Friday, 17 November 2017

साँसों में जहर घोल रही है दिल्ली एनसीआर की हवा






राजधानी दिल्ली और एन सी आर के तमाम हिस्सों में  धुंध की चादर ने बीते बरस की दिवाली के दौर की यादों को ताजा कर दिया  |  दिल्ली एन  सी  आर   के सभी इलाकों में लोगों का घरों  से निकलना  मुश्किल हो गया  क्योंकि  प्रदूषण ने इस बार  सभी रिकॉर्ड  तोड़ दिए हैं  । जिधर देखो वहां धुंध की चादर दिखाई दे रही है । आँखों से पानी आ रहा है तो खांसी  ने लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है । लोगों को अपने काम पर जाने में दिक्कतों से दो चार होना पड़ रहा है वहीँ यह प्रदूषण  का खतरनाक स्तर  छोटे बच्चों के लिए घातक  है  | वैज्ञानिको का साफ़ मानना है कि  दिल्ली की आबो हवा में इतना जहर घुल गया है  कि अब यहाँ जीना मुश्किल होता जाएगा और  जहरीले प्रदूषण  की  गिरफ्त  आने वाला हर इंसान सांस , हार्ट की कई बीमारियों का शिकार हो  जायेगा ।अंतरिक्ष एजेंसी नासा की तस्वीरों में भी उत्तर भारत के वायुमंडल में आग जनित धुंए  की मौजूदगी को दर्शाया है |  दिल्ली एनसीआर क्षेत्र में हवा की गति थमने के कारण वायुमंडल में मौजूद प्रदूषक तत्वों पीएम 2.5 और पीएम 10 धुंध की शक्ल में जमा हो गये हैं जिसकी  वजह से न सिर्फ हवा में घुटन बढ़ गयी है बल्कि यातायात सहित सामान्य जनजीवन भी प्रभावित हुआ है | हवा की गुणवता बताने वाला सूचकांक हर दिन गंभीर कुलांचे मार  रहा है | 

हाल कितने बुरे हैं इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि  विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायु प्रदूषण  मापने का जो पैमाना बनाया है पी  एम 2.5  का स्तर  प्रतिघन मीटर  10 माइक्रो ग्राम से अधिक नहीं  होना चाहिए लेकिन  दिल्ली के कई इलाकों में यह  400  माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर (एमजीसीएम) और पीएम  10 का स्तर 500   एमजीसीएम रिकॉर्ड हुआ जो कहीं न कहीं हमारे लिए खतरे की घंटी है । उत्तम नगर वेस्ट से लेकर द्वारका और पीतमपुरा से लेकर इंद्रलोक हर जगह कमोवेश एक जैसे हालात हैं । विजिबिलिटी कम है और सफ़ेद धुंध की चादर ने दिल्ली एन सी आर को अपने आगोश में ले लिया है । दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार राजधानी दिल्ली  में  पीएम 2.5 और पीएम 10 का स्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है । कई स्थानों में पीएम 2.5 का स्तर सामान्य से नौ गुना अधिक   तो पीएम 10 का स्तर सामान्य से सात गुना अधिक  पार कर गया है   । दिनों दिन दिल्ली के इलाकों में  प्रदूषण के स्तर में भी बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है ।  पी एम 2.5 हवा में किसी भी प्रकार के पदार्थ को जलाने से निकलने वाले धुंए से आता हैं। वाहनों के इंजन में पेट्रोल और डीजल के जलने से धुआं निकलता हैं, और इस धुंए में विभिन्न प्रकार के प्रदूषक होते हैं, जिनमें पी एम 2.5 भी एक होता हैं। लकड़ी, गोबर के उपले, कोयला, केरोसिन तथा कचरा जलाने, फैक्टरी, सिगरेट से निकलने वाला धुंए में पी एम 2.5 की तादात अत्यधिक होती हैं। पी एम 2.5 कई प्रकार से हमारे स्वास्थ्य पर असर डालते हैं। छींक, खांसी, आंखों, नाक, गले और फेफड़ों में होने वाली जलन का कारण पी एम 2.5 भी हो सकता हैं। लंबे समय तक पी एम 2.5 की अधिकता वाली प्रदूषित हवा मे रहने से अस्थमा, फेफड़ों तथा हृदय संबंधी बीमारी होने की संभावना अत्यधिक बढ़ जाती है और  यही बीमारिया बाद में मौत का कारण बनती है। पी एम 2.5 से होने वाली बीमारी का खतरा बूढ़े और बच्चो में अत्यधिक होती है


भारत में शहरों में रहने वालों की संख्या दिन ब दिन बढ़ती जा रही हैं। वाहनों, फैक्टरी तथा कचरा जलाने से निकलने वाला धुआँ शहरों में पी एम 2.5 का मुख्य स्रोत होता हैं। आज विश्व के 20 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में भारत के 10 से अधिक  शहर आते हैं। देश के ज़्यादातर शहरो मे पी एम 2.5 का स्तर सरकार द्वारा निर्धारित किए गए मानको से कहीं  अधिक  है। पी एम 2.5 हमारी आस पास की हवा में घुला एक ऐसा अदृश्य जहर हैं, जो प्रति वर्ष विश्व के लगभग 80 लाख लोगो की मौत का कारण बनता हैं। हिंदुस्तान में हर वर्ष लगभग 8 00,000 लोग सिर्फ पी एम 2.5 से होने वाली बीमारियो के कारण मारे जाते हैं। देश मे सबसे ज्यादा मौते सांस और हाई ब्लड प्रेशर के कारण होती हैं, तथा घर के अंदर खाना पकाने के लिए लकडियो, गोबर के उपले, व केरोसिन से निकलने वाले धुंए से उत्पन्न पी एम 2.5 मौत दूसरा सबसे बड़ा  कारण हैं। सिगरेट पीना और खाने मे पोषक तत्वों की कमी देश मे होने वाली मौतों का तीसरा व चौथा सबसे बढ़ा कारण हैं। पाँचवा बढ़ा कारण बाहर की हवा में उपस्थित पी एम 2.5 हैं जो गाड़ियों, फैक्टरी और कचरा जलाने से निकलने वाले धुंए से आता हैं। 

दशकों से यह बात देखने में आ रही है कि दिल्ली की आबोहवा की फ़िक्र सरकारों और नीति नियंताओं को नहीं है । प्रदूषण को लेकर आज एक जनांदोलन की ज़रूरत है जिसकी शुरुवात आम आदमी से होनी चाहिए । दिल्ली में डीजल से चलने वाले वाहनों पर सरकार का कोई अंकुश नहीं है । सार्वजनिक परिवहन यहाँ पर दूर की गोटी है । साल दर साल वाहनों की संख्या यहाँ पर बढती जा रही है । एक ख़ास बात यह है आज के समय में कारें हमारे देश में  स्टेटस सिंबल की तरह हो गई हैं | एक परिवार में अगर 5 सदस्य हैं तो सबके अपने अपने वाहन हैं जिससे वो आते जाते हैं । निजी वाहनों की संख्या यहाँ  80  लाख से भी ज्यादा हो चली है जो दिल्ली की साँसों में जहर घोल रही है । कई साल पुराने डीजल से चलने वाले वाहन  दिल्ली की फिजा में फर्राटा भर रहे हैं जो सबसे अधिक प्रदूषण का कहर बरपा रहे हैं ।  चाइना  और जापान जैसे देशों में पी एम 2. 5 अगर सामान्य स्तर को पार कर जाता है तो वहां की सरकारें जनता के स्वास्थ्य के प्रति संजीदा हो जाती हैं और कड़े फैसले लेती हैं । चीन में कार्बन उत्सर्जन का मुख्य कारक कोयला रहा इसलिए उसने साल 2017 तक कोयले के इस्तेमाल में 70 प्रतिशत तक कटौती करने का लक्ष्य रखा है और उसने बीते एक साल में ही यह निर्भरता काफी कम कर दी है। चीन में अब ऊर्जा की जरूरतों को बिजली और गैर-जीवाश्म ईंधनों से पूरा करने की कोशिश की जा रही है। चीन में  हैवी इंडस्ट्री को बंद किया जा रहा जो कोयले पर आधारित हैं। साथ ही  चीन ने 2020 तक कोयला मुक्त होने का लक्ष्य बनाया है । चीनी सरकार ने  जब यह देखा कि बीजिंग और उसके बाकी बड़े शहरों का दम घुटने लगा है तो उसने ऑनलाइन एयर रिपोर्टिंग की व्यवस्था शुरू की। चीन में अब 1500 साइट्स से पल्यूशन के रियल टाइम आंकड़े हर घंटे जारी किए जाते हैं। चीनी सरकार भी नियमित तौर पर शहरों की एयर क्वॉलिटी की रैंकिंग जारी करती है। साथ ही लोगों को भी समय-समय पर ये डाटा चेक करते रहने की सलाह जारी की जाती है।  2015 में  चीन में पर्यावरण प्रोटेक्शन कानून सख्ती से लागू हैं। चीन में ये कानून अब इतना कड़ा है कि प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों पर जुर्माने करने की कोई सीमा नहीं रखी गई है। कई बड़ी कंपनियों पर जुर्माना भी लगाया गया है । गैर-लाभकारी संगठन प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ जनहित मुकद्दमे दायर कर सकते हैं। स्थानीय सरकारों पर भी इन कानूनों को सख्ती से लागू कराने का दायित्व है। चीन ने 2017 तक ऐसी सभी गाड़ियों को सड़क से बाहर करने का लक्ष्य रखा है जो साल 2005 तक रजिस्टर्ड हुई हैं। जापान में भी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को मजबूत किया गया है तो  अटलांटा में प्रदूषण का स्तर बढ़ते ही एक खास तरह का अलार्म बजता है, जिसके बाद लोग तत्काल अपने वाहन खड़े कर देते हैं। वह सभी  वाहन दुबारा तभी चलते हैं जब प्रदूषण का स्तर तयशुदा मानकों के मुताबिक हो जाए।ये सभी देश ट्रैफिक जाम  से पूरी तरह से  मुक्त हैं और क्लोरो फ्लूरो कार्बन का उत्सर्जन कम करने   में अपना जोर लगा रहे हैं ।जबकि हमारे देश की बात करें तो यहाँ सरकारों का पूरा जोर इवन आड लागू करने में है | प्रदूषण  से लड़ने की इच्छा शक्ति  तो हमारे देश में है ही नहीं | यह तो वही बात हुई चार दिन की चांदनी फिर अँधेरी रात | 

चीन सरकार ने आने वाले 5 सालों में पेइचिंग, शंघाई और बीजिंग जैस शहरों में गाड़ियों की संख्या को निश्चित कर बड़ी कटौती करने की योजना बनाई हुई है लेकिन भारत में क्या होता है यह हम सब जानते हैं । केंद्र और राज्य सरकारें आपसी कलह में उलझी रहती हैं  और अदालती फटकार का इंतजार करती हैं । पटाखे फूटने चाहिए या नहीं ? इवन आड  लागू हो की नहीं इसमें भी अदालतों के आदेश का इन्तजार हमें करना पड़ता है |  नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल समय-समय पर  प्रदूषण की हालत को लेकर बीते कई  बरसों  में चिन्ता प्रकट करता रहता है लेकिन इसके नियंत्रण को लेकर एनजीटी के आदेश को दिल्ली और देश के दूसरे राज्य टाल-मटोल रवैया अपनाते हैं जिससे प्रदूषण की समस्या का समाधान दूर की कौड़ी बनता जाता है ।  असल में अंधाधुंध विकास को लेकर हमने बीते कई बरसों में बहुत तेजी दिखाई है । दिल्ली में बड़े बड़े फ्लाईओवर बनाये गए हैं तो मालों का नया कल्चर देखने में आया है । फैक्ट्रिया शहरी आबादी वाले इलाकों में जहर घोलने का काम कर रही हैं । दिल्ली की सीमा में हर राज्य के भारी वाहन और ट्रक सामान  ढो रहे हैं जिनसे कई गुना प्रदूषण  बढ़ रहा है ।  गुड़गाँव, फरीदाबाद, नोएडा  सरीखे शहर भी आज सुरक्षित नहीं  हैं । यहाँ पर प्रदूषण का लेवल सबसे अधिक हो चला है क्युकि बीते कई  दशको में यहाँ  विकास ने कुलांचे सबसे अधिक मारे हैं और जमीनों का अधिग्रहण सबसे अधिक यही  हुआ है और चमचमाते  विकास ने  यहीं सबसे तेज फर्राटा भरा है । हरियाली खत्म  हो चली  है तो  कंक्रीट का जंगल यहीं  बना है ।  दिल्ली में तो रियल स्टेट का धंधा ऐसा चला है कि हर सोसायटी में ब्रोकरो  की बाढ़ आ गई और बिल्डर और राजनेताओं के नेक्सस ने ऐसी लूट मचाई कि पर्यावरण की तो मानो धज्जियाँ ही उड़ गई । चार्वाक  दर्शन की तरह महानगर भी अब  खाओ पियो और मौज करो में यकीन रख रहे हैं । रही  सही कसर उन उद्योगों ने पूरी कर दी जिनसे निकलने वाले कचरे ने आम आदमी के सामने बीमारियों की बाढ़ लगा दी है । 

