनोती है॥| उसके पुराने मुद्दे वोटरों पर अपना असर नही छोड़ पा रहे है...|इसी कारण पार्टी अभी "बेकगेयर " में चल रही है ...| हमारे देश का युवा वोटर जिसकी तादात तकरीबन ६५ फीसदी है वह राहुल गाँधी के " हाथपर मुहर लगाना पसंद करता है ....|परन्तु वह ८१ के पड़ाव पर खड़े आडवाणी को प्रधान मंत्री की कुर्सी पर नही देखना चाहता है॥| यह सवाल भाजपा के लिए निश्चित ही खतरे की घंटी है...|अतः ऐसे में पार्टी को आडवानी पर निर्भरता को छोड़ किसी दूसरे नेता को आगे करने पर विचार करना चाहिए..|परन्तु लोक सभा चुनाव निपटने के बाद अभी भी भाजपा आडवानी का विकल्प नही खोज पा रही है यह अपने में एक चिंता जनक बात है...|
हमको तो समझ से परे यह बात लगती है आडवानी ने चुनावो से पहले यह कहा था अगर वह इस बार पी ऍम नहीबन पाये तो राजनीती से सन्यास ले लेंगे....लेकिन अभी तक आडवानी कुर्सी से चिपके हुए है..|उनके माथे पर हार की कोई चिंता नजर नही रही है ...| फिर से रथ यात्रा की तैयारिया की जाने लगी है...|
पार्टी में बहुत से नेता हार का दोष आडवानी को दे रहे है...|पर आडवानी की माने तो "जब पार्टी जीतती है तो यह सभी की जीत होती है हारती है तो यह भी सभी की हार होती है "...| अब साहब इस बयान के क्या अर्थ निकाले? मतलब साफ है अगर भाजपा इस चुनाव में हारी है तो सिर्फ़ उनके कारण नही...|आडवानी की "मजबूत नेता निर्णायक सरकार " कैम्पेन के रणनीतिकार सुधीन्द्र कुलकर्णी ने भी अपने एक लेख में उनको बचाया है.......|कुलकर्णी ने भी हार का ठीकरा अन्य नेताओ के सर फोड़ा है...|
साफ़ है पराजय के बाद भी आडवाणी हार मानने को तैयार नही है...| तभी तो चुनाव में भाजपा की भद्द कराने केबाद आडवानी ने अपनी पसंद के लोगो को मनचाहे पदों में बैठाने में कोई कसर नही छोडी...| लोक सभा
में उपनेता के तौर पर सुषमा की ताजपोशी और राज्य सभा में जेटली को पुरस्कृत कर आडवाणी ने अपनी मंशा जता दी है....."हार नही मानूंगा... सिक्का तो मेरा ही चलेगा"..........|
आडवानी की मंशा है अभी ज्यादा से ज्यादा लोगो को उनकी मर्जी से महत्वपूर्ण पदों में बैठाया जाए...|यही नही अगर सब कुछ ठीक रहा तो राजनाथ के बाद "अनंत कुमार " पार्टी के नए प्रेजिडेंट हो सकते है...|पर हमारी समझ अनुसार अभी आडवानी को २०१४ के चुनावो के लिए पार्टी को एकजुट करने पर जोर देना चाहिए...| साथ ही उन कारणों पर मंथन करना चाहिए जिनके चलते पार्टी की लोक सभा चुनावो में करारी हार हुई..|अभी महीने पहले हुईभाजपा की
रास्ट्रीय कार्य समिति की बैठक में हार के कारणों पर कोई मंथन नही किया गया...| निष्कर्ष निकला "दिन चले अदाई का कोस"......| वहाँ भी एक दूसरे पर टीका टिप्पणी जमकर हुई.....|पर हार के कारणों पर कोईमंथन नही हुआ.........|
भाजपा को यह समझना चाहिए इस चुनाव में आतंरिक कलह ने उसको अन्दर से कमजोर कर दिया....| राजानाथ के साथ आडवानी का ३६ का आंकडा जगजाहिर था साथ में पार्टी के कई बड़े नेता उनको प्रधान मंत्री पद की कुर्सी पर बैठते नही देखना चाहते थे...|चुनावी प्रबंधन सही से हो पाने के चलते पार्टी की करारी हार हुई.....|गौर करनेलायक बात यह है आज भाजपा में वह जोश नही है जो अटल बिहारी वाजपेयी जी के दौर में था ...|उस दौर में पार्टीमें एकजुटता थी .....| पर आज पार्टी में पञ्च सितारा संस्कृति हावी हो चुकी है...| पार्टी अपने मूल मुद्दों से भटक गईहै...| सत्ता की मलाई चाटते चाटते पार्टी इतनी अंधी हो गई है "हिंदुत्व " और एकात्म "मानवता वाद " रद्दी की टोकरी में चले गए है...|आज पार्टी यह तय नही कर पा रही है किस विचारधारा में चलना उसके लिए सबसे अच्छाहै...| संघ के साथ रिश्ते बनाये रखे या उससे अपने रिश्ते तोड ले इस पर पार्टी में कलह मचा हुआ है...|
पार्टी यह नही समझ पा रही है उसका हिंदुत्व किस तरह का है? परन्तु संघ की काली छाया से पार्टी अपने कोमुक्त कर लेगी ऐसा मुश्किल दिखाई देता है ..|भाजपा को इस बात को समझना चाहिए अब समय गया है जब वह किसी नए नेता का चयन करे और बूडे नेताओ पर अपनी निर्भरता को छोड़ दे...|युवा देश की सबसे बड़ी ताकतहै ... २०१४ में कांग्रेस से राहुल गाँधी पी ऍम पद की दौड़ में आगे रहेंगे.... पर भाजपा अपना नया लक्ष्मण नही खोजपा रही है ......| २००४ की तरह इस बार की हार को पार्टी नही पचा पा रही है.....| तभी तो हार के बाद भी अरुण शोरी, यशवंत सिन्हा अपनी वाणी पर लगाम नही लगा पा रहे है ...|
भाजपा की ग्रह दशा इस समय सही नही चल रही है....|सादे साती की यह दशा पार्टी में लंबे समय तक बने रहने काअंदेशा बना हुआ है...| सभी ने जेटली के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला हुआ है..|एक तरफ़ आडवानी के प्रशंसको की लॉबीखड़ी है तो दूसरी तरफ़ राजनाथ के प्रशंसको की कतार ....| एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशे जारी है..| कहाँतो हार की समीक्षा होनी चाहिए थी पर एक दूजे को कुर्सी से बेदखल करने की मुहिम पार्टी में चल पड़ी है...|पार्टी मेंहर नेता अपने को बड़ा समझने लगा है....| और तो और अपने आडवानी बुदापे में ओबामा जैसा बनने की चाहतफिर से पालने लगे है.... ऐसे में पार्टी की खराब हालत कैसे सुधार जायेगी?
इन हालातो में पार्टी में किसी युवा नेता की खोज दूर की कौडी लगती है ...|अगर ऐसा ही रहा तो पार्टी अपने झगडोमें ही उलझ कर रह जायेगी..|वैसे इस कलह ने भाजपा को अन्दर से कमजोर कर दिया है और भगवा पार्टी केभीतर पनप रहे असंतोष के लावे को पूरे देश के सामने ला खड़ा किया है ...| इसी कारण लोग अब भाजपा कीकथनी करनी समझने लगे
है.............|


