बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

"वैलेंटाइन डे" के बहाने............



चली इश्क की हवा चली ... चली इश्क की हवा चली ....अपने दिलबर को दीवाना ... ढूदता दिल गली गली... "बागवान " फ़िल्म का यह गाना आजकल दूकानों में सर चदकर बोल रहा है .....
कल की ही बात है ,शाम का समय था ... हम राजधानी के न्यू मार्केट इलाके में टहल रहे थे ...कल यहाँ की दुकानों में आजकल खासी चहल पहल नज़र आ रही थी .... वैसे तो न्यू मार्केट इलाके में पहले भी कभी कभार जाना होता रहता है लेकिन इस बार यहाँ फिजा कुछ बदली बदली सी नज़र आ रही थी ... हमे इस बदलाव का कारण नही सूझ रहा था... शाम को अकेले थे, वैसे ही भीड़ से हटकर ही चलते है .... लिहाजा ,साथ में भी कोई नही था जिससे यह पूछ सकते ...

तभी
हमारी नज़र एक गिफ्ट सेण्टर पर पड़ी, जहाँ पर खरीददारी हो रही थी .... कुछ युवतिया दूकानदार से बारगेनिंग कर रहे थी ... जो सामान के सही मूल्य लगाने को लेकर की जा रही थी... इस वाकये को मैं बड़ी गौर से देख और सुन रहा था लगा.... तब , पूरा माजरा समझ आ गया .... दरअसल यह सब वैलेंटाइन डे के लिए किया जा रहा था... युवतियों में इसको लेकर छा रही उत्सुकता ख़ुद ही कहानी को बयां कर रही थी... फिर बागवान फ़िल्म का गाना तो सच्ची तस्वीर को हमारे सामने ख़ुद ही ला रहा था...

न्यू मार्केट का जो दृश्य हमारी आँखों ने कल देखा .... यह आज की एक हकीकत है... भोपाल ही क्या हर जगह यही हाल होगा... चाहे आप दिल्ली की चाँदनी चौक में हो या कनाट पैलेस में, या फिर इनके जैसे किसी भी महानगर में ... हर जगह आप ऐसे दृश्यों को देख सकते है जिसका गवाह कल मेरी आँखें न्यू मार्केट में बनी....आज "वैलेंटाइन डे" पर देश के कोने कोने तक ऐसी ही बानगी देखी जा सकती है.... अब तो आलम यहाँ तक है की १४ फरवरी को मनाया जाने वाला यह त्यौहार महानगरो के साथ कस्बो में भी मनाया जाने लगा है... आज का युग बदल गया है... संस्कृति गई भाड में.... तभी तो हर जगह विदेशी संस्कृति पूत की भांति पाव पसारती जा रही है ..... हमारे युवाओ को लगा वैलेंटाइन का चस्का भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है... विदेशी संस्कृति की गिरफ्त में आज हम पूरी तरह से नजर आते है ... तभी तो शहरों से लेकर कस्बो तक वैलेंटाइन का जलवा देखते ही बनता है...आज आलम यह है यह त्यौहार भारतीयों में तेजी से अपनी पकड़ बना रहा है...

वैलेंटाइन के चकाचौंध पर अगर दृष्टी डाले तो इस सम्बन्ध में कई किस्से प्रचलित है... रोमन कैथोलिक चर्च की माने तो यह "वैलेंटाइन "अथवा "वलेंतिनस " नाम के तीन लोगो को मान्यता देता है ....जिसमे से दो के सम्बन्ध वैलेंटाइन डे से जोड़े जाते है....लेकिन बताया जाता है इन दो में से भी संत " वैलेंटाइन " खास चर्चा में रहे ...कहा जाता है संत वैलेंटाइन प्राचीन रोम में एक धर्म गुरू थे .... उन दिनों वहाँपर "कलाउ दियस" दो का शासन था .... उसका मानना था की अविवाहित युवक बेहतर सेनिक हो सकते है क्युकियुद्ध के मैदान में उन्हें अपनी पत्नी या बच्चों की चिंता नही सताती ...अपनी इस मान्यता के कारण उसने तत्कालीन रोम में युवको के विवाह पर प्रतिबंध लगा दिया... किन्दवंतियो की माने तो संत वैलेंटाइन के क्लाऊ दियस के इस फेसले का विरोध करने का फेसला किया ... बताया जाता है की वैलेंटाइन ने इस दौरान कई युवक युवतियों का प्रेम विवाह करा दिया... यह बात जब राजा को पता चली तो उसने संत वैलेंटाइन को १४ फरवरी को फासी की सजा दे दी....कहा जाता है की संत के इस त्याग के कारण हर साल १४ फरवरी को उनकी याद में युवा "वैलेंटाइन डे " मनाते है...

कैथोलिक चर्च की एक अन्य मान्यता के अनुसार एक दूसरे संत वैलेंटाइन की मौत प्राचीन रोम में ईसाईयों पर हो रहे अत्याचारों से उन्हें बचाने के दरमियान हो गई ....यहाँ इस पर नई मान्यता यह है की ईसाईयों के प्रेम का प्रतीक माने जाने वाले इस संत की याद में ही वैलेंटाइन डे मनाया जाता है...एक अन्य किंदवंती के अनुसार वैलेंटाइन नाम के एक शख्स ने अपनी मौत से पहले अपनी प्रेमिका को पहला वैलेंटाइन संदेश भेजा जो एक प्रेम पत्र था .... उसकी प्रेमिका उसी जेल के जेलर की पुत्री थी जहाँ उसको बंद किया गया था...उस वैलेंटाइन नाम के शख्स ने प्रेम पत्र के अन्त में लिखा" फ्रॉम युअर वैलेंटाइन" .... आज भी यह वैलेंटाइन पर लिखे जाने वाले हर पत्र के नीचे लिखा रहता है ...

यही नही वैलेंटाइन के बारे में कुछ अन्य किन्दवंतिया भी है ... इसके अनुसार तर्क यह दिए जाते है प्राचीन रोम के प्रसिद्व पर्व "ल्युपर केलिया " के ईसाईकारण की याद में मनाया जाता है ....यह पर्व रोमन साम्राज्य के संस्थापक रोम्योलुयास और रीमस की याद में मनाया जाता है ... इस आयोजन पर रोमन धर्मगुरु उस गुफा में एकत्रित होते थे जहाँ एक मादा भेडिये ने रोम्योलुयास और रीमस को पाला था इस भेडिये को ल्युपा कहते थे... और इसी के नाम पर उस त्यौहार का नाम ल्युपर केलिया पड़ गया... इस अवसर पर वहां बड़ा आयोजन होता था ॥ लोग अपने घरो की सफाई करते थे साथ ही अच्छी फसल की कामना के लिए बकरी की बलि देते थे.... कहा जाता है प्राचीन समय में यह परम्परा खासी लोक प्रिय हो गई... एक अन्य किंदवंती यह कहती है की १४ फरवरी को फ्रांस में चिडियों के प्रजनन की शुरूवात मानी जाती थी.... जिस कारण खुशी में यह त्यौहार वहा प्रेम पर्व के रूप में मनाया जाने लगा ....

