बृहस्पतिवार, 16 मई 2013

जम्हूरियत की जंग में जश्न-ए-नवाज

किसी ने कहा है इतिहास अपने को दोहराता है और राजनीति में हमेशा दो  दूनी चार नहीं होता। 14 साल पहले जिस नवाज शरीफ को पाकिस्तान छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था आज वही नवाज शरीफ तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। वहीं संयोग देखिए वक्त का पहिया कैसे घूमा और कैसे पाकिस्तान में  राजनीति एक सौ अस्सी डिग्री पर घूम गई। यह पूर्व तानाशाह मुशर्रफ की नजरबन्दी से समझी जा सकती है जिनको इस बार चुनाव लड़ने के अयोग्य न केवल घोषित कर दिया गया बल्कि उनको सत्ता पथ पर फटकने से रोकने के लिए सभी दल जम्हूरियत की जंग में साथ-साथ कदमताल भी करने लगे।
   
पाकिस्तान में सैन्य शासकों के शासन  से  आवाम की बेरूखी और फिर लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव में अपने बैलेट द्वारा सहभागिता यह बताने को काफी है कि मौजूदा तौर में पाक में जम्हूरियत की बैचेनी किस कदर सुनाई दे रही है। साढ़े छह दशकों के लम्बे इतिहास में लोगों का विशाल जनसैलाब बलूचिस्तान से लेकर सिन्ध और पंजाब से लेकर खैबर पख्तून की सड़कों पर वोट डालने लोकतांत्रिक सरकार के चुनने निकला उसने पहली बार न केवल तालिबानी कठमुल्लों के हौसलों को अपने वोट की ताकत से आईना दिखाया बल्कि जम्हूरियत की इस नई जंग में कट्टरपथियो के होश भी ठिकाने लगा दिये। तालिबान की धमकियों से बेपरवाह होकर महिलाओं ने भी पाक की सड़कों पर खुले घूमकर जिस तरह इस बार मतदान किया उससे पाक में लोकतंत्र की एक नई सुबह का आगाज सही मायनों में हुआ है। व्यापक हिंसा, सैकड़ों मौतों के बाद 60 फीसदी के आसपास हुए मतदान से लोकतंत्ररूपी जो बयार पाक में चली है उसे पाक के भविष्य के लिए हम शुभ संकेत मान सकते हैं।

नेशनल असेम्बली की 272 सीटों के लिए हुए मतदान में नवाज की पार्टी पीएमएल (एन) 123 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में न केवल उभरी बल्कि पाक की राजनीति में उसने इस चुनाव में पीपीपी और तहरीक-ए इंसाफ जैसी कई पार्टियों को दहाई के अंकों में समेट दिया। सबसे बड़ी पार्टी के रूप में पीएमएलएन के उभरने के बाद नवाज शरीफ का प्रधानमंत्री बनना तय है। वह तीसरी बार पाक की सत्ता संभालने जा रहे हैं। नवाज शरीफ को मिला यह जनादेश पाक में पीपीपी की अलोकप्रियता का एक ताजा प्रमाण है। एन्टी एनकम्बेन्सी फैक्टर ने भी इस चुनाव में पीपीपी के तिलिस्म को तोड़ने का काम किया है। साथ ही उन राजनीतिक पंडितों के आंकलन को झुठला दिया है जो इस चुना वमें इमरान खान को पाक की राजनीति का उभरता चेहरा बताने पर तुले थे। इस चुनाव से पहले ब्रिटिश काउंसिल की एक रिपोर्ट में नवाज शरीफ और इमरान की पार्टी में कांटे की टक्कर बताई गई थी लेकिन चुनाव परिणामों ने सेफोलाजिस्टों की घिग्घी बांध दी है। खैबर पख्तून में जहां इमरान ने अपना दबदबा इस चुनाव में कायम किया तो वहीं जरदारी की पीपीपी सिंध में अपनी लाज बचाने में सफल हो गई। वहीं नवाज की पीएमएल (एन) ने पंजाब, बलूचिस्तान में अपनी शानदार जीत से अन्य पार्टियों को सत्ता में आने से रोकने का काम किया है। पाकिस्तान का यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा क्योंकि सेना ने जहां चुनावी प्रक्रिया में अपने को दूर रखा वहीं बम धमाके और हिंसा के साये के बाद भी वोटरों में मतदान को लेकर उत्साह दिखा। यह पहला मौका है जब पाकिस्तान में सत्ता हस्तान्तरण का एक नया दौर  देखने को मिल रहा है जहां आवाम मताधिकार के आसरे लोकतंत्र में सहभागिता को लेकर लोकतंत्ररूपी उत्सव में अपनी भागीदारी वोट से कर रहा है। इस चुनाव में पाक के आवाम का बड़ा तबका जिस तरह कट्टरपंथियों के सामने खड़ा हुआ है उसने पूरे विश्व को एक नया संदेश दिया है कि अब फौजी शासन की फरेबी स्टाइल देश को नहीं बचा सकती। स्थिर और खुशहाल पाकिस्तान का सपना लोकतंत्र में ही साकार हो सकता है। 60 फीसदी से ज्यादा लोगों ने मतदान में भाग लेकर जम्हरियत के प्रति अपने विश्वास को प्रकट करने का काम किया है क्योंकि 70 के दशक के बाद यह पहला मौका रहा जब तमाम धमकियों के बावजूद लोग अपने घरों से बाहर निकले।

    पाक में जम्हरियत की इस जंग में नवाज शरीफ खरा उतरे और लोगों ने जिस विश्वास के साथ उन्हें आंखों पर बिठाया है उसके बाद उन पर लोगों की उम्मीदों को पूरा करने की एक कठिन चुनौती सामने खड़ी है। शायद इसी वजह से जीत के बाद नवाज ने पूरे आवाम को अपना शुक्रिया अदा किया। उन्होंने इस दौरान मुल्क में न केवल अमन चैन बहाल करने की वचन बद्धता दोहराई बल्कि पड़ेसी देशों में भी सम्बध सुधारने पर अपना जोर दिया। वैसे नवाज शरीफ ने अपनी पूरी चुनावी कैम्पेनिंग में कश्मीर के मुद्दे से दूरी तो बनाई ही साथ ही कारगिल की जांच  और मुम्बई हमले के दोषियों पर कार्यवाही करने का भरोसा जताकर भारत के प्रति अपने विश्वास को बहाल करने का काम किया है। शायद इसी वजह से चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन को पाक की यात्रा का निमंत्रण देने में देर नहीं दिखाई।
   
पाकिस्तान में तीसरी बार सत्ता में वापसी के बाद नवाज शरीफ ने अपने को न केवल शेर साबित किया बल्कि उन आलोचकों का भी मुंह बन्द कर दिया है जो पाकिस्तान में नवाज की वापसी को मुश्किल मान रहे थे। अब नवाज के सामने पड़ोसियों से ज्यादा आंतरिक समस्याओं का पहाड़ सामने खड़ा है। तालिबान अभी भी पाकिस्तान की जहां गर्दन मरोड़ रहा है वहीं अफगानिस्तान से अमरीका की फौजों की अगले साल हो रही वापसी के बाद नवाज के सामने असल मुश्किल खड़ी हो सकती है क्योंकि ऐसे हालातों में तालिबान पाक की गर्दन तोड़ेगा अतः उसके मुकाबले के लिए नवाज को अभी से तैयार रहना होगा। पाक में कट्टरपंथी उन्मादी प्रवृत्ति के लोग आज भी आये दिन वहां खून खराबा और आतंक बढ़ा रहे हैं जिससे जूझने की कठिन चुनौती नवाज के सामने खड़ी है। इस समय पाक की अर्थव्यवस्था सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। आवाम दाने-दाने के लिए जहां मोहताज है वहीं गैस सिलेण्डर, खाद्य सामग्रियों के दाम तो आसमान छू रहे हैं। साथ में कई इलाके बिजली संकट से जूझ रहे हैं। आये दिन होने वाले धमाकों से कोई नया निवेश पाक में नहीं हो पाया है जिससे अर्थव्यवस्था बेहाल  है। ऐसे में देखना होगा वह पाक में अपनी तीसरी पारी में क्या करिश्मा दिखा पाते हैं? वह भी ऐसे हालातों में जब बीते 7 सालों में अमरीका ने 20 अरब डालर की मद्द से उसे दीवाले होने से बचाया है और यही नवाज अपने चुनाव प्रचार में अमरीका और उसके नीति नियंताओं को बड़े-छोटे मंचों से लगातार कोसते ही रहे।
   
