Thursday, 9 September 2021

‘ ध्यानचंद एक ऐसा नाम है जो अमर है ’


 


अशोक कुमार भारत के पूर्व हॉकी  ओलम्पियन खिलाड़ी रहे हैं । वो हॉकी  के जादूगर कहे जाने वाले महान खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद के बेटे हैं । महज 6 बरस की  उम्र में हॉकी  स्टिक पकड़ ली और अपने पिता ध्यानचंद और चाचा रूप सिंह के पगचिन्हों पर चलते हुए उन्होनें 70 के दशक में अपनी प्रतिभा से हॉकी  के खेल में अपना अलग स्थान बनाया और अपने खेल से सभी का दिल जीत लिया । अशोक ने भारत की ओर से तीन विश्वकप खेले हैं । उन्होनें पहला विश्व कप 1971 में खेला जिसमें भारतीय टीम ने कांस्य पदक हासिल किया । उसके बाद 1973 के विश्वकप की रजत पदक विजेता टीम के भी सदस्य रहे । 1975 के विश्वकप जीतने वाली भारतीय टीम के सदस्य भी रहे । अशोक कुमार ने दो बार ओलम्पिक खेलों में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया । 1972 में म्यूनिख में भारत ने  कांस्य पदक हासिल किया वहीं 1976 में मांट्रियल  में भारत सातवें  स्थान में रहा । अशोक कुमार भारत के लिए तीन एशियाई खेलों का हिस्सा भी रहे हैं जहां भारत ने तीनों में रजत पदक प्राप्त किया । 

भारतीय हॉकी टीम भले ही टोक्यो ओलम्पिक में 41 साल बाद कांस्य पदक जीती  है लेकिन ओलम्पिक के इतिहास में भारतीय हॉकी  का इतिहास स्वर्णिम अक्षरों में आज भी दर्ज है । भारतीय पुरुष हॉकी  टीम ने 1928 के एम्सडर्म ओलम्पिक से अपना सफर शुरू किया था, जो अभी तक बदस्तूर जारी है । 1928 से 1956 तक का दौर भारतीय हॉकी  का स्वर्णिम युग कहा जा सकता है । इसी दौर में भारतीय हॉकी टीम ने सर्वाधिक मेडल जीते । भारतीय हॉकी  टीम के नाम ओलम्पिक हॉकी  में लगातार 6 गोल्ड मेडल जीतने का विश्व रिकार्ड भी दर्ज है । 

भारतीय हॉकी  टीम के स्वरूप , हालिया प्रदर्शन और तमाम संभावनाओं को लेकर 
मैंने बीते दिनों ध्यानचंद के बेटे अशोक कुमार से विशेष बातचीत की । अशोक कुमार मानते हैं टोक्यो ओलम्पिक में मेडल जीतना खिलाड़ियों के लिए निश्चित ही प्रेरणा और जीत का काम करेगा । अब हमको यह देखने की जरूरत है देश में हॉकी  को कैसे बढ़ावा दिया जाए।  

प्रस्तुत है हॉकी  के खेल को लेकर  उनसे हुई  इस विशेष बातचीत के मुख्य अंश :  

41 बरस के बाद भारतीय हॉकी  टीम ने ओलम्पिक में मेडल पाने का सूखा खत्म किया । इस ऐतिहासिक विजय गाथा को आप किस रूप में देखते हैं ?

ये हमारे लिए हाकी में एक बड़ी जीत है । इस जीत ने टीम के अंदर एक उत्साह भर दिया है । हमारी उन तमाम उन नाकामयाबियों के ऊपर पर्दा डाल दिया है जो हमने पिछले कई वर्षों से झेली है । वो उम्मीदें जो हमारी टीम के साथ हमेशा बनी रही कि टीम अच्छा करेगी । हमारी उम्मीदें तब धूमिल हो गई लेकिन इस टोक्यो ओलम्पिक में टीम के अंदर एक नया जज्बा देखने को मिला । एक ऐसा जज्बा,  किसी चीज को पाने की  लगन देखने को मिली । ये लगन एक दिन की नहीं थी । इसने पूरे डेढ़ से दो साल का वक्त लगाया । इस टीम ने उस भरोसे को जीतने के लिए जो उन्होनें खुद के ऊपर था और अपनी टीम, सारे खिलाड़ियों  के ऊपर था जिनकी वजह से टीम ने अच्छा परफार्म किया ।  शुरुवाती झटके हमें बहुत बुरे लगे हैं और आस्ट्रेलिया के खिलाफ जो बड़ी हार हुई इस ओलम्पिक में वह एक बड़ा झटका था लेकिन आगे के मैचों में इस टीम ने संतुलित होकर मानसिक ढंग से जो तकनीक अपनाई वो टीम के लिए तारीफ करने की बात है ।  सबसे बढ़कर उस दौरान में हमारे प्रधानमंत्री जी ने जो पर्सनल टच दिखाया वो काबिले – तारीफ रहा । मोदी जी ने हॉकी  के खिलाड़ियों को ये अहसास कराया आप अकेले नहीं हैं । पूरा हिंदुस्तान आपको देख रहा है । टीम के खिलाड़ियों से व्यक्तिगत तौर पर बात करने जैसी प्रधानमंत्री जी की बातें निश्चित रूप से टीम की स्प्रिट को बढ़ाने में बहुत सहायक सिद्ध हुई । जर्मनी के साथ मैच तो भारतीय हॉकी  के लिए बेहतरीन था ।  इसे वर्ल्ड हॉकी  खेलने वाले लीजेंड ही खेल सकते हैं । 

आस्ट्रेलिया के खिलाफ करारी हार के बाद क्या बेल्जियम जैसी चैम्पियन टीम के खिलाफ ये टीम शानदार वापसी कर लेगी ऐसी उम्मीद आपको थी ? आस्ट्रेलिया के खिलाफ हार के बाद टीम के मनोबल पर तो असर पड़ता है वो भी तब, जब आप ओलम्पिक खेल रहे हैं ? आस्ट्रेलिया से हार के बाद आप आगे क्वालिफाई   कर जाएंगे और कांस्य पदक ले जाएंगे ये कहीं न कहीं चौकाया ? 

हमको ही नहीं पूरी दुनिया को चौंकाया । हाँ , हमको ये लगा आस्ट्रेलिया के खिलाफ हम प्रेशर में खेले । आस्ट्रेलिया का रिकार्ड काफी अच्छा है । प्रेशर में 7 गोल हो गए और हमारी टीम अव्यवस्थित हो गई । पूरा मनोबल टूट गया । हार के बाद सभी ने ये जाहिर भी किया होगा । उसको उबारने के लिए आपस में तालमेल बना । इसके बाद हमने बेल्जियम जैसी विश्व चैंपियन टीम को जिस अंदाज में पराजित किया वो काबिले – तारीफ था । किसी टीम का एक लेवल अगर बन जाए तो उसको मैंटेन करना होता है । नेगेटिव पॉइंट निकालना और पाजिटिव बनाना मैनेजमेंट का काम होता है । खिलाड़ियों की समझ ,विवेक और हौंसला भी काम करता है । टोक्यो ओलम्पिक में हॉकी  क्वार्टर फाइनल मैच तो मिसाल के तौर पर याद रखा जाएगा । 

हॉकी  के जादूगर दादा ध्यानचंद ने भारतीय हॉकी  की दुनिया में एक अलख जगाई व दादा जब खेलते थे तो संसाधन बेहद सीमित थे । आज ग्लैमर, पैसा ,   स्पांसरशिप,  शोहरत सब कुछ है । कैसे इस दौर को आप उस दौर से अलग पाते हैं ?

हर्ष भाई आपने बिलकुल ठीक बात आपने कही । पहले ओलम्पिक शौकिया खेलों में होते थे । पहले खिलाड़ी  अपने संसाधन में खेलते थे । आज के दौर में बदलाव आ गया है । अब प्रोफेशनल आ गए हैं । जब प्रोफेशनल खेल रहे होते हैं तो चीजें बदल जाती हैं । उनके पीछे पैसे का बड़ा हाथ होता है। हम अच्छा करेंगे तो अच्छा पैसा मिलेगा ये बात हो जाती है । ध्यानचंद जी के जमाने में ये सब बातें नहीं थी । जो बात असली थी वो ये कि देश के लिए गोल्ड मेडल जीतने की ललक, गोल्ड जीतने के लिए सारी कोशिशें उस दौर में हुआ करती थी । गोल्ड जीतने के लिए तब कोई एक्सपोजर नहीं हुआ करता था । टेस्ट, संसाधन नहीं थे । उनके बावजूद आपको अपनी ड्यूटी  पूरी करने के बाद प्रैक्टिस  करनी होती थी । शौकिया खेल में उन्होनें खेल को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया जिसकी मिसालें आज तक दी जाती हैं। ओलम्पिक तो ओलम्पिक होता है ।  हर वर्ष ओलम्पिक में रिकार्ड टूटते रहते हैं । कोई भी खेल हो । जब से ये ओलम्पिक शुरू हुआ है तब से रिकार्ड टूटने का सिलसिला चल रहा है ।  आज की  भारतीय हॉकी  टीम और ध्यानचंद  की कोशिशें जो उन्होनें अपने बेहतर खेल से, व्यवहार से और अपने कहे गए लफ्जों से भी बनाई । जब जर्मनी के हिटलर  ने कहा तुम मेरे लिए जर्मनी में आ जाओ मैं तुम्हें जर्मनी में सर्वोच्च पद दूंगा तब उनका एक लाइन का जवाब मैं एक भारतीय हूँ और भारत में रहकर ही देश की सेवा करना चाहता हूँ वहीं से खेलना चाहता हूँ । तो इस तरह के प्रलोभन पैसों के लिए होते हैं लेकिन ध्यानचंद ने इसको महत्व देने के बजाय देश की हॉकी  और गरिमा को ध्यान दिया। भारत पहुँचकर तब उन्होनें गोल्ड को देश को समर्पित किया । ये चीज बदस्तूर जारी रही  । अनेकानेक हमारे खिलाड़ियों ने हॉकी  की गंगा जो ध्यानचंद ने निकाली इसमें  कई खिलाड़ियों ने अपना योगदान दिया है । फिर चाहे इसमें के डी सिंह बाबू , किशनलाल दादा, बलवीर शाह , चरणजीत सिंह हों या महान खिलाड़ी लेसली क्लाउडियस , भास्करन हों इन सबने देश की हाकी में अपना अमूल्य योगदान दिया है ।  हमने भी 1972 का ओलम्पिक खेला है तब ब्रांज मेडल मिला तो यकीन मानिए हर्ष भाई मैंने ब्रांज लाकर बाबू जी को दिखाया । पहले के दौर में जीतने भी खिलाड़ी थे ये सिर्फ और सिर्फ गोल्ड लेकर ही आते थे । गोल्ड की चाहत रखते थे ।  देश को मेडल  समर्पित करते थे । उसमें ब्रांज और सिल्वर मेडल का महत्व नहीं रह जाता था लेकिन आप ये देखिए आज के दौर में स्पर्धाएँ बढ़ गई हैं ।  हमारी टीम 41 साल के बाद हॉकी  में कांस्य पदक लेकर आई है तो आप ये देखिये हर्ष भाई पूरे देश भर  में कितना उत्साह है । खिलाड़ियों , राजनेताओं, युवाओं में इतना उत्साह इस बार देखा गया है तो ये मेडल आने वाले समय में भारतीय हॉकी  के लिए एक अच्छा संकेत है । हम अब उस पायदान पर खड़े हो गए हैं जहां से अगली दो सीढ़ियाँ गोल्ड तक जाती हैं  ।    

राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार हॉकी  के महान जादूगर  दादा ध्यानचंद के नाम शुरू करने को लेकर देश में राजनीति गरमा गई है । विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है । इस फैसले को आप किस रूप में देखते हैं ? क्या अवार्डों में भी  राजनीति आप जायज मानते हैं ? व्यक्तिगत तौर पर जानना चाह रहा हूँ ? 

इस बात को मैं  खिलाड़ी के तौर पर नहीं कहूँगा । जब राजीव गांधी खेल रत्न नाम से पुरस्कार शुरू किया गया था तब तो इस तरह की कोई आवाज नहीं होती थी । अब सरकार किस लिहाज और गरिमा से अवार्ड का नाम रखती है यह सब तो सरकार के ऊपर निर्भर करता है । वह तय करे ।  ध्यानचंद तो एक नाम है जो किसी के दिल , दिमाग और जेहन से नहीं निकल सकता और खेल का सबसे बड़ा अवार्ड जिसे देश का सबसे बड़ा  खिलाड़ी माना गया उसके नाम से रखा गया उससे तो खुशी ही होनी चाहिए । मैं भी उस खुशी में शामिल हूँ । ये अवार्ड प्रधानमंत्री  मोदी जी ने उनके नाम पर रखा लेकिन ध्यानचंद की गरिमा को ठेस कहीं से नहीं पहुँचती । ध्यानचंद एक ऐसा नाम है जो अमर है  । 

भारतीय हॉकी  टीम कभी ओलम्पिक में क्वालिफाई करने के लिए तरस जाती थी । आज 12 से टाप की चार टीमों में जगह बनाने में कामयाब हुई है । अब ओलम्पिक जीतने के बाद इस टीम का भविष्य कैसा देख रहे हैं आप ? इस टीम की मजबूत स्ट्रेंथ क्या रही ? किन क्षेत्रों में सुधार की गुंजाइश नजर आती है आपको फिलहाल  ? 

मुझे याद आता है जब दादा ध्यानचंद ने अपना शुरुवाती दौर का खेल हॉकी  का शुरू किया था । पहली बार निक्कर – बनियान और पीटी शूज पहनकर वो मैदान में खड़े हुए थे । हॉकी  में  उनकी पकड़ मजबूत थी क्योंकि झाँसी हीरो क्लब में उनकी प्रैक्टिस हुई थी जो कंकड़ – पत्थरों वाला ग्राउंड था । आजीवन उन्होनें यहाँ प्रैक्टिस की । गेंद को संभालने की जितनी कला उस समय उनके अंदर आ गई थी उसको उन्होनें आर्मी ज्वाइनिंग के समय भी दिखाया और खेलना शुरू किया । गेंद का कंट्रोल वहीं  से शुरू हो गया था । उसके मद्देनजर ट्रेनर उन पर नजर डालते थे तो उनकी नजर केवल ध्यानचंद पर पड़ी तो लगा इस बच्चे के अंदर बहुत कुछ है । उन्होनें ध्यानचंद को बुलाया और शाबासी देते हुए कहा ‘तुम बहुत अच्छा खेलते हो लेकिन तुम्हारा खेल व्यक्तिगत है । इस टीम के खिलाड़ियों के साथ खेलोगे तो तुम कामयाब हो जाओगे’।  हर्ष भाई मैं इस वाक्य को आज की हॉकी  के साथ जोड़ना चाहता हूँ । ये टीम गेम है । जो जज्बा हमारे हाकी खिलाड़ियों ने टीम के रूप में दिखाया है उसकी दाद देनी चाहिए । शुरू में जरूर हम संगठित नजर नहीं आए लेकिन बाद में हमारे खेल में निखार आता गया । आस्ट्रेलिया से मिली हार के बाद भी हम उबरे । इस पूरे ओलम्पिक में, मैं कहूँ तो खासतौर से पीआर श्रीजेश एक बड़े गोलकीपर के तौर पर उभरकर सामने आए । दशकों से ऐसा बेहतरीन गोलकीपर हमको नहीं मिला था । खेल में ऐसा बचाव करने वाला बेहतरीन खिलाड़ी मेरी नजर में आज तक नहीं आया है । वो असली हकदार इस जीत में हैं जिनके खेल को हम टाप पर रख सकते हैं ।  इनकी गोलकीपिंग मुझे सबसे बढ़िया लगी ।  हमारा डिफेंस भी बहुत अच्छा इस ओलम्पिक में रहा ।  हरमनप्रीत सिंह ने मौके पर गोल दागे ।  रूपेन्दर पाल सिंह राइट हाफ में अच्छा खेले , सेंटर में मनप्रीत मुझे प्रेशर में दिखे जो नहीं होना चाहिए था । लेफ्ट हाफ में हमारे विवेक सागर सिंह आते हैं उन्होनें भी मौके पर बड़े अच्छे गोल दागे । हाँ, मुझे हल्की सी निराशा शुरू से आई जिसे मैंने अपने लफ्जों में कहा भी ये भारत की  फारवर्ड लाइन की टीम कहीं  से कमजोर दिखती है और उसका असर हमें शुरुवाती मैचों में भी लगा ।  चाहे वो आस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच हो या स्पेन के खिलाफ । फारवर्ड लाइन के जिस तारतम्य के लिए भारतीय हॉकी  मशहूर थी वो नहीं दिखी । अटैक इज द बेस्ट वे आफ प्लेईंग  यानी हॉकी जितना आप अटैक करोगे उतना विपक्ष को परेशानी होती है तो वो कहीं न कहीं  हमारी कमी रही लेकिन कोई बात नहीं , परिणाम कांस्य पदक के रूप में मिला है जो एक नई शुरुवात है । इस शुरुवात को अब संभालने की कोशिश होनी चाहिए। अभी तो जलसे चल रहे हैं ।  रिसेप्शन दिये जा रहे हैं ।  उनके बारे में बहुत बयान  हो रहे हैं। निसंदेह हमारी हॉकी  टीम इस जीत की हकदार है तो बयान भी होंगे लेकिन इस जीत को अपने दिमाग के अंदर गर्व के साथ महसूस करना है , दिखाने वाले गर्व के साथ इसे नहीं लाना है  ।  

यूरोपियन खिलाड़ी बहुत आक्रामक हॉकी  खेलते हैं । वे स्टिक से गेंद  लगाते हैं ।  एक दिशा में पास देते हैं और सीधे सेंटर फारवर्ड पास बनाकर गोल करने पर आमादा हो जाते हैं ।  आमतौर पर भारत की हॉकी  टीम के खिलाड़ी ये सब नहीं कर पाते हैं । बड़ी टीमों के साथ भारत लंबे समय तक गेंद अपने पास रखने में नाकामयाब रहता है । इस ओलम्पिक में भी ये सब देखने को मिला है ।  ऐसा क्यों ? 