गुरुवार, 16 जुलाई 2009

जनरल की विदाई अब निशंक की बारी......................







आखिरकार उत्तराखंड से मुख्यमंत्री बी सी खंडूरी की विदाई हो गई... लंबे समय से उनको हटाने की सुगबुगाहट यू तो बहुत पहले से चल रही थी परन्तु हाई कमान उनको हटाये जाने के सम्बन्ध में पशोपेश में था ... इस बार लोक सभा की पाँच सीट गवाने के बाद उत्तराखंड में खंडूरी के ख़िलाफ़ माहौल तैयार हो गया था परन्तु भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बैठक का हवाला देकर हाई कमान इस मसले को लगातार टालता रहा ... भुवन चंद्र खंडूरी के इस्तीफे के बाद उत्तराखंड में नए मुख्यमंत्री के तौर पर स्वास्थ्य मंत्री "रमेश पोखरियाल "निशंक" की ताजपोशी कर दी गई है ... दिल्ली में काफ़ी माथा पच्चीसी के बाद आला कमान ने खंडूरी के चहेते "निशंक "का दाव खेलकर खंडूरी के धुर विरोधी भगत सिंह कोश्यारी को पस्त कर दिया ... राज्य गठन के सादे आठ वर्ष से अधिक के कार्यकाल में भाजपा के तीन मुख्यमंत्री सी ऍम की कुर्सी संभाल चुके है ॥ "निशंक "इस कुर्सी को संभालने वाले प्रदेश के पाँचवे और भाजपा के चौथे मुख्यमंत्री है...
"निशंक" की ताजपोशी के बाद भाजपा हाई कमान ने निश्चित ही चैन की साँस ली है ......उत्तराखंड में खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाने की माग को वहां के विधायक और कुछ स्थानीय नेता नही पचा पा रहे थे... इस कारण खंडूरी की ताज पोशी पर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी सरीखे नेताओ को कड़ी आपत्ति होने लगी थी जिस कारण दो दर्जन विधायको को उन्होंने अपने पाले में लाने की कोशिसो को शुरू कर दिया था...
यह विधायक उस समय कोश्यारी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर रहे थे परन्तु भाजपा का शीर्ष नेतृत्व खंडूरी को राज्य का सी ऍम बनाने का मन चुनावो से पहले ही बना चुका था.... इसी कारण तत्कालीन समय में कोश्यारी के पास बड़े पैमाने पर विधायको के समर्थन के बावजूद खंडूरी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया.... उस समय से लग गया था खंडूरी को कोश्यारी नही पचा पायेंगे और भविष्य में उनके लिए बहुत मुश्किल खड़ी करेंगे .... राजनीतिक प्रेक्षकों का यह अनुमान आज सोलह आने सच साबित हुआ है.....बीते ढाई सालो में कोश्यारी की सी ऍम बनने की चाहत कम नही हुई जिसके चलते खंडूरी की राज्य में कम दिलचस्पी रही...
दरअसल उत्तराखंड जैसे राज्य में खंडूरी को कमान सोपने की मुख्य वजह उनकी ईमानदार और कुशल प्रशासक की छवि रही ॥ साथ में एन डी ऐ सरकार के दौर में केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री के तौर पर खंडूरी ने अपने कार्यो के द्बारा खासी वाह वाही बटोरी थी जिस कारण उन पर अटल , मुरली मनोहर , आडवानी जैसे नेताओ का शुरू से वरदहस्त रहा...... उनकी बेहतर प्रशासकीय एबिलिटी के चलते उनको केन्द्र की राजनीती से राज्य में लाया गया...इसके चलते तिवारी सरकार के बाद राज्य के दूसरे आम चुनाव में खंडूरी को चुनाव प्रचार के दौरान निकाले जाने वाली परिवर्तन यात्राओ में आगे किया जाने लगा.... पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के निशाने पर राज्य में फौजियों की बड़ी तादात भी थी जिस कारण खंडूरी को आगे कर राज्य के फौजी वोटरों के वोट अपने पाले में लाये जा सकते थे ...भाजपा को इस चुनाव में सफलता मिली... कांग्रेस की करारी हार हुई॥ भाजपा ने कुछ निर्दलियों और यू के डी को अपने साथ लेकर एक बडा संख्या बल अपने साथ कर लिया ... मुख्यमंत्री पद पर खंडूरी की ताजपोशी हाई कमान के वरदहस्त के चलते की गई जिसको उनके विरोधी शुरू से नही पचा पाये...इसी कारण वह खंडूरी की कार्य शेली पर नजर रखते रहे.. मुख्यमंत्री की कुर्सी पाने के बाद खंडूरी के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह हुई ६ महीने के अन्दर कहाँ से चुनाव जाए...खंडूरी ने ऐसा दाव चल दिया विरोधी चारो खाने चित हो गए... जनरल खंडूरी ने कांग्रेस के रावत से हाथ मिला कर उनकी सीट धुमाकोट से चुनाव लड़ा वहां जीत दर्ज की... इसके बाद खंडूरी ने अपने दौरे शुरू किए ॥ सरकार आपके द्वार शुरू हुआ .... पहली बार कोई मुख्यमंत्री जनता के द्वारे आया॥ इससे लोगो में आस जगी ... पर विरोधी खंडूरी को नही जान पाये ॥ खंडूरी ने सभी मलाईदार मंत्रालय अपने पास रखे और कांग्रेस के पूर्व मुखिया तिवारी की तरह लाल बत्तिया बाटने में कंजूसी दिखाई....

