Saturday, October 31, 2009

......... मान गई महारानी.....................



आखिरकार राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे मान गई । राज्य में नेता प्रतिपक्ष के पद से उन्होंने अपना इस्तीफा राजनाथ को दे ही दिया...... पिछले कुछ समय से राजस्थान में उनकी कुर्सी से विदाई का माहौल बना हुआ था ...... परन्तु ख़राब स्वास्थ्य कारणों के चलते उनकी विदाई की खबरें दबकर रह गयी । .. साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की साढ़े साती की दशा चलने के कारण महारानी की विदाई नही हो पायी.......


गौरतलब है "पार्टी विद डिफरेंस" का नारा देने वाली भाजपा में अनुशासन हाल के दिनों में उसे अन्दर से कमजोर कर रहा है...पार्टी लंबे समय से अंदरूनी कलहो में उलझी रही जिस कारण राजस्थान में वसुंधरा की विदाई समय पर नही हो पायी.......



...... यहाँ यह बताते चले वसुंधरा की विदाई का माहौल तो राज्य विधान सभा में भाजपा की हार के बाद ही बनना शुरू हो गया था परन्तु पार्टी हाई कमान लोक सभा चुनावो से पहले राजस्थान में कोई जोखिम उठाने के मूड में नही दिखाई दिया.............. लोक सभा चुनावो में पार्टी की करारी हार के बाद माथुर की प्रदेश अध्यक्ष पद से छुट्टी कर दी गई ...पर आलाकमान वसुंधरा के अक्खड़ स्वभाव के चलते उनसे इस्तीफा लेने की जल्दी नही दिखा सका ..साथ ही वसुंधरा को आडवानी का " फ्री हैण्ड" मिला हुआ था जिस कारण पार्टी का कोई बड़ा नेता उन्हें बाहर निकालने का साहस जुटाने में सफल नही हो सका। ..यही नही इस्तीफे की बात होने पर वसुंधरा के "दांडी मार्च " ने भी पार्टी आलाकमान का अमन चैन छीन लिया।



दरअसल महारानी पर लोक सभा चुनावो के बाद से इस्तीफे का दबाव बनना शुरू हो गया था..... उत्तराखंड के मुख्यमंत्री खंडूरी ने जहाँ पाँच सीटो पर पार्टी की करारी हार के बाद अपने पद से इस्तीफे की पेशकश कर डाली वही महारानी हार के विषय में मीडिया में अपना मुँह खोलने से बची रही ... पर केन्द्रीय स्तर पर वसुंधरा विरोधी लाबी कहाँ चुप बैठने वाली थी ... उन्होंने महारानी को राजस्थान से बेदखल कर ही दम लिया...


आखिरकार वसुंधरा की धुर विरोधी लोबी ने पार्टी अध्यक्ष राजनाथ को साथ लेकर अनुशासन के डंडे पर महारानी की विदाई का पासा फैक दिया..... इससे आहत होकर महारानी ने राजनाथ से मिलने के बजाय आडवानी से मिलना ज्यादा मुनासिब समझा .....महारानी ने ओपचारिकता के तौर पर राजनाथ को अपना इस्तीफा भिजवा दिया.....



राजनाथ और महारानी के रिश्तो में खटास शुरू से रही है । राजस्थान में वसुंधरा के कार्य करने की शैली राजनाथ सिंह को शुरू से अखरती रही है ... लोक सभा चुनावो में राजस्थान में पार्टी की पराजय के बाद वसुंधरा की राजनाथ से साथ अनबन और ज्यादा तेज हो गई.... उस समय पार्टी आलाकमान ने उनसे इस्तीफा देने को कहा था पर वसुंधरा के समर्थक विधायको की ताकत को देखकर वह भी हक्के बक्के रह गए... जब पानी सर से उपर बह गया तो "डेमेज कंट्रोल" के तहत राजस्थान में पार्टी ने वेंकैया नायडू को लगाया पर वह महारानी को इस्तीफे के लिए राजी नही कर पाये... जिसके चलते पार्टी ने राजस्थान की जिम्मेदारी सुषमा स्वराज के कंधो पर डाली...


पिछले कुछ समय से वह भाजपा की संकटमोचक बनी हुई है... चाहे आडवानी के इस्तीफे का सवाल हो या फिर जसवंत की किताब पर बोलने का प्रश्न ॥ या फिर कलह से जूझती भाजपा का और ३ राज्यों के परिणामो में भाजपा की पराजय का प्रश्न उन्होंने बेबाक होकर इन सभी मसलो पर अपनी राय रखी है और अपनी सूझ बूझ को दिखाकर हर संकट का समाधान किया .... पर राजस्थान में महारानी को वह इस्तीफे के लिए नही मना सकी ....जिसके बाद राजस्थान में राजनाथ ने अपना "राम बाण " फैक दिया ...


