गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

बंद दरवाजो के बीच 'तेलंगाना' की दस्तक


आखिरकार  तेलंगाना बिल पास तो हो  गया  लेकिन इसके लिए जिन तौर तरीको का  यू पी ए  के फ्लोर मैनेजरों ने इस्तेमाल किया उसने  इमरजेंसी के  दिनों की  यादें  ताजा करा दी क्युकि  बिल पास कराने के लिए  संसद को देश की नजरों से छिपा दिया गया जहां  बंद  दरवाजो के साथ ही टीवी कैमरों को बंद करके सदन के घटनाक्रम का  प्रसारण रोक दिया गया। देश की जनता   को बिल के पास होने की खबर तब  मिली जब टीवी पर लाल  अबीर -गुलाल में डूबे तेलंगाना समर्थकों की जश्न मनाती भीड़ टी वी स्क्रीन में  नजर  आने लगी । तेलंगाना पर संसद में विरोध  के  जो तरीके बीते दिनों   दिखायी दिए उसने तेलंगाना   की  डगर  को  मुश्किल बना  दिया था । राह  भयानक  उस  समय हो गई जब  सरकार के मंत्री, सांसद  विरोध करते हुए स्पीकर के आसन तक पहुंच गए और  विरोध में मिर्च पाउडर  से लेकर  चाक़ू लहराना शुरू कर  दिया    जिससे   दुनिया  के  सबसे  बड़े लोकतान्त्रिक देश की महिमा तार तार हो गयी  इसके  बाद  देश के 29वें राज्य तेलंगाना के गठन की प्रक्रिया  उस समय  आगे  बढ़ी  जब  भाजपा के सहयोग से सीमांध्र क्षेत्र के सांसदों के कड़े  विरोध के बीच तेलंगाना  की  नई  राह  खुल गई । आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक 2014 लंबे समय से अटका हुआ था। भारी हंगामे  और लोकतंत्र के  मंदिर की  कार्यवाही का सीधा प्रसारण न होने के दौरान लोकसभा ने  आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक ध्वनिमत से पारित कर दिया। लोकसभा में विधेयक पर मत विभाजन के दौरान तेलंगाना का विरोध कर रहे आंध्र प्रदेश के सांसदों और कुछ विपक्षी पार्टियों ने अपना विरोध जताया। इसके बावजूद सदन में आंध्र प्रदेश पुनर्गठन विधेयक ध्वनिमत से पारित हो गया। दरअसल  2014 की चुनावी बेला सामने आने से पहले काँग्रेस तेलंगाना के  चक्रव्यूह मे इस कदर उलझती जा रही थी  जिससे पार पाना उसके लिए आसान नहीं दिखाई दे रहा  था लेकिन   दस जनपथ ने  आगामी लोक सभा  चुनावो के मद्देनजर काँग्रेस के एक तबके मे तेलंगाना को लेकर एक खास तरह की पशोपेश की  स्थिति  पैदा  कर  दी  थी  जिसमे  एक तबका तेलंगाना को साख ऊपर उठाने के लिए कारगर मुद्दे के तौर पर देख रहा था  लेकिन मौजूदा दौर मे काँग्रेस की  असल मुश्किल 2014 मे अपनी तीसरी बार केंद्र मे सरकार बनाना और  विभाजित आंध्र की सत्ता मे फिर वापसी करना है वह भी उन परिस्थितियो मे जब उपलब्धियों के  नाम पर बीते साढ़े   चार बरस  ज्यादा समय  में  उसके पास कहने को कुछ नहीं बचा है |ऐसे मे काँग्रेस की  वार रूम पॉलिटिक्स के कर्ता धर्ताओ का मानना रहा , काँग्रेस को दक्षिण दुर्ग को बचाने की रणनीति पर काम करने की अभी  जरूरत है जिसमे आंध्र प्रदेश उसके सामने बड़ी चुनौती   है | 


पिछली बार के  लोक सभा चुनावो मे काँग्रेस ने राजशेखर रेड्डी की अगुवाई मे आशातीत सफलता पायी थी लेकिन इस बार  जगन मोहन रेड्डी की बगावत ने काँग्रेस को बैकफुट पर जाने को मजबूर कर दिया है |परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं और तेलंगाना अब काँग्रेस की  एक दुखती रग बन चुका था  क्युकि बीते दौर मे इस मसले मे काँग्रेस के  साथ सभी दलो ने न केवल राजनीतिक रोटियाँ सेकी  बल्कि अवसरवाद का लाभ तेलंगाना राष्ट्रीय समिति  सरीखी पार्टियो ने लेने की पूरी कोशिश भी की  और अब वही काँग्रेस काफी माथापच्चीसी के बाद  तेलंगाना को  लोकतंत्र के  सबसे  मंदिर की बंद चहार दीवारियों में कैद कर  हरी  झंडी दे डाली ।  कांग्रेस   यह  सब  कर  आन्ध्र  के एक   हिस्से मे अपना जनाधार बचाने मे लग गई है | वही पहली बार दस जनपथ की अगुवाई मे राहुल गांधी की अगुवाई मे दक्षिण दुर्ग को बचाने की  उस रणनीति पर  काम  कर   रही है ताकि आने वाले दिनो मे लोक सभा चुनावो मे  तेलंगाना से अच्छी सीटें लाकर दक्षिण  में  बिसात बिछाई जा सके | इसकी झलक चिरंजीवी की प्रजा राज्यम के काँग्रेस मे विलय से समझी जा सकती है | वहीं काँग्रेस के बागी जगनमोहन रेड्डी काँग्रेस की मुश्किलों को राज्य मे लगातार बढ़ाते  ही जा रहे हैं जिसके चलते चुनावी साल मे काँग्रेस की चिंताएँ बढ़नी लाज़मी है | बीते दिनों जब दस जनपथ तेलंगाना पर मंथन के लिए काँग्रेस के कोर ग्रुप के साथ मंथन कर रहा था तो एकबारगी लगा कि जल्द ही काँग्रेस तेलंगाना पर बड़ी घोषणा का पिटारा खोल सकती है लेकिन यह मुद्दा एक बार फिर ठंडा चला  गया  | काँग्रेस के रणनीतिकारों को लगने लगा  कि अगर तेलंगाना बन  गया तो इससे काँग्रेस फायदे  मे ही रहेगी क्यूकि इसके बनने का सीधा लाभ वह  खुद   उठा सकती  है शायद इसी नब्ज  को  सोनिया ने अपने अंदाज में पकड़ा और आंध्र के एक हिस्से में कांग्रेस के सत्ता समीकरणों को बरकरार रखा ।  वहीं तेलंगाना को छोड़कर पूरे सीमांध्र  में  इस समय जगन मोहन रेड्डी की तूती जिस तरह बोल रही है उसने पहली बार काँग्रेस की सियासतदानों की हवा एक तरह से निकाली हुई है जहां आने वाले दिनों मे वाई एस आर काँग्रेस , काँग्रेस को तगड़ी चुनौती देती नजर अगर आती है तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्युकि बीते  दौर  के उप  चुनावो  मे उसने काँग्रेस की हवा सही मायनों मे निकालकर 2014 के चुनावो से पहले अपने बुलंद इरादे जता दिये हैं | ऐसे मे काँग्रेस उस दक्षिण के दुर्ग मे पहली बार हाँफ रही है जहां कभी राजशेखर रेड्डी के करिश्मे से उसने ना केवल सत्ता पायी बल्कि आन्ध्र  की राजनीति मे अपनी ठसक से चंद्रबाबू नायडू की टी डी पी सरीखी पार्टियो के जनाधार को सीधा नुकसान पहुंचाया | 
    
