सोमवार, 31 दिसंबर 2012

नववर्ष का उत्सव...

तमाम खट्टे मीठे  अनुभवों के बीच वर्ष 2012 की विदाई के साथ ही हम 2013 की चौखट में प्रवेश कर रहे हैं ।  नए साल को लेकर लोगो के बीच एक अलग तरह का उत्साह देखने को मिलता है लेकिन दिल्ली में घटी गैंगरेप की घटना और फिर सिंगापुर में दामिनी की मौत की घटना के बाद देश में कई  लोगो ने नए साल के कार्यक्रम टाल  दिए वहीँ कई जगह "थर्टी फर्स्ट "का जश्न धूमधाम से मनाये जाने की खबरों ने बता दिया महानगरो में भले  ही लोगो ने अपने को नए साल के जश्न से दूर रखा लेकिन कस्बो के साथ शहरों में नए साल को उत्साह के साथ मनाने के चलन में कोई कमी नहीं आई जबकि जंतर मंतर पर ठिठुरती ठण्ड के बावजूद कई लोग  पूरी रात जागे रहे और सरकारी तंत्र की हीलाहवाली को लेकर सवाल उठाते रहे ।

                    कई जगहों में थर्टी फर्स्ट के जश्न में किसी तरह की कमी नहीं देखी गई। पिछले कुछ वर्षो से हमने अपने को पूरी तरह पाश्चात्य संस्कृति के रंग में इस तरह रंग लिया है कि अब हमारी नई पीड़ी  अपने सांस्कृतिक जीवन मूल्यों से लगातार कटती  ही जा रही है । हमारी भारतीय संस्कृति में पंचांग के अनुसार नया साल नवसंवत्सर वर्ष प्रतिपदा से मनाया जाता है लेकिन अब समय बीतने के साथ ही यह परम्परा  कहीं पीछे छूटती जा रही है ।नववर्ष का उत्सव अब किसी पर्व से कम नही है ।थर्टी फर्स्ट  का बुखार अब  हमारी युवा पीड़ी को  भी लग चुका  है । होटल, रेस्तराओ  से लेकर सडको और घरो तक में नए साल की गुनगुनाहट में लोग अब गीत गाते हैं । डी जे की थाप पर थिरककर जश्न के साथ नए साल का  पर्व मनाते हैं । यह कैसी अपसंस्कृति है जब लोग शराब के साथ जश्न मनाते हैं और मछली और बकरों की बलि देकर नववर्ष का आगाज करते हैं ?


 हमारे आधुनिक समाज में भी अब इन सब चीजो का असर पड़ने लगा है ।ऐसे उत्सव की आड़ में जहाँ समाज में आपराधिक  घटनाओ का ग्राफ बढ़ रहा है  वहीँ  महिलाओ के साथ छेड़छाड़ की घटनाये भी तेजी के साथ बढ़ी  हैं जो यह बताता है आज हमारे समाज मानसिकता किस कदर बदल गई है । वह पूरी तरह पाश्चात्य संस्कृति के मोहपाश में जकड से गए हैं । फिल्मे समाज का आइना कही  जाती हैं लेकिन हमारे देश  में आज जिस तरह से हिंसा , सेक्स को अश्लील रूप में फिल्मो में पेश किया जा रहा है उसी रूपहले परदे की घटनाओ को लोग अपने जीवन में उतारने की कोशिशो में उतारने की चाहत में लगे हैं जिससे समाज में आपराधिक प्रवृति बढ  रही है । इसके साथ ही पुलिस पर राजनीतिक दबाव ज्यादा है जिसके चलते अपराधी आसानी से छूट जा रहे हैं । कानून का खौफ भी उन पर नहीं है शायद इसी के चलते समाज में आज अपराध बढ़ते ही जा रहे हैं ।

               नव वर्ष को एक उत्सव का रूप देने में मीडिया की भूमिका भी किसी  से छिपी नहीं है । उसने लोगो के सोचने से लेकर तौर तरीको तक में बदलाव ला दिया है । शायद इसी के चलते नववर्ष का उत्सव एक बड़ा बाजार बन गया है जिसमे हर कोई गोता लगाते हुए देखा जा सकता है । बाजार इतना हावी हो चला है कि इस नववर्ष को हर कोई उत्सव की तरह मनाने से परहेज  इस दौर में नहीं कर रहा है  लेकिन दुर्भाग्य है जब लुटियंस की दिल्ली में गैंगरेप की घटना को लेकर आक्रोश जंतर मंतर पर साफ दिखाई दे रहा था उसके बाद भी हमारे  देश में कई जगहों पर नववर्ष के जश्न में कोई कमी देखने को नहीं मिली जो हमारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा को असल में उजागर कर रहा था ।

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

सचिन बिन सब सून.......

रविवार को जब टेलीविजन स्क्रीन पर इंडिया गेट और विजय पथ पर गैंगरेप के विरोध में आक्रोशित युवाओ की लाइव तस्वीरें आ रही थी ठीक उसी समय सचिन रमेश तेंदुलकर  के वन डे क्रिकेट से सन्यास की खबरें टिकर पर ब्रेकिंग न्यूज़ के रूप में चलने लगी । दिल्ली में हो रहे भारी विरोध  प्रदर्शन के बीच क्रिकेट के भगवान की सन्यास की खबरें  कहीं दबकर रह गई और उसने कई सवालों को पहली बार खड़ा कर दिया । क्या अपने अब तक के क्रिकेट करियर में सचिन पहली बार चयनकर्ताओ की आलोचना का शिकार बने ? आखिर एकाएक सचिन ने वन डे क्रिकेट को गुड बाय क्यों बोल दिया ? सचिन ने इतनी बड़ी घोषणा पाकिस्तान की सीरीज  से ठीक पहले क्यों कर दी वह भी तब जब रणजी मैच में शतक बनाकर सचिन ने सबको मास्टर ब्लास्टर होने के मायने बता दिए थे ।  वह महान खिलाडियों की तरह मैदान में सन्यास लेने का फैसला क्यों नहीं कर पाए वह भी तब जब भारत के चिर प्रतिद्वंदी पाकिस्तान की टीम सीरीज खेलने भारत दौरे पर थी । क्या गांगुली, द्रविड़, वी वी एस  की तर्ज पर "फेबुलस फोर " का यह मुख्य पिलर बी सी सी आई की अंदरूनी राजनीती का शिकार तो नहीं हुआ जिसने पहली बार उसको  क्रिकेट की पिच पर हिट  विकेट कर दिया ? ये सवाल ऐसे हैं जो विदेशी खिलाडियों से लेकर सचिन के चाहने वाले हर प्रशंसक को इन दिनों परेशान कर रहे हैं ।

      22 साल 91 दिन ... 463 मैच ..18426 रन ... 86.23 का स्ट्राइक रेट .... इन बरसों में कई बल्लेबाज टीम में आये और कई गए  । कई गेदबाज टीम में अपनी जगह बनाने में सफल हुए तो कई कुछ मैच  खेलने  के बाद न जाने कहाँ गुमनामी के अंधेरो में खो गए। इस दौरान खेल भी बदला समय ने ऊँची करवट   ली लेकिन एक चीज जो नहीं बदली वह थी सचिन रमेश तेंदुलकर के तीन फीट लम्बे भारी बल्ले की धमक जिसकी आग ने मानो विपक्षी टीम का मान मर्दन करा दिया । सचिन का बल्ला अपनी आग उगलता रहा और क्रिकेट की किताब में एक -एक रन दर्ज होकर इतिहास बनता गया । शायद इसी वजह से भारतीय क्रिकेट का यह सितारा इतिहास में कोहिनूर बन गया और क्रिकेट का भगवान कहा जाने लगा  लेकिन क्रिकेट के भगवान की  वन डे पारी का ऐसा खामोश अंत इस तरह बेबस ढंग से होगा इसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी ।

जिस समय  बी सी सी आई के चयनकर्ता पाकिस्तान के साथ हाल में खेली जाने वाली  सीरीज  के लिए  खिलाडियों का चयन कर रहे थे ठीक उसी समय क्रिकेट का यह भगवन वन डे क्रिकेट को अलविदा कहने की तैयारियों में जुटा  हुआ था । बीते रविवार को जब पूरे देश की नजरें दिल्ली में गैंगरेप  के विरोध में युवाओ के आक्रोश की तरफ थी तब सचिन ने बी सी सी आई के जरिए जारी किये गए एक प्रेस नोट में वन डे फोर्मेट से सन्यास का फैसला लेकर सभी को चौंका दिया । दिन ढलते ढलते यह खबर सभी की जुबान पर छा  गई । सचिन के वन डे से सन्यास पर विपक्षी टीम के  गेंदबाजो  ने भले ही राहत की सांस ली हो लेकिन इस खबर ने उनके करोडो प्रशंसकों को मायूस ही किया । सचिन ने अपना अंतिम वन डे मैच मार्च 2012 में ढाका  में खेला  था जिसके बाद से वह टेस्ट क्रिकेट में ही ज्यादा रमे रहे लेकिन पिछले कुछ समय से उनके प्रदर्शन पर न केवल पूर्व भारतीय कप्तानो की एक बड़ी जमात सवाल उठा रही थी वरन उनको टीम से बाहर करने का ताना  बाना बुन रही थी जिसमे चयनकर्ताओ के आसरे उन पर मजबूरन सन्यास का दबाव बनाया जा रहा था और शायद यही कारण था सचिन ने किसी के दबाव  के आगे न झुकते हुए अपने अंतर्मन की आवाज को सुना और खुद को एकाएक वन डे से दूर करने का फैसला कर  लिया । जबकि यह सच  शायद ही किसी से छुपा है सचिन का प्रदर्शन पिछले कुछ समय से टेस्ट क्रिकेट में खराब चल रहा था । इस दौरान वह अपनी कई पारियों में 'क्लीन बोल्ड' हो गए थे ।  उनकी तकनीक को लेकर पहली बार इस दौर में सवाल उठने लगे जिसके बाद चयनकर्ताओ ने सचिन को नसीहत दे डाली अब नए खिलाडियों को मौका  देने की मांग जोर पकड़ रही है लिहाजा वह खुद से  सोचकर यह तय करें कि आगे उन्हें क्या करना है ? इसी के तहत "फेबुलस फोर " की जमात में शामिल रहे  गांगुली ,राहुल द्रविड़, लक्ष्मण से जबरन सन्यास दिलवाया गया और सचिन भी चयनकर्ताओ की इस गुगली के फेर में आ गए  ।

अपने अब तक के करियर में सचिन ने रिकार्डो का जो पहाड़ मैदान में खड़ा किया है उसे शायद ही आने वाले दिनों में कोई छू पाए । सचिन के नाम वन डे , टेस्ट मैचो में सबसे अधिक मैच , सबसे अधिक रन , शतक, अर्धशतक बनाने का रिकॉर्ड जहाँ दर्ज  है वहीँ सबसे अधिक मैन आफ द मैच से लेकर  मैन आफ द सीरीज जीतने तक के रिकॉर्ड दर्ज हैं । तभी सर डॉन ब्रेडमैन ने एक दौर में सचिन में अपना अक्स देखा था और शेन वार्न  सरीखे कलाई के जादूगर की रातो की नीद को उड़ा डाला था । सचिन के नाम अन्तर्राष्ट्रीय  क्रिकेट में 100 शतको का रिकॉर्ड दर्ज है । इसी साल मार्च में सचिन ने अपना आखरी शतक बांग्लादेश के खिलाफ ठोंका  था । सचिन ने 463 वन डे मैचो की 452 परियो में 44.83 की औसत से 18426 रन बनाये तो वहीं वन डे में 49 शतक बनाकर अपनी बल्लेबाजी का लोहा पूरी दुनिया के सामने मनवाया । फ़रवरी 2010 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ वन डे में  दोहरा शतक लगाने  वाले पहले खिलाडी बनने के साथ ही गेदबाजी में अपना कमाल 154 विकेट लेकर दिखाया । साझेदारी बनाने से लेकर साझेदारी तोड़ने तक में सचिन का कोई सानी नहीं  था । दो बार उन्होंने वन डे मैचो में एक साथ 5 विकेट झटकने के साथ ही सर्वाधिक 62  बार मैन आफ द मैच से लेकर 15 बार मैन आफ द सीरीज का रिकॉर्ड अपने नाम किया ।  वाल्श से लेकर डोनाल्ड , अकरम से लेकर वकार , शोएब अख्तर से लेकर ब्रेट ली और फिर शेन वार्न  से लेकर  मुरलीधरन सबकी गेदबाजी से सामने सचिन ऐसे चट्टान की  भांति डटे  रहते थे  जिनका विकेट हर किसी के लिए अहम हो जाता था । 15 नवम्बर 1989 को पाकिस्तान के विरुद्ध  महज 16 साल की उम्र में घुंघराले बाल वाले इस युवा खिलाडी ने जब  अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में पदार्पण किया था को किसी ने अंदाजा नहीं लगाया था कि भविष्य में यह खिलाडी  क्रिकेट के  देवता के देवता के रूप में पूजा जायेगा लेकिन सचिन ने अपनी प्रतिभा 1988 में ही दिखा दी जब अपने बाल सखा  विनोद काम्बली के साथ  664 रन की रिकॉर्ड साझेदारी कर इतिहास रच  डाला  था । पाकिस्तान के दौरे में अब्दुल कादिर की गुगली पर उपर से छक्का जड़कर उन्होंने अपने इरादे  जता  दिए थे । यही नहीं उस दौर को अगर याद  करें तो सियालकोट के टेस्ट में एक बाउंसर सचिन की नाक में जाकर लग गया । नाक से खून बह रहा था लेकिन इन सबके बीच सचिन मैदान से बाहर नहीं गए और डटकर गैदबाजो  का सामना किया ।

