Sunday, July 16, 2017



रवि शास्त्री जब भारतीय क्रिकेट टीम के नए कोच बने तो सभी को उम्मीद थी पिछले कुछ समय से भारतीय टीम में चल रहा विवाद आखिरकार थम जाएगा, लेकिन सीएसी और रवि शास्त्री के बीच विवाद कम होने की जगह बढ़ता ही जा रहा है | असल में बीते दिनों बीसीसीआई ने रवि शास्त्री  को भारतीय क्रिकेट टीम का नया मुख्य कोच नियुक्त किया जबकि पूर्व दिग्गज तेज गेंदबाज जहीर खान को दो साल के लिए नया गेंदबाजी कोच और राहुल द्रविड़ को  विदेशी दौरे के लिए बल्लेबाजी सलाहकार नियुक्त किया । रवि शास्त्री तीसरी बार  भारतीय क्रिकेट टीम के साथ जुड़े हैं। इससे पहले वह  2004  में बांग्लादेश दौरे के दौरान क्रिकेट मैनेजर थे और इसके बाद अगस्त 2014  से जून 2016  तक उन्हें टीम निदेशक बनाया गया जिस दौरान भारत ने श्रीलंका के खिलाफ उसकी सरजमीं पर टेस्ट श्रृंखला जीती और 2015 में   विश्व कप तथा 2016  विश्व टी 20  के सेमीफाइनल में जगह बनाई।

कोच की दावेदारी में टक्कर शास्त्री  और वीरेंद्र सहवाग के बीच कांटे की  थी लेकिन शास्त्री  के पूर्व कार्यकाल को लेकर कप्तान विराट कोहली की सिफारिश के कारण मामला पूर्व भारतीय कप्तान के पक्ष में गया। अब शास्त्री 2019 विश्व कप  तक भारतीय टीम के कोच के  रूप में जुड़े रहेंगे | शास्त्री ने यह जिम्मेदारी  तरह सबको  साथ  लेकर चलने के  जैसे दावे किये उससे एक  बारगी ऐसा लग रहा था  अब भारतीय खिलाडी पुरानी बातों  को भूलकर नए सिरे से टीम भावना के साथ खेलेंगे लेकिन किसे पता था  कुछ दिनों बाद शास्त्री अपने  खुद किए  दावों  की  हवा निकाल देंगे |

असल में शास्त्री अपने साथ राहुल और जहीर खान जैसे अनुभवी खिलाडियों को नहीं देखना चाहते |  सचिन , सौरभ और  लक्ष्मण सरीखे महान  खिलाडियों से सजी  सीएसी ने  शास्त्री  को कोच बनाकर औपचारिकता निभाई लेकिन द्रविड़ और जहीर को भी सलाहकार बनाकर शास्त्री के पर क़तर दिए जो शास्त्री  नागवार गुजरा |  शास्त्री भी  टीम इंडिया के  सपोर्ट स्टाफ में अपने भरोसेमंद अरुण भारत को बॉलिंग कोच के रूप में  लेना चाहते थे  जिसके बाद   सुप्रीम कोर्ट की बनाई प्रशासकों की समिति के हेड विनोद राय ने  कहा  कि चीफ कोच के सपोर्ट स्टाफ पर आखिरी फैसला रवि शास्त्री  के हिसाब  से तय होगा जिसके बाद भरत अरुण को  श्रीलंका दौरे पर टीम इंडिया के गेंदबाजी की कमान दे दी गई  | इस फैसले ने  एक बार फिर कोच , सपोर्टिंग स्टाफ और सीएसी की जंग को सतह पर ला दिया है |  

सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण की क्रिकेट एडवायजरी कमेटी  ने रवि शास्त्री के साथ-साथ बतौर गेंदबाजी कोच जहीर खान और बतौर बल्लेबाजी कंसल्टेंट राहुल द्रविड़ के नाम की सिफारिश पर अपनी मुहर लगा दी थी तो सवाल है जब तीनों महान खिलाडियों ने अपना फैसला सुना दिया था तो फिर  फैसले पर विनोद राय सामने ऐसी  मजबूरी आन  पड़ी जो वह शास्त्री  मनमाकिफ़ स्टाफ चुनने की आज़ादी देने लगे और शास्त्री के भी दुबारा कोच बनने  के बाद भी खिलाड़ियों को मैदान के बाहर  खुली छूट देने के बयान देने की आवश्यकता क्यों पड़ीं ? असल में इस पूरे प्रकरण में बी सी सी आई  की ही किरकिरी हुई है | जिस शर्मनाक ढंग से विराट और बोर्ड की मिलीभगत से कुंबले जैसे महान खिलाडी और कोच को बाहर का रास्ता दिखाया गया ऐसा  बहुत कम बोर्ड में ही होता है कि शानदार प्रदर्शन कर रही टीम के कोच को बदल दिया जाए। वह  भी तब जब  उसके आसपास तक फटक भी न  सके  लेकिन दुनिया में ऐसा कोई अगर कर सकता है तो वो है बीसीसीआई जिसके पास अकूत कमाई है जो न केवल विश्व के क्रिकेट बोर्डों को  खरीद सकता है बल्कि एक कोच के साथ दर्जनों  भारी भरकम स्टाफ रख सकता उसे मुंहमांगी कीमत दे सकता है |

