Tuesday, December 8, 2015

मूसलाधार बरसात से दरबदर चेन्नई




सुमित गुलाटी चेन्नई में मर्सिडीज कंपनी में सीए के पद पर कार्यरत हैं लेकिन पिछले एक हफ्ते से उनका लखनऊ और नैनीताल में अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं हो पा रहा जिसकी वजह चेन्नई में हुई भीषण बरसात है जिसने सुमित को अपने नाते रिश्तेदारों से दूर कर दिया  कभी पल पल अपने परिजनों की खबर लेने वाले सुमित को आज हालातों ने इतना मजबूर कर दिया है कि वह अब अपने मोबाइल से किसी से बात नहीं कर पा रहा और ना ही उनके परिजन सुमित से संपर्क कर पा रहे हैं |

सुमित के अजीज दोस्त पुरुषोत्तम से  जब चेन्नई के हालातों के बारे में बात की तो पता चला सुमित पिछले कुछ समय से चेन्नई की भीषण बाढ़ में फंसे हुए थे | यह जानकारी उन्हें उनके मोबाइल में व्हाट्सएप के माध्यम से मिली जिसमे उन्होने एक हफ्ते पहले चेन्नई के हालातों को बयां करते हुए खुद के फंसे होने का जिक्र किया था | उनकी पत्नी 9 महीने से प्रेग्नेंट भी थी लिहाजा मूसलाधार बरसात से बचने का कोई रास्ता  नहीं मिला | बड़ी मुश्किल से टिन के डब्बों से बनी डोगी से उन्होंने जान बचाई  यह मेसेज सुमित ने पिछले हफ्ते भेजा था जो चेन्नई के हालातों को बखूबी बयान करता है | सेंट जोजेफ कालेज नैनीताल की 1997 की यादें ताजा करते हुए आज भी पुरुषोत्तम भावुक हो उठते हैं | यहाँ दोनों एक साथ जरूर पढ़े हैं लेकिन आज  चेन्नई के बदलते हालातों पर पुरुषोत्तम सुमित से बात करने का साहस भी नहीं जुटा पा रहे और कुछ कह पाने की स्थिति में भी नहीं हैं |  सुमित तो एक बानगी है ना जाने सुमित जैसे कई ऐसे लोग और उनके नाते रिश्तेदार हैं जो चेन्नई की बाढ़ में जिन्दगी और मौत के बीच झूल रहे हैं |

तमिलनाडु के कई जिले इस समय भारी बारिश से परेशान है । चेन्नई पानी में पूरी तरह  डूब चुकी है। शहरी प्रबंधन की सारी पोल  एक बरसात ने झटके में खोल दी है। इस बरसात ने बीते 100 बरसों के रिकॉर्ड को जहाँ तोड़ डाला है वहीँ यह भी बताया है प्रकृति की मार के आगे इन्सान कितना बेबस है | सरकारें मुआवजे और पुनर्वास की व्यवस्था में लगी है तो वहीँ चारों तरफ पानी पानी होने से राहत और बचाव कार्यों  में गति  नहीं आ पा रही है वही मुश्किल हालातों में आपदा प्रबंधन भी  सही तरीके से नहीं हो पा रहा | सड़कें पानी से लबालब भरी पड़ी  हैं तो चेन्नई एयरपोर्ट का भी पानी से बुरा हाल है | बिजली नहीं है तो लोग पीने के पानी से परेशान हैं | मोबाइल टावरों में पानी भर गया है जिससे लोग अपने नाते रिश्तेदारों से सीधे कट गए हैं | एटीएम काम नहीं कर रहे जिससे लोगों के पास पैसों की कमी हो चली है तो वहीँ राशन खाने पीने के भी लाले पड़ गए हैं | हजारों लोगों का आशियाना छिन चुका है और उनका जीवन पटरी पर आना अभी थोडा मुश्किल लगता है क्युकि इस आपदा से वह अभी भी नहीं उबर पाए हैं | 

कभी चकाचौध से सरोबार रहा चेन्नई भीषण बरसात की मार से मानो ठहर-सा गया है। स्कूलकॉलेजअस्पताल और दुकानें बाढ़ की वजह से बंद पड़े हैं तो वडापलानीवलासरावक्कम और नंदमवक्कम जैसे इलाके उफनती झीलों में तब्दील हो गए हैं। आईआईटी मद्रास और ओल्ड आईटी कॉरिडोर,  कैलाश मंदिर के पास की सड़कें गड्ढे जैसी हो गई हैं। अंदाजा नहीं लग पा रहा है सडकों में गड्ढे हैं या  गड्ढों में सड़क |  एयरपोर्ट तो मानो बंदरगाह बन चुका जहाँ जहाज और गाड़ियाँ भी डूब गई हैं |  टी सी एस , मर्सीडीज , हुंडई और फोर्ड सरीखी दर्जनों नामी गिरामी कंपनियों ने पहली बार अपने सारे संस्‍थान बंद कर डाले हैं और उनकी कोशिश किसी तरह तमिलनाडु के विभिन्न जिलों में फंसे अपने कर्मचारियों को निकालना बन चुकी है |  द हिंदू सरीखा प्रतिष्ठित अखबार भी नहीं छप पा रहा |  137 बरस के इतिहास में पहला मौका है कि कुदरती बरसात ने प्रेस पर भी मानो आपातकाल लगा दिया है |