1948 में भारत के इस हिस्से में निजाम के शासन का अंत हुआ और हैदराबाद राज्य का गठन किया गया। 1956 में हैदराबाद का हिस्सा रहे तेलंगाना को नवगठित आंध्रप्रदेश में मिला दिया गया। निजाम के शासनाधीन रहे कुछ हिस्से कर्नाटक और महाराष्ट्र में मिला दिए गए। भाषा के आधार पर गठित होने वाला आंध्रप्रदेश पहला राज्य था। चालीस के दशक में कामरेड वासुपुन्यया की  अगुआई में कम्युनिस्टों ने पृथक तेलंगाना की मुहिम की शुरुआत की थी। उस दौर को याद करें तो  आंदोलन का उद्देश्य भूमिहीनों कों भूपति बनाना था। छह वर्षों तक यह आंदोलन चला लेकिन बाद में इसकी  कमान नक्सलवादियों के हाथ में आ गई।शुरुआत में तेलंगाना को लेकर छात्रों ने आंदोलन शुरू किया था,लेकिन बाद में  इसमें लोगों की भागीदारी ने इसे ऐतिहासिक बना दिया। इस आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग और लाठीचार्ज में साढ़े तीन सौ से अधिक छात्र मारे गए थे। उस्मानिया विश्वविद्यालय इस आंदोलन का केंद्र था। उस  दौर में एम. चेन्ना रेड्डी ने 'जय तेलंगाना' का नारा उछाला था ।  बाद में उन्होंने अपनी पार्टी तेलंगाना प्रजा राज्यम पार्टी का कांग्रेस में विलय कर दिया। इससे आंदोलन को भारी झटका लगा। इसके बाद इंदिरा गांधी ने उन्हें मुख्यमंत्री बना दिया था। 1971 में नरसिंह राव को भी आंध्रप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया था, क्योंकि वे तेलंगाना क्षेत्र के थे।जिस क्षेत्र को तेलंगाना कहा जाता है  उसमें आंध्रप्रदेश के 23 जिलों में से 10 जिले आते हैं। मूल रूप से ये निजाम की हैदराबाद रियासत का हिस्सा था। इस क्षेत्र से आंध्रप्रदेश की 294 में से 119 विधानसभा सीटें आती हैं। आंध्र की 42 में  से 17 लोकसभा सीटे तेलंगाना की है। नब्बे के दशक में के. चंद्रशेखर राव तेलुगूदेशम पार्टी का हिस्सा हुआ करते थे। 1999 के चुनावों के बाद चंद्रशेखर राव को उम्मीद थी कि उन्हें मंत्री बनाया जाएगा  लेकिन उन्हें डिप्टी स्पीकर बनाया गया।वर्ष 2001 में उन्होंने पृथक तेलंगाना का मुद्दा उठाते हुए तेलुगूदेशम पार्टी छोड़ दी और तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन कर दिया। 2004 में वाईएस राजशेखर रेड्डी ने चंद्रशेखर राव से हाथ मिला लिया और पृथक तेलंगाना राज्य का वादा किया। लेकिन बाद में उन्होंने इस पर ध्यान नहीं दिया। इसके बाद तेलंगाना राष्ट्र समिति के विधायकों ने इस्तीफा दे दिया और चंद्रशेखर राव ने भी केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था इसके बाद  से  तेलंगाना  को लेकर नयी  किस्सागोई आयोगो के आसरे चलती रही । 



दरअसल आन्ध्र प्रदेश  मे तेलंगाना का मसला कोई नया नहीं है | यह मांग राज्य पुनर्गठन आयोग के दौर 1956 से चली आ रही है | 1969 मे एम चेन्ना रेड्डी के नेतृत्व मे मुल्कीरूल आन्दोलन मे अलग तेलंगाना को नई चिंगारी दी गई  लेकिन गौर करने लायक बात यह है ब्रिटिश शासन के दौर मे तेलंगाना कभी अंग्रेज़ो के सीधे नियंत्रण मे नहीं रहा | कुतुबशाही और मुगलिया सल्तनत के दौर के बाद शाही रजवाड़े के निजाम ने अपना राज यहाँ कायम किया |निजाम ने अंग्रेज़ो की  सत्ता तो स्वीकार कर वहाँ तेलंगाना मे अपना सिक्का गाड़े रखा | ब्रिटिश शासन के दौर मे रॉयल सीमा व आन्ध्र  इलाके मद्रास प्रेसीडेंसी मे आते थे मगर आजादी के बाद पो श्रीराम मुलु  की अगुवाई मे संयुक्त आन्ध्र का  बड़ा आंदोलन चला | मद्रास प्रेसीडेंसी और तेलंगाना के निजाम ने हैदराबाद  के इलाको को एक ही राज्य मे भाषाई एकता के सुर मे तेलगु आधार बनाने का रास्ता आन्ध्र प्रदेश के रूप मे साफ किया | उस दौर मे तेलंगाना हैदराबाद के निजाम की रियासत का एक हिस्सा रहा था और मुल्की नाम से जाना जाता था | शेष दो हिस्से मद्रास प्रेसीडेंसी के अंदर आते थे  | वर्तमान मे आन्ध्र को  तीन हिस्सो मे बांटा जा सकता है | पहला इलाका तटवर्ती आन्ध्र , दूसरा रॉयल सीमा और तीसरा तेलंगाना है | तेलंगाना के जिस इलाके के लिए पिछले कुछ समय से आंदोलन चल रहा है उसमे आन्ध्र  के दस जिले शामिल हैं | सदियो से राजशाही के सीधे नियंत्रण मे रहने के चलते यह इलाका काफी पिछड़ा है | राज्य की तकरीबन 40 फीसदी आबादी तेलंगाना से आती है लेकिन यहाँ पर विकास  की बयार हाइटेक हैदराबाद सरीखी नहीं बही है जिसके चलते लोग उपेक्षित हैं और अलग राज्य  का सपना कई बरस से न केवल देख रहे हैं बल्कि के सी आर को  भी इस दौर मे अपना नया  मसीहा मान चुके थे  जो सड़क से लेकर संसद तक ना केवल अलग राज्य का राग अलाप रहे थे  बल्कि आन्ध्र प्रदेश  मे काँग्रेस और भाजपा की मुश्किलों को भी बड़ा रहे हैं | 