नवाज 1990 और 1997 के दौर में प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यह तीसरा मौका है जब वह पाक की कमान संभालने जा रहे हैं। लेकिन पिछली यादों को भुलाना उनके लिए आसान नहीं होगा। दो बार सेना ने लंगड़ी देकर न केवल उन्हें सत्ता से हटाया बल्कि अपने दोनों कार्यकाल में वह सेना की कठपुतली बनाकर राजपाट संभालते रहे। नवाज  ने  भले  ही    इस चुनाव  में पाक की आंतरिक   समस्याएं  दुरूस्त   करने  और सरकार  में सेना  के किसी   तरह  को हस्तक्षेप  से  इंकार    होने के  सब्जबाग  दिखाए  लेकिन  यह सब  करना आसान  नही  है ।   वह भी  उस मुल्क  में जहा बीते   65 सालो   से सरकार  में सेना  का सीधा  दखल  रहा है   और  विदेश नीति   से लेकर  आंतरिक   सुरक्षा  सभी सेना तय  करती  रही  है।  यही  नही सेना  को हर  मसले  पर  आईएसआई   भी  समर्थन  करती  रही है।  ऐसे  हालातो  में नवाज  को सेना  से सीधे   दो  -दो  हाथ  करना  पड़  सकता  है।  जाहिर  है  इन परिस्थियों  में उन्हें खुद को अभी से तैयार करना होगा  ।  इन परिस्थियों में   वह  फौज  से टकराव  नही  लेना चाहेगे   ।  हाल   के वर्षो   मे पाक  के  अंदरूनी   हालात  बहुत  अच्छे  नही रहे  है।  आंतकी  ताकतों  ने वहां   के  मासूम   नागरिको   का  अमन   चैन   छीन  लिया ।  माहौल  कितना  खराब   है  यह  वहा  आये  दिन   होने  वाले  हमलो  से समझा  जा सकता   है।  पाक  का  इतिहास  बतलाता  है   वहा जम्हुरियत   की  हवा  का स्वांग   भले  ही  समय समय  पर  रचा  जाता   रहा  हो  लेकिन   सेना के बिना  पत्ता  भी  नही  हिलता  ।  जरा  सा  दाये   -बाये   करने    पर   तख्ता   पलट   आम   बात  है।  जाहिर  है  मिया  नवाज   के  जेहन में  यह   सारी  बाते   अब   भी  कौंध   रही  होगी ।   90   के दौर  को याद   करे   तो  मुशर्रफ   मिया नवाज   की  वजह  से सेना  प्रमुख  बने  क्योकि    वरिष्ठता  के आधार    पर उनसे   पूर्व  दो  लेफ्टीनेन्ट   जनरल  आगे थे  लेकिन  नवाज    के भाई   शाहबाज   शरीफ  के कहने  पर  मिया नवाज    ने मुशर्रफ   के नाम    पर  किसी तरह का  एतराज    नही   जताया  । वही   मुशर्रफ   ने मौका   पाकर   न केवल  12  अक्टूबर   1999   को  नवाज   शरीफ   को सत्ता  से  न केवल   बेदखल   किया  बल्कि उन्हे   जेल  में नजबन्द   भी  कर दिया  ।  बाद   में समझौते   के कारण  नवाज    7 साल   सऊदी   अरब   चले  गये  जहां  मिया  नवाज   पर पाक   में  राष्ट्रद्रोह , विमान   अपरहण  के  मुकदमे  चलाये  गये  ।  यही  नही   जिया उल हक   के दौरे   को   भी   देखे   तो  जुल्फिकार   भुटटो  ने भी  दो  लेफ्टीनेन्ट   जनरलों  को  सुपरसीड    कर दिया  ।  मगर  कुछ  दिनो  बाद   जिया ने  जुल्फिकार  अली    भुटटो   की  बलि   उन्हे  शूली   पर चढ़कार  ली ।  नवाज  जब प्रधान मंत्री   पद की   शपथ  पाक  में लेंगे   तो इस   सीन  से  पार  पाना आसान   नही   होगा  ।  बड़ा  सवाल  इस  दौर   में मुशर्रफ   को लेकर   भी   है  जिनके    साथ कारगिल में  मुशर्रफ   ने  उन्हे  अंधेरे में रखा  जिसके चलते  भारत पाक सम्बन्ध  पटरी से उतर गये  । अटल बिहारी के  साथ लाहौर  वार्ता का जो चैनल   नवाज  ने खोला था   कारगिल होते होते  वह चैनल भी  बन्द हो गया  और मुम्बई   में  26/11  के बाद  तो  रिश्तो में  जंग  सरीखी  नौबत कई बार आ चुकी  है ।  ऐसे  में नये कार्यकाल  मे अब  मिया नबाज  को  सेना के साथ  फूंक फूंक  कर  कदम रखने होगे ।

मिया  नवाज की  भावी राजनीति  बहुत  हदतक  अगले सेना प्रमुख  की  ताजपोशी  से तय होगी ।  वर्तमान में  अशफाक  कियानी  सेनाध्यक्ष पद से रिटायर होने जा रहे है।   उन्होने अमरीका  का पूरा  भरोसा पाया था लेकिन  बड़ा सवाल  नये सेनाघ्यक्ष  के  चुनने को  लेकर भी है जिसमें  नवाज की क्या भूमिका होगी   यह देखना होगा । अपने  इस बार के चुनाव प्रचार में  नवाज ने अमरीका को खूब  खरी खोटी सुनाई  है ऐसे में जमीनी  स्तर पर  वह  अमरीका का दखल  पाक की  आंतरिक  राजनीति मे कितना कम कर पाते  है यह देखने वाली बात होगी  ।  पाक के  आवाम  में नवाज  की वापसी  का  जबरदस्त  जश्न  दिख रहा  है।  नेशनल  असेम्बली  में  पीएम एल  एन  के  मजबूत  होकर   उभरने  के साथ ही  पाक के आवाम  की नवाज से  उम्मीदे  बढ़ गई  है। नवाज  आने वाले दिनो में  सेना को  नियंत्रण में रख राजनीति  में  किस प्रकार  अपनी  बिसात बिछाते  है  यह भी देखने वाली बात होगी ।   हालांकि  अभी  वह सभी  दलो को  साथ लेकर  चलने की  अपनी बात  को दोहरा रहे है। यही वजह है  चुनाव परिणाम  आने के बाद  उन्होने तहरीक  ए  -इंसाफ  पार्टी के प्रमुख इमरान खान से मुलाकात  की  है जो  नेशनल असेम्बली मे इस बार  मुख्य विपक्ष  पार्टी के तौर पे  उभरी  है इसे  राजनीति के लिहाज से  अच्छा संकेत  माना जा सकता  है।  प्रधान मंत्री पद पर बैठने के बाद  अगर नवाज  अपनी  बिसात  खुद ही बिछाते  है  तो  यह  बेहतर  होगा  अन्यथा सेना ही  हमेशा की तरह  उनके लिए  खतरा पैदा कर सकती  है।  आतंकियो को नेस्तानाबूद करने के लिए नवाज को  सेना को  अपने नियंत्रण में लेना ही होगा क्योकि  पाक  में सेना व सरकार रिश्ते पहले से ही  तल्ख रहे है ।  नवाज सेना  की  मदद  से तालिबान , अलकायदा सरीखी  ताकतो पर  फतह पा सकते है।

पाक  के   इस चुनाव  ने कई  संदेश एक  साथ  दिये  है।  पहला यह कि  आप  किसी जननेता को  नही नकार सकते ।  मिया नवाज  आज भी  पाक  आवाम  की  बड़ी  पसन्द  बने है  शायद  तभी   वह  तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने जा रहे है ।  दूसरा  जनता  फौजी शासन से  त्रस्त आ चुकी है ।  अब  वह सड़को पर  निकलकर अपने वोट की ताकत  को  दिखा रही   है ।  तीसरा जनता भष्ट्राचार से  तंग आ चुकी है  । पीपीपी की  लुटिया  शायद इसी  भष्ट्राचार  ने  डुबोयी   । कम से कम  चुनाव परिणाम तो  यही साबित  करते  है। और  एक खास बात  यह चुनावी सभा में  उमड़ने वाली  भारी भीड़ को देखकर  हम  इस मुगालते  में ना रहे कि  यह भीड़ वोट में तब्दील होगी । अगर ऐसा होता तो  17 सालो के लम्बे संघर्ष के बाद पाकिस्तान में सत्ता की चाबी इमरान खान के पास होती लेकिन ऐसा नही हो पाया क्योकि  ये पब्लिक  है   सब जानती है पब्लिक  है ।

मंगलवार, 7 मई 2013

मामा की रेल में भांजे का खेल..............


कोलगेट के मसले पर सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट बदले जाने पर विपक्ष के लगातार हमले झेल रही यू पी ए 2  कानून मन्त्री अश्विनी कुमार को बचाने के लिए दस जनपथ में सोनिया के राजनीतिक सलाहकार  अहमद पटेल की अगुवाई में अभी अपनी बिसात बिछा ही रही थी कि रेलवे में प्रमोशन के घूसकाण्ड ने रेल मंत्री पवन कुमार बंसल की कुर्सी को भी हिलाकर रख दिया है | हर दिन किसी ना किसी घोटालो के घेरे  में घिरने वाली यू पी ए के लिए इससे शर्मनाक बात क्या हो सकती है २०१४ से ठीक पहले वह घोटालो के फेर में जिस तरह उलझती जा रही है उसने यूपीए की साख पर सीधे सवाल उठाने का काम किया है | मौजूदा दौर ऐसा है जब 2 जी से लेकर  कोलगेट तक की आंच सीधे 7 आर सी आर रोड तक जा रही है और मनमोहन हमेशा की तरह बेबसी का रोना रोते हुए खामोशी की चादर ओढ़ लिए हैं |

 रेल में प्रमोशन के नाम पर बीते दिनों चले इस खेल में जिस तरह सी बी आई ने  दर्जन भर लोगो को हिरासत में लिया है उससे रेलगेट विवाद से सरकार  बचना मुश्किल दिख रहा है | पूरे विवाद में सी बी आई ने माना है रेल मंत्री के भांजे विजय सिंगला ने  रेलवे बोर्ड के सदस्य महेश कुमार  को रेलवे का महाप्रबंधक का चार्ज देने के लिए 90 लाख रुपये शुरुवाती घूस ली | यही नहीं रिश्वत की इस खेफ के साथ उन्होंने भांजे को रंगे हाथो गिरफ्तार किया | साथ ही सी बी आई जांच में बंसल के निजी सचिव और भांजे की दो हजार फोन काल्स की जो डिटेल हाथ लगी है उससे रेल मंत्री की मुश्किलें बढ़ रही हैं लेकिन कांग्रेस जिस तरह  आक्रामक होकर पवन बंसल के बचाव में उतरी है उसने कई सवालों को खड़ा किया है | मसलन क्या इस देश में लोकलाज और नैतिकता नाम की कोई चीज नहीं बची है ? क्या पांच साल का जनादेश का मतलब बेख़ौफ़ राज करना है ? क्या लोकसेवको के लिए जन नाम की कोई चीज  इस दौर में नहीं बची है ? बीते चार साल में एक ईमानदार प्रधानमन्त्री भी कठघरे में है क्युकि  चिदंबरम से लेकर थरूर ,जायसवाल से लेकर खुर्शीद और अश्विनी कुमार से लेकर पवन बंसल हर किसी को बचाने की कोशिश खुद प्रधानमंत्री के द्वारा इस दौर   में हुई है और मजेदार बात यह है कि यह सभी चेहरे खुद मनमोहन की पहली पसंद रहे हैं |

जनता के बीच मनमोहन की साख को लेकर जैसे सवाल उनके दूसरे
कार्यकाल में उठ रहे हैं वैसे पहले कार्यकाल में नहीं उठे | संभवतया इसके पीछे वाम दलों का दबाव रहा जिसके न्यूनतम साझा    कार्यक्रम के चलते कोई अपनी मनमानी नहीं कर पाता था लेकिन  आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है | मनमोहन अपनी  आर्थिक सुधारों वाली लीक पर चल निकले हैं जहाँ विदेश नीति से लेकर हर माडल कमोवेश पश्चिमी देशो के करीब हो चला है और  यही  उदारीकरण का माडल  बड़े पैमाने  में लूट खसोट पैदा कर रहा है |