वसुंधरा पर अनुशासनात्मक कार्यवाही होने के समाचार आने के बाद राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष के पद से वसुंधरा को इस्तीफा देने को मजबूर होना पड़ा... इस्तीफे के बाद ४० विधायको के साथ किए गए प्रदर्शन में महारानी ने कहा " जबरन इस्तीफा लेकर पार्टी हाई कमान ने उनको अपमानित किया है ... राजस्थान में अपने दम पर भाजपा की सरकार उन्होंने पूर्ण बहुमत के साथ बनाई " साथ ही उन्होंने विधायको से कहा आज नही तो कल हमारा होगा..... मैं राजस्थान की बेटी हूँ मेरी अर्थी भी यही से उठेगी........



राजस्थान में महारानी की नेता प्रतिपक्ष से विदाई के बाद उनके उत्तराधिकारी को लेकर ज़ंग तेज हो गई है... वसुंधरा ने अपने पद से इस्तीफा तो दे दिया है परन्तु उनकी विदाई के बाद भाजपा में सर्वमान्य नेता के तौर पर किसी की ताजपोशी होना मुश्किल दिखाई देता है ...


खबरे है महारानी इस पद पर अपने किसी आदमी को बैठाना चाहती है परन्तु राजनाथ के करीबियों की माने तो नए नेता के चयन में वसुंधरा महारानी की एक नही चलने वाली...यही नही लोक सभा चुनाव में पीं ऍम इन वेटिंग के प्रत्याशी रहे आडवाणी की पार्टी में पकड़ कमजोर होती जा रही है ....


सूत्रों की माने तो आडवाणी की संसद के शीतकालीन सत्र के बाद पार्टी से सम्मानजनक विदाई हो जायेगी ..... बताया जाता है मोहन भागवत ने आडवानी की विदाई के लिए २२ दिसम्बर तक डैड लाइन तय कर ली है ... यहाँ यह बताते चले संसद का यह सत्र २२ दिसम्बर को समाप्त हो रहा है ... इसी अवधि में आडवानी की सम्मानजनक विदाई होनी है साथ ही पार्टी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष भी खोजा जाना है ...


यह सब देखते हुए कहा जा सकता है वसुंधरा की चमक आने वाले दिनों में फीकी पड़ सकती है ... साथ ही महारानी को आने वाले दिनों में नायडू, जेटली, सुषमा, अनंत की धमाचौकडी से जूझना है ... यह सब देखते हुई महारानी की राह में आगे कई शूल नजर आते है...



नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पाने के लिए इस समय पार्टी में कई नाम चल रहे है .... इस सूची में पहला नाम गुलाब चंद कटारिया का है.... कटारिया के नाम पर सभी नेता सहमत हो जायेंगे ऐसी आशा की जा सकती है .... उनकी उम्र के नेताओ को छोड़ दे तो राज्य में अन्य नेताओ को उनके नाम पर कोई ऐतराज नही है... साथ ही संघ भी उनके नाम को लेकर अपनी हामी भर देगा क्युकि संघ से उनके मधुर रिश्ते रहे है..... राजस्थान में पार्टी में कलह बदने की सम्भावना को देखते हुए पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उनके नाम पर अपनी मुहर लगा सकता है..


कटारिया की छवि एक मिलनसार नेता की रही है साथ ही वह सबको साथ लेकर चलने की कला में सिद्धिहस्त माने जाते है ...वसुंधरा को भी उनके नाम से कोई दिक्कत नही होगी ....

दूसरा नाम वसुंधरा के विश्वास पात्र माने जाने वाले राजेंद्र राठोर का चल रहा है.... राठोर को समय समय पर महारानी के द्बारा आगे किया जाता रहा है .... महारानी के सबसे करीबी विश्वास पात्रो में वह गिने जाते है .... अगर महारानी की नया नेता चुनने में चली तो राजेंद्र की किस्मत चमक सकती है .... वैसे भी अभी वह रेस के छुपे रुस्तम बने है...परन्तु उनके साथ सबसे बड़ी दिक्कत राजनीती की पिच पर अपरिपक्वता बनी हुई है ...यही बात उनकी राह का बड़ा रोड़ा बनी है ॥



तीसरा नाम घन श्याम तिवारी का है ... तिवारी वर्तमान में सदन में उपनेता के पद को संभाले हुए है...वर्तमान में वसुंधरा के इस्तीफे के बाद कार्यवाहक नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी उनके कंधो पर सोपी गई है ...विरोधियो को साथ लेकर चलने की कला तिवारी का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है...परन्तु उनका ब्राहमण होना उनकी राह कठिन बना सकता है ...