1990 में इंग्लैंड का ओल्ड ट्रेफर्ड सचिन का पहले शतक का गवाह बना जब उन्होंने विदेशी धरती से अपनी अलग पहचान बनाने में सफलता पायी । इसके बाद सिडनी और पर्थ की खतरनाक समझी जाने वाली पिचों पर सचिन ने अपनी शतकीय पारियों से प्रशंसको का दिल जीत लिया । इसके बाद तो उनके नाम के साथ हर दिन नए रिकॉर्ड जुड़ते गए । आज सचिन की इन उपलब्धियों के पहाड़ पर कोई खिलाडी दूर दूर तक उनके पास  तक नहीं फटकता ।  सचिन में एक खास तरह की विशेषता भी है जो उनको अन्य  खिलाडियों से महान बनाती है । उनका क्रिकेट के प्रति जज्बा देखते ही बनता है और पूरे करियर के दौरान उन्होंने इसे जिया । शालीन और शांतप्रिय होने के अलावे धैर्य और अनुशासन उनमे ऐसा गुण था कि विषम परिस्थितियों में में सचिन अपना रास्ता खुद से तय करते थे । कभी शून्य पर भी आउट हो जाते तो आलोचकों को करारा  जवाब अपने खेल से ही देते । टीम इंडिया में एक मार्गदर्शक के तौर पर उन्होंने युवाओ को एक नया प्लेटफार्म दिया जहाँ उनसे सलाह मांगने वालो में खुद धोनी , युवराज , भज्जी सरीखे खिलाडी शामिल रहते थे । प्रत्येक खिलाडी उनसे कुछ नया सीखने की कोशिश में रहता । यह हमारे लिए फक्र की बात है सचिन को हमने उनके शुरुवाती  दौर से खेलते हुए देखा है । आने वाले भावी पीढियों  को  हम सचिन की गौरव गाथा बड़े गर्व के साथ सुना पाएंगे ।

सचिन के लिए वर्ल्ड कप एक सपना था और धोनी की अगुवाई वाली टीम का हिस्सा बनने पर उन्हें काफी नाज है । इसकी झलक  वन डे सन्यास के समय उनके द्वारा दिए बयानों में साफ झलकी जहाँ उन्होंने टीम के वर्ल्ड कप जीतने पर  ख़ुशी जताई और अगले वर्ल्ड कप के लिए अभी से एकजुट हो जाने की बात कही । सचिन जैसे कोहिनूर अब भारत को शायद ही मिलें क्युकि  सचिन जैसे समर्पण की बात आज के खिलाडियों में नदारद है । क्रिकेट आज एक मंडी  में तब्दील हो चुका  है जहाँ खिलाडियों की करोडो में बोलियाँ लग रही हैं । सारी  व्यवस्था मुनाफे पर जा टिकी है जहाँ खेल का पेशेवराना पुराना अंदाज गायब है जो अस्सी और नब्बे के दशक में देखने को मिलता था । आज के युवा खिलाडियों की एक बड़ी जमात ट्वेंटी  ट्वेंटी के जरिये अपनी प्रतिभा को दिखा रही है जबकि वन डे और टेस्ट क्रिकेट से उनका मोहभंग हो गया है । यही नहीं इसमें उनका प्रदर्शन भी फीका ही रहा करता है । ऐसे में बड़ा सवाल यहीं से खड़ा होता है सचिन, गांगुली, राहुल , वी  वी एस  वाली लीक पर कौन आज के दौर में चलेगा वह भी उस दौर में जब ट्वेंटी ट्वेंटी टेस्ट से लेकर वन डे को लगातार निगल रहा है ।

 बहरहाल सचिन ने वन डे से सन्यास के बाद अभी टेस्ट मैच खेलने की बात कही है । यह उनके करोडो चहेते प्रशंसको के लिए राहत की खबर है लेकिन उनके वन डे से अचानक लिए गए सन्यास पर  सस्पेन्स अब भी बना है । आगे भी शायद यह बना रहे क्युकि मैदान से अन्दर और बाहर सचिन जिस शानदार  टाइमिंग से खेलकर कई लोगो को आईना दिखाते थे वैसी टाइमिंग उनके  सन्यास में देखने को नहीं मिली  । जाहिर है सचिन पहली बार चयनकर्ताओ  के निशाने पर सीधे तौर पर आये और आखिरकार दबाव  झेलने की वजह से उन्होंने वन डे से अचानक सन्यास की घोषणा कर सभी को  चौंका ही  दिया ।

बुधवार, 12 दिसंबर 2012

अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग ..........

रिटेल में  एफडीआई  के विरोध में विपक्ष की ओर से लाया गया प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में गिरने के बाद यूपीए सरकार इन दिनों बमबम है । सरकार  एफडीआई के मोर्चे पर एक बड़ी जंग जीतने के रूप में इसे प्रचारित करने में लगी हुई है और इसे ऐतिहासिक लकीर के तौर पर पेश करने में लगी   है लेकिन असल तस्वीर ऐसी नहीं है । यूपीए इस जीत के लिए सपा  और बसपा सरीखे दलों के समर्थन पर इतरा  जरुर सकती है जिसने विपरीत परिस्थितियों में  संकट की इस घडी में सरकार को उबारने के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जिससे एफडीआई की राह आसान  हो गई । 

सपा , बसपा के बूते जहाँ लोक सभा में  यूपीए का संख्या बल सरकार के पक्ष में गया वहीँ राज्य सभा में बसपा ने वोटिंग कर यू पी ए को आर्थिक मोर्चे पर लादे जा रहे अब तक के सबसे बड़े संकट से उबारा ।  एफडीआई के आसरे अब मनमोहनी इकोनोमिक्स की थाप पर पूरा देश नाचेगा  और इसी के आसरे 2014 की बिसात बिछाने में कांग्रेस लग गई है ।  मौजूदा दौर में एफडीआई  पर सपा और बसपा के रुख से कई सवाल पहली बार उठने लगे हैं ।मसलन उत्तर प्रदेश सरीखे बड़े राज्य में दोनों धुर विरोधी दलों की यह कैसी राजनीती है जो एक  ओर सड़क से संसद तक एफडीआई  के विरोध में आर पार की लड़ाई लड़ते हैं लेकिन जब संसद में मतदान की बारी आती है तो वह या तो वाकआउट कर लेते हैं या सदन के संख्या बल के आधार  पर अपनी चालें चलते इस दौर में नजर आते हैं । यही नहीं मत विभाजन होने की सूरत में एक ओर  वह जहाँ  सरकार के साथ भागीदारी वोटिंग के जरिये करते  हैं वहीँ दूसरी तरफ  लोक सभा से वाकआउट कर सरकार को संकट से उबारते हैं ।

                       राजनीती का मिजाज ही कुछ ऐसा है । यहाँ समीकरण बनते और बिगड़ते ही रहते है लेकिन मौजूदा दौर में जैसी मोल भाव की राजनीती प्रादेशिक दलों द्वारा केंद्र में की जा रही है उसे आप और हम स्वस्थ राजनीती नहीं कह सकते ।  पुराने पन्ने टटोलें  तो ज्यादा समय नहीं बीता जब सपा से लेकर बसपा और द्रमुक से लेकर एनसीपी  एफडीआई के विरोध में बढ़ चढ़कर अपनी भागीदारी करने में लगे हुए थे । यही नहीं कुछ माह पूर्व हुए भारत बंद के दौरान जहाँ सपा, बसपा और द्रमुक भी विपक्ष के साथ खड़े नजर आये लेकिन जब संसद पर बहस और मतदान की बारी आई तो या तो उन्होंने उससे किनारा कर लिया या अपनी प्राथमिकता और एजेंडा   ही बदल  डाला ।  कल तक जो समाजवादी कोलगेट पर कांग्रेस को सड़क से संसद में घेर  रहे  थे आज वह एफडीआई पर सरकार के साथ सुर में सुर मिला रहे हैं ।


                                  संसद में मुलायम सिंह का राग को देखिये । अपने को खांटी समाजवादी समझते हैं । किसानो का सबसे बड़ा  हितैषी  बताते हैं और उत्तर प्रदेश में एफडीआई ना लाने की बात दोहराते  फिरते हैं । देश हित में हमारे छोटे व्यापारियों के लिए इसे नुकसानदेहक बताने से  भी पीछे नहीं रहते लेकिन वोटिंग के दरमियान वाकआउट  कर अपना दोहरा चरित्र जनता के सामने उजागर कर देते  हैं । यही हाल माया बहन जी का भी है  । एक तरफ  वह कुछ माह पूर्व एफडीआई के विरोध में महारैली की हुंकार भारती हैं वहीँ संसद में यू पी ए के साथ कदमताल करती नजर आती हैं ।


                     राजनीतिक गलियारों में यह चर्चाएं जोरो पर हैं इस बार भी माया, मुलायम ने  संसद में अपने रुख के मद्देनजर एक तीर से कई निशाने साधे हैं । इसके एवज में जहाँ मुलायम को उत्तर प्रदेश के विकास के लिए करोडो का मोटा पॅकेज मिलने जा  रहा  है वहीँ  माया बहनजी ने इस बहाने प्रमोशन में  एस टी,एससी आरक्षण का पुराना  राग छेड़  दिया है ।  दोनों दल अब आगामी लोक सभा चुनावो को देखते हुए इसी के आसरे अपनी बिसात बिछा  रहे हैं  । बसपा और सपा का वोट बैंक  भले ही जो हो लेकिन अपने अपने सियासी फायदे नुकसान  के अनुरूप कांग्रेस के साथ खड़ा होना इन दोनों की मजबूरी इस समय बनी हुई है क्युकि जल्द चुनाव होने पर जहाँ मायावती घाटे  में रहने वाली हैं वही असल  फायदा तो सही मायनों में ऐसी सूरत में मुलायम को ही  मिलेगा । लेकिन मुलायम की मजबूरी भी कांग्रेस के साथ जाने की इस रूप में बन चुकी है अगर भविष्य में नेता जी को प्रधान मंत्री की कुर्सी पानी है तो कांग्रेस के साथ सम्बन्ध खराब करना उनके लिए सही नहीं है ।  


एफडीआई पर संसद में चर्चा से पहले इन दोनों दलों का साफ़ स्टैंड था । उन्होंने साफ़ तौर पर यह कहा था यह हमारे भारतीय किसानो और व्यापारियों को निगल लेगा लेकिन संसद में अपनी भूमिका को उसने पूरे देश के सामने उजागर कर दिया । कांग्रेस ने इस दफा भी सी बी आई के डंडे से इनको डराया जिसकी परिणति  एफडीआई को लागू कराने के लिए मिली हरी झंडी के रूप में हुई । एफडीआई  पर अब यू पी ए की मंशा साफ़ है । उसकी माने तो 10 लाख की आबादी वाली जगहों पर विदेशी कंपनिया अपने स्टोर खोल सकेंगी वही अब यह राज्य सरकारों के रुख पर निर्भर होगा क्या वह अपने अपने राज्य में इसे खोलने के लिए सहमति  देंगी या नहीं ?  वह चाहें तो इसे लागू करे ना चाहें तो मत करें । ऐसे माहौल में बसपा और सपा के रंग ढंग देखने लायक आने वाले दिनों में होने वाले हैं क्युकि संसद में इन दोनों दलों ने बीते दिनों जिस तरीके से कांग्रेस के साथ जाने की जिद पकड़ी उससे आम वोटर में सही सन्देश नहीं जा पाया है । अब देखना होगा अपने बड़े वोट बैंक  को यह दल  कैसे  समझा पाते हैं ।

                                  बसपा और सपा भाजपा की सांप्रदायिक राजनीती का हवाला देते हुए अक्सर सरकार को घेरने के मसले पर सदन में विपक्ष के साथ खड़े नहीं दिखते  लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए संसद में इसे लेकर 18 दलों की राय पहली बार पूरे देश के सामने बहस में सामने आई । इस लिहाज से देखें तो यह की भाजपा की निजी समस्या नहीं है ।  कांग्रेस के  एफडीआई  लागू कराने के फैसले पर  जहाँ उसके सहयोगी साथ खड़े इस दौर में नहीं दिखते  वहीँ वाम और तृणमूल भी इस पर कांग्रेस के साथ  कदमताल करते नहीं दिखे । तो क्या माना जाये वह भी सांप्रदायिक हो गए । 


सपा और बसपा की यह पहेली किसी के गले नहीं उतर सकती कि  बीते दिनों सदन के पटल पर सांप्रदायिक ताकतों की करारी हार हुई है । रिटेल के मोर्चे पर अपने रणनीतिकारो के आसरे भले ही कांग्रेस ने मैदान मार लिया हो लेकिन इसने उसकी साख पर भी सवाल उठाये हैं। वैसे भी लगातार लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों से उसकी साख मिटटी में मिली हुई है अब जब लोक सभा चुनावो के होने में 18 माह से भी कम का समय बचा हुआ है तो आर्थिक मोर्चे पर आर्थिक  सुधारों को हवा देने के लिए उसने पहली बार माया मुलायम के जरिये देश में एक नई  लकीर  खींच दी है जहाँ मनमोहनी इकोनोमिक्स अपने चकाचौध तले मध्यम वर्ग  में अपनी पकड़ मजबूत आगामी चुनावो के  जरिये बनाएगा वहीँ विदेशी  निवेशको का दिल जीतने की कोशिश शुरू होगी । 

वैसे भी 2 जी की आंच के बाद से कारपोरेट  डरा  और सहमा हुआ है । नया निवेश जहाँ  इस दौर में नहीं हो पा रहा है वहीँ पहली बार कई परियोजनाओ के लिए एनओंसी मिलने की राह मुश्किल हो चली  है । ऐसे में  अब ऍफ़ डी आई के जरिये भले ही कांग्रेस की मुस्कान लौट आई हो लेकिन  उसकी राज्य सरकारों के अलावे अन्य  राज्य जहाँ उसकी सरकार नहीं है शायद ही कोई इसे वहां लागू करा  पाए । 

कांग्रेस के दस जनपथ के चाटुकार मुख्यमंत्री जहाँ  इसे पूरी तरह अपने राज्यों में लागू करने के हिमायती दिख रहे हैं वहीँ अन्य पार्टियों में इसे लेकर अभी तक कोई सहमति  नहीं है । मसलन राकपा , तृणमूल, सपा सरीखे दल तो कतई अपने अपने अपने राज्यों  में इसे नहीं ला रहे हैं क्युकि चुनावी वर्ष में कोई भी चाल सोच समझकर चलने  की उनकी भी मजबूरी है । ऐसे में अगर यू पी ए  सोच रही है इसके आने के बाद भारतीय  अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी  उसका कायाकल्प हो जायेगा तो यह तर्क  किसी के गले नहीं उतर रहा ।

