Saturday, May 27, 2017

ड्रैगन ने बढ़ाई भारत की चिंता



72000 वर्ग किलोमीटर एरिया चीन को हारकर नेहरु उस दौर में जब ससंद गये तो सांसदों ने ये सवाल पूछा कि पंडित जी भारतीय जमीन  कब वापिस आएगी तो नेहरू इस सवाल को अक्सर टाल जाते थे | तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू चीन की तरफ से मिले इस धोखे से बुरी तरह आहत थे |  संसद में नेफा पर चीन के कब्जे को लेकर हुई बहस में नेहरू ने कह दिया कि वह तो बंजर इलाका है, वहां घास का एक तिनका तक नहीं उगता | उनके इस कथन पर उन्हें टोकते हुए  दिग्गज सांसद महावीर त्यागी ने जवाबी सवाल दागा, ‘पंडित जी, आपके सिर पर भी एक बाल नहीं उगता तो क्या उसे भी चीन को भेंट कर देंगे?
 शायद नेहरू को भी तत्काल अहसास हो गया था कि यह सब कर  उन्होंने सदन में  कमज़ोर दलील पेश कर दी है, लिहाज़ा उन्होंने अपना भाषण जल्द पूरा किया |  सदन में न तो नेहरू के कथन पर और न ही महावीर त्यागी के जवाबी कथन पर कोई हंगामा या नारेबाज़ी हुई|   यही नहीं चीन से हार के बाद संसद में कृपलानी ने भी नेहरु को कठघरे में खडा करते हुए कहा अध्यक्ष महोदय प्रधानमंत्री बार बार इतिहास बनाने की बात करते हैं और चीन भूगोल बना रहा है | 

इन वाकयों का मजमून यह है मौजूदा दौर में भी चीन लगातार भारत के सामने परेशानियों को खड़ा करने में लगा हुआ है लेकिन इसे लेकर किसी तरह की कोई हलचल देश में नहीं दिखाई दे रही |  यह सवाल मौजूदा दौर में  इसलिए भी बड़ा और गहरा हो चला है क्युकि चीन की चिंताओं को अभी भी भारत शायद हल्के में ले रहा है लेकिन इन दिनों  चीन अपनी  साम्राज्यवादी नीतियों के आसरे पूरे विश्व पर अपनी पकड़ मजबूत करने का रोड मैप तैयार करने में लगा हुआ है |  पड़ोसी मुल्क चीन सदैव हमारे लिए चिंता का कारण रहा है। 1962 में उसने हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा देते हुए हिमालय के सीमा क्षेत्रों से भारत पर आक्रमण कर दिया।  पड़ोसी देश होने के बावजूद चीन अक्सर भारत के खिलाफ आँखें तरेरता रहता है। 

 मौजूदा दौर में बीते दिनों चीन की महत्वाकांशी वन बेल्ट वन रोड  (ओबीओआर परियोजना ) ने फिर एक बार भारत की चिंताओं को बड़ा दिया है |  असल में चीन ने ओबीओआर परियोजना पर व्यापक सहमति बनाने के मकसद से बीजिंग में बीते दिनों पाक , रूस को एक मंच पर साधकर बड़ा सम्मेलन किया जिसमें दुनिया के 130 देशों के प्रतिनिधि , व्यापारी और फाइनेंसर शामिल हुए जबकि भारत ने इस आयोजन का बायकाट किया । 

चीन ओबीओआर के अंतर्गत चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा बना रहा है। यह रास्ता पाकिस्तान को सीधे चीन से जोड़ेगा। 2442 किलोमीटर लम्बे इस रास्ते को  बनाने का मकसद दक्षिण-पश्चिमी पाकिस्तान से चीन के उत्तर-पश्चिमी स्वायत्त क्षेत्र शिंजियांग तक ग्वादर बंदरगाह रेलवे और हाइवे के माध्यम से तेल और गैस की कम समय में वितरण करना है। भारत इस रास्ते का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि यह रास्ता पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित-बाल्टिस्तान और पाकिस्तान के विवादित क्षेत्र बलूचिस्तान होते हुए जायेगा। जिसे भारत अपना हिस्सा मानता है। यह रास्ता इसलिए भी विवादित है क्योंकि बलूचिस्तान प्रांत में दशकों से अलगाववादी आंदोलन चल रहे हैं। इसलिए भारत ने ओबीओआर सम्मेलन में हिस्सा नहीं लिया ।