प्रेम के तार रोम से सीधे जुड़े नजर आते है ... वहा पर क्यूपिड को प्रेम की देवी के रूप में पूजा जाने लगा ...जबकि यूनान में इसको इरोशके नाम से जाना जाता था... प्राचीन वैलेंटाइन संदेश के बारे में भी एक नजर नही आता ॥ कुछ ने माना है की यह इंग्लैंड के राजा ड्यूक के लिखा जो आज भी वहां के म्यूजियम में रखा हुआ है.... ब्रिटेन की यह आग आज भारत में भी लग चुकी है... अपने दर्शन शास्त्र में भी कहा गया है " जहाँ जहाँ धुआ होगा वहा आग तो होगी ही " सो अपना भारत भी इससे अछूता कैसे रह सकता है...? युवाओ में वैलेंटाइन की खुमारी सर चदकर बोल रही है... १४ का सभी को बेसब्री से इंतजार है... इस दिन के लिए सभी पलके बिछाये बैठे है... प्रेम का इजहार जो करना है ?.......

वैलेंटाइन प्रेमी १४ फरवरी को एक बड़े त्यौहार से कम नही समझते है.... मुझको "अंदाज "का गाना याद आगया है.... " किसी से तुम प्यार करो ..... इजहार करो कही ना फिर देर हो जाए" ..... तभी तो वह इसको प्यार का इजहार करने का दिन बताते है... यूँ तो प्यार करना कोई गुनाह नही है लेकिन जब प्यार किया ही है तो इजहार करने में कोई देर नही होनी चाहिए... लेकिन अभी का समय ऐसा है जहाँ युवक युवतिया प्यार की सही परिभाषा नही जान पाये है... वह इस बात को नही समझ पा रहे है की प्यार को आप एक दिन के लिए नही बाध सकते... वह प्यार को हसी मजाक का खेल समझ रहे है.... सच्चे प्रेमी के लिए तो पूरा साल प्रेम का प्रतीक बना रहता है ... लेकिन आज के समय में प्यार की परिभाषा बदल चुकी है ... इसका प्रभाव यह है की आज १४ फरवरी को प्रेम दिवस का रूप दे दिया गया है... इस कारण संसार भर के "कपल "प्यार का इजहार करने को उत्सुक रहते है... आज १४ फरवरी का कितना महत्त्व बढ गया है इसका अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है इस अवसार पर बाजारों में खासी रोनक छा जाती है .... गिफ्ट सेंटर में उमड़ने वाला सैलाब , चहल पहल इस बात को बताने के लिए काफी है यह किस प्रकार आम आदमी के दिलो में एक बड़े पर्व की भांति अपनी पहचान बनने में कामयाब हुआ है... इस अवसर पर प्रेमी होटलों , रेस्ताराओ में देखे जा सकते है... प्रेम मनाने का यह चलन भारतीय संस्कृति को चोट पहुचाने का काम कर रहा है... यूं तो हमारी संस्कृति में प्रेम को परमात्मा का दूसरा रूप बताया गया है ॥ अतः प्रेम करना गुनाह और प्रेम का विरोधी होना सही नही होगा लेकिन वैलेंटाइन के नाम पर जिस तरह का भोड़ापन , पश्चिमी परस्त विस्तार हो रहा है वह विरोध करने लायक ही है ....वैसे भी यह प्रेम की स्टाइल भारतीय जीवन मूल्यों से किसी तरह मेल नही खाती..... आज का वैलेंटाइन डे भारतीय काव्य शास्र में बताये गए मदनोत्सव का पश्चिमी संस्करण प्रतीत होता है...

लेकिन बड़ा सवाल जेहन में हमारे यह आ रहा है क्या आप प्रेम जैसे चीज को एक दिन के लिए बाध सकते है? शायद नही... पर हमारे अपने देश में वैलेंटाइन के नाम का दुरूपयोग किया जा रहा है ... वैलेंटाइन के फेर में आने वाले प्रेमी भटकाव की राह में अग्रसर हो रहे है.... एक समय ऐसा था जब राधा कृष्ण , मीरा वाला प्रेम हुआ करता था जो आज के वैलेंटाइन प्रेमियों का जैसा नही होता था... आज लोग प्यार के चक्कर में बरबाद हो रहे है... हीर_रांझा, लैला_ मजनू के प्रसंगों का हवाला देने वाले हमारे आज के प्रेमी यह भूल जाते है की मीरा वाला प्रेम सच्ची आत्मा से सम्बन्ध रखता था ... आज प्यार बाहरी आकर्षण की चीज बनती जा रही है.... प्यार को गिफ्ट में तोला जाने लगा है... वैलेंटाइन के प्रेम में फसने वाले कुछ युवा सफल तो कुछ असफल साबित होते है .... जो असफल हो गए तो समझ लो बरबाद हो गए... क्युकि यह प्रेम रुपी "बग" बड़ा खतरनाक है .... एक बार अगर इसकी जकड में आप आ गए तो यह फिर भविष्य में भी पीछा नही छोडेगा.... असफल लोगो के तबाह होने के कारण यह वैलेंटाइन डे घातक बन जाता है...

वैलेंटाइन के नाम पर जिस तरह की उद्दंडता हो रही है वह चिंतनीय ही है... अश्लील हरकते भी कई बार देखी जा सकती है...संपन्न तबके साथ आज का मध्यम वर्ग और अब निम्न तबका भी आज इसके मकड़ जाल में फसकर अपना पैसा और समय दोनों ख़राब करते जा रहे है... वैलेंटाइन की स्टाइल बदल गई है ... गुलाब गिफ्ट दिए ,पार्टी में थिरके बिना काम नही चलता .... यह मनाने के लिए आपकी जेब गर्म होनी चाहिए... यह भी कोई बात हुई क्या जहाँ प्यार को अभिव्यक्त करने के लिए जेब की बोली लगानी पड़ती है....? कभी कभार तो अपने साथी के साथ घर से दूर जाकर इसको मनाने की नौबत आ जाती है... डी जे की थाप पर थिरकते रात बीत जाती है... प्यार की खुमारी में शाम ढलने का पता भी नही चलता ....
आज के समय में वैलेंटाइन प्रेमियों की तादात बढ रही है .... साल दर साल यार... इस बार भी प्रेम का सेंसेक्स पहले से ही कुलाचे मार रहा है.... वैलेंटाइन ने एक बड़े उत्सव का रूप ले लिया है... मॉल , गिफ्ट, आर्चीस , डिस्को थेक, मक डोनाल्ड आज इससे चोली दामन का साथ बन गया है... अगर आप में यह सब कर सकने की सामर्थ्य नही है तो आपका प्रेमी नाराज .... बस बेटा ....प्रेम का तो दी एंड समझ लो.... फिर , देवदास के बरबाद होने का सिलसिला चल पड़ता है ... पारो की याद दिल से नही जा पाती.... दिल टूट जाता है ... हमारी समझ में यह नही आता यह कैसा देवदास जो इस बार का वैलेंटाइन पारो के साथ ... अगली बार चंद्रमुखी.... तो अगली बार किसी और चंदा के साथ मनाता है? यह एक फेक्ट है आप चाहकर भी इसको नकार नही सकते ... हम अक्सर अपने आस पास ऐसे वाकयों को देख चुके है जो हर रोज "रब ने बना दी जोड़ी " वाली एक नई "तानी " जी के पीछे भागते नजर आते है .... कॉलेज के दिनों से यह चलन चलता आ रहा है .... हर साल वैलेंटाइन प्रेमी बदलते जा रहे है.....