निजाम वाले दौर मे भी तेलंगाना के प्राकृतिक संसाधनो का खूब दोहन हुआ और आज भी कमोवेश वैसे ही हालत हैं | राज्य के पचास फीसदी जंगल तेलंगाना मे पाये जाते हैं साथ ही यहाँ प्रचुर मात्रा मे प्राकृतिक संसाधन भी शायद यही वजह है लाइमस्टोन की प्रचुरता इस इलाके को सीमेंट उद्योग का बादशाह बनाती हैं  तो वहीँ बाक्साइट उद्योग  भी सरताज । तेलंगाना से इतर तटवर्ती आन्ध्र  मे न केवल कारपोरेट घरानो ने बीते दशको मे बड़ा निवेश किया बल्कि  हैदराबाद सरीखे इलाके को देश के हाई टेक शहरो मे शामिल कर लिया | हैदराबाद की चमचमाहट देखकर आप सहज अनुमान लगा सकते हैं बीते दौर मे तेलंगाना विकास की दौड़ मे किस कदर पिछड़ गया होगा | शायद यही वजह थी आंध्र मे के सी आर अनशन कर और आंदोलन के रास्ते काँग्रेस के होश फाख्ता करते रहे और काँग्रेस भी बार बार आश्वासनों का  ही झुनझुना थमाकर उन्हे मनाती रही | लेकिन के सी आर नहीं माने और दो साल के भीतर उन्होने काँग्रेस गठबंधन से अलग होने का फैसला कर लिया | आन्ध्र प्रदेश मे मौजूदा संकट  ऐसा हो गया  था  कि तेलंगाना पर हर कोई आर पार की लड़ाई सीधे लड़ रहा था  जिसमे खुद  काँग्रेस के  सी एम किरण  रेड्डी और  कई विधायक भी शामिल थे  |  यही नहीं इस  मसले पर कई विधायक भी अब भी  सीधे इस्तीफ़ों के जरिये केन्द्र सरकार को सीधे ललकार रहे हैं तो वहीं   तेलंगाना विभाजन से नाराज आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी ने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता भी त्याग दी है।  माना जा रहा है कि किरण कुमार रेड्डी अब नई पार्टी का गठन कर सकते हैं।  भाजपा भी  नई कदमताल तेलंगाना को लेकर पहली बार  कांग्रेस  के   साथ  मिलकर कर रही है क्युकि जल्द ही चुनावी डुगडुगी बजनी है और जनता के सामने जाकर इस मसले पर वोट पाये जा सकते हैं | जबकि अटल बिहारी वाले दौर मे यही दोनों पार्टी  तेलंगाना नहीं बना सकी जबकि उस दौर से  भाजपा अपने को छोटे राज्यो का बड़ा हितेषी साबित करती रही है  | 


दरअसल नए राज्य के बारे मे काँग्रेस की नीति मे बड़ा खोट शुरुवात से देखा जा सकता है | भाषायी आधार पर राज्य की मांग को काँग्रेस ने उठाया जरूर लेकिन 1937 मे ठसक के साथ काँग्रेस जब सत्ता मे आई तो पार्टी ने भाषाई मांग को दोहरा दिया | 1953 मे पहली बार जब भारत सरकार ने फजल के नेतृत्व मे पहला राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया तो नेहरू ने ही   उसकी रिपोर्ट को ठंडे बस्ते मे डाला | राममुलु के त्यागपत्र के बाद आन्ध्र प्रदेश का गठन हुआ तो उसमे  तेलंगाना के लोग शामिल होने को तैयार नहीं हुए परन्तु सरकार ने वहाँ के लोगो को भरोसा दिया तेलंगाना पर विशेष ध्यान उसके द्वारा दिया जाएगा पर ऐसा हुआ नहीं | पूरा ध्यान तो तटीय आन्ध्र  और रॉयल सीमा मे दिया गया जहां विकास की नयी बयार चल निकली |  तेलंगाना के  नेताओ ने  भी  अपने स्वार्थो  के कारण किसी भी दल के साथ जाने से परहेज नहीं किया  | मसलन के सी आर को ली लें तो वो कभी टी डी पी का दामन थामे थे | 2001 मे उन्होने चन्द्रबाबू नायडू  को अलविदा कहा क्युकि नायडू ने उनको मंत्री बनाने से साफ इंकार कर दिया था  जिसके बाद उन्होने तेलंगाना के सरोकारों की अलख जगाने के लिए टी आर एस बनाई | चुनावी साल मे केंद्र और राज्य मे सत्ता की मलाई खाई | 2004 मे काँग्रेस की कृपा से केंद्र मे मंत्री भी बने लेकिन 2006 मे ही तेलंगाना के मसले पर काँग्रेस से नाता तोड़ दिया |  2006 मे काँग्रेस से दूरी बनाकर अपनी खुद की बनाई लीक पर चल निकले लेकिन तेलंगाना के मसले पर उनकी सीटो  मे कुछ खास इजाफा नहीं देखा गया | बाद मे काँग्रेस ने श्रीकृष्णन आयोग की रिपोर्ट बनाकर मामले को ना केवल लटकाया बल्कि तेलंगाना के  मसले से ही पल्ला झाड़ने मे कोई हिचक नहीं दिखाई | गृह मंत्रालय ने कभी भी इस मसले पर कोई सीधे बयान नहीं दिया | यहाँ पर सबसे बड़ी मुश्किल हैदराबाद को लेकर उभरी क्युकि तटीय आन्ध्र के कई नेताओ ने यहाँ  भारी निवेश किया बल्कि कारपोरेट घरानो ने भी अपने अनुकूल बिसात बिछाने मे सफलता हासिल की | ऐसे लोग इसे केंद्र शासित प्रदेश घोषित करने की मांग दोहराते रहे | 

आन्ध्र की राजनीति मे 294 विधान सभा सीटो मे से 119 सीटें तेलंगाना , 175 रायल सीमा और तटीय आन्ध्र की हैं | यही नहीं लोक सभा की 17 सीटें तेलंगाना से हैं और 25 सीटें शेष आन्ध्र से आती हैं | तेलंगाना के फैसले से एक बात साफ है कि कांग्रेस यह  मान  रही है सीमांध्र  में  उसको  जो भारी  नुकसान  होने  जा  रहा   है उसकी बड़ी  भरपाई तेलंगाना कर देगा ।   कांग्रेस ने 2009 में तेलंगाना में 12 सीटें जीती थीं और पूरे आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को 33 सीटें मिली थीं लेकिन यह वाइएसआर का करिश्मा था  क्युकि  इसी  वाइ एसआर फैक्टर  ने कांग्रेस का ग्राफ दक्षिण में चढ़ाया था लेकिन अबकी  बार   आंध्र प्रदेश की राजनीती  काफी बदल चुकी है।   मुख्य रूप से पूरे आंध्र मे काँग्रेस को सबसे ज्यादा चुनौती अगर आने वाले समय मे कोई देने जा रहा है तो वह जगन मोहन रेड्डी ही हैं और बड़े पैमाने पर काँग्रेस के  विधायक इस समय  तेलंगाना  पर आलाकमान  से नाराज चल रहे हैं | आने वाले दिनो मे इस बात की पूरी संभावना है चुनाव पास आने पर इनमे से कुछ लोग अलग पार्टी में  पाला बदल सकते हैं | वहीं दूसरी तरफ तेलंगाना  का  सीधा लाभ के सी आर और कांग्रेस   पार्टी  को मिलना है साथ ही भाजपा  भी मुकाबले में  खुद  को  ला  रही है।  




