शनिवार, 25 मई 2013

आई पी एल – 6 तमाशे की कलंक कथा

6 बरस पहले ट्वेन्टी ट्वेन्टी विश्व कप के फाईनल मैच में पाक खिलाडी मिसबाह- उल –हक के शॉट पर श्रीसंत ने कैच पकड़कर न केवल भारत को टी २० का सरताज बनाया बल्कि १९८३ की सुनहरी यादो को भी पीछे छोड़ दिया जब पहली बार कपिल देव की अगुवाई में भारतीय क्रिकेट टीम ने विश्व कप जीतने का ककहरा सीखा था |  टी 20 विश्व कप जीतकर        पाकिस्तान सरीखे चिर प्रतिद्वंदी को हराने के बाद भारत ने टी ट्वेन्टी में  भी अपनी सफलता के नए झंडे गाड़ दिये जिसके बाद भारत में ट्वेन्टी ट्वेन्टी का बुखार  परवान चढ़ने लगा | कैरी पैकर की तर्ज पर जब सुभाष चंद्रा ने आई सी एल चलाई तो उसकी बादशाहत को चुनौती देने के लिए ललित मोदी ने आई पी एल का दाव खेला | कॉर्पोरेट , मनोरंजन के तडके , बी सी सी आई ने जब उसे आई पी एल लीग में तब्दील कर दिया तो क्रिकेट की मंडी में खिलाडियों की बोलियां लगने लगी जिससे क्रिकेटरों की खूब कमाई हुई | साथ ही चीयर लीडरो के ग्लैमर और रेव पार्टियों ने पहली बार क्रिकेट को उस तमाशे में तब्दील कर मनोरंजन के तडके में परदे पर ऐसे पेश किया कि दर्शकों की भारी भीड़ अपने अपने सितारों को देखने उमड़ने लगी | लेकिन किसे पता था पाक के साथ खेले गए टी ट्वेन्टी फाईनल मैच में जों श्रीसंत हीरो बन गया वही हीरो एक दिन स्पॉट फिक्सिंग की जद में आ जायेगा | आई पी एल मुनाफे के बड़े बाजार , मनोरंजन के अलावे सट्टा बाजार में गोते लगाकर फिक्सिंग के साये में भी घिरते जा रहा है जिसमे हर दिन कोई न कोई नई कड़ी जुड़ते जा रही है जिसके तार बिंदु सिंह से लेकर श्रीनिवासन और उनके दामाद मयप्पन तक जुड रहे हैं | बीते दिनों दिल्ली पुलिस ने दर्जन भर से ज्यादे सट्टेबाजो और कई नामचीन हस्तियों का कच्चा चिटठा खोला है उससे पैसे का तमाशा बने इस फटाफट क्रिकेट का रंगीन सच सबके सामने आ गया है | अगर ऐसी घटनाओ के बाद लोगो का क्रिकेट से भरोसा उठ रहा है तो यह लाजमी ही है क्युकि इस दौर में आई पी एल भारतीय फिक्सिंग लीग का बदनुमा दाग ढो रहा है जहाँ सब पहले से ही तय माना जा रहा है और शायद यही वजह है क्रिकेट खिलाडियों से भी लोगो का भरोसा उठता ही जा रहा है और लोग यह मान रहे हैं इस बार का आई पी एल फिनल भी किन दो टीमों के बीच होगा यह सब फिक्स है | दिल्ली पुलिस और मुंबई पुलिस ने अपनी अपनी पड़ताल से फिक्सिंग के जो नए राज खोले हैं वह हर उस क्रिकेट प्रेमी को परेशान किये हुए है जो क्रिकेट को धर्म और खिलाडियों को देवता मानकर पूजते थे | कोच्ची एक्सप्रेस के नाम से मशहूर श्रीसंत अपनी गेदबाजी की धार से विरोधियो  पर टूट पड़ते थे और मैदान में अपने लटके झटको के लिए जाने जाते थे अब वही श्रीसंत एक्सप्रेस मैदान से बाहर है और पुलिसिया पूछताछ में उसके पसीने छूट रहे हैं | श्रीसंत जहाँ रोते हुए अपना जुर्म कबूल कर रहे हैं वहीँ अंकित चव्हाण भी कह रहे हैं उनसे बड़ा गुनाह हो गया है | कमोवेश यही हाल अजित चंदीला का भी है | मजेदार बात यह है सर्विलांस की बातचीत में चंदीला बुकी  से यह कहते हुए पाए गए जब पिछले सत्र में फिक्सिंग में दिक्कत नहीं आई तो इस बार क्या होगा ? अगर यह सच है तो अब यह शक भी गहरा गया है कहीं  पिछले सीजन में भी तो पूरा आई पी एल फिक्स नहीं था | पैसो की अधिकाधिक भूख में भी अब इन खिलाडियों का करियर ढलान पर बताया जा रहा है | दिल्ली पुलिस की माने तो आई पी एल के इस सीजन में एक मैच के एक ओवर के लिए श्रीसंत ने चालीस लाख, चंदीला को बीस लाख , अंकित के साथ साठ लाख की डील हुई | परत दर परत स्पॉट फिक्सिंग आई पी एल के मैचो में इस कदर हुई है कि सट्टेबाजी के तार अंडरवर्ल्ड  , बालीवुड और राजनेताओ के इर्द गिर्द तक जाते दिखाई दे रहे हैं |पूरे मामले का मास्टर माईंड दाउद है जो अपने भाई अनीश इब्राहीम की छत्रछाया में  सुनील सरीखे गुर्गो के साथ मिलकर दुबई और कराची से सट्टेबाजो के जरिये खिलाडियों तक अपनी पहुँच बनाने में कामयाब हुआ | शुरुवाती जांच के संकेत बहुत कुछ कहानी  को बयान करते हैं | बताया जाता है दाउद ने सुनील को साथ लेकर फिक्सरो का एक बड़ा नेटवर्क बीते एक दशक से भी ज्यादा समय से तैयार किया हुआ है और इस बार आई पी एल ६ के महाकुम्भ में उसने जीजू, जुपिटर, राकी सरीखे सट्टेबाजी के आकाओ के जरिये स्पॉट फिक्सिंग को अंजाम दिया जिसमे कई  खूबसूरत हसीनाओ  की डीलिंग भी खिलाडियों से करवाई और उनको ब्लेकमेल एम एम एस के जरिये करने की वारदात को अमली जामा पहनने की कोशिशे लगातार की | खिलाडियों के लैपटॉप में मिली कई लड़कियों की फोटो और मोबाइल नंबर इस बात की तस्दीक करते हैं कि किस तरह आई पी एल के जरिये स्पॉट फिक्सिंग के अलावा अय्याशी का खुला खेल खेला जा रहा था | स्पॉट फिक्सिंग का यह खुलासा क्रिकेट के नाम पर कलंक तो है ही साथ ही आई पी एल के आयोजन पर भी सवालिया निशान भी लगाता है क्युकि आई पी एल में काले धन का खुला खेल भी बड़े पैमाने पर हुआ है जिसमे खुले तौर पर करोडो के वारे न्यारे किये जा रहे थे | मजेदार बात तो यह है कि आये दिन नए नए खुलासे जहाँ नया इशारा कर रहे है वहीँ पहली बार बी सी सी आई अध्यक्ष एम श्रीनिवासन की कुर्सी खतरे में पड रही है क्युकि उनके दामाद  गुरुनाथ मयप्पन का नाम भी सीधे तौर पर इससे जुड रहा है | उनकी बिंदु दारा सिंह से हुई तकरीबन ढाई सौ से ज्यादा की फोन काल ने आई पी एल जांच में नया मोड दे दिया है | बताया जाता है कि मयप्पन  ने अपने ससुर की रसूख का इस्तेमाल कर बड़े पैमाने पर खिलाडियों और सटोरियों के बीच कड़ी का काम किया | अब इसके बाद बड़े पैमाने पर बी सी सी आई की सियासत एक सौ अस्सी डिग्री पर झुक आई है क्युकि श्रीनिवासन को लेकर पहली बार मुम्बई में शरद पवार ने अपनी बिसात सहारा सुप्रीमो सुब्रतो राय को आगे कर बिछा दी  है जिसमे साफ़ तौर पर उन्होंने कहा कि अगर श्रीनिवासन अपनी कुर्सी पर बैठे रहते है तो सहारा टीम इंडिया को सहारा नहीं दे पायेगा | वहीँ अरुण जेटली से लेकर  राजीव शुक्ला और अनुराग ठाकुर अगर इस पूरे प्रकरण का फैसला जांच से करने और मिले सुर मेरा तुम्हारा  का भरोसा दे रहे हैं तो यह भी राजनीती और क्रिकेट  के नए मिजाज को बतला रही  है जहां  हर कोई अपनी कुर्सी बचाने के लिए एक दूसरे को साध रहा है और एक की कमीज दूसरे की कमीज से मैली बताने पर  तुला है | मुंबई पुलिस और दिल्ली पुलिस इस मामले पर अपने अपने अनुरूप बिसात बिछाने में लगी हुई है | अहमदाबाद से ही बीते दिनों हुई विनोद मूलचंदानी नाम के सटोरिये की गिरफ्तारी से अब यह शक भी गहरा गया है कि आई पी एल में किस तरह एक के बाद एक बड़े बड़े नामो ने करोडो के वारे न्यारे इस खेल में किये हैं | आई पी एल के पूरे सीजन में सवा अरब की आबादी के मनोरंजन के नाम पर एक तरह से खिलवाड ही किया जा रहा था क्युकि स्पॉट फिक्सिंग की परतों के खुलने के बाद लोग अब यह सवाल पूछ रहे हैं यह खेल नहीं तमाशा  है शायद तभी २०१० में संसद में ६० से ज्यादा सांसदों ने इस तमाशे को लेकर सवाल उठाये और इसे बंद करने की मांग कर डाली थी क्युकि खेल भावना को दरकिनार करते हुए इसमें थप्पड़ बाजी , हवाला , फ्रेंचायजी विवाद , रेव पार्टी और महिलाओ के साथ हो रही अश्लीलता आम बात बन गई थी लेकिन आज तक इस पर कोई कार्यवाही नहीं की गई क्युकि खेल के मैदान पर भी राजनेताओ की बिसात इस कदर बिछी है कि हर कोई एक दूसरे के लिए इसमें लंगडी मार  अपने अपने खेल संघों के आसरे खेल रहा है |
क्रिकेट में फिक्सिंग का यह पहला कोई मामला सामने नहीं आया है | २००० में हेन्सी क्रोनिए और गिब्ब्स वाला दौर भी जेहन में बना है जब अजहर, प्रभाकर, जडेजा, मोगिया का नाम फिक्सिंग के दलदल में सीधे उछला था जिसके बाद इन सभी पर प्रतिबन्ध लगाए गए | शारजाह उस दौर में सटोरियों की शरणस्थली  बन गया जिसके बाद वहाँ  पर मैच खेलने प्रतिबंधित कर दिये गए | पिछली बार लन्दन में पाक खिलाडियों का नाम भी फिक्सिंग के चलते बदनाम हुआ जिसके बाद उनकी टीम से छुट्टी कर दी गई लेकिन उसके बाद भी फिक्सिंग का दौर थमा नही | आई पी एल के पिछले सीजन में भी मोहनीश मिश्रा , टी पी ,अमित यादव , शलभ, अभिनव बाली को एक स्टिंग में पकड़ा गया जिसके बाद उन पर आई पीएल में एक साल का प्रतिबन्ध लगा दिया गया था | उसके बाद बी सी सी आई ने काह भविष्य में आई पी एल मैचो में अब फिक्सिंग नहीं हो पाएगी क्युकि अब बी सी सी आई ने एंटी करप्शन विंग बना दी है जो यह  सारे मामले पकड़ लेगी लेकिन हैरत की बात तो यह है इस बार आई पी एल के मैचो में क्या इस कमेटी को सांप सूंघ गया था ?  तीन खिलाडियों ने तो बकायदा नए नवेले तरीको से स्पॉट फिक्सिंग का ताना बाना बुना जिसमे तोलिये, लाकेट और कलाई की घडी से मुनाफे का भारी खेल चंद ओवेरो में खेला |