 जिस चेन्नई की रफ़्तार महानगरों में सबसे तेज रही और जिस शहर की रईसी मुंबई, कोलकाता  और दिल्ली सरीखे शहर को भी पीछे छोड़ देती थी जिसकी अर्थव्यवस्था हर दिन गोते लगाने के साथ ही कुलाचे मारती थी, आज वह दो जून की रोटी और बूंद बूंद पानी के लिए तरस रही है और लोग आसमान की तरफ ताक रहे हैं किसी तरह बरसात रुक जाए ताकि उन्हें  खाने की रसद मिल सके | अपने लोगों के बीच फंसे लोगों का रो रोकर बुरा हाल है | जिधर दूर दूर तक नजर जाते है वहां पानी पानी ही नजर आता है | बस राहत और बचाव कार्यों में कोई नजर आ रहा है तो वह सेना और एन डी आर ऍफ़ की टीमें जो अपना सब कुछ दाव पर लगाकर किसी तरह लोगों की मदद करने में बढ़ चढ़कर आगे आई है | सेना के जज्बे को सलाम जो तन मन से राहत और बचाव कार्यों में डटी हुई है | कश्मीर से लेकर  उत्तराखंड  हर जगह सेना ने राहत कार्यों में जैसी संजीदगी दिखाई वैसी मिसालें देखने को नहीं मिलती लेकिन सियासत के शोर तले सेना की खबरें मुख्यधारा के मीडिया की सुर्खियाँ नहीं बन पाती यह भी देश में किसी त्रासदी से कम नहीं है |

प्रशासन और सरकारें इस समूचे दौर में राहत पहुंचाने में पूरी तरह नाकाम हैं | आपदा सरीखे संवेदनशील मसले पर भी सियासत हमारे सियासतदानों के मुह पर तमाचा है |  इस बार भी प्रशासन ने बाढ़ से निपटने की कोई तैयारी नहीं की | यह तब है जबकि मौसम विभाग का पूर्वानुमान था  कि अक्तूबर में ही राज्य सरकार को कहा गया था कि इस बार मानसून में बाढ़ का खतरा हो सकता है इसके बाद भी सरकारों का न जाग पाना कई सवालों को खड़ा करता है |

असल में प्राकृतिक आपदाओं के आगे हम हर बार बेबस हो जाते हैं और इससे निपटने की हमारे पास कोई कारगर तैयारिया  नहीं होती है |  हमें यह भी मानना पड़ेगा विकास की चकाचौध तले हमने महानगरों में पिछले कई बरसों से प्रकृति का जिस गलत तरीके से विदोहन किया है आज हम उसी की मार झेलने पर मजबूर हैं जो हमें विनाश की तरफ ले जा रहा है | उत्तराखंड से लेकर कश्मीर और चेन्नई से लेकर मुंबई हर जगह कमोवेश एक जैसे हालत हैं जो पहली बार सरकार के विकास के नवउदारवादी माडल पर सवाल खड़े कर रहे हैं जिसमे प्रकृति से जुड़े मुद्दों की अनदेखी हो रही है और हर जगह को औने पौने दामों पर खुर्द बुर्द करने का खुला खेल चल रहा है और कंक्रीट का जंगल बनाने की तैयारियां हो रही है |

चेन्नई की इस भीषण बाढ़ ने कई सवालों को खड़ा किया है | अंग्रेजों के दौर में जो नगर सांस्कृतिक आर्थिक विरासत के केंद्र बना आज वह अपने हाल पर बेबस है तो इसका कारण तेजी से हुआ विकास है जहाँ नदियों के बीच ऊँचे ऊँचे भवन बिल्डर और सरकारों के नेक्सस ने खोल डाले लेकिन पानी के निकास के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए । अंग्रेजों  के समय जो प्राकृतिक निकास के रास्ते थे वह आज अंधाधुंध निर्माण की वजह से बंद हो गए | नेता-अफसर-बिल्डर के काकटेल ने मिलकर शहरी इलाकों की किसी जमीन को नहीं छोड़ा | हालत ऐसे हो गए कि नदियों के बहाव को रोककर उन पर रिजॉर्ट और होटल खोलने का खुला खेल हर सरकार के दौर में हर राज्य में बीते कुछ बरसों से चला है  | विकास की अन्धाधुंध दौड़ में अपने स्वार्थ के लिए रियल स्टेट का धंधा तो मानो ऐसा बन गया जहाँ करोड़ों के वारे न्यारे हर महीने किये जाने लगे जिसमे सरकारों की भी जेबें गर्म रही और बिल्डरों को आनन फानन में एनओसी देने का खुला खेल क्रोनी कैपिटलिज्म के इस दौर में बेख़ौफ़ चला लेकिन उचित प्रबंधन के चलते  हम उस समय बेबस हो गए जब आपदाएं आई |