क्योंकि ये एस्ट्रो टर्फ का खेल बनाया ही इसलिए गया था । यूरोपियन के फायदे के लिए था जिसका खामियाजा एशियन हॉकी  को भुगतना पड़ा । आप देखिये आज हमारी पाक की टीम कहाँ खड़ी है ? पूरे खेलों में जो पहले अच्छा खेलती थी वो सब टीमें  खत्म हो गई ।  एस्ट्रो टर्फ  ऐसा गेम है जिसकी बहुतायत में देशों को जरूरत होती है । एस्ट्रो  टर्फ में हालैण्ड , आस्ट्रेलिया में सैकड़ों ग्राउंड हैं । हमारे कालेजों में क्या ऐसे क्वालिटी के मैदान उपलब्ध हैं ? जब इनकी संख्या ही नहीं बढ़ रही तो कैसे अच्छा  कर सकते हैं हम ? 

आज एक सीमित नंबर को लेकर हम हॉकी  खेल रहे हैं । वो जुनून , शौक कम हो गए हैं । बच्चे को खेलना एस्ट्रो टर्फ पर है। सभी कच्चे ग्राउंड पर कैसे खेल सकते हैं ? क्रिकेट के कोच आज हर स्कूल में हैं । पैसा अच्छा दिया जा रहा है । हॉकी  में कौन सी अच्छी पेंशन मिलती है । ये सब देखना तो प्रबंधन का काम है । हमें अब बच्चों में से ही भविष्य के लिए खिलाड़ी तैयार करने चाहिए । डिफेंस , फारवर्ड एन 100 में से बेहतरीन 10 बच्चों को छाँटें । 
 
जैसा आपने कहा यूरोपियन टीमें ड्रिबलिंग करती हैं वो जरूर इसे करती हैं लेकिन इस ओलम्पिक के अंदर हमने जो मैच खेले हैं उनमें हम उन्नीस  ही नहीं बीस थे । एक -दो  जगह ऐसा लगा हारने वाले हैं लेकिन ये खेल ही ऐसा है।  एक पाले से गाइड दूसरे पाले में पहुंचाई जा सकती है लेकिन यही तो खेल का अंदाज है ।  कोचिंग के साथ ही शारीरिक फिटनेस भी जरूरी है ।  पुरानी हॉकी  में पूरे 11 खिलाड़ी 70 मिनट पसीना बहाते हुए खेलते थे लेकिन आज हाकी ऐसी हो गई है जिस खिलाड़ी को चाहें 2 मिनट में आप बादल सकते हैं  इसलिए आज हॉकी  में तमाम बदलाव भी कर दिये गए हैं  ।  ये हिम्मत जज्बे का खेल है ।  ये सेल्फ स्टेमिना का खेल है  । 

लेकिन यूरोपियन खिलाड़ी को गाइड के स्टिक से लगने से पहले ही खुद को मानसिक रूप से खुद को पास के लिए तैयार कर लेते हैं ।  
 नहीं – नहीं । ये सब बातें टेक्निकल होती हैं । हम भी इन सब बातों को अच्छे से जानते हैं । हमारे खिलाड़ी भी ड्रिबलिंग करते हैं पासिंग भी । जर्मनी को हमने इस बार ओलम्पिक में 5-4 से पराजित किया जो मायने रखता है । खिलाड़ी मैदान पर कैसे गेंद निकाल रहे हैं ये देखना चाहिए । ध्यानचंद क्यों  ध्यानचंद कहलाए क्योंकि उनकी ड्रिबलिंग और पासिंग बेहतरीन थी । खिलाड़ी जब से हाकी पकड़ता है अगर दिल- दिमाग से मजबूत नहीं है तो किसी भी खेल को नहीं जीत सकता चाहे वो कोई भी खेल क्यों ना हो ? नर्वस सिस्टम भी एक चीज है नर्वस सिस्टम दिमाग को सीधे आर्डर देता है।   

कहीं न कहीं तेज रफ्तार से खेलने के मामले में  हम अभी बहुत पीछे हैं ?

मैंने कहा ना आपसे   पहली लाइन रामबाण का काम करेगी । जितनी कमी है उसको दूर करने का काम कोच करेंगे।  अब नई पौध को देश में तैयार करने की ज़िम्मेदारी इन्हें लेनी ही चाहिए । हमारे देश में सुविधाएं नहीं हैं । कोच नहीं हैं तो स्कूल में हॉकी  नहीं होती । उस तरह के मैदान भी नहीं है । शुरू के दौर के कोच और खिलाड़ी अलग थे वो चीज आज नहीं है । 60 ,70 , 80 के दशक में जैसा ये खेल खेला जाता था वैसा आज नहीं है । 

महिला हॉकी टीम ने भी इस बार ओलम्पिक में कमाल कर दिया ? 
 हमारी महिला हॉकी  टीम ने भी इस बार टोक्यो ओलम्पिक में अपने खेल से सभी का दिल जीत लिया । हार – जीत तो खेल का अहम हिस्सा है । ये महिला हॉकी   टीम सही मायनों में हारकर भी देशवासियों के दिलों में जीत गई । मुझे पूरी उम्मीद थी ये टीम मेडल जरूर लाएगी लेकिन ऐसा नहीं हो सका।  

भारत में खेलों में पर्याप्त बजट भी नहीं है । भारत में महज 3 पैसे प्रतिदिन जहां खर्च होता है वहीं पड़ोसी चीन में 6 रु 10 पैसा प्रतिदिन खर्च होता है जो भारत के मुक़ाबले 200 गुना अधिक है । अमरीका का खेलों का साल का बजट 22000 करोड़ है जबकि ब्रिटेन में यह 11000 करोड़ है वहीं भारत में साल भर में खेलों में महज 2596  करोड़ रू खर्च किए जा रहे  हैं । क्या आपको नहीं लगता इस पर अब नए सिरे से मंथन करने की आवश्यकता है ?

जब आप पूछ ही रहे हैं तो मैं जरूर कहना चाहूँगा ये जो फेडरेशन संचालित करते हैं उनको देखना चाहिए हाकी में जो चीज शुरुवात में मिलनी चाहिए वैसे ग्राउंड कहाँ हैं हमारे पास ? मुश्किल से लेवल ग्राउंड 40 से 50 होंगे हमारे पास जहां हॉकी  ढंग से खेली जा सकती होगी । कई ग्राउंड को 5 से 6 साल में बदलना पड़ता है । जब स्कूल में ग्राउंड हैं ही नहीं हमारे पास तो कैसे स्तरीय हॉकी  खेली जा सकेगी ? मैं तो कहूँगा 2596 करोड़ का बजट ये जो केंद्र का है ये हर स्टेट का होना चाहिए तब वही से हॉकी  और अन्य खेल देश में आगे बढ़ेंगे । आज खेलों में बजट को बढ़ाए जाने की बड़ी आवश्यकता है ।  ओलम्पिक में जीत के बाद अब हमारी ज़िम्मेदारी बढ़ गई है । अब भारतीय हाकी फेडरेशन कि यह ज़िम्मेदारी है कि हमें अपनी टीमों को अच्छे से तैयार करना है । स्कूल , कालेज से ही टीमों में यह ललक तैयार करने की जरूरत है जिससे कि वह अच्छा प्रदर्शन  कर सकें । 

आप जब 100 खिलाड़ी रखते हैं तो आपको 10 मिलते हैं 100 में 90 तो वेस्टेज हो जाता है ट्रेनिंग पार्ट में 10 खर्च होता है । हमारे खिलाड़ी आज  छोटे – छोटे आयोजनों में ही उलझ कर रह जाते हैं ।  यूथ ओलम्पिक , यूथ ओलम्पिक है वो ओलम्पिक नहीं है । उसमें मापदंड अलग है लेकिन हमारे खिलाड़ी उन छोटे खेलों में जीत को ही जीवन का अंतिम फाइनल मानने की भूल कर बैठते हैं । आज अगर आप यूथ ओलम्पिक में जीत गए हैं तो आपने जहान जीत लिया है इस तरह  की मानसिकता से भी हमारे देश के खिलाड़ियों को आज बाहर निकलने की  जरूरत है । उन्हें इनसे भी आगे बढ़ने की कोशिश भी करनी चाहिए । उनका जीवन का उद्देश्य जब नेशनल खेलना , नौकरी करना और कोचिंग करना है तो कैसे मेडल आ पाएंगे ? मेडल पाना वो भी ओलम्पिक में कोई आसान काम थोड़ी है । इसके लिए एक समर्पण की जरूरत होती है । लक्ष्य अर्जुन के तीर  जैसा मछली की आँख पर ही होना चाहिए जो मिसिंग है ।
 
हॉकी  के महान जादूगर दादा ध्यानचंद को भारत रत्न देने की मांग लंबे समय से उठती आ रही है लेकिन आज तक उनको भारत रत्न नहीं मिल सका है । यू पी ए सरकार के दौर से यह मांग उठती रही है ।  क्या ओलम्पिक में इस बार भारत के कांस्य पदक जीतने के बाद सवा सौ करोड़ से अधिक भारतवासियों की ये मुराद पूरी हो पाएगी ? 

फिलहाल इसका जवाब तो मेरे पास भी नहीं है। ध्यानचंद ने तीन बार देश को ओलम्पिक में गोल्ड दिलाया था और दादा का खेल तो पूरी दुनिया ने देखा है वो किस तरह के महान खिलाडी थे। ध्यानचंद एक ऐसे खिलाड़ी रहे हैं जिनका  ताल्लुक हॉकी  के जरिये  सिर्फ देश की प्रतिष्ठा, मान , सम्मान बढ़ाने में ही लगा रहा । ध्यानचंद का हुनर हासिल करना आज भी किसी खिलाड़ी के लिए सपना ही है । उन्होनें हॉकी  को बहुत कुछ दिया है ।

Saturday, 28 August 2021

ध्यानचंद : हाकी के जादूगर






उनकी स्टिक में एक जादू परिलक्षित होता था। हाकी थामे जब वो ड्रिबलिंग करते थे तो अच्छे -अच्छे खिलाड़ियों के पसीने छूट जाते थे । आप कह सकते हैं  हाकी के मैदान पर अपने तीसरे नेत्र द्वारा वो विपक्षी टीम के हर खिलाड़ी पर  पैनी नजर रखते थे । उनका दिल और दिमाग हर समय हाकी के खेल में ही डूबा रहता  था। सही मायने में उनके आसपास हाकी जैसे राष्ट्रीय खेल का औरा था। वे मैदान पर जब रहते थे तो खेल के हर दांव पर चीजों को साधते थे।  वे लोग भाग्यशाली  थे  जिन्होनें महान हाकी जादूगर ध्यानचंद के खेल को बेहद करीब से देखा है  । उनकी सबसे बड़ी देन यही है कि उन्होंने देश के  हर खिलाड़ी को यह पाठ पढ़ाया कि आपकी परिस्थितियां आपको बड़ा बनने से रोक नहीं सकतीं, अगर आप में  खेल के प्रति जुनून  है। किसी भी खिलाड़ी की महानता को आप  उसके खेलों के प्रति समर्पण, जिद और जुनून  से  बखूबी नाप सकते हैं , उस हिसाब से तो मेजर ध्यानचंद महान खिलाड़ी थे । उन्हें  हॉकी में फिरकी का जादूगर  यूं ही नहीं कहा जाता था  ।

ध्यानचंद का जन्म उत्तरप्रदेश के इलाहबाद में 29 अगस्त 1905 को हुआ था। उनके पिता का नाम समेश्वर सिंह था जो ब्रिटिश इंडियन आर्मी में एक सूबेदार के रूप कार्यरत थे। हाकी का माहौल तो मानो पूरे परिवार में ही था । पिता को हाकी की स्टिक पकड़ा देखकर  ध्यान ने भी हाकी की स्टिक थाम ली ।  यह वह दौर था जब ध्यानचंद के  भाई  मूल सिंह और  रूप सिंह भी हाकी के हीरो के रूप में  जाने जाने  लगे ।  हॉकी के खेल  में ध्यानचंद की  प्रतिभा देखते ही बनती थी । उन्होंने सतत साधना, अभ्यास, लगन, संघर्ष और संकल्प के सहारे  भारतीय हाकी को दुनिया में अपने आसरे न केवल नई पहचान दिलाई बल्कि दुनिया में भारत की हाकी की धमक अपने खेल के जरिये दिखाई ।  ध्यान चंद  जब महज 14  बरस के  थे, तब वह अपने पिता के साथ हॉकी मैच देखने के लिए गए। जहां उन्होंने एक टीम को 2 गोल से हारते हुए देखा, तभी चंद ने अपने पिता से पूछा कि वह हारने वाली टीम से खेल सकते हैं, उनके पिता ने  कहा “हाँ क्यों नहीं।” उस मैच में ध्यान चंद ने 4 गोल किए। उनके प्रदर्शन को देखते हुए सेना के अधिकारी इतने प्रभावित हुए और उन्हें सेना में शामिल होने की पेशकश की। ध्यानचंद 16 साल की उम्र में “फर्स्ट ब्राह्मण रेजिमेंट” में एक साधारण सिपाही के रूप में भर्ती हुए  लेकिन वे भारतीय सेना में मेजर के पद तक अपने खेल के जरिये पहुंचे ।  भारतीय सेना जॉइन  करने के बाद उन्होंने हॉकी  को अपना जीवन बना लिया किया।

ध्यानचंद  बेहतरीन हाकी खेलते थे  इसके लिए वो दिन - रात पसीना बहाया करते थे।  उस दौर में उनके  रात के अभ्यास सत्र को चांद निकलने से जोड़कर देखा जाता था  शायद यही वजह थी उनके साथी खिलाड़ियों ने उन्हें 'चांद' नाम दे दिया। ध्यानचंद को फुटबॉल में पेले और क्रिकेट में ब्रैडमैन के समतुल्य माना जाता है।  उनकी गेंद इस कदर उनकी स्टिक से चिपकी रहती कि प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ी को अक्सर आशंका होती कि  कहों वो किसी  जादुई स्टिक से तो  नहीं  खेल रहे हैं। ध्यानचंद की हॉकी स्टिक से जिस तरह गेंद चिपकी रहती थी उसे देख कर उनकी हॉकी स्टिक में गोंद लगे होने की बातें भी पूरी दुनिया में  कही गई। एक बार कुछ ऐसा हुआ कि नीदरलैंड में एक मैच के दौरान उनकी हॉकी स्टिक तोड़कर देखी गई, इस शक के साथ कहीं स्टिक में कोई चुम्बक तो नहीं लगी लेकिन उनके हाथ कुछ नहीं लगा क्योंकि जादू हॉकी स्टिक में नहीं ध्यानचंद के बेजोड़ खेल और हाथों  में था। एक बार ध्यान चंद  ने शाॅट मारा तो वह पोल पर जाकर लगा तो उन्होनें रेफरी से कहा की गोल पोस्ट की चौड़ाई कम है। जब गोलपोस्ट की चौड़ाई मापी गई तो सभी हैरान रह गए ।वह वाकई कम थी। ध्यान चंद ने देश को स्वाभिमान से जीना भी सिखाया । उनकी कलाकारी से मोहित होकर ही जर्मनी के रुडोल्फ हिटलर सरीखे जिद्दी सम्राट ने उन्हें जर्मनी के लिए खेलने  और जर्मन सेना में शामिल  होने की पेशकश कर दी थी लेकिन ध्यानचंद ने हमेशा भारत के लिए खेलना ही सबसे बड़ा गौरव समझा और लेकिन उन्होंने भारत में ही रहना पसंद किया और मौके पर ही इस पेशकश को ठुकरा ही दिया ।1936 में बर्लिन ओलंपिक में हिटलर के सामने ना सिर्फ जर्मनी की हॉकी टीम को 8-1 से पराजित किया, बल्कि उस दौर में दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह हिटलर के सामने खड़े होकर तब उन्हें भरतीय होने का एहसास कराया, जब हिटलर से आंख मिलाना भी हर किसी के बस की बात नहीं होती थी। ध्यानचंद ने हिटलर की उस फरमाइश को खारिज कर दिया जिसमें हिटलर ने ध्यानचंद को भारत छोड़ कर्नल का पद लेकर जर्मनी में रहने को कहा था लेकिन, ध्यानचंद उस वक्त भी  अपने फटे जूते , स्टिक और लांस-नायक के अपने पद को बतौर भारतीय ज्यादा महत्व दिया।  अपनी आत्मकथा 'गोल' में उन्होंने लिखा था, आपको मालूम होना चाहिए कि मैं बेहद सरल  और साधारण आदमी हूं ।  ध्यानचंद की हॉकी की जादूगरी  के जितने किस्से हैं उतने शायद ही दुनिया के किसी अन्य खिलाड़ी के बाबत सुने गए हों।