हाल के समय में दिल्ली एन सी आर  की आबोहवा खाराब होने के पीछे कारण यही बताया यही जा रहा है कि यह सब पटाखो के शोर और हरियाणा , राजस्थान  और पंजाब जैसे राज्यों में किसानों के पराली जलाने के चलते हुआ है । दिवाली पर यह सबको पता है कि पटाखों के शोर से वायुमंडल प्रदूषित होता है तो  कोर्ट के आदेश के बाद भी ऐसा कुछ नहीं किया गया जिससे पटाखे कम छुडाये जा सके । साथ ही दिल्ली के पड़ोसी राज्यो को ऐसा कुछ करना था जिससे पराली के जलाने पर सख्ती लग सके । हमारी सबसे बड़ी कमी यही है जब पानी सर से ऊपर बहता है तब हम जागते हैं ।  सडकों पर वाहनों के बोझ को कम करने के लिए दिल्ली सरकार ने अब  कुछ दिन के लिए इवन आड  स्कीम को लागू  करने का फैसला किया है  लेकिन इससे प्रदुषण की समस्या का निवारण तो नहीं हो सकता | रात में दिल्ली की सीमा में घुसने वाले ट्रको के कारण दिल्ली की आबोहवा  सबसे अधिक विकृत हो जाती है  । दिन में तो मामला ठीक रहता है  लेकिन रात में प्रदूषण का स्तर दिन के स्तर से कई गुना ज्यादा हो जाता है  | केजरीवाल सरकार  भले ही इस मसले पर अपनी पीठ थपथपाये   ;लेकिन प्रदुषण रोकने के लिए यह योजना भी उतनी कारगर नहीं रही जितना आम आदमी पार्टी ने इसे प्रचारित कर दुनिया में लोकप्रियता बटोरी । इवन आड  के बजाये  अब सरकार को सार्वजनिक परिवहन दुरुस्त करने पर जोर देना चाहिए । डीजल के वाहनों पर रोक लगनी भी जरूरी है ।साथ ही मेट्रो के फेरे बढ़ाने और किराया  घटाए  जाने की जरूरत है जिससे आम आदमी भी सुरक्षित सफर कर सके । 

यूरोप में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने के लिये मुफ्त सेवाएँ मुहैया कराई जा रही हैं। भारत को भी इस पर ध्यान देने की जरूरत है। हैरत की बात यह है कि  प्रदूषण को लेकर सरकारों को कोर्ट ने बीते कई बरसों से आगाह किया है लेकिन इसके बाद भी उनसे हालात नहीं सँभलते ।वायु प्रदूषण से जुडी विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के सबसे अधिक 20 प्रदूषित शहरों में 13 शहर भारत के है जिनमे दिल्ली के साथ इलाहाबाद , पटना ,कानपुर , रायपुर सरीखे शहर भी शामिल है जहाँ हाल के बरसों में चमचमाती अट्टालिकाओं को विकास का अत्याधुनिक पैमाना मान लिया गया है ।  यूनिसेफ की हाल की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 30  करोड़ बच्चे यानि 7 में एक बच्चा सांस लेने की बीमारी से ग्रस्त है । अब तक पांच साल से कम उम्र  के तकरीबन 63 करोड़ बच्चो की मौत वायु प्रदूषण  से हो चुकी है जिनमे से अधिकतर मामले उत्तर भारतीयों से जुड़े पाए गये हैं । राजधानी दिल्ली में हुआ हालिया एक सर्वे यह बताता है कि दिल्ली में हर तीसरे व्यक्ति का फेफड़ा खराब हो चुका है ।  

भारत में वायु प्रदूषण आज मौत का बड़ा कारण भी बन गया है ।  दरअसल हम जिस हवा में सांस ले रहे हैं और हमने अभी भी नहीं चेते  तो हमारा भविष्य भयावह होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी किये गए आकड़ों के मुताबिक प्रदूषण के कारण भारत में 1.4 मिलियन लोगों की असामयिक मृत्यु हो रही है। यानी हर 23 सेकंड में वायु प्रदूषण के कारण एक जान चली जाती है। जिस ईंधन का प्रयोग आज हम करते हैं, वह भी वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है।  फ़िलहाल प्राकृतिक गैस जैसे स्वच्छ ईंधन प्रदूषण कम करने का एकमात्र विकल्प है। जिन ईंधनों का प्रयोग आज हम करते हैं  वह वातावरण में भारी मात्रा में कार्बन डाइआॅक्साइड, सल्फर डाइआॅक्साइड, नाइट्रोजन आॅक्साइड  का उत्सर्जन करते हैं जो हवा को बुरी तरह से प्रदूषित करते हैं। हम ईंधनों के प्रयोग को बंद नहीं कर सकते क्योंकि उद्योगों का एक बड़ा हिस्सा इन पर ही चल रहा है लेकिन हम निश्चित तौर पर उनके प्रयोग को बदलकर हम जीवाश्म ईंधन  की दिशा  मजबूती के साथ बढ़  सकते हैं जो काफी  सस्ता  है और फेफड़ों के लिए भी नुकसानदेह नहीं हैं।  यदि प्रदूषण को यहीं पर नहीं रोका गया तो राजधानी दिल्ली की तरह कई शहरों का हाल  बुरा होगा । नासा की हाल में जारी तस्वीरें  दिल्ली में प्रदूषण  की पोल खोल रही है ।

दिल्ली की हवा में जहर  कैसे कम  हो आज काम इस पर  जरूरत है । आज देश में लाखो  कारें प्रतिमाह बिक रही हैं । हर घर में वाहनों का रेला  देखा जा सकता है । सरकारों को आज  सार्वजनिक परिवहन को दुरुस्त  करने की जरूरत है । दिल्ली  एन सी आर की बात करें तो यहाँ पर सरकार को  डीजल से चलने वाली गाड़ियों और ट्रको पर अंकुश लगाने की दिशा में बढ़ना चाहिए । उद्योगों के साथ बड़ी प्रदूषण  की वजह यही है ।  लोगो को अपने वाहनों के सुख के बजाय मेट्रो या फिर  सी एन जी बसों का प्रयोग करने पर जोर देना  चाहिए । सरकारों को चाहिए राजधानी  की सडको पर वह वाहनों के भारी बोझ को कम करने की दिशा में कोई कठोर  एक्शन प्लान बनाये । अगर अनियंत्रित वाहनों की रफ़्तार  उसने थाम ली तो ट्रैफिक जाम से मुक्ति मिल जायेगी और प्रदूषण  के खिलाफ यह पहला कदम होगा जिसमे जनभागीदारी की मिसाल देखने को मिलेगी ।  अकेले कोई  सरकार  प्रदूषण पर काबू नही पा सकती  ।  इसके लिये सरकार के साथ-साथ लोगों को भी सामने आगे आना होगा । पर्यावरण को हम नजरअंदाज नहीं कर सकते क्युकि मानव जीवन की बुनियाद पर्यावरण पर ही टिकी है । अगर प्रकृति की अनदेखी होती रही तो मानव सभ्यता का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है ।

Thursday, 2 November 2017

किस करवट बैठेगा हिमाचल चुनाव का ऊंट

                      



हिमाचल  प्रदेश में  छाई  सर्द हवाओ ने भले ही मौसम ठंडा कर दिया हो लेकिन राजनेताओ के चुनावी प्रचार पर इसका कोई असर नहीं है | राजधानी शिमला से लेकर कुल्लू - मनाली और चंबा सरीखे इलाकों से लेकर लाहुल स्पीति तक विपरीत परिस्थितियों और प्रतिकूल मौसम के बावजूद  ठण्ड में भी प्रत्याशियों का चुनावी पारा सातवे आसमान पर है | टिकटों का घमासान थमने के बाद अब सभी विधान सभाओ में चुनाव प्रचार तेज हो गया है और सभी पार्टियों ने अपनी पूरी ताकत चुनाव प्रचार  पर केन्द्रित कर दी है | जैसे जैसे मतदान की तिथि 9  नवम्बर  पास आती जा रही है वैसे वैसे हिमाचल की शांत वादियों में चुनावी सरगर्मियां  तेज होती जा रही हैं | राज्य में दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के बीच इस बार भी मुख्य जंग  है लेकिन बड़े पैमाने पर इन दोनों दलों के बागी प्रत्याशियों के मैदान में होने से खेल बिगड़ने के पूरे आसार दिखाई दे  रहे हैं | 

हिमाचल प्रदेश में कुल 68 विधानसभा सीटे हैं |  पिछले विधानसभा चुनाव में राज्य की 68 सीटों में से कांग्रेस को 36, भाजपा को 26 तो अन्य को 6 सीटें मिली थी | कांग्रेस को 2007 की तुलना में 2012 के विधानसभा चुनाव में 13 सीटों का फायदा हुआ था, वहीं बीजेपी को 2007 की तुलना में 2012 में 16 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा था | 2012 विधानसभा चुनाव में मिले वोटों पर नजर डालें तो कांग्रेस को 43 फीसदी और भाजपा  को 39 फीसदी वोट मिले थे |  2007 की तुलना में कांग्रेस का वोट 5 फीसदी बढ़ा जबकि भाजपा को 5 फीसदी वोट का नुकसान उठाना पड़ा | भाजपा  महज 4 फीसदी वोटों से कांग्रेस से पीछे रही लेकिन कांग्रेस की तुलना में उसे 10 सीटें कम मिली | छोटा राज्य होने के चलते इस बार भी यहाँ हार जीत का अंतर बहुत कम रहने के आसार हैं |  हिमाचल इस  समय उन  राज्यों में शामिल है जहाँ कांग्रेस अपनी सत्ता बचाने की जद्दोजेहद अपने सबसे भरोसेमंद चेहरे वीरभद्र सिंह के आसरे कर रही है | यहां 2012 में केन्द्र  से इस्तीफे के बाद वीरभद्र सिंह ने शानदार वापसी की और बीते चुनाव में कहो दिल से धूमल फिर से के बीजेपी के नारे को आईना दिखा दिया था |   इस बार भी वीरभद्र  सिंह कांग्रेस  का किला बचाने की पूरी  कोशिश कर रहे हैं | उनके सामने भाजपा के  सी एम के चेहरे के रूप में एक बार फिर प्रेम कुमार धूमल  ही खड़े  हैं |

बीते कई दशक से  हिमाचल प्रदेश की राजनीति उत्तराखंड सरीखी भाजपा और  कांग्रेस के इर्द गिर्द ही  रही है | इस बार भी  बीजेपी के प्रेम कुमार धूमल और कांग्रेस के वीरभद्र सिंह के चेहरों के  बीच ही  हिमाचल की जंग है |  वीरभद्र सिंह की  आय से ज्यादा संपत्ति के मामले को लेकर चल रही सीबीआई जांच की वजह से इस  चुनाव में कांग्रेस को  मुश्किलों का सामना करना पड़  रहा है | भाजपा का पूरा चुनाव प्रचार इस दौरान हिमाचल में कांग्रेस के भ्रष्टाचार और माफियाराज पर केंद्रित है | वहीँ  कांग्रेस बीजेपी द्वारा राज्य की उपेक्षा करने और जय शाह  की संपत्ति पर ताबड़तोड़ हमले करने से पीछे नहीं है |   नोटबंदी और जीएसटी का मामला भी इस राज्य में थाली में चटनी सरीखा है | पी एम मोदी की बेदाग़ छवि और भीड़  को वोट में बदलने की उनकी कला का लोहा यहाँ  हर कोई मान रहा है और उम्मीद है हिमाचल भाजपा मोदी मैजिक के  सहारे आसानी से फतह कर जाएगी | 