चीन की महत्वकांक्षी ओबीओआर परियोजना कितनी विशाल है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि दुनिया की आधी से अधिक आबादी अब इसके दायरे में आएगी। इस परियोजना के तहत सड़क रेलवे और बंदरगाहों का ऐसा  बुनियादी जाल बिछाया जाएगा जो एशिया  ,अफ्रीका और यूरोप के बीच संपर्क और आवाजाही को आसान कर देगा | तकरीबन  पैंसठ देशों को जोड़ने की इस महापरियोजना पर चीन 2013 से साठ अरब डॉलर खर्च कर चुका है और अगले पांच बरस में इस पर 900 अरब डॉलर निवेश करने की उसकी योजना है। चीन का मानना है कि यह दुनिया का सबसे बड़ा सिल्क रूट होगा और चीन की यूरोप तक सामान को पहुचाने की उसकी सीधी पहुँच  होगी | 

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शी की मानें तो यह परियोजना एशिया के साथ  यूरोप एवं अफ्रीकी देशों का कायाकल्प कर देगी |  अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट को अमलीजामा पहनाने की मंशा से उसने सम्मेलन में भागीदार विकासशील देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को 8 अरब डालर की सहायता देने का एलान भी कर दिया है | इस महाप्रोजेक्ट में कई मार्ग और बंदरगाह परियोजनाएं भी  हैं। 

चीन ने भारत (ओबीओआर परियोजना )  में शामिल होने से इनकार करने को खेदजनक बताया है। दरअसल भारत की मुख्य चिंता इस दौर में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे सीपीईसी  को लेकर हैं क्युकि परियोजना का अधिकांश हिस्सा पाक और चीन के कब्जे में है  जिससे कश्मीर क्षेत्र पर व्यापक असर न केवल पड़ सकता है बल्कि दोनों देशो के साथ भारत के संबंधों में और तल्खी आने की संभावना है |  हालाँकि चीनी मीडिया के मुताबिक यदि ओबीओआर परियोजना को लेकर किसी देश को इतने संदेह हैं और वह इसमें शामिल होने को लेने के लिए उस देश  पर दबाव नहीं बनाएगा। दरअसल भारत का कहना है कि कोई भी देश ऐसी परियोजना को स्वीकार नहीं कर सकता जिसमें उसकी संप्रभुता एवं भूभागीय एकता संबंधी प्रमुख चिंताओं की उपेक्षा की गई हो।  

चीन की लगातार भारत को चारों तरफ से घेरने की कोशिश से भारत की चिंता बढ़ गयी है |  चीन की वन बेल्ट, वन रोड नीति, रिंग पर्ल की नीति लगातार भारत को ही हर तरफ से घेर रही है। इससे आने वाले समय में भारत के व्यापार, सुरक्षा, तथा ब्लू वॉटर इकोनॉमी पर बुरा असर पड़ सकता है। चीन ने  हर मोर्चे पर भारत के पड़ोसियों को इस मुहीम में ना केवल साधा है बल्कि उन्हें मदद और लोन दिलाने का भरोसा दिलाया है | श्रीलंका के साथ  नेपाल, पाकिस्तान, मालदीव को एक मंच पर लाकर अपने सामारिक और व्यापारिक रफ़्तार को चीन बड़ी उड़ान में तब्दील करने की सोच रहा है |  

आज चीन समुद्री क्षेत्र, रेल, सडक़ समेत सभी संपर्क मार्गों को विस्तार करने में लगा है। चीन ने  पडोसी नेपाल के साथ वन बेल्ट, वन रोड परियोजना में समझौता किया है। इसके तहत चीन तिब्बत के रास्ते नेपाल तक सडक़ मार्ग के विकास को धार देगा। चीन नेपाल तक अपने रेलमार्ग के विकास को भी गति दे रहा है। उसकी योजना रसुआगढ़ से नेपाल के बीरगंज तक अपनी रेल सेवा लेकर आने की है। बीरगंज से बिहार राज्य से सटा है। श्रीलंका में भी चीन हंबनटोटा बंदरगाह के विकास में एड़ी चोटी का जोर लगा रहा है | चीन श्रीलंका की पोर्ट , सड़क , परिवहन सरीखी कई परियोजनाओं में भी दिलचस्पी ले रहा है जिनमें हंबनटोटा पोर्ट का विकास , इंडस्ट्रियल जोन निर्माण , कोलंबो पोर्ट सिटी का विकास  आदि प्रमुख रूप से शामिल है। श्रीलंका की तरह वह  अफगानिस्तान में भी सक्रियता बढाने की जुगत में है | 