गौरतलब है इस समय पार्टी के अध्यक्ष पद पर राजस्थान में अरुण चतुर्वेदी काबिज है जो ख़ुद भी ब्राहमण है ... अगर वसुंधरा के बाद तिवारी को यह जिम्मेदारी सोपी गई तो दोनों पदों पर ब्राह्मण काबिज हो जायेंगे .... ऐसे में राज्य में जातीय संतुलन कायम नही हो पायेगा.... अतः पार्टी ऐसी सूरत में उनको काबिज कर कोई बड़ा जोखिम राजस्थान में मोल नही लेना चाहेगी......



पूर्व उप रास्ट्रपति भैरव सिंह शेखावत के दामाद नरपत सिंह राजवी का नाम भी इस रेस में बना हुआ है ...नरपत के बारे में राजस्थान में एक किस्सा प्रचलित है ... मेरे राजस्थान के एक मित्र बताते है एक बार कुछ राजनीतिक मांग को पूरा करने के लिए नरपत ने खाना पीना छोड़ दिया था ...बेटी को मोहरा बनाकर अपने ससुर के जरिये नरपत अपनी इस इच्छा को पूरा करने की जुगत में लगे थे ... ... दामाद के हट को देखते हुए शेखावत अपने दामाद को राजस्थान की राजनीति में ले आए.... उम्र के इस अन्तिम पड़ाव पर भी भैरव बाबा नरपत सिंह राजवी को नेता प्रतिपक्ष के पद पर लाने की पुरजोर कोशिस कर रहे है॥


नरपत का युवा होना उनकी राह आसान बना सकता है ...बाबोसा के संघ से जनसंघ के दौर से मधुर रिश्तो के मद्देनजर नरपत के सितारे बुलंदियों में जा सकते है ...परन्तु नरपत की जनता में कमजोर पकड़ और पार्टी में उनके समर्थको की कमी एक बड़ी बाधा बन सकती है ...साथ ही राजस्थान की राजनीति में उनका ख़ुद का कोई कद नही है....


राजनीती के ककहरे से अनजान रहने वाले नरपत का ऐसे में ख़ुद को कंट्रोल करना तो दूर पार्टी को कंट्रोल करना दूर की कौडी लगता है ... वसुंधरा को उनके पद से हटाने के लिए बाबोसा ने कुछ महीने पहले एक करप्शन की मुहीम चलाई थी... अब वसुंधरा की विदाई के बाद बाबोसा के सुर में भी नरमी आ गई है... पिछले कुछ दिनों से वह भाजपा में प्यार की पींगे बड़ा रहे है..... १५ वी लोक सभा में ख़ुद को पीं ऍम इन वेटिंग बनाने पर तुले थे पर इन दिनों भाजपा के साथ बदती निकटता उनके किसी बड़े कदम की और इशारा कर रही है ...वह नरपत को राजस्थान में ऊँचा रुतबा दिलाना चाहते है...


अभी तक उनकी राह का बड़ा रोड़ा महारानी बनी हुई थी पर अब महारानी के राजपाट के लुट जाने के बाद बाबोसा को अपने दामाद का रास्ता साफ़ होता नजर आ रहा है...संभवतया इस बार पार्टी और संघ जनसंघ के इस नेता की राय पर अपनी मुहर लगा दे...और नए नेता के चयन में सिर्फ़ और सिर्फ़ शेखावत की ही चले.......

अगर वसुंधरा के खेमे से किसी की ताजपोशी की बात आती है तो दिगंबर सिंह का नाम भी सामने आ सकता है ... सूत्रों की माने तो महारानी की प्राथमिकता अपनी पसंद के नेता को प्रतिपक्ष की कुर्सी पर बैठाने की है... इस बात का ऐलान वह अपने जाने से पहले ही कर रही थी ...उन्होंने राजनाथ से साफतौर पर कहा था वह तभी अपनी कुर्सी छोडेंगी जब उनकी मांगे मानी जायेगी .... उनकी पहली मांग में नए नेता का चयन उनकी सहमती से होना था....अब यह अलग बात है पार्टी में " आडवानी ब्रांड" में गिरावट आने से वसुंधरा के विरोधी नेता उनकी पसंद के नेता को राजस्थान में प्रतिपक्ष की कुर्सी पर नही बैठाएंगे .....