  अब पांच साल के जनादेश का मतलब जन को ठेंगा दिखाते हुए लूट करना और अपने मन माकिफ राज करना हो गया है जहाँ  कारपोरेट   के लिए फलक फावड़े बिछाये बिना काम नहीं बनता | जैसे आरोपों के   घेरे में मनमोहन हैं वैसे आरोप आजाद भारत में किसी सरकार पर नहीं लगे | हालाँकि जीप घोटाला तो नेहरु के काल में ही हो गया था  जिसके बाद तत्कालीन रक्षा  मंत्री मेनन की कुर्सी चली गयी लेकिन जनता की अदालत में जाने के बाद वह नेहरु के कहने पर मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए गए | शास्त्री वाले दौर में भी नैतिकता थी जब रेल दुर्घटना के बाद वह खुद से इस्तीफा दे दिया करते थे लेकिन आज जनता से नेताओ का कोई सरोकार नहीं रह गया है |शायद तभी मनमोहन कई कैबिनेट मंत्रियो का बचाव करते हैं तो उनका इकबाल कमजोर होना लाजमी ही है |


 रेलवे  के हालिया घूसकाण्ड ने यह साबित किया है इस देश में किस तरह नौकरी पाने से लेकर प्रमोशन तक  में लाखो का खुला खेल होता है |
आरोपी विजय सिंगला पवन बंसल का भांजा है  और रेलवे में मामा की रसूख और  मंत्री पद की ठसक का इस्तेमाल कर उसने  करोडो का  साम्राज्य खड़ा कर लिया | ईट भट्टी से किराये के मकान में अस्सी के दशक में अपना सफ़र शुरू करने वाला सिंगला आज जेडीएल  इन्फ्रा , एक्रोपोलिस , रेडेंट सीमेंट सरीखी  दर्जनों कंपनियों को चला रहा है और मजेदार बात यह है कि इन सभी का पता 64 सेक्टर 28  A है जो खुद पवन बंसल का निवास है | मदनमोहन ,विक्रम,विजय के अलावा कंपनियों में पवन की  पत्नी की भी संलिप्तता उजागर हो रही है | सिंगला की कंपनी जिसका  २००७ में टर्न ओवर शून्य  रहा वह साल दर साल बंसल के केंद्र  में मंत्री बनने के बाद मुनाफा कमाती गई |  मामा के आज रेल मंत्री तक पहुँचने के बाद यह मुनाफा 152 करोड़ पार कर चुका है |  पवन बंसल भले ही पूरे मामले में  कारोबारी रिश्ते से  इनकार कर रहे हैं लेकिन बताया  जा रहा है भांजा सिंगला अपने मामा से मिलने बेरोकटोक रेल भवन जाता था जहाँ उसे किसी तरह के पास की भी जरूरत नहीं होती थी | 

नैतिकता का तकाजा तो यह है भांजे का नाम  आने के  बाद पवन बंसल खुद  इस्तीफा दे देते लेकिन दस जनपथ की कांग्रेस  वाली चौकड़ी आगामी राज्यों के चुनावो और लोक सभा चुनावो को देखते हुए कोई  खतरा मोल नहीं लेना चाहती क्युकि अगर बंसल जाते हैं तो इसके बाद अश्विनी कुमार से लेकर खुर्शीद , जायसवाल से लेकर प्रधानमंत्री सभी के विकेट गिरने का खतरा बन रहा है | ऐसे में चुनावी  में साल में प्रधान मंत्री के इस्तीफे से कांग्रेस की खासी किरकिरी होगी ऐसे में वह आक्रामक होकर विपक्ष के सवालों का जवाब जांच में खोजती दिख रही है | इस दौर में मनमोहन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है | आखिर कामनवेल्थ घोटालो के बाद क्यों नहीं उन्होंने इस लूट खसोट पर लगाम लगाने की दिशा में अपने कदम आगे बढाये ? यू पी ए पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप बहुत संगीन हैं अगर जांच बारीकी से निष्पक्ष रूप में हो तो इसके  फेरे मे कई मंत्री और  इनके  नाते रिश्तेदार आ सकते हैं | लेकिन क्या कीजियेगा  लोक तंत्र में आज शालीनता  और नैतिकता नाम की कोई  चीज  बची नहीं है  और ना ही लाल बहादुर शास्त्री ,माधव राव सिंधिया , आडवानी – अटल वाली बिसात   जिसकी लीक पर  चलने का भरोसा कोई दिखा सके | इस दौर में  लोकतंत्र का मतलब एक बार जनादेश पाकर आखें   मूदकर बैठना और  कुर्सी बचाने के लिए तरह तरह के जतन करना बन गया है शायद तभी कांग्रेस भी अपने मंत्रियो का दामन  पाक साफ़ बताने पर तुली है और  कारोबारी रिश्तो के ना होने की बात दोहराकर अपना रास्ता आगामी चुनावो के लिए किसी तरह साफ़ करना चाह रही है जबकि असल में इस सरकार का कोई इकबाल अब बचा नहीं है और दिनों दिन इसकी विश्वसनीयता गिर रही है | आजादी के बाद जहाँ पहली बार किसी सरकार के कई कैबिनेट मंत्रियो पर  भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगे वहीँ सी वी सी से  लेकर सी बी आई की निष्पक्षता को लेकर पहली बार सवाल उठे और सुप्रीम कोर्ट तक ने सरकार की हीलाहवाली को लेकर तल्ख़ टिप्पणिया की जिसके बाद यह सरकार नींद से जागी | यही नहीं कैग सरीखी संवैधानिक संस्थाओ की रिपोर्ट सरकार समय समय पर ख़ारिज करती रही |  और तो और जे पी सी की रिपोर्ट  पर भी पहली बार उसके सदस्य ही सवाल उठाने लगे | इतना सब होने के बाद  भी यह सरकार जनता द्वारा उसे पांच साल के लिए दिए गए जनादेश का राग अलापती रही |  जब तक सुप्रीम  कोर्ट ने तल्ख़  तेवर नहीं दिखाए तब तक वह नहीं जागी |

मनमोहन की तर्ज पर सफेद कुर्ते में रहने  वाले पवन बंसल की गिनती आम तौर पर शालीन और सुलझे हुए नेता के तौर पर अब तक  होती रही है लेकिन भांजे की करतूतों ने उनके कुर्ते पर रेलवे घूसकाण्ड की ऐसी कालिख पोत दी है जिससे आने वाले दिनों में उनके राजनीतिक करियर पर ग्रहण लग सकता है |

रेलवे की पहचान पूरे देश को जोड़ने वाले विशाल नेटवर्क के रूप में है लेकिन इस घूसकाण्ड के अलावे यह मामला आम आदमी से भी जुड़ा है क्युकि इस पद की  निगरानी में उपकरणों खरीद फरोख्त होती आई है |इस मामले में सी बी आई ने पहली बार बिना दबाव के कार्य करते हुए  रेल मंत्री के रिश्तेदारों को रंगे हाथो पकड़कर एक नई  मिसाल कायम की है |  आमतौर पर सी बी आई  पर सरकार के हाथ की कठपुतली होने के आरोप लगाये जाते रहे हैं जिससे जनता में भी उसकी निष्पक्षता को लेकर सवाल कई दशको से उठते रहे हैं लेकिन रेलगेट और कोलगेट के आसरे वह जनता के बीच अपनी  छवि निष्पक्ष रूप में पेश कर सकती है | बस निष्पक्ष जांच का हौंसला  चाहिए जो सरकारी दखल से दूर हो | 

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

" नमो " पर भारी " राग आडवाणी "

2009 के लोकसभा चुनावों का मौसम याद कीजिए। तब पीएम इन वेटिंग का राग भाजपा में उफान पर था लेकिन आज ऐसी कोई कार्ययोजना भाजपा की वार रूम पालिटिक्स में शामिल नहीं है। अटल बिहारी के सन्यास के बाद भाजपा ने तब आडवाणी के चेहरे को मतदाताओं के सामने पेश किया था लेकिन इस बार मसला पेचीदा हो चला है क्योंकि गुजरात चुनाव में लगातार तीन जीत दर्ज कराने के बाद मोदी की नजरें दिल्ली पर लगी हुई है और गुजरात की  चौकड़ी  के साथ उनकी भाजपा संसदीय बोर्ड में धमाकेदार इन्ट्री हो चुकी है । पार्टी का एक खेमा जहां 2014 में मोदी के नाम के साथ चुनौती वैतरणी पार करने के मूड में दिख रहा है वहीं गठबंधन दौर में मोदी को आगे करने पर एनडीए में बिखराव भी तय दिख रहा है जिससे 2014 की चुनावी बिसात दिलचस्प मोड़ पर आ खड़ी हुई है।

    राजग में इस समय बाजपेयी के उत्तराधिकारी को लेकर खींचतान मची है। ‘वाइब्रेट गुजरात‘ के लाख दावों और हवा के बीच राजग में मोदी की राह आसान नहीं लग रही। उनके नेतत्व को इस दौर में न केवल अपनी  पार्टी भाजपा के वरिष्ठ नेताओं से ही चुनौती नहीं मिल रही है वरन जदयू, शिवसेना सरीखे भाजपा के पुराने साथी भी आंखे  तरेर रहे हैं। ‘नमों‘ का जाप  भले ही भाजपा का एक बड़ा  कैडर इस दौर में कर रहा हो लेकिन नीतिश कुमार ‘नमों‘ की राह में सबसे बड़ा खतरा है जिनके समर्थक उनकी दिक्कतों को बढ़ा सकते हैं।

पिछले दिनों जनता दल यूनाइटेड ने अपने दिल्ली के अधिवेशन में नरेन्द्र मोदी का नाम लिये बगैर जिस तरह भाजपा पर सीधे निशाना साधा  उसने लोकसभा चुनावों से ठीक पहले एनडीए में प्रधानमंत्री पद के संकट को बढ़ाने का काम किया है। जदयू के बाद अब शिवसेना ने भी भाजपा पर एनडीए का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार जल्द घोषित करने की मांग कर डाली है जिसने एक नई  हलचल एनडीए में शुरू कर दी है। शायद इसी वजह से आडवानी के घर एनडीए की कोर कमेटी अपना मंथन शुरू कर रही है।