पाकिस्तान के ग्वादर में बंदरगाह के विकास से लेकर बिजिंग तक सिल्क रोड का विकास उसके एजेंडे में है। यूरोप और एशिया को सडक़ मार्ग से जोडऩे की एक नई नीति पर उसका मंथन चल रहा है जिसके तहत उसकी योजना अपनी कनेक्टिविटी के विस्तार की है। इधर मोदी ने भी बीते दिनों चाबहार का दाव खेलकर चीन की चुनौती को स्वीकार तो किया लेकिन भारत के सभी पड़ोसियों को अपने पाले में लाकर भारत को अलग थलक करने का काम चीन के अपने ड्रीम प्रोजेक्ट के आसरे कर दिया है जिसमे बहुत हद तक वह सफल हो रहा है | पहली बार मोदिनोमिक्स का कूटनीतिक दांव फंस कर रह गया है |  

पुराने पन्ने टटोलें तो भारत और चीन के बीच 1962 के बाद से रिश्तों में गर्माहट लाने की बहुत कोशिशें तेज हुई लेकिन यह सब धरी की धरी ही रही हैं | भारत चीन सम्बन्ध हमेशा तल्ख़ ही रहे हैं |  1962 के बाद से दोनों देशों के बीच सीमा विवाद , नत्थी वीजा , अरुणाचल, तिब्बत  को लेकर  कई विवाद हुए हैं। पिछले दिनों चीन ने अरुणाचल प्रदेश की कुछ जगहों के नाम  जहाँ बदल डाले वहीँ दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा पर चीन आग बबूला हो उठा था | भारत ने सुरक्षा की दृष्टि से चीन सीमा पर ब्रह्मोस तैनात की थी तब भी चीन नेकड़ा एतराज जताया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जैशे मोहम्मद सरगना हाफिज सईद को प्रतिबन्धित करने के भारत के प्रयास पर  चीन ने ही वीटो का इस्तेमाल कर भारत को आइना दिखा दिया | 

सीमा पार आतंकवाद बढाने में पाक की भूमिका किसी से छिपी नहीं है लेकिन चीन पाकिस्तान का इस मसले पर भी खुलकर साथ देने से पीछे नहीं रहता है |  यही नहीं चीन का  ब्रह्मपुत्र पर विशालकाय बांध बनाने का प्रोजेक्ट भी पाइप लाइन में है |ज्यादा समय नही बीता जब एन एस जी समूह की बैठक में बीते बरस भारत को चीन ने ही आईना दिखाया  | भारत इस समूह में सदस्यता हासिल करने के लिए जी-तोड़ प्रयास कर रहा है। उसने बीते बरस अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस व रूस जैसे दिग्गज देशों का समर्थन भी हासिल कर लिया था  लेकिन चीन टस से मस नहीं हुआ | चीन का हमेशा से यही राग रहा है कि वह भारत का विरोध नहीं कर रहा लेकिन उसे शर्तें तो माननी होंगी। 

भारत ने समूह में प्रवेश के लिए बीते बरस मई माह में अपना दावा पेश किया | असल में चीन नहीं चाहता कि भारत को इस समूह में प्रवेश मिले। इसके लिए उसने दो शर्तें थोप रखी हैं। पहली यह कि जिन देशों ने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत नहीं किए हैं उन्हें सदस्यता से महरूम रखा जाए। इसके साथ ही चीन पाकिस्तान को इस मामले में भारत के बराबर आंकता चला आ रहा है जो उसकी एक बड़ी भूल है | चीन के इस अड़ियल रुख से भारत की संभावनाएं इस बरस भी खत्म हैं | ड्रैगन के रुख में कोई बदलाव नहीं आ सकता | वह पाक के लिए कुछ भी कर सकता है भारत के लिए नहीं |