वसुंधरा खेमे के नेताओं में दिगंबर को लेकर आम सहमती बनाने में भी कई दिक्कते पेश आ सकती है...इन सबके इतर कोई अन्य नाम भी"डार्क होर्स " के रूप में सामने आ सकता है.. माथुर के बाद जब चतुर्वेदी को नया प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया था तो किसी को उनकी ताजपोशी की उम्मीद नही थी... हाई कमान ने जब उनका नाम फाईनल किया तो सभी चौंक गए... किसी ने उनके अध्यक्ष बनने के विषय में नही सोचा था... पर संघ से निकटता उनके लिए फायेदेमंद साबित हुई ... इसी प्रकार शायद इस बार नए नेता का चयन संघ की सहमती से हो इस संभावना से भी इनकार नही किया जा सकता.... राज्य में वसुंधरा समर्थक विधायको की बड़ी तादात देखते हुए वसुंधरा यह कभी नही चाहेंगी नया नेता विरोधी खेमे का बने ......


परन्तु अगर राजनाथ और संघ की चली तो वसुंधरा के राजस्थान में दिन लद जायेंगे..... जिस तरह इस्तीफे को लेकर महीनो से वसुंधरा ने ड्रामे बाजी की उससे राजनाथ की खासी किरकिरी हुई है ....पूरे प्रकरण से यह झलका है वसुंधरा किसी की नही सुनती है... आज वह पार्टी से भी बड़कर हो गई है... तभी वह राजनाथ से मिलने के बजाए आडवाणी से मिलना पसंद करती है...


बात राजनाथ की करे तो वह भी उत्तर प्रदेश से आगे नही बाद पाये.... खांटी राजपूत नेता होते हुए भी वह राजस्थान में ब्राह्मण राजपूत समीकरणों को आज तक नही समझ पाये.... और किसी तरह महारानी को राजस्थान से हटाने पर तुले थे ... राजनाथ को राजस्थान में भाजपा के गिरते वोट बैंक की जरा भी परवाह होती तो वह वसुंधरा को राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष से नही हटाते ...


राजनाथ के अंहकार के चलते इस गंभीर गलती का खामियाजा कही भाजपा के बचे खुचे वोट बैंक पर भी नही पड़े ...राजस्थान भाजपा में इन दिनों वैसे ही "सूर्य ग्रहण " छाया है .... अब राजनाथ ने वसुंधरा को हटाकर भाजपा के बचे खुचे वोट बैंक पर कुल्हाडी मारने का काम किया है ........



बहरहाल जो भी हो महारानी मान गई है.... महारानी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है.... साथ ही राजनाथ को लैटर लिखकर उनको हटाए जाने के निर्णय को चुनोती दे डाली है.....महारानी की विदाई के बाद उनके तेवरों को देखते हुए नए नेता की ताजपोशी आसान नही दिख रही है... नए नेता को जहाँ कार्यकर्ता , पार्टी, संगठन के साथ तालमेल बैठाना है वही प्रदेश अध्यक्ष चतुर्वेदी के साथ भी...... यहाँ यह बताते चले चतुर्वेदी के साथ वसुंधरा के सम्बन्ध अच्छे नही रहे है ....


बताया जाता है वसुंधरा समर्थक उनकी ताजपोशी को नही पचा पायेंगे... ऐसे में देखना होगा नए नेता के अध्यक्ष के साथ सम्बन्ध कैसे रहते है? इन सबके मद्देनजर राजस्थान में भाजपा की आगे की राह आसान नही दिखाई देती है ........ पनघट की कठिन डगर को देखते हुए भाजपा को फूक फूक कर कदम रखने होंगे.......

Monday, October 26, 2009

इस चित्र पर गौर फरमाए.........


आजाद प्रेस

( ... ऊपर का यह चित्र बहुत दुर्लभ है ......
सफ़ेद रंग की प्रेस की इस गाड़ी में एक "कुक्कुर" महाशय आराम फरमा रहे है ............
शायद उनको भी अच्छे से पता है लोकतंत्र में प्रेस के स्थान की कितनी अहमियत है
...तभी तो वह कह रहे है.. "ऐसी आज़ादी और कहाँ " ? )

Sunday, October 4, 2009

चुफाल के हाथ उत्तराखंड भाजपा की कमान .........



