रविवार, 27 सितंबर 2015

यूरोप में शरणार्थियों का सैलाब




समंदर के आगोश में लाल रंग की शर्ट और नीले रंग के जूते पहने 3 बरस के मासूम एलेन कुर्दी के शव की तस्वीर ने दुनिया भर के लोगों को न केवल झकझोर कर रख दिया बल्कि असंवेदनशील समाज और भूख से संघर्ष करते मानव की तस्वीरों को पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया |  मासूम एलेन उन सीरियाई लोगों में से एक था जो ग्रीस जाने के लिए नाव पर सवार हुआ था । नाव के रास्ते में  डूब जाने से  उसकी मौत हो गई वो तो शुक्र रहा फोटोग्राफर निलुफेर देमीर का जिन्होंने अपने कैमरे से एलेन की फोटो खींची और देखते ही देखते यह फोटो सोशल मीडिया से लेकर ट्विटर पर ट्रेंड करने लगी और पूरी दुनिया में छा गई। औंधे मुह गिरे उस बेजान मासूम  पड़े एलेन की लाश ने यूरोपीय देशों को न केवल शरणार्थियों के असल संकट पर नए सिरे से सोचने को विवश किया बल्कि आनन फानन में अपनी सीमाएं भी खोलने को मजबूर कर दिया |  एलेन की तस्वीर अगर सही मायनों में मीडिया के सामने नहीं आई होती तो शायद  सीरिया के संकट पर पूरी दुनिया इस तरह चिंतन मनन नहीं कर पाती जैसा वह अभी कर रही है | आये दिन हर देश द्वारा शरणार्थियों के मसले पर बयानबाजी का दौर बदस्तूर  जारी है और शायद ही कोई दिन ऐसा गुजर रहा है जब दुनिया के विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों की बहस के केंद्र  में लाखों प्रवासी न रहें |  द्वितीय विश्व युद्ध  के बाद पूरी दुनिया सबसे भीषण संकट का सामना इस समय कर रही है जहाँ लाखों शरणार्थी सर छिपाने के लिए 2 गज जमीन के लिए मोहताज दिखाई दे रहे हैं वहीँ यूरोपीय देशों की भी इन शरणार्थियों के मसले पर कोई कारगर नीति ना होने से यह समस्या दिन दिन गहराती ही जा रही है |

असल में अरब देशों में 2011 के बाद से हालात भयावह होते चले गए | सीरिया में  हुआ गृह युद्ध इसकी बड़ी वजह रहा जिसकी अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने अनदेखी की और असद सरकार को हटाने के लिए अपना एड़ी चोटी का जोर उन ताकतों को समर्थन देने में लगाया जो असद के विरोधी रहे | अतीत में असद की निकटता ईरान से जगजाहिर रही है और सऊदी अरब और क़तर सरीखे देशों की प्रतिद्वंदिता ईरान के शिया गुट से रही | सीरिया में पिछले पांच साल से गृहयुद्ध चल रहा है | मार्च 2011 में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए | उस समय सीरिया की आबादी 2.3करोड़ थी |  इस बीच करीब 40 लाख लोग देश छोड़ चुके हैं और तकरीबन 80 लाख देश में ही विस्थापित हुए हैं और दो लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं |  रही सही कसर अमरीका ने ईराक पर हमले ने पूरी कर दी | सद्दाम हुसैन के पास  जैविक हथियारों का हवाला देकर अमरीका की मंशा ईराक के तेल साम्राज्य पर कब्ज़ा जमाना रही लेकिन उसके बाद से ईराक अमरीका के हाथ संभल नहीं पाया और आज हालत यह है अरब देशों में आई एस का आतंकी गढ़ मजबूत होता जा रहा है और अरब देशों से लोग खौफ के चलते हाल के कुछ बरस में पलायन करने को मजबूर हुए है | मौजूदा दौर में यूरोप का यह सबसे भयानक शरणार्थी संकट है जहाँ पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ़्रीकी और अरब देशों के लोगो की मजबूरी किसी तरह यूरोप में प्रवेश पाना बन गई है क्युकि मौजूदा दौर में उनके सामने बुनियादी जरूरत से लेकर रोजगार का संकट तो है ही साथ में इस्लामिक स्टेट के बढ़ते प्रभाव के चलते उनके सामने जिन्दगी की जंग जीतना पहली न्यूनतम जरुरत बनता जा रहा है |

यूरोपीय देशो में शरणार्थियों को पनाह देने के लिए अलग अलग रुख अपनाए जाने को लेकर यूरोपीय संघ आयोग ने अब नई योजना का एलान किया है | आयोग के चेयरमेन ज्यां क्लाड जंकर ने शरणार्थियों के संकट से निजात पाने के लिए शरणार्थियों का कोटा बढाने की योजना बनाई है | जंकर ने आशंका जताई है कि शरणार्थियों के मसले पर यूरोपियन  यूनियन में विभाजन  बढ़ सकता है ।  इधर संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी आयोग के प्रमुख एंटोनियो ग्यूटेरेस ने यूरोपीय देशों से अपील की कि वह करीब दो लाख शरणार्थियों को तुरंत शरण दें वहीँ जर्मनी ने कहा कि यूरोप के सभी देश शरणार्थियों को जगह देने से इनकार करने लगेंगे तो इससे आइडिया ऑफ यूरोप ही खत्म हो जाएगा।