चेन्नई में हालत कितने खराब हो चले हैं इसकी बानगी देखनी है तो आप समझ सकते हैं जहाँ बरसों पहले शहर में सैकड़ों छोटे-बड़े तालाब हुए करते थे आज उनका अता पता नहीं है | अब  बारिश का पानी निकालने के इंतजाम तक नहीं हैं | आज हालत ऐसे हैं बेतरतीब विकास में इनका नामोनिशान मिट गया है | अंग्रेजों के समय पेरियार नदी में जब बाँध बनाया गया था तो 25 किलोमीटर लम्बी एक नहर भी निकाली गई थी ताकि ड्रेनेज सिस्टम मजबूत हो सके और आपदा का मुकाबला किया जा सके लेकिन आज हालत ऐसे हैं यह नहर 7 किलोमीटर शेष रह गई है | राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक चेन्नई में साढ़े छह सौ कुदरती ताल नष्ट हो चुके हैं और उनकी जगह सॉफ्टवेयर कंपनियों से लेकर मालों की बेतरतीब इमारतों ने ले डाली है | चेन्नई में नवउदारवादी नीतियों तले प्रकृति के मानकों की कैसे धज्जियाँ उडाई गई हैं यह इस बात से समझा जा सकता है  महानगर का ‘फीनिक्स’ आलिशान माल एक झील की बलि चढ़ा कर बनाया गया है जिसकी चकाचौध तले आर्थिक विकास और स्मार्ट सिटी का मर्सिया पढ़ा जा रहा है | चेन्नई का बस टरमिनल बसाने के नाम पर कोयबेडू इलाके की निचली जमीन का इस्तेमाल किया गया जो खुद डूब गया है और तो और एक्सप्रेस वे का फर्राटा देते यह नहीं देखा गया कि बेतरतीब निर्माण में पानी के निकास की क्या व्यवस्था होगी ?  

बेतरतीब निर्माण की आंधी में किसे पता था लाखों लोग थिलईगईनागर,पुझविथक्कम ,वेलाचेरी झील को ही अपना आशियाना बना लेंगे जो भविष्य में उनके लिए उजड़ने का टीला बन जायेगा इंजीनियरिंग कालेज से लेकर माल , सरकारी दफ्तरों से लेकर सॉफ्टवेयर कम्पनियाँ , कल कारखानों से लेकर मालों सब जगह  झीलों को कुर्बान कर दिया गया और प्राकृतिक संसाधनों का जमकर विदोहन  किया गया  | याराना पूँजी का यह खुला खेल आज देश के हर शहर में सरकारों को भरोसे में लेकर खेला जा रहा है जहाँ तमाम पर्यावरणीय मानकों को ताक पर रखते हुए विकास की चकाचौध तले देश में खुशहाली लाने के शिगूफे छोड़े जा रहे हैं लेकिन यह सब हमारे लिए आने वाले दिनों में बड़ी विभीषिका का कारण बन सकता है |

यकीनन तमिलनाडु की इस आपदा ने पहली बार कई सवालों को झटके में खड़ा किया है | माना आपदाओं को रोका नहीं जा सकता लेकिन उसके असर को तो कम किया ही जा सकता है | पिछले कुछ समय से  दशकों से मौसम में तरह तरह के बदलाव हमें देखने को मिल रहे हैं और इसी जलवायु परिवर्तन के असर का परिणाम हमें पूरी दुनिया में देखने को मिल रहा है जहाँ वह रीटा, कैटरीना , नरगिस की मार झेल रही है तो कहीं हुदहुद सरीखे चक्रवाती तूफानों और भीषण बरसात ने शहर की रफ़्तार थाम दी है |  तमिलनाडु के कई शहरों में बेमौसम बरसात से हुई भीषण तबाही बताती है कि हमारा शहरी नियोजन कुदरत के बदलते मिजाज के सामने कितना बेबस है | पूरी दुनिया अभी जलवायु परिवर्तन का दंश झेल रही है और पेरिस की छतरी तले दुनिया को एकजुट करने की तैयारी भी हो रही है लेकिन बेतरतीब निर्माण के माडल पर नकेल कसने के लिए कोई कारगर तैयार नहीं है साथ ही विकास के वैकल्पिक माडल की बातें भी दूर की गोटी हो चली है जहाँ पर्यावरण को ताक में रखकर विकास का माडल विनाश का कारण बन रहा है | इसमें दो राय नहीं कि चेन्नई की मौजूदा मूसलाधार बरसात भी ग्लोबल वार्निंग की देन है। लेकिन यह स्थिति बढ़ रहे पर्यावरणीय संकट और शहरी अनियोजन की तरफ भी इशारा करती है। तीन बरस पहले  उत्तराखंड का जल प्रलय हो या कश्मीर की बाढ़ और आंध्र में आया हुदहुद चक्रवात यह सभी उसी के उदाहरण हैं और  चेन्नई में भारी बारिश का दौर यह सब हमारे लिए एक सबक है |