दरअसल इस देश में क्रिकेट एक बड़े बजार का रूप ले चुका है | इसे बाजार का रूप देने में मीडिया की भी बड़ी भूमिका रही है | क्रिकेट खिलाडियों की छवि विज्ञापन जगत में ऐसे ब्रांड का रूप ले चुकी है जिसमे दिखने वाले ग्लैमर के बाद आम आदमी उस प्रोडक्ट की और खिंचा चला आता है | वहीँ इन क्रिकेट के खिलाडियों को क्रिकेट के अलावा विज्ञापनों से और आई पी एल से करोडो की कमाई साल दर साल हो रही है साथ ही अब तो बी सी सी आई ने खिलाडियों के कई ग्रेड भी निर्धारित किये हैं जिनके अनुरूप उनको रिटायरमेंट के बाद भी पैसो की बारिश हो रही है | शायद यही वजह है इस दौर में कॉर्परेट भी अब आई पी एल के तमाशे में अपना भविष्य सुनहरा देख रहा है जहाँ अम्बानी से लेकर नाईट राईडर्स शाहरुख  सभी अपने अपने हित साधने में लगे हुए हैं | अकूत धन सम्पदा के चलते क्रिकेट अब सट्टेबाजी के लिए सबसे माकूल है | भारत में तो अब छोटे शहरों से लेकर बड़े शहरो तक क्रिकेट की आड में बड़े बड़े सट्टे नुक्कड़ चौराहों में खेले  जा रहे हैं लेकिन यह पहला मौका है जब आई  पी एल के उस आयोजन में जिसमे कारपोरेट ने अपना सब दाव पर लगाया है जहाँ  दाऊद   सीधे दुबई और कराची सरीखे शहरों में बैठकर अपना हित  सट्टेबाजो  के आसरे साध रहा है  वहीँ फटाफट क्रिकेट का यह आई पी एल संस्करण ज्यादा दर्शक वर्ग को जहां खीच रहा है वहीँ क्रिकेटर भी यह जान रहा है टीम इंडिया में जगह बनाना इस दौर में कितना मुश्किल है और सेलेक्टर किस तरह अपने अपने राज्यों के खिलाडियों को टीम में जगह देते हैं यह किसी से इस दौर में  छुपा नहीं है | ऐसे में खिलाडी कम समय में आई पी एल के जरिये पैसा कमाना चाहते हैं जहां वह दर्शकों से खिलवाड कर पैसे के तमाशे के नाम पर कुछ भी करने को तैयार खड़े दिखते हैं और आई पी एल की यह गाथा किसी कलंक कथा से कम तो इस समय नजर नहीं आती क्युकि कई सफेदपोश लोगो के नाम से पर्दा हटना अभी बाकी है जिसमे राजनेताओ के साथ कई क्रिकेटरों और हसीनाओ के चेहरे बेनकाब हो सकते हैं |                       

अमित शाह के आसरे यूपी में हिंदुत्व की वैतरणी पार करेगी भाजपा

दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। " यह कथन भारतीय राजनीती के सम्बन्ध में परोक्ष रूप से सही मालूम पड़ता है |  एक दौर वह था जब आजाद भारत के लगभग सभी राज्यों में मुख्यमंत्रियों का ताज ब्राहमण जाति के उम्मीदवार को मिलता था । ब्राहमण जाति के सत्ता के सर्वोच्च उतुंग शिखर पर चढ़ने के कारण सचिवालय से लेकर मंत्रीमंडल तक में उस दौर में ब्राह्मण बिरादरी का सेंसेक्स अपने उच्तम स्तर तक बना रहता था लेकिन धीरे धीरे समय बदला और यह ब्राह्मण समाज सत्ता से दूर जाता गया। आज बसपा सरीखी पार्टी की "सोशल इंजीनियरिंग " की बिसात पर यही ब्राह्मण समाज दलितों के साथ हाथ मिलाकर निचले स्तर पर बैठकर राजनीती की सवारी करता नजर आ रहा है । ऊपर  की   जा रही ये बातें आपको थोडी अटपटी लग रहीं हो परन्तु हम इस फंडे को बेहतर ढंग से समझ सकते है । यदि हम बात इस प्रसंग में भारत के 80 सांसदों वाले सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के सम्बन्ध में करे तो बात समझ में आ जाती है। आज उत्तर प्रदेश में यही हो रहा है। हालाँकि कुछ समय पहले तक बहुजन समाज के हितों की बात करने वाली बसपा ब्राह्मणों को "बेक फ़ुट" पर धकेल दिया करती थी उसके संस्थापक नेता कांशी राम कहा करते थे "तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार" । इन परिस्थितियों को समझने से पहले कांशी राम द्वारा  उस समय कही गई बात को  हमें समझना पड़ेगा ।   उस दौर में उन्होंने कहा था "मै ब्राह्मणों से कह रहा हूँ जात तोड़ो और समाज जोडो लेकिन यह तबका मेरी बात नही समझ पा रहा है एक समय आयेगा जब मै इन्ही के मुह से कहलाऊंगा जात और बंधन छोड़ो और समाज को जोड़ो " आज उत्तर प्रदेश मै यही हो रहां है ।  बड़े  पैमाने पर भाजपा और कांग्रेस का ब्राह्मण वोट आपस में छिटक गया है और यही वोट बसपा और सपा में बंट   गया है ।