यकीन जान लीजिये मौजूदा दौर में विदेशी कंपनियों की माली हालत खस्ता है । पूरी दुनिया में अभी भी मन्दी  के बादल पूरी तरह  नहीं छटें  हैं  । उदारीकरण के इस दौर में आम आदमी को चकाधौंच दिखाने वाली वालमार्ट सरीखी कंपनियों का एक मात्र मकसद मुनाफा कमाना है । कोई भी विदेशी कंपनी यहाँ घाटे  का व्यवसाय करने नहीं  आएगी । ऐसे में यह तर्क किसी  के गले शायद ही उतरे कि इससे भारतीयों  का भला होने जा रहा है । यह हमारे किसानो और व्यापारियों के पेट पर लात मारने के सिवाय कुछ नहीं करेंगी । 

वैसे भी वर्तमान में वास्तविकता यह है चालू वर्ष की दूसरी तिमाही में जीडीपी अनुमान के मुताबिक़ 5.3 पर फिसल चूका है ।   ऐसे में लाख टके का सवाल यह है एफडीआई  के आने से भारतीय बाजार कैसे गुलजार हो जायेगा ? वालमार्ट के आने का मतलब जान लीजिये धीरे धीरे पूरा बाजार ये हाईजैक कर लेंगी और रेहड़ी पटरी पर लगाने वालो की कमर टूट जाएगी । हमारे  किराना स्टोर तबाह हो जायेंगे  और पूरा देश हौले हौले विदेशी कंपनियों की थाप पर थिरकेगा ।

                 ऍफ़ डी आई के मसले पर कांग्रेस के साथ खड़े  होकर माया और मुलायम ने जिस तरीके का रुख दिखाया है उससे इनकी साख भी प्रभावित हुई है ।आम आदमी के नाम पर ये दोनों दल जनविरोधी फैसलों  पर जिस तरीके से अपना समर्थन परदे के पीछे से  दे रहे  है उससे जनता में इन दोनों दलों के प्रति नाराजगी का भाव है जो आने वाले चुनावो में असर दिखा सकता है ।  मुलायम ने जहाँ इस एफडीआई पर कांग्रेस के साथ खड़े होकर उत्तर प्रदेश के लिए करोडो का पॅकेज जुटाया है वहीँ मायावती ने मुंबई में  अम्बेडकर  स्मारक की जमीन दलित वोट बैंक के लिए पा ली है ।यही नहीं अब वह दलितों को अपने साथ लाने की फिराक में जुट गई हैं क्युकि अब संसद में  रिजर्वेशन में एस टी ,एस सी आरक्षण को लेकर उन्होंने कांग्रेस को अपना अल्टीमेटम  दे दिया है ।


 बसपा इसके बहाने से जहाँ अपना दलित वोट फिर से मजबूत करेगी वहीँ सपा उसके साथ खड़ी  नहीं हो सकती क्युकि  इस साल उत्तर प्रदेश के चुनावो में इसके विरोध के चलते ही नेता जी  की पार्टी सिंहासन पर काबिज हो पाई । ऐसे में आने वाले दिनों में संसद पर सभी की नजरें  टिकी रहने वाली है  और आने वाले दिनों में सियासी नफा नुकसान देखकर ही चुनावी चौसर मजबूत या कमजोर होगी  । ऐसे में हर दल अपने फायदे के लिए संसदीय राजनीती में अपनी बिसात बिछाने में लगा हुआ है । बसपा और सपा भी अगर इसी के जरिये अपने वोट बैंक को मजबूत कर रहे हैं ।इस पूरे वाकये में  दोनों दलों की सच्चाई से भी पहली बार पर्दा उठ रहा है  वहीँ उनकी साख भी सीधे तौर पर प्रभावित हो रही है । ऐसा नहीं है जनता इस ट्रेलर को नहीं देख रही है । ये पब्लिक है सब जानती है पब्लिक है । तो इन्तजार कीजिए आने वाले समय में होने वाले चुनावो का जब यही पब्लिक हर दल के मोल भाव वाले  नुकसान को अपने वोट के आसरे आईना दिखाएगी ।

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

कितना धक्का दे पाएंगे येदियुरप्पा ?...............

जिस समय भाजपा अपने चुनावी प्रबंधको को साथ लेकर गुजरात के रण में पार्टी की संभावनाओ को लेकर मंथन करने में जुटी हुई थी उसी समय कर्नाटक के हावेरी में भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री रहे येदियुरप्पा अपनी नई  पार्टी  कर्नाटक  जनता पार्टी गठित करने में अपने समर्थको के साथ डटे थे और दक्षिण में कमल के मुरझाने की पटकथा लिख रहे थे । यूँ तो येदियुरप्पा ने भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा 30 नवम्बर को ही दे दिया था लेकिन बीते 9 दिसम्बर को उन्होंने अपनी खुद की पार्टी ' कर्नाटक जनता पार्टी ' को राज्य  के सियासी अखाड़े में उतारकर पहली बार आरएसएस और भाजपा की ठेंगा दिखाते हुए भाजपा को येदियुरप्पा होने के मायने बता दिए । इस साल 30 नवंबर को भाजपा में अपने 40 साल पूरे कर चुके येदियुरप्पा के जाने से कर्नाटक में भाजपा की सियासी जमीन दरकने के पूरे आसार अभी से नजर आने लगे हैं । शायद यही कारण है भाजपा अपने दक्षिण के दुर्ग को लेकर पहली बार चिन्तित  नजर आ रही है और येदियुरप्पा के साथ निकटता बढाने वाले लोगो को एक एक करके ठिकाने लगा रही है । इसकी बानगी येदियुरप्पा  की पार्टी गठित होने से ठीक एक दिन पहले देखने को मिली जब प्रदेश के मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार  ने सहकारिता मंत्री बीजे  पुट्टास्वामी को बर्खास्त कर दिया जिनकी गिनती येदियुरप्पा के सबसे करीबियों में की जाती है । इसके अलावे तुमकुर से लोक सभा सांसद जी एस बासवराज को भी पुट्टास्वामी की तर्ज पर पार्टी विरोधी गतिविधियो के आरोप में कारण बताओ नोटिस  जारी करने के  साथ  ही पार्टी से बर्खास्त कर दिया ।

                 भाजपा में येदियुरप्पा अपने को मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के बाद से लगातार अपने को असहज महसूस कर रहे थे और समय समय पर  संगठन को पार्टी छोड़ने की घुड़की देते रहते थे ।सदानंद गौड़ा के राज्य के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद पार्टी ने येदियुरप्पा के कहने पर राज्य के विधान सभा अध्यक्ष जगदीश  शेट्टार को मुख्यमंत्री पद के लिए प्रमोट किया लेकिन येदियुरप्पा की दाल उनके साथ भी नहीं गल पाई  क्युकि  सत्ता सुख भोगते भोगते येदियुरप्पा की पार्टी में  ठसक  लगातार  बढती  ही गई और आये दिन वह आलाकमान के सामने अपनी मांगे मनवाने के लिए अपना शक्ति  प्रदर्शन करते रहते थे । यही वजह थी उन्हें पार्टी में मुख्यमंत्री पद से इतर कोई पद नहीं चाहिए था । औरंगजेब  की बीजापुर और गोलकुंडा विजय ने दक्षिण भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना का रास्ता तैयार किया  था  इसी तर्ज पर कर्नाटक  में कमल खिलाने में येदियुरप्पा की भूमिका किसी से छिपी नहीं थी लिहाजा पार्टी ने येदियुरप्पा को मनाने की लाख कोशिशे की लेकिन मोहन भागवत  से लेकर सुरेश सोनी और अरुण जेटली से लेकर वेंकैया नायडू सबका प्रबंधन डेमेज कंट्रोल के लिए काम नहीं आ सका ।

                               पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से  इस्तीफ़ा दिए जाने से पूर्व येदियुरप्पा का दावा था कई सांसद, विधायक, मंत्री और पार्षद उनकी नई  पार्टी में आने को तैयार हैं लेकिन भाजपा आलाकमान द्वारा अब येदियुरप्पा के समर्थन में उतरे एक मंत्री और एक सांसद  के खिलाफ सख्त तेवर अपनाने के बाद अब राज्य  में भाजपा से जुडा  कोई व्यक्ति खुलकर येदियुरप्पा के साथ जाने से कतरा रहा है । पार्टी आलाकमान अब उन लोगो से भी पूछताछ कर रहा है जिन्होंने बीते दिनों येदियुरप्पा  की हावेरी में हुई विशाल रैली में शिरकत की ।येदियुरप्पा   पार्टी छोड़ते समय  बहुत भावुक नजर आये और उन्होंने भाजपा को भी बहुत बुरा भला जरुर कहा लेकिन अभी तक उन्होंने कर्नाटक की शेट्टार  सरकार को गिराए जाने की अपनी मंशा का इजहार  खुले तौर पर नहीं किया है शायद इसका बड़ा कारण उनका लिंगायत संप्रदाय से होना है  जिसका प्रतिनिधित्व खुद  राज्य  के मुख्यमंत्री शेट्टार  करते हैं ।  कर्नाटक  की पूरी राजनीती वोक्कलिक्का और लिंगायत के इर्द गिर्द ही घूमती  है जिसमे लिंगायत की बड़ी महत्वपूर्ण  भूमिका है । जहाँ पिछले विधान सभा चुनावो में इसी लिंगायत समूह के व्यापक समर्थन के बूते येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने  का रास्ता साफ़ हुआ था वहीँ येदियुरप्पा द्वारा शेट्टार को नया मुख्यमंत्री बनाया गया था तो वह भी उनकी बिरादरी से ही ताल्लुक रखते थे ।लिहाजा संकेत साफ़ है येदियुरप्पा  अभी शेट्टार सरकार को अपने समर्थको के बूते गिराने का खतरा मोल नहीं लेना चाहते क्युकि आने वाले कर्नाटक के विधान सभा चुनाव में यही लिंगायत वोट एक बार फिर हार जीत के समीकरणों  को प्रभावित करेंगे और अगर आज येदियुरप्पा समर्थक शेट्टार  सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेते हैं तो यकीन  जान लीजिए  लिंगायत आने वाले चुनावो में येदियुरप्पा के साथ अपनी पुरानी  हमदर्दी नहीं दिखा पाएंगे लिहाजा येदियुरप्पा ने कर्नाटक में अपनी रीजनल फ़ोर्स के आसरे भाजपा का खेल खराब करने का मन बना लिया । राज्य  की तकरीबन 7 करोड़ की आबादी में लिंगायतो की तादात 17 फीसदी है तो वहीँ वोक्कलिक्का 15 फीसदी  हैं जिन पर येदियुरप्पा की सबसे मजबूत पकड़ है । गौर करने लायक बात यह होगी कर्नाटक के आने वाले विधान सभा चुनावो में इन दोनों समुदायों का कितना समर्थन भाजपा छोड़ने के बाद येदियुरप्पा अपने लिए जुटा  पाते हैं ।

                      हालाँकि कुछ समय पूर्व येदियुरप्पा  की  कांग्रेस  में शामिल होने की अटकले भी मीडिया में खूब चली क्युकि  भाजपा से नाराज येदियुरप्पा ने  कई मौको पर जहाँ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और उनकी पार्टी के  विषय में तारीफों  के पुल  बांधे वहीँ सोनिया की येदियुरप्पा के गुरु से हुई मुलाकात के राजनीतिक गलियारों में  कई  सियासी अर्थ निकाले  जाने लगे थे लेकिन येदियुरप्पा अपने संगठन  के बूते कर्नाटक की सियासत में अपना खुद का मुकाम बनाना चाहते थे जो भाजपा और कांग्रेस से इतर एक अलग दल के रूप में ही  उन्हें नजर आया ।

                             राजनीती  संभावनाओ का खेल है । यहाँ किसी भी पल कुछ भी संभव हो सकता है । इसी सियासत के अखाड़े में बगावत की भी पुरानी  अदावत  रही हैं । कर्नाटक की राजनीती में येदियुरप्पा का एक बड़ा नाम है  उनका साथ भाजपा  को न मिलने से आने वाले विधान सभा और लोक सभा चुनावो में भाजपा की सत्ता में वापसी की राह जरुर मुश्किल हो  सकती है । पार्टी छोड़ते समय येदियुरप्पा की आंखो से आंसू जरुर छलके लेकिन उनकी समझ में यह नहीं आया कि  उनकी कुर्सी भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते चली गई । इसके बाद उत्तराखंड में घोटालो की गंगा बहाने के आरोप  ने निशंक की भी उत्तराखंड के  मुख्यमंत्री पद से विदाई कराई थी । रेड्डी बंधुओ को  लाभ  पहुचाने के आरोप में लोकायुक्त जस्टिस  संतोष हेगड़े  की एक रिपोर्ट ने  कर्नाटक  में खनन के कारपोरेट गठजोड़ को न केवल सामने ला दिया बल्कि इसमें सीधे तौर पर येदियुरप्पा के साथ रेड्डी  बंधुओ  को कठघरे में खड़ा किया । इसी के साथ येदियुरप्पा की  भावी राजनीती पर ग्रहण लग गया । अपने  दामन  को पाक साफ़ बताने वाले येदियुरप्पा  शायद यह भूल गए राजनीती जज्बातों से नहीं चलती । वह पार्टी के वफादार सिपाही जरुर थे लेकिन इसका यह मतलब नहीं था पार्टी उन्हें करोडो के वारे न्यारे करने की खुली छूट देती ।
      