 आन्ध्र  के  अखाड़े मे अब तेलगु देशम पार्टी की स्थिति भी इस चुनाव मे करो या मारो वाली हो गयी है क्युकि एन डी ए मे जाने के बाद चंद्रबाबू का मुस्लिम वोट उनके हाथ से छिटका है जिसकी भरपाई करना इतना आसान नहीं है | हालांकि भाजपा आन्ध्र मे काँग्रेस को पटखनी देने के  लिए जगन मोहन रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू से समझौता  करने का मन बना रही है लेकिन कम से कम जैसे हालात  हैं उसको देखते हुए हमें नहीं लगता फिलहाल आन्ध्र प्रदेश  मे टीडी पी किसी बड़े दल के  साथ कोई समझौता  करने जा रही है | आंध्र की तकरीबन 32 फीसदी मुस्लिम  आबादी मे से 22 फीसदी वोट अकेले तेलंगाना से आते हैं जहां पर चन्द्रबाबू की कोशिश के सी आर की पार्टी के वोट बैंक मे सैंध लगाने की बन चुकी है | ऐसे मे फिलहाल काँग्रेस को सीधी लड़ाई जगन मोहन रेड्डी से लड़नी है |  काँग्रेस मान रही है के सी आर और चंद्रबाबू मुस्लिम वोट मे सैंध लगाएंगे जिससे वह अपने पुराने वोट के  आसरे सीटें  बढ़ा ले जाएगी | मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी भी अब दस जनपथ के फैसले को चुनौती   देने  मे लगे हैं |  

काँग्रेस के आंकलन  और सर्वे रिपोर्टों का आधार क्या है यह तो उनके नेता ही जाने लेकिन फिलहाल आन्ध्र मे काँग्रेस को नेस्तनाबूद करने की रणनीति विपक्षी दल  बना रहे हैं | उनकी कोशिश है आगामी चुनावो मे काँग्रेस को रोकने के  लिए  राज्य मे एक मोर्चा बनाया जाये जहां आकार सभी काँग्रेस  के सामने मुश्किल खड़ी करें लेकिन विपक्षी  दल भी अपने नफे नुकसान के अनुरूप  बिसात बिछा रहे हैं | पुराने अनुभव के  आधार पर फिलहाल टी डी पी भाजपा मे कोई खिचड़ी पक रही  है वहीं वाई एस आर काँग्रेस के  कांग्रेस से समझौते के  आसार कतई  नहीं हैं | मौजूदा आन्ध्र  की राजनीति का सच यह है यहाँ जगन अपने को काँग्रेस से बड़ा खिलाड़ी साबित करने के  मूड मे दिख रहे हैं तो वहीं भाजपा कर्नाटक मे कमल खिलाने के बाद आन्ध्र प्रदेश  मे अपनी संभावनाएँ टटोल रही है और तेलंगाना  से  खाता खोलने की जुगत मे है | लेकिन जिन हालात में तेलंगाना  बिल लोकसभा में पास हुआ है उसमें यकीनन बीजेपी की भी  अंदरखाने  बड़ी सहमति रही है  क्योंकि उसके समर्थन के बिना  तेलंगाना  की राह  आसान  नहीं  बनती । 


अब  बड़ा सवाल तेलंगाना  के  लिए हरी झंडी  दिए  जाने  के उस  तरीके का है जो इस पूरे घटनाक्रम में देश को दिखा है। आंध्र प्रदेश को दो हिस्सों में बांटने के पीछे तर्क था कि छोटे राज्यों का प्रशासन , विकास  बेहतर तरीके से हो सकता है लेकिन तेलंगाना  की मांग आधी सदी से चली आ रही थी।  इतने संवेदनशील मसले को चुनावी  छटपटाहट  में कांग्रेस ने   जिस तरह संसद की मर्यादा  का कर उसे  राजनीतिक रंग  दिया और जिस तरह अपनी पार्टी के विधायको , सांसदो की मांगो को अनसुना किया उसने केंद्र की जिद  को सबके  सामने उजागर कर दिया । बड़ा सवाल  तो उस वायदे को लेकर भी हैं  जो 2004  में  किये  गए  थे और दस बरस  बाद चुनावी साल में उसे पूरा करने की  याद उसे आयी  । एक दशक में मनमोहन  सरकार  की  छवि  जिस तरीके  से तार  तार  गई हो उसमे तेलंगाना का हालिया उदाहरण भी सामने खड़ा है जहाँ जनभावनाओ  को दरकिनार  कर  चुनावी लाभ लेने की ऐसी नई  मिसाल   आज तक देखने को  नहीं मिलती ।  अब यक्ष  प्रश्न  है कि क्या इससे कांग्रेस को  किसी  तरह  का राजनीतिक लाभ मिलने जा  है ।  देखना होगा आने वाले समय  मे तेलंगाना मसले पर सीमांध्र और तेलंगाना  की राजनीती  चुनाव में किस  करवट  बैठती है ? 

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

पहाड़ के अग्निपथ पर हरीश रावत

 
12 बरस पहले लिए गए एक इंटरव्यू  में मैंने  हरीश चन्द्र सिंह  रावत से जब  यह सवाल  पूछा  था क्या  सत्ता राजयोग से मिलती है ? क्या आपकी  कुंडली में  राजयोग  नहीं है  तो  जवाब में हरीश रावत सकपकाये नहीं बल्कि अपनी  मंद मुस्कराहट के  साथ  उन्होंने जवाब हाँ  में दिया । उन्होंने मेरी तरफ देखते हुए कहा" मैं कांग्रेस का सच्चा समर्पित   सिपाही हूँ ।  पुजारी का काम देवता  को पूजना  है।  अब यह  देवता का काम है क़ि वह फल देता है या नहीं "? इसी दौर में नारायण दत्त  तिवारी  को राज्य  की पहली निर्वाचित  सरकार  का मुखिया बनाया  गया था और  इन सबके  बीच  यह  पहला  मौका था जब हरीश रावत  के हाथ सी एम की  कुर्सी आते आते  फिसल  गयी  जबकि  राज्य  में कांग्रेस  का सांगठनिक ढांचा  मजबूत  बनाने और  ग्राम   स्तर तक  पार्टी को खुद उन्होंने ही  अपने बूते  खड़ा किया   । इस दौर में  एनडी तिवारी  और हरीश रावत के  बीच खूब  शीत  युद्ध  देखने  को मिला ।  दूसरी  बार  जब हरीश  रावत  इंटरव्य़ू  के दौरान  मेरे  सामने थे  तो  मैंने  पूछा  रावत जी  एनडी तिवारी और आपके बीच छत्तीस का आंकड़ा जगजाहिर है । यह शीत युद्ध है या मुख्यमंत्री पद  ना पाने की कसक ? इस बार भी हरीश  रावत   ने   मुस्कराहट  भरे अंदाज  में जवाब दिया और कहा मेरे और  नारायण  दत्त  तिवारी जी के बीच  वही  आंकड़ा है जो भाजपा में अटल बिहारी  वाजपेयी और  लाल कृष्ण आडवाणी के बीच है   ।
                  