शरणार्थियों को शरण देने के मसले पर अब तक जर्मनी ने जैसी उदारता दिखाई है उसकी मिसाल बहुत कम देखने को मिलती है | अपनी नई पहल से  मर्केल का कद दुनिया में ना केवल ऊँचा हुआ है बल्कि उनका मान भी बढ़ा है | शरणार्थियों के स्वागत के लिए दिल खोलकर जर्मनी न केवल पैसा लुटा रहा है बल्कि बच्चो का स्वागत उपहार से कर रहा है और जर्मनी की  इस सदाशयता का अब तक स्वीडन , स्पेन और इटली सरीखे राष्ट्रों ने समर्थन किया है साथ ही वह जंकर की नई कार्ययोजना के सुर में सुर मिलाते देखे जा सकते हैं लेकिन हंगरी को इस  पर आपत्ति है और उसने अपनी सीमा में बाढ़ लगाने का एलान कर शरणार्थी संकट को  और अधिक गहरा दिया है | हंगरी ने तो सर्बिया की सीमा पर 175 किलोमीटर लंबी बाड़ लगाकर अपना रुख इस मसले पर अधिक साफ कर दिया है |  हंगरी के पडोसी पोलैंड , चेक गणराज्य और स्लोवाकिया को शरणार्थियों के कोटे में इजाफा मौजूदा दौर में कतई मंजूर नहीं है  | इधर संयुक्त राष्ट्र संघ की शरणार्थी समिति के सदस्य गुटरेस ने भी यूरोप में कानूनी तरीके से दाखिल होंने वाले शरणार्थियों  की संख्या बढाये जाने का समर्थन किया है | ऐसे में सभी देशो की शरणार्थियों के मसले पर अलग अलग सुर होने से शरणार्थी संकट यूरोप के लिए सबसे बड़ी पहेली बन गया है जिसका सुलझना फिलहाल तो दूर की गोटी हो चला है |

 ब्रिटेन ने बीते बरस की शुरुवात के बाद से 216 तो तुर्की ने  2 लाख सीरियाई शरणार्थियों को अपनाया है।  आस्ट्रिया और जर्मनी ने भी लाखो शरणार्थियों को अपनाकर मानो इनके लिए दिल खोलकर अपने देश के दरवाजे खोल दिए हैं वहीँ जर्मनी की मर्केल सरकार ने तो शरणार्थियों के लिए 450 अरब से ज्यादा की धनराशि का बजट तक तय किया हुआ है | हालाँकि इस मसले पर अधिकाँश लोग मर्केल के इस कदम की आलोचना कर रहे हैं वहीँ कुछ मर्केल के इस कदम को कुछ लोग  सीधे अर्थव्यवस्था से जोड़ रहे हैं क्युकि जर्मनी के पास इस दौर में युवा आबादी का संकट है और शरणार्थी उसकी अर्थव्यवस्था के लिए फायदे का सौदा बन सकते हैं लेकिन मर्केल की हालिया घोषणाओं ने वैश्विक राजनीती में उनके कद को बढाने का काम किया है क्युकि यह जर्मनी की उदारता ही है जो ईयू के अन्य देशो को भी शरणार्थी मसले पर सोचने के लिए मजबूर न केवल कर रही है बल्कि यूरोप को सीधे इस संकट से जोड़ने का काम कर रही है | जर्मनी ने सबसे अधिक शरणार्थी अपनाए हैं और वहां के लोग उनका स्वागत भी कर रहे हैं। जर्मनी के उप चांसलर जिगमार गाब्रियल ने कहा है कि जर्मनी कई साल तक हर वर्ष कम से कम पांच लाख शरणार्थियों को संभाल सकता है वहीँ जर्मन चांसलर मर्केल ने कहा है कि ^जर्मनी में बड़ी संख्या में आ रहे शरणार्थियों से आने वाले बरसों में उनका देश बदल जाएगा। जर्मनी शरण देने की प्रक्रिया को और  तेज करने की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा है उनका देश छह अरब यूरो की लागत से अतिरिक्त मकान बनाएगा। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री  कैमरन पहले तो अपने घरेलू हालातों की वजह से कुछ कह पाने कि स्थिति में नहीं थे लेकिन मूड भांपकर उन्होंने भी  कहा है कि अगले पांच साल में 20  हजार शरणार्थियों को ब्रिटेन में शरण दी जाएगी इसके तहत असुरक्षित बच्चों और अनाथ बच्चों  को पहली प्राथमिकता दी जाएगी। वक्त की नजाकत देखते हुए फ्रांस के राष्ट्रपति  ओलां ने भी कहा कि फ्रांस की सरकार 24 हजार शरणार्थियों को शरण देने के लिए तैयार है।^ तुर्की के राष्ट्रपति रीसेप अर्डान ने एलेन की मौत को असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा बतलाकर नई  बहस को जन्म दे दिया है  | हालांकि अमेरिका  ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन ने भी  सीरियाई लोगों को शरण देने की पेशकश की है लेकिन इन सभी ने अपने  देश के कानून की समीक्षा के तहत कम करने के आदेश जारी किये हैं  |

शरणार्थियों के मसले पर यूरोपीय देशों के आतंरिक मतभेद खत्म नहीं हो रहे हैं। पहले कोटा प्रणाली का सुझाव आया जो अस्वीकृत हो गया है। इसका एक  कारण यह है कि कुछ देशों में ज्यादा शरणार्थी आ चुके हैं और वह भारी दबाव के साये में जी रहे  हैं। पूर्वी यूरोप के अधिकांश देश कोटा प्रणाली के साथ खड़े नहीं हैं क्युकि उनका मानना है बड़ी संख्या में मुस्लिमो के आने से यूरोपीय संघ का इसाई स्वरुप तहस नहस हो जाएगा |

 हंगरी सहित यूरोपीय संघ के कई देशों ने बाध्यकारी कोटा परमिट का विरोध किया है | हंगरी के प्रधानमन्त्री ओरबान ने  बुडापेस्ट में हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टोर ओरबान ने शरणार्थियों के मसले पर कहा कि यह सभी लोग यूरोप के अन्य देशों में सुरक्षित जीवन की तलाश कर रहे शरणार्थी नहीं हैं बल्कि जर्मनी में रहने की मंशा से आ रहे अप्रवासी हैं। वहीं डेनमार्क ने सैकड़ों शरणार्थियों को सीमा पर रोकने के बाद जर्मनी के साथ सभी रेल संपर्क बंद कर दिए हैं। डेनमार्क ने दोनों देशों को जोड़ने वाले हाईवे को भी बंद कर दिया है।  स्पेन के गृह मंत्री ने चेतावनी जारी करते हुए कहा है सीरिया से आ रहे इन प्रवासियों की कड़ी निगरानी जरूरी हैं क्युकि यह सभी उन शहरों से आ रहे हैं जहाँ पर आई एस आई एस का प्रभाव अधिक है ऐसे में इनके शरण लेने से आई एस आई एस के नुमाइंदे शरणार्थी बनकर यूरोप में इंट्री पा सकते हैं वहीँ न्यूजीलैंड ने तो महिलाओं और बच्चो को शरण देने और पुरुष शरणार्थियो को आई एस के आतंकियों से लड़ने की सलाह देकर एक अनूठी नई बहस को जन्म देने का काम किया है |  वैसे  आने वाले दिनों में अगर जंकर प्लान की कोशिशें रंग लायी तो यूरोपियन यूनियन में अनिवार्य कोटा परमिट परवान चढ़ सकता है और बहुत हद तक शरणार्थियों का संकट सुलझ सकता है |