                       बहरहाल यह कोई पहला मौका नहीं है जब सियासत के अखाड़े में किसी जनाधार वाले नेता ने  पार्टी को गुडबाय बोला है ।  भाजपा में इससे पहले कल्याण सिंह ने एक दौर में भाजपा छोड़ी । 2010 में राष्ट्रीय  क्रांति पार्टी बनाई लेकिन कुछ कर नहीं पाए । मौलाना मुलायम नेताजी का भी दामन  थामा  लेकिन भाजपा छोड़ने के बाद उनका राजनीतिक करियर समाप्त हो गया । मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को ही लीजिए  । राष्ट्रीय  जनशक्ति पार्टी बनाई लेकिन कुछ खास करिश्मा  वह भी नहीं कर पाई  और मजबूर होकर इस साल यू पी के चुनावो से ठीक पहले उनकी दुबारा भाजपा में वापसी हुई । दिल्ली में  भाजपा  की सियासी जमीन  तैयार करने वाले  मदन लाल खुराना  को ही देख लें  एक दौर में उनका भी पार्टी से मोहभंग हो गया था लेकिन अपने खुद के दम पर वह सियासत में कुछ खास करिश्मा नहीं कर पाए । गुजरात में केशुभाई पटेल को ही देख लें  मोदी का बाल बाका तक नहीं कर पाए ।अभी गुजरात के अखाड़े में अपनी अलग पार्टी  बनाकर मोदी के विरुद्ध वह कदम ताल जरुर कर रहे हैं लेकिन असल ताकत 20 दिसम्बर  को पता चलेगी जब गुजरात के विधान सभा चुनावो के परिणाम  सामने आयेंगे । देखना होगा कितनी सीटो पर उनकी नई  पार्टी  जमानत जब्त होने से बचा पाती है । शंकर सिंह बाघेला को ही देखें  भाजपा छोड़ने के बाद कांग्रेस में जाकर कुछ ख़ास करिश्मा नहीं कर पाए ।2006 में अर्जुन मुंडा ने भी भाजपा को अलविदा कहा था लेकिन आज तक वह झारखण्ड में अपने बूते कोई बड़ा आधार अपने लिए तैयार नहीं कर सके हैं ।येदियुरप्पा के भविष्य के साथ अगर हम इन सबको जोडें तो एक बात साफ़ है जिन लोगो ने भी पार्टी से किनारे जाकर बगावत का झंडा  थामा वह सफल नहीं हो पाए और  लोगो के बीच उनकी साख और विश्वसनीयता को लेकर पहली बार सवाल उठे । यही नहीं दूसरी पार्टियों में जाने के बाद भी उन्हें वो सम्मान नहीं मिल पाया  जो उनकी मूल पार्टी में मिला  करता था ।
                              
       मसलन  अगर कांग्रेस के पन्ने टटोलें तो राजगोपालाचारी से लेकर जगजीवन राम , चौधरी चरण सिंह से लेकर कामराज , मोरार जी देसाई  से लेकर नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह  से लेकर नटवर सिंह तक सभी ने एक दौर में पार्टी छोड़ी लेकिन अपना अलग मुकाम नहीं बना सके । इन सबके बीच क्या येदियुरप्पा  कर्नाटक  में कमल को आने वाले समय में मुरझा पायेंगे यह एक बड़ा सवाल जरुर है जो जेहन में आता जरुर है लेकिन अतीत के अनुभव बताते हैं अपने बूते आगे की डगर मुश्किल है  लेकिन येदियुरप्पा की गिनती कर्नाटक में एक बड़े नेता के तौर पर है जिसने " नमस्ते प्रजा  वत्सले  मातृभूमे " से लेकर  इमरजेंसी  के दौर और संगठानिक  छमताओ से लेकर दक्षिण में भाजपा के सत्तासीन होने के मिजाज को बहुत निकटता  से बीते 40 बरस में  महसूस किया है । यही नहीं येदियुरप्पा  ने सरकार से लेकर  संगठन हर स्तर पर लोहा अपने बूते  मनवाया है । जहाँ 2004 में तत्कालीन  कांग्रेसी सीं एम धरम सिंह की सरकार से समर्थन वापस लेने के लिए जनता दल  सेकुलर को उन्होंने  ही  राजी  किया वहीँ  जेडीएस के आसरे कर्नाटक  की राजनीती में गठबंधन की बिसात बिछाई । यही नहीं उस दौर को अगर याद करें तो जब  कुमारस्वामी  बारी बारी से सरकार चलाने  के गठबंधन के फैसले से मुकर  गए तो येदियुरप्पा ही वह शख्स  भाजपा में थे जिन्होंने अकेले चुनाव में कूदने का मन बनाया और 2008 में पहली बार भाजपा को अपने दम पर जिताया । लेकिन सी एम बनने  के बाद से येदियुरप्पा लगातार विवादों में घिरे रहे । उस दौर में सरकारी  जमीन अपने रिश्तेदारों को  डिनोटिफाई करवाने के आरोपों से उनकी जहाँ खूब भद्द पिटी  वहीँ अपनी बेहद करीबी मंत्री शोभा करंदलाजे को एक बिल्डर से करोडो की  घूस दिलवाने के आरोपों के साथ ही उन पर अपने एनजीओ  के लिए खनन माफिया से भारी  भरकम रिश्वत लेने के आरोप भी लगे । इसके बाद लोकायुक्त संतोष हेगड़े  की एक  रिपोर्ट ने 30 जुलाई 2011 को उनकी मुख्यमंत्री  पद की कुर्सी छीन  ली । उसके बाद कर्नाटक  में भाजपा के दो मुख्यमंत्रियों के हाथ राज्य में कमान आ चुकी है जिनमे सदानंद गौड़ा , जगदीश शेट्टार शामिल हैं लेकिन अभी भी येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से इतर कोई पद किसी कीमत पर मंजूर नहीं है शायद इसी वजह से वह आने वाले विधान सभा चुनावो में कर्नाटक के रण  में अपना भाग्य आजमाने उतरने वाले हैं । वैसे अभी  भले ही येदियुरप्पा का दावा है कई विधायक उनकी पार्टी के साथ खड़े हैं । अगर  यह लोग  राज्य  की भाजपा सरकार  से समर्थन  वापस ले लेते हैं तो वहाँ  सरकार  गिर जाएगी लेकिन येदियुरप्पा के अब तक के तेवर यह बता रहे हैं  वह कर्नाटक की भाजपा सरकार को अस्थिर करने के मूड में फिलहाल नहीं दिखाई दे रहे हैं । मायने साफ़ हैं अकेले ही चलना है और अकेले की 2013 की विधान सभा की बिसात को अपने बूते ही बिछाना  है । कर्नाटक में भाजपा का  संगठानिक ढाँचा  जहाँ कमजोर है वही राज्य में रीजनल पार्टियों में बंगारप्पा और रामकृष्ण हेगड़े  की पार्टियों का नाम जेहन में उभरता है लेकिन यह दोनों दल अभी तक कर्नाटक में  कुछ खास करिश्मा नहीं कर पाए हैं । ऐसे में लाख टके का सवाल यह है क्या येदियुरप्पा अपने बूते राज्य में सियासी जमीन तलाश कर पाएंगे  या कर्नाटक  का  यह  करिश्माई नेता भी अतीत के अनुभवों की तर्ज पर राजनीती के गुमनाम अंधेरो में खो जायेगा ?  फिलहाल कुछ कहा पाना मुश्किल है क्युकि यह सब अभी भविष्य के गर्भ में है ।

सोमवार, 26 नवंबर 2012

वाइब्रेन्ट गुजरात में "ब्रांड " मोदी ...................

गुजरात के चुनावी अखाड़े में इस समय चुनावी सरगर्मियां  तेज हो चुकी  हैं । भाजपा और कांग्रेस इस बार भी यहाँ पर आमने सामने खड़ी हैं लेकिन टिकट चयन से लेकर हाईटेक प्रचार में मोदी कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों पर भारी पड़ते दिखाई देते हैं । इसकी छाप  बीते दिनों घोषित प्रत्याशियों की सूची को देखकर देखी जा सकती हैं जहाँ कांग्रेस ने पहले तो अपने प्रत्याशियों की दो -- दो  सूची घोषित की लेकिन बाद में एक चरण के उम्मीदवारों की सूची को कार्यकर्ताओ के विरोध के चलते  उसे रात सादे तीन बजे रद्द करने को मजबूर होना पड़ा वहीँ भाजपा टिकट चयन में कांग्रेस से आगे न केवल निकली बल्कि प्रचार में भी उसने उसको पीछे छोड़ दिया  है  । राजनीती के जानकारों की माने तो नरेन्द्र मोदी तीसरी बार भाजपा  की गुजरात में वापसी कराकर छह करोड़ गुजरातियों के सम्मान की रक्षा को बेताब खड़े दिख रहे हैं तो वहीँ पहली बार उनकी नजरें दिल्ली के सिंहासन पर भी  लगी हुई हैं ।

          पिछले दिनों भाजपा की केन्द्रीय समिति की एक बैठक में भाजपा की दिल्ली वाली " डी कम्पनी"  मोदी से  सीधे मुखातिब हुई  । मौका था गुजरात विधान सभा में भाजपा के टिकट  बटवारे का । इस बार भी टिकटों के बटवारे में मोदी ने अपने फ्री हैण्ड  का बखूबी इस्तेमाल किया और  "डी कंपनी " की   धमाचौकड़ी को यह अहसास करा ही दिया टिकट आवंटन में तो चलेगी तो मोदी की  ही  और वही नेता टिकट पाने में कामयाब होगा जो मोदी की चुनावी बिसात में फिट बैठेगा । बीते दस बरस में यह मौका पहली बार आया है जब गुजरात का कोई सीऍम टिकटों का चयन करने सीधे  दिल्ली पंहुचा है ।यही नहीं मोदी ने पहली बार दिल्ली पहुंचकर पार्टी के बड़े और छोटे नेताओ को मोदी होने के मायने बता दिए हैं । तो क्या माना जाए गुजरात चुनावो के निपटने के बाद मोदी  के कदम अहमदाबाद से सीधे निकलकर दिल्ली के सिंहासन की तरफ बढ़ रहे हैं ? गुजरात चुनावो में मोदी की भारी बहुमत से जीत ही उनके लिए 2014 की चुनावी बिसात में अहम् भूमिका अदा  करेगी।

               गुजरात विधान सभा के हाल के चुनावो में एक तरफ मोदी खड़े  हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस है जिसके पास कोई ऐसा चेहरा इस चुनाव में नहीं बचा है जो  मोदी के मुकाबले में कहीं ठहरता है । भाजपा से निष्काषित और अब कांग्रेस में गए शंकर सिंह वाघेला से लेकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अर्जुन मोड़वाडिया तक के सभी नेताओ में आपसी गुटबाजी इतनी ज्यादा  है  कि इस  बार के चुनावो में भी यह पार्टी का खेल खराब करती ही दिख रही है जिसके चलते मोदी की राह आसान लग रही है । वहीँ मोदी के सामने भी खुद अपनी पार्टी के असंतुष्टों से निपटने की तगड़ी चुनौती है। आरएसएस के असंतुष्ट स्वयंसेवको से लेकर वीएचपी और बजरंग दल सरीखे संगठन जहाँ इस बार भी मोदी के धुर विरोधियो में शामिल हैं वहीँ भाजपा को गुड बाय कह चुके पूर्व मुख्यमंत्री केशु भाई पटेल अब गुजरात परिवर्तन पार्टी बनाकर मोदी को ललकार  रहे हैं । लेकिन इन सबके बीच  आम गुजराती वोटर से अगर आप चुनाव के बारे में पूछें तो उसके मुह पर मोदी के अलावे  कोई चेहरा  इस दौर में नहीं ठहरता । मुस्लिम बाहुल्य इलाको में भी मोदी ने  अपने विकास कार्य के बूते अपने विरोधियो को भी अपने पाले में लाने की गोलबंदी इस चुनाव में की है । जाहिर है मोदी की नजरें इस बार मुसलमानों पर भी लगी हुई हैं जहाँ वह अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि बनाने में जुटे हैं क्युकि  दिल्ली का रास्ता गुजरात के बूते ही तैयार करना है । शायद इसीलिए आरएसएस भी मोदी की नाव में सवारी करने का मन इस दौर में बना  चुका  है । चूँकि गुजरात दंगो पर आई एसआईटी की रिपोर्ट ने मोदी को क्लीन चिट  दे दी है और अब अदालत से भी उनको राहत मिल चुकी है लिहाजा "हिन्दू  हृदय सम्राट " को अब राजनीती के असल हीरो के रूप में पेश करने से संघ पीछे नहीं हटने वाला है ।इसके संकेत गुजरात में मोदी की फिर से जीत के बाद देखने को मिलेंगे ।

                     इस साल संघ ने अपने मुखपत्र " आर्गनाइजर " में चूँकि यह लिखा कि  मोदी  ने गुजरात  दंगो के दौरान राजधर्म निभाने में कोई  कोताही नहीं की जो बहती हवा के असल रुख का अहसास तो करवा ही रहा है । साथ ही इसी बहाने  संघ मोदी को अपना  खुला समर्थन भी दे रहा है क्युकि  संघ मान चुका  है गुजरात से लेकर आगामी लोक सभा चुनावो में अकेले नरेन्द्र मोदी ऐसे नेता हैं जो संघ के राष्ट्रवाद को अपने कद में ढाल सकते हैं और हिंदुत्व को एक नई  पहचान दे सकते हैं ।इसके संकेत हाल ही में कुछ महीने पहले मोदी और मोहन भागवत के बीच हुई मुलाकात के दौरान देखने को मिले थे  जहाँ गुजरात चुनावो से ठीक पहले मोहन भागवत ने नरेन्द्र मोदी को "नमस्ते प्रजा वत्सले मातृभूमि " का पाठ पढ़ाकर  मोदी को संघ की आखरी उम्मीद होने का पाठ पढाया । साथ ही  भाजपा की दिल्ली वाली डी कंपनी के पीएम बनने की संभावनाओ को नकार दिया है ।