भाजपा के एक विधायक की माने तो खंडूरी कोई भी काम इमानदारी से किया करते थे ... फाईलो में विधायको की सहमती के बाद भी उनका दखल बना रहता था जिस कारण भाजपा के तमाम मंत्री संतरी उनके आस पास फटकने से कतराया करते थे...आलम यह था खंडूरी के राज में अफसरशाही खौफ खाती थी ...


खंडूरी के विरोधी गुट की अगुवाई कर रहे भगत सिंह कोश्यारी को उनके विरोध के लिए कोई न कोई ठोस बहाना तो चाहिय्रे था लिहाजा वह अपने साथ विधायको की एक बड़ी टोली साथ लेकर दिल्ली के बार बार चक्कर काटने लगे ॥ कोश्यारी ने अपने समर्थको को साथ लेकर ऐसा माहौल बनाया खंडूरी राज्य में ताना शाही दिखा रहे है.... मंत्रियो से मिलने का कोई समय खंडूरी के पास नही है ...मुख्यमंत्री से मिलने को जब मंत्री को कई बार अनुनय विनय करनी पड़ती है तो आम आदमी का क्या हाल होगा ऐसा समझा जा सकता है? अगर यही हाल रहा तो राज्य में भाजपा के विधायक मुह दिखाने लायक नही रह जायेंगे............




उस समय हाई कमान ने विधायको को समझ बूझ के साथ मन लिया॥ खंडूरी से भी कहा आप सभी को साथ लेकर चले..पर असंतोष का लावा जो मार्च २००७ के समय खंडूरी की ताजपोशी के समय बनकर तैयार हुआ था वह तो सुलगता ही रहा ॥ खंडूरी राज्य का विकास अपने विजन के अनुसार चाहते थे अतः उन्होंने अपने हिसाब से चलना उचित समझा .. खंडूरी के विरोधी उनके हर फेसले पर अंगुली उठाया करते थे ॥ खंडूरी के करीबी "प्रभात कुमार सारंगी" भाजपा के कुछ विधायको की गले की फाँस बन गए..हर काम में सारंगी के अनावश्यक दखल को यह विधायक पसंद नही करते थे जिस कारण सारंगी को बहाना बनाकर कुछ लोगो ने खंडूरी पर निशाना साधने की कोशिसे हाई कमान के सामने की ॥ पर हाई कमान ने इस पर खंडूरी की अच्छी से क्लास ले डाली...जिसके बाद खंडूरी ने सारंगी के अधिकारों में कटौती शुरू कर दी ॥ इसके बाद भी कोश्यारी समर्थक चुप नही बैठे ॥ मानो उन्होंने खंडूरी को सबक सिखाने की पूरी तैयारिया ही कर ली थी....





फिर क्या था अगस्त २००८ में कोश्यारी के साथ उनके समर्थक फिर दिल्ली आ पहुचे... दो दर्जन विधायको ने यहाँ खंडूरी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया..कोश्यारी विधायक दिल्ली में बड़ा चदाकर बातें पेश किया करते थे..एक सूत्र की माने दिल्ली में खंडूरी को किसी तानाशाह की तरह से पेश किया जाता था...परन्तु हाई कमान को खंडूरी पर पूरा भरोसा था लिहाजा उसने पंचायत चुनाव और लोक सभा चुनाव तक मामला शांत करने की बात की..हाई कमान के फिर से दखल के बाद सभी एकजुट होकर इन चुनावो की तैयारी में जुट गए..इन चुनावो में खंडूरी के नेतृत्व में पार्टी ने धमाकेदार जीत दर्ज की..पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा...खंडूरी के नेतृत्व में पार्टी एक के बाद एक चुनाव जीतती रही ॥


इस जीत के बाद खंडूरी मजबूत हो गए...पर विरोधी कहाँ मानने वाले थे वह तो मानो खंडूरी को नेश्तानाबूद करने की ठान ही चुके थे..निकाय चुनाव के बाद फिर से खंडूरी समर्थक विधायको ने दिल्ली में खंडूरी हटाओ का मोर्चा खोल दिया..इस बार जनरल की फौजी स्टाइल निशाने पर रही..खंडूरी विरोधियो ने कहा जनरल सबको समय नही दे पाते है ..उससे मिलने के लिए बड़ी मिन्नत करनी पड़ती है..हाई कमान इस बार सही नब्ज पकड़ने में कामयाब हुआ ..उसने राज्य की राजनीति से "कोश्यारी" की छुट्टी करवा दी और उनको राज्य सभा भेज दिया..उनसे "कपकोट" का इस्तीफा दिलवाया गया॥ कोश्यारी के राज्य सभा में जाने के बाद खंडूरी ने रहत की साँस ली..लेकिन उसके कुछ समय बाद खंडूरी की असली परीक्षा शुरू हुई ...वह थी १५ वी लोक सभा का चुनाव जहाँ पर उनकी प्रतिष्ठा दाव पर लगी थी..इस बार खंडूरी की किस्मत साथ नही रही.....इस बार जैसे ही चुनाव परिणाम सामने आए वैसे ही दून में खंडूरी हटाओ मुहीम फिर से कुलाचे मारने लगी.....