  इस बार भी जून में भारत के समर्थन में चीन के खड़े होने की नहीं के बराबर सम्भावना है | एन एस जी इसकी बैठक बर्न (स्विटजरलैंड) में अगले महीने होने जा रही है जहाँ दुनिया के तमाम परमाणु शक्ति संपन्न देश आपस में चर्चा करेंगे | कुलमिलाकर ड्रैगन  पर भारत की चिंता स्वाभाविक है | पी एम मोदी को चाहिए अब वह विश्व समुदाय के समक्ष चीन के हर मनमानीपूर्ण रवैये को ठोस ढंग से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाये तभी कुछ बात बन पाएगी नहीं तो जिस रफ़्तार के आसरे  चीन  बढ़ रहा है उसके बढ़ते कदम रुकने नामुमकिन हैं   | 

Tuesday, May 16, 2017

मुश्किल में लालू प्रसाद

लालू प्रसाद यादव का नाम जेहन में आते ही बिहार को लेकर एक अलग तरह की छवि बनती है |  सामाजिक न्याय और पिछड़ों के मसीहा कहलाने वाले लालू प्रसाद  को  अलहदा पहचान जे पी छाँव तले  मिली  जब नीतीश , जॉर्ज  , सुशील मोदी , शरद यादव , रविशंकर प्रसाद सरीखे नेताओं के साथ आपातकाल में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई |  जेपी आंदोलन के बाद लालू की राजनीति ऐसे  उफान पर रही जिसने मंडल कमंडल दौर में उनको बिहार का सरताज बना डाला |  यह सच भी शायद किसी से छिपा हो  उनके और राबड़ी देवी  के  कार्यकाल में  बिहार सबसे बुरे दौर में  कई बरस  पीछे  चला गया |  माफिया  गुंडों की लालू  प्रसाद के दौर में जहाँ तूती  बोलती थी  वही अपहरण , रंगदारी , लूटपाट , गुंडागर्दी , रेप  की घटनाएं  उस समय आम बात थी | कानून व्यवस्था लुंज पुंज थी | पुलिस के पास आप अगर प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज करवाने जाते थे तो रजिस्टर  में वह दर्ज भी नहीं हो पाती थी |  अपने कार्यकाल में उन्होंने जहाँ  करोड़ों  के वारे न्यारे किये वहीँ  उन्होंने कानून व्यवस्था  को तार तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी  |  बिहार  उनके समय से ही पलायन का दंश झेल रहा है | उस दौर में लालू के खिलाफ जब घोटालों का जिन्न आता है  तो  जेहन में सबसे पहले चारा घोटाले का जिक्र होता है जिसने 90 के दशक में लालू को चर्चित कर दिया | लालू प्रसाद  की राजनीती उस राजनीति की देन है जिसे बतौर प्रधानमंत्री वी पी  ने हवा दी और  मंडल कमीशन को देश भर में लागू कर दिया गया। पिछड़ी राजनीति का यह तोहफा  लालू प्रसाद को  बिहार के मुख्यमंत्री के  रूप में मिला। यही नहीं आडवाणी के रथ को रोक और उन्हें गिरफ्तार कर लालू  प्रसाद ने अपनी सांप्रदायिकता विरोधी छवि को देश में  जरूर मजबूत किया। उस दौर की शासन व्यवस्था का जिक्र करें तो उनका  कार्यकाल बिहार के लिए सबसे बुरे  दौर के रूप में  जाना जाता है जिसने लालूराज को जंगलराज से जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी |   

  गोपालगंज में एक यादव परिवार में जन्मे लालू यादव  ने राजनीती का ककहरा जेपी आंदोलन से सीखा । उस दौर को याद करें तो  रैली के दौरान ही जब  जेपी पर लाठियां बरसाई जाने लगीं तो लालू उन्हें बचाने के लिए उनकी पीठ पर लेट गए। कहा जाता है कि उनकी इस सूझ बूझ को देखते हुए उन्हें पहली बार  लोकसभा का टिकट थमा दिया गया लेकिन  लालू यादव का  असल राजनीतिक सफर आपातकाल के बाद से   शुरू हुआ जब वह पहली बार बिहार के छपरा से सांसद बने।बिहार के मुख्यमंत्री रहने के बाद वह  केंद्र सरकार में रेल मंत्री भी बनें। बिहार में लालू जब सत्ता में थे तब  साधु, सुभाष, राबड़ी और लालू (ससुराल)   के इर्द-गिर्द ही सत्ता  घूमती  थी। ठेठ गवई, चुटीली  राजनीति करने वाले लालू प्रसाद ने उस दौर में एक नई परंपरा गढ़ी जब बिहार का नाम देश दुनिया  में घोटालों ने ख़राब कर दिया |  1996 में जब चारा घोटाला सामने आया था तो मीडिया ने इसे खूब लपका | देश के किसे कोने में ऐसा पहली बार हुआ जब  जानवरों के चारे तक में घोटाले की बात सामने आई | तब इसे लेकर लालू पर खूब चुटकुले भी बने | लालू पर  90  के दशक  में मौजूदा झारखंड की चाईबासा ट्रेजरी से लाखों  रुपए निकालने का केस चल रहा था। तब चाईबासा बिहार में ही हुआ करता था। लालू यादव पर चाईबासा ट्रेजरी से पैसा निकालकर पशुपालन विभाग में ट्रांसफर कराने का केस था। पूरा चारा घोटाला करीब 950 करोड़ रुपए का था जिसमें ये केस तकरीबन 38 करोड़ रुपए की अवैध निकासी का था। अविभाजित बिहार में जगन्नाथ मिश्र से लेकर लालू यादव के सीएम रहने के दौरान फर्जी बिल के जरिए पशुओं को चारा खिलाने के नाम पर निकाला गया था।  चारा घोटाले के चाईबासा ट्रेजरी केस में लालू यादव के साथ जगन्नाथ मिश्र को भी दोषी पाया गया। 