 पैसे  की रईसी  तले बीसीसीआई को ऐसा हेड कोच मौजूदा दौर में  चाहिए जो कप्तान की बीन पर नाचे |  खिलाड़ियों को खुली छूट दे | सब कुछ  ओपन  इकॉनमी तले,  मैदान और मैदान से  बाहर पूरी तरह हो |  ड्रेसिंग  रूम  भी मस्ती में  डूबा  रहे तो कोई गम नहीं  | कमाई मैच  दर मैच बन  रही है | जब इस दौर में   कप्तान ही सब कुछ है तो कोच  की क्या  बिसात | यह दौर ऐसा है जहाँ खिलाडी कोच को सिखाते हैं | द्रोणाचार्य वाला दौर अब मिटटी में ख़ाक हो चुका है |आज भारतीय क्रिकेट  कप्तान और  बोर्ड के  नेक्सस नेटवर्क से चल रहा है जहाँ कप्तान सबसे बड़ा हो चला है, कोच  भूमिका सीमित  कर दी गई  है |   बात दिग्गज कुंबले की करें तो बीते एक बरस में  उनका कोचिंग रिकॉर्ड शानदार रहा |  पांच में से पांच टेस्ट सीरीज में जीत, 17 टेस्ट मैचों में से 12 जीत, 4 ड्रॉ और सिर्फ एक हार। कुंबले के कार्यकाल के दौरान ही टीम इंडिया ने आईसीसी रैंकिंग में नंबर-1 पायदान हासिल किया।  ऐसे ही नहीं जम्बो को  बेहतरीन स्पिनर और शानदार खिलाड़ी की संज्ञा दी गई । ये रिकॉर्ड खुद बताते थे  कि बतौर कोच कुंबले की पारी कितनी शानदार रही लेकिन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड  को कुंबले का यह शानदार प्रदर्शन नहीं दिखा। दिखा तो बस अपने कप्तान के प्रति उनका अनुशासनात्मक रवैया।  कुंबले के अनुभव को कोई चुनौती  नहीं  दे सकता  |

दुनिया का हर  खिलाडी  कुंबले का मुरीद रहा |  कुंबले का जिक्र  होते ही जेहन में 2002 में भारत-वेस्टइंडीज के बीच खेला गया  टेस्ट  याद  आता है जब मर्वन ढिल्लन की बाउंसर उनके सिर और जबड़े में  लगी और अनिल कुंबले को मैदान से बाहर ले जाया गया मगर  सिर से लेकर जबड़े तक पट्टी बांध  उन्होंने 14 ओवर गेंदबाजी की। इस दौरान जंबो ने महानतम बल्लेबाज ब्रायन लारा का भी विकेट लिया। मैच के बाद पता चला कि कुंबले के जबड़े में फ्रैक्चर था। यही नहीं टेस्ट मैच की एक पारी में  4 फ़रवरी 1999 को आरंभ हुए दिल्ली टेस्ट की चौथी पारी में अपने 26.3 ओवरों में 9 मेडन रखते हुए 74 रन देकर सभी 10 विकेट लेने का कारनामा कर दिखाया।  जिम लेकर के बाद विश्व के पहले ऐसे खिलाड़ी कुंबले  ही रहे | भारत की ओर से टेस्ट मैचों में सर्वाधिक विकेट लेनेवाले गेंदबाज कुंबले  रहे जिन्होंने  1990 से 2008 के बीच टेस्ट  जीवन में खेले 132 टेस्ट मैचों में  18355 रन देकर 29.65 की औसत से 619 विकेट लिए   कुंबले ने पाकिस्तान के विरूद्ध उनसे पहले इंग्लैंड के जिम लेकर ने ऑस्ट्रेलिया के विरूद्ध 26 जुलाई 1956 को आरंभ हुए मैनचेस्टर टेस्ट की कुल तीसरी पारी में और ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी में 51.2 ओवरों में 23 मेडन रखते हुए 53 रन देकर एक टेस्ट पारी में सभी दसों विकेट लेनेवाले पहले गेंदबाज बने थे।

आईपीएल में आरसीबी कुंबले की कप्तानी में 2009 के सीजन में फाइनल तक पहुंची, फाइनल में उसे 6 रनों से हार का सामना करना पड़ा था। अगले सीजन में कुंबले टीम को सेमीफाइनल तक ले गए। उसके बाद कुंबले ने आईपीएल से संन्यास ले लिया। तब से अब तक टीम की कमान कोहली के पास है। कोहली की कप्तानी में आरसीबी केवल एक बार ही फाइनल में पहुंच पाई । कुंबले से कभी तेंदुलकर, द्रविड़, श्रीनाथ, गांगुली और लक्ष्मण जैसे खिलाड़ियों को समस्या नहीं हुई  लेकिन विराट की टीम से कुंबले से  अनबन  क्यों हुई यह गंभीर सवाल है |

पिछले  कुछ समय से टीम इंडिया और कोच लेकर  से  जिस तरह से विवाद हुआ उसने भद्र जन के  बीच  खेल की साख तार तार  जरूर हुई है |  शास्त्री  को  खिलाडियों  और विराट भले ही अपने  में  ढाल  लिया हो लेकिन शास्त्री पर कुंबले से बेहतर रिजल्ट देने का दवाब जरूर होगा | शास्त्री का दौर कुंबले से अलग इस मायने में  होने  जा रहा है क्युकि आने वाले बरसों  में टीम इंडिया  श्रीलंका , ऑस्ट्रेलिया , इंग्लैंड , अफ्रीका , न्यूजीलैंड जैसे देशों दौरे करेगी जहाँ  टीम के कप्तान और  कोच की जोड़ी की  असली परीक्षा होगी | भारतीय टीम  घर में तो शेर है  लेकिन यही टीम विदेशी उछाल  लेनी वाली पिचों पर ढेर  जाती  है |

