Friday, June 22, 2012

सितारगंज उपचुनाव में दो सितारे आमने सामने...............

 
" बंगाल मूल के वाशिंदे वैध्य देवकीनंदन बनर्जी धार्मिक यात्रा के तहत बद्रीनाथ केदारनाथ दर्शन के लिए उत्तराखंड आये तो उसी दौरान टिहरी नरेश का पुत्र बीमार पड़ गया...उसे उनके वैध्य ने अपने  उपायों से मौत के मुह से बाहर  निकाल लिया... इससे खुश होकर टिहरी  के नरेश ने उन्हें बहुगुणा की उपाधि से नवाजा और पौड़ी के बुगानी गाव में जमीन आवंटित करवा दी और बसा भी दिया....आगे चलकर उन्ही के वंशज रेवती नंदन  बहुगुणा के पुत्र हेमवती नंदन  बहुगुणा और फिर विजय बहुगुणा  कद्दावर नेता के रूप में उभरे"...
                         
इस पर्चे का मजमून उत्तराखंड में कांग्रेस के लिए एक बड़ा दाव है और इसी बंगाली दाव को  आगे कर  राज्य में उसके मुखिया विजय बहुगुणा की मुख्यमंत्री के रूप में वैतरणी पार होने की संभावनाए छिपी हुई है क्युकि उत्तराखंड की जिस  सितारगंज विधान सभा सीट से हेमवती नंदन बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा उपचुनाव लड़ रहे हैं वहां पर बंगाली समुदाय की तादात सबसे ज्यादा है और इसी दाव का इस्तेमाल भाजपा ने उत्तराखंड के २०१२ के विधान सभा चुनाव में १० सालो से एकछत्र  राज करने वाले बसपा के नारायण  पाल को हटाने के लिए किया और भाजपा के टिकट पर किरण चंद मंडल सरीखे नौसिखियो  ने सितारगंज फतह कर सभी को चौंका दिया .....अब कांग्रेस के रणनीतिकार इसी बंगाली दाव के आगे बहुगुणा की जीत देख रहे हैं.....


मार्च  के महीने में उत्तराखंड विधान सभा चुनावो में पूर्ण बहुमत से दूर रही कांग्रेस ने राज्य में सरकार बनाने में तो सफलता प्राप्त कर ली लेकिन उसके मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को अपना चुनाव लड़ने के लिए खुद सीट चयन करने में पसीने आ गए...दरअसल राज्य में कोई भी कांग्रेसी विधायक चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के लिए सीट खाली करने के मूड में नही था क्युकि राज्य में केन्द्रीय राज्य मंत्री हरीश रावत के समर्थको और विधायको की बड़ी कतार विजय बहुगुणा को मुख्यमंत्री के रूप में नही देखना चाहती थी और उन्हें दस जनपथ का थोपा हुआ मुख्यमंत्री मान रही थी.... लेकिन विजय बहुगुणा के अपने राजनीतिक कौशल और प्रबंधन  के बूते सितारगंज विधान सभा सीट से भाजपा विधायक किरण चंद मंडल को इस्तीफ़ा दिलवाकर उन्हें ना केवल कांग्रेस के पाले में लाने में सफलता पाई बल्कि मंडल ने अपनी विधायकी से इस्तीफ़ा देकर खुद विजय बहुगुणा के लिए  सितारगंज सीट के रूप में उपचुनाव की नई बिसात बिछाई और कांग्रेस को फौजी तौर पर राहत पहुचाने का काम भी किया...
  
                       अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा सितारगंज सीट से ताल ठोकेंगे ... गौरतलब है क़ि विजय बहुगुणा अभी तक टिहरी लोक सभा सीट से सांसद थे...उत्तराखंड विधानसभा के चुनावो के बाद उनको कांग्रेस सरकार के मुखिया की कमान मिलने के बाद उनका ६ महीने के भीतर  राज्य की विधान सभा का सदस्य बनना अनिवार्य है लिहाजा उन्होंने सितारगंज सीट से अपना नामांकन कराया जो किरण मंडल के इस्तीफे के बाद खाली हुई.... सितारगंज में आगामी ८ जुलाई को मतदान होना है जहाँ पर भाजपा ने उनके सामने पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रकाश पन्त को मैदान में उतारा है ... हालाँकि पहले ऐसे कयास लगाये जा रहे थे क़ि सितारगंज उपचुनाव में सभी पार्टिया फिरोजाबाद लोक सभा उपचुनाव की तरह कांग्रेस के प्रत्याशी विजय बहुगुणा को वाकओवर  देंगी लेकिन  कांग्रेस  प्रत्याशी विजय बहुगुणा, भाजपा के प्रकाश पंत के साथ ही उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के दीवान सिंह बिष्ट, पीस पार्टी के रमेश चंद्र आर्य व अखिल भारतीय मुस्लिम लीग सेक्यूलर के हाजी राव मोहम्मद असगर तथा निर्दलीय मो.असलम, मोबीन अली, सरताज अली, शिवाजी सिंह, परमजीत सिंह, अयोध्या प्रसाद, मजहर अहमद व राजेंद्र ही अब चुनाव मैदान में रह गए हैं।
                    