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर चेन्नई में जलाशयों और झीलों को न पाटा गया होता तो स्थिति इस हद तक न बिगड़ती। जाहिर हैचेन्नई की मौजूदा बरबादी के पीछे बिल्डरोंराजनीतिकों और नौकरशाहों की लाबी का भी हाथ है। जो बातें उत्तराखंड और कश्मीर के सैलाब का अनकहा सच है यही बातें आज तमिलनाडु के हालातों पर भी फिट बैठ रही हैं |  जिस तरह माफियाओं और बिल्डरों के नेक्सस ने मिलकर नदियों के किनारे तक को नहीं छोड़ा उनका खूब दोहन किया , तालाबों और झीलों को पाट कर आलिशान कोठिया और ईमारत बनाई उससे सरकार की नीतियां भी कुछ बरस से कठघरे में आ रही हैं क्युकि बिना उनकी रजामंदी और पैसों के भारी खेल के चलते यह सहमति नहीं मिली होंगी ऐसे में सरकारों की नीयत पर भी सवाल उठते हैं जहाँ वह विकास विनाश की कीमत पर करना चाहती है


मौजूदा दौर में विकास की अवधारणा शहरीकरण पर टिकी है और आने वाले दस बरसों में देश की आधी आबादी शहरों में रहने लगेगी तो उसकी जरूरतें बढेंगी लिहाजा रियल स्टेट का धंधा कुलाचे मारेगा जमीनों के दाम आसमान छुएंगे और पर्यावरण की इसी तरह अनदेखी होती रही तो चेन्नई क्या उत्तराखंड और कश्मीर सरीखी आपदाओं की पुनरावृति होनी तय है | अगर अभी भी हम नहीं चेते तो ऐसे हादसे बार बार होते रहेगे जिनमे हजारों लोग काल के गाल में समाते रहेगे और सरकारें मुआवजे बांटकर अपने हित साधते रहेगी | अब समय आ गया है जब सरकारों को समझना होगा वह किस तरह का विकास चाहते हैं ? ऐसा विकास जहाँ प्रकृति का जमकर दोहन किया जाए या फिर ऐसा जहाँ पर्यावरण की भी फिक्र करते हुए विकास की बयार बहाई जाए ? इस मसले पर अब कोई नई लकीर हमें खींचनी ही होगी क्युकि मानव सभ्यता प्रकृति पर ही टिकी हुई है अगर प्राकृतिक संसाधनों का यूँ ही विदोहन होता रहा तो मानव के सामने खुद बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा | चेन्नई की बाढ़ इस दिशा में छिपा एक बड़ा सन्देश है पता नहीं कारपरेट घरानों की प्रीत की लत पर लुट जाने वाली हमारी सरकारें इन संकेतों को डिकोड कर पाती भी हैं या नहीं  ?

Thursday, December 3, 2015

खतरे की वार्निंग बनी ग्लोबल वार्मिंग



ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव अब पूरी दुनिया में देखा जा सकता है | दुनिया की सबसे भीषण चुनौतियों में से एक अब ग्लोबल वार्मिंग बन चुकी है यही कारण है कि 10 बरसों की तुलना में वर्ष 2015 अब तक का सबसे गरम बरस रहा और धरती का तापमान अभी जितना है इतना पिछले कई हजार वर्षों में नहीं बढ़ा | आई पी सी सी ने अनुमान लगाते हुए दोहराया भी है धरती का तापमान 2100 में सबसे गर्म होगा जो 1 से लेकर 6 डिग्री तक बढ़ सकता है | यह बहुत हद तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर निर्भर करेगा | बीते बरस नवंबर माह में ही ठंड की शुरुआत हो चुकी थी अभी स्थिति यह है दिसम्बर में कड़ाके की ठण्ड का अहसास भी नहीं हो पा रहा |  

पिछले कुछ वर्षो से मौसम का मिजाज लगातार बदलता ही जा रहा है जिस कारण पूरी दुनिया में अप्रत्याशित परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं |  जलवायु परिवर्तन के इस प्रभाव को हम बीते कुछ बरस में धरती के स्वर्ग कश्मीर से लेकर उत्तराखंड और नेपाल तक देख चुके हैं और  बीते दिनों चेन्नई में हुई मूसलाधार बरसात जिसने कई बरसों के रिकार्ड को तोड़ दिया यह भी ग्लोबल वार्निंग की खतरनाक दस्तक की तरफ इशारा कर रही है |  यदि हम इनके रूख को देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह  सब जलवायु परिवर्तन की वजह से हो रहा है । ग्लोबल वार्मिंग की वजह से वायुमंडल में ग्रीन हाउस गैस कार्बन डाईऑक्साइड 40.2 प्रतिशत, मिथेन 16.7 प्रतिशत, नाइट्रस ऑक्साइड 20 प्रतिशत व ओजोन 36 प्रतिशत बढ़ गयी है | ठण्ड का मौसम शुरू होने को है लेकिन कहीं बेमौसम फल और फूल उग आये हैं तो कहीं भीषण बरसात ने कहर बरपाया हुआ है | मौसम किस करवट पूरे विश्व में बैठ रहा है यह इस बात से समझा जा सकता है कि मौसम चक्र के बदलते रूप से दुनिया काहर देश इस समय प्रभावित है |  सुनामी, कैटरीना, रीटा, नरगिस, हुदहुद आदि परिवर्तन की इस बयार को पिछले कुछ वर्षो से ना केवल बखूबी बतला रहे है बल्कि  गौमुख , ग्रीनलैंड, आयरलैंड और अन्टार्कटिका में लगातार पिघल रहे ग्लेशियर भी ग्लोबल वार्निंग की आहट को करीब से  महसूस भी कर रहे हैं ।