अब तक साढ़े 4 लाख लोग जहाँ यूरोपीय देशों में शरण मांग चुके हैं वहीं बीते बरस सीरिया, इराक और अफ्रीकी देशों से पांच लाख से भी ज्यादा लोग भाग कर यूरोप को गले लगा चुके हैं। यूरोप में शरण लेने वाले लोगों में अधिकतर तादात सीरिया और लीबिया और अफ़्रीकी देशों की है जहां  आइएसआइएस ने आतंक का कहर बरपाया हुआ है | इराक और नाइजीरिया सरीखे शहरों से भी लोग यूरोप की तरफ या तो पलायन कर चुके हैं या वह पलायन की तैयारी में हैं | शरणार्थी संकट पर अरब जगत की चुप्पी समझ से परे दिख रही है और इन सभी अरब देशो में शरणार्थी असुरक्षित भी है शायद यह भी एक मजबूरी है जो रोजगार के अभाव में इन्हें अरब देशों से लगातार पलायन करने को मजबूर कर रही है |

  यूरोपियन देशो की सबसे बड़ी बात यह है यहाँ के सदस्य नागरिको को किसी भी देश में जाकर रोजी रोटी कमाने और फिर बसने की आजादी लेकिन शरणार्थियों के बढ़ते सैलाब ने ई यू के देशों के होश उड़ाकर रख दिए हैं शायद यही वजह है शरणार्थियों की बढ़ती संख्या से  यूरोप इस समय  परेशान हो चला हैं लेकिन असल संकट मौजूदा दौर में आई एस आई एस के उभार का है जो दुनिया भर के नौजवानो को इस्लामिक साम्राज्य खड़ा करने के लिए एकजुट कर रहा है बल्कि ऑनलाइन भर्ती का अभियान भी पूरी दुनिया में चलाये हुए है और तो और आई एस ने पाक और अफगानिस्तान में सक्रिय तालिबान के सहयोग से सीरिया , ईराक, टर्की, लीबिया , यमन , कैमरून में अपनी मौजूदगी का अहसास करवा दिया है शायद यही वजह है  यहाँ रहने वाले नागरिक अपने को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं और गेटवे आफ यूरोप को अपना नया आशियाना बनाने को मजबूर हो रहे हैं |  आज जरुरत इस बात की है पूरी दुनिया को शरणार्थियों के संकट के मजमून को समझते हुए आई एस आई एस के खिलाफ बड़ी जंग मिलकर लड़ने का ऐलान करना चाहिए क्युकि यह इस्लामिक स्टेट अपनी ताकत में दिनों दिन इजाफा करते जा रहा है और नौ दशक पुरानी खलीफा व्यवस्था को फिर से कायम कर अपना दबदबा पूरी दुनिया में कायम करना चाहता है लेकिन इस लड़ाई में मासूम लोग पिस रहे हैं जो खौफ के चलते अपने देशों से या तो भागने को मजबूर हो रहे हैं या भागने की तैयारी में हैं लेकिन त्रासदी देखिये मौजूदा दौर में यूरोपियन यूनियन इन शरणार्थियों को जगह देने से इनकार कर रही है या अपने देशो के दबावों के चलते किसी ठोस निर्णय को लेने में हिचक रही है लेकिन यकीन जानिए यह दुनिया का ऐसा गंभीर संकट है अगर दुनिया ने इस प्रकरण से नजरें फेर ली तो आने वाले दिनों में यह संकट भयावह रूप धारण कर सकता है इससे इनकार नहीं किया जा सकता | देखना होगा आने वाले दिनों में यूरोपीय देश इस संकट से कैसे पार पाते हैं ? उम्मीद पर दुनिया कायम है और शायद आने वाले दिनों में शरणार्थियों के संकट पर कोई ठोस हल निकालने की पहल ई यू के  28 देशों से ही होगी और शरणार्थी संकट की नई लकीर इन्ही देशो के आसरे खींची जाएगी इसकी उम्मीद तो हमें करनी ही चाहिए |    



रविवार, 20 सितंबर 2015

दिल्ली में डेंगू की दहशत





 डेंगू ने राजधानी दिल्ली में पाँव तेजी से पसार लिए हैं जिससे आम आदमी में दहशत है | यूँ तो हर बरस डेंगू का प्रकोप देश में दर्ज होता है लेकिन दिल्ली में इसने अब तक के सारे आंकड़े ध्वस्त कर दिए हैं। इन दिनों राजधानी के अस्पतालों में इसका व्यापक असर देखा जा सकता है | अस्पतालों में डेंगू और संक्रामक बुखार से पीड़ित लोग हर रोज बड़ी संख्या में पहुँच रहे हैं जो यह बताने के लिए काफी हैं कि राजधानी पर किस तरह डेंगू का कहर बढ़ता जा रहा है |  सरकारी अस्पतालों में मरीजों के लिए जहाँ जगह नहीं है वहीँ प्राइवेट अस्पतालों की मौजूदा दौर में चांदी कट रही है | एक अदद  बिस्तर पाने के लिए मारामारी चल रही है और मरीजों से मनमाने पैसे लेकर इलाज करने की पूरी कोशिश दिल्ली के निजी अस्पतालों में की जा रही है जबकि  दिल्ली सरकार इन अस्पतालों के लिए सस्ते में इलाज कराने का फरमान जारी कर चुकी है | हालाँकि सरकार और स्वास्थ्य विभाग का दावा है कि डेंगू पूरी तरह नियंत्रण में है लेकिन असलियत यह है राजधानी में इससे निपटने की कोई ठोस तैयारी ही नहीं की गई है |  अब तक डेंगू से हुई मौतों के आंकड़ों में हर दिन इजाफा ही होता जा रहा है । दिल्ली के कई इलाकों में मच्छरों के प्रकोप से लोगों को बचाने के लिए फागिंग तो दूर स्वास्थ्य कर्मियों की पर्याप्त टीमें तक गठित नहीं हैं और तो और एमसीडी ने बजट में कटौती का बहाना बनाकर सारी जिम्मेदारी केजरीवाल सरकार के जिम्मे डाल दी है | जहाँ राज्य सरकार की चिंता है कि कैसे इस समस्या से पार पाया जाए दूसरी तरफ निजी अस्पतालों को  डेंगू  के इलाज के नाम पर हर पल  अपने मुनाफे की फिक्र सता रही है। अब ऐसे भयावह हालातों में गरीबों के ऊपर क्या बीत रही होगी और वह किस तरह इलाज के लिए  दिल्ली में दर दर ठोकरें खाने को मजबूर हो रहे होंगे यह समझा जा सकता है | 