लम्बी जद्दोजहद के बाद उत्तराखंड के नये प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर बिशन सिंह चुफाल की ताजपोशी कर दी गई ..वर्तमान में वह निशंक की सरकार में कैबिनेट मंत्री के पद को संभाले हुए थे..जून में पांचो लोक सभा सीट गवाने के बाद जहाँ पार्टी हाई कमान ने खंडूरी की छुट्टी करवा दी थी वही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बची सिंह रावत को विकास नगर के उपचुनाव तक अभय दान दे दिया था ॥


अब विकास नगर के चुनाव परिणामो के आने के बाद बची सिंह रावत की भी कुर्सी सलामत नही रह पायी और उनको अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा...उत्तराखंड में इस बार के लोक सभा चुनावो में भाजपा का राज्य से पूरी तरह से सूपड़ा साफ़ हो गया था ... यहाँ तक की भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बची सिंह रावत भी अपनी नैनीताल सीट नही जीत पाये थे जिसके चलते उन पर भी इस्तीफे का दबाव लोक सभा चुनावो के ठीक बाद बनना शुरू हो गया था... पर उस समय पार्टी हाई कमान ने इस्तीफे के लिए कोई जल्दी नही दिखाई ...लेकिन विकास नगर के उप चुनाव के बाद पार्टी हाई कमान बची सिंह रावत की विदाई को लेकर आश्वस्त हो गया...




दरअसल उत्तराखंड के भाजपा के कई बड़े नेता खंडूरी के साथ बचदा से भी बुरी तरह से खार खाए हुए थे॥इसका कारण दोनों की घनिष्ट निकटता थी... यहाँ बताते चले दोनों वाजपेयी जी की सरकार में मंत्री रहे थे... जहाँ खंडूरी केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री थे वही बचदा विज्ञान प्रोद्योगिकी राज्य मंत्री ... उत्तराखंड में तिवारी सरकार के कार्यकाल के पूरा होने के बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की पहली पसंद के रूप में जनरल खंडूरी उभरे थे...इसी कारण २००७ में उनके सर राज्य के मुख्यमंत्री पद का सेहरा बधा था.... उस समय विधायको का बहुमत भगत सिंह कोश्यारी के साथ होने के बाद भी खंडूरी को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिल गई..तभी से खंडूरी कोश्यारी की नजरो में खटकने लगे थे... खंडूरी की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी के बाद पार्टी हाई कमान ने कोश्यारी के स्थान पर नये अध्यक्ष की खोज शुरू कर दी ...कोश्यारी इस पद पर अपने आदमी को बैठाना चाहते थे पर खंडूरी की आडवानी कैंप में मजबूत पकड़ के चलते कोश्यारी हाथ मलते रह गए॥


आखिरकार राज्य के अध्यक्ष पद पर खंडूरी बची सिंह रावत को ले आए... इसका एक कारण उनके साथ खंडूरी की अच्छी ट्यूनिंग तो था ही साथ ही दोनों केन्द्रीय स्तर के नेता थे॥ दूसरा लंबे समय से जिस संसदीय इलाके का बचदा प्रतिनिधित्व करते आ रहे थे वह रिज़र्व हो गया था लिहाजा पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी बचदा के अनुभव का लाभ लेना चाहता था अतः उसने खंडूरी के कहने पर बचदा को राज्य की बागडोर सौप दी.........


बचदा के नेतृत्व में राज्य में भाजपा की गाडी सही से बडी ... इस दौरान पार्टी ने राज्य में एक के बाद एक चुनाव जीते... खंडूरी और बचदा के समय में सरकार और संगठन में बेहतर समन्वय देखा गया... पर दोनों की कार्य शैली को भगत सिंह कोश्यारी नही पचा पाये और दिल्ली जाकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के सामने खंडूरी के बारे में दुष्प्रचार फैलाते रहे... पार्टी हाई कमान भी कभी निकाय चुनाव तो कभी पंचायत चुनावो का हवाला देकर अक्सर उनकी मांग को ठुकराता रहा.. दरअसल देहरादून की कोश्यारी वाली विधायको की एक लाबी ने खंडूरी को चलने ही नही दिया ... क्युकि कोश्यारी के विधायको के समर्थन को नजरअंदाज करते हुए खंडूरी राज्य के मुख्यमंत्री बना दिए गए...