इधर मोदी भी अपने अंदाज में गुजरात के रण  में  कांग्रेस की मुश्किलें अपने विकास कार्यो के द्वारा बढ़ा  रहे हैं । मोदी ने हाल के समय में जहाँ गुजरात चुनावो से पूर्व अपने सदभावना  उपवास के माध्यम से अपनी छवि बदलने की कोशिश की है तो वहीँ विवेकानंद विकास यात्रा के जरिये युवाओ के बीच अपनी अलग पहचान बनाने में भी सफलता हासिल की है ।साथ ही यह पहला मौका  है जब वह गुजरात के मुद्दों से इतर राष्ट्रीय मुद्दों को अपने चुनाव प्रचार में आक्रामक ढंग से उठा रहे हैं  और राहुल  ,सोनिया से लेकर मनमोहन  तक पर सीधे वार करने से नही चूक रहे हैं । यद्यपि 2002 के गोधरा दंगो का जिन्न मोदी  का पीछा  आज भी नही छोड़ रहा है वहीँ उनके दल की कद्दावर मंत्री रही माया कोडनानी को 28 साल तो बजरंग दल के बाबू  बजरंगी को नरोदा पाटिया  नरसंहार में उम्रकैद की सजा ने  उनकी मुश्किलों को बढ़ाने  का  काम  किया है लेकिन बीते दस बरस में यह पहला मौका है  जब नरोदा पाटिया  और  गोधरा सरीखे मुद्दो को मोदी के विरोधी  पीछे छोड़ चुके हैं । गुजरात  के पिछले विधान सभा चुनाव में सोनिया गाँधी द्वारा मोदी को मौत का सौदागर बताने भर से मोदी की जीत की राह आसान हो गई थी शायद इस बार यही सोचकर कांग्रेस दंगो के मसलो को छोड़कर अन्य  मुद्दे राज्य में उठा रही है क्युकि हिन्दू ह्रदय सम्राट जनता की नब्ज पकड़ना जानते  हैं ।वह अपने खिलाफ बनने वाले हर माहौल को हिंदुत्व वोटो के  ध्रुवीकरण के जरिये भारी वोटो में तब्दील करने का माद्दा रखते हैं । गुजरात में मोदी ने अपने विकास कार्य से लोगो का दिल जीता है साथ ही वहां का कायाकल्प किया है । एक दशक पहले के गुजरात को कौन भूल सकता है ? कौन भूल सकता है भुज के भूकंप को जब यह पूरा इलाका तहस नहस हो गया था लेकिनं आज वहां जाकर अगर आप भुज को देखें  तो  यकीन ही नहीं करेंगे यह गुजरात का वही भुज है जहाँ कभी भूकंप के झटके आये थे ।

आज मोदी ने अपने विकास कार्यो से गुजरात को एक माडल स्टेट के रूप में खड़ा किया है ।मोदी ने इस दरमियान ना केवल सड़को का भारी जाल बिछाया है बल्कि बिजली, पानी जैसी मूलभूत सुविधाओ को भी चुस्त दुरुस्त करने के साथ ही गुजरात में कॉरपोरेट  के आसरे विकास की नई  लकीर खींची  है । यही नहीं आज स्थिति ऐसी है कॉरपोरेट इस दौर में खुले तौर मोदी के साथ खड़ा है  जहाँ मुकेश अम्बानी से लेकर सुनील भारती मित्तल और रतन टाटा से लेकर अनिल अम्बानी तक सभी नरेन्द्र  मोदी की तारीफों के कसीदे पढ़ते नजर आते है और उनको वह देश की अगुवाई करने वाले नेताओ में शुमार  करने से पीछे नहीं हटते तो इसका कारण मोदी का विकास माडल रहा है जिन्होंने आम गुजराती के मन में अपनी अलग पहचान बनाने  में सफलता हासिल की है । शायद यही कारण है गुजरात का आम वोटर भी अब गुजराती अस्मिता की चाशनी में मोदी के हाथो में अपना भविष्य सुरक्षित देख रहा  है । 1985 में कांग्रेसी मुख्यमंत्री रहे माधव  सिंह सोलंकी ने  छत्रिय ,आदिवासी, दलित और मुसलमानों को साथ लेकर "खाम "  रणनीति के आसरे 182 में से 149 सीटें जीती थी वहीँ मोदी भी इस बार हिंदुत्व माडल को गुजराती अस्मिता के साथ जोड़कर 150 सीटें जीतकर दो तिहाई बहुमत से गुजरात  में भाजपा की सरकार बनाना चाहते हैं ।

मोदी ने इस चुनाव में अपना सब कुछ  पर लगा दिया है ।ट्विटर से लेकर फेसबुक , थ्रीडी प्रचार से लेकर ऑनलाइन चैटिंग ,  मुखौटा प्रचार से लेकर हाईटेक प्रचार सभी जगह मोदी की जय जय हो रही है । यहाँ तक कि मीडिया भी   इस चुनाव में मोदी का यशोगान करता नजर  आ रहा है । मोदी माधव  सिंह सोलंकी से आगे निकलकर  "खाम " रणनीति  के  आसरे अपने लिए रिकॉर्ड मतो से जीत का रास्ता तैयार कर रहे हैं ।हर विषय पर वह अपनी राय इस चुनाव प्रचार के दौरान सोशल मीडिया पर रख रहे हैं और चुनाव प्रचार में हिंदी का प्रयोग कर उसे ग्लोबल बना रहे हैं । छह करोड़ गुजरातियों में 16 फीसदी आदिवासी, 15 फीसदी पटेल हैं तो वहीँ 10 फीसदी मुस्लिम , 7 फीसदी दलित और 8 फीसदी ब्राह्मण हैं  वहीँ 44 फीसदी पिछड़ी जाति  के लोग शामिल हैं ।पटेल समुदाय पर जहाँ केशु भाई की पकड़ मजबूत है वहीँ पिछड़ी जाति  पर मोदी की पकड़  मजबूत  है ।  मोदी खुद  भी ओबीसी जाति से आते हैं जहाँ पर उनका मजबूत जनाधार रहा है ।पिछली बार भी गुजरात  के चुनावो में केशु भाई फेक्टर बड़ा बताया जा रहा था लेकिन  वहां पर उनकी  कोई   बड़ी भूमिका देखने को नहीं मिली परन्तु इस साल वह अपनी गुजरात  परिवर्तन पार्टी के जरिये ताल ठोक रहे हैं जहाँ मोदी से नाराज नेताओ का एक बड़ा तबका उनके साथ शामिल बताया जा  रहा  है ।ऐसे माहौल में मोदी की मुश्किलें  बढ़ सकती हैं लेकिन राजनीती के जानकारो  का कहना है  गुजरात  के चुनाव निपटने तक ही केशु भाई बड़ा फेक्टर माना जाएगा  । मतदान  निपटने के बाद  वह संघ के जरिये मोदी को ही लाभ पहुचायेंगे ।

कांग्रेस के पास मोदी की काट का कोई फार्मूला इस दौर में बचा नहीं है लिहाजा इस चुनाव में भी वह मोदी के खिलाफ फर्जी इनकाउंटर , कैग की गुजरात पर आई रिपोर्ट , सौराष्ट्र में सूखा , किसानो की ख़ुदकुशी और राज्य में लोकायुक्त की नियुक्ति ना होने का मुद्दा उछाल  रही है वहीँ मोदी केंद्र द्वारा गुजरात के साथ किए गए सौतेले व्यवहार और यू पी ए  2 के भ्रष्टाचार को मुद्दा बनाकर उसे तगड़ी चुनौती दे  रहे  है ।  अगर गुजरात के साथ हिमाचल में भी भाजपा की जीत होती है  तो यकीन जान लीजिए मोदी का नाम राष्ट्रीय  फलक पर मजबूत नेता के तौर पर उभरेगा । पिछले दिनों ब्रिटेन के  उच्चायुक्त की मोदी से मुलाक़ात के बाद जहाँ उनके समर्थको की बाछें खिली हुई हैं वहीँ अब मोदी सभी वर्गो में अपनी पैठ मजबूत कर 2014 का रास्ता दिल्ली के लिए खुद के बूते अगर  तैयार कर रहे हैं तो इसमें शक शायद ही किसी को हो । गोधरा अब काफी  पीछे छूट चुका  है  । अपने माडल से मोदी ने गुजरात को एक  नई पहचान दी है  । आज उनके इस माडल की उनके विरोधी भी सराहना करते हैं ।यह ब्रांड  मोदी का चेहरा है जिसने  हिंदुत्व की प्रयोगशाला में उन्होंने अपने अथक परिश्रम से सींचा है । मोदी प्रतिदिन 19 से 20 घंटे काम करते हैं और बंद कमरों में बैठकर विरोधी  की हर चाल का माकूल जवाब देने की रणनीति तैयार करते हैं । इस काम में वह भाजपा के आरएस एस को ठेंगा दिखाकर अपनी पार्टी के नेताओं को भी  ठिकाने लगाने से परहेज  अगर नहीं करते तो समझा जा  सकता है बीते एक दशक में मोदी ने  तमाम आरोपों के  बीच किस तरह  के करिश्माई नेता की पहचान बनाई है ।

एक दौर में संघ के प्रचारक रहे नरेन्द्र भाई मोदी कुशल  संगठनकर्ता भी रहे है । शायद इसी के चलते वह अपने बूते हर बार गुजरात में सरकार और संगठन में अच्छा  तालमेल  बनाने में सफल हुए हैं ।20  दिसंबर को अगर गुजरात में भाजपा बड़ी  दिवाली मनाने में सफल होती है तो इसके बाद अपनी जीत से मोदी यह सन्देश देने में कामयाब हो जायेंगे अब गुजरात का बोझ उठाने के बाद वह  राष्ट्रीय  फलक पर अपनी पहचान बनाने निकलने जा रहे हैं । संभव है इसके बाद भाजपा पीएम पद के लिए "ब्रांड मोदी " नाम को  भुनाएगी । ऐसी सूरत में पार्टी उन्हें 2014 के लोक सभा चुनावो से ठीक पहले प्रधानमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट करने से शायद ही हिचकेगी । राहुल गाँधी की तरह भाजपा में भी पार्टी की  मोदी पर निर्भरता शायद बढ़ जाएगी । लोक सभा में  उम्मीदवारों  के चयन से लेकर चुनाव संचालन  समिति की कमान तब मोदी के पास ही रहेगी ।अगले लोक सभा चुनाव से पहले सभी की नजरें गुजरात , हिमाचल में हैं अगर मोदी की वापसी गुजरात में आने वाले दिनो मे होती है  तो मध्य प्रदेश , राजस्थान , छत्तीसगढ़ , दिल्ली सरीखे 10  राज्यो में अगले साल होने जा रहे विधान सभा चुनावो में यह जीत पार्टी और कार्यकर्ताओ में नया जोश तो अवश्य ही भरेगी ।लेकिन फिलहाल सभी की नजरें मोदी की शानदार जीत पर लगी हैं और वाइब्रेन्ट  गुजरात   को भी 20 दिसम्बर तक  का इन्तजार है ।        
                      

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

राजनीती के मैदान पर केजरीवाल ...................



“ जब सारी व्यवस्था ही लूट खसोट की पोषक बन जाए | शासक वर्ग सत्ता की ठसक दिखाते हुए सत्ता के मद में चूर हो जाए और आम आदमी के सरोकार हाशिये पर चले जाए तो ऐसे में रास्ता किस ओर जाए और किया भी क्या जाए " ? 
मध्य प्रदेश के सीहोर के बिलकिसगंज इलाके से ताल्लुक रखने वाले  राजकुमार परमार जब मौजूदा व्यवस्था से थक हार कर आक्रोश में यह जवाब देते हैं तो भारतीय राजनीती के असल स्तर का पता चलता है | कांग्रेस के युवराज के बजाए अब वह राजनीती के नए युवराज केजरीवाल के जरिए देश की हालत सुधारने निकलने जा रहे हैं | २६ नवंबर को सभी की नजरें जहाँ जंतर मंतर पर केजरीवाल के समर्थन में सड़को पर उतरने वाले जनसैलाब पर रहेंगी वहीँ राजकुमार सरीखे युवा लोग भी केजरीवाल की घोषित होने जा रही पार्टी का हिस्सा बन अपने इलाको में हर व्यक्ति को आम आदमी की पार्टी से जोड़ने का रोडमैप तैयार करेंगे | २६ नवम्बर १९४९ को अपने देश में संविधान का विधान बना था वहीँ २६ जनवरी  १९५० को यह लागू हुआ था | इसी से प्रेरित होकर २६ नवंबर को केजरीवाल और उनकी युवा टीम देशवासियों को राजनीती का एक नया विकल्प देती दिखाई देगी क्युकि इस दिन आईएसी से इतर उनका संगठन पहली बार उस पार्टी का स्वरूप ग्रहण करेगा जिसमे आम आदमी मुख्यधारा में दिखाई देगा | सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को अपने निशाने पर लेने वाले अरविन्द केजरीवाल की इंट्री भारतीय राजनीती में उस “एंग्री यंगमैन “ के तौर पर हो रही है जिसके केंद्र में पहली बार आम आदमी है जो इस दौर में हाशिये पर चला गया है वहीँ अरविन्द आम आदमी के आसरे भारत की भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था की जड़ो को खदबदाने की कोशिशे कर रहे हैं जिसमे उनको सफलताए भी मिल ही है शायद यही कारण है आम आदमी केजरीवाल में उस करिश्माई युवा तुर्क का अक्स देख रहा है जिसके मन में सिस्टम से लड़ने की चाहत है और वह सिस्टम में घुसकर नेताओ को आइना दिखा रहा है |


                                
  
दरअसल भारतीय राजनीती इस दौर में सबसे नाजुक दौर से गुजर रही है | यह पहला मौका है जब सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष की साख मिटटी में मिल गई है | एक के बाद एक घोटाले भारतीय लोकतंत्र के लिए कलंक बनते जा रहे हैं लेकिन सरकार को आम आदमी से कुछ लेना देना नहीं है क्युकि उसकी पूरी जोर आजमाईश विदेशी निवेश बढाने और कारपोरेट के आसरे मनमोहनी इकोनोमिक्स की लकीर खीचने में लगी हुई है | उदारीकरण के बाद इस देश में जिस तेजी से कारपोरेट  के लिए सरकारों ने फलक फावड़े बिछाए हैं उसने उसी तेजी के साथ भ्रष्टाचार की गंगोत्री बहाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है | इस लूट के खिलाफ समय समय देश में आवाजें उठती रही हैं लेकिन आज तक कोई सकारात्मक पहल इस दौर में नहीं हो पायी है | स्थितिया कितनी बेकाबू हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अगर मौजूदा दौर में कोई केजरीवाल सरीखा व्यक्ति तत्कालीन कानून मंत्री और वर्तमान विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद को उनके संसदीय इलाके फर्रुखाबाद में चुनौती देता है तो माननीय मंत्री उसे खून से रंगने और निपटा देने की बात कहते हैं वहीँ दम्भी प्रवक्ता रहे और वर्तमान में सूचना प्रसारण मंत्री मनीष तिवारी अन्ना को भगौड़ा एक दौर में घोषित कर देते हैं जो आम आदमी का हाथ कांग्रेस के साथ की असल तस्वीर आँखों के सामने लाता है | देश में यह पहला मौका रहा है  जब २०११ मे अन्ना की अगस्त क्रांति , रामदेव के जनान्दोलन ने लोगो को इस भ्रष्टाचार के दानव के खिलाफ लड़ने के लिए सड़क पर एकजुट किया और पहली बार राजनेताओ की साख पर सीधे सवाल इसी दौर में ही उठने लगे |