किसी समय "चल गुंडन की छाती पर मुहर लगेगी हाथी पर" जैसे नारों को देने वाली बहिन जी ने  बीते सालो में नए नारे " हाथी नही गणेश है ब्रह्मा विष्णु महेश है" के आसरे अगर उत्तर प्रदेश में अपनी सियासी बिसात को बिछाने में सफलता पायी है तो इसका कारण देश के भीतर मौजूद विभिन्न समुदायों से जुड़े करोडो लोग है जिनके जरिये विभिन्न राजनीतिक दलों ने धर्म के नाम पर वोटरों को बांटकर अपनी सत्ता को मजबूत किया ।  अब आज के विकास वाले दौर में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच मजहब और जात सरीखी सियासत का ग्राफ नीचे चला गया जिसके मर्म को अच्छे से पकड़कर बसपा सरीखी पार्टियों ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिये ध्वस्त कर डाला । वह भी एक दौर था जब अपने को शिखर पर चढ़ा हुआ देखने पर ब्राह्मणों को यह नही सुहाता था कि कोई दलित उसके आस पास फटके ......

लेकिन आज हालत एकदम उलट हैं ।  उत्तर प्रदेश का ब्राहमण समाज उस नेत्री की छाया मे काम करने में असहज महसूस नहीं करता   जिसने फ़ोर्ब्स पत्रिका की महिलाओ की सूची मे अपना स्थान हाल के वर्षो में ना केवल बनाया है बल्कि माया ने त्याग की मूरत कही जाने वाली कांग्रेस की "सोनिया " को भी पीछे छोड़ दिया है तो यह राजनीती के नए बदलते  मिजाज  को बतलाता है । ."एक समय आयेगा जब पत्थर भी गाना गायेगा मेरे बाग़ का मुरझाया फूल फिर से खिल खिला जाएगा" .....किसी कवि द्वारा कही गयी इस कविता मे गहरा भाव छिपा है समय बदलने के साथ सभी दल अपने को ढाल लेते है सो बसपा के साथ भी  बीते दौर में  यही हुआ है उसमे नया सोशल बदलाव आ गया है.... हाल के समय में उसकी नीतिया बदल गयी है सभी को साथ लेने का नया चलन शुरू हुआ जिसे सोशल इंजीनियरिंग नाम दिया गया है इस फोर्मुले को लगाने मे सतीश चंद्र मिश्रा का बड़ा योगदान रहा जिनको यह अच्छी से पता था किस प्रकार सभी पार्टियों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है ......

आज यह हाथी सभी के लिए बड़ा सर दर्द बन गया है ...इससे भी बड़ा संकट यह है कि  उत्तर प्रदेश का ब्राहमण समाज बहिन माया की कप्तानी मे इंडियन पोल लीग का हर गेम खेलने को तैयार दिखता है । वही सत्तारुढ समाजवादी पार्टी भी अब समझ  रही है अगर  आने वाले दिनों में केंद्र में बड़ी ताकत के रूप में उसको उभरना है तो रास्ता उत्तर प्रदेश से ही जाएगा जहाँ पर वह ब्राह्मण और हिन्दुओ के प्रति उदार रवैया अपनाकर  ही अपनी बिसात  मजबूत कर सकती है ।    यह सवाल सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में  जिसको कचोट रहा है वह है  उत्तर प्रदेश  की भाजपा ।  यू पी  मे पार्टी की सेहत सही नही चल रही है.....  इस बीमारी का तोड़ निकालने मे किसी डॉक्टर को सफलता नही मिल पा रही है..... डॉक्टर के कई दल सेहत को चेक करने वहां जा चुके है लेकिन फिर भी तबियत में सुधार नही आ पा रहा है ... हर बार .डॉक्टरो के दल को भी बेरंग वापस लौटना पड़ रहा है।  बीजेपी की प्रदेश  मे डगमग हालत के चलते उसका हाई कमान भी चिंतित है ।  चिंता लाजमी भी है क्युकि चार  राज्यों के विधान सभा के चुनाव होने जा रहे है ऐसे में बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपने गृह प्रदेश को लेकर  अभी से हाथ पैर मारने में लग गए है।
हाल ही मे   प्रदेश में   चुनाव प्रचार की कमान  पूरी तरह  नरेन्द्र मोदी के दाहिने हाथ अमित शाह  को   सौपे जाने को विश्लेषक  एक नई  कड़ी का हिस्सा मान रहे है । . सूत्र बताते है कि संघ माया द्वारा जीते गए पिछले विधान सभा के चुनावो से कुछ सबक लेना चाह रहा है लेकिन राजनाथ  की इस साल बिछाई  गई बिसात में संघ की एक भी नहीं चल रही ।   इसी के चलते  इस बार  चुनाव में उत्तर प्रदेश में कद्दावर नेताओ को एक एक करके चुनावो से किनारे लगाया जा रहा है ।  राजनाथ  की बिसात  " जिताऊ " उम्मीदवारों के रास्ते जहाँ गुजरती  है वही  संघ का रास्ता उसके स्वयंसेवको  और पार्टी का झंडा लम्बे समय से उठाये नेताओ के आसरे गुजरता है  ।   दिल्ली मे पार्टी के एक नेता की माने तो इस बार अपने हाई टेक फोर्मुले के सहारे राजनाथ  माया के साथ जा मिले ब्राहमण वोट बैंक को वापस अपनी तरफ लेने की कोशिशे ना केवल  तेज कर रहे हैं बल्कि कांग्रेस के वोट बैंक पर सपा के जरिये सेंध   लगा रहे हैं । अगर भाजपा का इस बार का हिंदुत्व कार्ड अमित शाह के जरिये चल गया तो  जा रहा है  भाजपा और सपा को लाभ मिलना तय है ।  पार्टी के नेताओ का मानना है कि  ब्राहमण   वोट बैंक शुरू से उसके  साथ रहा है लेकिन बीते कुछ  चुनावो मे यह माया मैडम के साथ जा मिला तो वहीँ इस बार के विधान सभा चुनावो में यह सपा के पास गया ।  इसको फिर से अपनी  ओर लाकर ही  उत्तर  प्रदेश  में पार्टी की ख़राब हालत सुधर सकती है शायद इसी के मद्देनजर भाजपा के नाथ  की बिसात में जहाँ वह एक छोर  पर  खुद  राजनाथ खड़े   हैं  तो दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी के  कार्ड को खेलकर उसने ब्राहमण और ठाकुर  वोट के अलावे अन्य पिछड़े वोट  को अपने  पाले में लाने का नया फ़ॉर्मूला बिछाया है ।