 देखना होगा कप्तान और कोच की यह नई  जोड़ी कैसे टीम इंडिया  आगे  जाती है वह भी तब जब कुंबले टीम इंडिया  नयी ऊंचाई पर ले  जा रहे थे और टीम  इंडिया उनकी कप्तानी में जीत  गौरवगाथा  लिख रही थी और  सीएसी  समिति कुंबले के पक्ष में डटकर खड़ी  थी | आने वाले दिन विराट  कोहली के लिए भी मुश्किल रहेंगे  क्युकि एशिया  बाहर  भारत  खिलाडियों  ट्रेक रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा  है  और विराट भी  अभी उसी खेत  मूली हैं | देखना होगा  विराट और उनकी टीम आने वाले दिनों में देश से बाहर कैसा व्यक्तिगत प्रदर्शन करती है ?  अनुशासन , धैर्य ,  दृढ़ संकल्प , बड़ों  प्रति सम्मान किसी खिलाडी को महान बनाते  हैं |  विराट शायद अभी यह नहीं समझते  कि  सचिन , सौरभ , लक्ष्मण , द्रविड़ , कुंबले , जहीर ऐसे नहीं बना जाता  |

Monday, July 10, 2017

भारत चीन सम्बन्धों में तनाव की छाया




भारत और चीन के बीच तनाव और टकराव की स्थिति अभी भी कायम है | 1962 की भारत-चीन लड़ाई के बाद यह पहला मौका है जब सिक्किम से लगी सीमा पर भारत और चीन के बीच गतिरोध अपने चरम पर है | यह भी तब है जब हैम्बर्ग मे जी 20 समिट में दोनों मुल्कों के ताकतवर नेता मोदी और शी मुस्कुराहट के बीच मिल चुके हैं |  इसके बाद भी रिश्तों मे तल्खी थमने का नाम नहीं ले रही है | बीजिंग की सरकारी मीडिया ने हाल के दौर में जिस तरह के बयान दिये हैं उससे फिलहाल भारत और चीन के बीच वाकयुद्ध थमने के आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं | ग्लोबल टाईम्स ने अपने संपादकीय मे साफ लिखा भारतीय फौज के मुक़ाबिल चीनी सेना ज्यादा ताकतवर है | धमकी भरे अंदाज मे उसने लिखा यदि भारतीय सेना सम्मानपूर्वक वापिस नहीं गई तो चीनी सेना उसे खदेड़ आएगी | 

बीजिंग के विदेश मंत्रालय के ऐसे बयान काफी दुर्भाग्यपूर्ण हैं वह भी तब जब भारत के साथ चीन का व्यापार बरस दर बरस कुलांचे मार रहा है और चीन के उत्पादों के लिए भारत एक बड़ा बाजार बना हुआ है | चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गैंग शुआंग ने तो हद ही कर दी | उन्होने धमकी भरे अंदाज मे कहा भारत को डोकलाम इलाके से अपनी सेना हटाने के लिए अब कड़े कदम उठाने ही होंगे | दोनों देशों के सैनिको की आवाजाही पूरे इलाके मे नजर आ रही है | भारत ने डोकलाम में जो सैनिक भेजे हैं, उन्हें नॉन काम्बैटिव मोड में तैनात किया है वहीं चीनी सेना तो घात लगाकर पूरे इलाके की सघन घेराबंदी करने मे जुटी हुई है मानो यह नए युद्ध की आहट हो चली है | चीन के लाख दबाव के बाद भी भारतीय सैनिक वहाँ से हटने को तैयार नहीं दिख रहे हैं |

 सिक्किम की सीमा पर स्थित डोकलाम  एक ऐसा इलाका है, जहां चीन, भारत और भूटान तीनों की सीमा मिलती है| असल मे जिस इलाके मे चीन सड़क बना रहा है उसका तीनों देशों के लिए विशेष सामरिक महत्व है | भारत की बात करें तो यह इलाका भूटान मे बेशक है लेकिन सड़क अगर बन जाती है तो यह तिब्बत की चुंबी घाटी तक करीब आ जाएगी ऐसे मे चीन की भारत पर पकड़ मजबूत हो जाएगी |  

आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से भी देखें तो तो अगर ऐसा हो जाता है तो चीन भारत के बेहद करीब आ जाएगा और भविष्य मे उसके लिए भारत पर चढ़ाई करना बहुत आसान हो जाएगा | भारतीय सेना के जानकार भी मानते हैं हिमालय में यही एकमात्र ऐसी जगह है जिसे भौगोलिक तौर पर भारतीय सेना भलीभांति समझती है और इसका सामरिक फ़ायदा ले सकती है | ये वही इलाका है जो भारत को सेवन सिस्टर्स नाम से जानी जाने वाली उत्तर पूर्वी राज्यों से जोड़ता है और सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है | भारत और चीन के बीच 2 अहम दर्रे नाथुला और जेलपा भी यही खुलते हैं और इसी घाटी के ठीक नीचे है है सिलीगुड़ी का गलियारा जो भारत को नॉर्थ स्टेट से सीधे जोड़ता है | शायद भारत इस दौर मे इस इलाके के महत्व को समझ रहा है तभी उसने 16 जून से मुखर होकर चीन को आईना दिखाते हुए इस मसले पर भूटान का साथ दिया है | चीन की भारत की सीमा पर सड़क निर्माण की योजना को उसकी विस्तारवादी नीति का एक हिस्सा माना जा सकता है जहां उसकी कोशिश भारत को घेरने की रही है |

असल मे आज के दौर मे भारत की विदेश नीति जिस मोदिनोमिक्स की छाँव तले आगे जा रही है और वैश्विक  स्तर पर नया आकार ले रही है उससे चीन बौखलाया हुआ है जिसकी काट के लिए वह सीमा विवाद को नए सिरे से हवा देने की कोशिश कर रहा है | चीन दुनिया में अपनी धौंस दिखाते हुए भारत को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिशें अरसे से करता रहा है | बीते दिनों दलाई लामा के अरुणाचल दौरे को लेकर भी उसने सवाल उठाए | इससे पहले उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाकों पर भी उसके सैनिकों की आवाजाही देखी गई |  कुछ बरस पहले शी के भारत दौरे के समय भी सीमा विवाद चरम पर पहुँच गया था लेकिन शी की यात्रा पूरा होते ही सब पहले जैसा हो गया लेकिन इस बार का माजरा कुछ और है | 