कुछ समय पहले तक मनोरंजन का साधन दूरदर्शन हुआ करता था... ९० के दशक में केबल की क्रांति आ गई... चैनलों की बाद आ गई... अपने बोली वुड में फिल्मो की बाढ आई हुई है..... दुर्भाग्य इस बात का है अपने प्रेमी बिरादरी वाले फिल्मो के चरित्र को अपने में उतरने की कोशिस करते है .... वह यह भूल जाते है रुपहले परदे और बुद्धू बक्से में जमीन आसमान का अन्तर होता है ..... हमारे यहाँ की ज्यादातर फिल्मे प्यार के फंडे पर बनी है ... "इश्क विश्क" से लेकर "मै प्रेम की दीवानी हूँ", "कहो ना प्यार है" से लेकर "मोहोबते" सभी प्यार के फंडे पर बनी है ... अगर "रब ने बना दी जोड़ी में शाहरुख़ " सुक्खीपापे" को तानी जी के पीछे दौड़ते हुए दिखाया जा रहा है तो आज प्राईमरी में पड़ने वाला बच्चा भी अपने स्कूल की तानी जी का पीछा करता नजर आएगा... अगर फ़िल्म में " हौले हौले सी हवा चलती है ..... हौले हौले से दवा लगती है.... हौले हौले से नशा चदता है... ......हौले हौले हो जाएगा प्यार "बज रहा है तो प्राईमरी का बालक भी इस गाने में अपनी स्कूल वाली तानी जी को ढूदता नजर आता है .... उसको अपनी स्कूल वाली तानी जी में " रब दिखाई देने लगता है.... फिर हरदम तानी जी की यादो से वह बाहर नही आ पाता .... प्राईमरी में पड़ने वाले न जाने ऐसे कितने लम्पट देवदास शायद यह भूल जाते है भारत में " सत्यम शिवम् सुन्दरम", "राम तेरी गंगा मैली" , जैसी फिल्मे भी किसी ज़माने में बनी है जो लोगो के जेहन में आज भी अपनी जगह बनाये हुए है .... यह सभी सच्चे प्यार का अहसास कराने के लिए काफी है..... आज वैलेंटाइन मनाना सबकी नियति बन चुका है.... कल ही रात में जिस बस से मै हबीबगंज उतरा .... उस बस में कुछ प्राईमरी में पड़ने वाले युवक सवार थे .... मैंने इस विषय पर उनकी नब्ज पकड़नी चाही .... जैसा मै सोच रहा था वैसा ही हुआ .... वह अपने मोबाइल में " तुझ में रब दिखताहै" गाना सुन रहे थे.... कहाँ से आ रहे है आप? यह पूछने पर जवाब मिला " १४ फरवरी की .....तैयारी है दादा ..... न्यू मार्केट से गिफ्ट ला रहे है ........

बहरहाल , आज प्यार की परिभाषा बदल गई है .... वैलेंटाइन का चस्का हमारे युवाओ में तो सर चदकर बोल रहा है , लेकिन उनका प्रेम आज आत्मिक नही होकर छणिक बन गया है... उनका प्यार पैसो में तोला जाने लगा है .... आज की युवा पीड़ी को न तो प्रेम की गहराई का अहसास है न ही वह सच्चे प्रेम को परिभाषित कर सकते है... उनके लिए प्यार मौज मस्ती का खेल बन गया है .....

नीचे की
"पंक्तिया सटीक है.......


" अपने पर गौरव न तुम्हे
क्यों गीत पराया गाते हो
मीरा का प्रेम त्यागकर
तुम किसे पूजने जाते हो?

अश्लीलता में सने देह है
फिर बोलो कैसा दिल होगा
यह प्रेम नही फैशन है भइया
यहाँ हर प्रेमी कातिल होगा

ख़ुद को कहते प्रेमी क्या लाज नही आती तुम्हे
तुम तो तन के दीवाने हो
मन की सुन्दरता क्या भाती तुम्हे
क्यों आएना लोगो को दिखाते हो?
ख़ुद के चहरे को देखने से कतराते हो
क्यों चीर हरण का दुःख
चटखारे लेकर सुनते हो
बहस चर्चाएं आयोजित करते हो?
अश्लीलता को सुंदर गुलाबो से तोलते हो ?
चीर हरण की भूमिका पर
राय शुमारी क्यों नही करते
नारी को कर भोग्य रूप किस किया
संस्कृति कुरूप
उत्तर दो उत्तर दो....?

आज इतना ही.... कल पारिवारिक कार्यो के चलते बाहर जाना पड़ रहा है .... शायद दोस्तों को कुछ दिन तक मेरे ब्लॉग में कोई नई पोस्ट पदने को नही मिलेगी... आशा करता हूँ कि आप अपनी राय से मुझको अवगत करवाते रहेंगे ... अपने कार्यो को निपटाकर जब लौटूंगा तो उसके बात " बोलती कलम" में लिखने का सिलसिला चलता रहेगा .....

शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

ऑस्कर की ओर बदते "स्लम डॉग" के कदम...........





















रहमान के "गोल्डन ग्लोब" जीतने के बाद विश्व भर में "स्लमडॉग मिलेनियर" खासी सुर्खियों में आ गई है..... एक साथ ४ गोल्डन ग्लोब जीतना किसी भी फ़िल्म निर्माता के लिए एक बड़ी उपलब्धि है...इसको सही से साकार किया है " डैनी बोयल " ने... डैनी एक विदेशी फ़िल्म निर्देशक है .... उनकी स्लम डॉग अब भारत में भी रिलीज़ हो गई है... विदेशों में धूम मचाने के बाद डैनी को उम्मीद है वह यहं भी विदेशों की तरह यहाँ भी लोकप्रियता पायेगी.... रहमान के गोल्डन ग्लोब जीतने के बाद से ही हमारे देश में जश्न का माहौल बन गया था ...यही कारण था वह भारत में फ़िल्म के रिलीज़ होने की प्रतीक्षा करते रहे... यह उत्साह उस समय दुगना हो गया जब स्लम डॉग को ऑस्कर के लिए १० नामांकन मिल गए...मीडिया रहमान का गुणगान करने में लग गया .... डैनी का भी देश विदेशों में जोर शोर से नाम गूजा.... अभी डैनी की सफलता में एक अध्याय उस समय जुड़ गया जब अमेरिका में एक और अवार्ड बीते दिनों उनकी झोली में चले गया... स्लम डॉग लागत से कई गुना जयादा मुनाफा इंटरनेशनल मार्केट में कमा चुकी है.... उसका कारवा दिनों दिन रफतार के साथ बढता जा रहा है ......