प्रकाश पन्त के मैदान में आने के बाद सितारगंज उपचुनाव पर मुकाबला दिलचस्प होने के आसार दिखाई दे रहे हैं ..... पन्त के आने से विजय बहुगुणा को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है... हालाँकि इस सीट पर बहुगुणा की जीत के लिए शुरू से कांग्रेस बंगाली दाव खेल रही थी जिसमे बहुगुणा को पार्टी के रणनीतिकार बंगाली के रूप में प्रचारित करने में लगे हुए थे ... किरण मंडल के इस्तीफे के तुरंत बाद  विजय बहुगुणा ने अपनी पूरी ताकत सितारगंज में लगा दी और वहां जाकर अपने तूफानी दौरे करने शुरू कर दिए ... आलम यह था जिस समय शक्तिफार्म में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा "सितारगंज में अब दिन में भी दिखेंगे सितारे" के नारों के साथ घोषणाओ की फुलझड़ी जला रहे थे उसी वक्त सितारगंज विधान सभा के इलाको में मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के पहाड़ी मूल से बंगाली मूल के होने के पर्चे घर घर में बांटे जा रहे थे ...
     
                  इस पूरे घटनाक्रम की योजना विजय बहुगुणा के रणनीतिकारो ने बनाई जिसमे किरण मंडल को ढाल बनाकर विजय बहुगुणा ने भाजपा के खेमे से एक विधायक अपने पास झटक लिया.... सितारगंज से भाजपा के टिकट पर जीते किरण मंडल अब जनता के बीच जाकर यह प्रचारित कर रहे हैं क़ि उनके इलाके में बंगालियों की स्थिति सबसे ज्यादा ख़राब हो चली है और बंगालियों को भूमिधारी अधिकार नही दिए गए हैं जिसके चलते वह अपनी विधायकी छोड़ रहे हैं...साथ ही मंडल यह भी दोहरा रहे हैं क़ि विजय बहुगुणा के मुख्यमंत्री के रूप में इस विधान सभा में सक्रिय होने से सितारगंज का कायाकल्प हो जाएगा... किरण मंडल का एकाएक कांग्रेसी मोह भी लोगो के गले नही उतर रहा है ... बताया जाता है क़ि किरण से इस्तीफ़ा लेने के एवज में मुख्यमंत्री बहुगुणा और किरण मंडल के बीच १० करोड़ रुपये की कोई बड़ी डील हुई है तभी किरण मंडल अपनी सीट खाली करने को तैयार हुए हैं ... भाजपा इस मुद्दे को राज्य में जोर शोर से उछाल रही है ... इस मामले को लेकर वह नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट के नेतृत्व में राजभवन में मार्च भी निकाल चुकी है और आगामी उपचुनाव में इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच भी जा रही है.... अगर यह सच है तो यह एक छोटे से राज्य के लिए एक शर्मनाक घटना है जो यह बताती है क़ि उत्तर प्रदेश से निकले इस छोटे से प्रदेश ने भी अब झारखण्ड सरीखी  राह पकड़ ली है जहाँ विधायको की खरीद फरोख्त के लिए साम, दाम ,दंड ,भेद  सब कुछ इस्तेमाल किया जा रहा है....


                 वही राज्य के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा भी चुनाव जीतने के लिए अपने को पहाड़ी कहने के बजाए बंगाली कहने से परहेज नही कर रहे...इसकी शुरुवात उन्होंने बीते महीने अपने बंगाल दौरे के दौरान की जब उन्होंने अपने को गर्व से बंगाली कहा ताकि उत्तराखंड के सितारगंज में बंगालियों की सबसे ज्यादा तादात के मद्देनजर वह बंगाली समाज की सहानुभूति पा सके ....इस घटना ने एक बात साफ़ कर दी है भारतीय लोकतंत्र अभी भी परिपक्व नही हुआ है .. आजादी मिलने के कई वर्षो बाद भी आज चुनाव धनबल, बाहुबल, शराब  के साथ साथ जाति के आधार पर  ना केवल लड़े जा रहे हैं बल्कि जीते भी जा रहे हैं.... इसका ताजा उदाहरण हमें हाल ही में  उत्तराखंड के विधान सभा चुनाव में ही  देखने को मिला जब कोटद्वार से भाजपा के पूर्व मुख्यमन्त्री बी सी खंडूरी कांग्रेस के सुरेन्द्र  सिंह नेगी से चुनाव हार गए....यहाँ खंडूरी को हराने में जातिवाद बड़ा फैक्टर तो बना ही साथ ही भाजपा की ओर से निशंक ने उनको हराने के लिए अपनी पूरी ताकत कोटद्वार में लगा दी....इस बात को बहुगुणा के रणनीतिकार भी समझ रहे थे शायद तभी उन्होंने सोच समझकर सितारगंज का चयन  किया और   मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा के बंगाली मूल के होने को जोर शोर से उछालना शुरू कर दिया है...इसी दाव में कांग्रेस के मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा की कुर्सी सलामत दिख रही है क्युकि राज्य में केन्द्रीय मंत्री हरीश रावत का विरोधी खेमा मुख्यमन्त्री पद पर बहुगुणा की ताजपोशी के बाद से ही उनसे खफा है और  आये दिन उनको अपने निशाने पर लेता रहता है .....
                    