१५ वी लोक सभा में तो पानी पूरी तरह से सर के ऊपर बह गया... भाजपा की पूरी ५ सीट पर करारी हार हो गई... भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बची सिंह रावत जहाँ नैनीताल सीट हार गए वही पौडी संसदीय सीट से खंडूरी हार गए..यहाँ यह बताते चले पौडी गडवाल खंडूरी का गड़ रहा है॥ उत्तराखंड का मुख्यमंत्री बनने से पहले वह इस सीट का प्रतिनिधित्व करते आ रहे है..सी ऍम बनने के बाद १४ वी लोक सभा में यह सीट खली हो गई थी जिसे जीतने में टी पी एस रावात कामयाब हुए थे... लेकिन इस बार यह सीट कांग्रेस के खाते में गई है ॥ सतपाल महाराज यहाँ से सांसद निर्वाचित हुए है..वह पूर्व में केन्द्रीय रेल राज्य मंत्री रह चुके है॥


इस हार ने खंडूरी हटाओ आंधी को हवा देनी शुरू कर दी... चुनाव परिणामो के बाद खंडूरी ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेने की बात कही और राजनाथ को अपना इस्तीफा भी भेज दिया..पर राजनाथ ने इसको मंजूर नही किया..इसी समय से राज्य में उनके विरोधी कोश्यारी फिर से सक्रिय हो गए..उनको यकीन हो गया इस बार खंडूरी का सिंहासन खतरे में है॥ इसी बीच यशवंत सिन्हा की ख़बर आई.... इसी तर्ज पर कोश्यारी ने अपना ब्रह्मास्त्र चला दिया ॥ उन्होंने राज्य सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया..कोश्यारी ने अपने इस्तीफे में कहा अब वह राज्य में पार्टी संगठन के लिए काम करेंगे जिससे २०१२ के चुनाव में पार्टी मजबूत हो सकेगी..कोश्यारी के इस कदम की भनक लगते ही हाई कमान के हाथ पाँव फूल गए..सरकार पर खतरा मडराने लगा... बताया जाता है इस बार भी कोश्यारी के साथ ८ विधायको ने दिल्ली में डेरा डाल दिया॥



आनन फानन में राजनाथ ने कोश्यारी को समझा लिया..उनसे कहा गया उत्तराखंड पर बात रास्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक के बाद बात होगी..कोश्यारी की सी ऍम बनने की लालसा फिर से जग गई...रास्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक के बाद खंडूरी से इस्तीफा ले लिया गया..नए नेता की ताजपोशी के लिए माथा पच्चीसी शुरू हो गई.. हाई कमान ने इस मसले पर खंडूरी की राय को भी सुना..अपने इस्तीफे के बाद खंडूरी ने इस बात को उठाया कोश्यारी ने अपने दायित्वों का निर्वहन सही से नही किया... उनके पास चुनाव संचालन समिति की कमान थी लेकिन उन्होंने पार्टी प्रत्याशियों के लिए काम नही किया..अतः विरोधियो को किसी भी सूरत में पुरस्कृत नही किया जाना चाहिए॥



हाई कमान के दिमाग में यह सभी बातें थी अतः उसने इस बार पहले से ही यह तय कर लिया राज्य में किसी को जबरन मुख्यमंत्री के रूप में नही थोपा जाना चाहिए....अतः यह तय हुआ विधायक अपनी सहमती के आधार पर अपने नेता का चयन करे....खंडूरी ,कोश्यारी भले ही मुख्यमंत्री की कुर्सी से बाहर हो गए लेकिन अपने नेता की ताजपोशी के लिए दोनों ने जोर आजमाईश शुरू कर दी ... जहाँ निशंक खंडूरी के चहेते थे वही कोश्यारी के चहेते प्रकाश पन्त का नाम मुख्यमत्री पद के लिए आगे किया गया..खंडूरी के साथी सभी २४ विध्यको ने गुप्त मतदान में निशंक का समर्थन किया.. प्रकाश पन्त सी ऍम बनने से रह गए॥
यहाँ यह बता दे इस कहानी में क्लाइमेक्स उस समय आया जब २४ विधायक खंडूरी को फिर से मुख्यमंत्री बनाने की बात करने लगे जिसे हाई कमान ने खारिज कर दिया..हाई कमान ने साफ़ कहा इस बार ना खंडूरी ना कोश्यारी .....



रही बात निशंक की तो उनकी राह भी आसान नही लगती..उत्तराखंड में निशंक के मुख्यमंत्री के रूप में कांटो का ताज पहना है॥ वह भी ऐसे दौर में जब राज्य में भाजपा विरोधी लहर परवान चढ़ रही है...उनकी राह में तमाम शूल है जिनसे निपटने की बड़ी चुनोती निशंक के सामने है...सभी को साथ लेकर चलना होगा ॥ अभी पार्टी दो खेमो में बट चुकी है.. डोरी में अगर एक बार गाँठ पड जाए तो विशवास की डोर को बरकरार रख पाना मुश्किल होता है ॥ उत्तराखंड में आजकल हर नेता अपने को पार्टी से ऊपर समझने लग गया है... अनुशासन रद्दी की टोकरी में चले गया है ..कोश्यारी की सी ऍम बनने की लालसा अभी भी खत्म नही हुई है॥