 

दरअसल अपने देश में अब भ्रष्टाचार एक गंभीर समस्या बन चुका है | प्रायः लोग इसको लाइलाज समझने लगते हैं लेकिन अब समय आ गया है जब इससे निजात पाने का विकल्प  लोगो को देना होगा | देश के युवाओ में इसे लेकर गहरा आक्रोश है और वह पहली बार देश के नेताओ से लेकर नौकरशाहों को निशाने पर लेकर उनकी जमीन को निशाने पर ले रहा है और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी जा रही हर लड़ाई में अपनी भागीदारी दर्ज कर रहा है | इस लड़ाई में पहली बार वो लोग भी युवाओ के साथ दिख रहे है जो अपने अपने पदों से रिटायर होकर भ्रष्टाचार मुक्त भारत के सपने को साकार करने सड़क से संसद तक का रास्ता अख्तियार करने को भी तैयार खड़े हैं |
                          
  

देश की पैसठ फीसदी युवा आबादी अब आगामी चुनाव में अपनी बिसात के जरिए सत्ता के हठी तंत्र को भोथरा करने में जुटी है जिसमे अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम के साथी टिमटिमाते दिए में रोशनी दिखाते नजर आते हैं | अरब स्प्रिंग से प्रेरित होकर भारत में भी लोग तहरीर चौक की तर्ज पर नया भारत बसाने का सपना अब देखने लगे हैं और शायद उसी का परिणाम था पूरे देश में अन्ना आन्दोलन की परिणति ऐसी हुई जिसने पहली बार लोकतंत्र में लोक के महत्व को साबित कर दिखाया | २ जी , आदर्श सोसाईटी , कामनवेल्थ घोटाला ,कर्नाटक की खदान में हुआ घोटाला यह सब ऐसे मुद्दे थे जिसने अन्ना के आन्दोलन को प्लेटफोर्म देने का काम किया | लोगो ने इस जनांदोलन से सीधा जुड़ाव महसूस किया शायद इसी के चलते सभी नए इस पर बढ़ चढकर भागीदारी बीते बरस की | आज अन्ना और अरविन्द की राहें भले ही जुदा हो गई हैं लेकिन दोनों का मुद्दा एक है देश से भ्रष्टाचार का खात्मा और इसी के चलते अब केजरीवाल जहाँ अब सत्ता के मठाधीशो को उनकी माद में घुसकर चुनौती दे रहे हैं वहीँ राजनेताओ को आईना दिखाकर यह भी बतला रहे हैं २०१४ में खुद अकेले ही चलना है और अकेले ही रास्ता भी तैयार करना है | केजरीवाल के राजनीतिक गुरु अन्ना हजारे भी अब फिर से जनलोकपाल की लड़ाई नई टीम के साथ लड़ने वाले हैं | जो लोग सोचते थे अन्ना का आन्दोलन अब खत्म हो गया है वह शायद यह भूल गए हैं असली लड़ाई तो अब शुरू हो रही है जब रामदेव और अन्ना देश भर में घूम घूमकर २०१४ के चुनावो के लिए नई अलख जगाने लोगो के बीच निकलेंगे | अन्ना अगले महीने पटना के गाँधी मैदान से भ्रष्टाचार की लम्बी लड़ाई की हुंकार भरेंगे जिसमे कई रिटायर्ड नौकरशाह और अधिकारी भी उनका साथ देंगे और पूरे देश में भ्रष्टाचार समाप्त करने जन जन को जगायेंगे |  ऐसे में भ्रष्टाचार देश में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है |  मौजूदा दौर में भारतीय राजनीती के सामने जैसा संकट खड़ा है वैसा पहले कभी खड़ा नहीं था |

              

 इस दौर में जहाँ कांग्रेस की  भ्रष्टाचार के मसले पर खासी किरकिरी हो रही है वहीँ कोयले की कालिक के दाग से लेकर पूर्ति के गडबडझाले पर पहली बार उस विपक्षी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी पर सवाल उठे हैं जो पार्टी अपने को पार्टी विथ डिफरेंस कहती नहीं थकती है | ऐसे हालातो में  “केशव कुञ्ज” उनको अध्यक्ष पद पर अगर बनाए रखता है तो समझा जा सकता है ऐसा करके उसकी भ्रष्टाचार की लड़ाई खुद कमजोर नजर आने लगी  है | आम जनता में यह सन्देश जा रहा है दोनों राष्ट्रीय पार्टियों में भ्रष्टाचार के मसले पर भी मैच फिक्सिंग है | अगर इच्छा शक्ति  होती तो दोनों पार्टिया उन लोगो को पद से हटा देती जिन पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगे हैं लेकिन मनमोहन को देखिये मंत्रिमंडल विस्तार में उन्ही दागियो का प्रमोशन कर देते हैं जिनकी वजह से पार्टी की साख को नुकसान हुआ है | ऐसे माहौल में केजरीवाल सरीखे लोग अब लोगो को यह विश्वास करा रहे हैं अब भ्रष्टाचारी नेताओ के दिन जल्द ही लदने वाले हैं तो समझा जा सकता है आने वाले दिनों में नई बिसात संसदीय राजनीती में बिछने जा रही है जिसमे जनता के हाथ सत्ता की चाबी सही मायनों में होगी | न केवल केजरीवाल के साथ बल्कि रामदेव और अन्ना के गैर राजनीतिक आन्दोलन के साथ भी अब जनता खड़ी होती इस दौर में अगर दिख रही है तो इसका बड़ा कारण यह है आम आदमी इस दौर में भ्रष्टाचार से परेशान है | मिसाल के तौर अरविन्द  केजरीवाल को ही लीजिए अन्ना के राजनीतिक विकल्प देने के सवाल पर जब दोनों ने अलग राहें चुनी तो कई लोगो ने सोचा बिना अन्ना के केजरीवाल की राह मुश्किल भरी रहेगी लेकिन जनलोकपाल पर मनमोहन , सोनिया और गडकरी के घेराव , बिजली की बड़ी कीमतों के खिलाफ दिल्ली में विशाल प्रदर्शन द्वारा उन्होंने अपनी असली ताकत का एहसास करा दिया | युवाओ की एक बड़ी टीम उनके साथ हर मसले पर खड़ी रही चाहे वाड्रा का मामला लें या गडकरी का हर जगह उनको युवा साथियो का सहयोग इस दौर में मिला है | आज आलम यह है केजरीवाल के पास भ्रष्टाचार की आये दिन सैकड़ो शिकायते देश भर से आ रही हैं जिन पर वह अपने साथियो के साथ प्रतिदिन बहस करते हैं और युवा साथियो से लैस केजरीवाल ब्रिगेड उस पर गंभीरता के साथ अध्ययन करती है |
                               
  

मौजूदा दौर में पक्ष और विपक्ष दोनों यह कहते हैं कि आरोप लगने से कोई आरोपी नहीं हो जाता और वह जाँच से भी घबराते हैं वहीँ केजरीवाल को देखिये उन्होंने अपने साथियों की जांच के लिए भी अलग से टीम गठित कर दी है | इस दौर में जहाँ प्रशांत भूषण पर हिमाचल में नियमो को ताक पर रखकर जमीन लेने के आरोप लगे वहीँ मयंक गाँधी पर भी अपने चाचा को   महाराष्ट्र में जमीन देने के भी आरोप लगे हैं वहीँ अंजलि दमानिया पर भी ऊँगली  उठी जिसमे फर्जी किसान बनकर रायगढ़ में कम दामो पर खरीदी गई ३५ एकड़ जमीन को बेचकर मुनाफा बनाने का संगीन आरोप लगा है  लेकिन केजरीवाल ने उन सभी की जांच करने का ऐलान एक झटके में कर लोगो का बीच एक नई नजीर पेश कर डाली है | आम जनता उनके इस निर्णय के साथ खड़ी दिखाई देती है | लोगो को उम्मीद है कि केजरीवाल की नई पार्टी अन्य पार्टियों से इतर अलग राह पर चलेगी | जंतर मंतर पर आगामी सोमवार को पार्टी की न केवल आम सभा होने जा रही है बल्कि संविधान भी घोषित होगा | इसके बाद केजरीवाल चुनावी अखाड़े में कूदेंगे जहाँ पर उनकी असली परीक्षा होगी | उनकी नज़रे फिलहाल दिल्ली पर टिकी हैं | अगले साल दिल्ली में नगर निगम के चुनाव होने हैं | शीला दीक्षित की मुश्किलें बिजली की बड़ी कीमतों ने बढ़ाई हुई हैं | ऊपर से सरकार के खिलाफ आम जनमानस में रोष है | केजरीवाल ने वहां पर आम सभाए कर जनता से  जुड़े मुद्दे उठाये हैं | जनता बिजली, पानी , महंगाई से कराह रही है ऊपर से भ्रष्टाचार से देश का आम आदमी परेशान  इस दौर में हो चुका है | केजरीवाल इन्ही मुद्दो के आसरे जनता में घर घर पैठ बनाने की कोशिशो में लगे हैं |
                             
कुछ लोग केजरीवाल की राजनीती को ख़ारिज करने में लगे हुए हैं और उनको आये दिन निशाने पर ले रहे हैं | कांग्रेसी जहाँ सत्ता के मद में चूर होकर केजरीवाल को लोकतंत्र के लिए खतरा बता रहे हैं वहीँ भाजपा भी उसी के सुर में सुर मिला रही है जबकि हमारे देश के राजनीतिक दल शायद इस बात को भूल रहे हैं कि मौजूदा दौर में हमारे राजनीतिक सिस्टम में गन्दगी भर गई है | अपराधियों और माफिया प्रवृति के लोग राजनीती की बहती गंगा में डुबकी लगा रहे है | हत्या, चोरी, बलात्कार जैसे संगीन अपराधो में लिप्त लोग लोकतंत्र की शोभा बड़ा रहे है | राजनीती में भाई भतीजावाद, परिवारवाद, जातिवाद, साम्प्रदायिकता भरी हुई है और इन सबके बीच अगर केजरीवाल राजनीति का शुद्धिकरण करने जंतर मंतर  निकल रहे हैं तो वह कौन सा संगीन अपराध कर रहे हैं जो हमारे देश की बड़ी राजनीतिक जमात उनको ख़ारिज करने पर तुली हुई है | यही नहीं पत्रकारों की एक बड़ी जमात भी अब उनके पार्टी बनाने के फैसले पर साथ नहीं है | हमारे पत्रकारिता जगत के लिए यह शर्म की बात है जो खुलासे केजरीवाल कर रहे हैं उन पर अब तक किसी भी मीडिया घराने ने कई बरस से ना तो कलम ही चलाई और ना ही अपने चैनल में उन पर खबरें दिखाई  | केजरीवाल के यही खुलासे शायद अब इसी जमात को हजम नहीं हो रहे हैं | वैसे भी केजरीवाल जिस बेबाकी से मीडिया को उत्तर देते हैं उससे पत्रकारों के पसीने प्रेस कांफ्रेंस में छूट जाते हैं |  कुछ पत्रकारों और मठाधीशो ने राजनीती को अपनी जागीर समझ लिया है अब केजरीवाल नए सिरे से राजनीती को परिभाषित करने जा रहे हैं जिसके केंद्र में पहली बार आम आदमी रहेगा | अब तक देश की सभी पार्टियों द्वारा वह आम आदमी छला जाता रहा है | अब केजरीवाल अपनी पार्टी द्वारा जनता की नब्ज पकड़ेंगे | यही एक नेता की खासियत होती है | वह इसे बखूबी जानते हैं और इसकी खुशबू उन्होंने अपने सरकारी सेवाकाल के दौरान भी महसूस की  है |  यह तय हो चुका है उनकी पार्टी में सब अब आम आदमी ही तय करेगा और शायद इसीलिए यह पार्टी आम आदमी की होने जा रही है जिसमे ना तो महासचिव होगा ना अध्यक्ष | यह पार्टी जनता के सपनो की पार्टी होगी | तो इन्तजार कीजिये २६ नवंबर को जंतर मंतर से होने जा रहे केजरीवाल के बड़े एलान का | हमारी भी नजरें अब वहीँ की ओर हैं |

अन्तरिक्ष में सुनीता की ऊँची उड़ान........................