हिमाचल की  राजनीती के अखाड़े  में यूँ  तो भाजपा और कांग्रेस मुकाबले में बराबरी पर बने हैं लेकिन जिस  तरीके से इस दौर में दोनों दलों  में टिकट के लिए नूराकुश्ती देखने को मिली उसने राज्य के आम वोटर को भी पहली बार परेशान किया हुआ है और पहली बार इस ख़ामोशी के मायने किसी को समझ नहीं आ रहे है जिससे दोनों पार्टियों के सामने  मुश्किलें आ रही है | सभी दलों के नेता अब चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में स्टार प्रचारकों के आसरे हिमाचल को फतह करने के मंसूबे पालने लगे हैं | कानून व्यवस्था, कर्ज में राज्य के डूबे कदम ,बेरोजगारी , पलायन, खेती  जैसे कई और मुद्दे  पार्टियों के चुनावी गणित को पलट सकते है | हाल के बरसों में सरकारों ने युवाओं को रोजगार देने के दावे तो खूब किये हैं लेकिन हिमाचल के रोजगार के मसले पर हालत बहुत अच्छे नहीं हैं | आज भी इस पहाड़ी प्रदेश में नौजवान बेरोजगार नौकरी के लिए दर दर ठोकरें खा रहा है | पलायन भी बदस्तूर जारी है |  इस बार के चुनाव में प्रदेश में मतदान करने वालों में 30  प्रतिशत युवा मतदाता हैं जो पहली बार अपने वोट का इस्तेमाल करेंगे।इनका रुख  किस तरफ रहता है  इस पर सबकी नजरें  रहेंगी |  राज्य में महिलाओं  की बड़ी तादात भी हार जीत के समीकरणों को पलट सकती है | 

हिमाचल में  भाजपा किसी भी कीमत पर अपने हाथ से सत्ता को फिसलते हुए नहीं  देखना चाहती है | इसके लिए वह पिछले कुछ समय से एड़ी चोटी का जोर लगाये हुए है | भाजपा मोदी लहर पर सवार होकर हिमाचल को उत्तराखंड की तरह फतह करना चाहती है | मुख्यमंत्री के चेहरे के ऐलान के बाद  धूमल देर रात तक प्रदेश में अपनी सभाए कर कांग्रेस को निशाने पर ले रहे हैं | मसलन राज्य का वोटर केन्द्र सरकार की महंगाई , जी एस  टी जैसे मुद्दों से ज्यादा परेशान दिख रहा है जिसने एक तरीके से आम आदमी की कमर तोड़ने का काम किया है  | वहीँ  कांग्रेस सरकार में जारी भारी  गुटबाजी और भ्रष्टाचार पर भाजपा जरुर बमबम है  लेकिन हिमाचल में बगावत के फच्चर ने ऐसा पेंच भाजपा के सामने फसाया है जिससे पार पाने की बड़ी चुनौती  अब  पार्टी   के सामने खड़ी हो गई है | लम्बे अरसे तक धूमल और शांता गुटों में विभाजित रहने वाली हिमाचल भाजपा अब  धूमल, शांता और  नड्डा की त्रिमूर्ति की नई  राह पर चल दी है। नड्डा के खेमे में वही नेता इस दौर में  आने को आतुर रहा  जिन्हे धूमल सरकार के  समय  ज्यादा तवज्जो नहीं मिली थी। टिकट की इच्छा रखने वाले लोग भी नड्डा के साथ इस दौर में इसलिए रहे  क्योंकि  नड्डा की नजदीकियां मोदी और शाह से होने के चलते सभी उनको भावी  सी एम  मानने लगे लेकिन हिमाचल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भाजपा ने प्रेम कुमार धूमल को सीएम उम्मीदवार  घोषित कर दिया जिससे जे पी नड्डा के समर्थकों को झटका लगा है | 

राज्य में सबसे ज्यादा करीब 37 फीसदी राजपूत,18 फीसदी ब्राह्मण , 25  फीसदी अनुसूचित जाति , 6  फीसदी  एस टी , 14 फीसदी ओबीसी   मतदाता हैं | हिमाचल की राजनीती में राजपूतों का बड़ा दखल डॉ  वाई एस परमार के दौर से ही रहा है और मंडी, शिमला, कुल्लू , हमीरपुर , काँगड़ा सरीखे इलाकों में  राजपूत हावी रहे हैं |  ऐसे में ब्राह्मण पर दांव खेलकर बीजेपी राजपूतों को नाराज नहीं करना चाहती थी  इसलिए आगे होते हुए भी जे पी  नड्डा धूमल से पिछड़ गए | पिछले कुछ बरस से नड्डा पर जिस तरह पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने आँख मूँद कर भरोसा जताया  उसे देखते उन्हें  हिमाचल चुनाव में सीएम पद का स्वाभाविक दावेदार माना जा रहा था लेकिन अब धूमल के नाम के ऐलान के बाद नड्डा   समर्थक  किस तरफ जाते हैं यह  देखना होगा ? 

 उधर शांता कुमार के साथ शुरू से धूमल के  छत्तीस  के आंकड़े ने भाजपा को हमेशा की तरह इस बार भी  असहज कर दिया है |  राज्य में कांगड़ा का इलाका  महत्वपूर्ण हो चला है क्युकि यहाँ की तकरीबन 20  सीटें प्रत्याशियों के जीत हार के गणित को सीधे प्रभावित करने का माद्दा रखती हैं | पिछले  कई दशकों  की हिमाचल की  राजनीति पर अगर नजर दौड़ाई जाएँ तो शांता कुमार ही ऐसे   नेता रहे हैं जिन्हे  कांगड़ा का सर्वमान्य नेता कहा जा सकता है और  इसी कांगड़ा के दम पर शांता कुमार दो बार प्रदेश के मुख्यमन्त्रीं भी बने।  यह पूरा इलाका भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार का गृह जनपद रहा है लेकिन इस बार टिकट आवंटन में धूमल कैम्प और शांता कैम्प में टशन देखने को मिली उससे भाजपा की परेशानी बढ़ी है | शांता  कुमार सरीखे वरिष्ठ नेताओं को भाजपा हाशिये पर धकेल कर जिस तरह हाल के कुछ बरसों में राज्य में  बढ़ी है, उसका पार्टी को नुकसान भी  उठाना पड़ सकता है। पिछले  चुनाव में भी शांता की नाराजगी भाजपा को भारी पड़ी थी |  कांगड़ा के बाद मंडी हिमाचल में अहम है | यह 10 सीट के साथ प्रदेश का दूसरा सबसे बड़ा राजनीतिक  प्रभाव वाला जिला है जहाँ हार जीत के समीकरण तय होंगे | 

इस बार के चुनावो में सत्ता के गलियारों में यह चर्चा आम है कि कांगड़ा में टिकट आवंटन में भाजपा आलाकमान के ज्यादा दखल से  शांता कुमार को पूरी तरह से फ्री हैण्ड नहीं मिल पाया जिसके चलते  धूमल कैम्प टिकट आवंटन में हावी नजर आया | शांता कुमार और धूमल की टशन देखकर उत्तराखंड जेहन में आता  है | उत्तराखंड में शांता की भूमिका में जहाँ सांसद भगत  सिंह कोशियारी  एक दौर में खड़े रहे  वहीँ धूमल की भूमिका में खड़े रहे सांसद  बी सी खंडूरी  | दोनों के बीच टशन से उत्तराखंड  में भाजपा सरकार  अस्थिर हो गई थी | बाद में दोनों की खींचतान  का फायदा निशंक को मिला था जिसके बाद भ्रष्टाचार के मामलो ने निशंक  की  बलि ले ली थी  और इसका नतीजा यह हुआ  उत्तराखंड में  2012 में  हुए चुनावो में भाजपा खंडूरी के नेतृत्व में अच्छा परफार्म  कर गई लेकिन सत्ता में नहीं आ पायी | राजनीती में कुछ भी सम्भव है और उत्तराखंड और हिमाचल की परिस्थितियां  भी कमोवेश एक जैसी ही है लिहाजा इस सम्भावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता अगर यही कलह जारी रहती है तो भाजपा को इस बार भी नुकसान उठाने के लिए तैयार रहना होगा | 

वहीँ कांग्रेस के सामने भी भाजपा जैसी मुश्किलें इस दौर में राज्य के भीतर हैं | वीरभद्र सिंह  पर  भ्रष्टाचार के नए  मामले कार्यकर्ताओ का जोश ठंडा कर रहे है | वीरभद्र सिंह के ऊपर भ्रष्टाचार के आरोपों की फुलझड़ी  विपक्ष की ओर से जलाए जाने से कार्यकर्ता हताश और निराश हो गए है | इसका असर यह है कि तकरीबन  आधी  विधान सभा की सीटो पर कांग्रेस को  कड़ी चुनौती  मिलने का अंदेशा बना है  |

 कांग्रेस की मुश्किल इसलिए भी असहज हो चली है क्युकि हमेशा की तरह इस चुनाव में कांग्रेस में गुटबाजी ज्यादा बढ़ गई है | वीरभद्र सिंह का यहाँ पर एक अलग गुट सक्रिय है तो वहीँ  विद्या  स्टोक्स  , पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कौल सिंह ठाकुर और केन्द्रीय मंत्री आनंद शर्मा की राहें भी जुदा जुदा लगती हैं | कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू के साथ वीरभद्र खुद सहज नहीं  पाते हैं | ऐसे कई मौके आये हैं  जब दोनों के बीच जुबानी जंग तेज रही है | अर्की में  अपना नामांकन भरने के बाद वीरभद्र  ने कहा कि सुखविंदर सिंह सुक्खू को विधायक का चुनाव नहीं लड़ना चाहिए था। अगर उन्हें चुनाव लड़ना था तो फिर अध्यक्ष पद से हट जाना चाहिए था।  मुख्यमंत्री के इस बयान से सरकार व संगठन के बीच फिर रार छिड़ने के आसार हैं। हालाँकि इस बार टिकट आवंटन में वीरभद्र ने अपना सिक्का चलाया है और चुनावों से ठीक पहले 27 विधायकों  के समर्थन में एक पत्र कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया  गाँधी को भेजकर खुद को सी एम के चेहरे के तौर पर पेश करने का दांव चला लेकिन भ्रष्टाचार  के आरोप अभी भी  उनकी खुद की  सियासत पर ग्रहण सा लगा  रहे हैं और खुदा ना खास्ता इस चुनाव में अगर वीरभद्र सिंह कांग्रेस की सत्ता में वापसी नहीं करा पाते हैं तो हार का ठीकरा खुद उन्हीं  पर ही ना फूटे | 

हिमाचल में यह ट्रेंड पिछले कुछ  समय से देखने तो मिला है कि यहाँ बारी बारी से भाजपा और कांग्रेस सत्ता में आते रहे हैं | 1977  के बाद सिर्फ एक बार 1985  में यहाँ पर कांग्रेस की वापसी हुई | कांग्रेस में यहाँ  डॉ यशवंत सिंह परमार 1952  से 1977  तक सी ऍम रहे तो ठाकुर रामलाल ने 1977 से 1982  तक सी ऍम की कमान संभाली |  डॉ परमार के शासन का सबसे सुनहरा दौर हिमाचल में कांग्रेस के नाम रहा है शायद इसी के चलते आज जब सबसे अच्छे मुख्यमंत्रियों की बात की जाती है तो सबकी जुबान पर डॉ  परमार का ही नाम आता है और लोग यह कहने लगते है उन्हें यशवंत परमार जैसा मुख्यमंत्री चाहिए | वीरभद्र सिंह 1983 में सी ऍम बने  | 1990  में शांता कुमार की सरकार आई तो 1993  में फिर से वीरभद्र सिंह सी एम  की कुर्सी पर काबिज हुए  और 1998 में हार के बाद  फिर पार्टी में हाशिये पर धकेले गए लेकिन 2003 में  फिर उनकी  शानदार वापसी हो गई |  

2007 में  वीरभद्र सिंह   केंद्र में मंत्री बन गए और 2012 में भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते उनकी कुर्सी की बलि चढ़ गई | केंद्र से इस्तीफे के बाद फिर से वह राज्य की सत्ता में कांग्रेस की वापसी कराने में सफल हुए | इस बार  का चुनाव  भी वीरभद्र सिंह  के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर आगे बढ़ रहा है | स्थानीय मुद्दे नदारद हैं तो राष्ट्रीय मुद्दे हावी हैं | चुनावी वादों का पिटारा दोनों राष्ट्रीय दलों ने खोला हुआ है | हर कोई अपने को पाक साफ़  बताने में लगा हुआ है  लेकिन  भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए अबकी बार हालात   मुश्किलों भरे हैं क्युकि दोनों दल बागियों को मनाने के लिए अंतिम समय तक  मान मनोवल करते देखे गए हैं | फिर छोटी विधान सभा और राज्य छोटा होने से यहाँ विधान सभा में हार जीत का अंतर 2000 से 5000 तक रहता है | लहर किसके पक्ष में है इसका पता मतदान के प्रतिशत पर भी  निर्भर करेगा | इस चुनाव में मौसम कैसा साथ देता है इस पर भी सबकी नजरें रहेंगी | आमतौर पर नवम्बर में ठण्ड ज्यादा बढ़ जाती है ऐसे में पार्टियों  के सामने  मतदाताओं को पोलिंग बूथ तक लाने की बड़ी चुनौती होगी | आमतौर पर बढे मतदान के प्रतिशत को सत्ता विरोधी माना जाता है लेकिन पिछले कुछ समय से देश में वोटर का  मिजाज बदला है | अब वह विकास के नाम पर वोट कर रहा है | इन सबके बीच  देखना दिलचस्प होगा हिमाचल में 2017 के चुनावों में ऊंट किस करवट बैठता है ? 