भारत जिस तरह से अभी वैश्विक स्तर पर कदमताल मोदी की अगुवाई मे कर रहा है उससे चीन परेशान है | हाल के बरस मे भारत के पश्चिम के कई मुल्कों के साथ रिश्ते जहां मजबूत हुए हैं वही अरब देशों के साथ भी मोदी ने नई कदमताल कर विदेश नीति के मोर्चे पर नई इबारत गढ़ने का काम किया है | यही नहीं पीएम की लुक ईस्ट पॉलिसी ने भी चीन के नाक मे दम किया हुआ है जहां जापान , फिलपीन्स , इन्डोनेशिया , मलेशिया, सिंगापुर जैसे अहम चीन के विरोधी देशों को साधकर मोदी ने नया कूटनीतिक दांव खेला है जो अपना असर दिखा रहा है इससे चीन परेशान है क्युकि भारत आज एशिया मे बड़ी ताकत के तौर पर उभर रहा है और दुनिया के लिए बड़ा बाजार है इससे चीन की चिंता बढ़नी लाज़मी है |

मौजूदा दौर मे चीन भूटान और भारत से बहुत खफा है तो इसकी बड़ी वजह ओबीआर गलियारा है जिसमें दोनों देश शामिल नहीं हैं | चीन किसी तरह से भूटान को इस विशाल परियोजना मे शामिल करने पर ज़ोर दे रहा था जिसका भूटान ने मुखर होकर विरोध किया जबकि श्रीलंका , म्यांमार और नेपाल तक को इसमे शामिल कर चीन ने भारत की बड़ी घेराबंदी करने का प्लान तैयार किया है |  वह एशिया मे भारत को नीचा दिखाने के लिए भारत के सभी पड़ोसियो को अपने पाले मे लाने की कोशिश अरसे से करता रहा है जिसमे पाक उसका बड़ा सहयोगी है |

 पूरी दुनिया भले ही पाक प्रायोजित आतंकवाद की कड़े शब्दों मे निंदा करती हो लेकिन चीन पाक के प्रति हमदर्दी दिखाने से बाज नहीं आता | वह जैश , हिजबुल, लश्कर के आकाओं के खिलाफ एक शब्द भी नहीं उगलता और एन एस जी और सुरक्षा परिषद मे भारत की सदस्यता पर जबरन अड़ंगा लगाता रहता है | 

नेपाल , बांग्लादेश , म्यांमार , श्रीलंका की कई आर्थिक योजनाओं मे वह बड़ा साझीदार जहां है वहीं वियतनाम से लेकर फिलीपींस तक अपनी विस्तारवादी योजनाओं को नए पंख लगाने मे लगा हुआ है | जापान, ताइवान, भूटान , इन्डोनेशिया , वियतनाम , थाईलैंड सरीखे देशो के साथ चीन की तनातनी हाल के दौर मे काफी बढ़ी है | दक्षिणी चीन सागर पर तो चीन अपना मालिकाना हक जताता रहा है | वह भी तब जब अंतर्राष्ट्रीय अदालत का  फैसला उसके खिलाफ गया है | दुनिया की सुनने के बजाय वह दक्षिणी चीन सागर में कई आयलेन्ड्स भी बना रहा है जिसमें उसकी नजरें वहाँ की अकूत खनिज सम्पदा पर जा टिकी है |

 भारत की साख जिस तरह बीते कुछ बरस मे दुनिया मे बढ़ी है उससे चीन की चिंता बढ़नी लाज़मी ही है क्युकि मोदी की कूटनीति हर मोर्चे पर चीन के विरोधी देशों को जहां साध रही है वही अमरीका के साथ भारत के मजबूत होते रिश्तों को भी चीन नहीं पचा पा रहा और तो और अब भारत के रिश्ते इज़राइल के साथ दशकों के बाद जिस तरह से प्रगाढ़ हो रहे हैं और डिफेंस सेक्टर मे जिस तर्ज पर वह भारत के साथ सैनिक साजो सामान की बड़ी डील करने जा रहा है उससे ड्रैगन की चिंता और अधिक बढ़ गई है | 

इसी हफ्ते मालबार मे भारत, जापान और अमरीकी सेना का संयुक्त अभ्यास चल रहा है | यह भी चीन के लिए परेशानी की बड़ी वजह बन रहा है क्युकि चीन हिन्द महासागर मे भी अपने जहाज़ी बेड़े तैनात कर चुका है | अब इस संयुक्त युद्धाभ्यास से अमरीका और जापान भारत के करीब आ गए हैं तो चीन का नाराज होना लाज़मी है क्युकि एशिया मे वह खुद के अलावे किसी को बड़ी ताकत के रूप मे उभारते हुए नहीं देखना चाहता है |  इसी कड़ी में उसने हालिया दिनों मे भूटान के सड़क तीर के आसरे भारत को अपना निशाना बनाया है | भारत और भूटान के बीच गहरे संबंध रहे हैं जबकि चीन और भूटान के बीच कुछ खास राजनयिक संबंध नहीं हैं | 

विदेश नीति के हर मसले पर भूटान भारत से दिशा निर्देश लेता रहा है | दोनों देशों के बीच इस तरह की एक संधि भी है जिसके चलते भारत से भूटान ने मदद मांगी और भारत ने तत्काल अपने परम मित्र देश को सैनिको की मदद भेजी | चीन की कोशिश थी किसी भी तरह इस मसले पर भूटान पर हावी हुआ जाएँ लेकिन यहाँ पर उसका दांव उल्टा पड गया | भारत चीन की हालिया तनातनी 16 जून से शुरू हुई जब डोकलाम इलाके में चीन को भारत ने सड़क बनाने से रोक दिया जिससे उसकी परेशानी बढ़ गई |  इसके बाद चीनी सेना ने भारत के दो बंकर नष्ट कर दिए और इस घटना के बाद से बयानों का दौर जारी है | हालात कब तक सामान्य होंगे इस बारे में कुछ भी कहा नहीं जा सकता |