 ऊपर के ये चंद  संवाद  बानगी  भर है जो उत्तराखंड में हरीश रावत का औरा   उनकी साफ़गोई और करिश्मे को बतलाने के साथ ही मुख्यमंत्री पद ना  पाने की कसक उजागर  करते हैं तब एन डी  तिवारी  ने राज्य के  पहले  निर्वाचित मुख्य मंत्री  की शपथ  ली थी   लेकिन 2012  में जब एक बार फिर से कांग्रेस को उत्तराखंड  में  सरकार बनाने का मौका मिला तो हरीश रावत ही मुख्यमंत्री बनने की दौड़ में सबसे आगे थे। 3,  मूर्ति लेन दिल्ली में समाचार  चैनलों  पर टकटकी  लगाये बैठे उनके  हजारों समर्थको   को इस बार  पूरा विश्वास था कि  कांग्रेस आलाकमान रावत के साथ अन्याय नहीं करेगा लेकिन विजय बहुगुणा को पैराशूट  मुख्यमंत्री के रूप में लैण्ड करवाकर दस जनपथ ने  उस दौर में सभी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। लेकिन  संयोग  देखिये  देवभूमि के राजपथ में  12  बरस के वनवास के बाद हाई कमान ने डेमेज कन्ट्रोल के लिए तुरूप के इक्के के  रूप में  हरीश रावत को  आगे  क्या किया झटके  में हरीश  रावत की इंट्री ने उत्तराखंड  में कांग्रेस को   लोक सभा  चुनावो  का  बिगुल  बजने से पहले  भाजपा के सामने   मुकाबले  में लाकर  खड़ा कर दिया । 

 आज  अगर हरीश रावत की ताजपोशी से पूरे उत्तराखंड  में जश्न है तो इसका कारण  उनका ऐसा  जनप्रिय नेता होना है जिसे  लोग पहाड़ के  जनसरोकारों से  जुड़ाव रखने वाले नेता के तौर पर देखते रहे  हैं  । खांटी कांग्रेसी नेता के तौर पर हरीश की  यही  पहचान  उन्हें अन्य नेताओ से अलग बनाती  है  लेकिन रावत के सामने बड़ी चुनौतियों का पहाड़  सामने खड़ा है  जिससे पार  चुनौती   इस  चुनावी बरस  में है क्युकि इस दौर में कांग्रेस के सितारे  गर्दिश  में  हैं  और वह लगातार फिसलन  की  राह पर है । लेकिन  लम्बी रस्साकस्सी  के बाद हरीश रावत उत्तराखण्ड के आठवें  मुख्यमंत्री  तो बन ही गए हैं । जमीनी राजनीति से निकले हरीश रावत   ऐसे खांटी राजनेता हैं जिनका उत्तराखण्ड के हर  इलाके  में व्यापक जनाधार है। अतीत  में  भले  ही रावत दो बार सी एम  की कुर्सी पाने से चूक गये हों लेकिन  इस  बार अपनी बिछायी  बिसात में उन्होंने  विरोधियों  चारो खाने चित  कर दिया । विजय  बहुगुणा ने हरीश रावत की राह रोकने के लिए  रेड कार्पेट का हर दाव चला लेकिन उनको अभयदान  नहीं  मिल  सका।   हालाँकि दस  जनपथ  में  रीता  बहुगुणा जोशी  को  साथ लेकर बहुगुणा  ने  अपनी कुर्सी  सलामत रखने  की हर   तिकड़म की   लेकिन कोशिशें   रंग  नहीं ला  सकी ।  बताया  जाता है दस जनपथ में अहमद  पटेल और  राज्य की  प्रभारी अम्बिका सोनी केदारनाथ में जल प्रलय के बाद से ही बहुगुणा की कार्यशैली  से  बहुत  नाराज चल  रही थी लेकिन उनको नहीं हटाया   जा  सका । बीते बरस आम  आदमी  पार्टी की सफलता  के  बाद पहली बार कांग्रेस और भाजपा पार्टी की  पारम्परिक  राजनीति   पर  ग्रहण  लग  गया जिसकी शिकन राहुल गांधी  के चेहरे पर  विधान सभा  चुनाव  आने  के   चंद घंटे   बाद देखने  को   मिली  जब  राहुल   गांधी ने कैमरो के सामने आकर कहा हम   आम आदमी पार्टी से सीखेंगे ।  इसके बाद  तो उन्होंने  कांग्रेस को नए सिरे से मथने का मन  बना   लिया  जिसके  बाद से ही कांग्रेस में "कामराज " प्लान की आहट  सुनायी देने  लगी थी  जिसकी हिट  लिस्ट  में विजय बहुगुणा थे  ।
                           

 अपनी कुर्सी बचाने के लिए  विजय बहुगुणा ने  सतपाल महाराज का  ब्रह्मास्त्र  दस जनपथ में  इस बार आखरी समय तक  चला जिसमे बाइस विधायको के  हस्ताक्षर  को   आधार  बनाकर  हरीश रावत का रथ रोकने की हर सम्भव कोशिश की  गई लेकिन सफलता नहीं मिल पायी ।  इस्तीफे  के  दिन  राजभवन  में जाने से पहले बहुगुणा 22  विधायको में से किसी को वजीर बनाने की तिकड़म  महाराज के आसरे  करते  रहे लेकिन सोनिया गांधी के  आगे  उनकी  भी  नहीं चल पायी । कांग्रेस में  जनार्दन द्विवेदी ,  आनंद शर्मा और  जय  राम रमेश कांग्रेस शासित राज्यो में ब्राह्मण मुख्यमंत्री का  चमकता चेहरा  बताकर  बहुगुणा को  ना  हटाये  जाने  की  दुहाई  दे रहे थे लेकिन राहुल गांधी द्वारा उत्तराखंड में   कराये  गए एक  गुप्त सर्वे में  जब यह खुलासा हुआ कि उत्तराखंड में  विजय बहुगुणा के रहने पर  कांग्रेस का पांच लोक सभा सीटों  पर सूपड़ा  साफ़  हो सकता है तो ऐसे   में बहुगुणा के विदाई की  पटकथा  दस जनपथ में   लिखी जाने लगी ।