ध्यान चंद का असली नाम ध्यान सिंह था जो  नाम उनके कोच पंकज गुप्ता ने दिया था। उनकी हॉकी की कलाकारी देखकर  हर हॉकी प्रेमी बिना  वाह-वाह कहे बिना  नहीं रह पाता था  बल्कि प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाड़ी भी अपनी सुध - बुध खोकर उनकी  स्टिक की कलाकारी को देखने में मशगूल हो जाते थे।1928 में एम्सटर्डम में हुए ओलिंपिक खेलों में वह भारत की ओर से सबसे ज्यादा गोल करने वाले खिलाड़ी रहे। उस टूर्नमेंट में ध्यानचंद ने 14 गोल किए। एक स्थानीय समाचार पत्र में लिखा था, 'यह हॉकी नहीं बल्कि जादू था और ध्यान चंद हॉकी के जादूगर हैं।'1936 के बर्लिन ओलंपिक में उनके साथ खेले और बाद में पाकिस्तान के कप्तान बने आईएनएस दारा ने वर्ल्ड हॉकी मैगज़ीन के एक अंक में लिखा था, "ध्यान के पास कभी भी तेज़ गति नहीं थी बल्कि वो धीमा ही दौड़ते थे. लेकिन उनके पास गैप को पहचानने की गज़ब की क्षमता थी।  डी में घुसने के बाद वो इतनी तेज़ी और ताकत से शॉट लगाते थे कि दुनिया के बेहतरीन से बेहतरीन गोलकीपर के लिए भी कोई मौका नहीं रहता था। "

अपने शानदार खेल से  ध्यानचंद  विपक्ष  की रक्षापंक्ति को छिन्न-भिन्न कर देते थे और दर्शकों को  अपने बेहतरीन खेल से मंत्रमुग्ध कर देते थे ।इस पर विरोधी टीम  अक्सर  का सेंटर-हाफ में  अपना संतुलन खो  बैठती  थी ।   ओलंपिक चैंपियन  ध्यान चंद के बेटे अशोक ध्यानचंद  ने मुझे बताया कि  ध्यानचंद  ड्रिब्लिंग के उस्ताद  थे लेकिन उनकी असली प्रतिभा उनके दिमाग़ में थी  ।   वो उस ढ़ंग से हॉकी के मैदान को देख सकते थे जैसे शतरंज का खिलाड़ी चेस बोर्ड को देखता है।  उनको बिना देखे ही पता होता था कि मैदान के किस हिस्से में उनकी टीम के खिलाड़ी और प्रतिद्वंदी मूव कर रहे है।1947 के पूर्वी अफ़्रीका के दौरे के दौरान उन्होंने केडी सिंह बाबू को गेंद पास करने के बाद अपने ही गोल की तरफ़ अपना मुंह मोड़ लिया और बाबू की तरफ़ देखा तक नहीं। जब उनसे बाद में उनकी इस अजीब सी हरकत का कारण पूछा गया तो उनका जवाब था, "अगर उस पास पर भी बाबू गोल नहीं मार पाते तो उन्हें मेरी टीम में रहने का कोई हक़ नहीं था."  ।

ध्यानचंद ने कई यादगार मैच खेले लेकिन 1933 में कलकत्ता कस्टम्स और झांसी हीरोज के बीच खेला गया बिगटन क्लब फाइनल उनका सबसे ज्यादा पसंदीदा मुकाबला था। 1932 के ओलिंपिक फाइनल में भारत ने संयुक्त राज्य अमेरिका को 24-1 से हराया था। उस मैच में ध्यानचंद ने 8 गोल किए थे। उनके भाई रूप सिंह ने 10 गोल किए थे। उस टूर्नमेंट में भारत की ओर से किए गए 35 गोलों में से 25 ध्यानचंद और उनके भाई ने किए थे।1925 में उन्होंने अपना पहला राष्ट्रीय मैच खेला और उस मैच के प्रदर्शन के आधार पर उन्हें भारतीय राष्ट्रीय टीम के लिए चुना गया।उन्होंने अपने अंतरराष्ट्रीय डेब्यू मैच में गोलों की हैट्रिक लगाई थी। दिसंबर 1934 में ध्यान चंद को टीम का कप्तान नियुक्त किया गया। वर्ष 1935 में क्रिकेट के महान खिलाड़ी डॉन ब्रैडमैन ने अपना पहला हॉकी मैच देखा, जिसमें ध्यान चंद खेल रहे थे। वह उनके प्रदर्शन से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ध्यान चंद की प्रशंसा करते हुए कहा, “आप क्रिकेट में रन बनाने जैसे लक्ष्यों की भांति गोल करते हैं।”ऑस्ट्रेलिया के महान क्रिकेटर सर डोनाल्ड ब्रैडमैन ने 1935 में एडिलेड में एक हॉकी मैच देखने के बाद कहा था, “ध्यानचंद ऐसे गोल करते हैं जैसे क्रिकेट में रन बनता है।” ब्रैडमैन हॉकी के जादूगर से उम्र में तीन साल छोटे थे।  ध्यानचंद कितने जबर्दस्त खिलाड़ी थे वियना के स्पोर्ट्स क्लब में उनकी एक मूर्ति लगाई गई है जिसमें उनके चार हाथ और उनमें चार स्टिकें दिखाई गई हैं, मानो कि वो कोई देवता हों। 

3 मई सन्‌ 1926 ई. को न्यूजीलैंड में पहला मैच खेला था। न्यूजीलैंड में 21 मैच खेले जिनमें 3 टेस्ट मैच भी थे। इन 21 मैचों में से 18 जीते, 2 मैच अनिर्णीत रहे और और एक में हारे। पूरे मैचों में इन्होंने 192 गोल बनाए। उनपर कुल 24 गोल ही हुए। अंतर्राष्ट्रीय मैचों में उन्होंने 500 से अधिक गोल किए। अप्रैल, 1949 ई. को प्रथम कोटि की हाकी से संन्यास ले लिया।तीन बार ओलम्पिक के स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य रहे ध्यानचंद की  जन्मतिथि को भारत में “राष्ट्रीय खेल दिवस” के के रूप में मनाया जाता है  ।  उनके जन्म दिवस के मौके पर हर साल  साल  भारत में अर्जुन और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं  । ध्यानचंद ने तीन ओलिम्पिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया तथा तीनों बार देश को स्वर्ण पदक दिलाया। भारत ने 1932 में 37 मैच में 338 गोल किए, जिसमें 133 गोल ध्यानचंद ने किए थे। दूसरे विश्व युद्ध से पहले ध्यानचंद ने 1928 (एम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिल्स) और 1936 (बर्लिन) में लगातार तीन ओलिंपिक में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल दिलाए। ध्यानचंद   से 1949  तक करीब 23 साल तक भारत के लिए खेले। उन्होंने देश को आजादी से पहले एम्सर्टडम (1928),  लॉस एंजिलिस(1932) और बर्लिन (1936) में लगातार तीन ओलंपिक में पीले तमगे दिलाए। तीन ओलंपिक के 12 मैचों में ध्यानचंद ने 39  गोल दागे। उन्होंने भारत के लिए 195  मैच खेले और 570 गोल किए। वर्ष 1956 में, 51 वर्ष की उम्र में ध्यान चंद सेना से मेजर के पद से सेवानिवृत्त हुए।भारतीय हॉकी में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए ध्यान चंद को सम्मानित करते हुए, एक भारतीय डाक टिकट जारी की गई। उन्हें 1956 में भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था। वर्ष 2002 से, भारतीय खेल एवं युवा मंत्रालय द्वारा खिलाड़ी के जीवन भर के कार्य को गौरवान्वित करने के लिए “ध्यानचंद पुरस्कार” दिया जाने लगा। ध्यान चंद के जन्मदिन को हर वर्ष भारतीय राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है।  इस दिन राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति स्वयं खेल के अलग-अलग क्षेत्रों के अलग-अलग खिलाड़ियों को विभिन्न खेल सम्मानों (राजीव गांधी खेल रत्न, अर्जुन अवार्ड, द्रोणाचार्य अवार्ड, ध्यानचंद अवार्ड) से सम्मानित करते हैं।  हाकी के इस जादूगर का जन्म दिन राष्ट्रीय खेल दिवस सभी विद्यालयों ,कालेजों ,और खेल अकादमियों में मनाया जाता है। यह दिन मनाने के पीछे एक उद्देश्य यह भी है कि हम अपने देश के युवाओं में खेल को अपना करियर बनाने के लिए प्रोत्साहित कर पाएं और उनके अंदर ये भावना जाग्रित कर पाएं कि वे अपने खेल के उम्दा प्रदर्शन के जरिए खुद की तरक्की तो कर ही सकते हैं ,साथ ही उनके अच्छे खेल प्रदर्शन से देश का नाम भी ऊंचा करेंगे । देश की आज़ादी से पहले देश के बाहर देश का  तिरंगा झंडा लेकर कोई शख्स गया था तो वह ध्यानचंद ही थे। ओलंपिक फाइनल में जर्मनी से भिड़ने से पहले बकायदा टीम के कोच पंकज गुप्ता, कप्तान ध्यानचंद के कहने पर कांग्रेस का झंडा हाथ में ले कर जर्मनी की टीम को पराजित करने की कसम खायी लेकिन भारत रत्न कध्यानचंद  को देने को लेकर  भारत में को लेकर सोचा भी नहीं गया। उनके मंझले बेटे अशोक कुमार सिंह  हाकी  के  महानतम खिलाड़ी मेजर  ध्यानचंद को  देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न  मिलने के सवाल पर आज भी कहते हैं दादा का खेल पूरी दुनिया ने देखा है वो कसी तरह के खिलाड़ी दे। भारत की 1975 विश्व कप जीत के हीरो अशोक ने एक दशक पहले ध्यानचंद को भारत रत्न देने की  यह मुहिम शुरू की थी लेकिन  तीन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जिताने वाले हॉकी के जादूगर ध्यानचंद को यह पुरस्कार अभी तक नहीं मिल पाया है। उन्होंने अपनी हॉकी की कलाकारी से देश का गौरव बढ़ाया और उस दौर में देश को ओलंपिक में लगातार तीन सुनहरे तमगे दिलाए जब सुविधाएं नाममात्र थी। देशभर से  इस बार भी 41 बरस बाद भारतीय हाकी टीम के कांस्य पदक जीतने के बाद  यही आवाज उठ रही  है कि ध्यानचंद को अब भारत रत्न  देने में  केंद्र सरकार को देरी नहीं करनी  चाहिए । फिलहाल इसका जवाब उनके बेटे  अशोक ध्यानचंद के पास भी नहीं है  लेकिन जनभावनाओं और ध्यानचंद के हाकी के प्रति समर्पण को देखते हुए उन्हें  अभी भी उम्मीद है कि सरकार  देर -सबेर इस इस बारे में जरूर  सोचेगी । 

Sunday, 18 July 2021

नई उड़ान पर सवार ज्योतिरादित्य सिंधिया




शाही खानदान से भारतीय राजनीति में आना बहुत बड़ी बात मानी जाती है लेकिन अनगिनत  संभावनाओं वाली राजनीति में खुद को साबित करना तो एक बहुत चुनौतीपूर्ण काम है। आमतौर पर हमारे देश की राजनीति में पारिवारिक पृष्ठभूमि से आने वाले नेताओं की इंट्री बहुत जल्दी हो जाती है लेकिन बिरले राजनेता ऐसे होते हैं जो सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए अपनी विरासत संभालते हुए नई इबारत गढ़ते नजर आते हैं। मध्य प्रदेश की धरती से आने वाले महाराज ने सही मायानों में इसे बखूबी साबित कर दिखाया है। 

 जी हाँ , महाराज ज्योतिरादित्य सिंधिया राजनीति के वो नायाब हीरे हैं जिसके बारे में लिखना ऐसे इंसान के जज्बे को सलाम करना है जिसके लिए राजघराने की अथाह धन-दौलत- संपदा इस दौर में कोई मायने नहीं रखती । उसके लिए तो जनता के सरोकारों की राजनीति इस दौर में मायने रखती है जिसकी आँखों में दिन- रात  समाज के अंतिम छोर पर खड़े आम आदमी तक विकास पहुंचाने का सपना तैरता रहता है । महाराज देश के युवाओं के आयकन हैं। इसे समझना है तो राजा भोज विमान तल पर उनके स्वागत में आने वाले युवाओं सैलाब को देखकर जान सकते हैं। जब भी वो भोपाल आते हैं तो बैरागढ़  से लेकर वी आई रोड और कमला पार्क से लेकर विधान सभा तक  वाहनों की रफ्तार थम सी जाती है । हबीबगंज रोड में वाहनों का रेला लगने के चलते अक्सर  जाम की समस्या बन जाती है । महाराज के काफिले को प्रदेश भाजपा कार्यालय तक पहुँचने में घंटों लग जाया करते हैं । लोग महाराज का दीदार करने , एक झलक पाने के लिए  अपने घरों से बाहर निकल जाते हैं और महाराज में मध्य प्रदेश के भविष्य को ढूंढते नजर आने लगते हैं । महाराज ने अपनी राजनीति से हर उस युवा वोटर को अपने मोहपाश में इस कदर जकड़ा है मानो इस दौर में वो उनका  दीवाना हो जाता है और तारीफ़ों के कसीदे पढ़ने लगता है । राजनीति की रपटीली राहों में महाराज ने अपने को इस कदर उकेरा है,  हर वोटर  महाराज की जय- जयकार करने लग जाता है । भाजपा की मौजूदा राजनीति में जिस तरीके से युवा वॉटर को साधने के लिए हर चुनाव में बिसात बिछाई जा रही है और उन्हें हर प्रदेश में बड़ी जिम्मेदारियाँ दी जा रही हैं उस राजनीति में महाराज पूरी तरह हिट और फिट बैठते हैं । यह कहने में कोई  अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए अब मध्य प्रदेश  भाजपा की राजनीति का भविष्य ज्योतिरादित्य सिंधिया यानी महाराज ही  हैं। 

भोपाल का बड़ा तालाब कभी सूख जाता है तो कभी बरसात का पानी इसे भर देता है । बड़े तालाब की तरह राजनीतिक समुंदर की लहरें भी कभी ऊपर तो कभी नीचे गिरती रहती हैं । ऐसे में कब क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। महाराज के काँग्रेस छोड़ने के बाद से  ही उनके भविष्य को लेकर तरह तरह की अटकलें मीडिया में चलती रही। काँग्रेस से जुड़े लोग भी उनकी भविष्य की राजनीति को लेकर तमाम तरह के सवाल उठाते रहे लेकिन धैर्य धारण करने वाले महाराज की कुंडली में लिखे राजयोग की लकीर को कोई मिटा नहीं सका । यही वजह है काँग्रेस छोड़ने के बाद भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की लोकप्रियता  के ग्राफ में आज भी कमी नहीं आई है शायद इसकी बड़ी वजह पिता स्वर्गीय माधव राव सिंधिया के उसूलों की वो राजनीति रही है जिसने महाराज को राजनीति के नए शिखर पर लाकर खड़ा किया है,  जहां नागरिक उड्डयन मंत्री के रूप में महाराज प्रधान सेवक पी एम नरेंद्र मोदी कैबिनेट में नई उड़ान भर रहे हैं ।

 हालांकि ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस के साथ अपनी राजनीति शुरूवात की लेकिन बीते बरस मार्च में उनका काँग्रेस के साथ आगे चल कर छूट गया । अब वो भाजपा के साथ हैं लेकिन अब भी ज्योतिरादित्य सिंधिया की वही ठसक बरकरार है। आप ज्योतिरादित्य सिंधिया के बारे में कह सकते हैं वो राजनीति के अजातशत्रु हैं। महाराज तो महाराज हैं उनकी राजनीति के आगे सारे सूरमा धराशायी हो जाते हैं। आप कह सकते हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया की आँधी  बड़े बड़े सिंहासनों को उड़ा देती है । मेरी जानकारी में ऐसा कोई समय नजर आया जब मध्य प्रदेश की राजनीति की मुख्य धारा में वो हाशिये पर रहे । सियासत हमेशा नए चेहरों में संभावनाएं और भविष्य का नेतृत्व तलाशती है । बहुत कम ऐसे चेहरे होते हैं जिनमें हमेशा नई तरह की संभावनाएं नजर आती हैं । महाराज के नाम से मशहूर ज्योतिरादित्य सिंधिया देश की सियासत का ऐसा ही चेहरा हैं , जिसमें हर किसी को भविष्य का एक बड़ा राजनेता नजर आने लगा है।  ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीति की साधना को  जिन्होंने  बहुत करीब से देखा है, जो उनकी दो दशक की राजनैतिक यात्रा के गवाह रहे हैं। वह जानते होंगे कि महाराज बनना हर सियासतदां के बूते की बात नहीं, यह ‘आग’ में तपकर ‘कुंदन’ बनने जैसा है और अपने महाराज के साथ तो आदित्य और ज्योति दोनों का सम्मिश्रण हैं। तभी वो ज्योतिरादित्य कहलाते हैं। 