बीते दिनों डेंगू से एक नन्हे मासूम अविनाश की मौत ने दिल्ली के निजी अस्पतालों का कच्चा चिट्ठा सबके सामने खोल दिया | मासूम के परिजनों का साफ़ कहना था उन्होंने  अपने इस बच्चे के इलाज के लिए कई बड़े अस्पतालों के चक्कर काटे लेकिन सबने उनके बच्चे को दवाई तो दूर बेड तक देने से इनकार कर दिया  जिसके चलते  वह बच्चा इलाज के अभाव में  तड़पता रहा और उसने दम तोड़ दिया |  अपनों के खोने का गम क्या होता है यह इस बात से समझा जा सकता है उस नन्हे मासूम के माता पिता ने  इस घटना के बाद खुद को भी मौत के गले लगा दिया जिससे सरकार के कान खड़े हो गए और  दिल्ली सरकार ने आनन फानन में निजी अस्पतालों को डेंगू से प्रभावित लोगों के इलाज करने चेतावनी भी दे डाली |  वहीँ केंद्र ने भी डेंगू से प्रभावित लोगों के  इलाज में कोई कोताही नहीं बरतने के आदेश पहले से ही दे दिए हुए हैं  लेकिन इसके बाद भी प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी बदस्तूर जारी है |  गरीब जहाँ पर्याप्त इलाज के अभाव में परेशान हैं वहीँ अफरातफरी इतनी ज्यादा है कि मामूली बुखार पर भी लोग अपना ब्लड टेस्ट करवाने लम्बी लम्बी कतारें लगाकर खड़े हो जा रहे हैं जिससे अस्पतालों के डॉक्टरों और स्टाफ पर काम करने का दबाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है |  

राजधानी दिल्ली में पिछले कई बरस से लगातार डेंगू का खतरा बना रहता है।  बरसात के बाद  मच्छरों की आवाजाही हर बरस शुरू होती है और यहीं से डेंगू की दस्तक शुरू हो जाती हैं लेकिन सरकारों को गरीबों की याद चुनाव के समय ही आती है | वैसे 2006 से डेंगू से हर बरस कई लोगों की जान जा रही है और आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं बीते 8 बरस में डेंगू से एक हजार  से भी ज्यादा मौतें देश में  हो चुकी है लेकिन इसके बाद भी सरकारों की डेंगू से लड़ने की कोई पुख्ता तैयारी नहीं दिखाई देती | दिल्ली में इस बरस  डेंगू टाइप टू वायरस सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है जो डेंगू वन और थ्री की तुलना में ज्यादा खतरनाक माना जाता है। सरकार चाहे जो दावे करे लेकिन डेंगू टाइप टू के मरीजों की संख्या इस बार विकराल रूप धारण कर रही है|  डेंगू से होने वाली मौतों का आंकड़ा आने वाले दिनों में बढने की संभावनाओं से भी अब इनकार  नहीं किया जा सकता |  

डेंगू एडिस मच्छरों के काटने से होता है  जो घर के आसपास जमा पानी में पैदा होते हैं। यह मच्छर दिन में ज्यादा सक्रिय रहता है | तेज बुखार,शरीर पर लाल-लाल चकत्ते दिखाई देना,पूरे बदन में तेज दर्द होना,उल्टी होना ,मिचलाना जैसे  लक्षण डेंगू के शुरुवाती लक्षण हैं अगर ऐसा है तो हमें तुरंत अस्पतालों की तरफ रुख करना चाहिए और डेंगू की जांच  करानी चाहिए। समय पर फौगिंग और साफ़ सफाई ही इससे बचाव का उपाय है और आम जनता के लिए भी ऐसे हालातों में सजगता बेहद जरूरी है | 