  
 अटल बिहारी अपने करिश्माई और उदार व्यक्तित्व के चलते अपने दौर में  विरोधियों को पटखनी देने की कला में निपुण थे वहीं उस दौर में अपने आसरे उन्होंने गठबंधन की बिसात  को बिछाकर पहली बार एक नई  राजनीतिक लकीर खींचने का काम किया। उनके राजनीति से सन्यास के बाद अब भाजपा के किसी नेता में अटल सरीखी बात नही रही। नरेन्द्र मोदी कारपोरेट, मध्यम वर्ग और भाजपा के कैडर में भले ही जान फूंक सकते हैं लेकिन गोधरा का जिन्न उनकी भावी राजनीति की राह में ऐसा रोड़ा  है जो प्रधानमंत्री पद के लिए एनडीए में टूट पैदा कर सकता हे। वहीं सुषमा से लेकर जेटली और खुद राजनाथ से लेकर डा0 जोशी में वह जोश नहीं जो चुनावी साल में लोकसभा सीटें भाजपा की बढ़ा पाएं । इन सबके बीच इन दिनों भाजपा में प्रधानमंत्री पद को लेकर अंदरखाने  जबरदस्त जंग  चल रही है।
  
 जिन्ना विवाद के बाद जहां आडवाणी संघ की नजरों से उतर गये वहीं 2009 में उन्हीं को आगे कर भाजपा 15वीं लोकसभा के समर में कूदी जहां उसे मुंह की खानी पड़ी जिसके बाद भाजपा में आडवाणी की भूमिका सलाहकारों जैसी कर दी गई लेकिन पर्दे के पीछे रहकर भी भले ही इस दौर में भाजपा में नमों का नाम जोर शोर से उछल रहा है लेकिन मोदी की उग्र हिन्दुत्व वाली छवि के चलते कई पुराने सहयोगी एनडीए का साथ न केवल छोड़ सकते हैं बल्कि नये सहयोगी भी साथ आने से पहले दस बार सोचेंगे। ऐसे में आडवाणी के सितारे 2014 में बुलन्दियों में जाने के आसार  अभी से नजर आ रहे हैं। पिछले दिनों जदयू ने इशारों इशारो  में मोदी से परहेज कर जहां आडवाणी के नाम को आगे किया तो वहीं शिवसेना ने भी दो कदम आगे जाकर आडवाणी के नाम पर रजामंदी के संकेत दिखाए हैं। इसने इन बातों को बल दिया है आडवाणी को आगे करने से 2014  में भाजपा नहीं वरन एनडीए का दायरा बढ़ा सकता है बल्कि सरकार बनाने के लिए बहुमत सहयोगियों के जरिये जुटाया जा सकता है। नमों के मुकाबले आडवाणी न केवल एनडीए का भरोसा जीत सकते हैं बल्कि सुषमा से लेकर जेटली, वैंकेय्या से लेकर अनन्त कुमार और खुद राजनाथ से लेकर डा0 जोशी उनके नाम पर किसी तरह का रोड़ा नहीं अटकायेंगे। हिन्दुत्व व सेकुलारवादी रास्ते पर चलना उनके लिए मोदी के मुकाबले ज्यादा आसान होगा साथ ही बाजपेयी की तर्ज पर वह अपनी ईमानदारी के जरिये एनडीए का भरोसा भी जीत सकते हैं।
   
बीते दौर में जिन्ना विवाद के समय जब आडवाणी संघ के सीधे निशाने पर थे तो जदयू और टीडीपी ने तहे दिल से आडवाणी के बयान का समर्थन किया था जबकि जार्ज फर्नाडीज ने तब आडवाणी की तारीफों में कसीदे हम उनके साथ हैं कहकर पढ़े। यही नहीं तब नीतीश कुमार और चन्द्रबाबू नायडू ने आडवाणी को बचाने की पूरी कोशिशें की थी जिसके बाद एनडीए में आडवाणी की उम्मीदवारी को लेकर किसी तरह का पेंच नहीं अटका और सभी ने तहे दिल से आडवाणी को अपना नेता मान लिया। इस बार मोदी के मुकाबले आडवाणी के लिए 2014 की जमीन ज्यादा मुफीद लग रही है। मोदी को रोकने के लिए अगर आडवाणी   खूंटा गाड़कर खड़े हो जाते हैं तो एनडीए के पुराने सहयोगी  तो साथ रहेंगे ही नये साथी भी चुनाव के बाद जुड़ सकते हैं। यूपीए-2 की तमाम विफलताएं इस समय किसी से छिपी नहीं है। भ्रष्टाचार, महंगाई के दर्द से देश का आम वोटर कराह रहा है और यही 2014 में एनडीए का सबसे बड़ा मुद्दा बन सकता है। मोदी के नाम को आगे कर भाजपा भले ही 200 सीटें ले आये लेकिन पूर्ण बहुमत के जुगाड़ के लिए उसे सहयोगियों पर ही निर्भर होना पड़ेगा इससे बेहतर विकल्प यह है कि भाजपा 150 से 170 तक ही सिमट जाये तो आडवाणी अपने आसरे नये पुराने सहयोगियों को साथ लेकर मिशन दिल्ली पूरा कर सकते हैं । जानकारों की मानें तो चुनावों में आडवाणी ही भाजपा के सर्वमान्य नेता रहेंगे लेकिन कुछ लोग जबरन नमो-नमो राग को हवा दे रहे हैं।
   
भाजपा के भीतर इस समय एक नये सत्ता केन्द्र के रूप में राजनाथ सिंह का नाम भी उभर रहा है क्योंकि संघ का शुरूवात से उन पर खासा वरदहस्त रहा है। मोहन भागवत से लेकर संघ और भाजपा का एक बड़ा कैडर उनके हर फैसले पर साथ है जो उन्हें डार्क हार्स तो बना ही रहा है। शायद इसी के चलते दूसरी पंक्ति के नेता होने के बावजूद दिल्ली की डी  कंपनी वाली चौकड़ी को नकारकर वह संघ का भरोसा जीतने में कामयाब रहे हैं। यही वजह है दुबारा संघ ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर बिठाया। राजनाथ सिंह के पिछले कार्यकाल में भाजपा भले ही 2009 का लोकसभा चुनाव हार गई  लेकिन उन्होंने संघ को भी नजरअंदाज नहीं किया। वर्तमान में वह भी आडवाणी को अटल  बिहारी के बाद भाजपा का सबसे बड़ा नेता मान रहे हैं। वह जानते हैं अगर नमो की हवा हवा ही रह जाती है और खुद उनके नाम पर एनडीए का कुनबा नहीं बढ़ता है तो भाजपा में आडवाणी ही वह शख्स हैं जो एनडीए का दायरा बढ़ाकर यूपीए के विजयरथ को रोक सकते हैं। असल में भाजपा आज जहां खड़ी है वहां आडवाणी को मेहनत को हम नहीं नकार सकते। शायद यही वजह है इस दौर में नेताजी भी उनकी ईमानदारी के कसीदे कांग्रेस को आईना दिखाने के लिए पड़ रहे हैं। 1968 में दीनदयाल उपाध्याय के बाद से आडवाणी ही भाजपा संगठन को नेतृत्व व दिशा देते रहे हैं। बाजपेयी के बाद स्वाभाविक तौर पर भाजपा में वह सर्वमान्य नेता थे। आज भी हैं और शायद आगे भी रहें। जिन्ना विवाद के बाद भले ही संघ ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा लिया लेकिन 2009 में फिर उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए आगे किया। आज भी भाजपा में बिना आडवाणी से राय लिये बिना पत्ता भी नहीं हिलता। हाल ही में गडकरी की दुबारा अध्यक्ष पद पर आडवाणी की राय को तवज्जो मिली जो बताता है संघ भी इस दौर में आडवाणी को अनदेखा किये बिना नहीं चल सकता। राजनाथ सिंह दूसरी बार राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर भले ही बैठ गये हो लेकिन वह भी आडवाणी को विश्वास में लिये बिना नहीं चल सकते। नमो के मुकाबले राजग में आडवाणी की छवि ज्यादा स्वीकार्य दिख रही है। यह दौर गठबन्धन का है और सरकारे भी साझा कार्यक्रमों की  छाँव  में चला करती है। आडवाणी का लम्बा राजनैतिक अनुभव भावी सरकार को कुशल नेतृत्व दे सकता है। आने वाले दिनों में एनडीए का कुनबा मोदी के नाम पर अगर बिखरता है तो आडवाणी ही ऐसा नाम है जो बिखराव को रोक सकते है। भाजपा की नजरे फिलहाल मध्यप्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, राज्यस्थान के विधान सभा चुनावों  पर टिकी है जहां के चुनावी परिणाम बहती हवा का थोड़ा बहुत  अहसास तो पार्टी को करवा ही देंगे। अगर पार्टी यहां अच्छा करती है तो हवा के रूख के मद्देनजर भाजपा पीएम पद के लिये अपने पत्ते खोल सकती है। वर्तमान में कोई दल अपने बूते सरकार नहीं बना सकता। भाजपा के सामने भी 2014 में यही असल चुनौती है जहां उसे उसके सहयोगी ही पहुंचा सकते है। नये-पुराने सहयोगी भी भाजपा की नई राह 2014 में खोलेंगे बशर्ते ऐसे नेता को पार्टी प्रधान मंत्री पद के लिये प्रोजेक्ट करे जो सब को साथ लेकर चले और सेकुलर छवि का हो। अगर आडवाणी खुद प्रधानमंत्री पद के लिये रजामंद हो जाते है तो भाजपा, संघ क्या एनडीए में भी आडवाणी सरीखा कोई विकल्प इस दौर में मौजूद नहीं है।



सोमवार, 8 अप्रैल 2013

अलविदा ....आयरन लेडी



“मुझे थैचर की मृत्यु से गहरा दुःख पहुंचा है | हमने एक दूर द्रष्टा नेता खो दिया है’’  | ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरून ने कुछ इन्ही शब्दों के साथ अपने प्रधानमंत्री को आखरी विदाई दी | बीते सोमवार को ब्रिटेन के हर नागरिक की आँखें नम हो गई जब उन्होंने अपने प्रिय नेता की मौत का समाचार सुना | अपने प्रिय नेता को खोने का गम कैसा होता है यह ब्रिटेन की इकलौती महिला प्रधानमंत्री रही मार्गेट थैचर की मृत्यु से समझा जा सकता है | ब्रिटेन की राजनीती में आयरन लेडी का जो मकाम थैचर ने अपने आसरे गढा उसको छू पाना किसी भी नेता के लिए भविष्य में आसान नहीं लगता |