कम उम्र में ब्लाक प्रमुख और लगातार लोकसभा में हैट्रिक लगाने के बाद  अस्सी के दशक में  पहले  चुनाव में  हरीश रावत ने डॉ मुरली  जोशी सरीखे कद्दावर  को हराकर धमाकेदार  इंट्री अविभाजित उत्तर  में की । संजय  ब्रिगेड के सिपहसालार और समर्पित सिपाही  बन हरीश ने इसके बाद इतिहास उस  समय रचा  जब डॉ मुरली मनोहर को 1984 में उनके हाथो फिर  पराजित होना  पड़ा।  इसके बाद रावत ने  भगत सिंह कोश्यारी और काशी  सिंह  ऐरी जैसे   दिग्गजों  की नींद  उड़ा डाली जब उनको भी रावत के हाथो  पटखनी  मिली ।  नब्बे के दशक  की रामलहर में   हरीश रावत का सियासी कैरियर पूरी तरह से थम गया । रामलहर में उन्हें राजनीती के नए  नवेले  खिलाडी जीवन शर्मा के हाथ हार खाने को मजबूर होना पड़ा तो 1996 , 19 98 ,1999 में पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री बची सिंह रावत के सामने  हार  गए  । इसके  बाद उनकी पत्नी  रेणुका  रावत भी  बची सिंह  रावत  के सामने हार गयी । 2009 में हरीश ने हरिद्वार से  भाग्य आजमाया और हरिद्वार ने  उनका  राजनीतिक  पुनर्वास  किया  जब 15  लोक सभा में वह   श्रम राज्य मंत्री बने  । 2011 में  कृषि  राज्य मंत्री , संसदीय कार्यमंत्री और फिर  जल संसाधन  मंत्री  ने दिल्ली में उनकी  राजनीतिक उड़ान  को  नई  दिशा  दी ।राज्य बनने के बाद 2002 में कांग्रेस को राज्य में सत्ता दिलाने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही, लेकिन नारायण दत्त तिवारी को उनकी जगह मुख्यमंत्री बना दिया गया था ।तिवारी को जहाँ  ब्राह्मण समर्थको   के चेहरे के   रूप में पहचाना  गया  वहीँ हरीश रावत को ठाकुरों के पोस्टर बॉय के रूप में  और शायद यही वजह  रहीं हरीश  रावत  को  भी  अतीत   में पहाड़ की ब्राह्मण  ठाकुर   सियासत  का  सबसे  बड़ा  नुकसान उठाना  पड़ा ।   यही कहानी 2012 में भी दोहराई गई। बड़ी  संख्या  में विधायकों के  उनके पक्ष में दिल्ली में लामबंद होने के बावजूद ब्राह्मण चेहरे   विजय बहुगुणा  को मुख्यमंत्री बना दिया गया। ऐसे माहौल  में हरीश को उत्तराखंड से दूर रहने  नसीहतें  मिलती  रही लेकिन इसके बाद  भी वह उत्तराखंड  के हको की  लड़ाई न केवल  लड़ते रहे बल्कि बहुगुणा के खिलाफ 'लेटर वार' शुरू कर उन्होंने उत्तराखंड में   नयी बहस शुरू कर डाली ।


    विजय बहुगुणा के  सत्ता संभालने के साथ ही लूट-खसोट का राज   उत्तराखंड  में शुरू  हो  गया । सितारगंज में  पानी  की  तरह  पैसा बहाने के बाद टिहरी  उपचुनाव में साकेत  बहुगुणा  की चुनावी  हार  के  बाद विजय  बहुगुणा की आलोचना शुरू  हो  गयी ।  अपने शपथ ग्रहण समारोह में जो ख्वाब प्रदेशवासियों को उन्होंने  दिखाए थे वह राज्य में  हवा हवाई ही साबित हुए  |  प्रदेश में  अफसरशाही   जहाँ पूरी तरह से बेलगाम रही वहीँ  कभी न्यायाधीश रहे बहुगुणा इससे जूझ पाने में विफल साबित हुए | बहुगुणा का ज्यादातर समय दिल्ली की मैराथन दौड़ में ही जहाँ  बीता , वहीँ कांग्रेस के विधायक भी अंदरखाने बहुगुणा को राज्य में मुख्यमन्त्री के रूप में नहीं पचा पा रहे थे  | राज्य में विकास कार्य  इस कलह से सीधे  तौर पर  प्रभावित हुए  और शायद यही कारण रहा  राजनीती के ककहरे से अनजान बहुगुणा को पहली बार सियासी अखाड़े में अपनी पार्टी के लोगो से ही  तगड़ी चुनौती मिली  जहाँ अपनी कुर्सी बचाने के लिए वह दस जनपथ में अपनी बराबर हाजिरी लगाते हुए देखे गए ।  आज  से तकरीबन डेढ़  साल पहले जब  विजय बहुगुणा ने उत्तराखंड के मुख्यमन्त्री का कांटो रुपी  ताज पहना था तो लोगो को उम्मीद थी कि वह पर्वत पुत्र माने जाने वाले अपने पिता स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा सरीखे राजनीती के दिग्गज नेता की तर्ज पर अपनी अलग छाप छोड़ेंगे लेकिन बहुगुणा के शासन से उत्तराखंड के आम जनमानस का धीरे धीरे मोहभंग होता गया ।  टिहरी की हार का बड़ा कारण विजय बहुगुणा का अहंकार भी था  जो हरीश रावत सरीखे खांटी कांगेसी नेता और उनके समर्थको की उपेक्षा करने में लगे  थे और अपने को सुपर सी ऍम समझने की भारी  भूल कर बैठे जबकि बहुगुणा का उत्तराखंड के जनसरोकारो से सीधा कोई वास्ता भी नहीं रहा  | वह तो अपने पिता हेमवती नंदन बहुगुणा के नाम ,परिवारवाद  और कॉरपोरेट के आसरे उत्तराखंड के सी ऍम की कुर्सी पा गए और सितारगंज में धन बल के जरिये अपना चुनाव जीत भी गए |जबकि बहुगुणा के जनसरोकारो का असली चेहरा यह रहा कि वह पहाड़ के जनसरोकारो से ज्यादा कॉरपोरेट कंपनियों के ज्यादा करीब रहे हैं वहीँ  उनके सी  एम बनने  के बाद   राज्य में  पेयजल, बिजली जैसी समस्याओ का संकट खड़ा रहा  वहीँ  बेरोजगारों में गहरी निराशा देखी  गयी ।  हर दिन कार्मचारी सरकार के खिलाफ हड़ताल का मोर्चा खोलकर विजय बहुगुणा के खिलाफ नारेबाजी करते  रहे  ।   सारा  तिलिस्म तब टूट गया  जब केदारनाथ के साथ प्रदेश में बीते बरस  आई भीषण प्राकूतिक आपदा से निपटने में न केवल बहुगुणा सरकार अक्षम दिखी बल्कि संवेदनहीन भी नजर आई।  बहुगुणा ने पूरी आपदा के दौरान  दिल्ली में  ही ज्यादा समय बिताया। विजय बहुगुणा  और उनके पुत्र साकेत बहुगुणा सीधे तौर पर  भ्रष्टाचार के कटघरे  में घिरे रहे।

 