ज्योतिरादित्य सिंधिया की राजनीति की गहराई में जाने के लिए आपको थोड़ा फ्लैश बैक में जाने की जरूरत है। याद कीजिये 13 फरवरी, 2020  का दिन। तब  मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में कांग्रेस के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान जनसभा से अचानक ही कुछ टीचर खड़े हुए और उन्होंने जबर्दस्त ढंग से हंगामा शुरू कर दिया। टीचर तत्कालीन काँग्रेस सरकार से बहुत नाराज थे। मैं तब टीकमगढ़ ही था। नाराज टीचरों को शांत करने के उद्देश्य से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि आप की मांगों को मैंने चुनाव से पहले भी सुना था। यही नहीं बल्कि आपकी आवाज भी मैंने उठाई थी। मैं आपको यह विश्वास दिलाता हूं कि आपकी जो मांग है वह हमारी सरकार के मेनिफेस्टो में दर्ज है। वह मेनिफेस्टो हमारे लिए ग्रंथ बनता है। सब्र रखना और अगर उस मेनिफेस्टो का एक-एक अंक पूरा न हुआ तो आपके साथ सड़क पर हम भी होंगे। आप अकेले मत समझना। आपके साथ सड़क पर ज्योतिरादित्य सिंधिया भी उतरेगा।  सिंधिया के इस बयान  की बाद से तो मध्य प्रदेश की राजनीति में सियासी तूफान खड़ा हो गया । कमलनाथ सरकार की मानो घिग्गी ही बंध गयी । 2019 में पहली बार लोकसभा चुनाव हारने के बाद सियासी वनवास भुगत रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया की यह हुंकार  तब प्रदेश में चर्चा का विषय बन गई थी । हर किसी की जुबान पर ज्योतिरादित्य सिंधिया के बोल ही गूंजने लगे। इन बयानों को सुनते हुए हर किसी को महसूस होने लगा कि जैसे कोई विपक्ष का नेता सरकार के खिलाफ हुंकार अपने अंदाज में भर रहा है। उसका युवा जोश देखते ही बन रहा था । टी वी चैनलों के कैमरे उसकी तरफ बढ़ते जा रहे थे। वे सभी ज्योतिरादित्य सिंधिया की बाइट लेने के लिए बेकरार थे ।  वैसे आमतौर पर देखा जाए तो सरकार को कटघरे में  खड़ा करना विपक्ष का काम होता है लेकिन उसूलों पर आंच आए तो सीधे टकराना भी जरूरी है । कुछ इसी अंदाज में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने चुनावी मेनिफेस्टो में  जनता के मुद्दों को  पूरा करने के लिए तत्कालीन  कमलनाथ सरकार से सीधे टकराने की ठानी । इसका उत्तर कमलनाथ ने ये कहते हुए दिया था कि तो वो उतर जाएं लेकिन प्रदेश में पार्टी के नेताओं के बीच क्या कुछ चल रहा है इसे कांग्रेस आला कमान ने नज़रअंदाज़ किया जिसकी बड़ी कीमत उसने बीते बरस मध्य प्रदेश में बनी बनाई नई नवेली सरकार के गँवाने के रूप में चुकाई । 

 मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के ख़िलाफ़ ज्योतिरादित्य सिंधिया कई मुद्दों को लेकर लगातार  खुलकर बोलते रहे । सिंधिया की सोच हमेशा से ही दूरदर्शी रही है । महाराज ने कमलनाथ सरकार को चेताते हुए यहाँ तक कह दिया था अगर सरकार आपका काम नहीं करेगी तो हमें भी आपके साथ सड़कों पर उतरना पड़ेगा। जब सरकार आप हैं आप की पार्टी है और सीएम आपकी ही पार्टी का है, तो ऐसे में सड़कों पर उतरने का संदेश देना बहुत कुछ कह जाता है। राजनीतिक हलकों में सिंधिया के इस संदेश को तब गंभीरता से लेने में काँग्रेस पार्टी कहीं न कहीं चूक गयी। ऐसे में  दो दर्जन से अधिक विधायकों को अपने पक्ष में लामबंद करके महाराज ने राजनीति के  मंझे खिलाडी कमलनाथ को महाराज होने के मायने बता दिये । तब कमलनाथ सरकार विश्वासमत विधान सभा में प्राप्त नहीं कर पायी और मध्य प्रदेश में फिर से शिवराज मामा की  वापसी हो गयी।  कांग्रेस पार्टी में रहते हुए भी वो सही मुद्दों का हमेशा समर्थन करते नजर आए । सर्जिकल स्ट्राइक पर जब विपक्ष की पार्टी के तमाम नेता सवाल उठा रहे थे तब ज्योतिरादित्य सिंधिया देशहित मोदी सरकार के साथ अपनी पार्टी लाइन से इतर जाते हुए दिखे । यही नहीं धारा 370 को खतम करने से लेकर सीएए के समर्थन के मसले पर भी वह मोदी सरकार के साथ खुलकर नजर आए । नेहरू - गांधी  परिवार के सबसे भरोसेमंद सलाहकार कमलनाथ – दिग्गी राजा  तब इस हवा के रुख को भांपने में नाकामयाब हो गए ।  

 ग्वालियर से शुरू हुई महाराज की राजनीति यात्रा आज जिस पड़ाव पर है अब वह इतिहास में दर्ज हो गई है । महाराज अब केंद्र के सबसे दमदार नागरिक उड्डयन विभाग की कमान संभाल रहे हैं । मंत्रिमंडल में मध्य प्रदेश से उन्हें शामिल कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मध्य प्रदेश से विशेष लगाव को उजागर किया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल के शपथ समारोह से चंद घंटे पहले पी एम मोदी शपथ ग्रहण करने वाले सांसदों से 7 लोककल्याण मार्ग में मिले । उस समय प्रधानमंत्री मोदी की क्लास में सबसे आगे महाराज को स्थान मिलने से प्रदेश की राजनीति में एक साथ कई संदेश गये हैं। इसे महाराज के  मध्य प्रदेश में बढ़ते राजनीतिक कद के रूप में देखा जा रहा है। महाराज के काँग्रेस से इस्तीफे के बाद जहाँ उनके विरोधी यह मान चले थे कि उनकी राजनीति पर अब ग्रहण लग गया है और मध्य प्रदेश में अपने साथी विधायकों को शिवराज सरकार में एडजेस्ट करने के बाद अब भाजपा में उनको कोई पद मिलना मुश्किल हो गया है और उनको राज्य सभा की कुर्सी देकर संतुष्ट करने की कोशिश की गई है लेकिन जैसे ही शाम को राष्ट्रपति भवन में हुए मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण समारोह में ज्योतिरादित्य सिंधिया नजर आये उसने  एक बार फिर सभी को सियासत में महाराज होने के मायने बता दिए । एमपी से उनके कैबिनेट मंत्री बनाये जाने से जहाँ उनके  राजनीतिक कद में इजाफा हुआ है वहीँ लम्बे  समय से मध्य प्रदेश की विकास की  उम्मीदों को भी अब नए पंख लग गये हैं।  युवा तुर्क ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी साफगोई और बेबाकी  के लिए राजनीति में जाने जाते हैं । आज  अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया  की ताजपोशी से पूरे प्रदेश  में जश्न है तो इसका कारण  उनका ऐसा  जनप्रिय नेता होना है जिसे  लोग मध्य प्रदेश  के  जनसरोकारों से  जुड़ाव रखने वाले नेता के तौर पर देखते रहे  हैं । ज्योतिरादित्य सिंधिया धुन के पक्के हैं और अपने काम से विशेष लगाव रखते हैं और अकसर जनता के दुख दर्दों को उठाते आए हैं । एक  राजनेता के तौर पर महाराज   की  यही  पहचान प्रदेश भाजपा के  अन्य नेताओं  से उन्हें अलग करती  है । एक दशक से भी अधिक समय से महाराज ने  युवा सांसद के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई है । वह संसद में मुखर होकर बहस में प्रतिभाग करते हैं । 

 ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा को मुंबई के कैंपियन स्कूल एवं दून स्कूल में हासिल की जिसे एलिट क्लास का माना जाता है ।  ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दुनिया की मशहूर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से बीए की डिग्री ली और  स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए की डिग्री प्राप्त की। ज्योतिरादित्य बचपन से ही पढ़ाई में कुशाग्र रहे हैं।  राजनीति तो इनके परिवार के खून में मानो की हुई है । महाराज के ऊपर भी उनके इस राजवंश का विशेष प्रभाव रहा है राजनीति को वो समाज से जुडने और सेवा करने का बेहतरीन माध्यम मानते हैं । सिंधिया परिवार मध्य प्रदेश के शाही ग्वालियर घराने से आता है और उनके दादा जीवाजी राव सिंधिया इस राजघराने के अंतिम राजा थे। ज्योतिरादित्य सिंधिया जी की दादी विजय राजे सिंधिया ने भी अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत कांग्रेसी पार्टी से की 1957 में गुना क्षेत्र से पहली दफा लोकसभा सांसद के लिए चुनाव लड़ा था जिसके बाद वो संसद पहुँचने में कामयाब हुई।  विजय राजे सिंधिया चाहती थी उनके सभी परिवार के लोग भाजपा की तरफ से चुनाव लड़े लेकिन  इसके बावजूद माधवराव सिंधिया और उनके पुत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया  ने कांग्रेस की तरफ से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।  विजयराजे सिंधिया 10 बरस कांग्रेस पार्टी की तरफ से चुनाव लड़ा था और 1967 में जनसंघ में जाने का निर्णय लिया और विजयराजे सिंधिया के क्षेत्र में जनसंघ की जड़ें मजबूत हुई ।  1971 में इन्दिरा गांधी  का जब बोलबाला था, तब विजयराजे सिंधिया ने जनसंघ से गुना क्षेत्र से लोकसभा सीट के लिए चुनाव लड़ा और वे 3 सीटों के साथ जीत की नईगाथा लिखने में कामयाब हुई । 30 सितंबर 2001 को ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया की उत्तर प्रदेश में एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई।  वे मध्य प्रदेश की गुना सीट से नौ बार सांसद चुने गए थे  जहां 1971 में उन्होंने जनसंघ के टिकट पर चुनाव लड़ा वहीं आपातकाल के बाद साल 1977 में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर ताल ठोकी । उनकी मां किरण राज्य लक्ष्मी देवी नेपाल राजपरिवार की सदस्य थीं।  ज्योतिरादित्य सिंधिया ने  राजनीतिक क्षेत्र में पदार्पण पिता की मृत्यु के बाद किया । तब ज्योतिरादित्य सिंधिया महज 30 साल के युवा थे । ग्वालियर के अंतिम महाराजा जीवाजीराव सिंधिया के पोते ज्योतिरादित्य सिंधिया पार्टी-पॉलिटिक्स में आए और अपने काम के बूते राजनीति के मैदान में रम से गए । 2001 में पिता माधवराव के निधन के तीन महीने बाद ज्योतिरादित्य कांग्रेस में शामिल हो गए और इसके अगले साल उन्होंने गुना से चुनाव लड़ा जहाँ की सीट उनके पिता के निधन से ख़ाली हो गई थी। उसी साल चुनाव हुआ और ज्योतिरादित्य ने अपने बीजेपी के प्रतिद्वंद्वी को लगभग 5 लाख वोटों से हराया। वो भारी बहुमत से विजय पताका फहराने में कामयाब हुए । पिता के पगचिन्हों का अनुसरण करते हुए वो आगे बढ़ते ही गए।  उस दौर में तो कोई ये कल्पना भी नहीं कर सकता कि एक  नौजवान  जिसके सिर से पिता का साया उठ गया वो संसद में अपनी बात को कुशलता से व्यक्त कर सकता है । उस वक्त महाराज की उम्र बहुत कम थी लिहाजा उनको लेकर आशंकाएं भी व्यक्त की जाती थीं,  मगर महाराज ने खुद को सांसद के तौर पर खुद को  बेहतर साबित कर दिखाया और जनता के दिलों में अपनी जगह बनाई । अपने पिता के संसदीय क्षेत्र गुना से उनके स्थान पर चुनाव लड़ने का निर्णय जनता को भी बेहद पसंद आया ।  

सीहोर के बिलकिसगंज निवासी वरिष्ठ पत्रकार प्रवीण परमार कहते हैं “गुना क्षेत्र सिंधिया परिवार का बहुत मजबूत गढ़ अरसे से रहा है और  इस परिवार के नाम पर ही बहुत वोट आज भी मिलते रहते हैं। जब ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना क्षेत्र से सांसद के रूप में उभर के आए तब उन्होंने भारत सरकार की केंद्र की सहायता से अपने गुना क्षेत्र में बहुत से विकास कार्य किए और यह विकास कार्य गुना क्षेत्र की जनता को बहुत पसंद आई और हमेशा हमेशा के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया जनता जनार्दन के दिल में बस गए हैं”। 

शिवपुरी निवासी एमटेक मैकेनिकल इंजीनियर अंकित श्रीवास्तव कहते हैं “गुना कई दशकों से  सिंधिया राजवंश का मजबूत गढ़ रहा है यही कारण है कि इस राजवंश को हमेशा से ही गुना क्षेत्र से अच्छे खासे वोट प्राप्त होते रहे हैं।  ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता के देहांत के बाद भी महाराज सम्मानजनक जीत प्राप्त करते रहे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया जी अगर गुना क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए खड़े हो जाते हैं, तो उनके सामने बड़े से बड़े दिग्गज नेता को ज्योतिरादित्य सिंधिया जी के क्षेत्र में विजय प्राप्त करने के लिए बहुत ही कठिनाई होती हैं”। 

 खनियादाना से ताल्लुक रखने वाले पत्रकार तन्मय जैन बताते हैं “ मध्य प्रदेश के गुना संसदीय सीट पर पहले  बिजली पानी और सड़कों की बहुत विकराल समस्या हुआ करती थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने खुद के प्रयासों से सभी बुनियादी सेवाओं को ठीक करने में कामयाब हुए हैं । इसी की वजह से गुना क्षेत्र के निवासी ज्योतिरादित्य सिंधिया जी को महाराज कह कर संबोधित भी किया करते हैं। बेशक 2019 का लोक सभा चुनाव में वो पराजित हो गए लेकिन आज भी महाराज गुना क्षेत्र के निवासियों के दिल में बसते  हैं । वह लोगों से बराबर संवाद करते हैं उनकी समस्याओं का तत्काल निदान भी  करते हैं”। 

ज्योतिरादित्य सिंधिया की पत्नी प्रियदर्शिनी राजे सिंधिया भी खुद बड़ौदा के गायकवाड खानदान से ताल्लुक रखती हैं। 12 दिसंबर 1994 को दोनों का विवाह बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हुआ।  दोनों की एक बेटी और एक बेटा है ।  ज्योतिरादित्य सिंधिया की एक बहन चित्रांगदा राजे सिंधिया हैं तो उनकी बुआ वसुंधरा राजे सिंधिया  राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री रही हैं ।  ज्योतिरादित्य सिंधिया का घराना राजशाही है।  ज्योतिरादित्य सिंधिया जी का राजनीति में कद ऐसा है उन्होनें अपने बूते गुना क्षेत्र में रिकार्ड विकास कार्य किए हैं और आज भी गुना की जनता महाराज की जय - जयकार करती हुई देखी जा सकती है । यहाँ के लोग आपको  आज भी ये कहते भी नजर आ जाएंगे एक भरोसों एक आस अपनो तो महाराज।  तो कुछ बात तो है महाराज यूं ही नहीं बना करते।  ज्योतिरादित्य 2004-2014   में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में  मंत्री भी रहे। 2007 में उन्हें संचार और सूचना तकनीक मामलों का मंत्री बनाया गया वहीं 2009 में वे वाणिज्य व उद्योग मामलों के राज्य मंत्री बने और 2012 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ऊर्जा राज्यमंत्री । चार बार के सांसद रहे सिंधिया ने कांग्रेस में 18 साल बिताए और मनमोहन सरकार में संचार मंत्रालय से लेकर ऊर्जा मंत्रालय के रूप में बेहतरीन ढंग से काम किया । संचार मंत्री के रूप में देश भर के पोस्ट आफ़िस को आम आदमी के लिए घरेलू ज़रूरतों की उपलब्धता सुनिश्चित कराने.वाले एकीकृत सेंटर के रूप शुरू की गई योजना ने उन्हें एक कामयाब टेक्नोक्रेट मंत्री के रूप में स्थापित किया।  मोदी सरकार के शुरू किए गए कॉमन सर्विस सेंटर की योजना भी वही है जो सिंधिया ने शुरू की थी।  इसी तरह ऊर्जा मंत्रालय में बरसों से  लंबित पड़े पावर प्रोजेक्ट से जुड़े मसले का समाधान निकालने के लिए कांउसिल बनाने की पहल भी ज्योतिरादित्य  सिंधिया ने ही की थी।  उनकी छवि  तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन  सिंह सरकार में एक ऐसे मंत्री की बनी थी जो सख़्त फ़ैसले लेने से नहीं हिचकता था। सरकार में रहते हुए पारदर्शी काम काज करना और नौकरशाही से काम लेने के मामले में उनका कोई सानी नहीं था । ज्योतिरादित्य  सिंधिया अपने काम को अंजाम तक पहुचाने वाले लोगों में से एक  हैं । धुन के बहुत पक्के आदमी हैं और जो कहते हैं उसे करने में देर नहीं लगाते । वह बेहद  उर्जावान हैं और एक कुशल प्रबंधक के तौर पर भी मनमोहन सरकार में  अपनी छाप छोड़ चुके  हैं । यहाँ मंत्री के रूप में  उनकी सेवाएं  काबिले तारीफ रही हैं । उनके  काम करने का  अंदाज सबके दिलों  को जीत  गया । उस कार्यकाल में फाइलें कई दिनों तक नहीं अटकती थी । मनमोहन सरकार में एक कैबिनेट मंत्री ने उस दौर में एक इंटरव्यू में मुझे बताया था तत्कालीन पी एम मनमोहन सिंह को महाराज की प्रतिभा के कायल थे ।  वे यूपीए सरकार में सचिन पायलट , मिलिंद देवड़ा, जितिन प्रसाद के साथ  एक कुशल युवा चेहरा भी थे और टीम राहुल गांधी के सिपेहसालार और समर्पित सिपाही भी ।
 