1997 में लालू के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होने के बाद जब उन्हें सी एम पद छोड़ना पड़ा  तो वह अपनी पत्नी राबड़ी को सिंहासन  सौंप जेल चले गए और इसी दौर में  आय से अधिक संपत्ति का भी मामला उनके खिलाफ दर्ज हो चुका था | लालू को कुछ दिनों बाद बेल मिली |  लेकिन 2000 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में लालू और राबड़ी को कोर्ट में सरेंडर करना पड़ा जहाँ  राबड़ी को तो बेल मिल गई लेकिन लालू फिर जेल गए |  2006 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में वह और राबड़ी बरी हो गए |  2013 में लालू में रांची की सीबीआई कोर्ट ने लालू सहित 44 लोगों को सजा सुनाई | इसके साथ ही लालू को लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी थी | वह जेल भी गए और सशर्त जमानत पर बाहर भी आ गए | |  2 बरस पूर्व बिहार चुनावों के समय यह कहा गया  लालू यादव की भावी राजनीति की मियाद पूरी हो गई  , लेकिन  सत्ता और चुनाव लड़ने से उनके दूर होने के बाद भी वह बिहार में सबसे अधिक सीट लेकर आये और नीतीश का राजतिलक करवाया  लेकिन कल सुप्रीम कोर्ट ने ने 21 बरस  पुराने 950 करोड़ के चारा घोटाले के सभी चार मामलों में लालू प्रसाद यादव पर अलग-अलग मुकदमे चलाने के निर्देश दिए  साथ ही  जगन्नाथ मिश्र और तत्कालीन ब्यूरोक्रेट सजल चक्रवर्ती पर भी साथ-साथ केस चलाने का ऐलान करके मुश्किलों को बढ़ा दिया |  यह वही मामला है, जिसमें 2014 में झारखंड उच्च न्यायालय ने यह कहकर रोक लगा दी थी कि एक ही मामले में एक ही व्यक्ति पर समान गवाहों के साथ अलग-अलग केस नहीं चल सकता। अदालत ने इस मामले में सारी कार्रवाई तय समय-सीमा में पूरी करने की शर्त भी रखी है।  वैसे अगर देखें  तो लालू प्रसाद की राजनीति पर तब तक कोई खास असर पड़ता नहीं दिखाई देता, जब तक कि वह इन या ऐसे मामलों में सजा पाकर पूरी तरह जेल न चले जाएं। लेकिन फिलहाल सच यही है कि  उनकी पार्टी की  कई मुश्किलों में इस फैसले ने इजाफा कर दिया है। पिछले कुछ दिनों से दोनों मंत्री पुत्रों सहित लालू यादव खुद भी मिट्टी घोटाले के ताजा जिन्न और अभी-अभी आए कथित लालू-शहाबुद्दीन टेलीफोन वार्ता से विपक्ष के निशाने पर हैं। ताजा फैसला इन हमलों को और धार देगा। राजनीतिक उठापटक बढ़ेगी । यह भी तय है कि फैसला लालू प्रसाद की राजनीति से ज्यादा बिहार के महागठबंधन की राजनीति पर असर डालेगा और यही असल में देखने की बात होगी। कहना न होगा कि हाल में लगे आरोपों के बाद जिस तरह की बातें सामने आईं, जिस तरह महागठबंधन के बड़े साथी लालू प्रसाद के बचाव की बजाय जद-यू अपनी छवि को लेकर सतर्क दिखा है उसने भी भविष्य के संकेत दिए हैं। यह फैसला खुलासे के 21 साल बाद आया है और  सुप्रीम कोर्ट का साफ  कहना है  चार अलग-अलग मामलों में मुकदमा चलेगा, फिर सजा का एलान होगा। अदालत ने सुनवाई की समय-सीमा भी तय कर दी है।  आने वाले दिनों में अब लालू के सामने  भारी संकट खड़ा हो गया है | इस फैसले से  48 घंटे पहले अर्णव गोस्वामी के रिपब्लिक चैनल पर आये आडियो टेप ने तहलका मचा दिया जहाँ लालू जेल में शाहबुद्दीन से बात करते नजर आ रहे थे  | इस टेप ने बिहार के सत्ता गलियारों में लालू  की हनक और नीतीश के लाचार सी एम के सच को दिखाने का काम किया है जिसके बाद जे डी यू  और राजद  को ना उगलते बन रहा है ना निगलते | रही सही कसर अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ने बढ़ा दी है | 