यह बताने कि जरुरत किसी को नहीं कि राजनाथ और कलराज के समर्थक उत्तर प्रदेश में शुरू  से एक दूसरे के आमने सामने खड़े रहते थे । . पहली  बार अपनी बिसात में  राजनाथ ने नई व्यूह रचना इस प्रकार की है जिसके जरिये हिन्दू वोट बैंक को पार्टी अपने पाले में ला सके ।. यही नहीं इस बार राजनाथ  ने  जहाँ  एक ओर  प्रदेश  अध्यक्ष लक्ष्मी कान्त वाजपेयी  खेमे को भी चुनावी चौसर बिछाने में साथ लिया है तो वहीँ  कल्याण सिंह ,  उमा भारती को "स्टार प्रचारक " बनाकर और पिछड़ी जातियों के एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में लाने की  गोल बंदी कर डाली है  ।  इतना जरुर है इन सबके  जरिये पहली बार राजनाथ  ने संघ की हिंदुत्व प्रयोगशाला के सबसे बड़े झंडाबरदार  योगी आदित्यनाथ और विनय कटियार सरीखे नेता को अगर टिकट चयन से दूर रखा है तो समझा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के चुनावो में किस तरह  संघ ने अपने लाडले राजनाथ पर पूरा भरोसा जताया है ।  यही नहीं इस बार  राजनाथ  ने टिकट  जीतने वाले उम्मीदवारो  को देने के  अपने इरादे जता दिए है जिससे लम्बे समय से पार्टी का झंडा उठाये हुए नेताओ की दाल  गलनी मुश्किल दिख  रही है क्युकि वही नेता टिकट   पाने में कामयाब होगा जो अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की चुनावी बिसात में फिट बैठेगा । वही अमित शाह को आगे कर मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपना बड़ा दाव चलकर एक बार फिर अपने कदम दिल्ली के सिंहासन की तरफ बड़ा दिए हैं । मोदी इस बात को बखूबी समझ रहे हैं अगर भाजपा ने आगामी लोक सभा चुनाव में दिल्ली में सरकार बनानी है तो  लिटमस टेस्ट उत्तर प्रदेश में ही होगा । यहाँ अच्छा  करने  पर ही पार्टी केंद्र में सरकार  बनाने का दावा ठोक  सकती है ।       .  
 कुछ महीने पहले से ही पार्टी संसदीय बोर्ड में  हिंदुत्व के मुद्दे पर चर्चा की अटकलें सुनाई दे रही थी  ।  उत्तर प्रदेश भाजपा की  हिंदुत्व प्रयोगशाला का पहला पड़ाव रहा है जहाँ राम लहर की  धुन बजाकर  भाजपा  ने कभी राज्य में अपनी सरकार बनाई थी ।  पार्टी  के नेता मानते है हिंदुत्व की आधी मे वह केन्द्र मे सत्ता मे आयी लेकिन अपने कार्यकाल मे उसने कई मुद्दों को ठंडे बस्ते मे डाल दिया जिस कारण केन्द्र में यू पी ऐ की सरकार आ गयी और बीजेपी अवसान की ओर चली गयी ......इस बार पार्टी फिर हिन्दुत्व पर वापस लौटने  का मन बना रही है हालाँकि राजनाथ ने  अमित शाह को उत्तर प्रदेश में उतारे जाने  पर सीधे कुछ भी कहने से परहेज किया है लेकिन पार्टी की चाल  ढाल देखकर ऐसा लगता है कि वह अपनी हिंदुत्व की आत्मा को अलग कर नही चल सकती और मोदी उसकी इस बिसात में उत्तर प्रदेश में तारणहार बन सकते हैं । अयोध्या आन्दोलन के दौर में उत्तर प्रदेश में  की  नैय्या  इसी हिन्दू कार्ड ने पार लगाई और अब भाजपा मोदी के जरिये राजनीति के मैदान पर ध्रुवीकरण वाला वही फार्मूला चल रही है  जिसने नब्बे के दशक में भाजपा को बड़ी पार्टी के रूप में ना केवल उभारा  बल्कि हिंदुत्व की छाँव तले  उसे राष्ट्रवाद से जोड़ा ।  आज के दौर में भाजपा के पास मोदी के अलावा कोई  चेहरा  नहीं है जो बड़े पैमाने पर  वोटो का ध्रुवीकरण कर पार्टी की सीटें बड़ा सके  और इसी को ब्रांड बनाकर भाजपा विकास के जरिये मोदिनोमिक्स की छाँव तले उत्तर प्रदेश के अखाड़े में कदमताल  कर रही है ।  बड़ा सवाल यह है कि वह सबको साथ लेने के किस फोर्मुले पर चलेगी ? इतिहास गवाह है केंद्र में सत्ता  हथियाने के बाद पार्टी मे पिछडे नेताओ को उपेक्षित बीते कुछ समय  से रखा जाता रहा है।

 जब पार्टी मे यह तय हो चुका है वह आगामी चुनाव मे अपने ओल्ड एजेंडे पर चल रही है तो ऐसे मे पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश  सबसे बड़ी रन भूमि बन गया है । यही वह प्रदेश है जहाँ की सांसद  संख्या दिल्ली का ताज तय करती है। तभी तो माया जी यहाँ से अपने सर्वाधिक सांसद जितवाकर दिल्ली मे प्रधानमंत्री बन्ने के सपने अभी से देख रही है जिसके बारे में उन्होंने अपनी किताब "बहनजी " मे भी बताया है तो वहीँ पहली बार नेताजी उत्तर प्रदेश को साधकर केंद्र का रस्स्ता अपने लिए  कर रहे हैं । वैसे भी पूत के पाव पालने मे ही दिखाए देते है । बीजेपी भी इसको अच्छी तरह से जानती है, तभी वह आजकल बसपा की सोशल इंजीनियरिंग का तोड़  निकालने मे जुटी है।   साथ ही वह समाजवादी पार्टी  द्वारा  कराए जा रहे ब्राह्मण सम्मेलनों से परेशानी  में  है ।


बीजेपी के अन्दर के सूत्र बताते है कि ब्राह्मणों को लुभाने की मंशा  से पार्टी ने अपने  ट्रंप  कार्ड फैक दिए है जो पार्टी का जहाज उत्तर प्रदेश  में  बचाने की  पूरी कोशिश  करेंगे। . पहला कार्ड राजनाथ  सिंह  का है जो इसी गृह प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं ।  वह ख़ुद  ठाकुर  है ।  दूसरा कार्ड राज्य मे मौजूद पार्टी अध्यक्ष लक्ष्मी कान्त वाजपेयी  का है  का है जो खुद  ब्राह्मण है।  तीसरा  कार्ड  जो  फेंका  गया है वह है  वरुण गाँधी जिनको पार्टी महासचिव बनाकर इस बार अपने संसदीय बोर्ड में ले आई है ।   उत्तर प्रदेश में अपने भड़काऊ भाषणों के जरिये वह दूसरे  हिन्दू ह्रदय सम्राट  का झंडा लम्बे समय  से  उठाये हुए   है । लखनऊ  में   अटल बिहारी की खडाऊं पहनकर  लाल जी टंडन लखनऊ से सांसद तो है ही साथ ही यू पी की सियासत को बखूबी समझते है  ।  अब इन्ही के संसदीय इलाके से भाजपा उत्तर प्रदेश में अपना मिशन मोदी अमित शाह के आसरे चलने जा रही है जिनकी गिनती कुशल संगठनकर्ता के रूप में होती   आई है और अपने चुनावी प्रबंधन   को  उन्होंने  गुजरात में साबित भी  किया है ।  मोदी उत्तर प्रदेश के अखाड़े में फैंके जा रहे ऐसे इक्के हैं  जिसके जरिये पार्टी पिछडो के एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में लाने की जुगत में है साथ ही मोदी के नाम पर उत्तर प्रदेश चुनावो में भाजपा के चुनावी प्रबंधन में कॉर्पोरेट घरानों के फाईनेंसर  बनेंगे क्युकि  वह संघ  के साथ ही कॉर्पोरेट के लाडले हैं   ।  वैसे भी चुनाव  पैसो  के बल पर इस  देश में  लड़े   जा रहे है और यही कॉर्पोरेट घराने उत्तर प्रदेश में मोदी की बिसात बिछायेंगे ।    पार्टी का मानना है  राज्य मे ब्राहमणों   की बड़ी संख्या  १६ वी  लोक सभा चुनाव मे उसका गणित सुधार सकती है साथ मे हिंदुत्व का मुखोटा फिर से पहनने  से उसका खोया जनाधार  वापस आ सकता है । वैसे भी ९० के दशक  मे राम मन्दिर की लहर ने हिंदू वोट को उसकी ओर खीचा था जिसके बूते सेण्टर मे न केवल उसकी  सीटें  बढ़ी  बल्कि केंद्र  मे वाजपेयी की सरकार भी सही से चली भी  थी । .

राजनाथ  पार्टी की केंद्र में सत्ता  में वापसी   के लिए उत्तर प्रदेश  पर टकटकी लगाये हुए है..... वह इस बात को जानते है कि  पार्टी की  उत्तर प्रदेश  में  इस बार पतली हालत होने पर उनका सपना पूरा नही हो पायेगा।  वैसे भी उत्तर प्रदेश   फतह के बिना दिल्ली मे सरकार की कल्पना करना मुंगेरी  लाल के हसीन  सपने देखने जैसा है अतः पार्टी पहले इस यू पी  की चुनोती से पार पाना चाहती है । लोक सभा के लिए बीजेपी  अभी से कमर कस चुकी है । पार्टी द्वारा पिछले  चुनाव मे अपने एजेंडे से भटकने के कारण  संघ भी इस  बार अपने को यू पी के चुनावो से दूर कर रहा है। . संघ मानता है बसपा की हाथी की बदती धमक कमल के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है.... दलित और मुस्लिम वोट शुरू  से कांग्रेस के साथ रहा है लेकिन पिछले कुछ  चुनाव मे यह बसपा और सपा  के साथ जा मिला..... प्रदेश के ब्राहमण मतदाताओ  के  मुलायम   के  साथ इस विधान सभा चुनाव में  जाने से भाजपा  की हालत  सबसे ख़राब हो गयी है अतः राजनाथ  का रास्ता  ब्राहमणों के वोट बैंक  को बीजेपी के साथ लेने की कोशिशो  मे जुटा है। .