 इसकी बानगी हाल ही में सम्पन्न उत्तराखंड विधान सभा के सत्र में दिखाई दी जब केन्द्रीय राज्य मंत्री हरीश रावत ने खुलकर बहुगुणा को निशाने पर लिया .... उन्होंने कैबिनेट  की एक बैठक में पल भर में राज्य में चार नई प्राइवेट युनिवर्सिटियो को खोलने को हरी झंडी पल भर में दिला दी....यही नही राज्य में बड़ी और छोटी बिजली परियोजनाओ को शुरू करवाने  को लेकर हरीश और बहुगुणा में खूब खींचतान हुई.... जहाँ बहुगुणा सभी परियोजनाओ को शुरू  करने के हक़ में हैं वहीँ हरीश रावत इस पूरे मसले पर पूरे संत समाज के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं जो यह बखूबी साबित करता है क़ि बहुगुणा और हरीश रावत के रिश्तो में अभी खटास बरकरार है.... और तो और बीते दिनों मुख्यमन्त्री बहुगुणा ने सितारगंज उपचुनाव की कमान हरीश रावत के धुर विरोधी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल आर्य को सौप दी है जिससे हरीश रावत के समर्थक तिलमिलाए हुए है.... खुद रावत ने बीते दिनों बहुगुणा के खिलाफ यह बयान मीडिया में दे दिया अगर मुख्यमत्री विजय बहुगुणा उन्हें चुनाव प्रचार के लिए सितारगंज बुलाएँगे तो वह वहां चुनाव प्रचार करने जरुर जाएँगे.... यह बातें यह बताने के लिए काफी हैं क़ि  बसपा, यूकेडी और निर्दलियो के बूते उत्तराखंड में चल रही कांग्रेस की बहुगुणा सरकार में अभी सब कुछ ठीक ठाक नही चल रहा है .. अगर उत्तराखंड में कांग्रेस की राजनीती का सच यह है तो आने वाले दिनों में  मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा को सितारगंज उपचुनाव जीतने के लिए एड़ी चोटी  का जोर लगाना पड़ सकता है ..... राज्य में कांग्रेसियों की बड़ी तादात आज भी हरीश रावत को उत्तराखंड के मुख्यमन्त्री के रूप में देखना चाहती है क्युकि उत्तराखंड में कांग्रेस को खड़ा करने में  केन्द्रीय राज्य मंत्री  हरीश रावत की सबसे अहम् भूमिका रही है .... अगर हरीश रावत गुट विजय बहुगुणा के खिलाफ हो गया तो बहुगुणा को सितारगंज में हार का मुह ना देखना पड़ जाए क्युकि जिस उत्तराखंड की ३१ सीटो पर "खंडूरी हैं जरुरी " का नारा काम कर जाता है .... कोटद्वार में खंडूरी को लोग ख़ारिज कर देते हैं और भाजपा के भीतर के लोग उन्हें हरवाने में पूरा जोर लगा देते हैं तो मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा की क्या मजाल जो वह अपने बूते सितारगंज का उपचुनाव फतह कर ही लेंगे.. वैसे भी आज चुनाव समर्थको से ज्यादा कुशल प्रबंधन से जीते जाते  हैं .....


              वैसे विजय बहुगुणा के बंगाली मूल के होने के मसले पर कांग्रेस उनके लिए सितारगंज में जीत की संभावना  खोज रही है...लेकिन राज्य में हरीश रावत के समर्थको की एक बड़ी तादात और जननेता के रूप में हरीश रावत की स्वीकार्यता देखते हुए विजय बहुगुणा के सामने सितारगंज में रिकॉर्ड मतों से चुनाव जीतने की एक बड़ी चुनौती  है जिसके आसरे वह अपने को उनके पिता हेमवती नंदन बहुगुणाके सच्चे उत्तराधिकारी के रूप में साबित कर सकते हैं....साथ ही वह सितारगंज में कांग्रेस की प्रतिष्ठा बचा सकते हैं...सितारगंज सीट पर अब उनका भाग्य पूरी तरह से निर्भर हो गया है क्युकि यही रास्ता विजय बहुगुणा के मुख्यमन्त्री रुपी कांटो के ताज को जहाँ बचाए रखेगा वही ७० सदस्यीय राज्य की विधान सभा में उनकी पार्टी के विधायको की संख्या ३२ से बढकर ३३ हो जाएगी और भाजपा को यह सबसे बड़ा करारा जवाब होगा क़ि कांग्रेस में मुख्यमन्त्री के रूप में विजय बहुगुणा सर्वस्वीकार्य हैं ....  सितारगंज उपचुनाव जीतकर विजय बहुगुणा कांग्रेस सरकार को समर्थन देने वाले बसपा, यूकेडी , निर्दलियो को आईना भी दिखा सकते हैं...और इसी के जरिये हरीश रावत के समर्थको को चुप भी  बैठा सकते हैं...