राज्य सभा से उनके इस्तीफे का ब्रह्मास्त्र खंडूरी की सी ऍम पद से भले ही विदाई करवा गया है परन्तु इस खेल में कोश्यारी की हार हुई है...खंडूरी के मुख्यमंत्री बनने से जो उमीदे यहाँ के जनमानस में बधी थी वह खत्म हो गई है..उत्तराखंड में आज नारायण दत्त तिवारी और खंडूरी जैसे विराट व्यक्तित्व का कोई नेता नही होने से राज्य में नेतृत्व का संकट उत्पन्न हो गया है ... राज्य में हड़तालों का दौर चल रहा है॥ बिजली पानी की बुनियादी सुविधा से लोग वंचित है ..साथ में सूखे की चपेट में पूरा राज्य इन दिनों है ॥ ऐसे विषम हालातो का सामना निशंक को करना है ॥


निशंक का मतलब होता है किसी से ना डरने वाला ॥ उनकी अग्नि परीक्षा तो अब है ...सभी विधायको को खुश करना है ... साथ में कई विधायको को लाल बत्ती भी देनी है ....संगठन को मजबूत करने की भी चुनोती है..जहाँ खंडूरी के राज्य में माफियाओ ,भ्रष्ट लोगो पर अंकुश लगा था वही देखना होगा क्या निशांत अपनी सरकार की पाक साफ़ छवि को बरकरार रख पाते है ..परिसीमन स्थायी राजधानी, विकल्प धारियों वाले मुद्दे आज भी जस के तस है..इन पर भाजपा का स्टैंड साफ़ नही है ॥ ऐसे में यू के डी के साथ चलना खतरे से कम नही है॥
निशंक को यह समझना होगा उनसे पहले कोश्यारी ,नित्यानंद स्वामी ने भी मझधार में सी ऍम रुपी कांटो का ताज पहना था॥ परन्तु जब वह चुनावो में उतरी तो जनता जनार्दन ने उनको किक आउट कर डाला था॥ ऐसे हालातो में निशंक को फूक फूक कर कदम रखने होंगे...निशंक के साथ प्लस पॉइंट यह है वह युवा है और पहले राज्य के वित्त मंत्री भी रह चुके है ॥ लेकिन यह नही भूलना चाहिए युवा होने के साथ अनुभव भी जरूरी है .... स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर निशंक का अब तक का रिपोर्ट कार्ड सामान्य ही रहा है ॥



कमान सँभालने के बाद निशंक के कहा है राज्य का चहुमुखी विकास करना उनकी प्राथमिकता में है ..उनको खंडूरी के "मोडल स्टेट " के सपने को पूरा करना है..
हाई प्रोफाइल ड्रामा ख़त्म हो गया है पर अभी यह कहना मुश्किल है सरकानिशंक र राज्य में अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी....कोश्यारी समर्थक अभी निशंक की ताज पोशी के बाद चुप बैठ जायेंगे ऐसा कहना मुश्किल है...कोश्यारी आगे भी निशंक को घेरने में पीछे नही रहेंगे॥ उनका फंडा है" मत चूको चौहान"



राज्य में भाजपा अपने को बड़ा अनुशासित बताते नही थकती है लेकिन पिछले दिनों जिस तरह हर विधायक की सी ऍम और मंत्री पद की लालसा उजागर हुई उसने पार्टी की कमजोरियों को राज्य की जनता के सामने उजागर कर दिया है॥
निशंक की ताजपोशी के बाद जो लोग यह सोच रहे है उनके सी ऍम बनने के बाद जनरल खंडूरी चुप बैठेंगे तो वह ग़लत सोच रहे है... खंडूरी अब कोश्यारी को ठिकाने लगाकर ही दम लेंगे..बचे ढाई साल जनरल "फ्रंट फ़ुट" पर खेलेंगे॥ राजपाट जाने के बाद जनरल खामोश नही बैठेगा॥



असली खेल तो अब शुरू होगा जब "मनमोहन देसाई" के "देहरादून " वाले सेट पर जनरल भुवन चंद्र खंडूरी की "एंट्री" "एन्ग्री यंग मैन" के तौर पर होगी...



जनरल जब मीडिया से मुखातिब हो रहे थे तो मुझे यह अक्स दिखाई दिया..कोश्यारी पर वार करते हुए जनरल ने कहा जहाँ लोक सभा चुनाव में कपकोट विधान सभा में भाजपा २००० वोट से आगे थी वही उप चुनाव में ७००० वोटो से जीती ... आख़िर ऐसा क्यों? यहाँ यह बता दे कपकोट कोश्यारी का इलाका है ..... बात साफ है इशारो इशारो में जनरल ने यह कह दिया हार के बाद उनको जबरन "बलि का बकरा" बनाया गया जबकि जनता में कोई नाराजगी नही थी तभी कपकोट में भाजपा उपचुनाव जीती अगर नाराजगी होती तो पार्टी यह चुनाव हार जाती...साफ है पार्टी के नेताओ ने खंडूरी को लोक सभा चुनावो में अंधेरे में रखा............


गुरुवार, 9 जुलाई 2009

पवार की कांग्रेसी दरियादिली...................................


" प्रीत की लत मोहे ऐसी लागी हो गई मै दीवानी...... बलि बलि जाऊ मैं अपने पिया को जाऊ मैं वारी वारी ....." कैलाश खैर , का यह गाना अपने को बहुत अच्छा लगता है .... जिस अंदाज से वह यह गाना गाते है वह दिल खुशकर देता है... उनके इस सूफियाने अंदाज का मै कायल हूँ .... खैर ऐसी ही प्रीत की लत इन दिनों शरद पवार को लग गई है जिन पर यह गाना फिट बैठता है...