सपनो के आकाश में ऊँचा उड़ने का ख्वाब देखकर सुनीता ने ना केवल उसे जिया बल्कि उसे पदाई के बाद हकीकत में भी बदला | अन्तरिक्ष में उनकी यह ऊँची उड़ान  सही मायनों में सुनीता के असल कद का अहसास कराती है | भारतीय मूल की अन्तरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स और उनके दो सहयोगी फ्लाईट इंजीनियर बीते दिनों  यूरो  मालेंन्चेंको और अकी होशिंदे  के साथ चार महीने अन्तरिक्ष में बिताने के बाद सकुशल धरती पर लौट आई | बीते सोमवार को कजाकिस्तान के अर्कालिक स्टेशन पर सुबह सात बजकर तेईस मिनट पर स्पेस एयरक्राफ्ट  सोयूज जैसे ही लैंड हुआ हर किसी देशवासी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा क्युकि यही वह मिशन था जिस पर काम के द्वारा अन्तरिक्ष की असल उड़ान का रुख वैज्ञानिक तय करने जा रहे है |


 नासा के स्पेस मिशन एक्सपेडिशन ३३ की फ्लाइट इंजीनियर रही सुनीता इस साल 15 जुलाई को अन्तरिक्ष के लिए रवाना हुई थी | सुनीता की यह लम्बी उड़ान कई मायनों में यादगार रही है |यह कोई पहला मौका नहीं है जब सुनीता ने अपनी उड़ान द्वारा अन्तरिक्ष का सफ़र तय किया है | इससे पहले 2006 में वह अन्तरिक्ष के सफ़र को तय कर चुकी हैं | इस बार उन्होंने आईएसएस में १२७ दिन का लम्बा वक्त बिताने का नया कीर्तिमान स्थापित किया है | नासा के मिशन एक्सपेडिशन में जहाँ इस बार सुनीता ने अन्तरिक्ष मे दूसरी बार कदम बढाये वहीँ उनके साथी होशिदे दूसरी बार तो मालेंन्चेंको पांचवी बार अन्तरिक्ष की सैर कर चुके हैं |सुनीता के साथ उनके दो सहयोगियों के सकुशल वापस आने के बाद अब उनका अन्तरिक्ष यान सोयुज स्पेस से अलग जरुर हो गया है लेकिन वहां पर नासा की रिसर्च खत्म  नहीं हुई है | वैसे भी रिसर्च एक बहुत लम्बी प्रक्रिया  है और वैज्ञानिको को किसी नई खोज का पता लगाने के लिए लम्बे समय तक अध्ययन करना पड़ता है | जाहिर तौर पर नासा भी इसी लीक पर चल रहा है शायद तभी सुनीता के साथ मौजूद तीन और अन्तरिक्ष यात्रियों की अन्तरिक्ष से वापसी अगले साल तक धरती पर होगी | वह भी अन्तरिक्ष में नई सम्भावनाये तलाशने निकले है | उनका यह अध्ययन निश्चित रूप से वैज्ञानिको को अन्तरिक्ष की जमीनी सच्चाई से जहाँ वाकिफ कराएगा  वहीँ वहां पर जीवन के तौर तरीके की भी विस्तृत जानकारी लोगो को मिलेगी |

                      सुनीता और उनके साथियो के द्वारा किये गए अध्ययनों का लाभ निश्चित ही वैज्ञानिक उठा सकते है | इस वैज्ञानिक अध्ययन के जरिये अन्तरिक्ष के तौर तरीको को तो समझा ही जा सकेगा वहीँ कई गूढ़ रहस्यों से पर्दा हट सकता है | सुनीता की यह नई उपलब्धि पूरे विश्व के लिए एक मिसाल है लेकिन  एक भारतीय के तौर पर यह हमारे लिए भी ख़ुशी का पल है क्युकि सुनीता मूल रूप से भारत से ही ताल्लुक रखती हैं | इससे ज्यादा दिल को सुकून देने वाली बात क्या हो सकती है आज भी वह अपने भारत देश से गहरा लगाव रखती हैं शायद तभी उनके मन में भारत के प्रति प्यार है जिसका इजहार वह अपनी पिछली अन्तरिक्ष यात्रा के बाद भारत की अपनी यात्रा के दौरान कर चुकी हैं | बहुत सारी प्रतिभाए हमारे देश की ऐसी हैं जो अपना मूल देश छोड़ने के बाद भारत से कटे कटे सी रहती हैं | लेकिन सुनीता आज भी अपनी परम्पराए और संस्कार नहीं भूली हैं क्युकि उनकी जडें भारत में हैं और शायद यही कारण रहा है अपनी पहली अन्तरिक्ष यात्रा के बाद वह भारतीयों से गहन आत्मीयता से मिली | इस मुलाक़ात के मायने इस रूप में खास थे क्युकि उन्होंने अपने हर प्रशंसक के जवाब बहुत शालीनता के साथ ही न केवल दिए बल्कि उन्हें निराश भी नहीं किया | 

अन्तरिक्ष में सुनीता जहाँ अपने अध्ययन के माध्यम से वहां के रहस्यों पर प्रकाश डालेंगी वहीँ इससे सुनीता को  आदर्श मानने वाली लड़कियो को अब भारत में विज्ञान को लेकर रूचि जागेगी ऐसी उम्मीद भी जग रही है | सुनीता की इस उपलब्धि से हर किसी के मन में यह जज्बा जगा है हर इंसान में कुछ न कुछ खासियत रहती है | बस अपनी प्रतिभा को पहचानने की जरुरत है | सुनीता की बचपन से विज्ञान में रूचि थी | इसी रूचि ने उनके अन्तरिक्ष के सफ़र को साकार रूप प्रदान किया |  इस घटना ने  जहाँ यह साबित किया है भविष्य में अन्तरिक्ष को लेकर होने वाले अनुसंधानों में महिलाओ की भी बराबर भागीदारी सुनिश्चित हो सकती है  वहीँ इससे विज्ञान जैसे विषय को भी घर घर  लोकप्रिय बनाने में मदद मिल सकती है| ऐसी उम्मीद कई विशेषज्ञों को है |अगर सब कुछ ठीक  ठाक रहा तो जल्द ही हमारे देश के वैज्ञानिक भी  अपनी मेधा का लोहा पूरी दुनिया को मनाकर अन्तरिक्ष में सफलता के झंडे गाड सकते हैं | सुनीता की यह लम्बी उड़ान उनका अन्तरिक्ष में पथ प्रदर्शित करने के लिए काफी है |                 

सोमवार, 19 नवंबर 2012

कांग्रेस चली राहुल की राह ...................


                               



“जाएँगे तो लड़ते हुए जाएंगे” के जिस नारे के आसरे कांग्रेस इस दौर में आर्थिक सुधारो की फर्राटा भरने वाली मनमोहनी इकोनोमिक्स वाली अपनी लीक पर चल रही है अब उसी की थाप पर कांग्रेस के युवराज यानी राहुल गाँधी कांग्रेस के लिए आने वाले लोकसभा का चुनाव रास्ता तैयार कर रहे हैं क्युकि सूरजकुंड से निकले अमृत मंथन का सन्देश साफ़ है | राहुल को इस दौर में जहाँ कांग्रेस को खुद के लिए तैयार करना है वहीँ मनमोहन सिंह के पास भी कांग्रेस के चुनावी घोषणा पत्र में किये गए वायदों को पूरा करने की एक बड़ी चुनौती सामने खड़ी है | लेकिन असल चुनौती तो राहुल के सामने है जिनको आगे कर पार्टी लोकसभा चुनाव लड़ने जा रही है | सूरजकुंड में पार्टी के संवाद मंथन में यह तय हो चुका है कि कांग्रेस को राहुल की अगुवाई में ही २०१४ का रास्ता अपने बूते ही तय करना है क्युकि पार्टी ने इसी को ध्यान में रखकर राहुल को राष्ट्रीय चुनाव समिति का अध्यक्ष बनाया है | पार्टी की चुनाव समन्वय समिति में राहुल के अलावे अहमद पटेल, जनार्दन, मधुसुदन, जयराम रमेश की धमाचौकड़ी को जगह दी गई  है | इसके अलावे तीन उपसमूह भी बनाए गए हैं जो चुनाव पूर्व गठबंधन, चुनावी घोषणा पत्र से लेकर प्रचार प्रसार तक का काम देखेंगे | गौर करने लायक बात है इस पूरी उपसमिति में भी सोनिया के सलाहकारों की छाप साफ़ देखी जा सकती है क्युकि जहाँ गठबंधन और चुनावी घोषणा पत्र वाला विभाग सोनिया के सबसे भरोसेमंद एंटनी के पास है तो वहीँ प्रचार प्रसार का जिम्मा गाँधी परिवार के सबसे वफादार दिग्गी राजा संभालेंगे | राहुल को आगे करने की अटकले कांग्रेस में लम्बे समय से चल रही थी आखिरकार सूरजकुंड के बाद पार्टी द्वारा लिए गए फैसलों ने एक बात तो साफ़ कर दी है आने वाला लोक सभा चुनाव कांग्रेस मनमोहन के बजाए राहुल गाँधी को प्रोजेक्ट करके लड़ने जा रही है और इस बार की चुनावी बिसात में राहुल गाँधी पार्टी में अहम रोल निभाएंगे क्युकि इस चुनाव में पार्टी के टिकट आवंटन में राहुल गाँधी की ही चलेगी और वही नेता टिकट पाने में कामयाब होगा जो राहुल गाँधी की चुनावी बिसात के खांचे में फिट बैठेगा | ऐसा ना होने की सूरत में कई नेताओ के टिकट कटने का अंदेशा अभी से बनने लगा है |अगले आम चुनाव में कांग्रेस का बड़ा एक चेहरा राहुल ही  होंगे | 
                            
पार्टी में एक बड़ा तबका लम्बे समय से उनको आगे करने की बात कह रहा था | खुद मनमोहन सिंह भी उनसे मंत्रिमंडल में शामिल होने का आग्रह कर चुके थे | हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान भी उम्मीदें लगाई गई राहुल को सरकार या संगठन में एक बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है लेकिन सूरजकुंड में राहुल को बड़ी भूमिका मिलने के बाद अब उन सारी अटकलों पर विराम लग गया है क्युकि राहुल खुद पार्टी को संभालने आगे आये हैं | राहुल गाँधी को कांग्रेस आने वाले लोकसभा चुनाव में उस ट्रंप कार्ड के तौर पर इस्तेमाल करना चाह रही है जो अपनी काबिलियत के बूते देश की युवाओ की एक बड़ी आबादी के वोट का रुख कांग्रेस की ओर मोड़ सके | सूरजकुंड में सोनिया की सहमति से लिया गया यह फैसला पार्टी कार्यकर्ताओ में नए जोश का संचार भले ही कर जाए लेकिन राहुल गाँधी की राह आने वाले दिनों में इतनी आसान भी नहीं है | २००९ के लोक सभा चुनावो में भले ही वह पार्टी के सेनापति रहे थे लेकिन जीत का सेहरा मनमोहन की मनरेगा आरटीआई, किसान कर्ज माफ़ी जैसी योजनाओ के सर ही बंधा था | वहीँ उस दौर को अगर याद करें तो आम युवा वोटर राहुल गाँधी में एक करिश्माई युवा नेता का अक्स देख रहा था जो भारतीयों के एक बड़े मध्यम वर्ग को लुभा रहा था क्युकि वह नेहरु की तर्ज पर भारत की खोज करने पहली बार निकले  जहाँ वह दलितों के घर आलू पूड़ी खाने जाते थे  वहीँ कलावती सरीखी महिला के दर्द को संसद में परमाणु करार की बहस में उजागर करते थे | लेकिन संयोग देखिये राजनीती एक सौ अस्सी डिग्री के मोड़ पर कैसे मुड़ जाती है यह कांग्रेस को अब पता चल रहा है | अभी मनमोहन सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से तो घिरी ही है साथ ही आम आदमी का हाथ कांग्रेस के साथ के नारों की भी हवा निकली हुई है क्युकि महंगाई चरम पर है | सरकार ने घरेलू गैस की सब्सिडी ख़त्म कर दी है जिससे उसका ग्रामीण मतदाता भी नाखुश है और इन सबके बीच राहुल ने पार्टी के सामने नई जिम्मेदारी ऐसे समय में ली है जब बीते चार बरस में मनमोहन सरकार से देश का आम आदमी नाराज हो चला है | वह भ्रष्टाचार से लेकर महंगाई , घरेलू गैस की सब्सिडी खत्म करने के मुद्दे से लेकर तेल की बड़ी कीमतों के साथ ही ऍफ़डीआई के मुद्दे पर सीधे घिर रही है | देश की अर्थव्यवस्था जहाँ इस समय  सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है वहीँ आम आदमी का नारा देने वाली कांग्रेस सरकार से आम आदमी सबसे ज्यादा परेशान है क्युकि उसका चूल्हा इस दौर में नहीं जल पा रहा है | यह सरकार अपने मनमोहनी इकोनोमिक्स द्वारा आम आदमी के बजाए  कारपोरेट घरानों पर दरियादिली ज्यादा  दिखा रही है |
                        

ऐसे निराशाजनक माहौल के बाद भी कांग्रेस इस मुगालते में है राहुल गाँधी को आगे करने से उसके भ्रष्टाचार के आरोप धुल जायेंगे तो यह बेमानी ही है क्युकि यूपीए २ की इस सरकार के  कार्यकाल में उपलब्धियों के तौर पर कोई बड़ा काम इस दौर में नहीं हुआ है | उल्टा कांग्रेस कामनवेल्थ ,२ जी ,कोलगेट जैसे मसलो पर लगातार घिरती जा रही है जिससे उसका इकबाल कमजोर हुआ है | ऊपर से रामदेव , अन्ना के जनांदोलन के प्रति उसका रुख गैर जिम्मेदराना रहा है जिससे जनता में उसके प्रति नाराजगी का भाव है | देश में  मजबूत विपक्ष के गैप को अब केजरीवाल सरीखे लोग भरते नजर आ रहे हैं जो गडकरी से लेकर खुर्शीद तक को उनके संसदीय इलाके फर्रुखाबाद तक में चुनौती दे चुके हैं | ऐसे निराशाजनक माहौल में कांग्रेस के युवराज के सामने पार्टी को मुश्किलों से निकालने की बड़ी चुनौती सामने खड़ी है क्युकि राहुल को आगे करने से कांग्रेस की चार साल में खोयी हुई  साख वापस नहीं आ सकती | दाग तो दाग हैं वह पार्टी का पीछा नहीं छोड़ सकते | ऊपर से  आम आदमी के लिए आर्थिक सुधार इस दौर में कोई मायने  नहीं रखते क्युकि उसके लिए दो जून की  रोजी रोटी ज्यादा महत्वपूर्ण है लेकिन सरकार का ध्यान विदेशी निवेश में लगा है | वह आम आदमी को हाशिये पर रखकर इस दौर में कारपोरेट के ज्यादा करीब नजर आ रही है क्युकि वही सरकार के लिए चुनावो में बिसात बिछा रहा है | ऐसे खराब माहौल में राहुल को बैटिंग करने में दिक्कतें  पेश आ सकती हैं | साथ ही राहुल के सामने उनका अतीत भी है जो वर्तमान में भी उनका पीछा शायद ही छोड़ेगा |ज्यादा समय नहीं बीता जब २००९ में २००  से ज्यादा सीटें लोक सभा चुनावो में जीतने के बाद कांग्रेस का बिहार ,उत्तर प्रदेश, पंजाब,तमिलनाडु  के विधान सभा चुनावो में प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा | उत्तराखंड में लड़खड़ाकर कांग्रेस संभली जरुर लेकिन यहाँ भी भाजपा में  खंडूरी के जलवे के चलते कांग्रेस पूर्ण बहुमत से दूर ही रही | इन जगहों पर राहुल गाँधी ने चुनाव प्रचार की कमान खुद संभाली थी | संगठन भी अपने बजाय राहुल का औरा लिए करिश्मे की सोच रहा था लेकिन लोगो की भीड़ वोटो में तब्दील नहीं हो पाई और चुनाव निपटने के बाद राहुल गाँधी  ने भी उन इलाको का दौरा नहीं किया जहाँ कांग्रेस कमजोर नजर आई | चुनाव  निपटने के बाद संगठन को मजबूत करने की दिशा में कोई प्रयास नहीं किये गए | ऐसे में दूसरी परीक्षा में पास होने की बड़ी चुनौती राहुल के सामने खड़ी है |  
                