सितारगंज की पिच पर विजय बहुगुणा संभल संभल कर बैटिंग करते दिख रहे हैं शायद इसी के चलते इस उपचुनाव में उन्होंने अपने को स्टार प्रचारकों से दूर कर रखा है और वह अपने भरोसेमंदो को साथ लेकर पूर्व मुख्यमन्त्री रहे नारायण दत्त तिवारी के समर्थको को साधकर चुनाव प्रचार कर रहे हैं... उत्तराखंड कांग्रेस में यह तथ्य किसी से छिपा नही है क़ि राज्य गठन के बाद से ही कांग्रेस में रावत और तिवारी के बीच शुरुवात से जो  गुटबाजी देखने को   मिली वह अब कई खेमो में बट चुकी है .. इसी के चलते इस बार राज्य में विधान सभा  चुनाव का परिणाम सामने आने के कई दिनों बाद तक कांग्रेस में मुख्यमन्त्री पद के लिए किसी एक सर्वमान्य नेता पर सहमति नही बन पाई...और दस जनपथ से अपने घनिष्ठ संबंधो और पूर्व मुख्यमन्त्री तिवारी से निकटता के चलते विजय बहुगुणा उत्तराखंड की राजनीती में नए ध्रुव के रूप में उभरे जिसने हरीश रावत सरीखे खांटी कांग्रेसी को मुख्यमन्त्री पद की लड़ाई में विजय बहुगुणा से  बहुत पीछे कर दिया.... अगर रावत के समर्थको ने  विजय बहुगुणा के खिलाफ अपना बगावती अभियान नही थामा तो उत्तराखंड कांग्रेस में आने वाले दिनों में सरकार और संगठन के बीच की खायी और चौड़ा होने का अंदेशा बना रहेगा.........


 वहीँ  सितारगंज में भाजपा ने अपने पत्ते देर से खोले... मुख्यमन्त्री विजय बहुगुणा द्वारा खुद को बंगाली के रूप में प्रचारित करने के बाद भाजपा भी यहाँ किसी बंगाली को अपना प्रत्याशी बनाना चाहती थी... लेकिन बात नही बनी... इस सीट पर विजय बहुगुणा को टक्कर देने के लिए उसने भाजपा ने नेता वरुण गाँधी की पत्नी यामिनी का नाम भी चला लेकिन उनके उत्तराखंड मूल के ना होने के चलते भाजपा पशोपेश में उलझी रह गई...भाजपा के रणनीतिकार यहाँ बसपा के पूर्व विधायक प्रेमानंद महाजन के सम्पर्क में लम्बे समय से थे लेकिन बात नही बन पाई... महाजन गदरपुर पंतनगर विधान सभा सीट लगातार २ बार जीत चुके  है....लेकिन उत्तराखंड के नए परिसीमन ने इस बार के विधान सभा चुनाव में उनके बंगाली मतदाताओ को रुद्रपुर और गदरपुर में बाँट दिया जिससे मजबूर होकर उत्तराखंड  के इस बार के विधान सभा चुनावो में उन्होंने रुद्रपुर से भाजपा प्रत्याशी राजकुमार ठकराल के खिलाफ ताल ठोकी  लेकिन उनको हार का मुह देखना पड़ा...बहुगुणा के खिलाफ कद्दावर प्रत्याशी खोजने के लिए भाजपा के गणित को बसपा ने भी गड़बड़ा दिया.... बसपा के टिकट पर सितारगंज में लगातार २  बार जीते नारायण पाल और उनके भाई मोहन पाल को अपने पाले में लाने में भाजपा कामयाब नही हो पाई हालाँकि यह दोनों नेता पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते बीते दिनों बसपा से निष्कासित  कर दिए गए हैं.....भाजपा के प्रबंधको ने मुख्यमन्त्री से टक्कर लेने के लिए अपने कद्दावर नेता प्रकाश पन्त को आगे करना ज्यादा मुनासिब समझा जो राज्य की अंतरिम भाजपा सरकार में २००१ में  राज्य के विधान सभा अध्यक्ष और पिछली भाजपा सरकार में पूर्व संसदीय कार्य मंत्री रह चुके है........पन्त ने २००२, २००७ का चुनाव पिथौरागढ़  विधान सभा सीट से भाजपा के टिकट पर जीता लेकिन २०१२ के विधान सभा चुनावो में उन्हें १३००० वोटो से कांग्रेसी  प्रत्याशी मयूख महर के हाथो हार का मुह देखना पड़ा...संभवतया पन्त को आगे कर भाजपा गैर बंगाली वोटो का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कर विजय बहुगुणा के सामने मुश्किलें पैदा करना चाहती है....