 बीजेपी बीते  चुनावो  से इस बार सबक ले रही है। . समय समय पर उत्तर प्रदेश  को लेकर मीटिंग हो रही है।    चार राज्यों के विधान सभा  चुनाव से पहले  उत्तर प्रदेश को लेकर गंभीर मंथन हो रहा है ।   यू पी की पीठ पर जमकर नेट अभ्यास किया जा रहा है । बीजेपी के अध्यक्ष  राजनाथ    के पास विरोधियो को राजनीती की पिच  पर मौत देने का तोड़  है।  चेस के मैच पर अगर गोटी बिछी    हो तो राजनाथ  विरोधियो की हर चाल को पहले ही जान जाते है । .अपनी छमताओ  को वह बीते कुछ वर्षो मे  बिहार, हिमांचल, उत्तराखंड , गुजरात मे साबित कर चुके है । अब बारी उनके खुद के प्रदेश उत्तर प्रदेश की है जहाँ के वह  मुख्य मंत्री भी रह चुके है ।  यह  बड़ा प्रदेश है ।  हालात  अन्य प्रदेश से अलग है..... यहाँ पर खेलने के लिए बड़ा दिल रखना पड़ता है।  मैच टेस्ट क्रिकेट की तरह है जहाँ नेट पर जमकर पसीना बहाना पड़ता है साथ मे लंबे समय तक मैदान में टिकने  की कला भी  होनी चाहिए.... गेदबाज के एक्शन से पहले बोल परखने की कला होनी चाहिए.... पार्टी की  उत्तर प्रदेश  में हालत सही करने का जिम्मा अब राजनाथ   और मोदी   के कंधो  मे है । उनको अच्छा तभी कहा जा सकता है जब वह पार्टी को  प्रदेश  मे अच्छी सीट दिलाने में मदद करें.....इस बार अमित शाह को सह प्रभारी के रूप में   रामेश्वर चौरसिया का भी   जा रहा है जो बिहार से ताल्लुक रखते हैं और जो अमित शाह के साथ युवा मोर्चे में भी संगठन का काम देख चुके हैं ।


 २००२ के  चुनाव में बीजेपी को विधान सभा मे ४०२ सीट् मे ५१ सीट ही मिल पाई..... १४६ मे उसके जमानत जब्त हो गयी इसके बाद वहां के चुनाव मे पार्टी चार  नम्बर पर आ गयी । इसके  बाद तो पार्टी का  २००७   मे ऐसा जनाजा  निकला  पार्टी की माली  हालत  खस्ता  हो गयी। . ऐसे मे अपने राजनाथ ,अमित शाह  के सामने  उत्तर प्रदेश की  पुरानी  खोयी हुई जमीन को बचाने की बड़ी चुनौती  है.......  देखना होगा   गडकरी कि इस नयी बिसात में वह क्या करिश्माँ कर पाते   हैं ।    वह भी ऐसे समय में जब  राज्य में पार्टी के पुराने  संजय जोशी, विनय कटियार, योगी आदित्यनाथ   सरीखे चेहरे हाशिये  पर है। लोक सभा चुनावो की बात  तो उत्तर प्रदेश मे भाजपा का ग्राफ  लगातार नीचे जा रहा है ।   छियानब्बे   से पार्टी यहाँ पार्टी दस सीट  से  ज्यादा नहीं जीत पायी है ।



 राजनाथ  की इस बार  की  बिसात में अगर अमित शाह , रामेश्वर चौरसिया   की चौसर बिछी है तो वही  असंतुष्ट नेताओ से  पार पाना भी भाजपा की बड़ी मुश्किल बन सकता  है क्युकि अगर इस चुनाव में योगी, कटियार , उमा  भारती , कलराज ,संजय जोशी सरीखे कई कद्दावर नेताओ की  एक भी नहीं चलेगी  और उनके जैसे कई कार्यकर्ता जो पार्टी का झंडा  वर्षो  से उठाये है वह भी अगर इस दौर में मोदी की बिसात पर प्यादा भर बन हाशिये  में चले गए हो तो ऐसे में कीचड में कमल खिलने में  परेशानी हो सकती है ।  वैसे भी पिछले दिनों बाबू सिंह कुशवाहा  के मुद्दे पर पार्टी की खासी किरकिरी हो चुकी है तो वहीँ लगातार एक के बाद एक चुनाव हारने और अपने सुरक्षित गड़ो  को ना  पाने की कसक कार्यकर्ताओ  में आज भी हैं जो इस दौर में  मान रहे हैं "पार्टी विथ दिफरेन्स " का  भी चलन भी कांग्रेस की  बी टीम जैसा हो चला है ।   ऐसे में चुनावी डगर  मुश्किल दिख रही है।  फिर भी संघ  की गोद से  निकले राजनाथ  सिंह अगर कलराज , योगी ,कटियार  लाल जी टंडन , उमा भारती, कल्याण सिंह सरीखे चेहरों के अलावे बीते पांच अध्यक्षों की चौकड़ी को दरकिनार कर अमित शाह और नमो  के  जरिये  पूरे उत्तर प्रदेश को  साधने की कोशिश कर रहे है तो उसे उत्तर प्रदेश में भाजपा के डूबते जहाज को बचाने की अंतिम कोशिशो के तौर पर  ही देखा जाना चाहिए......

गुरुवार, 16 मई 2013

जम्हूरियत की जंग में जश्न-ए-नवाज

किसी ने कहा है इतिहास अपने को दोहराता है और राजनीति में हमेशा दो  दूनी चार नहीं होता। 14 साल पहले जिस नवाज शरीफ को पाकिस्तान छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था आज वही नवाज शरीफ तीसरी बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। वहीं संयोग देखिए वक्त का पहिया कैसे घूमा और कैसे पाकिस्तान में  राजनीति एक सौ अस्सी डिग्री पर घूम गई। यह पूर्व तानाशाह मुशर्रफ की नजरबन्दी से समझी जा सकती है जिनको इस बार चुनाव लड़ने के अयोग्य न केवल घोषित कर दिया गया बल्कि उनको सत्ता पथ पर फटकने से रोकने के लिए सभी दल जम्हूरियत की जंग में साथ-साथ कदमताल भी करने लगे।
   
पाकिस्तान में सैन्य शासकों के शासन  से  आवाम की बेरूखी और फिर लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव में अपने बैलेट द्वारा सहभागिता यह बताने को काफी है कि मौजूदा तौर में पाक में जम्हूरियत की बैचेनी किस कदर सुनाई दे रही है। साढ़े छह दशकों के लम्बे इतिहास में लोगों का विशाल जनसैलाब बलूचिस्तान से लेकर सिन्ध और पंजाब से लेकर खैबर पख्तून की सड़कों पर वोट डालने लोकतांत्रिक सरकार के चुनने निकला उसने पहली बार न केवल तालिबानी कठमुल्लों के हौसलों को अपने वोट की ताकत से आईना दिखाया बल्कि जम्हूरियत की इस नई जंग में कट्टरपथियो के होश भी ठिकाने लगा दिये। तालिबान की धमकियों से बेपरवाह होकर महिलाओं ने भी पाक की सड़कों पर खुले घूमकर जिस तरह इस बार मतदान किया उससे पाक में लोकतंत्र की एक नई सुबह का आगाज सही मायनों में हुआ है। व्यापक हिंसा, सैकड़ों मौतों के बाद 60 फीसदी के आसपास हुए मतदान से लोकतंत्ररूपी जो बयार पाक में चली है उसे पाक के भविष्य के लिए हम शुभ संकेत मान सकते हैं।