  इस मसले पर भूटान ने भारत की मदद से चीन के सामने अपनी चिंता ज़ाहिर की क्योंकि चीन और भूटान के बीच राजनयिक संबंध नहीं है | इस बीच चीन ने भी  भारत से सेना की गतिविधि को लेकर आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई |  डोकलाम पठार से सिर्फ 10-12 किमी पर ही चीन का शहर याडोंग है, जो हर मौसम में चालू रहने वाली सड़क से जुड़ा है जबकि डोकाला पठार नाथूला से महज 15 किमी की दूरी पर है | 

भूटान सरकार भी डोकलाम इलाके में चीन की मौजूदगी का विरोध कर चुकी है, जो कि भूटान सेना के बेस से बेहद करीब है | चीन का आरोप है भारत की सेना इस इलाके मे दाखिल हुई लेकिन सच्चाई ये है कि 16 जून को चीनी सेना ने डोकलाम में सड़क बनाने की कोशिश की तो  भूटानी सेना के गश्ती दल ने उन्हें रोकने की कोशिश की जिसके बाद भूटान ने चीन से विरोध दर्ज कराया और कहा यह डोकलाम में सड़क निर्माण समझौते का उल्लंघन है | तब भूटानी सेना के साथ डोकाला में मौजूद भारतीय सेना के लोग वहां पहुंचे और इन सबके  बीच चीन अपनी  सरकारी मीडिया के जरिये आक्रामक बयान दे रहा है।

अब चीन ने कहा है कि चीन अपनी सीमा की संप्रभुता बरकरार रखने के लिए कटिबद्ध है और इसके लिए वह युद्ध भी कर सकता है | दोनों देशों की सेनाओं के बीच 1962 के बाद ये सबसे लंबा गतिरोध है। इस एपिसोड़ का और अधिक लंबा चलना दोनों देशों के लिए घातक होगा | देखना होगा रिश्तों में यह तल्खी कब तक जारी रहती है ?

Friday, July 7, 2017

राजनीति की बिसात , हिट विकेट लालू प्रसाद






लालू प्रसाद यादव का नाम जेहन में आते ही बिहार को लेकर एक अलग तरह की छवि बनती है ।  सामाजिक न्याय और पिछड़ों के मसीहा कहलाने वाले लालू प्रसाद  को  अलहदा पहचान जे पी छाँव तले  मिली जब नीतीश , जॉर्ज , सुशील मोदी, शरद यादव, रविशंकर प्रसाद सरीखे नेताओं के साथ आपातकाल में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। जेपी आंदोलन के बाद लालू की राजनीति ऐसे  उफान पर रही जिसने मंडल कमंडल दौर में उनको बिहार का सरताज बना डाला । यह सच भी शायद किसी से छिपा हो उनके और राबड़ी देवी  के  कार्यकाल में  बिहार सबसे बुरे दौर में  कई बरस  पीछे  चला गया । माफिया  गुंडों की लालू  प्रसाद के दौर में जहाँ तूती  बोलती थी  वही अपहरण , रंगदारी , लूटपाट , गुंडागर्दी , रेप  की घटनाएं  उस समय आम बात थी । कानून व्यवस्था लुंज पुंज थी । पुलिस के पास आप अगर प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज करवाने जाते थे तो रजिस्टर  में वह दर्ज भी नहीं हो पाती थी |  अपने कार्यकाल में उन्होंने जहाँ  करोड़ों  के वारे न्यारे किये वहीँ  उन्होंने कानून व्यवस्था  को तार तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी  । बिहार  उनके समय से ही पलायन का दंश झेल रहा है । उस दौर में लालू के खिलाफ जब घोटालों का जिन्न आता है  तो जेहन में सबसे पहले चारा घोटाले का जिक्र होता है जिसने 90 के दशक में लालू को चर्चित कर दिया। लालू प्रसाद  की राजनीती उस राजनीति की देन है जिसे बतौर प्रधानमंत्री वी पी ने हवा दी और  मंडल कमीशन को देश भर में लागू कर दिया गया। पिछड़ी राजनीति का यह तोहफा  लालू प्रसाद को  बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में मिला। यही नहीं आडवाणी के रथ को रोक और उन्हें गिरफ्तार कर लालू प्रसाद ने अपनी सांप्रदायिकता विरोधी छवि को देश में  जरूर मजबूत किया। उस दौर की शासन व्यवस्था का जिक्र करें तो उनका  कार्यकाल बिहार के लिए सबसे बुरे  दौर के रूप में  जाना जाता है जिसने लालूराज को जंगलराज से जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।

गोपालगंज में एक यादव परिवार में जन्मे लालू यादव ने राजनीती का ककहरा जेपी आंदोलन से सीखा । उस दौर को याद करें तो  रैली के दौरान ही जब जेपी पर लाठियां बरसाई जाने लगीं तो लालू उन्हें बचाने के लिए उनकी पीठ पर लेट गए। कहा जाता है कि उनकी इस सूझ बूझ को देखते हुए उन्हें पहली बार लोकसभा का टिकट थमा दिया गया लेकिन लालू यादव का असल राजनीतिक सफर आपातकाल के बाद से शुरू हुआ जब वह पहली बार बिहार के छपरा से सांसद बने। बिहार के मुख्यमंत्री रहने के बाद वह केंद्र सरकार में रेल मंत्री भी बनें। बिहार में लालू जब सत्ता में थे तब  साधु, सुभाष, राबड़ी और लालू (ससुराल)  के इर्द-गिर्द ही सत्ता  घूमती  थी। ठेठ गवई, चुटीली  राजनीति करने वाले लालू प्रसाद ने उस दौर में एक नई परंपरा गढ़ी जब बिहार का नाम देश दुनिया में घोटालों ने ख़राब कर दिया । 1996 में जब चारा घोटाला सामने आया था तो मीडिया ने इसे खूब लपका । देश के कोने कोने में ऐसा पहली बार हुआ जब  जानवरों के चारे तक में घोटाले की बात सामने आई । तब इसे लेकर लालू पर खूब चुटकुले भी बने । 