 आयरन लेडी के नाम से मशहूर थैचर की समकालीन विश्व राजनीती पर पकड़ कॉ अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बीसवी सदी की सबसे सशक्त शख्सियतो में उनका नाम उस दौर में शुमार था | अपनी राजनीतिक पारी में तीन बार जीत की हेट्रिक लगाने वाली थैचर ने १९७९ से १९९० तक के दौर में ब्रिटेन को ना केवल कुशल नेतृत्व प्रदान किया बल्कि उस दौर में कंजरवेटिव पार्टी की बिसात को अपने करिश्मे से नया आयाम दिया और सबसे लंबे वक्त तक ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बन इतिहास के पन्नों में अपने को अमर कर दिया | थैचर ने अपने अंदाज में जहाँ राजनीतिक लीक पर चलने का साहस दिखाया वहीँ तमाम कयासो को धता बताते हुए अपने विचारों और समझ बूझ के साथ राजनीती की रपटीली राहों में अपना रास्ता खुदबखुद तैयार किया और शायद यही वजह रही उनके सिद्धांतों को उस दौर में थैचरिज्म नाम दे दिया गया |

शुरुवात में थैचर की राजनीती में रूचि नहीं थी लेकिन १९५९ में संसद बनकर उन्होंने राजनीति के मिजाज को अपने अंदाज में ना केवल जिया बल्कि समझ बूझ से राजनीती की बिसात को बिछाया | १९७५ में जब पूर्व प्रधानमंत्री एडवर्ड हीथ को उनकी ही पार्टी ने पद से बेदखल कर दिया तब वह मजबूत नेता के तौर पर कंजरवेटिव पार्टी में उभर कर सबके सामने आई और उनका लोहा हर किसी को मानना पड़ा | यही वजह थी १९७९, १९८३ और १९८७ के चुनाव में ताबड़तोड़ जीत की हैट्रिक  बनवाकर थैचर ने अपने को ब्रिटेन के साथ ही विश्व की राजनीती में मजबूत नेता के तौर पर उभारा | सत्तर के दशक को कोई नहीं भूल सकता जब रूस की व्यापक आलोचना के मसले पर उनके द्वारा एक शानदार भाषण दिया गया जिसके चलते रूस ने उनको आयरन लेडी का खिताब देना पड़ा |

शीत युद्ध का दौर भी हर किसी के जेहन में बना है | उस समय पूरा विश्व दो गुटों में बट गया था | एक गुट का नेतृत्व अमेरिका कर रहा था तो सोवियत संघ भी उस दौर में सुधारों की प्रक्रिया से गुजर रहा था | ब्रिटेन उस दौर में अमेरिका का साथी बना | उस दौर में रीगन और जार्ज एच  बुश के साथ उनकी खूब जमी | थैचर ने अपने लंबे कार्यकाल में ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था ने नयी जान फूंकी और कई सरकारी योजनाओं का निजीकरण किया | उस दौर में भारत में जहाँ आर्थिक सुधारों की शुरुवात नरसिंह राव शासन में शुरू हुई तो वित्त मंत्री की कमान मनमोहन सिंह ने थामी थी तो वहीँ थैचर  ने ब्रिटेन में आर्थिक सुधारों का झंडा उठाकर अर्थव्यवस्था को नया आयाम दिया | थैचर के शासन में सोवियत संघ का विभाजन हुआ तब पूँजीवाद हावी हो गया और साम्यवाद का ग्राफ गिरने लगा | थैचर ने अपनी नीतियों के आसरे आर्थिक सुधार मुक्त अर्थव्यवस्था की शक्ल में ढालकर किये  और ब्रिटेन में पूँजीवाद को प्रधानता देने का काम किया | 

अस्सी के दशक में अर्जेंटीना के फाकलैंड आयलैंड में दखल के बाद कई सलाहकारों ने थैचर से कहा आप इस समस्या पर हाथ ना डालिए लेकिन थैचर ने अपने दिल की सुनी और इस समस्या को सुलझा लिया  और द्वीप हासिल किया | थैचर की गिनती उस दौर में रीगन से लेकर गौर्वाचौव सरीखे नेताओ के साथ अगर होती थी तो इसके पीछे उनकी राजनीतिक सूझ बूझ जिम्मेदार थी और शायद इसी सूझबूझ ने उन्हें उस दौर में ताकतवर और कद्दावर महिला प्रधानमंत्री के रूप में विश्व की राजनीती में चर्चित कर दिया | उनकी मृत्यु से ब्रिटेन और विश्व ने एक ऐसा महान नेता खो दिया है  जिसके मन में कुछ अलग करने का जज्बा था जिसकी भरपाई करना आसान  भी नहीं रहेगा | राजनीती के अखाड़े में ऐसे मुकाम बहुत कम नेता पा पाते हैं | सच कहें तो कुशल राजनेता वह है जो भीड़ की नब्ज पकड़ना जानता है  और थैचर की गिनती इसी श्रेणी में होती थी और यही चीज राजनीती में उनको सही मायनों में आयरन लेडी बनाती थी |



रविवार, 31 मार्च 2013

बिछने लगी नेताजी की राजनीतिक बिसात ........

     क्या यू पी ए - २ अपना मौजूदा कार्यकाल सही से  पूरा कर पाएगी ? क्या आम लोक सभा  चुनाव  देश  में समय से ही होंगे ? क्या तृणमूल,  झारखण्ड विकास मोर्चा और द्रमुक  के बाद यू पी ए २ सरकार  से समर्थन वापस लेने वालो की जमात में कोई अन्य  सहयोगी तो शामिल  नहीं होंगे ? यह ऐसे सवाल हैं जो सियासी गलियारों में पिछले कुछ समय से सभी को परेशान  किये हुए हैं क्युकि  सैफई में होली मिलन कार्यक्रम के दौरान मुलायम सिंह ने  कांग्रेस  को लेकर  जिस  तरह की तल्ख़ भाषा  का इस्तेमाल किया उससे  यू पी ए २ का संकट  फिर  से गहराने   के आसार  दिखाई  दे रहे हैं ।  

नेताजी ने कांग्रेस को लेकर राजनीतिक लकीर खींचने की कोशिश यह कहते हुए खींची  कि  वह इस दौर में पीएम पद की  रेस  में नहीं हैं तो उन्होंने कांग्रेस पर हमला बोलते  हुए  कहा साथ देने वाले दोस्तों पर भी कांग्रेस को भरोसा नहीं रहता । यही नहीं तीन कदम आगे जाकर मुलायम ने कांग्रेस पर भय दिखाकर समर्थन लेने के आरोप लगाने के साथ ही इस बार कांग्रेस सरकार को घोटालो  की सरकार करार दे दिया  । यही नहीं सेकुलिरिज्म पर कांग्रेस के तमाशबीन होने के आरोपों की बौछार से यह सवाल गहरा गया है इन सबके पीछे नेता जी की मंशा आखिर क्या है ?  दरअसल अगले लोक सभा चुनावो  से पहले इसका एकमात्र उद्देश्य कांग्रेस से दूरी बनाकर चलने के साथ ही राष्ट्रीय  राजनीती में सपा  को किंग मेकर बनाना और गैर कांग्रेसी ,  गैर भाजपाई मोर्चे की अगुवाई करना  हो सकता है ।  

 
 २ ० १ ४ से ठीक पहले नेताजी कुछ ऐसी खिचड़ी पकाना चाह रहे हैं जिससे भाजपा और कांग्रेस  दोनों  दलों से इतर एक नयी मोर्चाबंदी केंद्र  में शुरू हो जिसकी कमान वह खुद अपने हाथो में लेकर  सरकार बनाने का दावा  पेश कर सकें ।  १ १ ९ ६ में जब नरसिंहराव सरकार से लोगो का मोहभंग हो गया तो नेताजी ही वह शख्स  थे जिसने समाजवादियो , वामपंथियों, लोहियावादी विचारधारा के लोगो को एक साथ   लाकर उस दौर में शरद पवार के साथ मिलकर एक नई  बिसात केंद्र की राजनीती में चंद्रशेखर को  आगे लाकर बिछाई थी । उसी तर्ज पर अब नेताजी कांग्रेस को ठेंगा दिखाते हुए अकेला चलो रे का राग अपना रहे हैं साथ में तीसरे मोर्चे के लिए भी हामी भरते दिख रहे हैं ।  १७  बरस बाद  नेताजी गैर भाजपाई और गैर कांग्रेसी मोर्चे के लिए अपनी शतरंजी बिसात बिछाने में लग गए हैं । अगर उत्तर प्रदेश में सपा पचास से अधिक लोक सभा सीट जीत जाती है तो नेताजी की कृष्ण मेनन मार्ग से ७ रेस  कोर्स की राह आसान  हो  सकती है ।  लेकिन असल परीक्षा तो यू पी में  है क्युकि  दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही गुजरता है । वर्तमान में सपा के 22   संसद हैं और नेताजी अपने सांसदों की संख्या आगामी लोक सभा चुनावो में बढाने के लिए अपना हर दाव  खेलने की तैयारी में दिखाई दे रहे हैं ।


जवानी में  पहलवानी के अखाड़े में अपना जोश दिखाने वाले नेताजी इस बार विपक्षियो को मात देने के लिये अपना हर दाव खेलने की तैयारी में हैं जिससे समाजवादी पार्टी को उत्तर प्रदेश के साथ अन्य  राज्यों में बदत मिल सके । नेताजी के निशाने पर अब आगामी लोक सभा चुनाव हैं यही वजह है उन्होंने पिछले कुछ समय से राष्ट्रीय राजनीती में अपनी पारिवारिक विरासत को स्थापित करने के लिए जोर आजमाईश शुरू कर दी थी । शिवपाल से लेकर रामगोपाल , धर्मेन्द्र यादव से लेकर डिंपल यादव  अगर आज राजनीती में हैं तो इसके पीछे नेताजी की राजनीतिक बिसात ही है जिसके बूते वह लोक सभा चुनावो में समाजवादी पार्टी की मजबूती चाह रहे हैं चाहे इसके लिए उन्हें अपने  पूरे परिवार को ही आगे क्यों ना करना पड़  जाए । 