दिल्ली में अगर अभी चुनावों का समय होता तो शायद डेंगू भी बहुत बड़ा मुद्दा बन जाता और हर पार्टी के नेता इस पर राजनीति करने से बाज नहीं आते और अपने को गरीब गोरबा जनता का सबसे बड़ा हिमायती बताने से भी पीछे नहीं रहते लेकिन अभी दिल्ली में चुनाव नहीं है सो मंत्री से लेकर मुख्यमंत्री जो अपने को सच्चा आम आदमी बताते हैं कैमरों के सामने आने से भी परहेज करते नजर आ रहे हैं | मंत्रियों के घर तो घंटों फौगिंग की जा रही है लेकिन झुग्गी झोपड़ी वाले इलाकों की तरफ सफाईकर्मी तो दूर एमसीडी के किसी कर्मचारी तक ने रुख नहीं किया है | दिल्ली में वैसे ही पानी के निकास की उचित व्यवस्था नहीं है | ऊपर से जो नाले हैं उनमे तैरता बदबूदार पानी और उस पर इस मौसम में रेंग रहे मच्छर हमारी स्वास्थ्य सेवाओं की जनसुलभ नीतियों की तरफ इशारा कराने के लिए काफी  हैं | हम स्वच्छ भारत बनाने के बड़े दावे करते हैं | महात्मा गांधी की 150 वी जयंती पर अपना घर और क़स्बा साफ करने की बात अक्सर बड़े मंचो से कहते नहीं थकते लेकिन ऐसी सफाई के क्या मायने जहाँ 2006 के बाद से हम डेंगू के मच्छर ही साफ़ नहीं कर पाए | यह हमारी लचर स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलने के लिए काफी है | हर बात पर केंद्र और राज्य में तकरार कर मामला नहीं सुलझ सकता | केजरीवाल सरकार जब सत्ता में आई तो बड़े जोर शोर से शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट दुगना कर दिए जाने की बात कर रही थी | स्वराज बजट पेश करते हुए आप ने कहा भी था स्वास्थ्य सेवा के लिए जो बजट आवंटित किया गया है वह पिछले बरस से 45 फीसदी अधिक है और अपने पहले बजट में दिल्ली की जनता के लिए वादों और इरादों की झड़ी विज्ञापनों के आसरे लगाने की कोई कोर कसार पार्टी ने नहीं छोडी लेकिन आज अगर अपनी सरकार के प्रचार प्रसार से ज्यादा इश्तिहार डेंगू से बचाव के लगाए गए होते तो राजधानी में पूरा सिस्टम इस तरह बेबस नहीं होता लेकिन सवाल सिस्टम से आगे का भी हो चला है क्युकि मौजूदा परिदृश्य में दिल्ली में सियासत के केंद्र में अब डेंगू भी आ गया है | भाजपा इस मसले पर जहाँ आप पार्टी को कोस रही है वहीँ कांग्रेस भी आप को घेरने का कोई मौका छोड़ रही लेकिन असल सच यह है यह दोनों दल उस दौर में बारी बारी से सरकार और एम सी डी में रहे हैं | ऐसे में उनकी यह जवाबदेही तो तत्कालीन समय से ही बनती थी क्युकि डेंगू दिल्ली  के लिए कोई नई बीमारी नहीं है और इसे बड़ी त्रासदी ही कहेंगे हमारे देश की सरकारें सत्ता में रहने के दौर में  डेंगू सरीखी बीमारी से निपटने के उपाय नहीं कर पाती और विपक्ष में रहने पर सत्तारूढ़ पार्टियों को कोसने का मौका नहीं चूकती | यह हमारे देश के  राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी कमी है कि उनकी याददाश्त बहुत कमजोर होती है और वह हर बरस के अनुभवों से सीख नहीं लेती हैं | आज हमारी राजनीतिक जमात के लिए यह जरूरी है कि वह डेंगू के बढ़ते कहर को देखते हुए कुछ ऐसे कदम उठाये  जिससे अगले बरस इस  बीमारी का समूलनाश पूरे देश में हो जाए |   

डेंगू की बीमारी के बारे में तो कायदे से यही किया जाना चाहिए बरसात की शुरुवात से पहले ही प्रचार प्रसार और जागरूकता अभियानों पर ध्यान दिया जाना चाहिए लेकिन हमारी सरकारों को तो चुनावों के समय ही जनता की याद आती है | इतने दिनों में राजधानी की हालत किस तरह हो चली है यह इस बात से समझा जा सकता है सरकारी अस्पतालों में जितने मरीज पहुँच रहे हैं वहां बिस्तर मिलना तो दूर दवाइयों तक की पूरी व्यवस्था नहीं है | हमारे समाज में किस तरह असमानता है यह इस बात से महसूस किया जा सकता है जिसके पास पैसा है वह प्राइवेट में इलाज कराने से पीछे नहीं हैं वहीँ निजी अस्पतालों की तरफ देखिये वह आगे बढकर डेंगू और संक्रामक रोगियों के इलाज के लिए नि शुल्क उपचार देने की पहल तक नहीं कर सके हैं | कैसी संवेदना है प्राइवेट अस्पतालों की जो अपना सामाजिक दायित्व तक भूलकर मुनाफा बटोरने में लगे हुए हैं | ऐसे में सरकारी की यह जिम्मेदारी बनती है वह इन अस्पतालों को अपने सामाजिक कर्त्तव्य की याद दिलाएं साथ ही इन अस्पतालों में गरीब लोगों के इलाज को सुनिश्चित करवाएं |    बड़ा सवाल यह है हर साल डेंगू की रोकथाम के लिए अस्पतालों को विशेष रूप से तैयार रहने को कहा जाता है। मगर हालत यह है कि जब  डेंगू अपना कहर बरपाता है तब पूरा सिस्टम फेल हो जाता है | सरकारी अस्पतालों पर मरीजों की बीमारियों का बोझ वैसे ही अधिक होता है लेकिन जब डेंगू सरीखी बीमारियाँ पैर पसारती हैं तो आबादी के बढ़ते प्रभाव के चलते लोग निजी अस्पतालों का रुख करते हैं  लेकिन जब यह निजी अस्पताल भी अपना पूरा ध्यान कमाई और मुनाफे पर केन्द्रित कर देते हैं तो मुश्किल बड़ी हो जाती है | जब हमारी राजधानी में ऐसा हाल है तो गावों और कस्बों में क्या होगा और वहां पर सिस्टम किस तरह धराशाई हाल के दिनों में हुआ होगा उसकी भयावहता की तस्वीर दिल्ली के आकडे पेश कर देते हैं जहाँ पूरा सिस्टम डेंगू से लड़ने में फेल हो चला है और गरीबों को बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं भी मयस्सर नहीं हो पा रही हैं | 

बहरहाल जिस तरह दिल्ली में  डेंगू की बीमारी से निपटने में हाल के दिनों में प्राइवेट अस्पतालों की हीलाहवाली सबके सामने उजागर हुई है उस पर अब  सरकार को कठोर कदम उठाने पर विचार करना ही होगा |  डेंगू आज किसी देश में खतरनाक बीमारी नहीं रही परन्तु हमारे देश में यह अगर जानलेवा बनी हुई है तो इसका कारण लाचार स्वास्थ्य सेवाएं , सरकारों का इसके प्रति सजग ना होना और सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों की हीलाहवाली ही है |





                  

रविवार, 13 सितंबर 2015

विराट व्यक्तित्व के धनी थे भारत रत्न गोविन्द बल्लभ पन्त

    


भारत रत्न पंडित गोविन्द बल्लभ पन्त का नाम आज भी राष्ट्रीय राजनीती में बड़े गर्व के साथ लिया जाता है |  पन्त जी के अतुलनीय योगदान के कारण वह पूरे राष्ट्र के लिए ऐसे युगपुरुष के समान थे जिसने अपने ओजस्वी विचारो के द्वारा राष्ट्रीय राजनीती में हलचल ला दी |  उनके व्यक्तित्व में समाज सेवा, त्याग, दूरदर्शिता का बेजोड़ सम्मिश्रण था |  उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और भारत रत्न गोविंद बल्लभ पंत को राजनीतिक रूप से पिछड़े माने जाने वाले पहाड़ी इलाकों को देश के राजनीतिक मानचित्र पर जगह दिलाने का श्रेय जाता है तो वहीँ तराई लिकाओं को भी आबाद कराने में उनकी खासी भूमिका रही |