               प्रकाश पन्त की छवि उत्तराखंड के आम जनमानस में साफ़ सुधरी रही है ... साथ ही वह मिलनसार भी हैं लेकिन खंडूरी सरकार में संसदीय कार्य मंत्री होने के चलते वह अपनी विधान सभा पिथौरागढ़ में इस साल कम समय दे पाए जिसके कारण उनकी विधान सभा में हर दिन पानी को लेकर हाहाकार मचा .. साथ ही कई बुनियादी समस्याए जस की तस रही जिसके चलते वह इस बार का चुनाव हार गए...लेकिन सितारगंज में २८ फीसदी बंगालियों के अलावा ७२ फीसदी गैर बंगाली वोट हैं जिस पर भाजपा की नजरें लगी हुई हैं.... दरअसल, ऊधमसिंह नगर जिले के अंतर्गत आने वाली सितारगंज सीट  में लगभग एक लाख मतदाताओं में सर्वाधिक लगभग 28 फीसदी  बंगाली, 20 फीसदी  मुस्लिम और लगभग 12 फीसदी  पर्वतीय वोटर हैं। इसके अलावा सिख लगभग 15 प्रतिशत, थारू 12 प्रतिशत और लगभग 13 प्रतिशत अन्य हैं.... यानी, बंगाली वोटर सितारगंज में सबसे अहम निर्णायक भूमिका में हैं.... हाल में राज्य सरकार ने विधायक किरण मंडल को दिए आश्र्वासनों को जिस तरह पूरा किया  उससे साफ है कि कांग्रेस इस वोट बैंक को पूरी तरह साधने की कोशिश में है। इस स्थिति में एक गैर बंगाली के रूप में प्रकाश पंत को उतारकर भाजपा की रणनीति गैर बंगाली वोटर को अपने पक्ष में करने के साथ ही पर्वतीय वोटरों को अपने पाले में लाने की हो सकती है.... क्युकि पहाड़ी  इलाको से पलायन करने वाले कई लोगो ने अपना आशियाना पहाड़ो के बजाए इन दिनों तराई के इलाको को बनाया है जिन पर प्रकाश  पन्त अपना दावा मजबूती के साथ ठोक सकते हैं .... इन्ही वोटरों के आसरे प्रकाश पन्त मुख्य मंत्री विजय बहुगुणा को चुनोती दे सकते हैं और यही प्रकाश पन्त की खोई प्रतिष्ठा को वापस लाने का सही समय है ...समझा जा रहा है कि प्रकाश पंत जैसे वरिष्ठ पार्टी नेता को प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने यह संदेश देने की कोशिश की है  भाजपा, मुख्यमंत्री को वाकओवर देने के लिए कतई तैयार नहीं है...... अगर वह सितारगंज का उपचुनाव ना भी जीतें तो सितारगंज का बैरोमीटर उनकी भावी राजनीती की दिशा और दिशा को तय करेगा क्युकि राजनीती की नई बिसात महत्वाकान्शाओ  के आसरे ही चल रही है और पन्त अपनी इसी महत्वाकान्शाओ के चलते अगर २०१४ के लोक सभा चुनावो के लिए खुद की  भाजपा से दावेदारी का नया चैनल खोल रहे हैं तो राजनीतिक विश्लेषको को इसमें आश्चर्य कुछ भी नही लगता क्युकि सितारगंज का रास्ता २०१४ में उत्तराखंड से संसदीय राजनीती के लिए खुला अभी से हमें दिखने लगा है.....   

Thursday, June 7, 2012

रायसीना हिल्स की जंग...........................




 

 जिस समय यूपीए सरकार अपनी सरकार के तीन साल पूरे होने का जश्न एक ओर मना रही थी उसी समय रायसीना हिल्स के लिए कांग्रेस अपने सहयोगियों की नब्ज टटोलने में लगी हुई थी..... ३ साल के इस जश्न में ना माया दिखी, ना ममता, ना करूणानिधि..... इस बार इस पार्टी में अगर किसी की तरफ कैमरे की नजरें गई तो वह मुलायम और लालू प्रसाद थे... कैमरे का फ्लैश इस पार्टी में मुलायम की तरफ सबसे ज्यादा चमक रहा था .... जैसे जैसे पार्टी शुरू हुई मुलायम ने पूरे आयोजन को अपनी उपस्थिति से कैश करवा लिया..... कुछ देर बाद कांग्रेस ने उनका सत्कार इस अंदाज में किया जिसका अनुमान कभी मुलायम ने भी नही लगाया होगा .....मुलायम को सीधे मंच पर बैठाया गया जिसने इन अनुमानों को बल देने का काम जरुर किया कि आने वाले दिनों में यूपीए के नए संकटमोचक मुलायम सिंह यादव बन सकते है......यह अलग बात है इस पार्टी में लालू पर कांग्रेस ने उतनी दरियादिली नही दिखाई जितनी वह उन पर उस दौर में दिखलाया करती थी जब वह रेल मंत्री एक दौर में यू पी ए की सरकार में हुआ करते थे ...........


इस मिजाज को पड़ पाना हर किसी के लिए आसान नही है... लेकिन यही राजनीती की नई बिसात है जिसके आसरे हर दल इस दौर में अपने को पाक साफ़ बताने में जहाँ तुला हुआ है वहीँ अपनी कुर्सी बचाने के लिए अपने विरोधियो से कोई भी समझौता करने को तैयार खड़ा दिखाई देता है.... यू पी ए में इस समय यही कशमकश चल रही है ... लालू आज के दौर में अगर कांग्रेस के लिए बेगाने हो गए है और मुलायम उसके लिए फायदे का सौदा बन रहे हैं तो समझा जा सकता है यह नया रास्ता इस दौर में किस तरफ जा रहा है ... मौजूदा समय में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती जहाँ अपनी सरकार बचे २ साल चलाने को लेकर खड़ी है, वहीँ उसकी नजरे रायसीना हिल्स पर अभी से लगी हुई है क्युकि इस पद की बिसात जिस रूप में बिछ रही है उसमे अकेले कांग्रेस के "यस मैन" आसानी से अपने प्रत्याशी को जिताने की स्थिति में जहाँ खड़े नजर नही आते वहीँ विपक्ष यूपीए प्रत्याशी के नाम सामने आने तक किसी भी रूप में अपने पत्ते फैकने की स्थिति में भी नही है.... ऐसे में सभी की नजरे मुलायम और ममता के दल के साथ लगी है जिस पर अभी मुलायम का रुख सबसे भारी पड़ रहा है शायद तभी मुलायम पर कांग्रेस डोरे डालने से बाज नही आ रही है.......