लालू पर  90  के दशक  में मौजूदा झारखंड की चाईबासा ट्रेजरी से लाखों  रुपए निकालने का केस चल रहा था। तब चाईबासा बिहार में ही हुआ करता था। लालू यादव पर चाईबासा ट्रेजरी से पैसा निकालकर पशुपालन विभाग में ट्रांसफर कराने का केस था। पूरा चारा घोटाला करीब 950 करोड़ रुपए का था जिसमें ये केस तकरीबन 38 करोड़ रुपए की अवैध निकासी का था। अविभाजित बिहार में जगन्नाथ मिश्र से लेकर लालू यादव के सीएम रहने के दौरान फर्जी बिल के जरिए पशुओं को चारा खिलाने के नाम पर निकाला गया था।  चारा घोटाले के चाईबासा ट्रेजरी केस में लालू यादव के साथ जगन्नाथ मिश्र को भी दोषी पाया गया। 

1997 में लालू के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होने के बाद जब उन्हें सी एम पद छोड़ना पड़ा  तो वह अपनी पत्नी राबड़ी को सिंहासन  सौंप जेल चले गए और इसी दौर में  आय से अधिक संपत्ति का भी मामला उनके खिलाफ दर्ज हो चुका था ।लालू को कुछ दिनों बाद बेल मिली लेकिन 2000 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में लालू और राबड़ी को कोर्ट में सरेंडर करना पड़ा जहाँ  राबड़ी को तो बेल मिल गई लेकिन लालू फिर जेल गए ।  2006 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में वह और राबड़ी बरी हो गए । 2013 में लालू में रांची की सीबीआई कोर्ट ने लालू सहित 44 लोगों को सजा सुनाई । इसके साथ ही लालू को लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी थी । वह जेल भी गए और सशर्त जमानत पर बाहर भी आ गए । 
2 बरस पूर्व बिहार चुनावों के समय यह कहा गया लालू यादव की भावी राजनीति की मियाद पूरी हो गई  , लेकिन  सत्ता और चुनाव लड़ने से उनके दूर होने के बाद भी वह बिहार में सबसे अधिक सीट लेकर आये और नीतीश का राजतिलक करवाया | इसी दौर मे  सुप्रीम कोर्ट  ने 21 बरस पुराने 950 करोड़ के चारा घोटाले के सभी चार मामलों में लालू प्रसाद यादव पर अलग-अलग मुकदमे चलाने के निर्देश दिए  साथ ही  जगन्नाथ मिश्र और तत्कालीन ब्यूरोक्रेट सजल चक्रवर्ती पर भी साथ-साथ केस चलाने का ऐलान करके मुश्किलों को बढ़ा दिया । यह वही मामला रहा  जिसमें 2014 में झारखंड उच्च न्यायालय ने यह कहकर रोक लगा दी थी कि एक ही मामले में एक ही व्यक्ति पर समान गवाहों के साथ अलग-अलग केस नहीं चल सकता। 

अदालत ने इस मामले में सारी कार्रवाई तय समय-सीमा में पूरी करने की शर्त भी रखी है।  वैसे अगर देखें  तो लालू प्रसाद की राजनीति पर तब तक कोई खास असर पड़ता नहीं दिखाई देता, जब तक कि वह इन या ऐसे मामलों में सजा पाकर पूरी तरह जेल न चले जाएं। पिछले कुछ महीनों से दोनों मंत्री पुत्रों सहित लालू यादव खुद भी मिट्टी घोटाले के ताजा जिन्न और लालू-शहाबुद्दीन टेलीफोन वार्ता से विपक्ष के निशाने पर थे लेकिन हालिया दिनों मे सी बी आई की रेड में लालू यादव का पूरा कुनबा ही  नई मुसीबत में घिरता दिख रहा है |

लालू यादव पर आरोप है कि उन्होंने रेलमंत्री रहते हुए बड़ी वित्तीय गड़बड़ियां की जिसमें उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बिहार के उप मुख्यमंत्री और उनके बेटे तेजस्वी यादव के अलावा चार अन्य लोगों का नाम आया है | सीबीआई ने इस मामले में भ्रष्टाचार का नया केस दर्ज करते हुए पटना में सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी देवी के आवास सहित पटना, रांची, गुरुग्राम और भुवनेश्वर में 12 जगहों पर छापेमारी की  जिसके बाद उनकी पार्टी की  कई मुश्किलों में इस फैसले ने इजाफा कर दिया है।  मामले की जड़े  तत्कालीन एनडीए सरकार के उस फैसले तक जाती हैं जब उसने रेलवे के होटलों की कैटरिंग सेवाओं का प्रबंधन आईआरसीटीसी को सौंपने का फैसला किया था |

 रेलवे बोर्ड ने 2001 में फैसला लिया कि कैटरिंग सर्विस और रांची तथा पुरी स्थित रेलवे के होटल बीएनआर का संचालन भारतीय रेलवे से लेकर आईआरसीटीसी को दे दिया जाएगा |  