Thursday, 26 October 2017

'आबेनॉमिक्स' की छाँव तले जापान



जापान के मध्यावधि चुनाव में प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त की है |  आबे के एलडीएफ नेतृत्व वाले गठबंधन को संसद के निचले सदन में  मिली   शानदार जीत में  दो तिहाई से अधिक बहुमत हासिल हुआ है ।  पिछले दिनों आबे  की रेटिंग में जबरदस्त गिरावट देखने को मिली जिसके चलते उन्हें अचानक चुनाव कराने  का जुआ खेलने को मजबूर होना पड़ा । इस  जीत से आबे ने अपने विरोधियों को भी करारा जवाब दिया है |  आबे की अचानक चुनाव कराने की रणनीति काम कर गई  और विपक्ष को करारी हार का सामना करना पड़ा। मध्यावधि चुनाव करने का शिंजो का यह दांव  सही समय में काम आया  इससे विपक्षी दलों के पास खुद को संभालने का वक्त  नहीं  मिला  और उन्होंने सशक्त विकल्प के अभाव में  में आबे को ही वोट दिया। 

आबे की एलडीपी और उसके गठबंधन सहयोगी न्यू कोमितो ने 121 सीटों पर चुनाव लड़ा था जिसमें 76 उनके हिस्से में आई |  ऊपरी सदन की कुल 242 सीटों में 135 पर अब इसी गठबंधन का कब्जा है |  शिंजो  दिसंबर 2012 से जापान के प्रधानमंत्री पद पर बने हुए हैं। इन्होंने 2006 - 2007 तक के दौर में भी  जापान के प्रधानमंत्री पद की सत्ता को संभाला  था । जब अबे जापान की राष्ट्रीय संसद  'डाइट'   के विशेष सत्र में  2006  में पहली बार प्रधानमंत्री पद के लिए चुने गए, तब  वह  द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान के सबसे कम उम्र के प्रधानमंत्री बने। साथ ही आबे  द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जन्मे पहले प्रधानमंत्री हैं |
 
2006 में सुधारवादी प्रधानमंत्री जूनीचीरो कोइजूमी की पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद इस जीत ने आबे के लिए प्रधानमंत्री के रूप में लंबे कार्यकाल की उम्मीद भी मजबूत कर दी हैं | आबे के पास इस पारी में लम्बे समय तक पी एम पद पर टिके  रहने का शानदार मौका है क्युकि आने वाले दौर में वह नई इबारत गढ़ने जा रहे हैं |  वह जापान में सबसे लंबे समय तक पद पर रहने वाले प्रधानमंत्री बन जाएंगे। दूसरे विश्वयुद्घ के बाद से जापान में प्रधानमंत्रियों का औसत कार्यकाल दो वर्ष के करीब रहा है। वर्ष 2012 में उनके प्रधानमंत्री बनने से पहले के छह वर्ष में जापान में छह प्रधानमंत्री हुए। 

जापान  में संसद के ऊपरी सदन में जीत के साथ प्रधानमंत्री शिंजो  की सत्ता की मजबूत ठसक बरक़रार रही है |  इस दौर में जापान के सामने कई  मुश्किलें बाएं  खड़ी हैं | बेशक जापान की  अर्थव्यवस्था कुलांचे मार रही है और रोजगार  भी पैदा  हुए हैं लेकिन  भारी बहुमत मिलने के बाद  नई  पारी में आबे अपनी राष्ट्रवादी सोच तले  जापान को एक नई  दिशा दे सकते हैं | इस नई  पारी में  उनकी प्राथमिकता आर्थिक कार्यक्रमों को तेज करने की होगी   |  मौद्रिक नीति, सरकारी खर्चे में कमी और आर्थिक सुधार ऐसे पहलू  हैं जिस  पर उनके रुख पर  सबकी नजर रहेगी | इस चुनाव का ख़ास पहलू युवाओं का रुझान था जिसने जापान  की सियासत को अपने वोट से पहली बार नई दिशा दी  और सियासत के रुख को ही बदल दिया |  इस चुनाव को लेकर सबसे बड़ी दिलचस्पी शिंजो आबे के ‘राष्ट्रवादी’ एजेंडे और संविधान में एक खास संशोधन के उनके घोषित इरादे की वजह से रही । पिछले दिनों उत्तर कोरिया ने  मिसाइल दागी जो  जापान के होक्काइयो द्वीप से सीधे समुद्र में समां गई | इसके बाद से जापान और उत्तर कोरिया के रिश्तों को लेकर प्रेक्षक अपना नया  आकलन करने लगे थे | यूँ तो जापान की पहचान एक शांतिप्रिय देश की रही है और उसके उत्तर कोरिया के साथ किसी तरह के राजनीतिक और आर्थिक सम्बन्ध नहीं हैं  लेकिन इस नई पारी में शिंजो का उत्तर कोरिया के प्रति रुख क्या होता है इस पर सबकी नजर रहेगी |  इस तरह की रिपोर्टें आ रही हैं इस पारी में आबे  संविधान के शांतिप्रिय  अनुच्छेद नौ में संशोधन करना चाहते हैं जिससे सुरक्षा के मोर्चे और उत्तर कोरिया की मिसाइल चुनौती से वह बखूबी निपट सकें | लेकिन क्या वह ऐसा कर पाएंगे यह बड़ा सवाल है |  यूँ तो इस जीत के बाद प्रधानमंत्री शिंजो आबे को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और उत्तर कोरिया पर उनके पहले से कड़े रूख को मजबूत करने में मदद  मिलने  की बात कही है लेकिन चुनावी मोड में  तो राजनेता तमाम तरह की घोषणाएं करते रहते हैं | चुनाव निपटने के बाद कथनी और करनी का पता चल पाता है | ऐसे में देखना दिलचस्प होगा शिंजो क्या नई लकीर खींच पाएंगे ? 

जापान के सामने पहली चुनौती नॉर्थ कोरिया से परमाणु हमले का खतरा है। यही मुद्दा चुनाव में भी छाया रहा। देश की जनता ने भी किम जोंग-उन के खिलाफ आबे के सख्त कदमों के समर्थन में उन्हें एकमुश्त वोट किया। जीत के बाद अपने संबोधन में आबे ने कहा वह जापान की जनता की खुशहाली को कायम रखने के लिए प्रतिबद्ध  हैं | उन्होंने  कोरिया के मिसाइल, परमाणु और अपहरण के मामलों के लिए निर्णायक और सशक्त कूटनीति  का जिक्र कर इस बात को तो जतला ही दिया है आने वाले दिनों में  नॉर्थ कोरिया पर  कड़ा रुख जापान की तरफ से देखने को मिल सकता है | जहां तक भारत और जापान के रिश्तों का सवाल है, शिंजो आबे के अब तक के कार्यकाल में दोनों देशों के संबंध  प्रगाढ़ ही हुए हैं।  शिंजो  का वापस आना हमारे लिए  अहम है | भारत और जापान ऐसी अर्थव्यवस्थाएं हैं, जिनमें अनेक पूरक पहलू हैं। मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी , बुलेट ट्रेन  योजनाओं को लेकर जापान के  कारोबारी  उत्साहित हैं | द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊंचाईयों पर ले जाते हुए भारत और जापान के बीच  रक्षा और परमाणु ऊर्जा जैसे प्रमुख क्षेत्रों और बुलेट ट्रेन नेटवर्क निर्माण सहित कई समझौतों पर काम शुरू हो  चुका  है |   हमने  जापान के साथ असैन्य परमाणु ऊर्जा  सहयोग पर भी  हस्ताक्षर किए हैं  जो वाणिज्य एवं स्वच्छ ऊर्जा के लिए अहम है । भारत संभावनाओं का देश है और  जापान की तकनीक उसकी  ताक़त है और  ऐसे में अगर शिंजो और मोदी की गलबहियां आने वाले दिनों में कोई नया गुल खिलाती हैं तो पूरी दुनिया की नजर रहेगी | 

कुल मिलाकर आबे का सत्ता में मजबूती से वापस आना कई वजहों से बेहतर है। इस दौर में  जापान  भारत  की दोस्ती खूब परवान चढ़ी  है और जापान ने छोटे  भाई की तरह भारत का हर संभव सहयोग किया है | जापान की  स्थिरता रक्षा, व्यापार और बुनियादी ढांचागत सुधार  में भारत के लिए बेहतर होगी। दो एशियाई ताकतों जापान और भारत का साथ  आने से अब चीन की परेशानी और अधिक बढ़ सकती है | भारत और जापान  दोनों ही चीन की बढ़ती आर्थिक व सैन्य ताकत तथा सतत आर्थिक विकास की साझा रणनीतिक चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारत और जापान का साथ आना आज की नई जरूरत बन गई  है | । लुक  ईस्ट पॉलिसी पूर्व एशियाई क्षेत्र में मजबूती हासिल करने की भारत की सामरिक आर्थिक नीतियों में से एक है जिसके  तहत भारत का प्रयास है इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सके और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ सामरिक , आर्थिक संबंधों को मजबूत किया जा सके | इस नीति पर चलते हुए भारत ने बीते कुछ बरसों में श्रीलंका, सिंगापुर, थाईलैंड  सरीखे देशों के साथ अपने सम्बन्ध मधुर किये हैं और अब इस कड़ी में  जापान भारत के लिए अहम कड़ी साबित हो सकता है  जिससे भारत जापान सम्बन्ध के आने वाले दिनों में  और प्रगाढ़ होने की उम्मीद बंध रही है | 

Thursday, 19 October 2017

आस्था का प्रतीक दिवाली


हिन्दू  परंपरा में त्यौहार से आशय  उत्सव और  हर्षोल्लास से लिया जाता है ।  अपने देश की बात  की जाए  तो यहाँ मनाये जाने वाले त्योहारों में विविधता में एकता के दर्शन होते हैं । यहाँ मनाये जाने वाले सभी त्योहार कमोवेश परिस्थिति के अनुसार अपने रंग , रूप और आकार में भिन्न हो सकते हैं लेकिन इनका अभिप्राय आनंद की प्राप्ति ही होता है । अलग अलग धर्मों में त्यौहार मनाने के विधि विधान भिन्न हो सकते हैं लेकिन सभी का मूल मकसद बड़ी आस्था और विश्वास  का संरक्षण होता है । सभी त्योहारों से कोई न कोई पौराणिक कथा जुडी हुई है  जिनमे से सभी का सम्बन्ध आस्था और विश्वास से है । यहाँ पर यह भी कहा जा सकता है इन त्योहारों की  पौराणिक कथाएँ भी प्रतीकात्मक होती हैं । कार्तिक मॉस की अमावस के दिन दीवाली का त्यौहार मनाया जाता है । दीवाली का त्यौहार महज त्यौहार ही नहीं है इसके साथ कई पौराणिक गाथाए भी  जुडी हुई हैं  ।

दीवाली की शुरुवात आमतौर पर कार्तिक मॉस की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन से होती है जिसे धनतेरस कहा जाता है । इस दिन आरोग्य के देव धन्वन्तरी की पूजा अर्चना का विधान है । इसी दिन भगवान  को प्रसन्न  रखने के लिए नए नए बर्तन , आभूषण खरीदने का चलन है । यह अलग बात है मौजूदा दौर में  बाजार अपने हिसाब से सब कुछ तय कर रहा है और पूरा देश चकाचौंध के साये में जी रहा है जहां अमीर के लिए दीवाली ख़ुशी का प्रतीक है वहीँ गरीब आज भी दीवाली उस उत्साह और चकाचौध के साये में जी कर नहीं मना  पा रहा है जैसी उसे अपेक्षा है क्युकि समाज में अमीर और गरीब की खाई दिनों दिन गहराती ही जा रही है । 