वैसे भी मुलायम उत्तर प्रदेश फतह करने के बाद से सातवे आसमान पर हैं... नेता जी ने भले ही अखिलेश के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता मार्च के महीने में साफ़ कर दिया लेकिन उनकी असली नजरे अभी भी केंद्र के सिंहासन को पाने में लगी हैं.... खुद सपा के कार्यकर्ता उनकी राष्ट्रीय राजनीती में भूमिका को खोजने में लगे हुए है.... अगर कांग्रेस का साथ मुलायम सिंह देने को आने वाले दिनों में तैयार हो जाते हैं तो उनको केंद्र में मंत्री पद का " लालीपॉप " दिया जा सकता है साथ ही उप राष्ट्रपति की कुर्सी के लिए कांग्रेस उनके भाई रामगोपाल यादव के नाम को आगे कर सकती है...ऐसे भी कयास हैं कि आने वाले दिनों में कांग्रेस अपने एक सहयोगी आरएलडी से किनारा कर अजित सिंह की नागरिक उड्डयन मंत्री पद से विदाई करा सकती है और इसके बेहतरीन विकल्प के रूप में नेता जी को नागरिक उड्डयन मंत्री का ताज दिया जा सकता है......


यह तय है आने वाले दिनों में यूपीए के बड़े संकटमोचक मुलायम बन सकते है ... जिस तरीके से यूपीए सरकार मे महंगाई लगातार बढती जा रही है ... रूपया लगातार गिर रहा है और मनमोहनी इकोनोमिक्स इस दौर में धराशायी हो रही है ... उसके मद्देनजर ममता सरीखे कांग्रेस के सहयोगी कांग्रेस से कभी भी समर्थन वापस ले सकते है .. ऐसे में यू पी ए अभी से मुलायम की शरण में जाकर जहाँ अपने बचे २ साल चैन से काटना चाह रही है वहीँ वह आने वाले दिनों में चुनावो में फिर से अकेला चलो की नीति को अपना सकती है.....


२००५ में मुलायम ने परमाणु करार पर जिस प्रकार यू पी ए की नैया पार लगाई थी इस बार भी वह राष्ट्रपति चुनावो में कांग्रेस की पसंद को विभिन्न दलों के बीच ले जाकर उस प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाते नजर अगर आएँगे तो इसमें किसी को कोई आश्चर्य शायद ही होगा क्युकि इसके एवज में वह अपने उत्तर प्रदेश के लिए केंद्र से बड़ा पैकेज लेने का मौका भी शायद ही छोड़ेंगे ......रायसीना हिल्स की इस बार की जंग दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ी हो गई है ....पांच राज्यों के चुनाव परिणामो ने जहाँ कांग्रेस और भाजपा सरीखी बड़ी पार्टियों के समीकरण पूरी तरह गड़बड़ा दिए है वही राष्ट्रपति को लेकर नए नए नामो के कयास लगने शुरू हो गए है.. किसी एक नाम पर शायद सहमति इस बार बन पाये.... ऐसे में छोटे छोटे दलों की भूमिका प्रभावी होने की पूरी सम्भावनाये दिख रही है जहाँ मुलायम "ट्रंप कार्ड " साबित हो सकते है....


कांग्रेस को अपनी पसंद के प्रत्याशी को राष्ट्रपति बनाने के लिए या तो अपने सभी सहयोगियों को साथ लेकर चलना होगा या फिर सहयोगियों के द्वारा सुझाये गए नाम पर अपनी मुहर लगाने को मजबूर होना पड़ेगा ... वैसे इस बार राष्ट्रपति पद की चाबी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सरीखे राज्यों के पास है जिनका संख्याबल यू पी ए और एन डी ए जैसे दलों के गणित पर भारी पड़ सकता है..... कांग्रेस में इस समय यह भी चल रहा है अगर वह अपने प्रत्याशी को जिताने में कामयाब रहती है तो उपराष्ट्रपति का पद वह अपने सहयोगियों सपा, तृणमूल जैसी पार्टियों को देने में कोई हिचक नही दिखाएगी.... वहीँ भाजपा भी इस पशोपेश में उलझ रही है किसी भी तरह ममता, माया, अम्मा को साथ लेकर यू पी ए को डेमेज किया जाए जिसमे नवीन पटनायक जैसे नेता उसका साथ दें.....


राष्ट्रपति का पद भारत में सम्मानजनक है .....जिसके चुनाव में संसद के दोनों सदनों और राज्यों के विधान मंडल के सदस्य भाग लेते हैं देश में इस समय कुल ७७६ सांसदों के वोट की ताकत ५,४९,४०८ है जबकि ४१२० विधायको के वोट की ताकत ५,४९,४७४ है ... इस समय कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है उसके पास ३,३०,४८५ वोट है जो राष्ट्रपति के लिए पड़ने वाले कुल १०,९८,९९२ वोटो कि तुलना में बहुत कम हैं.....अगर इस बिसात में यू पी ए के अन्य १२ सहयोगियों को भी साध लिया जाए तो यह आंकड़ा ४,५९,४८३ तक पहुचता है जो कुलवोट का महज ४० फीसदी ही है .... जबकि सभी जानते है राष्ट्रपति के लिए आंकड़ा ५० फीसदी से एक अधिक का होना जरुरी है....