नेशनल असेम्बली की 272 सीटों के लिए हुए मतदान में नवाज की पार्टी पीएमएल (एन) 123 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में न केवल उभरी बल्कि पाक की राजनीति में उसने इस चुनाव में पीपीपी और तहरीक-ए इंसाफ जैसी कई पार्टियों को दहाई के अंकों में समेट दिया। सबसे बड़ी पार्टी के रूप में पीएमएलएन के उभरने के बाद नवाज शरीफ का प्रधानमंत्री बनना तय है। वह तीसरी बार पाक की सत्ता संभालने जा रहे हैं। नवाज शरीफ को मिला यह जनादेश पाक में पीपीपी की अलोकप्रियता का एक ताजा प्रमाण है। एन्टी एनकम्बेन्सी फैक्टर ने भी इस चुनाव में पीपीपी के तिलिस्म को तोड़ने का काम किया है। साथ ही उन राजनीतिक पंडितों के आंकलन को झुठला दिया है जो इस चुना वमें इमरान खान को पाक की राजनीति का उभरता चेहरा बताने पर तुले थे। इस चुनाव से पहले ब्रिटिश काउंसिल की एक रिपोर्ट में नवाज शरीफ और इमरान की पार्टी में कांटे की टक्कर बताई गई थी लेकिन चुनाव परिणामों ने सेफोलाजिस्टों की घिग्घी बांध दी है। खैबर पख्तून में जहां इमरान ने अपना दबदबा इस चुनाव में कायम किया तो वहीं जरदारी की पीपीपी सिंध में अपनी लाज बचाने में सफल हो गई। वहीं नवाज की पीएमएल (एन) ने पंजाब, बलूचिस्तान में अपनी शानदार जीत से अन्य पार्टियों को सत्ता में आने से रोकने का काम किया है। पाकिस्तान का यह चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा क्योंकि सेना ने जहां चुनावी प्रक्रिया में अपने को दूर रखा वहीं बम धमाके और हिंसा के साये के बाद भी वोटरों में मतदान को लेकर उत्साह दिखा। यह पहला मौका है जब पाकिस्तान में सत्ता हस्तान्तरण का एक नया दौर  देखने को मिल रहा है जहां आवाम मताधिकार के आसरे लोकतंत्र में सहभागिता को लेकर लोकतंत्ररूपी उत्सव में अपनी भागीदारी वोट से कर रहा है। इस चुनाव में पाक के आवाम का बड़ा तबका जिस तरह कट्टरपंथियों के सामने खड़ा हुआ है उसने पूरे विश्व को एक नया संदेश दिया है कि अब फौजी शासन की फरेबी स्टाइल देश को नहीं बचा सकती। स्थिर और खुशहाल पाकिस्तान का सपना लोकतंत्र में ही साकार हो सकता है। 60 फीसदी से ज्यादा लोगों ने मतदान में भाग लेकर जम्हरियत के प्रति अपने विश्वास को प्रकट करने का काम किया है क्योंकि 70 के दशक के बाद यह पहला मौका रहा जब तमाम धमकियों के बावजूद लोग अपने घरों से बाहर निकले।

    पाक में जम्हरियत की इस जंग में नवाज शरीफ खरा उतरे और लोगों ने जिस विश्वास के साथ उन्हें आंखों पर बिठाया है उसके बाद उन पर लोगों की उम्मीदों को पूरा करने की एक कठिन चुनौती सामने खड़ी है। शायद इसी वजह से जीत के बाद नवाज ने पूरे आवाम को अपना शुक्रिया अदा किया। उन्होंने इस दौरान मुल्क में न केवल अमन चैन बहाल करने की वचन बद्धता दोहराई बल्कि पड़ेसी देशों में भी सम्बध सुधारने पर अपना जोर दिया। वैसे नवाज शरीफ ने अपनी पूरी चुनावी कैम्पेनिंग में कश्मीर के मुद्दे से दूरी तो बनाई ही साथ ही कारगिल की जांच  और मुम्बई हमले के दोषियों पर कार्यवाही करने का भरोसा जताकर भारत के प्रति अपने विश्वास को बहाल करने का काम किया है। शायद इसी वजह से चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन को पाक की यात्रा का निमंत्रण देने में देर नहीं दिखाई।
   
पाकिस्तान में तीसरी बार सत्ता में वापसी के बाद नवाज शरीफ ने अपने को न केवल शेर साबित किया बल्कि उन आलोचकों का भी मुंह बन्द कर दिया है जो पाकिस्तान में नवाज की वापसी को मुश्किल मान रहे थे। अब नवाज के सामने पड़ोसियों से ज्यादा आंतरिक समस्याओं का पहाड़ सामने खड़ा है। तालिबान अभी भी पाकिस्तान की जहां गर्दन मरोड़ रहा है वहीं अफगानिस्तान से अमरीका की फौजों की अगले साल हो रही वापसी के बाद नवाज के सामने असल मुश्किल खड़ी हो सकती है क्योंकि ऐसे हालातों में तालिबान पाक की गर्दन तोड़ेगा अतः उसके मुकाबले के लिए नवाज को अभी से तैयार रहना होगा। पाक में कट्टरपंथी उन्मादी प्रवृत्ति के लोग आज भी आये दिन वहां खून खराबा और आतंक बढ़ा रहे हैं जिससे जूझने की कठिन चुनौती नवाज के सामने खड़ी है। इस समय पाक की अर्थव्यवस्था सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। आवाम दाने-दाने के लिए जहां मोहताज है वहीं गैस सिलेण्डर, खाद्य सामग्रियों के दाम तो आसमान छू रहे हैं। साथ में कई इलाके बिजली संकट से जूझ रहे हैं। आये दिन होने वाले धमाकों से कोई नया निवेश पाक में नहीं हो पाया है जिससे अर्थव्यवस्था बेहाल  है। ऐसे में देखना होगा वह पाक में अपनी तीसरी पारी में क्या करिश्मा दिखा पाते हैं? वह भी ऐसे हालातों में जब बीते 7 सालों में अमरीका ने 20 अरब डालर की मद्द से उसे दीवाले होने से बचाया है और यही नवाज अपने चुनाव प्रचार में अमरीका और उसके नीति नियंताओं को बड़े-छोटे मंचों से लगातार कोसते ही रहे।
   
नवाज 1990 और 1997 के दौर में प्रधानमंत्री रह चुके हैं। यह तीसरा मौका है जब वह पाक की कमान संभालने जा रहे हैं। लेकिन पिछली यादों को भुलाना उनके लिए आसान नहीं होगा। दो बार सेना ने लंगड़ी देकर न केवल उन्हें सत्ता से हटाया बल्कि अपने दोनों कार्यकाल में वह सेना की कठपुतली बनाकर राजपाट संभालते रहे। नवाज  ने  भले  ही    इस चुनाव  में पाक की आंतरिक   समस्याएं  दुरूस्त   करने  और सरकार  में सेना  के किसी   तरह  को हस्तक्षेप  से  इंकार    होने के  सब्जबाग  दिखाए  लेकिन  यह सब  करना आसान  नही  है ।   वह भी  उस मुल्क  में जहा बीते   65 सालो   से सरकार  में सेना  का सीधा  दखल  रहा है   और  विदेश नीति   से लेकर  आंतरिक   सुरक्षा  सभी सेना तय  करती  रही  है।  यही  नही सेना  को हर  मसले  पर  आईएसआई   भी  समर्थन  करती  रही है।  ऐसे  हालातो  में नवाज  को सेना  से सीधे   दो  -दो  हाथ  करना  पड़  सकता  है।  जाहिर  है  इन परिस्थियों  में उन्हें खुद को अभी से तैयार करना होगा  ।  इन परिस्थियों में   वह  फौज  से टकराव  नही  लेना चाहेगे   ।  हाल   के वर्षो   मे पाक  के  अंदरूनी   हालात  बहुत  अच्छे  नही रहे  है।  आंतकी  ताकतों  ने वहां   के  मासूम   नागरिको   का  अमन   चैन   छीन  लिया ।  माहौल  कितना  खराब   है  यह  वहा  आये  दिन   होने  वाले  हमलो  से समझा  जा सकता   है।  पाक  का  इतिहास  बतलाता  है   वहा जम्हुरियत   की  हवा  का स्वांग   भले  ही  समय समय  पर  रचा  जाता   रहा  हो  लेकिन   सेना के बिना  पत्ता  भी  नही  हिलता  ।  जरा  सा  दाये   -बाये   करने    पर   तख्ता   पलट   आम   बात  है।  जाहिर  है  मिया  नवाज   के  जेहन में  यह   सारी  बाते   अब   भी  कौंध   रही  होगी ।   90   के दौर  को याद   करे   तो  मुशर्रफ   मिया नवाज   की  वजह  से सेना  प्रमुख  बने  क्योकि    वरिष्ठता  के आधार    पर उनसे   पूर्व  दो  लेफ्टीनेन्ट   जनरल  आगे थे  लेकिन  नवाज    के भाई   शाहबाज   शरीफ  के कहने  पर  मिया नवाज    ने मुशर्रफ   के नाम    पर  किसी तरह का  एतराज    नही   जताया  । वही   मुशर्रफ   ने मौका   पाकर   न केवल  12  अक्टूबर   1999   को  नवाज   शरीफ   को सत्ता  से  न केवल   बेदखल   किया  बल्कि उन्हे   जेल  में नजबन्द   भी  कर दिया  ।  बाद   में समझौते   के कारण  नवाज    7 साल   सऊदी   अरब   चले  गये  जहां  मिया  नवाज   पर पाक   में  राष्ट्रद्रोह , विमान   अपरहण  के  मुकदमे  चलाये  गये  ।  यही  नही   जिया उल हक   के दौरे   को   भी   देखे   तो  जुल्फिकार   भुटटो  ने भी  दो  लेफ्टीनेन्ट   जनरलों  को  सुपरसीड    कर दिया  ।  मगर  कुछ  दिनो  बाद   जिया ने  जुल्फिकार  अली    भुटटो   की  बलि   उन्हे  शूली   पर चढ़कार  ली ।  नवाज  जब प्रधान मंत्री   पद की   शपथ  पाक  में लेंगे   तो इस   सीन  से  पार  पाना आसान   नही   होगा  ।  बड़ा  सवाल  इस  दौर   में मुशर्रफ   को लेकर   भी   है  जिनके    साथ कारगिल में  मुशर्रफ   ने  उन्हे  अंधेरे में रखा  जिसके चलते  भारत पाक सम्बन्ध  पटरी से उतर गये  । अटल बिहारी के  साथ लाहौर  वार्ता का जो चैनल   नवाज  ने खोला था   कारगिल होते होते  वह चैनल भी  बन्द हो गया  और मुम्बई   में  26/11  के बाद  तो  रिश्तो में  जंग  सरीखी  नौबत कई बार आ चुकी  है ।  ऐसे  में नये कार्यकाल  मे अब  मिया नबाज  को  सेना के साथ  फूंक फूंक  कर  कदम रखने होगे ।