बिहार में सत्ताधारी जदयू को डर है कि लालू प्रसाद का करियर अगर समाप्त हुआ तो नीतीश की साफ़ सुथरी  छवि पर भी ग्रहण लगना  तय है | वहीँ लालू प्रसाद जानते हैं कि दोनों बेटों को वारिस  बनाकर  उनकी पार्टी  एक नई  शुरुवात की तरह बढ़ रही थी लेकिन उनके खिलाफ चार केसों  पर अगर बड़ा फैसला आ जाता है और अलग अलग सजा हुई  तो उनको अपने वोट बैंक से हाथ गंवाना पड़  सकता है | साथ ही नीतीश  कुमार भी उनसे दूरी बना सकते हैं |  लालू के बिना  राजद में सब सून सून  होने का अंदेशा भी बन रहा है |  अब इस मामले में सुप्रीम  कोर्ट के ताजा रुख को देखते हुए लालू यादव और अन्य अभियुक्तों को  निर्दोष करार दिए जाने की संभावना नहीं के बराबर बन रही है | देखना होगा लालू प्रसाद इस मुश्किल से कैसे बाहर आते हैं जहाँ उनकी साख एक बार फिर सवालों के घेरे में है तो दूसरी तरफ राज़द के बिखरने का अंदेशा भी नजर आ रहा है |  क्या राजनीती की बिसात पर अबकी बार हिटविकेट होंगे लालू प्रसाद ? फिलहाल इस सवाल के जवाब के लिए कुछ महीने  और इन्तजार करना पड़ेगा |

Tuesday, May 9, 2017

फ्रांस में मैक्रोन की नई सुबह





फ्रांस में राष्ट्रपति चुनाव संपन्न हो गए जिसमे एमानुएल मैक्रोन की शानदार  जीत हुई है  | चुनाव से पहले उनके बारे में तरह तरह की बातें कही गयी लेकिन तमाम कयासों को धता बताते हुए उन्होंने कुर्सी पा ही ली |  मैक्रोन  एक ऐसे पहले  बैंकर हैं जिन्होंने  पहली बार जिन्होंने  राष्ट्रपति पद के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी और झटके में दक्षिणपंथी मरीन ली पेन को हराया। इस चुनाव में मैक्रोन को 65.5 से 66.1 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। दूसरी ओर मरीन ली पेन 34.5 प्रतिशत तक ही सिमट गई  | मैक्रोन ने अपनी इस  ऐतिहासिक  जीत को फ्रांस हेतु नई संभावनाओं विश्वास से भरे अध्याय की शुरुवात  बताया है  ।  फ्रांस  के इस चुनाव में  खास बात युवा वोटरों  का मैक्रोन के साथ ख़ास तरह का झुकाव और उत्साह  देखने को मिला | खासतौर से शहरी युवा वोटरों ने उन्हें आँखों पर बिठाया जिसका नतीजा  आज सबके सामने है  |  मैक्रोन  की यह जीत दक्षिणपंथियों के लिए किस सदमे से काम नहीं है क्युकि हाल के बरस में पूरी दुनिया में दक्षिणपंथियों की जीत की सुनामी भारत से लेकर अमरीका और यूरोप तक चली है जिसने पहली बार वैश्विक स्तर पर एक अजीबोगरीब तरह की हलचल पैदा की है |  राष्ट्रपति चुनाव में मिली इस  ऐतिहासिक जीत के बाद अब  मैक्रोन  को बधाई देने वालों की बाढ़  आयी हुई है लेकिन उनकी नीतियां न केवल अब फ्रांस के भविष्य को तय करेगी बल्कि आतंकवाद और प्रवासियों के मसले पर कोई नई लेकर खींची जाएगी ऐसी आशा फ़्रांस के शहरी , मध्यम , प्रगतिशील तबके को है | 