 पंत जी का जन्म 10 सितम्बर 1887 ई. वर्तमान उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा ज़िले के खूंट  नामक गाँव में ब्राह्मण परिवार में हुआ था। इस परिवार का सम्बन्ध कुमाऊँ की एक अत्यन्त प्राचीन और सम्मानित परम्परा से है। पन्तों की इस परम्परा का मूल स्थान महाराष्ट्र का कोंकण प्रदेश माना जाता है और इसके आदि पुरुष माने जाते हैं जयदेव पंत। ऐसी मान्यता है कि 11वीं सदी के आरम्भ में जयदेव पंत तथा उनका परिवार कुमाऊं में आकर बस गया था। गोविन्द बल्लभ पंत के पिता का नाम श्री 'मनोरथ पन्त' था। श्री मनोरथ पंत गोविन्द के जन्म से तीन वर्ष के भीतर अपनी पत्नी के साथ पौड़ी गढ़वाल चले गये थे। बालक गोविन्द दो-एक बार पौड़ी गया परन्तु स्थायी रूप से अल्मोड़ा में रहा। उसका लालन-पोषण उसकी मौसी 'धनीदेवी' ने किया।

 गोविन्द ने 10 वर्ष की आयु तक शिक्षा घर पर ही ग्रहण की। 1897 में गोविन्द को स्थानीय 'रामजे कॉलेज' में प्राथमिक पाठशाला में दाखिल कराया गया। 1899 में 12 वर्ष की आयु में उनका विवाह 'पं. बालादत्त जोशी' की कन्या 'गंगा देवी' से हो गया, उस समय वह कक्षा सात में थे। गोविन्द ने लोअर मिडिल की परीक्षा संस्कृत, गणित, अंग्रेज़ी विषयों में विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में पास की। गोविन्द इण्टर की परीक्षा पास करने तक यहीं पर रहे। इसके पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया तथा बी.ए. में गणित, राजनीति और अंग्रेज़ी साहित्य विषय लिए। इलाहाबाद उस समय भारत की विभूतियां पं० जवाहरलाल नेहरु, पं० मोतीलाल नेहरु, सर तेजबहादुर सप्रु, श्री सतीशचन्द्र बैनर्जी व श्री सुन्दरलाल सरीखों का संगम था तो वहीं विश्वविद्यालय में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के विद्वान प्राध्यापक जैनिग्स, कॉक्स, रेन्डेल, ए.पी. मुकर्जी सरीखे विद्वान थे। इलाहाबाद में नवयुवक गोविन्द को इन महापुरुषों का सान्निध्य एवं सम्पर्क मिला साथ ही जागरुक, व्यापक और राजनीतिक चेतना से भरपूर वातावरण मिला

   1909 में गोविन्द बल्लभ पंत को क़ानून की परीक्षा में विश्वविद्यालय में सर्वप्रथम आने पर 'लम्सडैन' स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। जनमुद्दो की वकालत करने की तीव्र जिज्ञासा ने इनको इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एल एल बी की डिग्री लेने को विवश किया | इस उपाधि के मिलने के बाद इन्होने अपना जीवन न्यायिक कार्यो में समर्पित कर दिया |गोविन्द बल्लभ पंत जी की वकालत के बारे में कई किस्से मशहूर रहे |  उनका मुकदमा लड़ने का ढंग निराला था  जो मुवक्किल अपने मुकदमों के बारे में सही जानकारी नहीं देते थे पंत जी उनका मुकदमा नहीं लेते थे |  काकोरी मुकद्दमें ने एक वकील के तौर पर उन्हें पहचान और प्रतिष्ठा दिलाई  | गोविंद बल्लभ पंत जी महात्मा गांधी के जीवन दर्शन को देश की जनशक्ति में आत्मिक ऊर्जा का स्त्रोत मानते रहे | गोविंद बल्लभ पंत जी ने देश के राजनेताओं का ध्यान अपनी पारदर्शी कार्यशैली से आकर्षित किया | भारत के गृहमंत्री के रूप में वह आज भी प्रशासकों के आदर्श हैं|  पंत जी चिंतक, विचारक, मनीषी, दूरदृष्टा और समाजसुधारक थे|  उन्होंने साहित्य के माध्यम से समाज की अंतर्वेदना को जनमानस में पहुंचाया |   उनका लेखन राष्ट्रीय अस्मिता के माध्यम से लोगों के समक्ष विविध आकार ग्रहण करने में सफल हुआ |

उनके निबंध भारतीय दर्शन के प्रतिबिंब हैं | उन्होंने राष्ट्रीय एकता के लिए भी  अपनी लेखनी उठाई |  प्रबुद्ध वर्ग के मार्गदर्शक पंत जी ने सभी मंचों से मानवतावादी निष्कर्षों को प्रसारित किया | राष्ट्रीय चेतना के प्रबल समर्थक पंत जी ने गरीबों के दर्द को बांटा और आर्थिक विषमता मिटाने के अथक प्रयास किए |1909 में पंतजी के पहले पुत्र की बीमारी से मृत्यु हो गयी और कुछ समय बाद पत्नी गंगादेवी की भी मृत्यु हो गयी। उस समय उनकी आयु 23 वर्ष की थी। वह गम्भीर व उदासीन रहने लगे तथा समस्त समय क़ानून व राजनीति को देने लगे।  1910 में गोविन्द बल्लभ पंत ने अल्मोड़ा में वकालत आरम्भ की। अल्मोड़ा के बाद पंत जी ने कुछ महीने रानीखेत में वकालत की   वहाँ से काशीपुर आ गये। उन दिनों काशीपुर के मुक़दमें डिप्टी कलक्टर की कोर्ट में पेश हुआ करते थे। यह अदालत ग्रीष्म काल में 6 महीने नैनीताल व सर्दियों के 6 महीने काशीपुर में रहती थी। इस प्रकार पंत जी का काशीपुर के बाद नैनीताल से सम्बन्ध जुड़ा।वह अल्मोड़ा , नैनीताल , लखनऊ ,काशीपुर में अत्यधिक सक्रिय रहे | कुमाऊ परिषद् के सचिव होने के साथ ही उन्होंने गढ़वाल में भी आज़ादी की अलख जगाई |