राजनीति के मैदान से इतर महाराज  क्रिकेट के शौक़ीन भी रहे हैं और एक दौर में मध्य प्रदेश क्रिकेट संघ के अध्यक्ष भी रहे हैं। आज भी राजनीति के साथ परिवार का बिजनेस संभालते हुए उन्होंने अपने क्रिकेट प्रेम को जगाए रखा है। मनमोहन के दौर में स्पॉट फ़िक्सिंग मामलों को लेकर उन्होंने अपनी आपत्ति ज़ाहिर की थी। 2013 में पूर्व बीसीसीआई सेक्रेटरी संजय जगदले की  आईपीएल फिक्सिंग के चलते  भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के सचिव पद से विदाई हुई । देवताओं  की तरह पूजे जाने वाले क्रिकेट के इतिहास में यह बड़ी घटना थी  जो इतिहास में दर्ज है ।फिक्सिंग का मकड़जाल फैलाए लोगों पर उस दौर में अगर कड़ी कार्रवाई  हुई तो ज्योतिरादित्य  सिंधिया  ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई । उनकी इस क्षमता के चलते मध्यप्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन का चेयरमैन बनाया गया था।
ज्योतिरादित्य  सिंधिया  से मिलने का अहसास  हमेशा सुखद रहता है ।  वह अपने आसपास इतना सकारात्मक वातावरण बना देते हैं कि नकारात्मकता वहां से बहुत दूर चली जाती है। अपनी दो दशक से अधिक समय की सांसद के तौर पर यात्रा  में उन्होंने साबित किया वह हर कार्य को करने में  कुशल और दक्ष हैं । हर जगह उन्होंने खुद को अपने काम के बूते साबित किया है । मनमोहन सरकार में मंत्री रहते हुए उनके द्वारा किए गए काम  देश- दुनिया  में  सराहे गए।  ज्योतिरादित्य  सिंधिया  उन चुनिन्दा राजनेताओं में से एक हैं जिसमें  मिलनसारिता का भाव हर मुलाक़ात में देखा जा सकता है  । भोपाल जब भी आते हैं तो पत्रकारों से घुल मिल जाते हैं । अपने इसी स्वभाव के  बलबूते प्रदेश के युवाओं का बड़ा नेटवर्क पूरे प्रदेश में खड़ा कर लिया है । नेटवर्क को कैसे बनाया जाता है और जनता से सीधे कैसे कनेक्ट हुआ जा सकता है  और कैसे राजनीति में  उसका उपयोग किया जाता है यह महाराज  से बखूबी  सीखा जा सकता है।  सौम्यता, मधुर मुस्कान, कोमल स्वर और लोगों के बीच घुलमिलकर रहना उनका मूल स्वभाव है और आज मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनने के बाद भी वह नहीं बदले हैं । आमतौर पर कुर्सी मिल जाने और सत्ता सुख भोगने के बाद राजनेताओं में अहंकार स्वाभाविक रूप से आ जाता है लेकिन आज भी जनता के अदने से सेवक ही बने हैं । गुना , भिंड , मुरैना , शिवपुरी , ग्वालियर, चंबल , टीकमगढ़ के आसपास के ग्रामीण लोगों के लिए ज्योतिरादित्य  सिंधिया  आज जी एक पारिवारिक सदस्य जैसे हैं । दो दशकों से सांसद के रूप में और मंत्री के रूप में निस्वार्थ सेवा के कारण अपने क्षेत्र के युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं के बीच वह एक चहेते नेता के रूप में लोकप्रिय हैं ।  अपने संसदीय इलाके के हर गांव में अपने  व्यक्तिगत प्रयासों से किए गए अनेक छोटे-बड़े विकास कार्यों के कारण वह अपने क्षेत्र की जनता के दिलों पर राज करते हैं। कुशल-तार्किक वक़्ता और अध्ययनशील महाराज मध्य प्रदेश ही नहीं पूरे देश के राजनैतिक परिदृश्य में एक साफ छवि के राजनेता के रूप में पहचाना जाता है। साथ ही सिंधिया की संचार और प्रशासन में मजबूत पकड़ है ।  अपने सार्वजनिक जीवन में वह जनता के लिए सदैव उपलब्ध रहते हैं । राज्य या देश के किसी भी स्थान पर उनसे कोई भी सहजता से मिल सकता है । महाराज से मिलने के लिए आपको घंटों लाइन में कभी नहीं लगना  पड़ता है।  सांसद रहते हुए और ना रहते हुए भी वह अपने मोबाइल पर हर पल लोगों की समस्याएं सुनते हैं और यथासम्भव समाधान भी करवा देते हैं । 

आप आज ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम काबिल और ईमानदार राजनेताओं में रख सकते हैं।  रईसी में जहां वो सबसे ऊपर है तो वे पढ़े-लिखे नेताओं में देश का कोई नेता उनके आस पास भी नहीं फटकता ।  राजनीति की बात हो या सरकार चलाने की , राजघराने को चलाने की बात हो या परिवार चलाने की , इसके लिए कुशल प्रबंधक की जरूरत होती है ये सब गुण उनमें जन्मजात मौजूद हैं । होनहार बिरवान के होत चिकने पात को चरितार्थ करते वे नजर आते हैं  ।  वो अपनी विरासत को सहेजकर रखने वाले राजनेताओं में से एक हैं । ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने 2 दशक के राजनीतिक यात्रा में हर ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाया है।  ज्योतिरादित्य सिंधिया के पारिवारिक रिश्ते भी दुनिया के सर्वोच्च शाही खानदानों से रहे हैं। बात नेपाल के राणा खानदान की हो या राजस्थान के राजे खानदान की।  इसके अलावा सिंधिया घराने का 40 एकड़ में फैला जयविलास महल हो या विंटेज कारों की फेहरिश्त, इस कड़ी में ज्योतिरादित्य सिंधिया को सबसे आगे माना जाता है। 1960 के दशक में बनी बीएमडब्ल्यू इसेट्टा कार भी सिंधिया के घर की शोभा बढ़ाती है। 


हावर्ड से पढ़े सिंधिया का शौक़ केवल राजनीति नहीं बल्कि पिता माधव राव की तरह ही क्रिकेट  से भी बहुत अधिक रहा है।  बहुत कम लोगों को ये बात भी मालूम है सिंधिया शुरुआती बैंकर भी रहे हैं और आज भी आप बैंकिंग के महारथियों में इनको शामिल कर सकते हैं । इसे महज़ संयोग कहेंगे कि जिन बीजेपी महासचिव कैलाश विजवर्गीय को मध्य प्रदेश कंट्रोल बोर्ड के चुनाव में उन्होंने धूल चटाई उन्हीं की मदद से उन्हें बीजेपी में अपने समर्थकों के लिए जगह बनाई और उपचुनाव को  जिताने में भी मदद ली । 2013 में ज्योतिरादित्य सिंधिया  मध्य प्रदेश से कांग्रेस की चुनाव अभियान समिति के प्रमुख के रूप में चुने गए । साल 2014 में जब पूरे देश में मोदी लहर की चर्चा हो रही थी उस वक्त कांग्रेस के कुछ ही नेता लोकसभा चुनाव जीते थे।  उनमें से एक थे ज्योतिरादित्य सिंधिया थे जो गुना की सीट से जीते थे लेकिन लगातार चुनाव प्रचार के बाद भी 2019 लोकसभा चुनाव में वो इस सीट से हार गए। तब केपीएस यादव ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा था। मध्य प्रदेश में विधान सभा चुनाव के दौरान हुई रैलियों में ज्योतिरादित्य सिंधिया को तब राहुल गांधी और कमल नाथ का भी साथ मिला था। जहां राहुल गांधी ने कमलनाथ को 'अनुभवी नेता' बताया था वहीं उन्होंने ज्योतिरादित्य को 'भविष्य का नेता' बताया था।  बेशक चुनाव के नतीजे उनके पक्ष में नहीं रहे थे लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा बड़ी थी और वो प्रदेश के मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। इसके लिए उन्होने राज्य की हर विधान सभा में खूब पसीना बहाया और कांग्रेस को सम्मानजनक स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया ।  दस जनपथ के अपने जानकारों ने एक बार मुझे बताया भी था कि कांग्रेस आलाकमान ने उनके सी एम बनने की  बात मान ली थी और उन्हें आधे से अधिक विधायकों का समर्थन साबित करने को कहा था लेकिन वो केवल  दो दर्जन भर विधायकों का समर्थन ही हासिल  कर पाये थे  जिसके बाद प्रदेश के  मुख्यमंत्री की कमान कमलनाथ के खाते में चली गई । 

कांग्रेस नेता राहुल गांधी के साथ ज्योतिरादित्य की नज़दीकी कई मौक़ों पर साफ़ दिखाई दी। 2014 के चुनावों में कांग्रेस की करारी हार के बाद भी दोनों नेता कई बर साथ दिखे लेकिन मध्य प्रदेश के मौजूदा मुख्यमंत्री कमलनाथ के साथ उनके रिश्तों में हमेशा छत्तीस का आंकड़ा ही रहा  ।  वो पहले भी राज्य में सरकार के काम काज से नाराज़गी जताते थे लिहाजा कमलनाथ दस जनपथ में उनकी राहों में कांटें बोने का काम करते थे । राजधानी भोपाल में  एक बार कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने मुझे बताया था प्रदेश अध्यक्ष के पद के लिए काँग्रेस में दस जनपथ में जब लाबिंग चली तो  पार्टी आलाकमान उनके नाम पर बात चली थी लेकिन पार्टी के भीतर कुछ वरिष्ठ नेता इससे सहमत नहीं थे । ज्योतिरादित्य  सिंधिया की ताजपोशी वरिष्ठ नेताओं की ताजपोशी पर न केवल ग्रहण लगा सकती थी बल्कि उनकी भावी राजनीति में अडचनें भी पैदा कर सकती थी ।   तब  पार्टी के भीतर ये भी चर्चा चल पड़ी  कि ज्योतिरादित्य  सिंधिया 2019 का लोक सभा चुनाव हारने के बाद से राज्यसभा जाना चाहते हैं लेकिन मध्यप्रदेश से दिग्विजय सिंह को राज्यसभा के लिए नामित करने की बात कमलनाथ कैंप में होने लगी होने लगी जिससे ज्योतिरादित्य की उम्मीदें धरी की धरी रह गई। काफी जद्दोजहद के बाद कांग्रेस पार्टी ने मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में विजय प्राप्त हो गई मगर ज्योतिरादित्य सिंधिया के काफी कोशिशों के बावजूद भी उनको सीएम पद के लिए नहीं चुना गया।  मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया की जगह कमलनाथ  को सीएम का पद दे दिया गया। नाराज होकर  ज्योतिरादित्य सिंधिया  और कमलनाथ के बीच तकरार का मामला जनता के बीच  उभर के सबके सामने आया।  लोकसभा चुनाव में ज्योतिरादित्य सिंधिया हार मिलने के बाद कांग्रेस पार्टी से मध्य प्रदेश के अध्यक्ष का पद मांग रहे थे लेकिन उन्हें यह भी नहीं प्रदान किया गया। इसी से नाराज होकर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमलनाथ की सरकार के खिलाफ सड़कों पर धरना प्रदर्शन करने का धमकी भी दी , परंतु उनके इस दबाव से कांग्रेस पार्टी को जरा सा भी फर्क नहीं पड़ा।  यही कारण है, कि 10 मार्च 2020 को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया और उनके साथ ही उनके खेमे में कुल 22 सदस्यों ने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दे दिया।  ऐसे में कांग्रेस पार्टी को बहुत बड़ा झटका लगा ।  ज्योतिरादित्य सिंधिया ने 9 मार्च 2020  को ही अपना इस्तीफ़ा काँग्रेस आलाकमान को सौंप दिया था लेकिन ये इस्तीफ़ा मार्च 10 मार्च 2020  को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से उनकी मुलाक़ात के बाद ही सार्वजनिक किया गया।  ज्योतिरादित्य के क़रीबी महेंद्र सिंह सिसोदिया के बयान ने साफ़ कर दिया था कि पार्टी के भीतर कलह की जड़ें गहरी हैं. सिसोदिया ने  तब एक बार कहा भी  था, "सरकार गिराई नहीं जाएगी लेकिन जिस दिन हमारे नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया को नज़रअंदाज़ किया गया उस दिन ये सरकार बड़ी मुसीबत में फंस जाएगी।" और हुआ भी यूं ही । सिंधिया के इस्तीफ़ा देने से पहले उनके क़रीबी माने जाने वाले पार्टी के कम से कम 17 विधायकों को बेंगलुरु या गुरुग्राम ले जाया गया। इस घटना ने कमलनाथ सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ा दीं।  कमलनाथ ने दिल्ली में  9 मार्च 2020 को ही सोनिया गांधी से मुलाक़ात की लेकिन मध्य प्रदेश में सियासी हलचल तेज़ होने की ख़बर मिलने के बाद उन्हें आननफानन में प्रदेश लौटना पड़ा।  इसी दिन शिवराज सिंह चौहान ने भी गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी के आला नेताओं से मुलाक़ात की और प्रदेश में हो रही सियासी गतिविधियों की जानकारी दी ।  इसके बाद कांग्रेस के प्रवक्ता केसी वेणुगोपाल ने बयान जारी कर कहा, "पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया को पार्टी से निकाल दिया गया है” जिसके बाद अब एक तरह से ज्योतिरादित्य के लिए बीजेपी का दामन थामने के रास्ते खुल गए ।कांग्रेस पार्टी महासचिव और युवा नेताओं में एक ज्योतिरादित्य सिंधिया ने ठीक होली के दिन पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया, जिसके बाद मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार पर संकट के बादल गहरा गए । उनके साथ कांग्रेस के क़रीब 19 विधायकों ने भी अपने इस्तीफ़े दे दिए । इधर कांग्रेस ने तुरंत प्रभाव से ज्योतिरादित्य को पार्टी से निकालने का ऐलान कर दिया । इसके बाद अब उनके बीजेपी में शामिल होने की अटकलें तेज़ हो गई ।

सिंधिया ने 2020  में कांग्रेस को छोड़कर भाजपा में शामिल हुए जिसके बाद नवम्बर 2020 में मध्यप्रदेश उपचुनाव प्रक्रिया संपन्न की गई जिसमें  ज्योतिरादित्य ने अपना दमखम  भाजपा में दिखाया।  भाजपा में उन्होंने स्वयं को साबित कर दिखाया है । मध्य प्रदेश की बदलती राजनीति में ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थकों को शिवराज सरकार में भारी भरकम विभाग दिलाने में सफल रहे।  चाहे फिर तुलसी सिलावट से लेकर गोविंद सिंह राजपूत, महेंद्र सिंह सिसोदिया से लेकर प्रद्युम्न सिंह तोमर , डॉक्टर प्रभु राम चौधरी से लेकर राज्यवर्धन सिंह दत्ती गांव को सरकार में शामिल कराया गया । जिनको मंत्री पद नहीं मिल सका उनको भाजपा संगठन  में एडजस्ट किया गया। ज्योतिरादित्य ने एक कप्तान के तौर पर अपनी टीम को सरकार से लेकर संगठन में खेलने के मौके प्रदान किए।  उन्होनें भाजपा को ये अहसास भी कराया मध्य प्रदेश की राजनीति में उन्हें  विश्वास में लेकर आगे बढ़ना होगा । ऑपरेशन लोटस महाराज के रहते  सम्पन्न हुआ और नरोत्तम मिश्रा ने इसकी पटकथा लिखी जिसके बार महाराज पर भी केसरिया रंग होली में खूब चढ़ा । सिंधिया ने खुद को मजबूत खिलाड़ी के तौर पर साबित किया और संकेत दिया कि भविष्य में मध्य प्रदेश में कोई बड़ी ज़िम्मेदारी उन्हें मिलेगी तो वे उसे सहर्ष स्वीकारेंगे ।  केंद्र में कैबिनेट मंत्री के बाद भी उनका दिल अभी भी मध्य प्रदेश  के लिए धडक रहा है । भाजपा के नीति निर्धारक शिवराज से लेकर विष्णु दत्त शर्मा,  सुहास भगत , नरोत्तम मिश्रा , गोपाल भार्गव ने भी महाराज के स्वागत में  रेड कारपेट बिछाई । काँग्रेस में रहते जो सम्मान महाराज को नहीं मिल सका वो भाजपा में ज्योतिरादित्य  और उनके समर्थकों को पूरा मिला ।  मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद चुनौतियों से जूझ रहे शिवराज सिंह चौहान  ने भी महाराज को लोकप्रिय नेता करार देने के साथ भी प्रदेश की राजनीति में ये संदेश दिया कि महाराज की पसंद का पूरा ध्यान सरकार और संगठन में रखा जाएगा । 