साथ में जनरल ने कई भारी भरकम मंत्रालय अपने पास रखे जिस कारन राज्य के मंत्रियो की मन माकिफ मंत्रालय पाने की उम्मीद धराशायी हो गई.. राज्य के एक नए विधायक की माने तो राज्य की भाजपा सरकार में गुट बाजी बढाने में कोश्यारी जैसे नेताओ का हाथ रहा ... वह अपने को मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे जिस कारन बार बार वह खंडूरी जी की सरकार को अस्थिर करते रहे...


कोश्यारी ने जब जब विधायको को लामबंद कर अपने पाले में लेकर हाई कमान के सामने खंडूरी हटाओ की मांगे रखी तब तब जनरल और ज्यादा मजबूत होते गए... इसी के चलते राज्य में निकाय ,पंचायत चुनावो में भाजपा ने खंडूरी के नेत्तृत्व में धमाकेदार जीते दर्ज की ....पर इन सब के बाद भी कोश्यारी के चेहरे पर खुशी नाम की चीज नही रही॥ भला रहती भी क्यों नही? राज्य में खंडूरी को सी ऍम बना दिया गया....


पहली बार राज्य में ऐसे व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाया गया जिसकी इमानदारी के चर्चे अटल बिहारी की सरकार के समय जोर शोर से हुआ करते थे...पर कोश्यारी के कुछ विधायको के पर खंडूरी ने छोटे मंत्रालय देकर कतर दिए..... यह सब उनको नागवार गुजरा और वह न्याय की फरियाद पाने कोश्यारी के पास पहुच जाया करते थे...


कोश्यारी कई बार राजनाथ और आडवाणी के यहाँ खंडूरी को हटाने की परेड विधायको को साथ लेकर किया करते थे ... पर हर बार पार्टी हाई कमान उनको आश्वाशन देकर मतभेदों को आपस में बैठकर सुलझाने की सलाह देता रहता था..बाद में जब बहुत हद हो गई तो पार्टी ने एक फोर्मुले के तहत कोश्यारी की राज्य की राजनीति से छुट्टी कर दी ..... इसी कारन पार्टी ने उनको उत्तराखंड की सक्रिय राजनीती से केन्द्र की राजनीती करने राज्य सभा भेज दिया पर इसके बाद भी कोश्यारी के बगावती तेवरों में कमी नही आई....


लोक सभा चुनाव में ५ सीट गवाने के बाद कोश्यारी ने फिर खंडूरी के ख़िलाफ़ अपना मोर्चा खोल दिया..इस बार तीर निशाने पर लग गया .... खंडूरी की ५ सीटो पर हार ने उनकी सी ऍम की कुर्सी से विदाई करवा दी....खंडूरी की विदाई के बाद कोश्यारी को आस थी वह राज्य के मुख्यमंत्री बन जायेंगे पर हाई कमान ने उनको इस बार लंगडी दे दी... ख़ुद खंडूरी ने इस बात को बताया कोश्यारी ने लोक सभा चुनावो में पार्टी के लिए काम नही किया जिस कारन विरोधियो को पुरस्कृत नही किया जाना चाहिए॥


कोश्यारी अपनी पसंद के प्रकाश पन्त को मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे पर खंडूरी ने निशंक को आगे कर कोश्यारी को पस्त कर दिया ॥इसके बाद बची सिंह रावत की छुट्टी का माहौल बनना शुरू हो गया.... वह भी नैनीताल सीट नही जीत सके शायद पार्टी हाई कमान उनकी कपकोट के बाद विदाई का इच्छुक था ... पर कपकोट जीतने के बाद भी बचदा की विदाई नही हो पायी .... शायद उनके संभावित उत्तराधिकारी के नाम पर मुहर नही लग पायी ... तभी उनकी कुर्सी विकासनगर के चुनाव परिणाम आने के कुछ दिन तक सलामत रह गई....अब विकास नगर चुनाव जीतने के साथ ही खंडूरी के बाद लोक सभा में हार की गाज बचदा पर गिरी है ...


पार्टी ने उनके स्थान पर निशंक सरकार में केबिनेट मंत्री रहे बिशन सिंह चुफाल को भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनाया है...चुफाल के अध्यक्ष बनने के साथ ही पार्टी हाई कमान ने यह संदेश देने की कोशिश की है हार की जिम्मेदारी सामूहिक है ..गौरतलब है की कुछ दिनों पहले भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री खंडूरी ने जसवंत और शौरी के सुर में सुर मिलाते हुए यह बात कही थी की पार्टी में हार के लिए जिम्मेदारी तय नही की जाती ॥ यही नही खंडूरी द्बारा राजनाथ को लिखे गए उस पत्र की मीडिया में बड़ी चर्चा हुई थी जिसमे उन्होंने कहा था मुझसे हार के बाद जबरन इस्तीफा लिया गया ...