दरअसल मामला ही कुछ ऐसा है ... अभी कुछ समय पहले मुंबई में बान्द्रा वर्ली सी लिंक परियोजना को अमलीजामा पहनाया गया .... इसको हरी झंडी यू तो बहुत समय पहले ही मिल गई थी लेकिन कार्य की सही प्रगति न होपाने के चलते इस परियोजना पर संकट के बादल छा गए थे ... जाहिर सी बात है देरी के कारण परियोजना की लागत में इजाफा हो गया ... अनुमान के मुताबिक १६०० करोड़ की लागत से बने इस पुल की लम्बाई पाँचकिलोमीटर से अधिक है जिसके बन जाने के बाद बान्द्रा से वर्ली तक का सफर 7 से ८ मिनट में पूरा होगा ....


इस लिंक के शुरू होने के समय मुख्य अतिथि यू पी ऐ की अध्यक्ष सोनिया गाँधी थी .... सोनिया के साथ मंच पर शरद पवार थे ... साथ ही एन सी पी के कई नेता भी चहलकदमी करते देखे गए... एक बात जिसने सभी का ध्यान खीचा ,वह था इस लिंक का नाम राजीव गाँधी के नाम से रखने की बात शरद पवार ने की ... माना जाता है शरद पवार ने एक सोची समझी रणनीति के तहत यह सब किया... पवार की यह राजनीती ख़ुद उनकी पार्टी के साथ विपक्षियों को भी पसंद नही आ रही है ॥ लंबे समय से " मराठी मानुष " के जिस मंत्र के आसरे पवार अपनी " घड़ी " के जरिये राजनीती को आगे बढाया करते है आज वही राजीव गाँधी के नामकरण का प्रस्ताव अगर करे तो इसमे आश्चर्य की बात तो होगी ही.... सियासत भी जोर शोर से होगी ही......

भाजपा शिव सेना इस पर विरोध को उतारू हो गए है ॥ यह दोनों पार्टी इस लिंक का नाम सावरकर के नाम से करने की बात कर रहे थे परन्तु उनके उम्मीदों पर पलीता ख़ुद शरद पवार ने लगा दिया है... पलीता लगाने की इस " पवारी स्टाइल" को लोग नही पचा पा रहे है ..... बताया जाता है जैसे ही पवार ने समारोह में लिंक का नाम राजीव गाँधी के नाम से करने का प्रस्ताव रखा वैसे ही महारास्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चौहान ने इसके लिए अपनी हामी भर दी..... विश्लेषक इसके पीछे कई कारणों को देख रहे है जिसके चलते आज पवार ने सभी के सामने नतमस्तक होने का मन बनाया ...

महारास्ट्र में इस साल के अंत में विधान सभा चुनाव होने है ... इन चुनावो में शरद पवार अकेले चुनावी रणभूमि में उतरेंगे ऐसी सम्भावना बहुत कम दिखाई देती है ॥ वैसे भी पवार को पन्द्रवी लोक सभा के परिणामो ने जमीन दिखा दी है ॥ इस चुनाव में पवार ने अपने को जोर शोर से देश के प्रधानमंत्री के रूप में पेश किया था ... आडवाणी के बाद अगर कोई नेता पी ऍम इन वेटिंग की कतार में खड़ा था तो वह अपने शरद पवार ही थे.... इस चुनाव में एक ओर वह महारास्ट्र में कांग्रेस के साथ २६_ २२ की पिच पर खेल रहे थे वही नवीन पटनायक पर डोरे डालने के साथ ही वामपंथियों को भी अपने पाले में लाने की पुरजोर कोशिसो में लगे थे .... परन्तु राजनीती तो ऐसी ही चीज है ... पवार की पी ऍम बन्ने की उम्मीदों पर धक्का लग गया॥ वैसे भी जोर का झटका धीरे से लगता है ॥जिसके झटको से वह अभी तक नही उबर पाये है... पवार को इसका बखूबी एहसास अब होने लगा है॥ पन्द्रवी लोक सभा में " घड़ी" चुनाव चिन्ह से पवार के ८ प्रत्याशी विजयी हुए है जिसको देखते हुए इस बार वह महारास्ट्र में कोई " रिस्क " मोल लेने के मूड में नही दिखाई देते...

इस बार पवार ने पुल के बहाने राजीव का नाम लेकर सोनिया का गुणगान करने का मौका अपने हाथ से नही जाने दिया है... जो दल सावरकर के नाम पर राजनीती कर रहे है उनकी मुहिम पर भी पवार ने करार तमाचा जड़ दिया है ... भाजपा शिवसेना ने इस पुल का नाम सावरकर के नाम पर करने का शिगूफा छेड़ते हुए कहा सावरकर की पेदायिश महारास्ट्र की है लिहाजा इस पर पहला हक़ उन्ही का बनता है ... एन सी पी अध्यक्ष पवार ने इसे बड़ी चालाकी से टालते हुए कहा है राजीव गाँधी भी मराठा भूमि पुत्र है.... उनके इस ब्यान से स्वयं ऍन सी पी कार्यकर्ता सकते में है ॥ महारास्ट्र के एन सी पी कार्यकर्ता से ही इस पर अगर आप बात करे तो वह अपना मुह खोलने से बच रहे है... इशारे इशारे में वह शरद पवार की कार्य शेली पर सवाल उठा देता है ...

लोक सभा चुनावो से पहले तक जो शरद पवार अपने को प्रधानमंत्री बनाने के सारे समीकरणों पर काम कर रहे थे आज चुनाव परिणाम आने के बाद जब " युवराज" के साथ कांग्रेस की चारो ओर" जय हो " हो रही है तो अब पवार को राहुल में भविष्य के प्रधानमंत्री बनने के गुण नजर आने लगे है .....