 धनतेरस के दूसरे दिन नरक चौदस मनाई जाती है जसी छोटी दीवाली भी कहते हैं । इस दिन किसी पुराने दिए में  सरसों के तेल में पांच  अन्न के दाने डालकर घर में जलाकर रखा जाता है जो दीपक यम दीपक कहलाता है । ऐसा माना जाता है इस दिन कृष्ण ने नरकासुर रक्षक का वध कर उसके कारागार से तकरीबन 16000 कन्याओं को मुक्त किया था । तीसरे दिन अमावस की रात दीवाली का त्यौहार उत्साह के साथ मनाया जाता है । इस दिन गणेश जी और लक्ष्मी की स्तुति की जाती है । दीवाली के बाद अन्नकूट मनाया जाता है । लोग इस दिन विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाकर गोवर्धन की पूजा करते हैं । पौराणिक मान्यता है कृष्ण ने नंदबाबा और यशोदा और ब्रजवासियों को इन्द्रदेव की पूजा करते देखा ताकि इन्द्रदेव ब्रज पर मेहरबान हो जाये तो उन्होंने ब्रज के वासियों को समझाया कि जल हमको गोवर्धन पर्वत से मिलता है जिससे प्रभावित होकर सबने गोबर्धन को पूजना शुरू कर दिया । यह बात जब इंद्र को पता चली तो वह आग बबूला हो गए और उन्होंने ब्रज को बरसात से डूबा देने की ठानी  जिसके बाद भारी वर्षा का दौर बृज में देखने को मिला ।  सभी  रहजन कृष्ण के पास गए और तब कान्हा ने तर्जनी पर गोबर्धन पर्वत उठा लिया । पूरे सात दिन तक  भारी वर्षा हुई पर ब्रजवासी गोबर्धन पर्वत के नीचे सुरक्षित रहे । सुदर्शन चक्र ने उस दौर में बड़ा काम किया और वर्षा के जल को सुखा दिया । बाद में इंद्र ने कान्हा से माफ़ी मांगी और तब सुरभि गाय ने कान्हा का दुग्धाभिषेक किया जिस मौके पर 56 भोग का आयोजन नगर में किया गया । तब से गोबर्धन पर्वत और अन्नकूट की परंपरा चली आ रही है । 


 शुक्ल द्वितीया को भाई दूज मनायी जाती है । मान्यता है यदि इस दिन भाई और बहन यमुना में स्नान करें तो यमराज आस पास भी नहीं फटकते । दीवाली में दिए जलाने की परंपरा उस समय से चली आ रही है जब रावन की लंका पर विजय होने के बाद राम अयोध्या लौटे थे । राम के आगमन की ख़ुशी इस पर्व में देखी जा सकती है । जिस दिन मर्यादा पुरुषोत्तम राम अयोध्या लौटे थे उस रात कार्तिक मॉस की अमावस थी और चाँद बिलकुल दिखाई नहीं देता था । तब नगरवासियों में अयोध्या को दीयों की रौशनी से नहला दिया । तब से यह त्यौहार धूमधाम से  मनाया जा रहा है । ऐसा माना जाता है दीवाली की रात यक्ष अपने राजा कुबेर के साथ हस परिहास करते और आतिशबाजी से लेकर पकवानों की जो धूम इस त्यौहार में दिखती है वह सब यक्षो की ही दी हुई है । वहीँ कृष्ण भक्तों की मान्यता है इस दिन कृष्ण ने अत्याचारी राक्षस नरकासुर का वध किया था । इस वध के बाद लोगों ने ख़ुशी में घर में दिए जलाए । एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान् विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर हिरनकश्यप का वध किया था और समुद्र मंथन के पश्चात प्रभु धन्वन्तरी और धन की देवी लक्ष्मी प्रकट हुई जिसके बाद से उनको खुश करने के लिए यह सब त्योहार के रूप में मनाया जाता है । वहीँ  जैन मतावलंबी मानते हैं कि जैन धरम के 24 वे तीर्थंकर महावीर का निर्वाण दिवस भी दिवाली को हुआ था । बौद्ध मतावलंबी का कहना है बुद्ध के स्वागत में तकरीबन 2500 वर्ष पहले लाखो अनुयायियों ने दिए जलाकर दीवाली को मनाया । दीपोत्सव सिक्खों के लिए भी महत्वपूर्ण है । ऐसा माना जाता है इसी दिन अमृतसर में स्वरण मंदिर का शिलान्यास हुआ था और दीवाली के दिन ही सिक्खों के छठे गुरु हरगोबिन्द सिंह को कारागार से रिहा किया गया था । आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद  ने 1833 में दिवाली के दिन ही प्राण त्यागे थे । इस लिए  उनके लिए भी इस त्यौहार का विशेष महत्व है । 



भारत के सभी  राज्यों में दीपावली धूम धाम के साथ मनाई जाती है । परंपरा के अनुरूप इसे मनाने के तौर तरीके अलग अलग बेशक हो सकते हैं लेकिन आस्था की झलक सभी राज्यों में दिखाई देती है । गुजरात में नमक को लक्ष्मी का प्रतीक मानते हुए जहाँ इसे बेचना शुभ माना जाता है वहीँ राजस्थान में दीवाली के दिन रेशम के गद्दे बिछाकर अतिथियों के स्वागत की परंपरा देखने को मिलती है । हिमाचल में आदिवासी इस दिन यक्ष पूजन करते हैं तो उत्तराखंड में थारु आदिवाई अपने मृत पूर्वजों के साथ दीवाली मनाते  हैं । बंगाल में दीवाली को काली  पूजा के रूप में मनाया जाता है ।  देश के साथ ही विदेशों में भी दीवाली की धूम देखने को मिलती है । ब्रिटेन से लेकर अमरीका तक में यह में दीवाली  धूम के साथ मनाया जाता है ।  विदशों में भी धन की देवी के कई रूप देखने को मिलते हैं । धनतेरस को लक्ष्मी का समुद्र मंथन से प्रकट का दिन माना जाता है । भारतीय परंपरा उल्लू को लक्ष्मी का वाहन मानती है लेकिन महालक्ष्मी स्रोत में गरुण अथर्ववेद में हाथी को लक्ष्मी का वाहन बताया गया है  । प्राचीन यूनान की महालक्ष्मी एथेना का वाहन भी उल्लू ही बताया गया है लेकिन प्राचीन यूनान में धन की अधिष्ठात्री देवी के तौर पर पूजी जाने वाली हेरा का वाहन मोर है । भारत के अलावा विदेशों में भी लक्ष्मी पूजन के प्रमाण मिलते हैं । कम्बोडिया में शेषनाग पर आराम कर रही विष्णु जी के पैर दबाती एक महिला की मूरत के प्रमाण बताते हैं यह लक्ष्मी है ।   प्राचीन यूनान के सिक्कों पर भी लक्ष्मी की आकृति देखी जा सकती है । रोम में चांदी  की थाली में लक्ष्मी की आकृति होने के प्रमाण इतिहासकारों ने दिए हैं । श्रीलंका में भी पुरातत्व विदों  को खनन और खुदाई में कई भारतीय देवी देवताओं की मूर्तिया मिली हैं जिनमे लक्ष्मी भी शामिल है । इसके अलावा थाईलैंड , जावा , सुमात्रा , मारीशस , गुयाना , अफ्रीका , जापान , अफ्रीका जैसे देशों में भी इस धन की देवी की पूजा की जाती है । यूनान में आइरीन , रोम में फ़ोर्चूना , ग्रीक में दमित्री को धन की देवी एक रूप में पूजा जाता है तो  यूरोप में भी एथेना मिनर्वा औरऔर एलोरा का महत्व है ।  

   समय बदलने के साथ ही बाजारवाद के दौर के आने के बाद आज बेशक इसे मनाने के तौर तरीके भी बदले हैं लेकिन आस्था और भरोसा ही है जो कई दशकों तक परंपरा के नाम पर लोगों को एक त्यौहार के रूप में देश से लेकर विदेश तक के प्रवासियों को एक सूत्र में बाँधा है । बाजारवाद के इस दौर में  घरों में मिटटी के दीयों की जगह आज चीनी उत्पादों और लाइट ने ले ली है लेकिन यह त्यौहार उल्लास का प्रतीक तभी बन पायेगा जब हम उस कुम्हार के बारे में भी सोचें  जिसकी रोजी रोटी मिटटी के उस दिए से चलती है जिसकी ताकत चीन के सस्ते दीयों ने  आज छीन ली है ।  हम पुराना वैभव लौटाते हुए यह तय करें कि कुछ दिए उस कुम्हार के नाम  इस दीवाली में खरीदें जिससे उसकी भी आजीविका चले और उसके घर में भी खुशहाली आ सके । इस त्यौहार में भले ही महानगरों में आज  चकाचौंध का माहौल है और हर दिन अरबों के वारे न्यारे किये जा रहे हैं लेकिन सरहदों में दुर्गम परिस्थिति में काम करने वाले जवानों के नाम भी हम एक दिया जलाये जो दिन रात सरहदों की निगरानी करने में मशगूल हैं  और अभी भी दीपावली अपने परिवार से दूर रहकर मना  रहे हैं । इस दीवाली पर हम यह संकल्प भी करें तो बेहतर रहेगा यदि इस बार की दीवाली हम पौराणिक स्वरुप में मनाते हुए स्वदेशी उत्पादों का इस्तेमाल करें । पटाखों के शोर से अपने को दूर करते हुए पर्यावरण का ध्यान रखें और कुम्हार के दीयों से  अपना घर रोशन ना करें बल्कि समाज को भी नई राह दिखाए  तो तब कुछ बात बनेगी ।

Tuesday, 29 August 2017

गुरुनानक के पिता कालू मेहता ने जब अपने बेटे नानक को व्यापार करने के लिए 20 रुपये दिए तो गुरूजी ने उन पैसों से व्यापार का सौदा न खरीदकर भूखे साधुओं को भोजन करा दिया था | पिता के थप्पड़ मारने पर गुरुनानक ने कहा था  मैं दुनिया में कोई झूठा सौदा भी  नहीं करना चाहता हूँ | उन रुपयों से साधुओं की भूख मिटाकर मैंने सच्चा सौदा किया है लेकिन किसे पता था  सच्चे  सौदे और गुरु के नाम पर खुद को राम रहीम और इंसा कहने वाला गुरुमीत एक दिन अपनी काली करतूतों से न केवल खुद को बल्कि पूरी मानवता  को शर्मसार कर देगा | धर्म के मायावी तिलस्म में आस्था के दुष्‍परिणाम क्या होते हैं, यह हमने  रामपाल के डेरे में देखा | यही नहीं खुद को बड़ा बापू बताने वाला आसाराम भी किस तरह अपनी मायावी दुनिया के मोहपाश में महिलाओं को यूज करता था यह भी हम देख चुके हैं |  बीते बरस से ही बापू  अपने बेटे नाराणस्वामी के साथ सलाखों की हवा खा रहे हैं | आशाराम बापू,  राधे मां , गुरुमीत , इच्छाधारी  सरीखे  धर्मगुरूओं ने धर्म और नैतिकता के नाम पर जो कुछ भी किया है वह अक्षम्य है  और  कभी संत महात्माओं के लिए जाना जाने वाला भारत आज  इन राम रहीम  सरीखे पाखंडी बाबाओं के कारण शर्मसार हो रहा है | 

खुद को संत मानने वाला  बाबा गुरमीत राम-रहीम के बारे में कल सुनारिया जेल में सजा का बड़ा फैसला आ गया जिसमें साध्वियों से उत्पीड़न के दो अलग अलग मामलों में उसे  10 -10  बरस की सजा सुनाई गयी है | शुक्रवार को जैसे ही पंचकूला में वह बलात्कार के दोषी पाए गए उसके बाद से ही हरियाणा , पंजाब और दिल्ली में हिंसा का जैसा तांडव मचा उसने पहली बार राजनेताओं और बाबाओं की साठगांठ  के चेहरे को सही मायनों  में सबके सामने उजागर कर दिया | पंचकूला , सिरसा सरीखे शांत शहर हिंसा की आग में जैसे झुलसे उसने हरियाणा की मनोहर लाल सरक़ार को भी कटघरे में खड़ा किया | बाबा के समर्थकों ने जिस अंदाज में तांडव मचाया उसकी मिसाल देखने को नहीं मिलती | पार्क से लेकर रेल , बस से लेकर निजी वाहन हर किसी को आग के हवाले कर दिया गया | लोग अपने घरों में दुबक कर रहने लगे | बाजार बंद हो गया तो शहर में कर्फ्यू सरीखा माहौल देखने  को मिला |  बाबा के समर्थकों ने गिरफ्तारी के नाम पर सडकों में हिंसा का जैसा नंगा नाच पुलिस और प्रशासन के सामने किया उसने सभ्य कहे जने वाले भारतीय  आचरण पर सवाल खड़े कर दिए | लोकतंत्र के चौथे सतम्भ पत्रकारों  को भी बाबा के अनुयायियों  ने कहीं का नहीं छोड़ा और मीडिया कर्मियों से अभद्रता की और कई ओ बी वैन को फूंक दिया | पंचकूला  सरीखा हरियाणा का शांत माना जाने वाला शहर कुछ ही घंटों में ख़ाक हो गया | 