 इस प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं है ।  पिछले कुछ समय से यहाँ के मौसम में अप्रत्याशित बदलाव हमें देखने को मिले हैं । असमय वर्षा का होना , सूखा पड़ना, बाढ़ आ जाना , हिमस्खलन , भारी बरसात  जैसी प्राकृतिक आपदाएं जलजला आना तो अब आम बात हो गयी है । "सुजलाम सुफलाम शस्य श्यामला " कही जाने वाली हमारी माटी में कभी इन्द्रदेव महीनो तक अपना कहर बरपाते हैं तो कहीं इन्द्रदेव के दर्शन ही दुर्लभ हो जाते हैं । 

आज पूरे विश्व में वन लगातार सिकुड़ रहे हैं तो वहीँ किसानो का भी इस दौर में खेतीबाड़ी से सीधा मोहभंग हो गया है । अधिकांश जगह पर जंगलो को काटकर जैव ईधन जैट्रोफा के उत्पादन के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है तो वहीँ पहली बार जंगलो की कमी से वन्य जीवो के आशियाने भी सिकुड़ रहे हैं जो  वन्य जीवो की संख्या में आ रही गिरावट के जरिये महसूस की जा सकती है वहीँ औद्योगीकरण की आंधी में कार्बन के कण वैश्विक स्तर पर तबाही का कारण बन रहे हैं तो इससे प्रकृति में एक बड़ा  प्राकृतिक  असंतुलन पैदा हो गया है और इन सबके मद्देनजर हमको यह तो मानना ही पड़ेगा जलवायु परिवर्तन निश्चित रूप से हो रहा है और यह सब ग्लोबल वार्मिंग की आहट है । 

औद्योगिक क्रांति के बाद जिस तरह से जीवाश्म ईधनो का दोहन हुआ है उससे वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा में अप्रत्याशित वृद्धि हो गयी है । वायुमंडल में बढ़ रही ग्रीन हाउस गैसों की यही मात्रा ही ग्लोबल वार्मिंग के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है । कार्बन डाई आक्साइड के साथ  मीथेन , क्लोरो फ्लूरो कार्बन भी इसके लिए जिम्मेदार है जिसमे 55 फीसदी कार्बन डाई आक्साइड है । वैज्ञानिकों ने पाया है कि औद्योगिक क्रांति के बाद से ही वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साईड और ग्रीन हाउस गैसों में बेतहाशा वृद्धि हुई है साथ ही बीते 100 बरसों में धरती के तापमान में भी दशमलव 85 की वृद्धि हुई है|  आर्कटिक महासागर में बर्फ का लगातार पिघलना और लगातार ग्लेशियरों का पिघलना यह बतलाने के लिए काफी है कि मौसम चक्र तेजी के साथ बदल रहा है |   

 जलवायु परिवर्तन पर आई पी सी सी ने अपनी रिपोर्ट में भविष्यवाणी की है 2015 तक विश्व की सतह का औसत तापमान 1.1 से 6.4  डिग्री सेन्टीग्रेड तक बढ़ जाएगा जबकि समुद्रतल 18 सेंटीमीटर से 59 सेन्टीमीटर तक ऊपर उठेगा । रिपोर्ट के अनुसार 2080 तक 3.20 अरब लोगो को पीने का पानी नहीं मिलेगा  और लगभग 60 करोड़  लोग भूख से मारे जायेंगे । अगर यह सच साबित हुआ तो यह  दुनिया के सामने किसी भीषण संकट से कम नहीं होगा । 

कार्बन डाई आक्साइड के सबसे बड़े उत्सर्जक अमेरिका ने पहले कई बार क्योटो प्रोटोकोल पर सकारात्मक पहल की बात बड़े बड़े मंचो से दोहराई  लेकिन आज भी असलियत यह है जब भी इस पर हस्ताक्षर करने की बारी आती है तो वह इससे साफ़ मुकर जाता है । अमरीका  के साथ विकसित देशो  की बड़ी  जमात में आज भी कनाडा, जापान ,चीन सरीखे कई विकसित देश खड़े हैं जो किसी भी तरह अपना उत्सर्जन कम करने के पक्ष में नहीं दिखाई देते । विकसित देश अगर यह सब करने को राजी हो जाएँ तो उन्हें अपने जी डी पी के बड़े हिस्से का त्याग करना पड़ेगा जो तकरीबन  5.5  प्रतिशत बैठता है और यह  सब मौजूदा दौर में दूर की गोटी ही लगती है।