कांग्रेस के पास लोक सभा में अपने खुद के बूते और सहयोगियों को लेकर जहाँ बहुमत है वहीँ राज्य सभा में अपने सहयोगियों को साथ लेने के बाद भी उसकी राह इस साल आसान नही दिखती .....यही स्थिति भाजपा की भी है .. उसके विधायको और सांसदों की ताकत इस बार के चुनावो में २,२५,३०१ है ... और एन डी ए के घटक दलों का कुनबा भी अगर उसने साध लिया तो यह आंकड़ा ३,०४,७८५ तक ही पहुचता है.....यानी कुल वोट का तकरीबन ३५ फीसदी.......


अब इस जंग में कोई प्रदेश सबसे ज्यादा अहम् साबित हो सकता है तो वह उत्तर प्रदेश ही हमें दिख रहा है ... जहाँ की चाबी सही मायनों में नेताजी के पास है.... ८० सांसदों वाले इस प्रदेश में सबसे ज्यादा ८३,८२४ वोटो पर सीधा मुलायम का नियंत्रण जहाँ है वही ममता के पास अपनी तृणमूल के ४५,६४० वोट की ताकत है... वहीँ जयललिता भी तमिलनाडु फतह करने के बाद गदगद हैं क्युकि उनके पास भी ३५,३९२ वोटो की बड़ी ताकत है जो यू पी ए के गणित को डगमगा सकती है.... .....सभी राज्यों के तकरीबन ५,४९, ४७४ वोटो में १५ फीसदी वोट अकेले उत्तर प्रदेश , पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के हैं जो इस बात को बता रहे है कि इस बार रायसीना की जंग में इन तीन राज्यों की तिकड़ी का ही कमाल अगर हमें देखने को मिले तो किसी को कोई आश्चर्य नही होना चाहिए.....


रायसीना के लिए योग्य प्रत्याशी खोजने में सभी दलों के लिए नई कड़ी का काम अगर कोई कर सकता है तो वह बेशक सोनिया गाँधी हो सकती है ... २००७ में भी उन्होंने चुनाव होने से ठीक पहले प्रतिभा पाटिल का दाव खेलकर सभी को चौंका दिया था....उस समय प्रतिभा ताई का नाम दूर दूर तक इस पद के लिए संभावित उम्मीदवारों की सूची में नही था.... वह तो राजस्थान में ब्रह्मकुमारी विश्वविद्यालय के एक समारोह में अपना संबोधन कर रही थी.......तभी प्रतिभा ताई के फ़ोन की घंटी बजी और सोनिया ने उनके नाम पर अपनी हामी भर दी.... इस बार भी अगर किसी एक नाम पर सहमति नही बनती तो शायद यही हो सकता है सोनिया जो दाव चलेंगी उस पर किसी को कोई एतराज नही होगा... वैसे भी इस देश में कांग्रेस नेहरु गाँधी परिवार के "ओरा "तले अपने पत्ते फैकती है जहाँ मुख्यमंत्री से लेकर विधान सभा चुनावो में प्रत्याशी चयन का जिम्मा दस जनपद की चाटुकार टोली संभाला करती है ... अगर इस बार सोनिया कि नही चली तो दस जनपद से कोई नया नाम चुनाव से ठीक पहल्रे सामने लाया जाएगा .. और इन सब के बीच कांग्रेस के ट्रबल शूटर इस मुहिम में यू पी ए के सहयोगियों को साथ लेने के काम को हमेशा की तरह अंजाम देते नजर आ सकते हैं.....


वैसे बताते चलें अभी तक कांग्रेस ने इस पद के लिए प्रत्याशी के नाम का ऐलान नही किया है... जो नाम सामने आ रहे है वह सब मीडिया की उपज ही हैं.... इस कड़ी में सबसे पहला नाम कांग्रेस के संकटमोचक प्रणव मुखर्जी का है जिन्होंने अगला लोक सभा चुनाव ना लड़ने की बात को कुछ समय पहले दोहराया था ......लेकिन कांग्रेस में कई लोग प्रणव दा के लिए समर्थन देंगे इसमें संशय बना है.... खुद मनमोहन भी अपनी सरकार के इस संकटमोचक को रायसीना हिल्स भेजकर अपने लिए संकट खड़ा नही करना चाहते ... क्युकि यह बात किसी से छुपी नही है यह यू पी ए सरकार अपनी दूसरी पारी में अगर किसी के बूते चल रही है तो वह प्रणव मुखर्जी ही हैं जिन्होंने हर संकट पर यू पी ए के सहयोगियों को अपने साथ साधने का काम किया है......सोनिया राष्ट्रपति पद पर मनमोहन जैसे अपने किसी विश्वासपात्र को अगर बैठाना चाह रही है तो इसमें आश्चर्य जैसा कुछ भी नही है.... क्युकि सोनिया की हर बिसात का रास्ता दस जनपद से होकर जाता है और यह सभी को अच्छे से मालूम है आज के दौर में दस जनपथ का पूरी तरह से कांग्रेसीकरण हो गया है.... .. ऐसे में वह अपने किसी यस मैन के लिए ही रायसीना का दरवाजा खोलेगी......इस कड़ी में प्रणव मुखर्जी की राह आसान नही है क्युकि सोनिया पूर्व में राजीव के साथ प्रणव के व्यवहार को भली भांति जानती हैं ... साथ ही वह प्रणव की अवसरवादिता से भली भांति वाकिफ भी हैं ........ऐसे में प्रणव के राष्ट्रपति बनाये जाने की राह आसान नही लगती.....