इसके ठीक बाद जब 2004 में लालू रेलमंत्री बने, तो उन्होंने सुजाता होटल्स के मलिक हर्ष और विनय कोचर, लालू यादव के करीबी पीसी गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता और आईआरसीटीसी के अधिकारियों के साथ मिलकर कथित तौर पर आपराधिक साजिश रची |  इन लोगों ने साजिश के तहत होटलों पर अधिकार पाने के लिए  योजना बनाई | सीबीआई के मुताबिक, इसी साजिश के तहत विनय कोचर ने 25 फरवरी, 2005 को पटना में तीन एकड़ की प्राइम लैंड महज 1.47 करोड़ रुपये में डिलाइट मार्केटिंग को बेच दी, जो कि सर्किल रेट से काफी कम थी | 

 इस कंपनी का मालिकाना हक प्रेमचंद गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता के पास था, लेकिन यह लालू प्रसाद  की ही बेनामी कंपनी थी | इस सौदे के दिन ही रेलवे बोर्ड ने बीएनआर होटल आईआरसीटीसी को सौंपने का ऐलान किया और फिर दोनों होटलों का प्रबंधन कोचर बंधुओं की कंपनी को सौंप दिया गया |  इसके लिए जो टेंडर निकाला गया वह भी गलत था |   इस मामले में तत्कालीन प्रबंध निदेशक पीके गोयल ने कथित रूप से धांधली की | टेंडर की शर्तों में फेरबदल हुआ , ताकि इस टेंडर के लिए सुजाता होटल को एकमात्र दावेदार बनाया जा सके|  

यहां दोनों होटलों के लिए  15 से ज्यादा टेंडर दस्तावेज हासिल किए गए, लेकिन सुजाता होटल के अलावा किसी दूसरी कंपनी का कोई रिकॉर्ड नहीं है | सीबीआई ने दावा किया कि साल 2010 और 2014 के बीच डिलाइट मार्केटिंग का मालिकाना हक भी सरला गुप्ता से लारा प्रोजेक्ट्स के हाथों में चला गया, जिसका स्वामित्व राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव के पास है जो नीतीश सरकार मे अभी अहम  उपमुख्य मंत्री पद मे हैं |  पटना की उस जमीन की कीमत भी तब तक सर्किल रेट के अनुसार बढ़कर 32.5 करोड़ रुपये हो गई | 

 सीबीआई का आरोप है कि पीसी गुप्ता के परिवार के सदस्यों ने 32.5 करोड़ रुपये नेटवर्थ की कंपनी का शेयर मात्र 65 लाख रुपये के मामूली दाम पर लालू प्रसाद यादव के परिवार को ट्रांसफर कर दिया सीबीआई ने इस मामले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी प्रसाद यादव, सरला गुप्ता, विजय कोचर, विनय कोचर, लारा प्रोजेक्ट्स और आईआरसीटीसी के पूर्व महानिदेशक पीके गोयल के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 , 120बी के अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 पीसी एक्ट की धाराओं 13(2) और 13 (डी) के तहत एफआईआर दर्ज किया है |  

रांची और पुरी के चाणक्य बीएनआर होटल जोकि रेलवे के हेरिटेज होटल थे | लालू यादव ने रेल मंत्री रहते हुए इन होटलों को अपने करीबियों को लीज पर बेच डाला जो  होटल अंग्रेजों के जमाने के थे इसीलिए इसका ऐतिहासिक महत्व था पर अब नहीं रहा क्योंकि इन होटल्स को पूरा रेनोवेटेड कर दिया गया है |  लालू प्रसाद एवं उनके परिवार के खिलाफ एक हजार करोड़ की बेनामी संपत्ति का मामला रांची और पुरी से जुड़ा हुआ है | 


लालू प्रसाद जब रेल मंत्री थे तब रेल मंत्रालय ने रांची एवं पुरी के ऐतिहासिक होटल बीएनआर को लीज पर देने का निर्णय लिया | इस लीज के लिए रांची के कुछ होटल व्यवसाइयों के अलावा झारखंड से राज्यसभा के सांसद प्रेमचंद गुप्ता की कंपनी दोनों होटलों को लेने में सफल रहे और रांची के बीएनआर होटल को पटना के प्रसिद्ध होटल चाणक्य के संचालक हर्ष कोचर को 60 साल के लिए लीज पर मिल गया | पहले तो लीज की अवधि 30 वर्ष रखी गयी, परन्तु बाद में इसकी अवधि बढ़ाकर साठ साल कर दी गई |  आरोप है कि इन दोनों होटलों को लीज पर देने की जितनी कीमत राज्य सरकार को मिलनी चाहिए वह नहीं मिली  | 

ताजा फैसला लालू प्रसाद के खिलाफ  हमलों को और धार देगा राजनीतिक उठापटक बढ़ेगी क्युकि दोनों पुत्र इस समय नीतीश सरकार में ताकतवर मंत्री  हैं | यह भी तय है कि फैसला लालू प्रसाद की राजनीति से ज्यादा बिहार के महागठबंधन की राजनीति पर असर डालेगा और यही असल में देखने की बात होगी। कहना न होगा कि हाल में लगे आरोपों के बाद जिस तरह की बातें सामने आईं, जिस तरह महागठबंधन के बड़े साथी लालू प्रसाद के बचाव के बजाय जद-यू अपनी छवि को लेकर सतर्क दिखा है उसने भी भविष्य के संकेत दिए हैं। 


यह फैसला लालू की मुश्किलों को और बढ़ा सकता है क्युकि 2005 के हलफनामे मे उन्होने अपनी संपत्ति 87 लाख के आस पास बताई थी लेकिन सी बी आई की मानें तो लालू के पूरे कुनबे ने 1000 करोड़ से भी अधिक की अकूत बेनामी सम्पत्ति बटोरी है वह भी उस दौर मे जब यूपीए के उस दौर में जब लालू की ठसक से सब कुछ काम  आसानी से हो जाया करते थे | हाल में लालू के  ठिकानों पर आयकर विभाग के ताबड़तोड़ छापों  के बाद तो लालू की मुश्किलें और बढ़ गई हैं ।