                   
    वैसे एक दशक से ज्यादा समय से राजनीती में राहुल को लेकर कांग्रेसी चाटुकार मौजूदा दौर में सबसे ज्यादा आशावान हैं | लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में राहुल का चुनावी प्रबंधन पार्टी के काम नहीं आ सका | एमबीए, एमसीए डिग्रियों से लैस उनकी युवा टीम ने जहाँ  इन्टरनेट की दुनिया में राहुल के लिए माहौल  बनाया वहीँ कांग्रेसी चाटुकारों की टोली ने उन्हें विवादित बयान देने और चुनावी सभा में बाहें ही चढ़ाना सिखाया | अगर वह जनता की नब्ज पकड़ना जानते तो शायद उत्तर प्रदेश के अखाड़े में वह उनसे कम उम्र के अखिलेश यादव से नहीं हारते | एक दशक से भारत की राजनीती में सक्रिय राहुल गाँधी जहाँ पुराने चाटुकारों से घिरे इस दौर में नजर  आते हैं वहीँ उनकी सबसे बड़ी कमी यह है की चुनाव  निपटने के बाद वह उन संसदीय इलाको और विधान सभा के इलाको में फटकना तक पसंद नहीं करते जहाँ कांग्रेस लगातार हारती जा रही है | यही उनकी सबसे बड़ी कमी इस दौर में बन चुकी है वहीँ अगर हम अखिलेश तो देखें तो उत्तर  प्रदेश के चुनावो में वह मीडिया की नज़रों से बिलकुल ओझल रहे लेकिन उन्हें अपने काम पर भरोसा था वह जनता से सीधा संवाद स्थापित करने में कामयाब रहे और जनता ने सपा को इस साल मौका दिया वहीँ कांग्रेस को उसी हाल पर छोड़ दिया जहाँ वह बरसो से उत्तर प्रदेश में खड़ी है | अखिलेश की सबसे बड़ी खूबी यह है वह अच्छे संगठनकर्ता हैं ही साथ ही वह एक एक कार्यकर्ता का नाम तक जानते हैं और उनसे  कभी भी सीधा संवाद आसानी से स्थापित कर लेते हैं | वहीँ राहुल गाँधी को अपने चाटुकारों से फुर्सत मिले तब बात बने | राहुल गाँधी को अगर  आने वाले दिनों में  अपने बूते कांग्रेस को तीसरी बार सत्ता में लाना है तो संगठन की दिशा में मजबूत प्रयास करने होंगे साथ ही कार्यकर्ताओ की भावनाओ का ध्यान रखना होगा क्युकि किसी भी पार्टी की सबसे बड़ी रीड उसका कार्यकर्ता होता है अगर वह ही हाशिये पर रहे तो पार्टी का कुछ नहीं हो सकता | राहुल को उन कार्यकर्ताओ में नया जोश भरना होगा जिसके बूते वह जनता के बीच  जाकर सरकार की नीतियों के बारे में बात कर सकें | उत्तर प्रदेश में अच्छा प्रदर्शन करने की सबसे बड़ी चुनौती राहुल के सामने खड़ी है |
                
       
एक दशक से ज्यादा समय से भारतीय राजनीती में सक्रियता दिखाने वाले राहुल गाँधी ने शुरुवात में कोई पद ग्रहण नहीं किया | उन्होंने बुंदेलखंड के इलाको के साथ बिहार , उड़ीसा ,विदर्भ के इलाको के दौरे किये और जनता के बीच जाकर उनकी समस्याओ को गौर से सुना | इसी दौरान वह उड़ीसा में  पोस्को और नियमागिरी के इलाको में जाकर वेदांता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी कर चुके हैं जिन पर पूरे देश का ध्यान गया | यही नहीं भट्टा परसौल, मुंबई की लोकल ट्रेन से लेकर कलावती के दर्द को उन्होंने बीते एक दशक में करीब से महसूस किया है | लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमी यह रही है वह इन इलाको में एक बार अपनी शक्ल  दिखाने और  मीडिया में सुर्खी बटोरने के लिए जाते जरुर हैं । बाद  में खामोश हो जाते हैं और उन इलाको को उसी हाल पर छोड़ देते हैं जिस हाल पर वह इलाका पहले हुआ  करता था तो उनके  विरोधी भी सवाल उठाने लगते है |

मिसाल के तौर पर विदर्भ के इलाके को लीजिए | बीते एक दशक में साढ़े तीन लाख से ज्यादा किसान आत्महत्याए कर चुके हैं जिसको राहुल अपनी राजनीति से उठाते है | कलावती के दर्द को संसद के पटल पर परमाणु करार के जरिये उकेरते हैं लेकिन उसके बाद कलावती को उसी के हाल पर छोड़ देते हैं | २००५ में अपने पति को खो चुकी कलावती का दर्द आज भी कोई नहीं समझ सकता | न जाने लम्बा समय बीतने के बाद वह कहाँ  गुमनामी के अंधेरो में खो गई | राहुल उसकी सुध इस दौर में लेते नहीं दिखाई दिए जबकि आडवानी की रथ यात्रा के  दौरान २०११ में अक्तूबर के महीने में उसकी बेटी सविता ने  ख़ुदकुशी कर ली वहीँ इसी साल २०१२ में कलावती की छोटी बेटी के पति ने खेत में कीटनाशक दवाई खाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर दी | तब राहुल गाँधी  की तरफ से उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई | जबकि कलावती के जरिये संसद में परमाणु करार पर मनमोहन सरकार ने खूब तालियाँ अपने पहले कार्यकाल में बटोरी थी  जब वाम दलों की घुड़की के आगे हमारे प्रधानमंत्री नहीं झुके | उसके बाद क्या हुआ कलावती अपने देश में बेगानी हो गयी | उत्तर प्रदेश में थकी हुई रीता बहुगुणा जोशी के हाथ कमान दी जो अपने जीवन का एक चुनाव तक नहीं जीत सकी | शुक्र है इस बार के चुनाव में उन्हें हार नहीं मिली |  चुनावो के बाद भीतरघातियो पर कारवाही  तक नहीं हुई और ना ही राहुल  उत्तर प्रदेश के आस पास फटके | यही हाल बिहार में हुआ अकेले चुनाव लड़ने का मन तो बना लिया लेकिन सगठन दुरुस्त नहीं था न कोई चेहरा था जो नीतीश के सामने टक्कर दे सकता था इसी के चलते २०१० के विधान सभा चुनाव में केवल ४ सीट ही हाथ लग सकी | चुनाव निपटने के बाद बिहार को भी वैसा ही छोड़ दिया जैसा उत्तर प्रदेश है | अब ऐसे हालातो में पार्टी का प्रदर्शन कैसे  सुधरेगा यह एक बड़ी पहेली बनता जा रहा है |  राहुल को यह कौन समझाए वोट कोई पेड पर नहीं उगते | उसे पाने के लिए जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है और कार्यकर्ताओ को साथ लेकर चलना पड़ता है जिसमे संगठन एक बड़ी भूमिका अदा करता है | लेकिन राहुल की सबसे बड़ी मुश्किल यही है चुनाव के दौरान ही वह चुनाव प्रचार करने इलाको में नजर आते हैं चुनाव निपटने के बाद उन इलाको से नदारद पाए जाते है |


        

  यू पी ए २ में राहुल के पास अपने को साबित करने की एक बड़ी चुनौती है जिस पर वह अभी तक खरा नहीं उतर पाए हैं | मिसाल के तौर पर अन्ना के आन्दोलन को ही देख लीजिए उस दौरान  सोनिया गाँधी बीमार थी | राहुल को कांग्रेस के बड़े नेताओ के साथ  डिसीजन मेकिंग की कमान दी गई थी लेकिन अन्ना के आन्दोलन पर उनकी एक भी प्रतिक्रिया नहीं आई | यही नहीं जनलोकपाल  जैसे अहम  मसलो पर वह उनकी पार्टी का स्टैंड सही से सामने नहीं रख पाए | वह इस पूरे दूसरे कार्यकाल में संसद से नदारद पाए गए है | सदन में कोई बड़ा बयान उनके द्वारा जहाँ नहीं दिया गया वहीँ किसानो की आत्महत्या, महंगाई, ऍफ़डीआई ,गैस सब्सिडी खत्म करने  जैसे मसलो पर उनका कोई बयान मीडिया में नहीं आया  है जो सीधे आम आदमी से जुड़े मुद्दे हैं | यही नहीं भ्रष्टाचार के मसले पर भी वह ख़ामोशी की चादर ओढे बैठे रहे | वाड्रा डीएलएफ  के गठजोड़ पर भी उनकी चुप्पी ने कई सवालों को जन्म तो दिया ही साथ ही कांग्रेस पार्टी द्वारा हाल ही में अपनी पार्टी के कोष से नैशनल हेराल्ड को दिए गए ९०००० करोड़ रुपये के चंदे पर भी राहुल ने खामोश रहना मुनासिब समझा | हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में ऐसे लोगो का कद बढ़ाया गया  जिन पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगे | लेकिन राहुल ने उस पर भी कुछ नहीं कहा | राहुल की भूमिका को लेकर सवाल उठने लाजमी ही हैं | अब समय आ गया है जब उनको देश से और आम जनता से जुड़े मुद्दे सामने लाने से नहीं डरना होगा तभी बात बनेगी | नहीं तो अभी के हालत कांग्रेस के लिए बहुत अच्छे नजर नहीं आते | वर्तमान में पार्टी जहाँ उत्तर प्रदेश और बिहार सरीखे बड़े राज्यों में ढलान पर है वहीँ मध्य प्रदेश , गुजरात  पंजाब, हिमाचल , उत्तराखंड , छत्तीसगढ़ में उसकी हालत बहुत पतली है |  औरंगजेब की बीजापुर और गोलकुंडा विजय ने दक्षिण में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना का रास्ता खोला था लेकिन यहाँ पर कांग्रेस पतली हालत में है | सबसे ज्यादा हालत आन्ध्र में है जहाँ जगन मोहन रेड्डी आने वाले विधान सभा चुनावो में मजबूत खिलाडी बनकर उभरेंगे इसके आसार अभी से नजर आने लगे हैं | देश  की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के हालत भी कांग्रेस  जैसे ही हैं | चोर चोर मौसरे भाई जुगलबंदी दोनों पर सटीक बैठ रही है | गडकरी पर लग रहे भ्रष्टाचार के दाग भाजपा की साख ख़राब कर रहे हैं साथ ही भ्रष्टाचार के खिलाफ भाजपा की लड़ाई कमजोर नजर आने लगी है | ऐसे में रास्ता इन दोनों दलों से इतर तीसरे मोर्चे की तरफ जा रहा है जहाँ पर अपने अपने राज्यों के छत्रप मजबूत स्थिति में जाते दिख रहे है जिससे भाजपा और कांग्रेस दोनों की सत्ता में आने  की सम्भावनाए  धुंधली होती दिखाई दे रही है | ऐसे में राहुल को कांग्रेस के लिए रास्ता तैयार करने में मुश्किलें पेश आ सकती हैं                                       
               


 वैसे असल परीक्षा तो आने वाले दिनों में हो रहे संसद सत्र के दौरान कांग्रेस को उठानी पड़ सकती है जब विपक्ष के भारी विरोध का सामना उसे करना पड़ेगा | ममता कांग्रेस से समर्थन वापस ले चुकी हैं ऐसे में वह यूपीए  के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने  का मन बना रही है | सभी दल अभी इस पर अपने पत्ते नहीं खोल रहे है | अगर कांग्रेस की मुश्किल विपक्षी बढ़ाते हैं तो यह भी तय है आम चुनाव जल्दी हो जायेंगे | ऐसे में कांग्रेस जल्द चुनाव का ठीकरा भाजपा  के सर फोड़कर चुनावी लाभ लेना चाहेगी | वैसे इस बात की सम्भावना अभी कम ही नजर आ रही है क्युकि कांग्रेस के भूमि अधिग्रहण कानून और खाद्य सुरक्षा कानून जैसी योजनाये अभी अधर में लटकी है | नए रोजगार पैदा नहीं हो रहे | देश में निवेश की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है क्युकि  २ जी  और घोटालो की आंच से कॉर्पोरेट सहमा हुआ है | जाहिर है ऐसे माहौल में कांग्रेस जल्द चुनाव का जुआ नहीं खेलना चाहेगी | उसकी कोशिश मनमोहनी इकोनोमिक्स की छाव तले आम आदमी के हित में कई कदम उठाने की होगी जिसको वह चुनाव में लोगो के बीच जाकर भुना सके और खुद को आम आदमी का हितैषी बता सके | ऐसे में उसका सबसे बड़ा खेवनहार वही गाँधी परिवार बना रहेगा जिसके बूते वह लम्बे समय से भारतीय राजनीती में छाई है और यही राहुल गाँधी का औरा उसे चुनावी मुकाबले में भाजपा के बराबर खड़ा कर सकता है क्युकि सोनिया का स्वास्थ्य सही नहीं है | मनमोहन के आलावे कोई चेहरा पार्टी में ऐसा इस दौर में बचा नहीं है जो भीड़ खींच सके और लोगो की नब्ज पकड़ना जाने | जाहिर है रास्ता ऐसे में उसी गाँधी परिवार पर जा टिकता है  जिसके नाम पर पार्टी इतने वर्षो  से एकजुट नजर आई है और यही औरा गाँधी परिवार की पांचवी पीड़ी में पार्टी के कार्यकर्ताओ को राहुल गाँधी के रूप में नजर आता है जो उसमे  नेहरु से लेकर इंदिरा और राजीव तक का अक्स देखते हैं |  शायद इसके मर्म को सोनिया भी बखूबी  समझ रही हैं तभी कांग्रेस राहुल की राह वाली ढाई चाल चलती इस दौर में दिख रही है |