अब नए निजाम    हरीश रावत के सामने   चुनौतियों का पहाड़  खड़ा है । बेलगाम  नौकरशाही को   पटरी  पर लाने   के ठोस उपाय  उन्हें करने   होंगे ।  ऐसे कठोर कदम उठाने होंगे जिससे नौकरशाही की घिग्घी बँध जाए । बहुगुणा वाले दौर से यह देखा गया  है  नौकरशाह  इस प्रदेश  को लूटने में  लगे  हुए हैं  जिन  पर  बिल्डरो ,माफियाओ से सांठगांठ के संगीन आरोप  लगे  हैं।  मिसाल  के तौर पर अपर मुख्य सचिव राकेश शर्मा पर  जमीनों को सस्ते दामो  में बिल्डरों को बेचने का आरोप है। बहुगुणा सरकार में शर्मा के आगे पूरी   मशीनरी  नतमस्तक  रही है  । यह  तो  बानगी भर है हर  विभाग में लूट खसोट का   खुला खेल बहुगुणा अपने राकेश  शर्मा सरीखे  प्यादो  के जरिये  उत्तराखंड में  चलाते  रहे। भ्रष्टाचार की इस गंगोत्री की  सफाई  तभी  तो पायेगी बड़ी  मछलियों के साथ  तालाब  की  छोटी  मछलियां भी जाल में आएँगी । उत्तराखंड में निशंक  सरकार के राज  में  कुम्भ घोटाला और स्टॉर्डिया  सरीखे कई घोटाले  उस दौर में हुए हैं  क्या हरीश उस पर कोई एक्शन  ले पाएंगे यह  सवाल  इसलिए बड़ा  हो चला है क्युकि  अपनी  सुधरी छवि के जरिये वह भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेन्स  की बात दोहराते रहे हैं । अब नाव के माझी वह खुद हैं ।  नाव  सही दिशा में तैरे  इसकी जिम्मेदारी खुद अब उनके कंधे में है ।    क्या हरीश  रावत इस पर  कोई  नयी लकीर खीँच  पाएंगे यह अब  समय ही बतायेगा ?    

   केदारनाथ में आई आपदा के बाद बहुगुणा सरकार ने  राहत के नाम पर केवल खानापूर्ति की है। पूरे प्रदेश में सड़कें टूटी पड़ी हैं। कई गाँवों  में आज भी बुनियादी  सुविधाएं  मयस्सर  नहीं हो पाई हैं ।   पहाड़ो में  डॉक्टरों की कमी  देखी  जा सकती है।  गांवों से पलायन  लगातार  बढ़ रहा है । बेरोजगार उत्तराखंड में परेशान  हैं । विधायको के वेतन भले ही इस दौर में कुलांचे मार रहा है लेकिन बेरोजगारी दर  ने राज्य में कई रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं ।   बीते  तेरह बरस  में उत्तराखंड  के पास  उपलब्धियों के  ढिंढोले  के रूप में  कुछ  खास  नहीं है ।एक विशेष  उपलब्धि  यह है आपदा  प्रबंधन को दुधारू  गाय  बना दिया गया है  जिसमे राजनेताओ और नौकरशाहो ने अरबो के  वारे न्यारे कर डाले ।   ऐसे में  हरीश रावत की  राह  आसान नहीं है। अभी भी प्रदेश में गठबंधन सरकार है और उन्हें हर  किसी  विधायक के साथ तालमेल बैठाना होगा।अपने विरोधियो को साधना होगा । सतपाल  महाराज  ,   यशपाल आर्य ,   हरक सिंह रावत, इंदिरा हृदयेश और खुद विजय बहुगुणा सरीखे उनके धुर विरोधी अब चुप बैठ जायेंगे  नहीं है । उनकी  ताजपोशी से ठीक पहले तक जिस तरीखें के तल्ख़ तेवर महाराज ने दिखाए हैं वह बताते हैं उत्तराखंड में अभी भी  कांग्रेस की गुटबाजी पर लगाम लगाने की  जरुरत है अन्यथा  पंचायत  चुनाव और लोक सभा चुनावो में कांग्रेस का  खेल बिगड़ सकता है ।

 हरीश को कम समय में    विकास  का लाभ   पहाड़ के सीमांत गांवों तक पहुचाना  होगा ।  जनभावनाओ का सम्मान  करते हुए  गैरसैण  में स्थायी राजधानी बनाने  की  दिशा में काम  करना  होगा  । हरीश रावत  को हिमाचल  के प्रथम मुख्यमंत्री से  प्रेरणा लेनी  चाहिए । यशवंत  सिंह परमार का   हिमाचल प्रदेश को अस्तित्व में लाने और विकास की आधारशिला रखने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लगभग 3 दशकों तक कुशल प्रशासक के रुप में जन-जन की भावनाओं  को समझते हुए उन्होने प्रगति पथ पर अग्रसर होते हुए हिमाचल प्रदेश के विकास के लिए नई लकीर खींची आज ऐसी ही  लकीर  खींचने  वाले जननेता  की उत्तराखंड  को जरुरत है । हरीश चन्द्र  सिंह रावत  सरीखे  नेता में सब कुछ कर  गुजरने  की तमन्ना है।  अपने हक़ की लड़ाई अपनी ही सरकार  में  लड़ने वाले हरीश रावत के पास इससे "गोल्डन" समय शायद ही कभी आये जब  वह  नए निजाम के तौर पर पहाड़ के उस  अग्निपथ पर हैं जहाँ लोगो की बड़ी अपेक्षाएं उनसे जुडी हैं ।  अब  यह हरीश रावत पर टिका है वह उत्तराखंड को  किस  दिशा  में ले जाते हैं ? आज  वह एक पार्टी के सामान्य कार्यकर्ता से मुख्यमंत्री  की जिस कुर्सी तक वह   पहुंचे हैं यह कांटो भरा ताज  जरुर है और इतिहास में ऐसे  मौके बार बार नहीं आते । रावत अगर पूर्व मुख्यमंत्रियो से अलग लीक पर चलते हैं तो  उत्तराखंड  के इतिहास में वह जननायक के तौर पर याद किये जायेंगे अन्यथा वह भी  सियासी तिकडमो के बीच अगर अपनी कुर्सी  बचाने की मैराथन में  ही  लगे रहे तो इससे प्रदेश की जनता का कुछ भला नहीं होगा और उत्तराखंड नौकरशाहो  के हाथ की कठपुतली  ही बना रह जायेगा   जहाँ  भ्रष्टाचार की गंगा में हर कोई अपना हाथ  साफ़  करने में  लगा रहेगा ।हरिवंश राय बच्चन  पंक्तिया  रावत को  निश्चित  ही प्रेरणा देंगी -
तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।


गुरुवार, 6 फ़रवरी 2014

दंगो की छाँव तले गरमाती सियासत



टाईम्स  नाउ  के मैनेजिंग एडिटर  अर्णब  गोस्वामी  को दिए गए अपने एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल   गांधी ने 30  बरस पहले  सिख विरोधी  दंगो में कांग्रेस के कुछ नेताओ के शामिल  होने का   बयान  देकर कांग्रेस की  चुनावी  साल में मुश्किलो  को बढ़ाने का  काम किया है । इस बयान के  बाद कांग्रेस जहाँ बैक फुट  पर आकर खड़ी हो गई है वहीँ राहुल "राग" की इस धुरी ने सियासत को  फिर दंगो की छाँव तले लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ  2014  की लड़ाई  साम्प्रदायिकता  बनाम  धर्मनिरपेक्षता के आमने सामने खड़ी हो गई है । इस बयान ने कांग्रेस की उन उम्मीदों पर पलीता जरुर  लगा दिया है जो 2002  के गोधरा दंगो को मुद्दा बनाकर नमो की राह में कांटे खलनायक,   मौत का सौदागर और  राजधर्म  का पालन  ना  करने वाला  राजा  के रूप  में   बिछाते आये हैं  शायद यही वजह है अब वार  रूम पॉलिटिक्स मे अपने  कर्ता  धर्ताओ के साथ  राहुल को अपने पांच प्रवक्ता नमो को घेरने की रणनीति बनाने में अब लेने पड़े  हैं  । वहीँ जनता के  आंदोलन से  निकली आप पार्टी  भी अब दिल्ली से आगे निकल लोक सभा  चुनावो की बिसात अपने अनुरूप बिछा रही है जहाँ  वह सिख विरोधी दंगो को भुनाकर राजनीतिक लाभ लेने  की पूरी  कोशिशे तेज कर रही है जिसमे  सिख विरोधी दंगो की जांच के लिए अलग से एस आई  टी  का गठन कर  झटके  में सिखों  के बड़े वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने का जाल बिछाया  जा रहा है ।  