      परिवार के दबाव पर 1912 में पंत जी का दूसरा विवाह अल्मोड़ा में हुआ। उसके बाद पंतजी काशीपुर आये। पंत जी काशीपुर में सबसे पहले 'नजकरी' में नमक वालों की कोठी में एक साल तक रहे। सन 1912-13 में पंतजी काशीपुर आये उस समय उनके पिता जी 'रेवेन्यू कलक्टर' थे। श्री 'कुंजबिहारी लाल' जो काशीपुर के वयोवृद्ध प्रतिष्ठित नागरिक थे, का मुक़दमा पंत' जी द्वारा लिये गये सबसे 'पहले मुक़दमों' में से एक था। इसकी फ़ीस उन्हें 5 रु० मिली थी।


1913 में पंतजी काशीपुर के मौहल्ला खालसा में 3-4 वर्ष तक रहे। अभी नये मकान में आये एक वर्ष भी नहीं हुआ था कि उनके पिता मनोरथ पंत का देहान्त हो गया। इस बीच एक पुत्र की प्राप्ति हुई पर उसकी भी कुछ महीनों बाद मृत्यु हो गयी। बच्चे के बाद पत्नी भी 1914 में स्वर्ग सिधार गई।1916 में पंत जी 'राजकुमार चौबे' की बैठक में चले गये। चौबे जी पंत जी के अनन्य मित्र थे। उनके द्वारा दबाव डालने पर पुनःविवाह के लिए राजी होना पडा तथा काशीपुर के ही श्री तारादत्त पाण्डे जी की पुत्री 'कलादेवी' से विवाह हुआ। उस समय पन्त जी की आयु 30 वर्ष की थी।

काशीपुर में एक बार गोविन्द बल्लभ पंत जी धोती, कुर्ता तथा गाँधी टोपी पहनकर कोर्ट चले गये। वहां अंग्रेज़ मजिस्ट्रेट ने आपत्ति की। पन्त जी की वकालत की काशीपुर में धाक थी और उनकी आय 500 रुपए मासिक से भी अधिक हो गई। पंत जी के कारण काशीपुर राजनीतिक तथा सामाजिक दृष्टियों से कुमाऊँ के अन्य नगरों की अपेक्षा अधिक जागरुक था। अंग्रेज़ शासकों ने काशीपुर नगर को काली सूची में शामिल कर लिया। पंतजी के नेतृत्व के कारण अंग्रेज़ काशीपुर को ”गोविन्दगढ़“ कहती थी।
     
1914 में काशीपुर में 'प्रेमसभा' की स्थापना पंत जी के प्रयत्नों से ही हुई। ब्रिटिश शासकों ने समझा कि समाज सुधार के नाम पर यहाँ आतंकवादी कार्यो को प्रोत्साहन दिया जाता है। फलस्वरूप इस सभा को हटाने के अनेक प्रयत्न किये गये पर पंत जी के प्रयत्नों से वह सफल नहीं हो पाये। 1914 में ही पंत जी के प्रयत्नों से ही 'उदयराज हिन्दू हाईस्कूल' की स्थापना हुई। राष्ट्रीय आन्दोलन में भाग लेने के आरोप में ब्रिटिश सरकार ने इस स्कूल के विरुद्ध डिग्री दायर कर नीलामी के आदेश पारित कर दिये। जब पंत जी को पता चला तो उन्होंनें चन्दा मांगकर इसको पूरा किया।
   
1916 में पंत जी काशीपुर की 'नोटीफाइड ऐरिया कमेटी' में लिये गये। बाद में कमेटी की 'शिक्षा समिति' के अध्यक्ष बने। कुमायूं में सबसे पहले निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा लागू करने का श्रेय पंत जी को ही जाता  है। पंतजी ने कुमायूं में 'राष्ट्रीय आन्दोलन' को 'अंहिसा' के आधार पर संगठित किया। आरम्भ से ही कुमाऊं के राजनीतिक आन्दोलन का नेतृत्व पंत जी के हाथों में रहा। कुमाऊं में राष्ट्रीय आन्दोलन का आरम्भ कुली उतार, जंगलात आंदोलन, स्वदेशी प्रचार तथा विदेशी कपडों की होली व लगान-बंदी आदि से हुआ। दिसम्बर 1920 में 'कुमाऊं परिषद' का 'वार्षिक अधिवेशन' काशीपुर में हुआ जहां 150 प्रतिनिधियों के ठहरने की व्यवस्था काशीपुर नरेश की कोठी में की गई। पंतजी ने बताया कि परिषद का उद्देश्य कुमाऊं के कष्टों को दूर करना है न कि सरकार से संघर्ष करना। सन 1916 में 'कुमायूँ परिषद' की स्थापना की और इसी वर्ष 'अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी' के सदस्य चुने गये। यह वर्ष  पन्त जी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ |  इस वर्ष पन्त जी अपने असाधारण कार्यो के कारण किसी के परिचय के मोहताज नही रहे | यही वह वर्ष था जब वे राष्ट्रीय राजनीती में धूमकेतु की तरह चमके| कुँमाऊ परिषद् के सचिव रहते हुए उन्होंने गढ़वाल में भी आज़ादी कि अलख जगाई | 1920 में गाँधी जी के सहयोग से असहयोग आन्दोलन में इन्होने अपना सक्रिय सहयोग दिया | की।1923 में 'स्वराज्य पार्टी' के टिकट पर उत्तर प्रदेश 'विधान परिषद के लिए निर्वाचित हुए  वहीँ सन 1927 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे। बाद में धीरे-धीरे कांग्रेस द्वारा घोषित असहयोग आन्दोलन की लहर कुमायूं में छा गयी।