पवार जैसे ही सुर तारिक अनवर के भी बने है ॥ विश्लेषको का मानना है अभी कुछ समय पहले शरद पवार की पार्टी की दसवी बरसी पर अनवर एन सी पी के कांग्रेस में विलय पर जोर दे रहे थे... सूत्रों की माने तो पवार संगमा की तरह अनवर को भी अपने विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से बगावत करने का भारी पश्चाताप है ... अनवर को आस है सोनिया का दिल बड़ा उदार है॥ वह त्याग की मूर्ती है और तीनो को अब माफ़ कर देंगी... विदेशी मूल का मुद्दा अब पुराना हो गया है परन्तु पवार कांग्रेस के साथ विलय के मूड में नही दिखाई दिए ... वह आगामी महारास्ट्र का चुनाव कांग्रेस के साथ ही लड़ना चाहते है... पवार का मानना है अगर वह मैदान में अकेले उतरे तो पार्टी की पराजय निश्चित है ... सोनिया द्वारा उन पर किए गए उपकारों के लिए वह उनके ऋणी है ..... सत्ता की मलाई किसको प्यारी नही होती है? इस समय पवार कृषि मंत्रालय और प्रफुल्ल पटेल उड्डयन मंत्रालय पाने में सफल रहे है ..... साथ ही संगमा की बेटी अगाथा भी राज्य मंत्री का दर्जा पाने में सफल रही है...
चुनाव में युवा कार्ड भी जबरदस्त ढंग से चला है ... इस कारण पवार को उनका गुण गान मजबूरी में करना पड़ रहा है ... अगर ७० के पड़ाव पर खड़े पवार सोनिया और कांग्रेस के प्रति अपनी दरियादिली अभी नही दिखायेंगे तो कब मौका मिलेगा ऐसा करने का ? वैसे भी राहुल के आसरे इस बार २०६ का आंकडा मिला है ... अब सभी दलों में युवाओ को आगे करने का नारा चल पड़ा है... कांग्रेस में दिग्गी राजा के राहुल बाबा तो सपा में अखिलेश, द्रमुक में स्टालिन तो एन सी में उमर अब्दुल्ला .... अब एन सी पी भी इससे अछूती नही है ... अगाथा , सुप्रिया कार्ड आगे कर दिया गया है...

बहरहाल जो भी हो , पवार की सोनिया के प्रति दरियादिली लाजमी ही है ... प्रीत की लत ऐसी लग गई है अब पवार अपने विदेशी मूल के, वंशवाद वाले मुद्दों से इतर सोनिया का गुण ज्ञान करने वाली राजनीती करने पर उतारू हो गए है.... इसकी एक बानगी सी लिंक का नाम राजीव गाँधी के नाम से करने को अपनी ख़ुद की सहमती देना है... पवार राजनीती के मझे खिलाड़ी है... उनको मालूम है अगर बिना कांग्रेस के वह इस बार महारास्ट्र के मैदान में उतरते है तो उनकी हालत पतली हो जायेगी...

पवार साहब आपकी अपनी स्टाइल पर सवाल उठने लाजमी ही है .... आपको शायद यह खौफ सता रहा है अगर युवराज ने बिहार की तरह महाराट्र में इस बार अकेले उतरने का मन बना लिया तो एन सी पी की फजीहत हो सकती है...क्युकि दोनों पार्टियों का लगभग एक वोट बैंक है... केन्द्र में कांग्रेस की सरकार देखते हुए वहां का वोटर इस बार कांग्रेस के "हाथ" का साथ दे सकता है ..... २६११ के बाद जहाँ बीजेपी शिव सेना का गटबंधन मजबूत होना चाहिए था वह कमजोर ही साबित हुआ है.... राज ठाकरे की मनसे ने इसके वोट बैंक पर सेंध लगायी है.....जिसको देखते हुए यह नही कहा जा सकता बीजेपी शिव सेना फिर से महारास्ट्र में अपनी पकड़ को मजबूत कर लेंगे.....
पवार बहुत मझे खिलाड़ी है ... बहुत दूरदर्शी भी ... इनकी राजनीती को समझने के लिए हमको दस साल पहले का रुख करना पड़ेगा॥ यही ९० का दसक ... तब राजीव के बाद अगर किसी की दावे दारी प्रधानमंत्री पद के लिए पुख्ता थी तो वह एन डी तिवारी और पवार ही थे ... परन्तु उस दौर में किस्मत ने पवार का साथ नही दिया और राव के सर पी ऍम का सेहरा बंधा था....राव के जाने के बाद सीता राम केशरी के हाथ कांग्रेस की कमान आ गई ...... उनके जाने के बाद कांग्रेस की कमान सोनिया के पास आ गई....तब पवार के साथ तारिक अनवर और संगमा ने विदेशी मूल के मसले पर कांग्रेस से बगावत कर दी थी॥ अब आज देखिये पवार की पार्टी अब अपने लक्ष्य से भटक गई है॥ पवार कांग्रेस के प्रति हमदर्दी दिखाने से पीछे नही है.... बीते दिनों इनकी पार्टी के द्वारा जिस तरह से कांग्रेस के प्रति दरियादिली दिखाई गई है उसको देखते हुए कहा जा सकता है तीनो का सोनिया और कांग्रेस के पार्टी प्रेम फिर से उजागर हो गया है...ऐसा ही हाल संगमा का है... महीनो पहले एक विवाह समारोह में संगमा सोनिया से मिले॥ उनका अभिवादन किया.... मीडिया में कयास का बाजार गरम था... संगमा से जब इस पर बात की गई तो उन्होंने फरमाया विदेशी मूल अब बीते दौर की बात हो गई है.... वाह, संगमा जी मान गए आपको और शरद पवार को ....अब अगाथा को मंत्रालय मिलने के बाद आपकी वाणी भी बदल गई है.... आप भी कांग्रेस का गुणगान करने मे पीछे नही है .......तभी तो कहते है "राजनीती मे न कोई स्थायी दोस्त न दुश्मन होता है"......................