ज्योतिरादित्य सिंधिया के 2020 में कांग्रेस छोड़ने पर राहुल गांधी ने कहा था कांग्रेस में ज्योतिरादित्य रहते तो समय के साथ मुख्यमंत्री भी बन जाते पर बीजेपी कभी उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाएगी ।  आज मोदी सरकार में सिंधिया को उसी मंत्रालय का ज़िम्मा दिया गया है जो तीस साल पहले उनके पिता माधव राव सिंधिया नरसिम्हा राव की सरकार में कैबिनेट मंत्री के रूप में संभालते थे । महत्वाकांक्षाओं से लबरेज़ करियर के सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव  पर कांग्रेस से बगावत कर चुके सिंधिया के पास  भाजपा में काम करने की अअनगिनत और  असीमित संभावनाएँ हैं । हाल के समय में भाजपा में देवेंडर फड़नवीस, सर्वानंद सोनेवाल , ,विप्लव कुमार देव , हेमंता पुष्कर सिंह धामी जैसे युवा मुख्यमंत्री बन चुके हैं तो प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी  ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए भाजपा में बड़ा स्कोप है ।  दिल्ली में  सत्ता के गलियारों में लोग अभी भी महाराज को लोग एक  करिश्माई नेता मानते हैं लेकिन इन सबके बाद भी ज्योतिरादित्य सिंधिया में किसी तरह का घमंड नहीं है ।  वो आज भी  भाजपा के दीनदयाल मार्ग स्थित राष्ट्रीय कार्यालय में पदाधिकारियों  और आम कार्यकर्ताओं से  गर्मजोशी के साथ मिलते हैं  । 
  
 उड्डयन मंत्रालय की कमान  मिलने के बाद महाराज को अपना दशकों का अनुभव इस मंत्रालय में इस्तेमाल करना है ।  नागरिक उड्डयन मंत्रालय में  बेहतर ढंग से काम करने की चुनौती उनके सामने है ।  पीएम मोदी का विजन है छोटे शहरों से आम आदमी को उड़ान योजन के जरिये लुभाना । इसके लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया  से बेहतर रोडमैप शायद ही किसी नेता के पास होगा । महाराज युवा होने के साथ ही काफी  ऊर्जावान  भी हैं इसलिए उनसे सभी को बड़ी उम्मीदें हैं । वो इस मंत्रालय में कायाकल्प  करने का माद्दा रखते हैं ।  कोरोना काल में  उड्डयन क्षेत्र आर्थिक संकट का सामना कर रहा है । आमदनी अठन्नी खर्चा रुपईया । घाटा हर दिन बढ़ रहा है और रोजगार पर संकट है । आय के नए रास्ते खोजने के लिए  निजीकरण की राह पकड़नी जरूरी है अन्यथा इस सेक्टर के सामने मुश्किलें बढ़नी तय हैं । युवा सिंधिया को कैबिनेट मंत्री के तौर पर उस पी एम मोदी की टीम में शामिल होने का मौका मिला है जिसकी लोकप्रियता में आज भी दूर दूर तक कोई गिरावट नहीं है । ज्योतिरादित्य  यू पी ए सरकार में भी मंत्री रहे लिहाजा उनके पास अनुभव की कमी नहीं है ।  महाराज उस शख्स का नाम है जिसके चेहरे पर कभी हताशा या निराशा देखने को नहीं मिली  ।   कैबिनेट मंत्री के तौर पर उनकी ताजपोशी के बाद  देश का युवा उन्हें नई उम्मीदों भरी नजर से देख रहा है  । ज्योतिरादित्य  सिंधिया जानते हैं अगर अपनी युवा सोच क  नए आकार में नागरिक उड्डयन मंत्रालय में उन्होनें अपना लिया  तो  प्रधानमंत्री मोदी की गुडबुक में वो शामिल हो सकते हैं और शायद मध्य प्रदेश में सी एम बनने का जो सपना काँग्रेस में रहते हुए पूरा नहीं कर पाएँ वो मोदी सरकार में  अपने मंत्रालय में बेहतर काम जरिए साकार कर सकते हैं । सिंधिया अभी काफी युवा हैं और उनके पास भविष्य की राजनीति के लिए  लंबी पारी खेलने के लिए पर्याप्त समय है ।  बेशक शिवराज सिंह चौहान का विकल्प फिलहाल एमपी में कोई नहीं है लेकिन बी डी शर्मा, कैलाश विजयवर्गीय, नरोत्तम मिश्रा , गोपाल भार्गव , प्रह्लाद पटेल और नरेंद्र सिंह तोमर के सामने महाराज डार्क हार्स के रूप में चुनौती आने वाले दिनों में खड़ी कर सकते हैं । महाराज के पिता माधव राव सिंधिया राजीव गांधी सरकार में रहते हुए  आम मध्यम वर्ग के वे हीरो बन गए थे। उनके पास भी आम आदमी का महाराज बनने के बेहतरीन समय मोदी सरकार में है । इन सब के बीच समय भी आशावान है । महाराज का ये जो  नया सफर भाजपा के साथ कैबिनेट मंत्री के तौर पर शुरू हुआ है वो अब लंबी रेस के घोड़े के रूप में आगे जाता दिख रहा है ।  महाराज एक कुशल योद्धा के रूप में सबके सामने आए हैं । खास बात ये है ज्योतिरादित्य के पास जोश भी है और होश भी । महाराज केंद्र में कैबिनेट मंत्री की जिस ऊंचाई पर पहुंचे हैं वहाँ से पलटकर देखने की गुंजाइश नहीं है ।  महाराज की एक खूबी ये हैं राजनीति में वो आज भी उसी जोश एक साथ आगे बढ़े हैं  जो जोश उस समय देखने को मिला  जब वो  पहली बार 30 बरस की उम्र में सांसद बने थे । आदित्य की ज्योति कमल को लंबे समय तक  कमल को मध्य प्रदेश में खिला सकती है ।  ज्योतिरादित्य सिंधिया के पास यह स्वर्णिम अवसर है जब वो अपनी दादी के द्वारा खड़ी की गई जनसंघ की जड़ों से जुड़कर भाजपा में अपना अलग प्रभाव दिखा सकते हैं ।  
  
कांग्रेस छोड़ने के एक दिन बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी में शामिल हो गए थे तब उन्होंने कहा था उनके जीवन में दो तारीखें बहुत महत्वपूर्ण रहीं। पहला दिन 30 सितंबर 2001 था  जिस दिन उन्होंने अपने पिता माधवराव को खोया। दूसरा दिन 10 मार्च 2020 का  जो उनके पिता की 75वीं वर्षगांठ थी। इस दिन उन्होंने बीजेपी में शामिल होने का फैसला लिया था। एक समझदार नेता की तरह सिंधिया ने अर्जुन की भांति बड़े लक्ष्य को भेदना बेहतर समझा। एंग्री यंग मैन की भूमिका में भी नजर आकार उन्होने कमलनाथ सरकार के मानो तोते ही उड़ा दिये । आने वाले दिनों में सिंधिया के लिए मध्य प्रदेश में  नगरीय निकाय के चुनाव सबसे बड़ी चुनौती होगी । देखना होगा भाजपा महाराज का उपयोग मध्य प्रदेश में कैसे करेगी ? मध्य प्रदेश भाजपा में  संगठन में जिस तर्ज पर नई युवा टीम आई है उसे देखते हुए लगता है  अब प्रदेश में भाजपा परिवर्तन के साथ युवाओं को लेकर नई सोच के साथ आगे बढ़ रही है ।  कमलनाथ सरकार के गिरने के बाद  ज्योतिरादित्य सिंधिया  ने अपने को बड़े किंग मेकर के तौर पर साबित किया है ।  बेशक सी एम शिवराज सिंह चौहान  ने अनुभव से  पार्टी हाईकमान को बड़ा संदेश दिया है लेकिन बिना लोटस आपरेशन के भाजपा के सत्ता में आने की दूर दूर तक कोई संभावना  नजर नहीं आती थी। इस पूरी पटकथा के नायक तो ज्योतिरादित्य सिंधिया  महाराज ही हैं ।

सिंधिया 16 महीने के इंतज़ार के बाद पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया  की तरह दिल्ली में नई  उड़ान भरने को तैयार हैं।  पिछले 16 महीने धैर्य की अग्निपरीक्षा से कम नहीं था। पहले उपचुनाव में कांग्रेस से टूटकर आए समर्थक विधायकों  को जिताकर अपने वजूद को साबित करने की चुनौती, फिर उन्हें शिवराज सरकार और बाद में संगठन में  में सम्मानजनक मंत्रालय दिलवाना मायने रखता है ।  मध्य प्रदेश की हालिया राजनीतिमें शिवराज बेशक किंग हैं लेकिन किंग से ज्यादा पावरफुल किंगमेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया साबित हुए हैं । भाजपा आलाकमान भी उनकी उपयोगिता को  बखूबी समझता है ।  राजनैतिक आडंबर, प्रपंच और प्रबंधन से दूर रहने वाले महाराज की छवि मध्य प्रदेश में एक धीर- गंभीर नेता की रही है ।  ज्योतिरादित्य  सियासत में गंभीरता, सौम्यता और जिम्मेदाराना व्यवहार के लिए ही जाने जाते हैं । प्रदेश के संभवत: इकलौते ऐसे नेता रहे, जिनके किसी भी बयान पर कभी कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ शायद इसका कारण उनका सिंधिया राजवंश से ताल्लुक रहना रहा । एक राजा का ये कर्तव्य ही रहा है उसकी प्रजा का कोई व्यक्ति परेशान नहीं हो ।   राज्य की सियासत में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जो अपनी अलग पहचान बनायी  है उसमें किसी पार्टी की कोई भूमिका नहीं है ।  

 राजनीति में महाराज के कद का औरा इतना बड़ा है  उसके इर्द गिर्द आज कोई नेता भी कोई नजर नहीं आता है । महाराज के समर्थकों और प्रशंसकों में ही नहीं बल्कि सियासत में दिलचस्पी रखने वालों को उनमें भविष्य का मुख्यमंत्री नजर आता है ।  मध्य  प्रदेश की राजनीति में ज्योतिरादित्य सबसे अधिक सरल मंत्री माने जाते रहे हैं। राजनीतिक हल्कों में उनके लिए  कुछ भी यूं ही नहीं कहा जाता है कि वे अपने जनपक्षीय कार्यों के चलते हर मुख्यमंत्री और नेता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन जाते हैं। यह ज्योतिरादित्य सिंधिया  का करिश्मा ही कहिए दिग्विजय सिंह , कमलनाथ, शिवराज सिंह चौहान , नरोत्तम मिश्रा , कैलाश विजयवर्गीय, नरेंद्र सिंह तोमर,थावर चंद गहलोत , प्रह्लाद पटेल  जैसे नेताओं की राजनीति  भी महाराज की राजनीति की चमक के सामने  कुंद पड़ जाती है ।  वैसे भी इन सबकी राजनीतिक पारी उत्तरार्ध में है। इस बात की पूरी संभावना है भाजपा अगला चुनाव शिवराज सिंह चौहान  की अगुवाई में नहीं लड़ेगी । युवाओं पर दांव खेला जाएगा और कई मौजूदा विधायकों का टिकट सिटिंग गेटिंग फार्मूले के तहत काटा जाएगा । ऐसे में ज्योतिरादित्य सिंधिया के नाम का बड़ा जुआ  भाजपा का संसदीय बोर्ड  खेल सकता  है इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता ।  

 इसे महाराज की राजनीति का नया युग ही कहिए  भारी उथल पुथल के दौर में  जब भी गाहे बगाहे  मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री  शिवराज सिंह चौहान के विकल्प के रूप  चर्चा होती है भावी  मुख्यमंत्री के केंद्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया ही होते हैं। महाराज के सामने प्रदेश में खुद को अपनी दादी विजयराजे सिंधिया और पिता माधव राव सिंधिया की तरह सर्वस्वीकार्य नेता के तौर पर स्थापित करने का इससे बेहतर मौका शायद ही कभी मिले । प्रधानमंत्री  मोदी की टीम में जगह पाकर हाल के दिनों में  ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम जिस तेजी के साथ सियासी फिजा में तैर रहा है वह अपने आप में साफ करता है कि भविष्य में  मध्य प्रदेश की राजनीति की एक बड़ी धुरी महाराज ही होंगे । महाराज का मतलब मध्य प्रदेश में  इस दौर में अगर न भूतो न भविष्यति हो चला है  तो मतलब साफ है इनके बगैर भविष्य में भाजपा की राजनीति  नहीं सध सकती। एक कप्तान के रूप में प्रदेश की विधानसभा सीटों और संसदीय सीटों की  जितनी बारीकियां महाराज को मालूम हैं उतना शायद ही भाजपा के किसी नेता  ने जानने का प्रयास किया होगा ।  गुना , भिंड , मुरैना , ग्वालियर , शिवपुरी , टीकमगढ़ के साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया का प्रभाव प्रदेश में उन विधानसभा सीटों में भी है जहां रियासतकालीन समय  में सिंधिया घराने की रियासतें हुआ करती थी ।  इसमें राजस्थान की सीमा  से लगी आगर मालवा विधानसभा से लेकर  मध्य प्रदेश के शाजापुर जिले की कालापीपल विधानसभा तक का विशाल क्षेत्र सम्मिलित है ।  मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में राज माता सिंधिया का विशेष प्रभाव रहा है ।  यहाँ की एक विशेष जाति तंवर को राजमाता सिंधिया ने नई पहचान दिलाई थी ।  आज भी राजमाता के परिवार से यहाँ रहने वाले निवासी बहुत प्रभावित हैं  ।  ऐसा प्रभाव कई विधान सभा और संसदीय सीटों पर देखा जा सकता है जहां महाराज के भाजपा में जाने के बाद से समीकरण तेजी से भाजपा के पक्ष में जा सकते  हैं ।  ज्योतिरादित्य  की छवि रियासत से जुड़ी होने के चलते अलग है । वो करिश्माई जादूगर हैं । उनकी राजनीति के केंद्र में किसान से लेकर  मध्यम वर्ग, युवा से लेकर आम आदमी और समाज के वंचित- शोषित तबके शामिल हैं जो अपनी बिछाई बिसात से साधे जा सकते हैं ।  ज्योतिरादित्य सिंधिया का व्यक्तित्व  भी ऐसा है  जो मध्य प्रदेश के आगामी विधान सभा चुनाव में तमाम सामाजिक समीकरणों को साधते हुए भाजपा का बड़ा चेहरा बन सकते हैं । तीन पीढ़ियों से राजनीति की जड़ें सींचने में  सिंधिया राजघराने की बड़ी भूमिका रही है साथ ही जनसंघ की जड़ें सींचने में भी इस राजघराने के योगदान को नहीं नकारा जा सकता । खुद  ज्योतिरादित्य सिंधिया काँग्रेस की कमियों को जानते हैं और विभीषण बनकर काँग्रेस की संभावनाओं पर पलीता लगाते हुए भाजपा की संभावनाओं को नए पंख लगा सकते हैं ।  ज्योतिरादित्य सिंधिया को समझना होगा उनकी दादी और पिता की विरासत को वे भाजपा में रहते लंबे समय तक आगे बढ़ा सकते हैं । उन्हें अपनी पूरी ऊर्जा काँग्रेस के मिशन को नाकामयाब बनाने में लगानी होगी साथ ही युवाओं के पोस्टर बाय के रूप में भाजपा कार्यकर्ताओं में नया जोश भरना होगा ।  महाराज का ये  शगल ही है कि आज भी उनके साथ हजारों लोगों की भीड़ एक दिन में जुड़ जाती है। भाजपा के स्टार प्रचारक के तौर पर  ज्योतिरादित्य सिंधिया चुनावी सभाओं में उमड़ने वाली भेद को वोटों में तब्दील करने की क्षमता रखते हैं ।  महाराज प्रदेश में कहीं भी पहुँचने के लिए एक ट्वीट कर दें तो उनके प्रशंसक उनके स्वागत के लिए सड़कों पर निकाल पड़ते हैं ।  जनमानस की समस्याओं  को सुनने के लिए शिद्दत से सदैव तत्पर रहने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया  मानवता और मानवीय गुणों से  भी सम्पन इंन्सान हैं । राजा का काम जनता के दुख दर्द में सहभागी होना और उनकी समस्याओं को सुनना है। ज्योतिरादित्य सिंधिया इस मामले में एक कुशल  और मंझे हुए राजनेता की छवि गढ़ते नजर आते हैं । कर्मों में कुशाग्रता,मन में निश्छलता का भाव,ह्रदय में एकाग्रता,सहित तमाम नीति निपुणता  उनके कार्यों का विराट स्वरुप है । 

 आज जब राजनेता पढ़ना लिखना भूल चुके हैं, गंभीर विषयों पर नेताओं का बिना जाने समझे बोलना चलन मे है, राजनेताओं में विनम्रता के स्थान पर घोर अहंकार भर चुका है, ऐसे में ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे  युवा नेता बेहद प्रासंगिक हैं और उम्मीदें भरते नजर आते हैं । मध्य प्रदेश की राजनीति में आप महाराज को एक विनम्र, व्यवहार कुशल, जनसुलभ  नेता के तौर पर अपनी बात  खुलकर रखने वाले नेता के तौर पर देख सकते हैं । ऐसे दौर में जब लोग राजनीति में स्वच्छ ईमानदार छवि वाले सेवाभावी लोगों की कमी होती जा रही है, उस समय ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे जनप्रिय नेता समाज के लिए रोल माडल बन जाते हैं । यह सही है कि मौजूदा दौर में पारिवारिक पृष्ठभूमि से सियासत में आना बहुत आसान है । मगर मौजूदा दौर में लोकतांत्रिक व्यवस्था, जन जन की समस्याओं को समझना, इसमें खुद को साबित करना,  विषयों को पकड़ना, लोकप्रिय होना और जनता का सवाल उठाना और  भरोसा जीतना आसान नहीं है । ज्योतिरादित्य सिंधिया  की खासियत यही है  कि मूल्यों की राजनीति से उन्होंने बहुत कम समय में अपनी प्रतिभा और योग्यता के दम पर यह सब मुकाम हासिल किया है । 
हरिवंश राय बच्चन  पंक्तिया  महाराज को  निश्चित  ही प्रेरणा देंगी -
तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।
यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