  इधर अधिकांश वैज्ञानिको का मानना है कि कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन को कम करने के लिए विकसित देशो को किसी भी तरह फौजी राहत दिलाने के लिए कुछ उपाय तो अब करने ही होंगे नहीं तो दुनिया के सामने एक बड़ा भीषण संकट पैदा हो सकता है और यकीन जान लीजिये अगर विकसित देश अपनी पुरानी जिद पर अड़े रहते हैं तो तापमान में भारी वृद्धि दर्ज होनी शुरू हो जायेगी ।  अगर ग्लोबल वार्मिंग 2 डिग्री की दर से बढती रही तो समुद्री सहत तकरीबन 6 फीट तक बढ़ जायेगी यही नहीं धरती का एक बड़ा हिस्सा पानी में डूब जायेगा | यह आशंका निर्मूल नहीं है क्युकि दुनिया की सबसे विश्वसनीय जर्नल साइंस ने इसे अपनी रिपोर्ट में प्रकाशित भी किया है जिसमें दुनिया के 20 बड़े शहरों के डूबने की भविष्यवाणी की गई है | इस रिपोर्ट में  भारत के मुंबई, कोलकाता समेत पडोसी चीन के शंघाई सरीखी आलीशान शहर शामिल हैं | अमरीका के पूर्वी तट और मेक्सिको की खाड़ी में समुद्री सतह तेजी से बढ़ रही है |  बीते 50 बरस में यहाँ समुद्र का जल स्तर 8 इंच से अधिक बढ़ा है जिसका कारण ग्लेशियरों का पिघलना है जो ग्लोबल वार्मिंग के चलते तेजी से सिकुड़ रहे हैं |  

वैसे इस बढ़ते तापमान का शुरुवाती असर हमें अभी से ही दिखाई  देने लगा है । हिमालय के ग्लेशियर अगर इसी गति से पिघलते रहे तो 2030 तक अधिकांश ग्लेशियर जमीदोंज हो जायेंगे । नदियों का जल स्तर गिरने लगेगा तो वहीँ भीषण जल संकट सामने आएगा । वैसे ग्रीनलैंड में बर्फ की परत पतली हो रही है वहीँ उत्तरी ध्रुव में आर्कटिक इलाके की कहानी भी किसी से शायद ही अछूती है । बर्फ पिघलने से समुद्रो का जल स्तर बढ़ने लगा है जिस कारण  आने वाले समय में कई इलाको के डूबने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता ।  कार्बन डाई आक्साइड की मात्रा न केवल उपरी समुद्र  में बल्कि निचले हिस्से में भी बढती जा रही है बल्कि पशु पक्षियों में , जीव जन्तुओ में भी इसका साफ़ असर परिवर्तनों के रूप में  देखा जा सकता है जिनके नवजात समय से पूर्व ही इस दौर में काल के गाल में समाते जा रहे हैं ।  कई प्रजातियाँ इस समय संकटग्रस्त हो चली हैं जिनमे बाघ, घडियाल , गिद्ध , चीतल , भालू, कस्तूरी मृग, डाफिया, घुरड़, कस्तूरी मृग सरीखी प्रजातियाँ शामिल हैं । लगातार बढ़ रहे तापमान से हिन्द महासागर में प्रवालो को भारी नुकसान  झेलना पड़ रहा है ।

 सूर्य से आने वाली पराबैगनी विकिरण को रोकने वाली ओजोन परत में छेद दिनों दिन गहराता ही जा रहा है । हम सब इन बातो  से इस दौर में बेखबर हो चले हैं क्युकि आर्थिक सुधारों की थाप पर चल रहे देश में लोगो को चमचमाते मालो की चमचमाहट ही दिख रही है । ऐसे में प्रकृति से जुड़े मुद्दों की लगातार अनदेखी हो रही है । यह सवाल मन को कहीं ना कहीं कचोटता जरुर है शायद यही वजह है पूरी दुनिया 11 दिनों तक पेरिस में इस संकट की भयावहता को करीब से महसूस कर भी रही है | विकास की अंधाधुंध दौड़ में आज हम प्रकृति का विदोहन करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे जिससे अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन के कारण  पूरी दुनिया में गंभीर असंतुलन पैदा हो गया है |

 इसमें कोई दो राय नहीं आज दुनिया में जो जलवायु परिवर्तन हुआ है उसमे बड़े देशों की हिस्सेदारी कुछ ज्यादा है अतः बेहतर होगा पेरिस सम्मेलन में ग्लोबल वार्मिंग का रास्ता भी बड़े और विकसित देशों से ही निकले | जिस तकनीक के आसरे विकसित देशों ने ताकत हासिल की आज उसी के चलते दुनिया में संकट मडरा रहा है | आज जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव को हर देश भुगत रहा है | कई देशों के सामने खाद्यान का संकट खड़ा है वहीँ सूखा , बाढ़ और अतिवृष्टि ने इस दौर में भारत सरीखी समूची ग्रामीण कृषि अर्थव्यवस्था वाले देश का तो बंटाधार कर दिया है | आर्थिक सुधार और  औद्योगीकरण को गति देने के साथ ही ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा बढ़ी है | 