 बाबा ने अपने फैसले के आने से  पहले ही उत्तेजक माहौल बनाकर देश की न्याय प्रणाली को यह चेतावनी देने की कोशिश की कि यदि निर्णय उनके  खिलाफ आया तो देश अराजकता के हवाले कर दिया जाएगा। उसके  सभी भक्त भारत का नामोनिशॉन  मिटा देंगे। किसी जीवंत  लोकतंत्र में ऐसी हिंसा किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जा सकती जहाँ न्यायपालिका के निर्णय को ठेंगा दिखाते हुए लोग कानून को अपने हाथ में ले लें |  शुक्रवार को जब अदालत ने बाबा गुरमीत को दोषी करार दिया तो पांच मिनट के भीतर हरियाणा समेत दिल्ली, हिमाचल, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में अनेक जगहों से आगजनी व तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आने लगीं। देखते-देखते करोड़ों की संपत्ति नष्ट कर दी गई और नियंत्रण के उपाय में पुलिस व सुरक्षाबलों की गोलीबारी में 38  लोगों की मौत हुई और एवं 250 से अधिक लोग घायल हो गए। किसी भी सभ्य समाज में ऐसी हिंसा नहीं होनी चाहिए | बाबा के बलात्कार मामले में फैसला आने से ठीक पहले से ही पंचकूला में बाबा के समर्थक इकट्ठा  होने शुरू हो गए थे | इस मामले में  हरियाणा की मनोहरलाल सरकार ने पिछली घटनाओं से सबक नहीं लिया | रामपाल और जाट आंदोलन के दौरान भी हमने देखा किस तरह सरकार इससे निपटने में नाकाम साबित हुई और बाबा रामरहीम के मसले पर भी पूरी सत्ता , पुलिस और प्रशासन बाबा के आगे नतमस्तक हुई दिखी | जबकि चंडीगढ़ के डी  जी पी ने 22 अगस्त को ही  डेरा के अनुयायियों के इरादों को भांप लिया था | सरकार चाहती तो वह फैसले से पहले  ख़ामोशी से अपना काम डेरा समर्थकों को पंचकूला  कूच  करने से पहले रोक सकती थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ पंचकूला में बाबा के सैकड़ों समर्थकों  ने बड़ी बड़ी गाड़ियों  में अपना शक्ति  प्रदर्शन  किया |   डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम पर यौन शोषण का आरोप सिद्ध हुआ तो उनके सर्मथकों ने उत्तरी भारत में हिंसा का तांडव रचकर जता दिया  कि अदालती आदेश के उनके लिए कोई मायने नहीं हैं और अदालत उनके बाबा पर फैसला नहीं कर सकती क्युकि उनका बाबा गॉड ऑफ़ मेसेंजर है | 

हैरानी की बात यह है कि चंडीगढ़ प्रशासन और हरियाणा एवं पंजाब की सरकारों को पता था कि 24 अगस्त को यह फैसला आना है और उनके समर्थक तीन दिन पहले से ही पंचकूला में धारा 144 लगाए जाने के बाबजूद लाखों की संख्या में आना शुरू हो गए तब उनको नियंत्रित क्यों नहीं किया गया। बड़ी संख्या में पुलिस के अलावा अर्ध-सैनिक बलों 15 हजार जवान तैनात थे। थल सेना गश्त कर रही थी। बाबजूद बाबा के समर्थक लाठी, हथियार और पेट्रोल व डीजल, ऐ के 47  लेकर संवेदनशील क्षेत्रों में घुसे चले आए। खुफिया एजेंसियां को भी इनकी मंशा की भनक तक नहीं लग पाई। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि एजेंसियों के अधिकारी-कर्मचारियों ने क्षेत्र में जाकर न तो समर्थकों से बातचीत की और न ही उनकी तलाशी ली। यहाँ तक की डेरा अनुयायियों ने एक रणनीति के तहत अपने लोगो के खाने पीने के पूरे बंदोबस्त किये हुए थे | 

डेरा मामले में  खुफिया एजेंसियों की बड़ी चूक है  साथ ही सरकार की डेरा से निकटता के चलते पुलिस भी तमाशबीन बानी रही  इसलिए उन्हें भी इस हिंसा के लिए दोषी ठहराए जाने की जरूरत है। धारा 144 लगाने का मतलब  है 4  से  5 लोग एक ग्रुप में साथ साथ नहीं रह सकते |लेकिन हरियाणा के पर्यटन मंत्री पंडित रामविलास शर्मा  ने तो हद ही कर दी | मीडिया  के सामने आकर उन्होंने यह  कहा 144  धारा  डेरा अनुयायियों पर लागू  नहीं होती | वह तो शांतिप्रिय लोग हैं और उनके खाने पीने की व्यवस्था करना सरकार का काम है | राजनीती कैसे इन बाबाओं के सामने नतमस्तक हो जाती है यह  इस  प्रकरण से हम बखूबी समझ सकते हैं | साफ़ है खट्टर सरकार भी अपने वोट बैंक के मद्देनजर डेरा अनुयायियों पर सख्ती नहीं बरती  | यहाँ तक कि पुलिस भी डेरा  से आने वाले लोगों की आवभगत में जुटी रही | इससे ज्यादा  शर्मनाक बात क्या हो सकती है इस पूरे मामले में हरियाणा सरकार को कड़ी फटकार कोर्ट की तरफ से पड़ी जिसमे उसने साफ़ किया सरकार इस मामले पर सख्ती दिखाए और अगर वह ऐसा नहीं करती तो क्यों ना डी जी पी को ही बर्खास्त  कर दिया जाए | कोर्ट ने तो हिंसा करने वालों को सीधे गोली मारने के आदेश भी दिए थे लेकिन इसके बाद भी सरकार अगर रेंग नहीं पायी तो इसे  वोट बैंक के आईने में देखना होगा जहाँ भाजपा ,  कांग्रेस , इनेलो सब डेरे के आसरे अपनी चुनावी बिसात हर चुनाव में अपने अनुकूल बिछाते रहे | पंजाब की तकरीबन  27 तो हरियाणा  की तकरीबन तीन  दर्जन सीटों पर डेरा का ख़ास प्रभाव है | पडोसी राज्य राजस्थान में गंगानगर संभाग भी पूरी तरह डेरा के वोट से घिरा हुआ है जहाँ राम रहीम के बिना  चुनाव में पत्ता भी नहीं हिलता |  डेरा हर चुनाव में जिस पार्टी की ओर इशारा करता है हवा का रुख उस पार्टी की तरफ मुड़  जाता है और वह पार्टी सत्ता का सुख भोगती है | सरकार खट्टर की रही हो या चौटाला या हुड्डा की गाहे बगाहे डेरा के आगे हरियाणा  की पूरी सरकारें नतमस्तक रही हैं | 

1948 में शाह मस्ताना ने डेरा सच्चा सौदा की नीव रखी | 90  के दशक में गुरमीत राम रहीम ने जब से गद्दी  संभाली तब से डेरा में पांच सितारा संस्कृति न केवल हावी हुई बल्कि गुरमीत का डेरा विवादों से चोली दामन का साथ रहा | सिरसा में डेरा सच्चा सौदा का ये आश्रम करीब सात सौ एकड़ में फैला हुआ है। सबसे खास बात ये है कि इस आश्रम के अंदर ही सबकुछ है। गुरमीत राम रहीम का मायालोक ऐसा है जहां एक तरफ आस्था का आश्रम है और दूसरी तरफ ऐश का अड्डा। 700 एकड़ में बसा एक ऐसा शहर, जहां पत्ता भी डोलता है तो राम रहीम के इशारे पर। यह अपने आप में एक शहर से कम नहीं। आश्रम में एक हवाई पट्टी भी है, जिसपर बाबा राम रहीम का प्लेन लैंड और टेकऑफ करता है। महंगी बाइक और इंपोर्टेड कार गुरमीत बाबा राम रहीम के लिए मानो जिद की हद तक के शौक हैं। उसकी ऐशगाह में उनके पास महंगी कारों का एक लंबा चौड़ा काफिला है। बड़ा स्टेडियम भी है जहाँ  सुविधाएं हैं | इस पाखंडी बाबा के गैराज में मर्सडीज, बीएमडब्ल्यू, ऑडी, लेक्सस और टोयोटा जैसी कई कारें  हैं | जिस एसयूवी से राम रहीम बाहर सड़कों पर निकलते हैं, वो गाड़ी  बुलेटप्रूफ भी है और उसमें जैमर भी लगा हुआ है।यही नहीं बाबा को सरकार  ने जेड प्लस की सुरक्षा भी मिलती  थी | यह बाबा मॉडर्न है | विलासिता और अय्याशियों का शौक ऐसा जिसकी गुफा में महिलाएं ही महिलाएं हैं | बाबा की दुष्कर्म की दुनिया  ऐसी जहाँ उनके दुष्कर्म को पिताजी की माफ़ी कहा जाता था | बाबा ने अपने इस आश्रम में अपनी रसूख और सरकार में दखल का फायदा उठाने का कोई मौका नहीं छोड़ा |  

 डेरा सच्चा सौदा की शुरुआत 1948 में एक संत शाह मस्ताना ने की थी। लेकिन 1990 में डेरा की सत्ता संभालने के बाद ये राम रहीम की जागीर बन गया। 1998 में बेगू गाँव के एक बच्चे की डेरा के वाहन की चपेट में आने से मौत हो गई | तब डेरा  प्रमुख ने खबर छापने पर खासा बवाल किया था|   2002 में बाबा के खिलाफ उनकी शिकायत पर दुष्कर्म व यौन उत्पीड़न का प्रकरण दर्ज किया गया था।  तब साध्वियों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी को पत्र लिखकर बाकायदा शिकायत की थी | वाजपेयी  को लिखी उस गुमनाम चिठ्ठी ने डेरा की संगीन दीवारों का सच सबके सामने  लाने का काम किया | यही नहीं 2002 में डेरा समिति के अहम् सदस्य  रणजीत सिंह का क़त्ल भी किया गया | कहा गया  रणजीत ने ही साध्वियों से चिट्ठी लिखवाई |   | उस दौर में  वाजपेयी ने चिट्ठी को सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश के पास भेज दिया था जिसके बाद सिरसा के मजिस्ट्रेट को जांच के आदेश दिए गए |  2002 में साध्वियों की आवाज को नई धार पूरा सच   अखबार में देने वाले रामचंद्र  छत्रपति  ने दी  |  बलात्कार की खबर छपने के बाद बाबा  के   समर्थकों ने 5 गोलियां मारकर उनकी  हत्या कर दी और अपोलो अस्पताल में 28  दिन जिंदगी और मौत से जूझते छत्रपति के बयान पुलिस तक ने दर्ज नहीं करवाया इससे बड़ी त्रासदी इस सिस्टम की क्या हो सकती है जब राजनेता और डेरा प्रमुख मिलकर समानांतर सरकारें चलाया करते हो | 2007 में ही डेरा प्रमुख राम रहीम ने गुरु गोबिंद सिंह की वेशभूषा पहनकर अपने शिष्यों को अमृतपान करवाया था जिससे सिख समाज बड़ा आहत भी हुआ था | यही नहीं राम रहीम पर कई लोगों को नपुंसक बनाए जाने के आरोप भी लगे हैं जिन पर फैसला आना अभी बाकी है | साथ ही पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या की अहम् सुनवाई भी अब 25  सितम्बर को है जहाँ उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है | साध्वी बलात्कार के मामले में राम रहीम जेल की सलाखों के पीछे हैं इसके पीछे पूरा सच अखबार की सबसे बड़ी भूमिका है | सलाम रामचन्द्र छत्रपति को जिन्होंने सिरसा के अपने छोटे से अखबार में राम रहीम की काली करतूतों  और बाबा की गुफा के सच को अपने अखबार के माध्यम से उजागर किया | अखबार कोई भी बड़ा या छोटा नहीं होता है शायद यही काम रामचंद्र की खबर ने  पूरा  सच  अखबार में  लिखकर कर दिया | इसके बाद 2005 -06 में सी बी आई  के अधिकारी बदलते रहे और जांच सही से शुरू नहीं हो पायी | उस दौर में हरियाणा में चौटाला की सरकार थी जिनकी निकटता डेरा के साथ थी जिसके  चलते जांच शुरू नहीं हो पायी | चौटाला के बाद हुड्डा भी रामरहीम के साथ वोट बैंक के आसरे गलबहियां करते रहे जिसके चलते  मामले को सी बी आई के सामने रफा दफा करने की और प्रलोभन देने की  कोशिशें की गयी | वो तो शुक्र रहा सी बी आई  के अफसर सतीश डागर का जिन्होंने  बिना दबाब के मामले को अंजाम तक पहुंचा दिया | उन्होंने न केवल साध्वियों को  गवाही के लिए तैयार किया बल्कि अम्बाला से यह केस पंचकूला तक  विशेष सी बी आई अदालत तक पहुंचा दिया | 3  बरस बाद ट्रायल इस मामले में शुरू हुआ |  2016 में पूरे 52 गवाह  , 15 वादी और 37 प्रतिवादी सामने आये और  पीड़ित साध्वियों के बयान  2009 -10  में दर्ज हुए  | राम  रहीम को दोषी ठहराने के लिए दो पीड़ित साध्वियों ने 15 साल कानूनी लड़ाई लड़ी जिसके लिए उनको भी सलाम | सच में इस फैसले ने  तो साबित ही कर दी है कानून के हाथ बहुत लम्बे  होते हैं और कोई भी अपराधी पुलिस की पकड़ से बहार नहीं जा सकता  चाहे उसकी रसूख कितनी ही ऊँची क्यों ना हो | 