Monday, 5 July 2021

पहाड़ के सरोवर में नई उम्मीदों का ' पुष्कर '

 



उत्तराखंड  राज्य बनने के पश्चात भारतीय जनता पार्टी ने विभिन्न नेताओं को उत्तराखंड की बागडोर सौंपी, परन्तु जनता के बीच कोई चेहरा लोकप्रिय नहीं हो सका।  ऐसे समय में 2022 की चुनौतियों को देखते हुए एक व्यक्ति ने देवभूमि उत्तराखंड की सियासत में सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है वो नाम है युवा तुर्क पुष्कर सिंह धामी। भाजपा की सियासत में युवा मोर्चा के दो बार प्रदेश अध्यक्ष , एक बार उपाध्यक्ष  और दो बार भाजपा का विधायक होना इतना आसान नहीं है । फिर बिना मंत्री रहते हुए सीधे कई दिग्गजों की फौज को पीछे छोड़ते हुए सीधे मुख्यमंत्री का ताज ग्रहण कर ले ये राजनीति में दुर्लभ हैं लेकिन पुष्कर धामी ने अपनी क्षमताओं और संगठन में पकड़ के बूते  ये सिंहासन हासिल किया है । पुष्कर धामी का सूबे  का मुखिया बनाया जाना  भाजपा के  दूसरी पीढ़ी के सभी नेताओं के लिए बड़ा सदमा है लेकिन खाँटी जनसंघी महामहिम भगत सिंह कोश्यारी के इस मृदुभाषी चेले ने दिल्ली दरबार में अपनी मजबूत पकड़ के लिए जाने जाने वाले नेताओं को पटखनी दे यह साबित कर डाला है कि उनको कमजोर नेता समझना विरोधियों की भारी भूल है ।पुष्कर  धामी का सूबे का मुखिया बनना कई मायनों में चौंकाने वाला है। दिल्ली दरबार के करीबी होने का दावा करने वाले प्रदेश भाजपा के कुछ बड़े नेता इस घटनाक्रम से बेहद हत्‌प्रभ बताए जा रहे हैं। दरअसल,  प्रदेश में कई बार जीत के स्वाद चख चुके भाजपा के कुछ नेताओं ने खुद को दिल्ली दरबार में मीडिया के समक्ष प्रोजेक्ट किया लेकिन  आलाकमान ने पुष्कर धामी को कमान देकर मिशन 2022 के अगले मुख्यमंत्री की दौड़ में जहां एक नए उम्मीदवार का खाता तो खोल ही डाला है,  वहीं मिशन 2022 की मुनादी भी अभी से कर दी है । पुष्कर धामी अभी काफी युवा हैं और उनमें पार्टी को आगे बढ़ाने की पूरी क्षमताएँ हैं । इसी के साथ भाजपा के तमाम दिग्गजों को भी हाईकमान ने साफ संदेश दिया है है कि नेतृत्व के पास अपना आकलन करने का एक अलग सा  तरीका है।

जी हाँ , पुष्कर सिंह धामी पर लिखना एक ऐसे व्यक्ति के जज्बे को सलाम करना है, जिसके लिए राजनीति का मतलब इस दौर में जनसेवा और हर संकट का समाधान खोजना है । उनका हंसमुख , सरलता और सौम्यता से भरा व्यक्तित्व हर आम इंसान को अपनी तरफ खींच लेता है।  विचारों में आधुनिक, किंतु भारतीयता की जड़ों से गहरे जुड़े पुष्कर सिंह धामी संघ परिवार के उन सामान्य समर्पित कार्यकर्ताओं में से एक  हैं , जिनमें गहरा भारत बोध बचपन से भरा हुआ है । दो बार युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी सहजता से निभाने वाले धामी देखते ही देखते राजनीति के मैदान में रम गए । उत्तराखंड के जल,जमीन  और जंगल के साथ ही  युवाओं के रोजगार के सवाल भी किसी राजनेता की जिंदगी जीने की वजह हैं तो उसका दूसरा नाम है पुष्कर सिंह धामी । पुष्कर धामी  के रुतबे और उनकी कार्यशैली को  समझने के लिए हमें  यह जानना जरूरी है वो किस तरह अपने काम को शालीनता के साथ अंजाम तक पहुंचाते हैं । इस बात से सभी वाकिफ हैं उत्तराखंड में भाजयुमो में रहते उन्होंने राज्य में तत्कालीन काँग्रेस सरकार के सामने युवाओं के बेरोजगारी के सवाल को सड़क से लेकर विधान सभा के गेट तक उठाने में सफलता पाई जिसके बाद 2010-11 में  काँग्रेस सरकार को राज्य में लगने वाले उद्योगों में 70 फीसदी आरक्षण देने को मजबूर होना पड़ा था।  सही मायनों में कहा जाये  तो  नाउम्मीद को उम्मीद में बदलना  पुष्कर की बड़ी कला है। उनकी इस कला का लोहा विपक्षी दल के नेता भी मानते हैं। आज अगर पुष्कर की ताजपोशी पर देहरादून से लेकर हड़खोला गाँव तक जश्न है तो इसका कारण उनका युवाओं के बीच समर्पण है ।

  जिद, जिजीविषा, जीवटता और जीवंतता एक साथ किसी एक आदमी में देखनी हो तो आपको पुष्कर धामी की सेवा की साधना को समझना चाहिए।  एक ऐसा नायक जिसने एक सामान्य से परिवार में पहाड़ की बेहद खुरदरी जमीन से जिंदगी की धीमी शुरुआत की और संघ के शिक्षा वर्ग को पूर्ण करने के बाद उनके भीतर समाजसेवा का जनज्वार उमड़ने लगा और इसी राष्ट्रभक्ति के संस्कारों के बूते वो आसमान की उस ऊंचाई तक आज सीएम के रूप में  पहुंचे हैं , जहां पहुंचना किसी के लिए सपने से कम नहीं है।  राज्य भाजपा के पास पुष्कर धामी  जैसा व्यक्ति एक आम कार्यकर्ता का प्रतीक भी हैं। बहुत पुरानी बात नहीं है कि जब वे विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के नाते इस परिवार में आए और  युवा मोर्चा में अपनी लगातार मेहनत, श्रेष्ठ संवाद शैली और संगठन कौशल से सूबे के मुख्यमंत्री का पद भी कम उम्र में प्राप्त किया। अपनी भाव-भंगिमाओं,प्रस्तुति और वाणी से वे हमेशा यह अहसास कराते हैं कि वे आज भी दल के  एक अदने से कार्यकर्ता ही हैं। कार्यकर्ता भाव जीवित रहने के कारण वे आज के युवाओं में भी काफी लोकप्रिय हैं और जनता के बीच नागरिक भाव जगाने के प्रयासों में लगे हैं। वे जनमर्म को  बखूबी समझते हैं शायद यही वजह है शपथ ग्रहण करने से ठीक पहले पी एम मोदी के मंत्र सबका साथ और सबका विश्वास को उन्होनें अपना मूल मंत्र बताया है ।

 पुष्कर सिंह धामी उत्तराखंड के उन चुनिंदा राजनेताओं में से  हैं जिनके व्यक्तित्व में एक  गुरूत्वाकर्षण मौजूद है । युवा उन्हें देखना और सुनना पसंद करते   हैं । वे  युवाओं के भविष्य से जुड़े सवालों  के साथ ही जल , जमीन , जंगल और पलायन जैसे  विषयों को उठाते हैं और उस पर समाज की गहरी अंर्तदृष्टि मौजूद रहती है । उनके साथ युवा मोर्चा अध्यक्ष रहते हुए एक दौर में जब भी उनके  एक दो बार इंटरव्यू करने का जब भी मौका मिला तो मैं भी उनकी विलक्षण प्रतिभा और संगठानिक क्षमताओं का मुरीद हुए बिना नहीं रह सका । तब वे अपनी  मनमोहिनी मुस्कान और संगठन के लिए सारी ताकत और  संपर्कों को झोंक देने का जोश लिए युवा मोर्चे के हर आन्दोलन में युवाओं के साथ कंधे से कंधा मिलाते नजर आए  । पूरे राज्य में युवाओं का एक समूचा तंत्र केवल पुष्कर धामी के  पास है। वे संगठन और विचार की राजनीति को समझते हैं। पहाड़ की ऊबड़ खाबड़ जमीन से आने के नाते, जमीनी कार्यकर्ता की भावनाओं को पढ़ना उन्हें आता है।आपको अगर काम के प्रति लगन , समर्पण और हमेशा सकारात्मकता का भाव आज के किसी  युवा राजनेता में देखना हो तो वो  पुष्कर  से बेहतर कोई नहीं हो सकता।  वो राज्य  ऐसे  इकलौते राजनेता हैं जिसने पहाड़ की पगडंडियों से जिन्दगी की शुरुवात की और बेहद कम समय में  युवाओं के बीच लोकप्रिय  हुए हैं । अविभाजित यू पी और उत्तराखंड  में  पार्टी के सच्चे सिपाही के तौर पर उन्होंने खुद को अपने काम के बूते हर जगह साबित किया है वहीं खटीमा सरीखे मैदानी क्षेत्र से विधायक  होने के बाद भी वे कुमाऊँ व गढ़वाल दोनों मंडलों  में युवाओं के बीच  समान आधार रखते रहे हैं । इन सबके बीच  पुष्कर सिंह धामी   बेपरवाह रहते हुए शालीनता के साथ संघ व बीजेपी के घोष वाक्य "देश प्रथम, संगठन द्वितीय व व्यक्ति अंतिम" के सिद्धांत को दोहराकर अपने कार्य मे लग जाते हैं।

जब भगत सिंह कोश्यारी अन्तरिम भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री थे उस समय पुष्कर सिंह धामी ने मुख्यमंत्री कार्यालय को बखूबी संभाला  और  अपनी प्रशासनिक दक्षता से सराहनीय कार्य कर भगत सिंह कोश्यारी जी को अपना गुरु बना लिया और उनके बताए रास्ते पर राजनीति की राह का हर सफर पूरा किया । इसके अलावा तत्कालीन  सीएम बी सी खण्डूडी व निशंक सरकारों में भी सरकारी दायित्वधारी रहकर अपनी प्रतिभा के झंडे गाड़े।  शहरी विकास अनुश्रवण परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में शहरी विकास की योजनाओं  के जरिए कायाकल्प किया । उत्तराखंड में आज की बदली परिस्थितियों  के बीच ये चर्चा आम हो चुकी है कि पुष्कर धामी ही अब उत्तराखंड भाजपा का भविष्य  हैं शायद यही वजह है अब भाजपा  पुष्कर के आसरे अपनी तीसरी पीढ़ी के नेताओं के भरोसे उत्तराखंड  के भविष्य के लिए युवाओं पर दांव खेलने को बेकरार दिखाई देती है ।  पुष्कर सिंह धामी  को कमान देकर आलाकमान ने जो संदेश दिया है  आज  उसे डिकोड किए जाने की जरूरत है ।इस बार पार्टी ने अनुभव से ज्यादा काबिलियत को तरजीह दी है जिसमें पुष्कर पूरी तरह से फिट बैठते हैं । पिछले कुछ समय से प्रदेश भाजपा में काँग्रेस से आयातित नेताओं की संख्या बढ़ी है जिनका एक मात्र उद्देश्य किसी तरह सत्ता की मलाई खाते रहना और बगावत का झण्डा बुलंद करना है ।  इन सभी की राजनीति में वैचारिक प्रतिबद्धता कुछ चीज नहीं रही । ऐसे सभी नेताओं से कन्नी काटते  हुए भाजपा आलाकमान ने  इस बार पुष्कर सिंह धामी  के रूप में नया दांव खेला है जो पार्टी का आम कार्यकर्ता है । इसमें कोई दो राय नहीं पुष्कर आज  उत्तराखंड के युवाओं की आन, बान और शान हैं। वो  उत्तराखंड के इकलौते युवा  नेता हैं जिनका पूरे  उत्तराखंड के हर कोने  में युवाओं के बीच व्यापक जनाधार है।  उनके चाहने वाले युवा आपको यमकेश्वर से लेकर धरमपुर , रायवाला से लेकर बदरीनाथ , माणा से लेकर धारचूला के पांगला,  खिर्सू  से लेकर  नेपाल के महेन्द्रनगर तक मिल जाएँगे ।  उत्तराखंड के सीमांत जनपद पिथौरागढ़ को पुष्कर धामी के सीएम बनने के बाद प्रदेश की सियासत में एक मजबूत पहचान मिली है । उनका अब तक का राजनीतिक  सफ़र उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों की कहानी को बखूबी बयां करता है।
 
पुष्कर सिंह धामी जहां एक ओर संघ के बहुत करीबी हैं वहीं  वे  बचपन से संघ की शाखाओं में विभिन्न प्रकल्पों के भी भागीदार रहे हैं। इसके अलावा अविभाजित उत्तरप्रदेश में विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता के रूप में  उनकी  सक्रियता उनको अन्य नेताओं से अलग करती है । उत्तराखंड के सीमांत  जनपद पिथौरागढ़ में जन्म लेने के बाद भी उन्होनें  खटीमा जैसे मैदानी इलाकों को अपनी कर्मभूमि के रूप में चुना  और दो बार विधायक बनकर अपने काम के बूते वहाँ की जनता का दिल जीतने का काम किया है । 2012 के चुनावों से पहले एक दौर में खटीमा को काँग्रेस का मजबूत गढ़ माना जाता था लेकिन धामी ने अपनी बिसात से काँग्रेस को हर तरफ से चित्त कर दिया है । पुष्कर सिंह धामी को पिछली विधान सभा में बेहतर विधायक के सम्मान से उनके कामों के बूते नवाजा जा चुका है । धामी को राजनीति विरासत में नहीं मिली है और न ही उनके परिवार की राजनीति में में कोई पृष्ठभूमि रही है । फिर भी धामी ने अपनी मेहनत, जोश और जज्बे से उत्तराखंड की राजनीति में खुद को स्थापित किया है । एक खास बात जो उनको उत्तराखंड के अन्य नेताओं से अलग करती है वो है उनकी सादगी,  ईमानदारी और दामन पर किसी तरह का कोई दाग नहीं होना ।  उनका पहाड़ी व मैदानी दोनों  इलाकों में युवाओं के बीच जबर्दस्त जनाधार भी उत्तराखंड में उनको मजबूती प्रदान करता है । सूबे के 44 लाख से अधिक युवा वोटर को अपनी साधी चाल से सी एम रहते वो साध सकते हैं ।  युवाओं से उनका याराना देखकर हर किसी को उन पर रश्क हो जाये शायद यही वजह है भाजपा के आम कार्यकर्ता चार माह पहले त्रिवेन्द्र रावत के सी एम पद से हटने के बाद से ये  कहने लगे  थे कि पुष्कर सिंह धामी अपनी राजनीति से पहाड़ से लेकर दून तक  को  बखूबी साध सकते हैं जो आज सोलह आने सच साबित हुई है । गौरतलब है  पुष्कर सिंह धामी का नाम चार महीने पहले उपमुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री  के तौर पर भी ज़ोर शोर चला था लेकिन टीम 11 में जगह बनाने में वो सफल नहीं हो पाये और मायूस से नजर आए। धामी को अपने समर्पण और काम के बूते इस बात की उम्मीद थी उन्हें समय आने पर बड़ी ज़िम्मेदारी अवश्य ही मिलेगी  शायद विधाता ने उनके लिए इससे भी दमदार स्क्रिप्ट लिखी थी जो आज सीएम के रूप में ताजपोशी  के रूप में सामने आई है ।  उनके राजनीतिक गुरु महाराष्ट्र और गोवा के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने तो 2017 में ग्राम श्रीपुर बिचवा में  विधान सभा चुनावों में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए एक बार  कहा भी था पुष्कर सिंह धामी एक दिन मंत्री नहीं,  मुख्यमंत्री बनेगा  और  आज संयोग देखिये पुष्कर धामी  सीधे सी एम की कुर्सी तक जा पहुंचे हैं ।  