मुलायम की मुश्किल इस समय यह है उत्तर प्रदेश सरीखे बड़े राज्यों के अलावा सपा का अन्य  राज्यों में कुछ ख़ास जनाधार नहीं है और वह इन राज्यों में कुछ करिश्मा भी अब तक नहीं कर पायी है । आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश में जहाँ उनकी  कोशिश लोक सभा की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतना इस दौर में बन रही  है वहीँ अन्य  राज्यों को लेकर भी माथे पर चिंता की लकीरें हैं क्युकि  यू पी के अलावे अन्य  राज्यों   में सपा का संगठन लचर है । ऐसे में उनके सामने दो ही संभावनाये बन रही है या तो वह कांग्रेस के साथ  फिर जाए या फिर अपने बूते ही गैर भाजपा और गैर कांग्रेस के नारे के आसरे अपने लिए केन्द्र  की सत्ता का रास्ता साफ़ करें । मौजूदा दौर में कांग्रेस की पतली हालत के चलते सपा अपने बूते ही आगे  का रास्ता   तय करेगी लिहाजा कांग्रेस के साथ जाने का विकल्प तो बंद होता दिख रहा है । इन दिनों सपा के हर छोटे बड़े नेता की तरफ से जिस तरह यू पी ए  सरकार को कभी भी गिराने के बयान  सामने आ रहे हैं उससे यह संभावना भी बन रही है  यू  पी ए --२ सपा की बैसाखियों पर अब ज्यादा दिन नहीं चल सकती । नेताजी अपने 22   सांसदों के दम पर कभी भी मनमोहन सरकार को गिरा  सकते हैं ।
 
बीते दिनों ताबड़तोड़  अंदाज में केन्द्रीय मंत्री  बेनी प्रसाद ने  नेताजी को जिस तरह निशाने पर लिया है उससे सपा के हर कार्यकर्ता में नाराजगी बढ़  गई है और वह नेताजी के जरिये मनमोहन सरकार को गिराने का दबाव बना रहे हैं जिस पर मुलायम सिंह को फ्री हैण्ड मिल चुका  है । लोक सभा चुनाव की तैयारियों के चलते यह तो साफ़ ही लग रहा है नेताजी अब जल्द चुनावो का जुआ खेलना चाह रहे हैं । वह काग्रेस के भ्रष्टाचार के दागो को अब ज्यादा धो पाने की स्थिति में  भी नहीं दिख रहे हैं ।  ज्यादा समय तक कांग्रेस के साथ जाने से सपा के वोट बैंक को भारी  नुकसान उठाना पड़  सकता है । इस दौर में मुलायम सिंह जहाँ कांग्रेस से मेलजोल बढाने के बजाए सीधे उसे निशाने पर लेने के साथ ही दूरियां बना रहे हैं वहीँ इशारो इशारो में तीसरे मोर्चे का राग अलाप  रहे हैं । यही नहीं कांग्रेस को आईना  दिखाने की मुहिम  के तहत वह लाल कृष्ण आडवानी की तारीफों में कसीदे पड़ने से पीछे नहीं हट रहे हैं । अपनी राजनीतिक बिसात  के मद्देनजर  नेताजी अखिलेश सरकार को भी निशाने पर लेने से नहीं चूक रहे है क्युकि  एंटी इनकम्बेंसी के मिजाज  को मुलायम ने यू  पी में विपक्ष  में रहते हुए  महसूस   किया  हैं  यही  वजह है वह क़ानून व्यवस्था के नाम पर अपनी नाराजगी उत्तर प्रदेश को लेकर कई बार जाहिर कर चुके हैं ।   
 अभी कुछ दिनों पहले  सैफई में होली मिलन के दौरान नेताजी ने मध्यावधि चुनावो के लिए नवंबर तक का वक्त दे दिया जो बतलाता है सपा ने आगामी लोक सभा चुनावो के लिए कमर कस ली है । यही वजह है ५६  लोक सभा प्रत्याशी तय करने के बाद अब उनकी नजरे जल्द शेष बचे  प्रत्याशी घोषित करने की है जो एक दो महीने में शायद पूरी कर दी जाएँ । राजनीती संभावनाओ का खेल है और नेताजी बड़े दूरदर्शी नेता हैं वह जान रहे हैं यही समय है जब अगर कांग्रेस भाजपा अगर दो सौ  से कम में सिमट कर रह गए तो सपा की अगुवाई में तीसरा मोर्चा दिल्ली में अपनी दस्तक दे सकता है । वैसे वामपंथी साथियो को भी अभी भी मुलायम में तीसरे मोर्चे की उम्मीदें  दिख रहीं हैं जिसका इजहार वह कई बार बड़े मंचो से कर चुके हैं । आडवानी तो पिछले साल ही तीसरे मोर्चे में एक उम्मीद अपने ब्लॉग में देख चुके हैं जिसमे मुलायम  सिंह  कड़ी का काम कर सकते हैं ।  कुश्ती के अखाड़े की तर्ज पर नेताजी आने वाले दिनों में कुछ ऐसा गणित भी फिट कर सकते हैं जिससे अगले लोक सभा चुनाव में
कांग्रेस को   उन्हें समर्थन देने को मजबूर होना पड़े । यही वजह है इस दौर में मुलायम  कांग्रेस की सरकार गिराना नहीं चाह रहे हैं । वैसे भी इस समय भाजपा और वामपथी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के खिलाफ हैं । अगर सपा अपना बाहर  से समर्थन यू पी ए  २ से वापस ले लेती है तो सरकार गिराने का कलंक मुलायम को  खुद ढोना पड़ेगा जिससे जनता में अच्छा  सन्देश नहीं जायेगा इसलिए मुलायम राजनीती का हर दाव  इस तरह से चल रहे हैं ताकि सांप  भी मर जाए और लाठी भी न टूटे ।


वर्तमान समय में मुलायम की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा उत्तर प्रदेश में होनी है । अखिलेश उत्तर प्रदेश में अपने हर चुनावी वादे को पूरा करने में लगे हुए हैं । विपक्ष अखिलेश सरकार में कानून व्यवस्था बदहाल होने के आरोप लगा रहा है साथ ही बीते दिनों प्रतापगढ  में जो कुछ घटा उसमे राजा भैया सरीखे बाहुबलियों की ठसक से समाजवादी सरकार की छवि  पर बदनुमा दाग लग गया है । अगर यही सब चलता रहा  तो आगामी दिनों में सपा का उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन फींका पड़  सकता है और अगर ज्यादा दिनों तक मुलयम  मनमोहन सरकार के साथ खड़े   होते हैं तो कांग्रेस की खराब  होती सेहद का असर खुद उनकी पार्टी पर भी पड  सकता है ।  शायद इसी के चलते मुलायम सोच समझ कर समझ बूझ  के साथ  अपनी शतरंजी चाल चल  रहे हैं । वह ऍफ़ डी  आई पर मनमोहन सरकार की नैय्या  पार लगाते हैं तो वहीँ कांग्रेस को घोटालो की सरकार कहने के साथ ही समर्थन वापसी की घुड़की भी  समय समय पर देते हैं लेकिन मनमोहन सरकार को गिराने का खतरा मोल नहीं लेना चाहते क्युकि  दूरदर्शी नेता रहे नेताजी जानते हैं अगर पासा उल्टा पड़  गया और मनमोहन किसी नए सहयोगी के बूते आई सी यू से अपने को बाहर निकालने में कामयाब हो जाते हैं तो पूरे  प्रकरण में  किरकिरी सपा  की ही होगी और आगामी लोक सभा चुनाव  से ठीक पहले सपा  के लिए यह अपशकुन साबित होगा ही साथ ही नेताजी के प्रधानमंत्री बनने  के सपनो को  शायद इस बार भी पंख नहीं लग पाएं ।

सोमवार, 25 मार्च 2013

सुरापान और कुमाऊं की होली ...

 होली आपसी प्रेम , भाईचारे और सदभाव का त्यौहार है ।  यह  मन में नई  उमंग और उत्साह का संचार करता है । जिस प्रकार पतझड़ के बाद बसंत  का आगमन  होता है उसी प्रकार फागुनी बयार के आते  ही एक उल्लास का माहौल हमें देखने को मिलता है । यूँ तो होली पूरे देश में और विदेश में उत्साह के साथ मनाई जाती है लेकिन इसे मनाये जाने के तौर तरीके भी अब समय  के साथ साथ बदल रहे हैं । होली मनाने के पीछे भी तमाम मान्यताये हैं । विष्णु को परम शत्रु मानने वाला हिरण्यकश्यप  जब किसी तरह प्रहलाद की प्रभु भक्ति में रुकावट नहीं  डाल  पाया तो उसने उसे मारने की ठानी ।  हिरण्यकश्यप की बहन होलिका जिसे वरदान मिला था वह जिसे भी गोद में बिठाएगी वह आग में भस्म हो जायेगा । होलिका ने भी प्रहलाद को गोद में बिठाया तो प्रहलाद तो बच गए होलिका भस्म हो गयी । तभी से होलिका दहन करने की परम्परा चल पड़ी । वैसे द्वापर युग में होली  का जिक्र आते ही राधा और कृष्ण की रास लीला भी सबकी जुबान पर आ जाती है जिसके आधार पर लोग बरसाने की तरह लोगो के बीच जाकर रंग डालते हैं । 
     

 देवभूमि उत्तराखंड की होली की पूरे देश में विशेष पहचान है । बसंत पंचमी से यहाँ पर होली की महफिले सजने लगती हैं ।  एकादशी से लगातार घर घर होली के मंगल गीत गाये जाने लगते हैं । होली  के छठे  दिन रंग की हिली खेली जाती है जिसे पहाडो में छरडी कहते हैं । होली के दिन घर घर जाकर लोग आलू के गुटके, ,गुजिया  सुपारी , सौंफ खाके गले मिलकर एक दूजे को बधाईया देते हैं और होली के गीतों की फुहार में झूमते हैं । पहाड़ो  में छरडी के अगले दिन देवर भाभी और जीजा साली का टिका होता है जिसमे सभी टीका लगाकर बधाई  देते हैं ।