      1927 में सर्व सम्मति से कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए |  19 नवम्बर 1928 को लखनऊ में जब साईमन कमीशन आया तो नेहरु की साथ इन्होने भी उनका विरोध किया | इसी वर्ष पंडित नेहरु और पन्त जी के नेतृत्व में  साईमन कमीशन के लखनऊ आगमन पर भारी जुलूस निकाला गया जिसमे पुलिस के लाथिचार्ग में उनको गायल भी होना पड़ा |  23 जुलाई, 1928 को पन्त जी 'नैनीताल ज़िला बोर्ड' के चैयरमैन चुने गए  | पंत जी का राजनीतिक सिद्धान्त था कि अपने क्षेत्र की राजनीति की कभी उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। 1929 में गांधी जी कोसानी से रामनगर होते हुए काशीपुर भी गये। काशीपुर में गांधी जी लाला नानकचन्द खत्री के बाग़ में ठहरे थे। पंत जी ने काशीपुर में एक चरखा संघ की विधिवत स्थापना नवम्बर, 1928 में लखनऊ में साइमन कमीशन का बहिष्कार करने की ठानी और स्वतंत्रता संग्राम के दौर में कई वर्ष जेल रहे | 10 अगस्त, 1931 को भवाली में उनके सुपुत्र श्रीकृष्ण चन्द्र पंत का जन्म हुआ। नवम्बर, 1934 में गोविन्द बल्लभ पंत 'रुहेलखण्ड-कुमाऊं' क्षेत्र से केन्द्रीय विधान सभा के लिए निर्विरोध चुन लिये गये। 17 जुलाई, 1937 को गोविन्द बल्लभ पंत 'संयुक्त प्रान्त' के प्रथम मुख्यमंत्री बने जिसमें नारायण दत्त तिवारी संसदीय सचिव नियुक्त किये गये थे।
   
            सन 1937 से 1939 एवं 1954 तक अर्थात मृत्यु पर्यन्त केन्द्रीय सरकार के स्वराष्ट्र मंत्री रहे। पन्त जी 1946 से दिसम्बर 1954 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। पंत जी को भूमि सुधारों में पर्याप्त रुचि थी। 21 मई, 1952 को जमींदारी उन्मूलन क़ानून को प्रभावी बनाया। मुख्यमंत्री के रूप में उनकी विशाल योजना नैनीताल तराई को आबाद करने की थी। पंत जी एक विद्वान क़ानून ज्ञाता होने के साथ ही महान नेता व महान अर्थशास्त्री भी थे। स्व कृष्णचन्द्र पंत उनके पुत्र केन्द्र सरकार में विभिन्न पदों पर रहते हुए योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे और भाजपा के टिकट पर नैनीताल संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व भी किया |

पन्त जी के जीवन पर महात्मा गाँधी का विशेष प्रभाव पड़ा |गाँधी के कहने पर ये वकालत को छोड़कर राजनीती में चले आये | उस समय समाज में दो तरह की विचार धाराएं थी | पहली विचारधारा में प्रगतिशील लोग हुआ करते थे, वही दूसरी विचार धारा में स्वदेश प्रेमी लोग थे | पन्त जी ने दोनों विचार धारा में समन्वय कायम कर उत्तराखंड के कुमाऊ में राष्ट्रीय चेतना फ़ैलाने में अपनी महत्त्व पूर्ण भूमिका निभाई |उन्होंने गरीबो के विरोध में आवाज उठाते हुए कुली बेगार के खिलाफ विशाल आन्दोलन चलाया  | अपने प्रयासों से ही कुमाऊ परिषद की स्थापना की और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी  चुने गए | कांग्रेस के पार्टी उनकी इतनी अगाध आस्था रही 30 बरस तक वह राष्ट्रीय कांग्रेस कार्यकारणी के सदस्य रहे | गांधी जी के द्वारा चलाये गए कई आन्दोलन में उन्होंने बढ़  चढ़कर भाग लिया और कई बार जेल भी जाना पड़ा |

देश की आजादी में पन्त के योगदान को कभी नही भुलाया जा सकता है | जंगे आजादी की दौर में हिमालय पुत्र की द्वारा प्रत्येक आन्दोलन चाहे वह सत्याग्रह हो या असहयोग आन्दोलन ,अपना पूरा योगदान दिया | आजादी की दौर में अपनी सक्रिय भूमिकाओं की चलते पन्त जी को कई बार जेल की यात्राये भी करनी पड़ी | देश की आज़ादी के लिए  ब्रिटिश हुकूमत के साथ वह गोलमेज वार्ता में भी वह शामिल हुए |   वर्ष 1937 में पंत जी संयुक्त प्रांत के प्रथम प्रधानमंत्री बने और 1946 में उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने | 15 अगस्त 1947 को वह आज़ाद भारत में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनाये गए | इस पद पर वह 1952 तक काम करते रहे | 1952 में देश की संविधान बनाये जाने के बाद जब प्रथम आम चुनाव हुए तो उनका सञ्चालन पन्त जी की प्रयास से हुआ | इन चुनावो में कांग्रेस ने विजय पताका लहराई | 1954 में जवाहर लाल नेहरु की आग्रह पर केन्द्रीय मंत्रिमंडल में गृह मत्री का ताज पहना और देश के विकास में अपना योगदान दिया |

सन 1957 में गणतन्त्र दिवस पर महान देशभक्त, कुशल प्रशासक, सफल वक्ता, तर्क के धनी एवं उदारमना पन्त जी को भारत की सर्वोच्च उपाधि ‘भारतरत्न’ से विभूषित राष्ट्रपति  डॉ राजेंद्र प्रसाद ने किया  | अपने कार्यकाल में पन्त जी ने विभिन्न कामो को पूरा करने का भरसक प्रयत्न किया | हिन्दी को राजकीय भाषा का दर्जा दिलाने में भी गोविंद वल्लभ पंत जी का महत्वपूर्ण योगदान रहा | 26 जनवरी का दिन कुमाऊ के इतिहास में बड़ा महत्वपूर्ण रहा | इस तिथि को भारत सरकार ने उन्हें "भारत रत्न" की उपाधि से विभूषित किया | 7 मार्च 1961 को पन्त जी की ह्रदय गति रुक जाने से मौत हो गई |

पन्त जी ने अपने प्रयासों से राष्ट्र हित के जितने काम किये उसके कारण भारतीय इतिहास में उनके योगदान को नही भुलाया जा सकता | पन्त जी को सच्ची श्रद्धांजलि तब मिल पाएगी जब हम उनके द्वारा कहे गए विचारो और सिद्धांतो पर चले |