25 अगस्त 2017 के दिन को हमेशा याद रखा जाएगा क्युकि  विशेष सीबीआई जज जगदीप सिंह ने राम रहीम  को बलात्कार के मामले में दोषी पाया और 28 अगस्त  2017  भी हमेशा याद रखा जायेगा जहाँ सुनारिया जेल में ही कोर्ट  लगा और बाबा को 10-10  साल की सजा हुई | साध्वियों के बयानों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर यह  इल्जाम सही साबित हुआ। बाबजूद समर्थकों ने पीड़ित साध्वियों का पक्ष लेने की बजाए उस बाबा का साथ दिया, जिसने बाबा का रूप रखकर जघन्य अपराध किया था। भारत में यह बेहद दुखद  स्थिति है कि भक्तगण धर्म के मायालोक में इतने अंधविश्वासी हो जाते हैं कि वे अपना सही-गलत का विवेक तो खोते ही हैं, कानून भी अपने हाथ में लेकर, अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारने का काम कर देते हैं। खद बात यह है बलात्कार  में दोषी पाए जाने के बाद भी भक्तों की नज़रों में  राम रहीम जैसे  विलासी लोग दैवीय शक्ति के  प्रतीक बन जाते हैं। नतीजतन इनके सम्मोहन में आकर लोग अंधेपन का शिकार होकर अपने जीवन को पंगु बना देने का काम कर डालते हैं।   राम रहीम जैसे बाबाओं को महिमामंडित करने का काम हमारे राजनेता भी उनकी शरण में जाकर करते हैं। इस कारण आम जनता का मानस इन्हें चमत्कारी मानने का भ्रम पाल लेती है। मिसाल देखिये 25  अगस्त  को राम रहीम पर फैसले आने से पहले हरयाणा के तो ताकतवर मंत्री रामविलास शर्मा , अनिल विज बाबा के डेरा में सिरसा में मिले भी थे जहाँ 51 लाख का चंदा हरियाणा सर्कार की तरफ से उन्होंने दिया |  2014 में मोदी  के सत्ता में आते आखिरी पलों में डेरा ने खुलकर भाजपा को वोट देने का ऐलान अपने समर्थकों के बीच किया था जिसका असर यह हुआ केंद्र और राज्य के चुनाव में भी भाजपा का कमल हरियाणा में खिला | 

सुनारिया जेल में कल  सीबीआई अदालत ने जो फैसला राम रहीम पर  सुनाया है उसने एक साथ कई चेहरों से नकाब उठा दिया। धर्म के इस  पाखंडी बाबा  का धर्म  से कोई लेना देना नहीं है और ना ही आध्यात्म से। लोगों की भावनाओं और आस्था को भड़काकर इस शख्स ने अय्याशी का साम्राज्य खड़ा किया है। यह शख्स खुद को आस्था का अवतार, लोगों का भगवान कहता था। फिल्में दिखाकर कुछ भी कर गुजरने का दावा करता था। सीबीआई की विशेष अदालत के एक फैसले ने साबित कर दिया कि लोगों की आस्था ने जिसे अब तक एक पहुंचा हुआ बाबा माना था, वो असल में  बलात्कारी से ज्यादा कुछ भी नहीं था ।

Tuesday, 22 August 2017

जिनपिंग की ब्रांडिंग की चीनी चाल




चीन अपनी बड़ी अर्थव्यवस्था के चलते दुनिया में ताकतवर बनने का सपना  कमोवेश हर  दिन देखता ही  जा रहा है और शायद यही वजह है इस दौर में  उसकी  दबंगई भी पूरी दुनिया में  बढ़ती जा रही है।  दुनिया की सबसे बड़ी ताकत के रूप में स्थापित करने की चीन की ये शातिर चालबाजियां  जगजाहिर है। चीन के अपने सभी पड़ोसी देशों के साथ इस समय सीमा विवाद है | पूरी दुनिया इस समय चीन की विस्तारवादी नीति की जोर शोर से चर्चा तो है लेकिन इन सब विवादों को हवा देने के पीछे चीन की अंदरूनी राजनीति की भी जड़  है | असल  में  इसी बरस  चीन की सत्ता में  बड़ा बदलाव  तय माना जा रहा है | कहा तो यह भी जा रहा है  शी जिनपिंग  राष्ट्रवाद तले  किसी तरह अपने दूसरे कार्यकाल को बरकरार रखने की जुगत में हैं लेकिन दूसरे कार्यकाल के लिए भी उनकी कुर्सी तभी बरकरार रह पायेगी जब वह पार्टी के महासचिव चुने जायेंगे |   इसी के साथ हाल के कुछ महीनों में  पोलित ब्यूरो की स्टैंडिंग कमेटी और  सदस्यों का चुनाव भी होना है । शी पोलित ब्यूरो में अपनी स्थिति दिनों दिन  मजबूत रखना चाहते हैं।  सुन जेंगसई ने इस दौर में शी  की परेशानियों को बढ़ाया हुआ है क्युकि चीन की सत्ता के गलियारों में जिनपिंग का उत्तराधिकारी माना जाता था। चीनी सत्ता के केंद्र 25 सदस्यीय पोलित ब्यूरो के वह सबसे युवा सदस्य थे। इस बार उनका सात सदस्यीय स्टैंडिंग कमेटी में जाना तय था  लेकिन जिनपिंग ने इससे पहले ही उनकी राजनीति को झटके में  खत्म कर दिया। उन्होंने अधिवेशन से पहले ही  जेंगसई को  हटा दिया । यही नहीं उनके खिलाफ पार्टी नियमों के खिलाफ काम करने के आरोप में जांच भी बिठा दी । जिनपिंग चीन में  अब हर दिन अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत कर रहे हैं। दुनिया  के साथ विवाद के दौरान राष्ट्रवाद  तले वह अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में लगे हुए हैं ।

2012 के बरस में भी  राष्ट्रपति बनने के बाद जिनपिंग ने  लोकप्रिय नेता बो जिलाई को हटा कर जेल में डलवा दिया था। उन्हें भी जिनपिंग का उत्तराधिकारी माना जा रहा था।  मौजूदा दौर में भी  भारत के साथ सीमा विवाद और दुनिया के तमाम विवादों के बीच शी  अपने अगले कार्यकाल के रास्ते की बाधा को हटाने की पूरी कोशिश करते देखे जा सकते हैं |  चीन की ओर से उसका सरकारी मीडिया दुनिया  के खिलाफ  आक्रामक माहौल बनाने में जुटा है ताकि  शी  की छवि को और अधिक उभारा जा सके | 

जिनपिंग अपनी ब्रांडिंग किस तर्ज पर कर रहे हैं यह इस बात से समझा जा सकता है चीनी  अर्थव्यवस्था की खस्ता माली हालत के बीच हाल ही में चीन ने भारत के पड़ोसियों को साथ लेकर  वन बेल्ट वन रोड की शुरुआत की जिसमें सौ से अधिक देश के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया | चीन कूटनीतिक रास्ते के आसरे विस्तारवादी अपनी पुरानी नीति पर चल रहा है जिसमें वहां का मीडिया शी के साथ कदमताल कर रहा है | इससे चुनाव के मोर्चे पर खुद जिनपिंग की मजबूत स्थिति हो रही है |  डोकलाम विवाद में भी भारत ने चीन को पटखनी दी है| हमारे सैनिक वहां भूटान के साथ मिलकर चीन के सड़क निर्माण पर सवाल उठा रहे हैं  और  दुनिया चीन के हर कदम को उसकी विस्तारवादी नीति के अक्स में देख रही है | चीन की विस्तारवादी नीति के कारण दुनिया के कई देश उससे परेशान हैं |  

भारत चीन के बीच डोकलाम सीमा पर पिछले कई महीने से चल रहा विवाद थमने के कगार पर पहुँच रहा है लेकिन चीनी मीडिया लगातार भारत को युद्ध की धमकी दे रहा है लेकिन हाल के दिनों में अब  चीन के वाटर बम को लेकर कयासों का बाजार गरम है |  चीन की विस्तारवादी नीति के अक्स में अगर झांकें तो यह आशंकाएं निर्मूल हैं  |  असल में  मीडिया में ऐसी खबरें सरकारी मीडिया को साधकर प्लांट की जा रही हैं कि चीन भारत से निपटने के लिए अब  'वॉटर बम' जैसी साजिश रच रहा है, जिससे भारत के बड़े इलाके को तबाह किया जा सके|  अपने सरकारी मीडिया को साधकर चीन एस माहौल बना रहा है जैसे  चीन के  ऊंचाई पर बने हुए बड़े-बड़े बांध भारत के लिए कभी भी  तबाही का मंजर खड़ा कर सकते हैं | 

 तिब्बत से निकलकर  कई नदियां भारत में बहती हैं|  इन नदियों पर चीन ने बड़े-बड़े बांध बना रखे हैं इसलिए  चीन डोकलाम से ध्यान हटाने के लिए अब मीडिया को साधकर वाटर बम का नया दाव खेलने में लगा हुआ है |  अब तक इस बाते के कोई संकेत या सबूत तो नहीं मिले हैं जिससे ऐसा लगा हो  चीन अपने बांधों के दरवाजे खोलकर भारत में जल प्रलय लाने की साजिश रच रहा है, लेकिन  चीन सीधे युद्ध के बजाय मीडिया में शी के राष्ट्रवाद को ढालने में लगा हुआ है | इसके अक्स में देखें तो यहाँ भी उसकी विस्तारवादी नीति में राष्ट्रवाद का तड़का है और इससे सीधे युद्ध की आहट भले ही ना हो लेकिन चुनावी बरस में जिनपिंग अपनी खुद की स्थिति चीन  के सामने मजबूत कर लेंगे जिससे चुनावी बरस में वह अपनी छवि चीन के एक मजबूत नेता के तौर पर बना लेंगे |

कुछ महीने पहले चीन  की सेना अपना 90वां स्थापना दिवस मनाया जिसमें   चीन में पहली आर्मी डे परेड का आयोजन किया गया |  चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी दुनिया की सबसे बड़ी फौज है जिसने  अगस्त 2017 को  90 बरस पूरे कर लिए | इस मौके पर सैन्य दस्तों को संबोधित करते हुए जिनपिंग ने कहा, आज चीन को एक आधुनिक सेना की ज़रूरत पहले के मुकाबले कहीं ज़्यादा है. उन्होंने सेना से अपनी युद्धक क्षमता और बढ़ाने तथा राष्ट्रीय रक्षा व्यवस्था आधुनिक बनाने को कहा | यही नही जिनपिंग ने कहा पीएलए चीनी सीमा में घुसने वाली किसी भी सेना को हराने और चीन की संप्रभुता, सुरक्षा व राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने में सक्षम है| ऐसे संकेतों को भी अगर हम डिकोड करें तो साफ़ है शी राष्ट्रवाद के आईने में खुद को मजबूत नेता के तौर पर फिट करना चाहते हैं जिससे अगले बरस वह एक और कार्यकाल के लिए अपना रास्ता साफ़ कर सकें | चीनी राष्ट्रपति अक्सर राष्ट्रवाद की बात दोहराते हैं |  