कुछ दिनों बाद लम्बी यात्रा से अपनी वापसी हो गई है.... इस स्टोरी से बोलती कलम आज फिर से बोल रही है... अभी यात्रा के कुछ अनुभव आपसे ब्लॉग के माध्यम से शेयर करने है ... सब्र कीजिये हम लौट आए है.... तरोताजा है .... चिंता छोडिये... पोस्ट पर अपनी राय देने में कोई कंजूसी मत कीजिये........

रविवार, 5 जुलाई 2009

..............किताबे.......................


२४ जून से यात्रा पर निकला हुआ हू ....... जिस कारण इन्टरनेट से बहुत दूर हो गया हू.......| अभी आज बड़ी मुश्किल से अपने किसी दोस्त के लैपटॉप में इस इन्टरनेट की सुविधा का लाभ उठाने का मौका मिला है ...| इस कारण अपने ब्लॉग पर नजर फेर रहा हू ...| आपसे कई दिनों से संवाद कायम नही हो पा रहा था ... | आज मुझको यह मौका मिल गया है ...| कुछ समय बाद यात्रा पूरी कर जब वापस लौटूंगा तो ब्लॉग पर लिखने का सिलसिला फिर से चल पड़ेगा........| तब तक आप भी "बोलती कलम " में नई पोस्टो की प्रतीक्षा कीजिये......|


अभी की यह पोस्ट किताबो के बारे में है ....| यह बहुत अच्छी लगी अपन को ...| यह किताबो के बारे में "सफ़दर हाशमी" ने लिखी है ...| आपको भी शायद किताबो का यह संसार पसंद आए........




"किताबो में चिडिया चहचहाती है

किताबो में खेतिया लहलहाती है

किताबो में झरने गुनगुनाते है

परियो के किस्से सुनाते है

किताबो में रोकेट का राज है

किताबो में साइंस की आवाज है

किताबो में ज्ञान की भरमार है

किताबो का कितना बड़ा संसार है

क्या तुम इस संसार में नही चाहोगे?

किताबे कुछ कहना चाहती है

तुम्हारे पास रहना चाहती है |


" सफ़दर हाश्मी "




लालू से दो कदम आगे निकली ममता ....बजट में लुटाई ममता .......








शुक्रवार..... भारत में इस वार का खासा महत्त्व है....| यह दिन बोलीवुड के लिए खासा अहम् हुआ करता है...| इसदिन भारत में कई फ़िल्म रिलीज हुआ करती है...| सिनेमा होल में टिकेट पाने की होड़ मची रहती है ...| निर्देशकको इस दिन फ़िल्म से अच्छा रेस्पोंस मिलने की उम्मीद रहती है ...| फ़िल्म के हिट होने की आस भी बनी रहतीहै
लेकिन बीता शुक्रवार देश के लिए खासा अहम् था ...| पूरे देश की नजरे इस दिन ममता दीदी की रेल पर पड़ीरही...| १४ लाख रेलवे कर्मचारियों को ममता से जहा बहुत आशाएं थी वही देश की गरीब गोरबा जनता की नजरेइस बात पर टिकी रही की ममता के पिटारे में कौन सी लोक लुभावन योजनाये है?
दूरदर्शन पर रेल बजट का शोर गुल था...| सुबह से चर्चो का लंबा दौर चलता रहा...| मीडिया में भी इस बजट को लेकर खासा हो हल्ला देखा गया ...| सभी अपने अपने हिसाब से आकलन करने मेंलगे थे आख़िर ममता दीदी की रेल इस बार पटरी पर कैसे चलती है.....?
तभी संसद के बहार अपनी निजी जेन गाड़ी में सवार साडी पहनेममता दीदी की दस्तक होती है...| भोली भाली सीधी साधी ममता नीले रंग का झोला लटकाए सदन के भीतर प्रवेशकरती हैबाहर से मीडिया कर्मी उनको घेरने को दौड़ पड़ते है ...| बस फिर क्या था ममता दीदी नॉन स्टाप चलतीरहती है ... झोला खोलकर अपना पिटारा खोल देती है ...| एक के बाद एक घोषणा की झडी लग जाती है...| बेचारीममता बोलते बोलते अगर थक जाती है तो पानी पीने के लिए मीरा बहिन से अनुमति भी मांग लेती है ....

ममता का इस बार का रेल बजट उन्ही की तरह सीधा साधा सरल रहा ...| जैसा नाम भाई वैसा काम अपन का तो कहना है ममता ने अपने नाम के अनुसार समाज के हर तबके काध्यान रखा है ...| यात्री किराये और माल भाड़े को नही बढाया है॥| लालू की हवा इस बजट में फुस्स कर दी हैममता ने सही से अपना बजट पेश किया ...| ५० नई ट्रेन चलाने और ५० स्टेशन को विश्व स्तरीय बनाने की बात हुई है॥| यही नही इज्जत नामक नई योजना शुरू करने की बात की गई है ...| इस के तहत १५०० रुपयेमासिक आमदनी वाले लोगो को २५ रुपये में १०० किलोमीटर की यात्रा करने की छुट दी गई है॥| तल्काल रिज़र्वेशन का शुल्क ५० रूपया कम कर दिया गया है ॥| साथ ही अब ऐसे टिकेट दिन पहले खरीदे जा सकेंगे...| लम्बी दूरी की यात्रा में चिकित्सकों का दल ट्रेन में साथ रहेगा...| सबसे अहम् बात यह है इस बजट ने लालू को मौतदे दी है...| लालू के गरीब रथ की तर्ज पर ममता दीदी ने युवा रेल चलाने की घोषणा की है जिसका किराया गरीबरथ से आधा होगा॥| २०११ में बंगाल के चुनावो को देखते हुए ममता ने बंगाल पर अपनी पूरी ममता लुटाने में कोई कसर नही छोडी है ... | ममता दीदी की नजरे बंगाल के मुख्यमंत्री पद पर लगी है...| देखना होगा क्या ममताका यह बजट चुनावो से पहले बंगाल के लोगो को लुभा पाता है या नही...?