मिया  नवाज की  भावी राजनीति  बहुत  हदतक  अगले सेना प्रमुख  की  ताजपोशी  से तय होगी ।  वर्तमान में  अशफाक  कियानी  सेनाध्यक्ष पद से रिटायर होने जा रहे है।   उन्होने अमरीका  का पूरा  भरोसा पाया था लेकिन  बड़ा सवाल  नये सेनाघ्यक्ष  के  चुनने को  लेकर भी है जिसमें  नवाज की क्या भूमिका होगी   यह देखना होगा । अपने  इस बार के चुनाव प्रचार में  नवाज ने अमरीका को खूब  खरी खोटी सुनाई  है ऐसे में जमीनी  स्तर पर  वह  अमरीका का दखल  पाक की  आंतरिक  राजनीति मे कितना कम कर पाते  है यह देखने वाली बात होगी  ।  पाक के  आवाम  में नवाज  की वापसी  का  जबरदस्त  जश्न  दिख रहा  है।  नेशनल  असेम्बली  में  पीएम एल  एन  के  मजबूत  होकर   उभरने  के साथ ही  पाक के आवाम  की नवाज से  उम्मीदे  बढ़ गई  है। नवाज  आने वाले दिनो में  सेना को  नियंत्रण में रख राजनीति  में  किस प्रकार  अपनी  बिसात बिछाते  है  यह भी देखने वाली बात होगी ।   हालांकि  अभी  वह सभी  दलो को  साथ लेकर  चलने की  अपनी बात  को दोहरा रहे है। यही वजह है  चुनाव परिणाम  आने के बाद  उन्होने तहरीक  ए  -इंसाफ  पार्टी के प्रमुख इमरान खान से मुलाकात  की  है जो  नेशनल असेम्बली मे इस बार  मुख्य विपक्ष  पार्टी के तौर पे  उभरी  है इसे  राजनीति के लिहाज से  अच्छा संकेत  माना जा सकता  है।  प्रधान मंत्री पद पर बैठने के बाद  अगर नवाज  अपनी  बिसात  खुद ही बिछाते  है  तो  यह  बेहतर  होगा  अन्यथा सेना ही  हमेशा की तरह  उनके लिए  खतरा पैदा कर सकती  है।  आतंकियो को नेस्तानाबूद करने के लिए नवाज को  सेना को  अपने नियंत्रण में लेना ही होगा क्योकि  पाक  में सेना व सरकार रिश्ते पहले से ही  तल्ख रहे है ।  नवाज सेना  की  मदद  से तालिबान , अलकायदा सरीखी  ताकतो पर  फतह पा सकते है।

पाक  के   इस चुनाव  ने कई  संदेश एक  साथ  दिये  है।  पहला यह कि  आप  किसी जननेता को  नही नकार सकते ।  मिया नवाज  आज भी  पाक  आवाम  की  बड़ी  पसन्द  बने है  शायद  तभी   वह  तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने जा रहे है ।  दूसरा  जनता  फौजी शासन से  त्रस्त आ चुकी है ।  अब  वह सड़को पर  निकलकर अपने वोट की ताकत  को  दिखा रही   है ।  तीसरा जनता भष्ट्राचार से  तंग आ चुकी है  । पीपीपी की  लुटिया  शायद इसी  भष्ट्राचार  ने  डुबोयी   । कम से कम  चुनाव परिणाम तो  यही साबित  करते  है। और  एक खास बात  यह चुनावी सभा में  उमड़ने वाली  भारी भीड़ को देखकर  हम  इस मुगालते  में ना रहे कि  यह भीड़ वोट में तब्दील होगी । अगर ऐसा होता तो  17 सालो के लम्बे संघर्ष के बाद पाकिस्तान में सत्ता की चाबी इमरान खान के पास होती लेकिन ऐसा नही हो पाया क्योकि  ये पब्लिक  है   सब जानती है पब्लिक  है ।

मंगलवार, 7 मई 2013

मामा की रेल में भांजे का खेल..............


कोलगेट के मसले पर सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट बदले जाने पर विपक्ष के लगातार हमले झेल रही यू पी ए 2  कानून मन्त्री अश्विनी कुमार को बचाने के लिए दस जनपथ में सोनिया के राजनीतिक सलाहकार  अहमद पटेल की अगुवाई में अभी अपनी बिसात बिछा ही रही थी कि रेलवे में प्रमोशन के घूसकाण्ड ने रेल मंत्री पवन कुमार बंसल की कुर्सी को भी हिलाकर रख दिया है | हर दिन किसी ना किसी घोटालो के घेरे  में घिरने वाली यू पी ए के लिए इससे शर्मनाक बात क्या हो सकती है २०१४ से ठीक पहले वह घोटालो के फेर में जिस तरह उलझती जा रही है उसने यूपीए की साख पर सीधे सवाल उठाने का काम किया है | मौजूदा दौर ऐसा है जब 2 जी से लेकर  कोलगेट तक की आंच सीधे 7 आर सी आर रोड तक जा रही है और मनमोहन हमेशा की तरह बेबसी का रोना रोते हुए खामोशी की चादर ओढ़ लिए हैं |

 रेल में प्रमोशन के नाम पर बीते दिनों चले इस खेल में जिस तरह सी बी आई ने  दर्जन भर लोगो को हिरासत में लिया है उससे रेलगेट विवाद से सरकार  बचना मुश्किल दिख रहा है | पूरे विवाद में सी बी आई ने माना है रेल मंत्री के भांजे विजय सिंगला ने  रेलवे बोर्ड के सदस्य महेश कुमार  को रेलवे का महाप्रबंधक का चार्ज देने के लिए 90 लाख रुपये शुरुवाती घूस ली | यही नहीं रिश्वत की इस खेफ के साथ उन्होंने भांजे को रंगे हाथो गिरफ्तार किया | साथ ही सी बी आई जांच में बंसल के निजी सचिव और भांजे की दो हजार फोन काल्स की जो डिटेल हाथ लगी है उससे रेल मंत्री की मुश्किलें बढ़ रही हैं लेकिन कांग्रेस जिस तरह  आक्रामक होकर पवन बंसल के बचाव में उतरी है उसने कई सवालों को खड़ा किया है | मसलन क्या इस देश में लोकलाज और नैतिकता नाम की कोई चीज नहीं बची है ? क्या पांच साल का जनादेश का मतलब बेख़ौफ़ राज करना है ? क्या लोकसेवको के लिए जन नाम की कोई चीज  इस दौर में नहीं बची है ? बीते चार साल में एक ईमानदार प्रधानमन्त्री भी कठघरे में है क्युकि  चिदंबरम से लेकर थरूर ,जायसवाल से लेकर खुर्शीद और अश्विनी कुमार से लेकर पवन बंसल हर किसी को बचाने की कोशिश खुद प्रधानमंत्री के द्वारा इस दौर   में हुई है और मजेदार बात यह है कि यह सभी चेहरे खुद मनमोहन की पहली पसंद रहे हैं |