जहाँ तक फ़िल्म की कहानी की बात है तो इस फ़िल्म का कथानक "विकास स्वरूप " के भारतीय उपन्यास "क्यू एंड ए" पर आधारित है......... विकास ने २००३ में यह उपन्यास लिखा था जिसका ३५ भाषाओ में अनुवाद हो चुका है ......इस उपन्यास ने विकास को बहुत चर्चित बना दिया है........ विकास भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी है जिनकी इस कृति को अफ्रीका में " बोआयाकी " सम्मान से भी नवाजा जा चुका है... अब स्लम डॉग की धूम के बाद उनके इस उपन्यास की बिक्री मार्केट में तेजी से बढ गई है...... स्लम डॉग सच्चे भारत की तस्वीर को बयां करती है ...... हम बड़े जोर शोर से हाई टेक युग में विकास कार्यो के जोर शोर से नारे लगाते है लेकिन सच्चाई इससे कोसो दूर है .... आज भी हमारे देश की एक बड़ी आबादी गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन कर रही है.... उसको दो जून की रोटी जुटाने के लिए हाड मांस एक करना पड़ता है .... लेकिन भारत के एक बड़े वर्ग को चमचमाते भारत की यह बुलंद तस्वीर रास नही आ रही है...... इस कारण से यह फ़िल्म विवादों में घिरती जा रही ... लोगो का मानना है की इस फ़िल्म में भारत की गरीबी ओर झोपडियो का जीवन मसालेदार अंदाज में फिल्माया है ....जिस कारण पश्चिम में इसके चाहने वालो की संख्या बढ रही है.... कुछ लोगो आपत्ति फ़िल्म के"डॉग" शब्द को लेकर है... उनकी माने तो डैनी ने भारतीय स्लम के लिए यह शब्द का प्रयोग कर करोडो देश वासियों की भावनाओ को आहत करने का काम किया है ....

वैसे तो यह फ़िल्म विकास के उपन्यास पर आधारित है लेकिन इसकी कहानी उससे हूबहू मेल नही खाती .....विकास के उपन्यास का नायक जहाँ " राम थॉमस है..... वही डैनी का नायक "जमाल" है...... इसी तरह से राम की प्रेमिका उपन्यास में जहाँ नीता है , फ़िल्म में यह "लतिका " है .....उपन्यास की कहानी कुछ और ही बयां करती है.... उसमे दिखाया गया है किस प्रकार से धारावी में पला राम नाम का युवक शो शुरू होने के कुछ हफ्ते पहले ही एक अरब की मोटी रकम जीत जाता है लेकिन यहाँ पर एक नई समस्या शो के आयोजकों के सामने आजाती है ....जब उनके पास राम को देने के लिए रकम नही होती ...... वह राम को जालसाज साबित करने में लग जाते है .......इस दरमियान एक महिला वकील उसकी मदद करने को आगे आती है .....यह सब फ़िल्म में नही है .....जो भी हो इस फ़िल्म को देखने के बाद बुलंद भारत की असली तस्वीर देखीजा सकती है .....आज भी भारत की एक बड़ी आबादी स्लम में रहती है उनका गुजर बसर किस तरह से होता है यह सब हम इस फ़िल्म में देख सकते है..... गरीबी को लेकर चाहे कुछ भी कहा जा रहा हो लेकिन यह भारत की एक सच्चाई है हम इसको नकार नही सकते..... आज भी देश की बड़ी आबादी भूख और बेगारी से जूझ रही है.... उसे दो जून की रोटी भी सही से नसीब नही होती....

फ़िल्म की कहानी "जमाल " और " सलीम" नमक दो युवको के इर्द गिर्द घूमती है..... स्लम डॉग दोनों की बचपन से जवानी तक के सफर की असली हकीकत को बयां करती है... यह फ़िल्म "भारत उदय" के फब्बारो की हवा निकाल देती है... फ़िल्म में दिखाया गया है एक अदना सा दिखने वाला युवक "जमाल" किस तरह से करोड़ जीत जाता है वह अपने निजी जीवन के अनुभवों के आधार पर प्रश्नों के जवाब दे देता है ......

स्लम डॉग दोनों भाईयो के बचपन की दास्ताँ दर्द भरी है .....बचपन में दंगो की आग में इनकी माँ का कत्ल हो गया जिसके चलते अलग राह पकड़ने को मजबूर होना पड़ा..... दंगो के बाद दोनों युवक अंडरवर्ल्ड के शिकंजे में फस जाते है जिसमे उनकी सखी लतिका भी शामिलहो जाती है..... दोनों इसके चंगुल से छूट जाते है लेकिन लतिका वही की वही फस जाती है.... देश में बच्चो के अपहरण करने वालो का गिरोह किस कदर सक्रिय है यह फ़िल्म में दिखाया गया है ....वह बच्चो से अपने मुताबिक काम कराने से कोई गुरेज नही करता ......वहां से भागने के बाद जमाल की राह तो अलग हो जाती है लेकिन सलीम फिर से गिरोह वालो के चंगुल में फस जाता है ....जहाँ पर लतिका भी उसके साथ है..... बाद में जमाल केबीसी के शो में भाग लेता है जहाँ पर सभी सवालों के जवाब देकर वह "मिलेनियर " बन जाता है लेकिन लोग इस बात को नही पचा पाते की कैसे स्लम से आने वाला एक युवक सही जवाब दे देता है ? लेकिन "जमाल" अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर सवालो के जवाब दे देता है ....अन्तिम सवाल पूछने से पहले पुलिस उसको प्रताडित करने से बाज नही आती लेकिन जमाल का आत्मविश्वास देखते ही बनता है उसकी माने तो "मुझे जवाब आता है"..... पुलिस उसको पकड़कर इस पहेली का हल खोजने की कोशिस करती है लेकिन उसको सफलता नही मिल पाती ...."जमाल" के भाग्य में करोड़पति बनना लिखा होता है वह बनकर रहता है.....


स्लम डॉग की कहानी हमारे देश की स्लम की सच्चाई है ... आज भी वहां की स्थितिया बदतर बनी है ... स्लम का आदमी किस तरह की परिस्थितियों में रहकर जीवन यापन करता है ॥ क्या खाता है? क्या पीता है? कैसे गुजर बसर करता है ? यह सवाल हमारे लिए एक पहेली है ... जिस पर चिंतन करने का समय हमारे पास नही है ... पिज्जा, बर्गर , मैक डोनाल्ड वाली संस्कृति आज हमारी पहचान बन गई है ... हम बड़े जोर शोर से मॉल, मल्टी प्लेक्स में घूमने के आदी हो गए है लिहाजा हमको भूख , बेगारी से जूह रहे हमारे देश के फ़ुट पाथो की सच्चाई नजर नही आती... स्लम डॉग इसी सच्चाई को बखूबी बता रही है .....


जहाँ फ़िल्म में छोटे जमाल की भूमिका में आयुस उतरे है..... वही देव पटेल ने बड़े जमाल की भूमिका निभाई है ....छोटे जमाल के द्वारा किया गया एक शोट ध्यान खीचता है जिसमे जमाल अपने प्रिय अभिनेता " बिग बी " के दर्शनों को पाने के लिए इस कदर बेताब रहता है की वह "गटर" में छलांग लगाकर भीड़ में अपने अभिनेता के ऑटो ग्राप के लिए हेलीकाप्टर के पास दोड़ता है..... इरफान खान, अनिल कपूर, फ्रीडापिंटो , महेश मांजरेकर का अभिनय भी फ़िल्म में लाजावाब है... सभी ने अपने परफॉर्मेंस से सभी की कायल कर दिया है .... गुलजार के गाने झूमने को मजबूर कर देते है.... साथ ही अपने "रहमान " का तो क्या कहना .... जय हो जय हो .... हाथी घोड़ा पालकी जय बोलो "रहमान " की .....रहमान के संगीत की प्रशंसा में शब्द नही है ....