 कुमाऊ में होली के अवसर पर घर घर में धूम देखी  जा सकती है ।  इसमें होलियार होली के गीत गाकर समाँ बांधते हैं तो वहीँ महिलाओ के स्वांग रचने के उदाहरण  भी देखने को मिलते हैं जहाँ  वह पुरुष वेश धारण कर खूब हसी और ठिठोली में डूबे रहते हैं ।  कुमाऊँ  अंचल में एकादशी के बाद से ही घर घर में महिलाओ की बैठकी होली शुरू हो जाती है । शहरों की अपेक्षा गावो में होली के मौके पर ख़ास चहल पहल देखने को मिलती है ।  मनी ऑर्डर  इकॉनमी पर आधारित पहाड़ में अधिकांश सैनिक जो देश की सेवा में दिन रात तत्पर रहते हैं वह भी होली के ख़ास मौके पर अपने गाव जाना नहीं भूलते जिसके चलते गावो में उनके आने से होली के त्यौहार में चार चाँद लग जाते हैं । होली और दिवाली पहाड़ में एक ऐसे त्यौहार हैं  हैं जब पूरा परिवार एकजुट रहता है । गावो में होली घर के आँगन में गाई  जाती है । आंगन  में लकडियो की धूनी जलाई जाती है जिसके पास एक व्यक्ति गले में ढोल बजाता है । पूरे गाँव के लोक गोल घेरे में झूमते हुए परिक्रमा करते हुए होली गाते हैं ।  गोल घेरे के मध्य में एक गाव का कोई बुजुर्ग पहले एक लाइन गाता है फिर उसका अनुसरण सभी लोग करते हैं । होली गाने वाले पहाड़ के ये सभी होलियार झूम झूमकर मस्ती से होली  करते हैं । एक ताल में जहाँ गीतों के बोल मिलते हैं वहीँ कदम भी एक साथ चलते, गिरते और उठते हैं । पहाड़ के गावो में खेली जाने वाली इस होली में गोल घेरे में महिलाये सम्मिलित नहीं होती बल्कि वह बैठकर पुरुषो की इस होली का आनंद लेती हैं ।


      पहाड़ में होली गायन  "सिद्धि को दाता  विघ्न विनाशन" गणेश वंदना से शुरू होता है । वही द्वादशी के दिन से रंग राग शुरू हो जाता है । मत जाओ पिया होली आय रही जैसे गीतों के जरिये जहाँ नायिका अपने पति को परदेश जाने से रोकती है वहीँ विरह की पीड़ा भी इस होली में "ठाडी जो हेरू बाट  म्यार सैय्या कब आवे" जैसे गीतों में होली का यह उत्साह चरम पर चला जाता है । पहाड़ो में अगर आप होली देखे तो यहाँ की होलिया ढलती  उम्र मे किसी भी व्यक्ति को युवावस्था की याद दिलाकर उसे अपने मोहपाश में जकड लेती हैं । कुमाऊं में छरडी  के पहले से ही  होली की जबरदस्त धूम घर घर में देखने को मिल जाती है । लोग अपना काम काज छोड़कर गाँवों में उत्साह के साथ होली के आयोजन में अपनी सहभागिता करते हैं । घर घर में होल्यारो की मंडलिया देर रात तक होली के गीतों में थिरकती रहती हैं ।  छरडी के दिन गले मिलकर लोग अपनी खुशियाँ बांटते हैं और नहाने धोने के बाद शाम को गाँवों में खड़ी  होली गायन करते हैं जो देर रात तक चलता है ।  अंत में लोग " केसरी रंग डारो  भिगावन को , सांवरी रंग डारो  भिगावन  को  " जैसे गीतों से परिवार के हर सदस्य को आशीष देते हैं ।


 उत्तराखंड में कई वर्षो पहले तक जो होली गाँवों में देखने को मिलती थी वह अब समाप्त होती जा रही है । हाल के वर्षो में रोजगार के अभाव में पहाड़ो से पलायन काफी बढ़ा है । खेती बाड़ी चौपट है तो जल जमीन जंगल के नाम पर लूट चल रही है । लोग महानगरो की तरफ रोजी रोटी की तलाश में बढ  रहे हैं जिससे होली जैसे त्यौहार भी अब  गावो में सिमटते जा रहे हैं क्युकि  इस दौर में समूची कवायद तो कॉर्पोरेट के आसरे विकास के चमचमाते सपने दिखाने में लगी हुई है और इन सबके बीच परम्परा को भी आधुनिकता का ग्रहण लग चुका  है । कुमाऊ  में गौरंग घाटी , चम्पावत, लोहाघाट और अल्मोड़ा की होली आज भी अपने अस्तित्व को बचाए हुए है  । एक दौर ऐसा भी था जब कुमाऊ  की इस होली की अलग पहचान थी और लोग इससे देखने के लिए लालायित रहते थे लेकिन अब माहौल पहले जैसा नहीं रहा । पहाड़  के गाव दिनों दिन खाली होते जा रहे हैं । युवा पीड़ी माल संस्कृति वाली हो गयी है । वह पहाड़ से जुड़ाव महसूस  नहीं करती  । शराब ने  नशा नहीं रोजगार दो के दौर में पहाड़ो को खोखला कर दिया था । अब होली के मौके पर भी सुरापान ट्रेंड अपने  चरम पर है । कच्ची शराब के कल कारखाने जहाँ  घर घर में फूलने लगे हैं वहीँ सूबे के मुखिया विजय बहुगुणा  ने शराब को बढ़ावा देने के लिए जिस तरह नीतिया यहाँ हाल के वर्षो में बनाई हैं उससे देवभूमि में अब हर चाय के ढाबे में  चाय कम सुरापान ज्यादा होने के आसार बन रहे  हैं । दस जनपथ की कृपा से  मुख्यमंत्री बने विजय बहुगुणा कॉपरेट और सिंडिकेट के आसरे उत्तराखंड में नई  बोतल में पुरानी शराब घर घर तक पहुचाने में  गए हैं । ऐसे में सरकार की नीयत पर सवाल उठने  लगे हैं । ऊपर से होली सरीखे  बड़े त्योहारों में भी देवभूमि में शराब की गंगा बहनी अब तय ही दिख रही है । अगर ऐसा हुआ तो उत्तराखंड में होली के  मौके पर  रंग में भंग पड़ना तय है और शराब के रंग के आगे इस बार की  होली के रंग भी फीके ही रहेंगे ।

रविवार, 3 मार्च 2013

कलह ने किया भाजपा को कमजोर .....


पार्टी विथ डिफरेंस जुमला भाजपा के बारे में जरुर कहा जाता है । इस पर अगर यकीन करें तो पार्टी में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ,और देश प्रेम का पाठ जोर शोर से हर कार्यकर्ता को ना केवल पढाया जाता है बल्कि संघ भी अपने अंदाज में राष्ट्रवाद के कसीदे पढ़कर दशको से एक नई लकीर अपने आसरे खींचता रहा है लेकिन आज भगवा खेमे में पहली बार हताशा का माहौल है । पार्टी में अब व्यक्ति की गिनती पहले होने लगी है । भगवा खेमे में इस बार हलचल ना केवल प्रधानमंत्री पद को पाने के लिए है बल्कि कांग्रेस से लगातार 2 लोक सभा चुनावो में हारने की कसक नेताओ में बरकरार है । अगर यही हालत रहे तो 2014 के लोकसभा चुनावो में भाजपा का प्रदर्शन फीका पड़ने के आसार अभी से ही दिखाई दे रहे हैं । जिस अनुशासन का हवाला देकर पार्टी अपने को दूसरो से अलग बताती थी आज वही अनुशासन पार्टी को अन्दर से कमजोर कर रहा है क्युकि अगले चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए जनता के बीच जाने के बजाए पार्टी प्रधानमंत्री के पद की किचकिच में उलझी है । उसे यह समझ नहीं आ रहा कैसे भाजपा की नैय्या 2014 में बिना अटल बिहारी के कैसे पार लगेगी ?


वर्तमान दौर में पहली बार भाजपा के अन्दर उथल पुथल है । यही कारण है बीते दिनों राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक में पार्टी ने सुशासन ,संकल्प और विकल्प का नारा ही दे डाला । यह अलग बात है पार्टी में अभी भी कलह थमने का नाम नहीं ले रही और इन सबके बीच पार्टी में अरुण जेटली के अलावे विजय गोयल, सुधांशु मित्तल, नितिन गडकरी जैसे नेताओ की फ़ोन टेपिंग का साया इस राष्ट्रीय कार्यकारणी में भी देखने को मिला है जो कहीं ना कहीं भाजपा के अन्तर्विरोध को एक बार फिर सबके सामने ला रहा है । मजेदार बात यह है राजनाथ के अध्यक्ष बनने से ठीक पहले भाजपा के कई नेताओ के फ़ोन टेप होने का मसला सामने आने से यह मसला दिलचस्प बन गया है जो पार्टी के भीतर तमाम सवालों को पैदा कर रहा है । गडकरी की विदाई के बाद लोगो को उम्मीद थी कि राजनाथ सिंह के अध्यक्ष बनने के बाद सब कुछ सामान्य हो जायेगा पर अभी तक वह अपनी टीम ही नहीं बना सके हैं । इस दौर में भाजपा के पास अपने अस्तित्व को बचाने की गहरी चुनौती है । उसके पुराने मुद्दे अब वोटर पर असर नहीं छोड़ पा रहे तो भावनात्मक मुद्दे भी लोगो को नहीं रिझा पा रहे । यू पी ए 2 की हर एक विफलता को भुनाने मे वह अब तक नाकामयाब ही रही है । हाल ही में उत्तराखंड , उत्तर प्रदेश और हिमांचल सरीखे राज्य उसके हाथ से निकल गए जहाँ वह अच्छा कर सकती थी वहीँ अन्य प्रदेशो में भी पार्टी बहुत अच्छी स्थितियों में नहीं है । हर राज्य में उसके छत्रप लगातार अपने दम पर मजबूत होते जा रहे हैं तो वही यही लोग अपने अंदाज में समय समय पर पार्टी को अपने अंदाज में ठेंगा भी दिखा रहे हैं । बीते कुछ समय पहले येदियुरप्पा और वसुंधरा राजे इसका नायाब उदाहरण रहे हैं वहीँ गुजरात में भाजपा नहीं मोदी लगातार जीत रहे हैं जो बतलाता है पार्टी में हर नेता अपने को पार्टी से बड़ा समझने लगा है जिसके चलते पार्टी 2014 में किसी नेता को प्रोजेक्ट करने से ना केवल डर रही है बल्कि मोदी को लेकर भी कमोवेश इस दौर में तस्वीर साफ़ होती नहीं दिख रही है क्युकि इससे एन डी ए के टूटने का खतरा बना हुआ है जबकि मोदी में ही पार्टी का बड़ा तबका 2014 में भाजपा के लिए नई उम्मीद देख रहा है ।