 इस घटना के बाद बिहार में राजनीतिक हालत तेजी से बदल रहे हैं । लोग महागठबंधन के भविष्य पर भी अब सवालिया निशान लगा रहे हैं । नीतीश कुमार अब मुश्किल में पड़ते जा रहे हैं |  लालू पर लगातार शिकंजा कसे जाने और  तेजस्वी और तेज प्रताप के भी भ्रष्टाचार के मसले पर घिरने से उनकी पार्टी की भी खूब किरकिरी हो रही है । इधर सुशील मोदी ने भी लालू का साथ छोड़ने का राग कुछ महीनों पहले छेड़कर  भाजपा और जद यू के पास आने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया है।

 नीतीश ने भी हाल के दिनों में वह खुद पी एम पद के दावेदार नहीं कहकर एक बड़ा राजनीतिक बयान  दिया है जिसके कई बड़े मायने बिहार की राजनीती में निकाले जा रहे हैं । बिहार में सत्ताधारी जदयू को डर है कि लालू प्रसाद का करियर अगर समाप्त हुआ तो नीतीश की साफ़ सुथरी छवि पर भी ग्रहण लगना  तय है वहीँ लालू प्रसाद जानते हैं कि दोनों बेटों को वारिस बनाकर  उनकी पार्टी एक नई शुरुवात की तरह बढ़ रही थी लेकिन उनके खिलाफ चार केसों पर अगर बड़ा फैसला आ जाता है और आयकर विभाग के हालिया मामलों में भी अलग अलग सजा हुई तो उनको अपने वोट बैंक सेना केवल  हाथ गंवाना पड़  सकता है बल्कि राजद की लालटेन का भी सूपडा बिहार की राजनीति से साफ हो सकता है । साथ ही नीतीश  कुमार भी उनसे दूरी बना सकते हैं ।

इधर लालू के बिना राजद में सब सून सून  होने का अंदेशा भी बन रहा है। अगर ऐसा होता है तो नीतीश के लिए बिहार मे अकेले चलो की लड़ाई आसान नहीं होने वाली |  अब इस मामले में  के ताजा रुख  और आयकर विभाग के तमाम जानकारों की पड़ताल को देखते हुए लालू यादव और कुनबे  को  निर्दोष करार दिए जाने की संभावना नहीं के बराबर बन रही है ।  ऊपर से आय से अधिक संपत्ति मामले में उनकी नई मुश्किल बढती ही जा रही है । 

सबसे बड़ा सवाल अब यह है क्या सुशासन बाबू  तेजस्वी को मंत्री मंडल से बाहर निकालेंगे ? फिलहाल संकेतों को डिकोडे करें तो जेडीयू लालू के खिलाफ चुप्पी को  अपनी ढाल बना रही है | सूत्र बता रहे हैं छापे के बाद पार्टी की हुई आपात बैठक मे भी पार्टी हाई कमान की तरफ से इस मामले पर चुप रहने को कहा गया है | पार्टी प्रवक्ताओं को भी इस मसले पर कुछ भी उगलने से साफ इंकार कर दिया गया है |   जेडीयू  इस वक्त वेट एंड वाच  की मुद्रा मे है | 


 नीतीश कुमार के बारे मे माना जाता है वह पार्टी के बड़े फैसले खुद से लेते हैं | चाहे 2014 मे भाजपा के साथ ना जाने का फैसला रहा हो या नोटबंदी के समर्थन का | हर फैसले मे नीतीश की छाप दिखाई दी है | यह हाल के दौर मे रामनाथ कोविन्द की राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के समर्थन मे भी दिखाई दिया है | नीतीश ने ही सबसे पहले विपक्ष की एकजुटता को दरकिनार करते हुए रामनाथ का समर्थन किया था और उनको बधाई देने सीधे राजभवन पहुँच गए | छापे और मुकदमें के बाद अब  नीतीश लालू के खिलाफ सोच समझकर अपना तीर कमान से निकालेंगे | दिल्ली में 23 जुलाई को जेडीयू के राष्ट्रीय़ कार्यकारिणी की बैठक होने जा रही है |  माना जा है कि तब तक गठबंधन की गांठ भी साफ हो जाएंगी |  

बहरहाल जो भी हो आने वाले दिनों में अब लालू  प्रसाद के सामने  भारी संकट खड़ा हो गया है । सुप्रीम कोर्ट का लालू के खिलाफ पहले के फैसलों पर साफ  कहना है  चार अलग-अलग मामलों में लालू पर  मुकदमा चलेगा, फिर सजा का एलान होगा। इस फैसले के बाद अर्णव गोस्वामी के रिपब्लिक चैनल पर आये आडियो टेप ने बिहार मे तहलका मचा दिया  था जहाँ लालू जेल में शाहबुद्दीन से बात करते नजर आ रहे थे । इस टेप ने बिहार के सत्ता गलियारों में लालू  की हनक और नीतीश के लाचार सी एम के सच को दिखाने का काम किया  जिसके बाद जे डी यू  और राजद को ना उगलते बन रहा था ना निगलते ।

रही सही कसर अब आयकर विभाग की हालिया छापेमारी ने बढ़ा दी है जहां लालू का पूरा कुनबा घिरता दिख रहा है । देखना होगा लालू प्रसाद इस मुश्किल से कैसे बाहर आते हैं जहाँ उनकी साख एक बार फिर सवालों के घेरे में है तो दूसरी तरफ राज़द और महागठबंधन के बिखरने का अंदेशा भी नजर आ रहा है । क्या राजनीति की बिसात पर अबकी बार हिटविकेट होंगे लालू प्रसाद ? फिलहाल इस सवाल के जवाब के लिए जुलाई महीने के आखिर तक और इन्तजार करना पड़ेगा ।