एक सवाल जो हमको बार बार कचोटता है वह यह की हमारे बॉलीवुड के निर्माता कब तक प्यार के फंडो पर बनने वाली फिल्मो से इतर सोचना शुरू करेंगे...? स्लम डॉग जैसी फिल्म उनके लिए एक सीख है ... वैसे लीक से हटकर सोचने का माद्दा हमारे यहं किसी को नही.... थोड़ा सहस अगर किसी ने पहले दिखाया तो वह नाम... "सत्यजीत राय" ... लेकिन नरगिस" ने उनको भी नही छोड़ा... उन्होंने उनकी फिल्मो पर सवाल उठाते हुए कहा सत्यजीत अपनी फिल्मो में भारत की गरीबी को दिखाते थे और फिर उस गरीबी को विदेशो में बेचकर अंकल जाते थे...



जो भी हो इस बार स्लम डॉग को लेकर फिर से नाहक सवाल उठ रहे है .. परन्तु स्लम की सच्चाई से सभी वाकिफ है.... खैर इस बार स्लम डॉग ऑस्कर के दरवाजे पर खड़ी है... उससे ऑस्कर पाने की आशाए है सभी को ... अब २२ फरवरी का इंतजार है .... अपने रहमान से भी पूरे देश को खासी उम्मीद है... दिल थामकर बैठिये... सब्र का फल मीठा होता है .....अगर रहमान को यह मिल जाता है तो वह पहले भारतीय होंगे जिसने किसी विदेशी की फ़िल्म में काम कर इसको पाया..... १० नामांकनों पर सबकी नजरें लगी है.... भारत में जो लोग स्लम डॉग की आलोचना कर रहे है उनको यह सोचना चाहिए स्लम की सच्चाई से आप अपने को अलग नही कर सकते ... ।

खैर जो भी हो हाल के कुछ वर्षो में भारत का नाम ऊँचा हुआ है॥ अपने "अरविन्द ओडीगा " व्हाइट टायगर " पर पुरस्कार जीतकर भारत का झंडा बुलंद कर चुके ... अब बारी विकास के उपन्यास की है .... क्या हुआ ऑस्कर अगर स्लम डॉग को ही मिले उसकी कहानी तो स्वरूप की ही ... स्लम डॉग के कलाकार भी भारत के ... गुलजार भी ... इरफान भी... रहमान भी... अनिल भी.... सभी यार हमारे ...| अपने रहमान भी | विदेशी निर्देशक की फ़िल्म में भारतीयों की दस्तक.... तो अब सब्र कीजिये ....| इंतजार की घडिया अब जल्द ही समाप्त होने जा रही है ... आप दिल थामकर तो बैठिये...

बहरहाल , स्लम डॉग पर चाहे कुछ क्यों न कहा जा रहा हो परन्तु हमारा मानना है इसमे दिखाया गया स्लम का जीवन एक सच्चाई है ... आप और हम इससे आँख मूदकर नही रह सकते ....| असली हिन्दुस्तान तो आज
भी फ़ुट पाथ पर आबाद है ॥ पंक्तिया सटीक व प्रासंगिक है ------
" १०० में ७० आदमी फिलहाल नासाज है
दिल पर हाथ रखकर कहो क्या यह देश आबाद है
कोठियों से मुल्क की मयार को मत आंकिये
असली हिन्दुस्तान तो फ़ुट पाथ पर आबाद है "

सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

साइकिल की सवारी ...अब कल्याण की बारी ......


"दिल्ली का रास्ता उप से गुजरता है " भारतीय राजनीती के सम्बन्ध में यह कथन सही मालूम पड़ता है ८० सांसद देने वाले उत्तर प्रदेश में इस बार सभी की नज़र लगी है यह कोई नई बात नही है हर बार यहाँ पर घमासान होना कोई नई बात नही...इस बार मुकाबला दिलचस्प होने के आसार लग रहे है... अपनी "बहनजी" ने पिछले चुनाव में " सर्वजन समाज " के फोर्मुले पर चलकर वहां पर सरकार जो बनाई है कम समय में माया को मिली यह सफलता को विपक्षी दल नही पचा पा रहे है वह माया के हाथी की फुर्ती को देख घबराए हुए है घबराना लाजमी है.... उप एक ऐसा स्थान है ,जहाँ की सीट दिल्ली का ताज तय करती है ...समाजवादी पार्टी से लेकर कांग्रेस सभी माया के बदते कदमो को देखकर सकते में है... उप में जहाँ हाथी का बढता कद "साइकिल " का "टायर " पंचर कर रहा है , वही लोक सभा चुनावो से ठीक पहले "कांग्रेस " की माली हालत भी खस्ता हो चली है भारतीय जनता पार्टी की हालत भी डगमग डगमग है... कह सकते है बीजेपी उप में मरणासन्न हो चली है पार्टी अभी "डाई लिसिस" में है॥ हाल के कुछ वर्षो में डॉक्टर के कई दल हालत देखने उप गए लेकिन कोई सफलता नही मिलपायी है ... इतना है बस जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे दिन कट रहे है ... हालत में अपेक्षित सुधार न हो पाने के कारणअब सब कुछ "राम" के आसरे ही टिका है वह ही अब पार्टी के प्राण उप में बचा सकते है ....


देश में बीजेपी के ग्रह इन दिनों ख़राब चल रहे है... पी ऍम वेटिंग के नाम के लिए पार्टी में खलबली मची हुई है... आडवानी जी ओबामा की तर्ज पर कैम्पेनिंग कर ही रहे थे कि बीच में अपने " भैरव बाबा" [बाबोसा] आ धमके ... राजस्थान में ताल ठोक दी चुनाव लड़ने की ... आडवानी को खुली चुनोती ... कह दिया लोक सभा चुनाव लडूंगा... साथ में वसुपर करप्शन का पुलिंदा बनाकर अशोक को थमा दिया ... बाबोसा वैसे ही नाराज चल रहे है वसु से और माथुर से ... विधान सभा चुनाव में दोनों ने उनकी एक नही सुनी ... नतीजा सामने सबके॥ राजस्थान बीजेपी के हाथ से छिटका... रास्ट्रीय स्तर पर भी बाबोसा कीउपेक्षा ... राजस्थान में अपने दामाद की भी कोई पूछ नही... अब क्या करे ... सभी को चित करना है... सो बाबोसा ने अडवाणी से वसु को हटाने माग कर दी लेकिन आडवानी ने बाबोसा कि मांग को दरकिनार कर दिया... सो बाबोसा मन ही मन खिन्न हो गए... प्रधान मंत्री बन्ने का खवाब देखने लगे ... बीजेपी कि मुस्किले बढ गई ... राजनाथ भड़क गए...बोले गंगा नहा चुके लोगो को कुए में नहाने कीजरूरत नही है लेकिन बाबोसा बोले वह राजनाथ जब पैदा भी नही हुए तब से वह संघ में है... खैर इस पर हम बाद में विस्तार से बात फिर करेंगे... अभी इस विषय पर राजस्थान के अपने परम मित्र से फ़ोन में बात हुई है... इस पर ब्लॉग में विस्तार से लिख रहा हूँ इस महीने .....