 लोक सभा चुनावो से ठीक पहले चुनावी मॉड  में दंगो  की सियासत ने  राजनीती  का परिदृश्य उस तरफ खींच डाला है जिसकी आग  में बरसो से  यह देश  जलता रहा  है और   जहाँ मजहब , जाति के नाम पर  बांधकर  राजनीती जनता  को  हमेशा  प्यादा  बनाकर  अपनी रोटियां सेकती  रही   है। चूँकि कांग्रेस के सामने एंटी इंकम्बेंसी का खतरा मडरा रहा है और इस चुनावी साल में  उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती तीसरी बार चुनाव जीतने को लेकर है शायद तभी भाजपा और अकाली दल  सिख दंगो में कांग्रेस को कोई ढील देने के मूड में नहीं दिख रहे जिसके चलते वह पीडितो को इन्साफ देने की मांग सड़क से लेकर संसद  तक करते नजर आ रहे हैं । कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की माने तो 2002 के गुजरात दंगो में जहाँ मोदी सरकार दंगो को उकसा रही थी वहीँ 1984  के दंगो में कांग्रेस सरकार ने दंगो को रोकने की हरसंभव कोशिशें की । राहुल का यह बयान किसी के गले नहीं उतर रहा क्युकि 30  बरस पहले हुए दंगो में कांग्रेस  के कई नेता न केवल शामिल  रहे बल्कि वह भीड़ को उकसाने का काम भी कर रहे थे ।

 इन दंगो में पौने तीन हजार से भी ज्यादा सिखों  का कत्ले आम चुन चुन कर कर दिया गया था जिसकी तस्दीक  नानावती  आयोग की रपट करती है जिसमे सादे चार सौ  से अधिक हत्या के मामले दर्ज किये गए और पांच सौ   से ज्यादा ऍफ़ आई  आर दर्ज हुई , सी बी आई  और दिल्ली पुलिस  ने काफी छानबीन भी की  मगर जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सकी । सबूतो के अभाव में अब तक कई मामले या तो ख़ारिज हो गए हैं या मामलो से जुडी फाईल को रफा दफा कर दिया गया है जिसके चलते सिखों  को न्याय नहीं मिल पाया है और दोषी आज भी आजाद हैं । पुख्ता सबूतो का हवाला देते हुए 49 लोगो को   अब तक दोषी पाया  जिनकी सजा  आजीवन कारावास में बदली जा चुकी है फिर भी इन दंगो के बड़े दोषी पहुँच से बाहर हैं । 

 ध्यान देने वाली बात यह है कि दंगा शुरू होने के बहत्तर घंटो तक सरकारी मशीनरी तमाशबीन बनी रही । 1984  के सिख विरोधी दंगे  सिखों   के खिलाफ थे ।   इंदिरा गाँधी की  हत्या उन्ही के अंगरक्षकों द्वारा कर दी गई  उसी के जवाब में ये दंगे भड़के । इन दंगो में सादे  से ज्यादा मौतें हुई  थी । यह  हिंसक कृत्य दिल्ली पुलिस के अधिकारियो और राजीव गांधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के सहमति से आयोजित किये गए थे। राजीव गाँधी ने तो उस दौर में   कहा  भी  था, "जब एक बड़ा पेड़ गिरता है, तब धरती माता  भी हिलती है"।

एक अनुमान के मुताबिक उस दौर में  पूरे देश में तकरीबन  10 हजार सिखों को बेरहमी से कत्ल कर दिया गया था । अकेले दिल्ली में करीब 3000 सिख बच्चों, महिलाओं  को मौत के घाट उतार दिया गया । हिंसा का तांडव रचा गया।  घरों को लूट लिया गया और उसके बाद उन्हें आग के हवाले कर दिया गया। इतना ही नहीं जिन राज्यों में हिंसा भड़की वहां अधिकांश जगह  कांग्रेस की सरकारें थीं। पूरे देश में फैले इन दंगों में ‍सैकड़ों सिख महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया लेकिन  पुलिस सिर्फ तमाशबीन बनी रही।  उस दौर  में प्रधान मंत्री रहे  राजीव गांधी किस तरह हाथ पर हाथ धरे बैठे थे इसकी तस्दीक तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के प्रेस सेकेटरी रहे  तरलोचन सिंह ने भी की  है । तरलोचन सिंह ने दावा किया है कि जब पूरा देश दंगों की आग में जल रहा था तब राष्ट्रपति के कई बार फोन करने के बाद भी राजीव गांधी उपलब्ध नहीं हुए थे। ज्ञानी जैल सिंह की गाडी के साथ उस दौर में पथराव  भी हुआ था जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि  उस दंगो में हिंसा किस तरह  फैली होगी ? 

 चुनावी बरस  में अब सिख दंगो के जिन्न ने कांग्रेस के सामने संकट बड़ा दिया है ।  लोक सभा चुनावो की  डुगडुगी के बीच  यू  पी ए  की मुख्य सहयोगी रही ऍन सी पी ने बीते दिनों मोदी पर अपने सुर नरम करते हुए यह कहा है कि गोधरा पर जब कोर्ट मोदी को क्लीन चिट  दे  चुका  है और दोषियो को सजा सुनाई  जा चुकी है तो फिर नमो को बार बार कठघरे में खड़ा क्यों किया जा रहा है?   यही नहीं  फारुख अब्दुल्ला ने भी नमो के प्रधान मंत्री बनने न बनने का फैसला  जनता पर छोड़ने  की बात कहकर एक नई  बिसात बिछाकर कांग्रेस को अलग थलग  कर दिया है ।   ऐसे में कांग्रेस की चिंता बढ़नी लाजमी है । वैसे1984 के   दंगो में कांग्रेस की भूमिका शुरू से  सवालो के घेरे में ही  रही है शायद यही वजह रही कि प्रधानमंत्री मनमोहन  सिंह  भी  इस पर  पूरे देश से माफ़ी मांग चुके हैं लेकिन अभी भी चौरासी के जख्म नहीं भरे हैं और इन सबके बीच  सियासत  हर किसी को अपने अनुरूप साध रही है ।