अब कम से कम चुफाल की ताजपोशी से यह साफ हुआ है पार्टी राज्य में 5 सीट हारने के बाद गंभीर है .... जिस तरीके से चुफाल की ताजपोशी हुई है उससे कोश्यारी कैंप को फिर से करारी हार मिली है ..यहाँ यह बताते चले कभी कोश्यारी के करीबी रहे चुफाल राज्य में खंडूरी की सरकार बन्ने वाले समय से खंडूरी के खासमखास रहे है ....इसकी एक बानगी उस समय देखने को मिली थी जब खंडूरी और कोश्यारी को मुख्यमंत्री बनाये जाने को लेकर २००७ में देहरादून के एक होटल में सिग्नेचर अभियान चला था तब बिशन सिंह चुफाल ने निशंक का साथ देकर खंडूरी को मुख्यमंत्री बनाये जाने की मांग रखी थी....


जब चुफाल के हाथ बागडोर सौपे जाने का समाचार मैंने सुना तो अपनी देहरादून वाली २ साल की याद ताजा हो गई तब हम भी देहरादून में सत्ता के लटके झटके देख रहे थे ..आज सोच रहा हूँ खंडूरी से यह गहरी निकटता बिशन सिंह चुफाल के लिए फायदे का सौदा बनकर उभरी है ..खंडूरी ने अपने मंत्रिमंडल विस्तार में चुफाल का हमेशा ध्यान रखा ॥ उनको हमेशा मलाईदार मंत्रालय दिए... चुफाल ने भी अपने कामो को बखूबी अंजाम दिया...खंडूरी के जाने के बाद भी निशंक ने चुफाल का ध्यान रखा ... तभी वन, पर्यावरण ,सहकारिता , ग्रामीण अभियंत्रण परिवहन जैसे मंत्रालय देकर चुफाल को अपना करीबी बनाये रखा ...इस बार पार्टी राज्य में ५ सीट बुरी तरह हार गई... हार का पोस्ट मार्टम तक नही किया गया .... हार का दोष खंडूरी को दे दिया गया ...किसी ने इस बात पर मंथन नही किया इस लोक सभा चुनाव में खंडूरी की केबिनेट के सारे मंत्रियो की विधान सभा में भाजपा बुरी तरह हारी ...सिवाय बिशन सिंह चुफाल की विधान सभा को छोड़कर अन्य जगह भाजपा को कांग्रेस के हाथो पटखनी मिली....हार के लिए जब जवाबदेही तय होती तो पार्टी आलाकमान ने खंडूरी, बचदा के साथ सारे मंत्रियो की भी क्लास लेनी चाहिए थी पर उन्होंने खंडूरी और बचदा को बलि का बकरा बना दिया...


चुफाल को बागडोर सोपने के पीछे हाई कमान की एक मंशा लोक सभा चुनावो में उनकी अपनी विधान सभा में भाजपा को मिली बम्पर बदत भी रही है......बिशन सिंह चुफाल की छवि सीधे सादे नेता की रही है ... चुफाल के राजनीतिक जीवन की शुरुवात ८० के जनान्दोलनों से हुई ॥ १९८३ में ग्राम प्रधान बने चुफाल 19८६ में डी डी हट के ब्लोक प्रमुख निर्वाचित हुए..इसके बाद १९८४ से १९९२ तक पिथोरागढ़ जिले में भाजपा जिला अध्यक्ष रहे ..१९९६ में पहली बार अविभाजित उत्तर प्रदेश में विधायक चुने गए... राज्य की नित्यानंद स्वामी सरकार में चुफाल कबीना मंत्री रहे ... यह सिलसिला २००२ में भी जारी रहा ... हाँ ,यह अलग बात है उस समय राज्य में पहले विधान सभा चुनावो में कांग्रेस ने पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल की... जिसके चलते भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा था....२००७ के चुनावो में कांग्रेस के नए चेहरे हेम पन्त को पटखनी देने के बाद चुफाल फिर से विधायक चुने गए...सरल स्वभाव के धनी चुफाल में सीधे आदमी के दर्शन होते है ..आधुनिक राजनीतिक तड़क भड़क और दिखावे से कोसो दूर रहने वाले चुफाल उत्तराखंड में भाजपा के युवा पोस्टर बॉय है.. शालीनता ,सरलता, सादगी ही शायद उनकी राजनीती का मूल मन्त्र है ॥


चुफाल की राजनीती को करीब से देखने का सौभाग्य मुझे मिला है...२००७ के चुनावो की याद आज भी जेहन में बनी है तब चुफाल गाव गाव वोट मांगने जाया करते थे ...तब उनकी विधान सभा से ताल्लुक रखने वाले बरला के अनिल कहा करते थे चुफाल की पकड़ गावो के चूल्हों तक है ... अभी जैसे ही उनके अध्यक्ष के रूप में शपथ ग्रहण करने की ख़बर आई तो अनिल की बात सोलह आने सच हो गई ....