इधर बाबोसा का विवाद शांत ही हुआ था कि फिर टाटा , अम्बानी , मित्तल ने "मोदी" को पी ऍम के रूप में पेश कर आडवानी और भाजपा की मुस्किलो को बड़ा दिया ... सर मुडाते ओले पड़े...जबाब में बीजेपी के नेताओ ने किसी तरह मीडिया से पल्ला झाडा ... रूडी ने फ़रमाया यह भाजपा के लिए अच्छी बात है ... मोदी का मॉडल सभी को पसंद आ रहा है तो इसमे क्या बुरा है...? उन्होंने भाजपा शषित राज्यों का हवाला दे डाला और मोदी के नाम में कई कसीदे पड़ डाले...यह तूफान किसी तरह से थमा कि अब नया तूफान उप में आ गया...

उप में कल्याण ने भाजपा को "गुड बाय " कह दिया... २००१ में भी भाजपा छोडे थे .... अलग रास्ट्रीय क्रांति पार्टी बना डाली थी... विधान सभा चुनाव भी लड़ा ....हाल बेहाल हुआ... ४ सीट जीत पाये...लेकिन बाद में फिर अपना हश्र देख लिया.... भाजपा में आ गए...लेकिन इस बार फिर भाजपा से बाय बाय कह दिया ...राजनीती में क्या हो जाए इसका इंटर प्रेटेशन आप नही कर सकते ... कल तक जो कल्याण सिंह अपने को भाजपा का असली हीरो समझते थे आज वही भाजपा कि खुल्लम खुल्ला आलोचना कर रहे है ....वही अपने मुलायम सिंह को देखिये कल तक कल्याण को बाबरी मस्जिद ढहाने का जिम्मेदार बताते थे आज वही उनको क्लीन चिट दे रहे है... मुलायम के "हनुमान " अमर सिंह को ही देखिये आज उनकी भाषा भी बदल गई है ... कल्याण उनके लिए दोस्त हो चुके है... वह पिछडी जातियों के सच्चे हितेसी हो गए है...हनुमान जी आपको भी मान गए ... कल्याण सिंह सही फरमाते है आप राजनीती के असली चाणक्य है ... वाह मान गए उस्ताद .. लखनऊ से " मुन्ना " का टिकेट पक्का किया तो "योगी बाबा" के खिलाफ "भोजपुरी तिवारी "को खड़ा कर दिया...आपका बस चले तो आप असंभव को भी सम्भव बना दे ... अगर कोर्ट के आदेश के चलते संजू बाबा लखनऊ से नही लड़ते तो "मान्यता" कि जे जे बोलेंगे.... उनको पटक देंगे लखनऊ से... सपा के हनुमान की ऐसी मिसाल कही देखने को नही मिलती... सपा में समाज वाद आज दम तोड़ता नजर आ रहा है ... अमर सिंह ने उसका जनाजा निकाल दिया है ... पूंजीपतियों का वर्चस्व बन रहा है... चमक दमक कीसंस्कृति आ गई है वहा ...अब ख़बर ऐसे आ रही है की "मदेपुरा " से पप्पू यादव को चुनोती देने के लिए"ऐश्वर्या " को उतारा जा सकता है ...इधर यह ख़बर आते ही अपने शरद यादव भड़क गए और मीडिया को लताडा....ऐसे अटपटे सवाल मुझसे नही पूछे ....

खैर हम, बार उप की कर रहे है तो उस पर आते है ... बात कल्याण सिंह पर हो रहे थी ...कल्याण के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह हो रही थी पार्टी में उनकी नही सुनी जा रही थी ... वह अजित सिंह से तालमेल के बिल्कुल खिलाफ थे... लेकिन अपने जेटली तालमेल के पूरे मूड में...... कई महीनो से लगे थे परन्तु कल्याण के चलते तालमेल नही बन रहा था ... अब कल्याण के जाने के बाद पूरे आसार नजर आ रहे है भाजपा के साथ समझोता होकर रहेगा आर एल डी का...कल्याण की दूसरी दिक्कत "अशोक प्रधान" बने थे ... गले की हड्डी बन गए थे अशोक उनकी... भाजपा ने अशोक को बुलंदशहर से टिकेट दे दिया लेकिन कल्याण को यह रास नही आया...अशोक प्रधान वैसे तो १९९६ से नॉएडा खुर्जा सीट से मेंबर ऑफ़ पार्लियामेन्ट है ... अपने कल्याण अभी बुलंदशहर से ...अब कल्याण का इलाका रिज़र्व हो गया है जिस कारण उनकी मुस्किले बढ गई है...परिसीमन का रोड़ा आ गया है पूरे लोक सभा चुनावो में .... खुर्जा, नॉएडा अब अलग अलग लोक सभा हो गए इस कारन कल्याण का तो "कल्याण" ही हो गया ...यहाँ दोनों जगह कल्याण का जनाधार नही है ... वाह लोध बिरादरी से आते है जिसकी तादात उप में ५% के आसपास है.... इस कारन बुलंदशहर में कल्याण की तूती बोलती थी....वह भी अब रिज़र्व ... अब पार्टी ने उनको "एटा " पटक दिया वहां कल्याण की हालत खस्ता ....इसलिए बीजेपी से खफा खफा .... यह तो वही बात ... "आँख है भरी भरी और तुम मुस्कुराने की बात करते हो"