वैज्ञानिको के ताजा आंकड़ो को अगर आधार बनाये तो 2030 तक पृथ्वी का तापमान 6 डिग्री बढ़ जायेगा । वहीँ पूरे विश्व में ग्लोबल वार्मिंग  का असर दिख रहा है जिसके चलते अफ्रीका में खेती योग्य भूमि आधी हो जायेगी । अगर ऐसा हुआ तो खाने को लेकर एक सबसे बड़ा संकट पूरी दुनिया के सामने आ सकता है क्युकि लगातार मौसम का बदलता मिजाज उनके यहाँ भी अपने रंग दिखायेगा ।  प्राकृतिक असंतुलन को बढाने में प्रदूषण की भूमिका भी किसी से अछूती है । कार्बन डाई आक्साइड , कार्बन  मोनो आक्साइड, सल्फर  डाई आक्साइड , क्लोरो फ्लूरो कार्बन के चलते आम व्यक्ति सांस लेने में कई जहरीले रसायनों को ग्रहण कर रहा है । नेचर पत्रिका ने अपने हालिया शोध में पाया है विश्वभर में तकरीबन एक करोड़ से ज्यादा लोग जहरीले रसायनों को अपनी सांस में ग्रहण कर रहे हैं ।  

वायुमंडल में इन गैसों के दूषित प्रभाव के अलावा पालीथीन की वस्तुओ के प्रयोग से कृषि योग्य भूमि की उर्वरता कम हो रही है । यह ऐसा पदार्थ है जो जलाने पर ना तो गलता है और ना ही सड़ता है । साथ ही फ्रिज , कूलर और एसी  वाली कार्यसंस्कृति  के  अत्यधिक प्रयोग , वृक्षों की कटाई के कारण पर्यावरण को नुकसान पहुँच रहा है । जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण , ध्वनि प्रदूषण तो पहले से ही अपना प्रभाव दिखा रहे हैं । अन्तरिक्ष कचरे के अलावा देश के अस्पतालों से निकलने वाला मेडिकल कचरा भी पर्यावरण को नुकसान पंहुचा रहा है जो कई बीमारियो को भी खुला आमंत्रण दे रहा है । 

 ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम में तेजी से तब्दीली हो रही है । वायुमंडल जहाँ गरमा रहा है वहीँ धरती का जल स्तर भी तेजी से नीचे जा रहा है । इसका ताजा उदाहरण भारत का सुन्दर वन है जहाँ जमीन नीचे धंसती ही जा रही है । समुद्र का जल स्तर जहाँ बढ़ रहा है वहीँ कई बीमारियों के खतरे भी बढ़ रहे हैं । एक शोध के अनुसार समुद्र का जल स्तर 1.2 से 2.0 मिलीमीटर  के स्तर तक जा पहुंचा है । यदि यही गति जारी रही तो उत्तरी ध्रुव की बर्फ पूरी तरह पिघल जाएगी । कोलोरेडो विश्वविद्यालय की मानें तो अन्टार्कटिका में ताप  दशमलव 5 डिग्री की दर से बढ़ रहा है । इस चिंता को समय समय पर यू एन ओ महासचिव बान की मून भी जाहिर कर चुके हैं । 

ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने के लिए ईमानदारी से  सभी देशो को मिल जुलकर प्रयास करने की जरुरत है । दुनिया के देशो को अमेरिका के साथ विकसित देशो पर दबाव बनाना चाहिए । अमेरिका की दादागिरी पर भी रोक लगनी जरुरी है । साथ ही उसका भारत सरीखे विकास शील देश पर यह आरोप लगाना भी गलत है कि विकास शील देश इस समय बड़े पैमाने पर ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कर रहे हैं । ग्लोबल वार्मिंग का दोष एक दूसरे  पर मडने के बजाए सभी को इस समय अपने अपने देशो में उत्सर्जन कम करने के लिए एक लकीर खींचने की जरुरत है क्युकि ग्लोबल वार्मिंग की समस्या अकेले विकासशील देशो की नहीं विकसित देशो की भी है जिनका ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे ज्यादा योगदान रहा है । 

यकीन जान लीजिये अगर अभी भी नहीं चेते तो यह ग्लोबल वार्मिंग  पूरी दुनिया के लिए  आखरी वार्निंग साबित हो सकती है | अक्सर ग्लोबल वार्मिंग जैसे मसलों पर दुनिया कई बार आपसी चर्चा के लिए तैयार दिखाई देती है लेकिन वह उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य को हासिल करना तो दूर किसी आपसी  निर्णय  तक नहीं पहुँच पाती | इसका सबसे बड़ा कारण विकसित और विकासशील देशो के ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के मसले पर आपसी झगडें हैं क्युकि अमरीका सरीखे विकसित देश ग्रीन हाउस गैस बढ़ने के लिए भारत , चीन जैसे देशों को दोषी ठहराते हैं और जब अपने उत्सर्जन को कम करने की बारी आती है तो वह जिम्मेदारियों से पीछे भागने में देरी नहीं लगाते हैं |