जनता के बीच मनमोहन की साख को लेकर जैसे सवाल उनके दूसरे
कार्यकाल में उठ रहे हैं वैसे पहले कार्यकाल में नहीं उठे | संभवतया इसके पीछे वाम दलों का दबाव रहा जिसके न्यूनतम साझा    कार्यक्रम के चलते कोई अपनी मनमानी नहीं कर पाता था लेकिन  आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है | मनमोहन अपनी  आर्थिक सुधारों वाली लीक पर चल निकले हैं जहाँ विदेश नीति से लेकर हर माडल कमोवेश पश्चिमी देशो के करीब हो चला है और  यही  उदारीकरण का माडल  बड़े पैमाने  में लूट खसोट पैदा कर रहा है |

  अब पांच साल के जनादेश का मतलब जन को ठेंगा दिखाते हुए लूट करना और अपने मन माकिफ राज करना हो गया है जहाँ  कारपोरेट   के लिए फलक फावड़े बिछाये बिना काम नहीं बनता | जैसे आरोपों के   घेरे में मनमोहन हैं वैसे आरोप आजाद भारत में किसी सरकार पर नहीं लगे | हालाँकि जीप घोटाला तो नेहरु के काल में ही हो गया था  जिसके बाद तत्कालीन रक्षा  मंत्री मेनन की कुर्सी चली गयी लेकिन जनता की अदालत में जाने के बाद वह नेहरु के कहने पर मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए गए | शास्त्री वाले दौर में भी नैतिकता थी जब रेल दुर्घटना के बाद वह खुद से इस्तीफा दे दिया करते थे लेकिन आज जनता से नेताओ का कोई सरोकार नहीं रह गया है |शायद तभी मनमोहन कई कैबिनेट मंत्रियो का बचाव करते हैं तो उनका इकबाल कमजोर होना लाजमी ही है |


 रेलवे  के हालिया घूसकाण्ड ने यह साबित किया है इस देश में किस तरह नौकरी पाने से लेकर प्रमोशन तक  में लाखो का खुला खेल होता है |
आरोपी विजय सिंगला पवन बंसल का भांजा है  और रेलवे में मामा की रसूख और  मंत्री पद की ठसक का इस्तेमाल कर उसने  करोडो का  साम्राज्य खड़ा कर लिया | ईट भट्टी से किराये के मकान में अस्सी के दशक में अपना सफ़र शुरू करने वाला सिंगला आज जेडीएल  इन्फ्रा , एक्रोपोलिस , रेडेंट सीमेंट सरीखी  दर्जनों कंपनियों को चला रहा है और मजेदार बात यह है कि इन सभी का पता 64 सेक्टर 28  A है जो खुद पवन बंसल का निवास है | मदनमोहन ,विक्रम,विजय के अलावा कंपनियों में पवन की  पत्नी की भी संलिप्तता उजागर हो रही है | सिंगला की कंपनी जिसका  २००७ में टर्न ओवर शून्य  रहा वह साल दर साल बंसल के केंद्र  में मंत्री बनने के बाद मुनाफा कमाती गई |  मामा के आज रेल मंत्री तक पहुँचने के बाद यह मुनाफा 152 करोड़ पार कर चुका है |  पवन बंसल भले ही पूरे मामले में  कारोबारी रिश्ते से  इनकार कर रहे हैं लेकिन बताया  जा रहा है भांजा सिंगला अपने मामा से मिलने बेरोकटोक रेल भवन जाता था जहाँ उसे किसी तरह के पास की भी जरूरत नहीं होती थी | 

नैतिकता का तकाजा तो यह है भांजे का नाम  आने के  बाद पवन बंसल खुद  इस्तीफा दे देते लेकिन दस जनपथ की कांग्रेस  वाली चौकड़ी आगामी राज्यों के चुनावो और लोक सभा चुनावो को देखते हुए कोई  खतरा मोल नहीं लेना चाहती क्युकि अगर बंसल जाते हैं तो इसके बाद अश्विनी कुमार से लेकर खुर्शीद , जायसवाल से लेकर प्रधानमंत्री सभी के विकेट गिरने का खतरा बन रहा है | ऐसे में चुनावी  में साल में प्रधान मंत्री के इस्तीफे से कांग्रेस की खासी किरकिरी होगी ऐसे में वह आक्रामक होकर विपक्ष के सवालों का जवाब जांच में खोजती दिख रही है | इस दौर में मनमोहन की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है | आखिर कामनवेल्थ घोटालो के बाद क्यों नहीं उन्होंने इस लूट खसोट पर लगाम लगाने की दिशा में अपने कदम आगे बढाये ? यू पी ए पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप बहुत संगीन हैं अगर जांच बारीकी से निष्पक्ष रूप में हो तो इसके  फेरे मे कई मंत्री और  इनके  नाते रिश्तेदार आ सकते हैं | लेकिन क्या कीजियेगा  लोक तंत्र में आज शालीनता  और नैतिकता नाम की कोई  चीज  बची नहीं है  और ना ही लाल बहादुर शास्त्री ,माधव राव सिंधिया , आडवानी – अटल वाली बिसात   जिसकी लीक पर  चलने का भरोसा कोई दिखा सके | इस दौर में  लोकतंत्र का मतलब एक बार जनादेश पाकर आखें   मूदकर बैठना और  कुर्सी बचाने के लिए तरह तरह के जतन करना बन गया है शायद तभी कांग्रेस भी अपने मंत्रियो का दामन  पाक साफ़ बताने पर तुली है और  कारोबारी रिश्तो के ना होने की बात दोहराकर अपना रास्ता आगामी चुनावो के लिए किसी तरह साफ़ करना चाह रही है जबकि असल में इस सरकार का कोई इकबाल अब बचा नहीं है और दिनों दिन इसकी विश्वसनीयता गिर रही है | आजादी के बाद जहाँ पहली बार किसी सरकार के कई कैबिनेट मंत्रियो पर  भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगे वहीँ सी वी सी से  लेकर सी बी आई की निष्पक्षता को लेकर पहली बार सवाल उठे और सुप्रीम कोर्ट तक ने सरकार की हीलाहवाली को लेकर तल्ख़ टिप्पणिया की जिसके बाद यह सरकार नींद से जागी | यही नहीं कैग सरीखी संवैधानिक संस्थाओ की रिपोर्ट सरकार समय समय पर ख़ारिज करती रही |  और तो और जे पी सी की रिपोर्ट  पर भी पहली बार उसके सदस्य ही सवाल उठाने लगे | इतना सब होने के बाद  भी यह सरकार जनता द्वारा उसे पांच साल के लिए दिए गए जनादेश का राग अलापती रही |  जब तक सुप्रीम  कोर्ट ने तल्ख़  तेवर नहीं दिखाए तब तक वह नहीं जागी |

मनमोहन की तर्ज पर सफेद कुर्ते में रहने  वाले पवन बंसल की गिनती आम तौर पर शालीन और सुलझे हुए नेता के तौर पर अब तक  होती रही है लेकिन भांजे की करतूतों ने उनके कुर्ते पर रेलवे घूसकाण्ड की ऐसी कालिख पोत दी है जिससे आने वाले दिनों में उनके राजनीतिक करियर पर ग्रहण लग सकता है |

रेलवे की पहचान पूरे देश को जोड़ने वाले विशाल नेटवर्क के रूप में है लेकिन इस घूसकाण्ड के अलावे यह मामला आम आदमी से भी जुड़ा है क्युकि इस पद की  निगरानी में उपकरणों खरीद फरोख्त होती आई है |इस मामले में सी बी आई ने पहली बार बिना दबाव के कार्य करते हुए  रेल मंत्री के रिश्तेदारों को रंगे हाथो पकड़कर एक नई  मिसाल कायम की है |  आमतौर पर सी बी आई  पर सरकार के हाथ की कठपुतली होने के आरोप लगाये जाते रहे हैं जिससे जनता में भी उसकी निष्पक्षता को लेकर सवाल कई दशको से उठते रहे हैं लेकिन रेलगेट और कोलगेट के आसरे वह जनता के बीच अपनी  छवि निष्पक्ष रूप में पेश कर सकती है | बस निष्पक्ष जांच का हौंसला  चाहिए जो सरकारी दखल से दूर हो |