अशोक प्रधान से पुराना हिसाब भी कल्याण को चुकता करना था... पिछले चुनाव को कौन भूल सकता है जब उनके बेटे "राजवीर" को हराने की कमान अपने हाथ में ली थी प्रधान ने॥ यह अलग बात है बेटा जीत गया .... लेकिन अशोक से हिसाब किताब करना ..... आडवानी से चिल्लाये अशोक को टिकेट देकर बहुत बड़ी गलती कर रही है भाजपा....लेकिन बीजेपी उनके आगे नही झुकी ॥अपने बेटे की राजनीती के खातिर बीजेपी को टाटा बोल दिया॥ कल्याण यह कह रहे है की बीजेपी में उन जैसे समर्पित सिपाहियों की कोई कद्र नही है... पार्टी अपने मूल मिशन से भटक चुकी है... लेकिन बीजेपी का कहना है उनको पार्टी ने पूरा सम्मान दिया ...सीएम भी बनाया ... साथ में उप के पिछले चुनाव में सीएम के रूप में भी प्रोजेक्ट किया था....लेकिन उनका करिश्मा नही चल सका उप में ... पार्टी ५१ सीटो में सिमटकर रह गई थी....
अब कल्याण के अगले कदम की सभी को प्रतीक्षा.... कल ही मुलायम का बयान आया.... बोले कल्याण के साथ मैंने कोई समझोता नही किया है... उनकी माने तो समझोते में कुछ शर्त होती है .... यह तो दोस्ती है... मुलायम की माने तो आज राम मन्दिर और बाबरी मस्जिद कोई मुद्दा नही रहा ... भूख , बेगारी से जूझ रहे इस देश में मुद्दे की कोई कमी नहीआज विकास सबसे बड़ा मुद्दा .... मुलायम भी इसकी जय जयकार करने को आमादा हो रहे ....है... मुलायम जी मान भी ली आपकी बात सही है लेकिन उन मुसलमानों का क्या होगा जिनको भुनाकर आप किसी समय उप की सियासत में अपना अलग रुतबा कायम करते रहे है....आज कल्याण के आने से वह अगर आपसे दूर चले गया तो साइकिल की सवारी करना उप में आपके लिए आसान नही होगी.....वैसे भी कल्याण के आने के बाद आपकी पार्टी में इसको लेकर विरोध ...आपके लंगोटिया यार आजम खान चिल्ला चुके...बोले कल्याण के साथ आने पर सपा को नुक्सान उठाना पड़ेगा ही... उनकी माने तो कल्याण मुसलमानों के कट्टर विरोधी.... तभी तो राम मन्दिर आन्दोलन में जमकर नारे बाजी करी आपने..."राम लला हम आयेंगे मन्दिर यहीं बनायेंगे " नारा अभी ठंडा नही पड़ा है... बचपन में उप में इसकी गूंज सुनी थी यह आज भी मुझको कंठस्त याद है... मुझको ही क्यों मुसलमानों को भी .... ९० का दशक याद करे.... उस दौर में कल्याण बीजेपी के पोस्टर बॉय ... चिल्ला चिल्ला कर राम नाम की माला जपा करते थे...बाबरी मस्जिद के आन्दोलन वाले दौर में २४ घंटे के लिए जेल भी गए.... जेल से छूटने पर फिर वही पुराना राग... मन्दिर ... राम ..राम॥ यही नही बीजेपी के द्वारा जब वह सीएम पहली बार बनाये गए ....तब भी वही...... राम नाम के साथ...यही नही २००१ में रास्ट्रीय क्रांति पार्टी बनते समय भी राम का दामन छोड़ने का नाम नही... कहते रहे .... राम मन्दिर बनकर रहेगा... हिन्दुत्व मेरी जान...अब फिर बीजेपी छोड़ दी ... मुलायम के साथ ...है... मुसलमान तो उनकी कथनी को सही से जानते है ...... कल्याण सिंह के बयानबदल सकते है लेकिन मुसलमान के दिलो में बाबरी की याद आज भी जेहन में है...तो मुसलमान तो नाराज होंगे ही... लेकिन मुलायम को इसकी कोई परवाह नही... बोलते है बाबरी मस्जिद गिराने में कल्याण की कोई भूमिका नही ... कल्याण का नाम लेने से तौबा तौबा...अब इसका दोष दिया संघ और शिव सेनिको को....मुलायम की माने तो कल्याण राजधरम का पालन उस दौर में नही कर सके ....लेकिन इसमे उनकी कोई गलती नही... इस्तीफा भी जल्दी दे दिया था...जिस कल्याण ने अपने को बाबरी मस्जिद ढहाने का सच्चा सिपे सालार साबित किया था उस पर मुसलमान भरोसा नही कर सकते ... तभी कांग्रेस की भ्रिकुतिया तन गई... १० जनपद से आया बयान ... कहा सोनिया उस सभा को संबोधित नही करेंगी जिसमे कल्याण मुलायम के साथ होंगे.... अपने दिग्गी राजा भी मुलायम से खफा... यार खफा होने की तो बात ही है ... कल तक सांप्रदायिक ...आज सेकुलर हो गए...यह तो वही बात हुई "बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना"...

खैर क्या करें अब ? कल्याण तो गए ...मुलायम से दोस्ती हुई है... मुलायम ने ख़ुद फ़रमाया है॥ दोनों अच्छे दोस्त है॥ अभी कल्याण वेट एंड वोच नीति पर ... बेटे को तो सपा में शामिल करवा दिया ... उसका टिकेट भी पक्का... लेकिन सवाल अपना॥ अभी साइकिल पर सवारी करने में जल्दी नही ... तभी तो बोले .... निर्दलीय ही कूद जाऊंगा मैदान में... लेकिन अभी कहानी में नया मोड़ .... कुसुम राय बीजेपी के कोटे से राज्य सभा में .....वह इस बार कल्याण के साथ नही... पिछली बार जब कल्याण ने बीजेपी छोड़ दी ... तो कुसुम भी उनके साथ चली गई .....पार्टी को छोड़कर ... क्युकी बीजेपी कुसुम राय को ज्यादा चारा नही डालती थी ... आडवानी ने इसको बेहतर ढंग से इस बार समझ लिया ... कल्याण की दुखती रग पर पहले ही हाथ रख दिया ... कुसुम को राज्य सभा भेज दिया ... ताकि कल्याण की नाराजगी कम हो सके...सभी को कल्याण कुसुम की जानकारी सही से..लोग बताते है कुसुम लखनऊ की जब पार्षद हुआ करती थी तो दोनों एक दूजे केकरीब आ गए ... शास्त्री भवन इसका गवाह ... कल्याण तभी से कुसुम की राय को कभी अनसुना नही किया करते थे.... जब कल्याण ने बीजेपी से किनारा किया तो कुसुम भी उनके साथ चली गई... कुसुम कल्याण नाम राशि एक समान ...तभी तो दोनों की सही बनती थी॥ रास्ट्रीय क्रांति पार्टी बनने ने बाद मुलायम से मिलकर कुसुम को ऍम अल सी बनने के लिए एडी चोटी का जोर लगाया... इसमे कल्याण सफल भी हो गए .... लेकिन इस बार कुसुम राज्य सभा में ... अब कल्याण के साथ जाने का कोई सवाल नही ॥ गई तो राज्य सभा से छुट्टी तय है .... "जहाँ बाबु जी जायेंगे वहां मैं जाउंगी " के नारे का तो कुसुम ने इस बार जनाजा निकाल दिया .... कल्याण के जाने के बाद कुसुम के रंग बदल गए तभी बोली कल्याण ने बीजेपी छोड़कर सही काम नही किया...
खैर , कल्याण की बीजेपी से विदाई हो गई... अब बीजेपी के लिए उप में मुस्किल हालत... आडवानी के प्रधान मंत्री बन्ने का सपना उप तय करेगा... अब कल्याण का विकल्प खोजने की
बड़ी चुनोती ...जहाँ तक राजनीती की हमारी समझ है उसके मुताबिक बीजेपी के लिए आगे की राह नही आसान ...रमापति, कलराज , लाल जी टंडन जैसे बूडे नेताओ के बूते नगर निगम का २० २० जीतना अलग बात है और इस बार का लोक सभा का वर्ल्ड कप जीतना अलग ... ऐसे बूडे नेताओ की ख़राब फिटनेस के सहारे उप फतह करने में हमे संशय लगता है...
अकेले जेटली क्या कर लेंगे?

अगाध आस्था और विश्वास का केन्द्र है : ऋषे स्वर महादेव


उत्तराखंड के पग पग पर देवालयों की कतारे है| इसी कारण यहाँ की धरा को देवभूमि की संज्ञा से नवाजा गया है| अपने बहुत से धार्मिक कार्यो के द्वारा यहाँ की भूमि को अनेक ऋषियों ने धन्य कियाहै| कई साधू महात्माओ ने तो आजीवन यहाँ जनम पाने की आकांशा लिए समाधी तक ली है| प्राचीन समय से ही यहाँ के पौराणिक धर्म स्थलों के प्रति आम जनमानस की गहरी रूचि रही है |आज भी यहाँ के देवालयों में आने वाला हर एक भक्त एक अमित छाप लेकर जाता है और बार बार यहाँ आने की कामना करता है |निराश प्राणी यहाँ आकर सुख शान्ति की अनुभूति करता है| एक तरह से यहाँ की वादियों में डेरा जमाकर व्यक्ति परम पिता प्रभु के दर्शनों की आस में अपना तन मन समर्पित कर देता है उसके मन में किसी भी तरह से अनंत ब्रहम के दर्शनों की जिज्ञासा जाग उठती है|