मैक्रोन का जन्म 21 दिसंबर 1977 को फ्रांस के एमियेंज में हुआ। फिलोसोफी से छात्र रहे एमानुएल साल 2004 में ग्रेजुएट होने के बाद इनवेस्टमेंट बैंकर बन गए। 2006 से 2009 के बीच  वह सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य  भी रहे । 2012 में पहली बार जब  ओलांद की सरकार जब बानी तो तब मैक्रोन को डिप्टी सेक्रेटरी जनरल चुना गया। 2014 में मैक्रोन ने वित्त मंत्री का जिम्मा संभालने के साथ ही  अगस्त 2016 में उन्होंने सरकार से इस्तीफ़ा देकर  राष्ट्रपति पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर सबको चौंका दिया और संयोग देखिये झटके में फ्रांस के  भीतर उन्होंने नया करिश्मा कर अपनी नयी इबारत गढ़ने की तैयारी कर ली |  उनकी जीत के साथ आज फ्रांस में एक नयी सुबह की शुरुवात हुई है | पहली बार दक्षिणपंथी ताकतों को जनता ने नकार दिया है और ओलांद की सरकार के खिलाफ आक्रोश को अपनी वोट की ताकत से हवा देने का काम किया  है | इस चुनाव के एक सच यह भी है कि  हर तीन में से एक मतदाता ने या तो किसी के पक्ष में भी वोट देना ठीक नहीं समझा | फ्रांस में 1958 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है, कि चुना गया राष्ट्रपति फ्रांस के दो प्रमुख राजनीतिक दलों, सोशलिस्ट और रिपब्लिकन पार्टी से नहीं है।

इसके साथ ही अब फ्रांस के नए राष्ट्रपति मैक्रोन के सामने चुनौतियों का पहाड़  खड़ा हो गया है |  आज फ्रांस को आतंकवाद , प्रवासियों के संकट और बेरोजगारी जैसे  मुद्दो पर  बेहतर काम करना है  ।  चुनावी अभियान में मैक्रोन इन मुद्दों को शालीनता के साथ हवा देते रहे | मैक्रोन  की जीत से यूरोपियन संघ को काफी राहत मिली है |  उसके नेताओं ने इस चुनाव परिणाम का खुले दिल से स्वागत किया है |  इसका बड़ा कारण उनका यूनियन के प्रति विश्वास है |  अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद यूनियन के नेताओं को आशंका थी कि कहीं फ्रांस की सत्ता भी राष्ट्रवादी  समर्थक मरीन के हाथ में न चली जाए  शायद यह वजह रही इन चुनावों में ओबामा मैक्रोन के साथ खुलकर खड़े दिखे  और उन्होंने उनकी तारीफों के कसीदे भी खूब पड़े | जीत के बाद मैक्रोन ने कहा हम भय के सामने हार नहीं मानेंगे |  विभाजन की कोशिशों के सामने घुटने नहीं टेकेंगे|  ऐसा करके उन्होंने अगले पांच साल के लिए सबको साथ लेकर चलने  का रोडमैप बना दिया है | साथ ही अतिवाद के समर्थन में वोट न डालने की अपील कर अपने बुलंद इरादे जता दिए हैं |  अपने प्रचार अभियान में मैक्रोन  ने फ्रांस को ज्यादा बिजनेस फ्रेंडली देश बनाने और कॉरपोरेट टैक्स कम करने का वादा किया था | अब उन्हें काम करके दिखाना होगा | उदार मध्यमार्गी मैक्रोन व्यापार समर्थक और यूरोपीय संघ के समर्थक हैं। मैक्रोन ने चुनावी सभाओं में   5000 बॉर्डर गार्ड्स की फोर्स बनाने के साथ ही  फ्रांसीसी राष्ट्रीयता हासिल करने के लिए फ्रैंच भाषा का राग भी  छेड़ा |  अपने चुनाव अभियान के दौरान मैक्रोन ने कहा राज्य को निरपेक्ष रहना चाहिए क्योंकि धर्मनिरपेक्षता फ्रांस हृदय में है | साफ़ है वह धर्म  के नाम को किसी बड़े विभाजन के साफ़ खिलाफ हैं |