यही स्थिति हामिद अंसारी के साथ भी है... वह एक मुस्लिम हैं और वर्तमान में उप राष्ट्रपति की कुर्सी संभाल रहे हैं लेकिन जिस तरीके से कलाम का नाम एक बार फिर सियासतदानो के बीच इस दौर में उमड़ घुमड़ रहा है इन सबके मद्देनजर हामिद अंसारी का दावा इस पद के लिए नरम पड़ता जा रहा है.....दलित राष्ट्रपति के नामो पर भी कांग्रेस में इस समय मंथन चल रहा है जिसमे सुशील कुमार शिंदे से लेकर मीरा कुमार तक रेस में बने हैं.... वही इस पद के लिए पिछली बार की तरह डॉ कर्ण सिंह का दावा भी मजबूत नजर आ रहा है क्युकि उनकी सोनिया के साथ निकटता किसी से छिपी नही है ... साथ ही वह दस जनपद के सबसे विश्वास पात्रो में से एक हैं......


इसी कड़ी में पूर्व गृह मंत्री और वर्तमान राज्यपाल शिवराज पाटिल का नाम भी सामने आ रहा है जिनकी साफ़ सुधरी छवि पर कांग्रेस अपने सहयोगियों की मुहर लगा सकती है लेकिन उनकी सबसे बड़ी दिक्कत महाराष्ट्र से होने को लेकर है.... इस बार भी अगर नए राष्ट्रपति के लिए महाराष्ट्र से प्रत्याशी को आगे किया जाता है तो देश में विभिन्न दल इस पर अपना विरोध जताने की स्थिति में है....... पूर्वोत्तर से नया राष्ट्रपति चुने जाने के लिए अटकले इस समय तेज हैं जिसमे आसाम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई का नाम हवा में तैर रहा है .... वह हैट्रिक लगाकर लगातार तीसरी बार आसाम के मुख्यमंत्री बने हैं..... लेकिन उनके नाम के साथ जनजातीय राष्ट्रपति की गूँज संगमा ने अपने साथ लगा दी है......... बीते दिनों जयललिता, नवीन पटनायक को अपने साथ साधकर उन्होंने देश में नयी बहस को जन्म देने का काम किया है कि क्या इस बार नया राष्ट्रपति जनजातीय हो और जो पूर्वोतर का प्रतिनिधित्व करे ......? लेकिन संगमा के नाम को लेकर शरद पवार ने अभी तक अपना समर्थन नही किया है वहीँ सोनिया भी संगमा के अतीत को देखते हुए उनके नाम पर शायद ही सहमत होंगी क्युकि ९० के दशक में तारिक अनवर, शरद पवार , संगमा की तिकड़ी ने उनके विदेशी मूल के मुद्दे पर कांग्रेस से बगावत कर दी थी...... लेकिन संगमा भाजपा से भी अपने लिए समर्थन मांग रहे हैं .... आडवानी को छोड़कर किसी भाजपा के बड़े नेता ने अभी तक उनके नाम का समर्थन नही किया है और इस समय आडवानी किस तरीके से हाशिये पर खड़े हैं यह सभी अच्छे से जान रहे हैं .... ऐसे में राष्ट्रपति की जंग इस बार रोचक होने के पूरे आसार नजर आ रहे है.......


वैसे इस पद के लिए सबसे ज्यादा काबिल अगर कोई इस समय दिख रहा है तो वह पूर्व राष्ट्रपति कलाम हैं.... कलाम के नाम का दाव अगर मुलायम इस बार फिर चल दें तो देश की सियासत में एक मुस्लिम उम्मीदवार को आगे करने के नेताजी के दाव का जहाँ पूरे देश के मुस्लिम समर्थन करेंगे वहीँ नीतीश कुमार, लालू प्रसाद, जयललिता, ममता, शरद पवार , प्रकाश सिंह बादल जैसे लोग नए राष्ट्रपति के लिए सर्वसम्मति बनाने की दिशा में एक नई लीक पर चलने का साहस जुटा सकते हैं जिसके बाद मजबूर होकर भाजपा और कांग्रेस को उनकी उम्मीदवारी का समर्थन करना होगा....... लेकिन मौजूदा दौर में नए राष्ट्रपति का रास्ता भी सौदेबाजी के आसरे ही गुजरता नजर आ रहा है जहाँ हर दल २०१४ के लिए अपने लिए नई बिसात बिछा रहा है और अपने दल के लिए केंद्र से मिलने वाले फायदे को ही देख रहा है............. ऐसे में रायसीना हिल्स की यह जंग किस मुकाम पर जाएगी कह पाना मुश्किल ही है.....?