असल में भाजपा को सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के भीतर से ही मिल रही है । अटलबिहारी सरीखे करिश्माई नेता की कमी जहाँ भाजपा को इस दौर में खल रही है वहीँ 80 पार के आडवानी इस दौर में भी प्रधान मंत्री की कुर्सी का अपना मोह नहीं छोड़ पा रहे है । यह अलग बात है इशारो इशारो में आडवानी कहते रहे हैं पार्टी ने उन्हें बहुत कुछ दिया है अब किसी और चीज की चाह नहीं है लेकिन राजनीती का मिजाज ही कुछ ऐसा है व्यक्ति चाहकर भी इसका मोह नहीं छोड़ता । पिछले चुनाव मनमोहन को कमजोर बताने वाले आडवानी के नेतृत्व को देश का वोटर नकार चुका है लिहाजा पार्टी को आडवानी पर निर्भरता छोड़कर केवल उन्हें मार्गदर्शन तक सीमित रखतेहुए दूसरी पंक्ति के किसी नेता पर दाव 2014 में लगाना चाहिए लेकिन इस पर भी भाजपा से लेकर संघ में एका नहीं है क्युकि डी -4 की दिल्ली वाली चौकड़ी तो भागवत के निशाने पर उस दौर से ही है जिस दौर में गडकरी को महाराष्ट्र की राजनीती से पैराशूट की तर्ज पर दिल्ली में उतारा गया वहीँ सुषमा से लेकर जेटली , मोदी से लेकर राजनाथ सभी इस दौर में पीं एम् इन वेटिंग वाली आडवानी वाली लकीर पर चल निकले हैं लेकिन संघ के आशीर्वाद के बिना कोई भी इस पद को नहीं पा सकता । वहीँ इनका सपना भी तभी पूरा हो पायेगा जब 2014 के लोक सभा चुनावो में भाजपा 200 सीटें अपने दम पर पार करे जो इस समय दूर की गोटी ही दिख रही है । हमको तो यह बात हजम नहीं होती पिछले लोकसभा चुनावो में आडवानी ने कहा था अगर वह 2009 मे प्रधान मंत्री नहीं बन पाए तो वह राजनीती से सन्यास ही ले लेंगे लेकिन इस दौर में पार्टी आडवानी पर अपनी निर्भरता नहीं छोड़ पा रही । आडवानी ने चुनावो के बाद अपने को विपक्ष के नेता पद से दूर जरुर किया लेकिन सुषमा और जेटली को आगे कर अपना सबसे बड़ा दाव संघ के सामने ना केवल चला बल्कि जिस गडकरी को पिछली बार उन्होंने संघ के आसरे भाजपा के अध्यक्ष पद पर बिठाया था आज उन्ही को अपनी बिसात के जरिये दूसरा टर्म देने से रोका है जो आज भी साबित करता है आज भी भाजपा में आडवानी का सिक्का जोरो से चलता है । अब जैसे जैसे लोकसभा चुनाव पास आते जा रहे है आडवानी एक बार फिर से पुराने रंग में लौटते जा रहे हैं । हाल ही में उन्होंने पाकिस्तान को हैदराबाद बम धमाको में सीधा जिम्मेदार ठहराया है बल्कि समय समय पर बीते दौर में यू पी ए सरकार को भी अपने निशाने पर लिया है जो बताता है रेस कोर्स के लिए आडवानी आखरी जंग लड़ने के मूड में हैं और अगर खुद ना खास्ता भाजपा अच्छी सीटें नहीं ला पायी तो आडवानी का चेहरा ही ऐसा है जिस पर एन डी ए बिखरने से बच सकता है बल्कि अटल सरकार को छोड़कर गए पुराने पंछी भी फिर से जहाज पर सवार हो सकते हैं । लिहाजा आडवानी अंदरखाने अपने अंदाज में पार्टी के बीच अपना गणित बिठाने में लगे हुए हैं । वैसे भी आज भाजपा में आडवानी के रुतबे में कोई कमी नहीं आई है लिहाजा सुषमा,जेटली से लेकर शिवराज और रमन सिंह सरीखे मुख्यमंत्री उनकी उनकी सबसे बड़ी ताकत बने हुए हैं । पार्टी में आडवानी के नाम पर आज भी वैसी ही सर्व स्वीकार्यता है जैसी नेहरु गाँधी परिवार को लेकर कांग्रेस में है ।

बीते दौर को अगर याद करें तो दीनदयाल उपाध्याय , कुशाभाऊ ठाकरे, विजयराजे सिंधिया और अटल बिहारी सरीखे करिश्माई दिग्गज नेताओ का नाम जेहन में आता है जिनकी बदौलत भाजपा ने एक बड़ा मुकाम बनाया । उस दौर में पूरी पार्टी एकजुट थी । अहं का टकराव नहीं था लेकिन आज कैसा अंतर्कलह मचा हुआ है यह यशवंत सिन्हा द्वारा पार्टी फोरम से बाहर मोदी को पी एम बनाने , गडकरी को चुनौती देने के लिए खुद मैदान ए जंग में आने के बयानों से साफ झलका है ।वहीँ पार्टी अध्यक्ष द्वारा मीडिया में पी एम पद केलिए खुले तौर पर कुछ भी कहने से मनाही के बाद हर नेता पार्टी में अपने बयानों के नए तीर 2014 के चुनावो से पहले छोड़ रहा है जो बतलाता है भाजपा का मौजूदा संकट किस कदर गहराया हुआ है ? राजनाथ के आने के बाद भी पार्टी में आज कार्यकर्ताओ में वह जोश गायब है जो वाजपेयी वाले दौर में हमें देखने को मिलता था । पार्टी मे आज पंचसितारा संस्कृति हावी हो चुकी है । पार्टी का चाल,चलन और चेहरा आज बदल गया है । गडकरी के कार्यकाल में पार्टी के फंड मे सबसे ज्यादा रिकॉर्ड धन प्राप्त हुआ है जो बताता है भाजपा भी किस तरह इस दौर में कारपोरेट के आगे नतमस्तक है । कांग्रेस की तमाम बुराइया भाजपा ने आत्मसात जहाँ कर ली हैं वहीँ गुटबाजी में भी पार्टी ने कीर्तिमान ही तोड़ दिए हैं । पार्टी अपने मूल मुद्दों से भटक ही गई है । राम लहर पर सवार होकर उसने सत्ता सुख जरुर भोगा लेकिन अपने कार्यकाल में गठबंधन की मजबूरियां गिनाकर वह अपने एजेंडे से ही भटक गई । सत्ता की मलाई चाटते चाटते वह इतनी अंधी हो गई कि हिंदुत्व और एकात्म मानवतावाद रद्दी की टोकरी मे जहाँ चले गए वहीँ बाबूसिंह कुशवाहा सरीखे लोगो को उसने बीते दौर में ना केवल गले लगाया बल्कि येदियुरप्पा और निशंक सरीखे नेताओ के भ्रष्टाचार से आँखें मूँद ली । यही नहीं खंडूरी सरीखे जिस नेता को उन्होंने पिछले लोक सभा चुनावो में उत्तराखंड से हटा दिया और विधान सभा चुनावो से ३ माह पहले वापस बुलाकर अपनी भद्द ही कराई । बड़ा सवाल यह था अगर खंडूरी अच्छा काम उत्तराखंड में कर रहे थे तो उनको क्यों हटाया गया और फिर चुनाव पास आतेदेख पार्टी को उनकी याद क्यों आ गई ?यही बात वसुंधरा राजे केलिए भी लागू होती है । उनकी पिछली सरकार ने राजस्थान में अच्छा काम किया फिर भी राजनाथ ने अपने पहले कार्यकाल में उनको नेता प्रतिपक्ष पद से हटा दिया और संयोग देखिये अब राजस्थान में विधान सभा चुनावो में वही वसुंधरा पार्टी का बड़ा चेहरा होने जा रही हैं ?

भारतीय जनसंघ का दौर अलग था ।तब पार्टी के पास एक विजन था । 1977 में यह जनता पार्टी के साथ मिल गयी । इसके बाद १1979 में जनता पार्टी की सरकार गिरने के बाद 1980 मे भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ । 1984 में जहाँ पार्टी ने दो सीटें जीती वहीँ 1989 में 86 सीटो पर भगवा परचम लहराया । इसके बाद नब्बे का दशक आते आते पार्टी राम लहर में सवार हो गई जिसने 1996 में उसे सबसे बड़ी पार्टी बनाया । 1999 से 2004 तक भाजपा ने अटल के आसरे गठबंधन राजनीति की नई लकीर खींची जहाँ प्रमोद महाजन सरीखे नेता की मैनेजरी के जरिये भाजपा ने राजनीती में नई इबारत लिखी । पोखरण, कारगिल उस दौर की यादगार घटनाये रही । साथ ही संसद पर हमला ,आई सी 814 का अपहरण ,गोधरा पार्टी के लिए कलंक साबित हुआ जिसके दाग अभी तक नहीं छूट पाएं है । 2004 के लोकसभा चुनावो में इंडिया शाईनिंग के फब्बारे क़ी ऐसी हवा निकली जिसके जख्मो से वह लगातार पिछले दो लोक सभा चुनावो से नहीं उबर पायी है और इस बार भी चुनाव की बिसात बिछाने से ज्यादा पार्टी में प्रधान मंत्री पद को पाने के लिए सारी रस्साकसी चल रही है । कहीं यह 2014 में भाजपा की मिटटी पलीद नकार दे । बेहतर होगा वह पी एम पद के बजाए2014 में अपना प्रदर्शन सुधारने पर जोर दे । यह दौर ऐसा है जब जनता यू पी ए -2 की नीतियों से परेशान दिख रही है और कहीं का कहीं भ्रष्टाचार के मसले पर बीते कुछ समय से उसकी खासी किरकिरी भी हुई है जिसको भुनाने में भाजपा नाकामयाब ही रही है । सरकार को घेरने का हर मौका भाजपा चूकी है और भ्रष्टाचार की लड़ाई को कमजोर उसने गडकरी सरीखे नेता को बचाकर पूरा किया है जो बतलाता है भाजपा में साढे साती की यह दशा 2014 में भी कहीं उसका खेल कहीं खराब नहीं कर दे और शायद यही वजह है भाजपा पहली बार राजनाथ के अध्यक्ष बनाये जाने के बाद एकजुट होकर राष्ट्रीय कार्यकारणी के जरिये यह बतलाने की कोशिश का रही है 2014 के लिए वह कमर कस चुकी है लेकिन पार्टी का अंदरूनी कलह असंतोष के लावे को सबके सामने तो ला ही रहा है