 फ्रांस पिछले कुछ समय से मुस्लिम आतंकवादियों का दंश झेल रहा है जहाँ आई एस आई एस आये दिन आतंकी वारदातों में शामिल रहा है |  शरणार्थियों का मुद्दा राष्ट्रपति चुनावों में अहम मुद्दा रहा |  शरणार्थी संकट के   दौर में फ्रांस में लाखो शरणार्थी  आये लेकिन कई आतंकी हमलों के बाद धर्मनिरपेक्ष देश में मुसलिम आबादी के साथ तनाव बढ़ गया  | पिछले दिनों फ्रांस में तमाम आतंकी हमले हुए हैं जिसके चलते यूरोप में असहिष्णुता का भाव बढ़ा है । आज दुनियाभर में शायद इस्लामोफोबिया का डर हावी है, लेकिन यूरोप में यह कुछ ज्यादा है। मैक्रोन को इस दलदल से फ्रांस को बाहर निकालना होगा | इस जीत के साथ ही उन्होंने काफी समय से फ्रांस की राजनीति में हावी  रही रिपब्लिकन पार्टियों की जड़ें हिला दी हैं लेकिन मैक्रोन की पार्टी एन मार्शे के पास संसद में एक भी सीट नहीं है। राष्ट्रपति चुनाव के बाद अगले महीने ही संसदीय चुनाव होने हैं।  मैक्रोन को अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए गठबंधन का सहारा भी लेना पड़ सकता है। संसदीय  चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए उन्हें अपने राजनीतिक विरोधियों को भी साधना पड़ सकता है | फ्रांस के खर्च  में बड़ी कटौती करने की दिशा में भी उन्हें कदम बढ़ाने होंगे |  सामाजिक सुरक्षा और सरकारी नौकरियों पर इसी खर्च के चलते तलवार की तरह लटक रही है  |  मैक्रोन की नीतियां इसके समर्थन में हो सकती हैं|  बहुत संभव है वह राजकोषीय घाटे के लिए कटौती को मुकाम तक ले जायेंगे | अपने चुनावी अभियान  में  मैक्रोन ने बजट में 60 अरब यूरो की बचत करने का लक्ष्य  पहले ही रखा था अब देखने वाली बात होगी वह कौन सी नयी राह चुनते हैं जिससे  अवसर मिल सकें | मैक्रोन के सामने युवाओं को रोजगार के अवसर मुहैया कराने होंगे | युवा इस चुनाव में खुलकर  आये है इसलिए नौकरियों का नया पिटारा फ़्रांस में उन्हें खोलना ही होगा |  मैक्रोन ने चुनाव के दौरान  श्रम बाजार में सुधारों की बात कही है साथ ही कमजोर कमजोर श्रम कानूनों को बदलकर रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराना उनके चुनावी एजेंडे में रही भी है | साथ ही उन्हें आर्थिक सुधारों की दिशा में भी मजबूती के साथ अपने कदम बढ़ाने होंगे | 
इसके साथ ही आतंकवाद के मोर्चे पर उन्हें बड़ी लड़ाई लड़नी होगी | खूबसूरत  फ्रांस को पिछले कुछ बरस से आतंकी हमलों की नजर लग चुकी है जिनमें कई निर्दोष देशी और विदेशी नागरिको की जानें जा चुकी हैं |  आतंरिक सुरक्षा पिछले कुछ बरस में ढुलमुल रही है जिसके चलते एक के बाद एक आतंकी हमलों से फ्रांस दहलता रहा |  मैक्रोन को आतंकवाद पर कठोर रवैया अपनाना होगा | वैसे  मैक्रोन  अपनी नयी सियासी पारी  खेलने जा रहे हैं  | अब उनको अपने काम के दम पर अब खुद को  साबित करना  होगा | देखना दिलचस्प होगा वह खुद के लिए क्या प्राथमिकताएं आने वाले दिनों में तय करते हैं ?