चीन के साथ  अभी पूर्वी और दक्षिणी चाइना सी में भी काफ़ी विवाद है लेकिन  चीन ने साफ़ संकेत दिया है कि वह अहम क्षेत्रीय हितों को लेकर अपना क़दम पीछे नहीं खींचेगा | चीन अभी दुनिया के किसी देश के खिलाफ कोई बड़ा कदम नहीं उठाना चाहता  | चीन अगर कुछ गलत  करता है तो दुनिया में उसकी आलोचना होगी और महाशक्ति बनने के उसके सपनों को पंख नहीं लग पाएंगे इसलिए फिजा में राष्ट्रवाद की महक है और चीन का सरकारी मीडिया युद्ध के माहौल के बीच जिनपिंग की नए सिरे से ब्रांडिंग करने में लगा हुआ है | नजरें 2018 की तरफ लगी हैं |  यह तो वही बात है कहीं पे तीर कही पे निशाना | 

Sunday, 16 July 2017



रवि शास्त्री जब भारतीय क्रिकेट टीम के नए कोच बने तो सभी को उम्मीद थी पिछले कुछ समय से भारतीय टीम में चल रहा विवाद आखिरकार थम जाएगा, लेकिन सीएसी और रवि शास्त्री के बीच विवाद कम होने की जगह बढ़ता ही जा रहा है | असल में बीते दिनों बीसीसीआई ने रवि शास्त्री  को भारतीय क्रिकेट टीम का नया मुख्य कोच नियुक्त किया जबकि पूर्व दिग्गज तेज गेंदबाज जहीर खान को दो साल के लिए नया गेंदबाजी कोच और राहुल द्रविड़ को  विदेशी दौरे के लिए बल्लेबाजी सलाहकार नियुक्त किया । रवि शास्त्री तीसरी बार  भारतीय क्रिकेट टीम के साथ जुड़े हैं। इससे पहले वह  2004  में बांग्लादेश दौरे के दौरान क्रिकेट मैनेजर थे और इसके बाद अगस्त 2014  से जून 2016  तक उन्हें टीम निदेशक बनाया गया जिस दौरान भारत ने श्रीलंका के खिलाफ उसकी सरजमीं पर टेस्ट श्रृंखला जीती और 2015 में   विश्व कप तथा 2016  विश्व टी 20  के सेमीफाइनल में जगह बनाई।

कोच की दावेदारी में टक्कर शास्त्री  और वीरेंद्र सहवाग के बीच कांटे की  थी लेकिन शास्त्री  के पूर्व कार्यकाल को लेकर कप्तान विराट कोहली की सिफारिश के कारण मामला पूर्व भारतीय कप्तान के पक्ष में गया। अब शास्त्री 2019 विश्व कप  तक भारतीय टीम के कोच के  रूप में जुड़े रहेंगे | शास्त्री ने यह जिम्मेदारी  तरह सबको  साथ  लेकर चलने के  जैसे दावे किये उससे एक  बारगी ऐसा लग रहा था  अब भारतीय खिलाडी पुरानी बातों  को भूलकर नए सिरे से टीम भावना के साथ खेलेंगे लेकिन किसे पता था  कुछ दिनों बाद शास्त्री अपने  खुद किए  दावों  की  हवा निकाल देंगे |

असल में शास्त्री अपने साथ राहुल और जहीर खान जैसे अनुभवी खिलाडियों को नहीं देखना चाहते |  सचिन , सौरभ और  लक्ष्मण सरीखे महान  खिलाडियों से सजी  सीएसी ने  शास्त्री  को कोच बनाकर औपचारिकता निभाई लेकिन द्रविड़ और जहीर को भी सलाहकार बनाकर शास्त्री के पर क़तर दिए जो शास्त्री  नागवार गुजरा |  शास्त्री भी  टीम इंडिया के  सपोर्ट स्टाफ में अपने भरोसेमंद अरुण भारत को बॉलिंग कोच के रूप में  लेना चाहते थे  जिसके बाद   सुप्रीम कोर्ट की बनाई प्रशासकों की समिति के हेड विनोद राय ने  कहा  कि चीफ कोच के सपोर्ट स्टाफ पर आखिरी फैसला रवि शास्त्री  के हिसाब  से तय होगा जिसके बाद भरत अरुण को  श्रीलंका दौरे पर टीम इंडिया के गेंदबाजी की कमान दे दी गई  | इस फैसले ने  एक बार फिर कोच , सपोर्टिंग स्टाफ और सीएसी की जंग को सतह पर ला दिया है |  

सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण की क्रिकेट एडवायजरी कमेटी  ने रवि शास्त्री के साथ-साथ बतौर गेंदबाजी कोच जहीर खान और बतौर बल्लेबाजी कंसल्टेंट राहुल द्रविड़ के नाम की सिफारिश पर अपनी मुहर लगा दी थी तो सवाल है जब तीनों महान खिलाडियों ने अपना फैसला सुना दिया था तो फिर  फैसले पर विनोद राय सामने ऐसी  मजबूरी आन  पड़ी जो वह शास्त्री  मनमाकिफ़ स्टाफ चुनने की आज़ादी देने लगे और शास्त्री के भी दुबारा कोच बनने  के बाद भी खिलाड़ियों को मैदान के बाहर  खुली छूट देने के बयान देने की आवश्यकता क्यों पड़ीं ? असल में इस पूरे प्रकरण में बी सी सी आई  की ही किरकिरी हुई है | जिस शर्मनाक ढंग से विराट और बोर्ड की मिलीभगत से कुंबले जैसे महान खिलाडी और कोच को बाहर का रास्ता दिखाया गया ऐसा  बहुत कम बोर्ड में ही होता है कि शानदार प्रदर्शन कर रही टीम के कोच को बदल दिया जाए। वह  भी तब जब  उसके आसपास तक फटक भी न  सके  लेकिन दुनिया में ऐसा कोई अगर कर सकता है तो वो है बीसीसीआई जिसके पास अकूत कमाई है जो न केवल विश्व के क्रिकेट बोर्डों को  खरीद सकता है बल्कि एक कोच के साथ दर्जनों  भारी भरकम स्टाफ रख सकता उसे मुंहमांगी कीमत दे सकता है |

 पैसे  की रईसी  तले बीसीसीआई को ऐसा हेड कोच मौजूदा दौर में  चाहिए जो कप्तान की बीन पर नाचे |  खिलाड़ियों को खुली छूट दे | सब कुछ  ओपन  इकॉनमी तले,  मैदान और मैदान से  बाहर पूरी तरह हो |  ड्रेसिंग  रूम  भी मस्ती में  डूबा  रहे तो कोई गम नहीं  | कमाई मैच  दर मैच बन  रही है | जब इस दौर में   कप्तान ही सब कुछ है तो कोच  की क्या  बिसात | यह दौर ऐसा है जहाँ खिलाडी कोच को सिखाते हैं | द्रोणाचार्य वाला दौर अब मिटटी में ख़ाक हो चुका है |आज भारतीय क्रिकेट  कप्तान और  बोर्ड के  नेक्सस नेटवर्क से चल रहा है जहाँ कप्तान सबसे बड़ा हो चला है, कोच  भूमिका सीमित  कर दी गई  है |   बात दिग्गज कुंबले की करें तो बीते एक बरस में  उनका कोचिंग रिकॉर्ड शानदार रहा |  पांच में से पांच टेस्ट सीरीज में जीत, 17 टेस्ट मैचों में से 12 जीत, 4 ड्रॉ और सिर्फ एक हार। कुंबले के कार्यकाल के दौरान ही टीम इंडिया ने आईसीसी रैंकिंग में नंबर-1 पायदान हासिल किया।  ऐसे ही नहीं जम्बो को  बेहतरीन स्पिनर और शानदार खिलाड़ी की संज्ञा दी गई । ये रिकॉर्ड खुद बताते थे  कि बतौर कोच कुंबले की पारी कितनी शानदार रही लेकिन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड  को कुंबले का यह शानदार प्रदर्शन नहीं दिखा। दिखा तो बस अपने कप्तान के प्रति उनका अनुशासनात्मक रवैया।  कुंबले के अनुभव को कोई चुनौती  नहीं  दे सकता  |

दुनिया का हर  खिलाडी  कुंबले का मुरीद रहा |  कुंबले का जिक्र  होते ही जेहन में 2002 में भारत-वेस्टइंडीज के बीच खेला गया  टेस्ट  याद  आता है जब मर्वन ढिल्लन की बाउंसर उनके सिर और जबड़े में  लगी और अनिल कुंबले को मैदान से बाहर ले जाया गया मगर  सिर से लेकर जबड़े तक पट्टी बांध  उन्होंने 14 ओवर गेंदबाजी की। इस दौरान जंबो ने महानतम बल्लेबाज ब्रायन लारा का भी विकेट लिया। मैच के बाद पता चला कि कुंबले के जबड़े में फ्रैक्चर था। यही नहीं टेस्ट मैच की एक पारी में  4 फ़रवरी 1999 को आरंभ हुए दिल्ली टेस्ट की चौथी पारी में अपने 26.3 ओवरों में 9 मेडन रखते हुए 74 रन देकर सभी 10 विकेट लेने का कारनामा कर दिखाया।  जिम लेकर के बाद विश्व के पहले ऐसे खिलाड़ी कुंबले  ही रहे | भारत की ओर से टेस्ट मैचों में सर्वाधिक विकेट लेनेवाले गेंदबाज कुंबले  रहे जिन्होंने  1990 से 2008 के बीच टेस्ट  जीवन में खेले 132 टेस्ट मैचों में  18355 रन देकर 29.65 की औसत से 619 विकेट लिए   कुंबले ने पाकिस्तान के विरूद्ध उनसे पहले इंग्लैंड के जिम लेकर ने ऑस्ट्रेलिया के विरूद्ध 26 जुलाई 1956 को आरंभ हुए मैनचेस्टर टेस्ट की कुल तीसरी पारी में और ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी में 51.2 ओवरों में 23 मेडन रखते हुए 53 रन देकर एक टेस्ट पारी में सभी दसों विकेट लेनेवाले पहले गेंदबाज बने थे।

आईपीएल में आरसीबी कुंबले की कप्तानी में 2009 के सीजन में फाइनल तक पहुंची, फाइनल में उसे 6 रनों से हार का सामना करना पड़ा था। अगले सीजन में कुंबले टीम को सेमीफाइनल तक ले गए। उसके बाद कुंबले ने आईपीएल से संन्यास ले लिया। तब से अब तक टीम की कमान कोहली के पास है। कोहली की कप्तानी में आरसीबी केवल एक बार ही फाइनल में पहुंच पाई । कुंबले से कभी तेंदुलकर, द्रविड़, श्रीनाथ, गांगुली और लक्ष्मण जैसे खिलाड़ियों को समस्या नहीं हुई  लेकिन विराट की टीम से कुंबले से  अनबन  क्यों हुई यह गंभीर सवाल है |

पिछले  कुछ समय से टीम इंडिया और कोच लेकर  से  जिस तरह से विवाद हुआ उसने भद्र जन के  बीच  खेल की साख तार तार  जरूर हुई है |  शास्त्री  को  खिलाडियों  और विराट भले ही अपने  में  ढाल  लिया हो लेकिन शास्त्री पर कुंबले से बेहतर रिजल्ट देने का दवाब जरूर होगा | शास्त्री का दौर कुंबले से अलग इस मायने में  होने  जा रहा है क्युकि आने वाले बरसों  में टीम इंडिया  श्रीलंका , ऑस्ट्रेलिया , इंग्लैंड , अफ्रीका , न्यूजीलैंड जैसे देशों दौरे करेगी जहाँ  टीम के कप्तान और  कोच की जोड़ी की  असली परीक्षा होगी | भारतीय टीम  घर में तो शेर है  लेकिन यही टीम विदेशी उछाल  लेनी वाली पिचों पर ढेर  जाती  है |

 देखना होगा कप्तान और कोच की यह नई  जोड़ी कैसे टीम इंडिया  आगे  जाती है वह भी तब जब कुंबले टीम इंडिया  नयी ऊंचाई पर ले  जा रहे थे और टीम  इंडिया उनकी कप्तानी में जीत  गौरवगाथा  लिख रही थी और  सीएसी  समिति कुंबले के पक्ष में डटकर खड़ी  थी | आने वाले दिन विराट  कोहली के लिए भी मुश्किल रहेंगे  क्युकि एशिया  बाहर  भारत  खिलाडियों  ट्रेक रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा  है  और विराट भी  अभी उसी खेत  मूली हैं | देखना होगा  विराट और उनकी टीम आने वाले दिनों में देश से बाहर कैसा व्यक्तिगत प्रदर्शन करती है ?  अनुशासन , धैर्य ,  दृढ़ संकल्प , बड़ों  प्रति सम्मान किसी खिलाडी को महान बनाते  हैं |  विराट शायद अभी यह नहीं समझते  कि  सचिन , सौरभ , लक्ष्मण , द्रविड़ , कुंबले , जहीर ऐसे नहीं बना जाता  |