कम से कम पार्टी हाई कमान को भी इस बात का एहसास हो गया चुफाल में लम्बी रेस का घोड़ा बन्ने की काबिलियत है ॥चुफाल को राज्य में कमान सौपकर भाजपा ने एक तीर से कई निशाने खेल दिए है ॥ इससे भगत सिंह कोश्यारी के समर्थको को जहाँ फिर से ठिकाने लगाने की कोशिस की गई है वही कुमाऊ गडवाल में संतुलन कायम करने की कोशिस की गई है ..पिछली बार खंडूरी जब सी ऍम थे तो ब्राह्मणहोने के साथ वह गडवाल से थे वही दूसरी तरफ़ बची सिंह रावत राजपूत थे जो कुमाऊ से ताल्लुक रखते थे .... इस बार भी ऐसा कुछ किया गया है .. निशंक गडवाल से है तो चुफाल कुमाऊ से ..भाजपा ने २०१२ के चुनावो की तैयारी शुरू कर दी है ॥


चुफाल के हाथ भाजपा की बागडोर है....उनको सभी को साथ लेकर चलना है .... साथ ही गुटों में विभाजित भाजपा को एकजुट करना है ... खंडूरी की कुर्सी खाली होने के बाद भी कोश्यारी के समर्थक चुप बैठ जायेंगे ऐसी उम्मीद करना बेमानी है ...क्युकि कोश्यारी की मुख्यमंत्री बन्ने की लालसा कब जाग जाए यह कह पाना मुश्किल है ? साथ ही विकासनगर में भाजपा के जीत जाने के बाद खंडूरी चुप बैठ जायेंगे ऐसी उम्मीद करना भी बेमानी होगी...ऐसे में चुफाल को फूक फूक कर अभी से कदम रखने होंगे....चुफाल के सामने जनता तक पहुचने की भी चुनोती है ...


मुख्यमंत्री आम कार्यकर्त्ता और मंत्रियो के लिए उपलब्ध रहे इसका उनको ध्यान रखना होगा....साथ ही सरकार और संगठन को साथ लेकर चलना होगा तभी उत्तराखंड में २०१२ में कमल खिल सकता है..नही तो अभी के हालत देखकर नही लगता पार्टी खंडूरी के जाने के बाद बहुत अच्छी स्थिति में है...निशंक ने विकास नगर सीट भाजपा प्रत्याशी कुलदीप को जीता तो दी है लेकिन जीत का अन्तर बहुत मामूली रहा ..लोक सभा की पाँच सीट गवाने के बाद भाजपा ने यह सीट जीतकर निशंक सरकार की नाक बचाई है ...


रही बात चुफाल की तो उनको निशंक के साथ मिलकर काम करना होगा....राज्य की जनता में इस समय भाजपा सरकार को लेकर आक्रोश चरम पर है ॥ जनता आए दिन हड़ताल कर रही है ॥ सड़क , बिजली, पानी जैसी बुनियादी समस्यायें जस की तस है.... जिन उद्देश्यों को लेकर राज्य की लड़ाई लड़ी गई थी वह पूरे नही हो पाये है.... खंडूरी के जाने के बाद कानून व्यवस्था की स्थिति ख़राब हो गई है... भू माफियाओ की सक्रियता पैर पसार रही है॥ करप्शन चरम पर है ...


बिना रिश्वत के कोई काम नही बनता ... पहाड़ से पलायन थमने का नाम नही ले रहा ..ऐसे विषम हालातो में भाजपा की हालत अच्छी नही कही जा सकती ..चुफाल को इन सब विषम परिस्थितियों से जूझना है ...उनको अगर २०१२ में फतह हासिल करनी है तो निशंक के साथ कदम से कदम मिलकर चलना होगा...नही तो राज्य में भाजपा की दुर्गति को कोई नही रोक पायेगा ...देखना होगा चुफाल इस बार केन्द्रीय नेतृत्व की उम्मीदों में कितना खरा उतर पाते है ?