उत्तराखंड का सीमान्त जनपद चम्पावत अपने प्राकृतिक सौन्दर्य और रमणीयता के लिए प्रसिद्ध रहा है| यहाँ पर मौजूद बहुत सारे पौराणिक स्थल इसकी सुन्दरता में चार चाँद लगाते है | यहाँ पर जहाँ पूर्णागिरी माता का चमत्कारिक मन्दिर है, वहीँ री टा साहब जैसे सर्व धर्म समभाव वाले स्थल भी है |चम्पावत जनपद में बालेश्वर , नागनाथ जैसे मन्दिर भी है जो इसका महत्त्व बताते है ,विश्व प्रसिद्ध "बग्वाल" मेला भी यहीं होता है जिसमे पत्थर युद्ध होता है माता बाराही का मन्दिर विश्व में अपनी ख्याति पाए हुए है|

चम्पावत से तकरीबन १२ किलो मीटर की दूरी पर लोहाघाट नगर स्थित है| चम्पावत से लोहाघाट आने पर ऋषे श्वर महादेव का अनुपम देवालय पर्यटकों का मन मोह लेता है |देव शिव शंकर की यह तपस्थली चारो दिशाओ से देवदार के सघन वनों से भरी पड़ी है| ऐसा माना जाता है की यहाँ पर सप्त ऋषियों ने सतयुग में तपस्या कर भोलेशंकर भगवान् को प्रसन्न किया था |तब शिव शंकर यहाँ प्रकट हुए थे , तभी से लोगो में इसके प्रति आस्था बनीं हुई है |जन शुत्रियो के अनुसार यह भी माना जाता है , यहाँ पर शिव शंकर भगवान् अपने अपने भक्त बाणासुर की रक्षा करने को प्रकट हुए थे और यहीं पर उन्होंने बाणासुर को अपराजेय होने का वर दिया था जो आगे चलकर उसके लिए कई बार लाभकारी साबित हुआ| शिव से अजेय वर पाकर बाणासुर अपने को अपराजेय समझने लगा था|

किन्दवंतिया है इस वर को पाने के बाद बाणासुर युद्ध के मोर्चे पर हर किसी दो दो हाथ करने की ठानता है ,लेकिन कोई वीर सूरमा उसके कद के लिए नही मिल ता है और वह उसे वर दान देकर अपराजेय बनने वाले शिव शंकर भगवान से ही युद्ध करने की ठान लेता है |शिव बाणासुर के घमंड को देखकर उससे रणभूमि में युद्ध करने को तैयार होते है परन्तु पार्वती उनको ऐसा करने से रोक लेती है | अपनी पत्नी के आदेश पर अब शिव बाणासुर से कहते है जिस दिन महल के ऊपर की धवजा धरती पर गिरेगी उसी दिन तुमसे दो दो हाथ करने को कोई तैयार होगा| ऐसा माना जाता है आगे चलकर उस के गिरने पर कृष्ण के साथ शिव का युद्ध हो जाता है तब बाणासुर की रक्षा करने को शिव आते है| युद्ध इतना भयानक होता है की खून की धाराए बहने लगती है खून की धाराएं नदी का रूप धारण कर लेती है |इसी नदी को"लोहावती" नदी कहा जाता है जो मन्दिर के पास से बहती है |बाद में शिव के आग्रह पर कृष्ण बाणासुर को छोड़ देते है और स्वयं कैलाश में चले जाते है| लोगो का मानना है की शंकर यहाँ आने से पहले अपने कुछ बेताल और भेरव को यहाँ छोड़ जाते है जो यहाँ शिव लिंग अपने आराध्य देव के लिए स्थापित कर जाते है , जिसकी आगे चलकर पूजा की जाती है |वर्त्तमान में इसी लिंग ने ताबे में स्थान ग्रहण कर लिया है फिर भी इस शिव लिंग की स्थापना कैसे हुई इस विषय में लोगो में एका नही है?




मन्दिर बहुत से चमत्कारों से भरा है |स्थानीय पुजारी कहते है पुराने समय में अंग्रेजो के काल में भी मन्दिर कई चमक्तारो का साक्षी रहा है |बताते है एक बार एक अंग्रेज ने मन्दिर में गेट पर ताला दाल दिया |उस समय देवता अवतरित हुए थे यह शक्ति "डंगरिया" पर आई थी ताला लगने के बाद जब वह डंगरिया देव के रूप में मन्दिर में आया तो उसने "चावल के " दाने फैककर ताले को अलग कर दिया | सच में वह अद्भुत चमत्कार था |इस शक्ति को देखकर अंग्रेज भी महादेव के आगे नतमस्तक हो गएऔर ताबे का कलश मन्दिर में चदाया |तभी से यहाँ पर विशाल शिव लिंग विराजमान है| कुछ लोगो का मानना है की पास में शव विसर्जन के लिए घाट होने के कारण किसी दिव्य "भूत पिसाच का भी वास है परन्तु यह सभी शिव के गन के रूप में जाने जाते है|

ने मन्दिर के पास बकरी की बलि पुजारी के आदेश की अवहेलनाकर ली |पुजारी के लाख विनय करने के बाद उसने किसी की एक नही सुनी| तभी शिव शंकर उससे गुस्सा हो गएऔर की शुरूवात घनघोर बारिस से हुईजिसने पास में चल रहे निर्माण कार्यो को भारी हानि पहुचायीऔर सवयम वह मुस्लिम युवक अपना मानसिक संतुलन खो बैठा | कहा जाता है आगे चलकर शिव ने उसको माफ्ह किया और उस युवक ने अपने जीवन के शेष बसंत शिव अर्चन में अर्पित कर दिए| तभी से मन्दिर के प्रति लोगो में गहरी आस्था उभरनी शुरू हुई |लोहाघाट में इस मन्दिर को सभी मनो रथो को पूरा करने वाला जाना जाता है |यहाँ की पूजा के द्वारा मनुष्य के सारे कार्य पूरे हो जाते है|

मन्दिर को विकशित करने में श्री श्री १०८ स्वामीजी हीरानंद जी महाराज का बहुत योगदान है |वह ३४ वर्षो से यहाँ पर साधना में तल्लीन है| समय समय पर यहाँ पर धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता रहा है |नवरात्रियों में भी यहाँ पर भक्तो की भारी भीड़ उमड़ पड़ती है| उत्तराखंड में पौराणिक स्थानों की भारी भरमार मौजूद है |वर्त्तमान खंडूरी सरकार के कार्यकाल में तीर्थाटन और धर्मस्व मंतरालय भी बनाया गया है ,परन्तु सरकार की भारी उपेक्षा चलते आज ऐसे धार्मिक स्थल उपेक्षित पड़े है| सरकार को आज जरूरत है की ऋषि स्वर सरीखे धार्मिक स्थलों को लेकर कोई नीति बनाये| कोलिधेक निवासी "चंचल सिंह ढेक" कहते है "
इस मन्दिर की चमत्कारिक देखते ही बनती है|यहाँ पर आने वाला हर पर्यटक एक अमिट याद को लेकर जाता है | सरकार को चाहिए वह ऐसे स्थलों अपनी प्राथामिकताओ में शामिल करे जिससे इस स्थान की कीर्ती दूर दूर तक फेल सकती है |............