  हिमालय की गोद में बसे प्रकृति की अमूल्य धरोहर देवभूमि उत्तराखण्ड़ के सीमान्त जनपद पिथौरागढ की तहसील डीडीहाट वर्तमान तहसील कनालीछीना की ग्राम सभा हरखोला का तोक टुण्डी गांव में सूबेदार पद से सेवानिवृत्त हुए एक पूर्व सैनिक के घर में पुष्कर धामी का जन्म  16 सितंबर 1975 को तीन बहनों के पश्चात हुआ।  खटीमा में आर्थिक अभाव में जीवन यापन कर सरकारी स्कूलों से प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। धामी बचपन से ही स्काउट गाइड, एनसीसी, एनएसएस आदि से जुड़े रहे। वह स्नातकोत्तर एवं मानव संसाधन प्रबंधन और औद्योगिक संबंध में मास्टर्स की डिग्री ले चुके हैं। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्रों को एक जुट करके निरन्तर संघर्षशील  रहते हुए उनके शैक्षणिक हितों की लडाई लडते हुए उनके अधिकार दिलाये तथा शिक्षा व्यवस्था के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । 1990 से 1999 तक उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में जिले से लेकर राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर तक विभिन्न पदों में रहकर कार्य किया। प्रदेश मंत्री के पद पर रहते हुए लखनऊ में हुए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय सम्मेलन में संयोजक की भूमिका भी निर्वहन किया । राजनीतिक यात्रा के बढ़ते क्रम में इसके बाद उन्होने उत्तराखण्ड राज्य आन्दोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाते हुए कई आन्दोलनों में प्रमुखता से भाग लेकर जन समस्याओं के निदान में गहरी दिलचस्पी दिखाई उनकी योग्यता को भांपकर इस दौरान पार्टी ने उन्हें युवामोर्चा में कमान दी । उत्तराखण्ड राज्य गठन के उपरांत पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी के साथ ओएसडी यानी सलाहकार के रूप में उनके करीब रहकर 2002 तक कार्य किया। 2002 से 2008 तक छः वर्षो तक दो बार भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष रहे। 2007 में कनालीछीना सीट से भाजपा से टिकट पाने में कामयाब नहीं हो पाये लेकिन निराश नहीं हुए । 2012 से  वह खटीमा से लगातार दो बार विधायक हैं।  2012 में भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष के तौर पर रुद्रपुर में युवा गर्जना रैली में उन्होनें  अपनी नेतृत्व  क्षमताओं को सभी के सामने बेहतर तरीके से दिखाया । चूंकि  वे कुमाऊं मंडल से आते हैं, इसलिए राज्य में भाजपा के गढ़वाल मंडल के ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक के साथ वह जातीय संतुलन में सटीक बैठते हैं। धामी की पैदाइश  सीमांत पर्वतीय जनपद पिथौरागढ़ की है  और तराई की खटीमा विधानसभा उनकी कर्मभूमि रही है, इसलिए वह पहाड़ और मैदान का संतुलन भी  बखूबी साधते हैं। उन पर न ही कोई पर्वतीय न होने का टैग लगा सकता है और न ही मैदानी न होने का लिहाजा उनकी सर्वस्वीकार्यता  और युवा शक्ति पर भरोसा देखते हुए भाजपा आलाकमान ने उनके नाम के साथ 2022 के रन में उतरने का मन बना लिया है  । भविष्य में पहाड़ में होने वाले परिसीमन को देखते हुए मैदानी इलाकों में सीटों की संख्या में इजाफा होने की संभावना है इस लिहाज से भी पुष्कर धामी भाजपा की भावी संभावनाओं को नए पंख लगा सकते हैं ।  उत्तराखंड में युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाकर उन्होनें  अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। उन्होंने राज्य के युवाओं में  में एक ऐसा भाव पैदा किया जिसके चलते न उनमें अपनी माटी के प्रति प्रेम पैदा हुआ बल्कि उनमें इस जमीन  काम करने की ललक भी जगी है । खटीमा में पूर्व सैनिकों के सम्मेलन से लेकर रोजगार के मेले और पलायन पर सार्थक गोष्ठियों को  आयोजित करवाकर उन्होनें  इस मामले  में खुद को एक आशावादी और विकासवादी राजनेता के रूप में पेश किया है जिसकी रगों में देश प्रेम और पल –पल उत्तराखंड के विकास की धारा बहती है । आने वाले दिनों में वो किसान आंदोलन के बाद तराई क्षेत्र में भाजपा को आगामी विधानसभा चुनाव में संभावित नुकसान को भी रोकने का माद्दा भी रखते हैं।

राजनीती में पुष्कर  होना इतना आसान नहीं है इसके लिए प्रतिभा, जुनून और  समर्पण होना चाहिए।  वो इस मामले में बहुमुखी प्रतिभा के धनी  रहे हैं।  2012 में खटीमा जीतने के बाद से ही उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और उत्तराखंड में दो बार विधायक  बनकर उत्तराखंड  के सी एम की कुर्सी तक  शानदार ढंग से एक सामान्य कार्यकर्ता के तौर पर अपनी मेहनत के बूते पहुंचे हैं । उत्तराखंड की पहाड़ी जमीन के हर  उबड़ खाबड़ रास्तों का पता पुष्कर धामी को  है। वो  युवा मोर्चा के पद पर रहते हुए व्यक्तिगत रूप से कई हजार गाँवों में गए हैं , साथ ही युवाओं से संवाद केंद्र में रहा है । इसका लोहा इनके विपक्षी  और धुर विरोधी भी मानते रहे हैं। किसी ने ठीक ही कहा है समय से बड़ा बलवान कोई नहीं। इसीलिए वे अपनी विधान सभा में विकास के काम में सबको साथ लेकर चलना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि विकासधारा में सब साथ हों, भले ही विचारधाराओं का अंतर क्यों न हो। यह सिर्फ संयोग ही नहीं है कि आज उत्तराखंड का युवा उनको एक नई नजर से देख रहा है तो ऐसे में  पुष्कर धामी का अपनी पहचान को निरंतर प्रखर बनाना साधारण नहीं है, शुभ संकेत यह है कि ये सवाल राज्य के मुखिया के जेहन में  पहले से भी हैं। हर व्यक्ति का समय होता है जब वह शिखर पर पहुंचता है ।  पुष्कर धामी  इस मामले में भी काफी धनी हैं। हरसैम की कृपा उन पर सदा बनी रही है। । उत्तराखंड में युवाओं की राजनीती के केंद्र में हर समय पुष्कर ही रहे । आज भी जब आम आदमी उनको देखता है तो उसे सहसा विश्वास नहीं होता ये वही पुष्कर है जो युवा मोर्चा के अध्यक्ष , विधायक हैं। विधायक रहते हुए  खटीमा जैसे पिछड़े इलाके में जो विकास की गंगा अपने दो बार के कार्यकाल में बहाई है उसकी मिसाल देखने को नहीं मिलती ।  पुष्कर धामी को खाली समय में जब भी मौका मिलता है तो युवाओं से  सीधा संवाद करने में वो पीछे नहीं रहते हैं । उनकी समस्याओं को मौके  पर ही निपटाने का प्रयास करते हैं । विचार को लेकर स्पष्टता, दृढ़ता और गहराई के बावजूद उनमें जड़ता नहीं थी। वे उदारमना, बौद्धिक संवाद में रूचि रखने वाले, नए विजन के साथ सोचने वाले और जीवन को बहुत सरल और व्यवस्थित ढंग से जीने वाले व्यक्ति हैं । उनके आसपास एक ऐसा आभामंडल स्वतः बन जाता है कि उनसे सीखने की ललक हर युवा नेता में होती है ।  युवा को अपने विमर्श का हिस्सा बनाना उन्हें युवाओं का महानायक  बनाता है । वे परंपरा के पथ पर आज भी आधुनिक ढंग से सोचते हैं । चुनावी बरस में धामी की सबसे बड़ी चुनौती  अब भाजपा को 2022 के चुनावों में सत्ता की दहलीज पर पहुंचाने की है ।  

सीमांत जनपद पिथौरागढ़ जिले के एक छोटे से गांव से शुरू हुई उनकी राजनीति यात्रा आज जिस पड़ाव पर है अविस्मरणीय है। एक पहाड़ी  नौजवान के  गाँव से लेकर  उत्तराखंड  मुख्यमंत्री बनने तक की कहानी  उनके जज्बे और लगन की हिमालय जैसी ऊँची उड़ान है।  पुष्कर अपनी साफगोई और बेबाकी  के लिए जाने जाते हैं और  भारतीयता के मुखर प्रवक्ता रहे हैं। अपनी युवावस्था में जिस विचारधारा को लेकर वह साथ आये उसका पालन करते हुए बिना मंत्री बने सीधे विधायक से  सी एम बनकर नयी मिसाल राज्य में पेश  की और और खुद को लंबी रेस का घोडा साबित किया है । उनके वाणी और कर्म में जो साम्य  है वह उन्हें एक कुशल जननेता बनाता है। राष्ट्रबोध और राष्ट्र  के लोगों के प्रति प्रेम उनमें कूट कूट कर भरा है। उनसे मिलने का अनुभव हमेशा सुखद अहसास करा जाता है। उम्मीद जगाना और नाउम्मीद को  उम्मीद में बदलना , युवाओं को आगे बढ़ने के लिए सदा  प्रेरित करने के मामले में उनका कोई सानी  नहीं है।  पुष्कर धामी  के साथ प्लस पॉइंट यह है वह सूबे  के सबसे युवा  सी एम होने के साथ ऊर्जावान भी हैं। कुछ तो बात है हाल ही में हुए परिवर्तन के बाद भी सोशल मीडिया पर भी युवाओं के बीच पुष्कर धामी  ट्रेंड कर रहे हैं और छाए हुए हैं ।  आज भी वे उत्तराखंड युवाओं की  एक धुरी हैं  जिसके पास युवाओं का विशाल जमावड़ा है। राज्य के युवाओं को उनसे बड़ी उम्मीदें हैं ।  एक  राजनेता के तौर पर  उनकी  यही  पहचान उन्हें  अन्य नेताओं  से  अलग  करती  है। उन्हें पता है कि उनको मिली नई जिम्मेदारी साधारण नहीं है। वे एक ऐसे परिवार के मुखिया बनाए गए हैं जिसकी परंपरा में नित्यानन्द स्वामी , भगत सिंह कोश्यारी, बी सी खण्डूड़ी, रमेश पोखरियाल निशंक ,विजय बहुगुणा , त्रिवेन्द्र सिंह रावत , तीरथ सिंह रावत  जैसे असाधारण  और कर्मठ जैसे कुशल रणनीतिकार हैं । उत्तराखंड भाजपा का संगठन साधारण नहीं है।  पुष्कर धामी की खूबी ये हैं वो सभी के साथ सहजता से बात करते हैं और अपनी शपथ से ठीक पहले वो सभी तीन पूर्व सीएम और सीनियर मंत्रियों के आशीर्वाद लेने उनके घर गए । कम समय में पार्टी को आगामी  चुनाव में सत्ता में लाने की  उनकी कोशिशें कितनी रंग लाएंगी यह तो समय बताएगा, किंतु पुष्कर धामी में दौड़ भाग करने और सरकार – संगठन में तालमेल बनाने की असाधारण क्षमताएँ हैं । पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के मूल मंत्र ‘चैरेवेति-चैरेवेति’ को वे राज्य गठन के बाद से लगातार साकार कर रहे हैं । निष्काम कर्मयोगी पुष्कर धामी  की साधना जिन्होंने देखी है वे मानेंगें कि इस  45 बरस के अदने से कार्यकर्ता को राजनीति  सब कुछ यूं हीं नहीं मिला है। उन्होनें विचारधारा के साथ  कभी कोई समझौता नहीं किया और धैर्य धारण किया  है । पुष्कर पूरे प्रदेश में युवा मोर्चे में रहते हुए घूमे हैं लिहाजा उन्हें राज्य की  बेहतर समझ है । सूबे का मुखिया  होना बहुत कठिन उत्तराधिकार है, इसे वे बखूबी समझते हैं। राजनीति में आज के युवा नेताओं में ऐसा समर्पण दूर तक देखने को नहीं मिलता । आज हर कोई राजनीति की रपटीली राह शॉर्ट कट रास्तों के आसरे तय करना चाहता है ।  निश्चय ही पुष्कर धामी ने अपनी काबिलियत से यह साबित कर दिया है उनको राज्य में कमान देने का आलाकमान का फैसला कितना जायज है । पुष्कर आज उत्तराखंड भाजपा के शिखर पर हैं, तो इसके भी खास मायने हैं,  एक तो यह कि भाजपा में साधारण काम करते हुए आप असाधारण बन सकते हैं, दूसरा यह कि सामान्य कार्यकर्ता कितनी ऊंचाई हासिल कर सकता है वे इसके भी अप्रीतम उदाहरण है।

  पुष्कर धामी  समय समय पर  युवाओं से संवाद करते हैं और उनकी समस्याओं को सुनते हैं । तीन बरस पहले पुष्कर धामी ने सर्जिकल स्ट्राइक डे पर हल्द्वानी में पूर्व सैनिकों पर पकड़ मजबूत करने के लिए भव्य कार्यक्रम  कराया था ।  खटीमा में राजनाथ सिंह गृह मंत्री रहते एक सम्मेलन में शिरकत करते हैं और उनकी तारीफ़ों के कसीदे यूं ही सबके सामने नहीं पढ़ते ।  फेसबुक,  ट्विटर , व्हाट्सएप जैसे  माध्यमों में उनकी सक्रिय भागीदारी उनकी संवेदनशीलता को दिखाती है । सही मायनों में वे  सच्चे कर्मयोगी हैं । एक बार जो ठान लेते हैं उसे पूरा करके ही दिखाते हैं ।  खटीमा  में काम करते हुए कई बार उनको देखा है । कोरोना  के दौर में भी वह खाली नहीं बैठे और 18 से 20 घंटे तक बिना रुके काम अनरवत रूप से  लोगों की समस्याओं का समाधान करते रहे । पुष्कर  की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं दिखता है और वो हमेशा सकारात्मक उर्जा से सरोबार रहे हैं और यही उर्जा उनको विषम परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है ।  सूबे के मुखिया के तौर पर  वो आज उस  अग्निपथ पर हैं जहाँ लोगो की बड़ी अपेक्षाएं अभी भी  उनसे जुडी हैं । बेशक महामहिम भगत सिंह कोश्यारी  का आशीर्वाद उनके साथ है लेकिन उत्तराखंड में बहुसंख्यक राजपूत  वोट पर आज भी हरीश रावत का ही जादू चलता है लेकिन अब पुष्कर धामी के सी एम के चेहरे के रूप में सामने आने से हरीश रावत की मुश्किलें पूरे उत्तराखंड में बढ़नी तय हैं। पुष्कर धामी  के युवा तुर्क के रूप में भाजपा को कुमाऊँ में ऐसा दमदार चेहरा मिला है जो हरीश  रावत को उनके घर में अपने युवा जोश से हराने का माद्दा रखता है ।

 पुष्कर धामी की असल अग्नि परीक्षा का समय  अब एकदम निकट है। विधान सभा चुनाव में बेहद कम समय होने के चलते विकास की नई इमारत गढ़ते  हुए प्रदेश के सभी सीनियर और जूनियर नेताओं को साधते हुए सत्ता में भाजपा की  2022 में दमदार वापसी  करवाना उनके सामने बड़ी चुनौती है । खास तौर से पुष्कर धामी की सी एम पद पर ताजपोशी के बाद से कुमाऊँ में नाराजगी के सुर जनता में अब  धीमे पड़ गए हैं ।  यदि वह सभी बड़े नेताओं को साथ ला पाने में सफल रहते हैं तो अगले चुनाव में भाजपा पूर्ण बहुमत पा सकती है। इसके ठीक उलट यदि खेमेबाजी का दौर भाजपा के भीतर जारी रहता है तो कोई आश्चर्य नहीं कि अगली सरकार बनाने के लिए भाजपा को  नाकों चने  पर मजबूर होना पद जाये जो राज्य के हितों पर गहरा असर डालने वाला होगा। अब चूंकि पार्टी नेतृत्व को लेकर चल रही अटकलों पर केन्द्रीय नेतृत्व के फैसले ने विराम देने का काम किया है। यह देखा जाना बाकी है कि  पुष्कर धामी  कैसे  सीनियर और जूनियर को साध पाने का प्रयास करेंगे ? कांग्रेस का सूबे में भविष्य भी अब की पुष्कर धामी  की इसी राजनीति से तय होगा।  सी एम के चेहरे के रूप में पुष्कर धामी  के सामने आने के बाद अब शायद कॉंग्रेस को भी अपनी रणनीति में बदलाव करने को मजबूर होना पड़ जाये । युवा  मुख्यमंत्री धामी को इतिहास की इस घड़ी में यह अवसर मिला है कि वे इस भूगोल को उसकी तमाम समस्याओं के बीच एक नया आयाम दे सकें।  धामी के सामने चुनौतियों का विशाल पहाड़ खड़ा है । बहुत चुनौतीपूर्ण और कम समय होने के बावजूद उन्हें इन चुनौतियों को स्वीकार करना ही होगा, क्योंकि सपनों को सच करने की जिम्मेदारी  देवभूमि के भूगोल और इतिहास दोनों ने उन्हें बखूबी दी है। वैसे भी पहाड़ और मैदान की परिस्थितियों की उनको बखूबी समझ है । जाहिर है वे इन चुनौतियों से किसी भी हाल में भागना भी नहीं चाहेंगे।  

समय का पहिया बहुत तेजी से घूमता रहता है जो कुछ करना चाहते हैं उनके लिए एक- एक पल का बड़ा महत्व होता है। विधान सभा चुनाव में अब बमुश्किल 7 से 8 महीने बचे हैं। देवभूमि  में ऐसी ही जिजीविषा का धनी  युवा तुर्क के रूप में नया  इतिहास रचने जा रहा है। उसकी ताजपोशी के बाद से  युवाओं की उम्मीदें परवान चढ़  रही हैं। केंद्र में नरेंद्र मोदी के पी एम के बाद प्रदेश को युवा हृदय सम्राट के रूप में ऐसा सी एम मिला है जिसके मन में उत्तराखंड के विकास को लेकर एक अलग तरह का विजन है। दोनों 2022 के चुनावों में युवाओं के बीच इसको कैश करने की कोशिश करेंगे जिससे भाजपा की संभावनाएँ चुनाव में बेहतर हो सकेंगी । मुख्यमंत्री के सिंहासन पर ताजपोशी होने के बाद  पहाड़ की जनता उन्हें अपनी बधाई  देते हुए शायद इस बार यही कह रही है राजनीति में अपनी कप्तानी में खेलने , फील्डिंग लगाने, शाट मारने , सही टीम चुनने और अपना हुनर दिखाने के मौके बार बार नहीं मिलते इसलिए  इस बार मत चूको पुष्कर धामी !