 अब ऐसे माहौल में रास्ता निकलना मुश्किल ही लगता है लेकिन पेरिस में प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह वैश्विक मंच में अपनी बात को बेबाकी से रखते हुए  पूरी दुनिया से अपनी जिम्मेदारियों को समझने का आह्वान किया है और बड़े देशो की उत्सर्जन में हिस्सेदारी को उठाया है उससे इस बात की उम्मीद तो बन ही रही है कि पेरिस में तमाम देश मिलजुलकर कोई ऐसा रास्ता तो निकाल ही लेंगे जिससे धरती को बचाया जा सके | ऐसे विकास से भी क्या लाभ जहाँ पर  मानव का जीवन ही खतरे में पड जाए | पेरिस में मोदी  की पहल पर जिस तरह बीते दिनों अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन को मूर्त रूप दिया गया वह स्वागतयोग्य है | सौर उर्जा बढ़ते ताप से धरती को बचाने का कारगर माध्यम साबित हो सकता है जिसमे विकसित और विकासशील देशों की  पहली धुरी पी एम मोदी बने हैं | 

सौर उर्जा की मौजूदा तकनीक काफी महंगी है लिहाजा विकासशील देशों के सामने इस पर निर्भरता संभव नहीं है लेकिन दोनों के एक मंच पर साथ आने और गठबंधन बनने से निश्चित ही कोई नई राह खुलेगी ऐसी उम्मीद तो बन ही रही है | फिर इस बार पेरिस में चल रहा  जलवायु  परिवर्तन का सम्मेलन 30 नवम्बर से 11 दिसंबर तक चल रहा है जिसमे पूरी दुनिया पेरिस की छतरी तले जिस तरह एकजुट दिख रही है उससे इस बात का पता तो चल ही रहा है कि दुनिया अब अपनी जिम्मेदारियों को मान रही है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को करीब से महसूस भी कर रही है | वैश्विक राजनीति में इन दिनों मोदी और ओबामा की जुगलबंदी की चर्चाएं जोर शोर से चल निकली हैं | कहा जाता है कि मोदी और ओबामा की कैमिस्ट्री आमतौर पर हर मसले पर अच्छी रही है और पहली बार ओबामा ने मोदी के सामने यह जतला दिया है कि अब विकसित देश अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं भाग सकते इसे डिकोड करें तो पेरिस से जलवायु परिवर्तन के मसले पर कोई नया रास्ता जरूर निकलेगा ऐसी उम्मीद तो इस बार बंध ही रही है | 

Monday, November 30, 2015

ऊँचाइयों पर शिवराज का परचम





उमा भारती और बाबूलाल गौर के बाद भाजपा की डगमगाती नैय्या को सही मायनों में अगर किसी ने मध्य प्रदेश में पार लगाया है तो बेशक वो शिवराज सिंह चौहान ही हैं । सूबे में सबसे ज्यादा समय तक गैरकांग्रेसी मुख्यमंत्री बनने का तो कीर्तिमान उन्होंने बना ही लिया है और अब मुख्यमंत्री के रूप में 10 बरस पूरे कर लेने के बाद प्रदेश में शिवराज का नायकत्व उन्हें सफल मुख्यमंत्री की कतार में लाकर खड़ा कर रहा है | विषम परिस्थितियों में मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले शिवराज सिंह चौहान ने जिस अंदाज में मध्य प्रदेश को बीमारू राज्य की श्रेणी से बाहर निकालने में सफलता पाई है वह उनके दूरदर्शी नेतृत्व की मिसाल है | पिछले कुछ समय से  शिवराज ने भाजपा के अंदरुनी उठापटक को शांत करने के साथ-साथ विकास की नई लकीर भी खिंची जिसकी परिणति चुनाव दर चुनाव जोरदार बहुमत के साथ भाजपा की सत्ता वापसी के रूप में हुई | 

विकास को मॉडल बना कर दिग्विजय सिंह ने यहाँ 10 वर्षों तक राज किया लेकिन वह विकास को लोगों तक पहुंचाने में सफल नहीं रहे जिस कारण उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी। एक कद्दावर नेता होते हुए कांग्रेस को जहाँ वह फिर से सत्ता में वापस नहीं ला सके वहीँ भाजपा ने  भी उमा भारती से लेकर बाबूलाल गौर तक को प्रदेश की सत्ता सौपकर कई प्रयोग किये लेकिन इन दोनों के सी एम पद से हटने के बाद पूरी भाजपा को एकजुट कर पाना मुश्किल था | ऐसे समय में शिवराज ने सत्ता और संगठन के साथ बेहतर तालमेल कायम कर मध्य प्रदेश में चुनाव दर चुनाव जीतकर भाजपा की उम्मीदों को नए पंख लगा दिए | प्रदेश में पिछले कुछ समय से  भाजपा का मतलब शिवराज चौहान अगर रहा है तो इसका बड़ा कारण उनका  बेहतर संगठनकर्ता होने के साथ ही जनता के सरोकारों की राजनीति करने वाला नेता होना रहा |

शिवराज की राजनीती लोगों को आपस में जोड़ने की रही है और उनकी जीत का मूल मंत्र विकास और निर्विवाद रूप से साफ़ छवि  रही  है और उनके शासन का विकास मध्य प्रदेश में धरातल में दिखलाई भी देता है | शिवराज ने  लोगो  के बीच अगर बेहतर मुख्यमंत्री की छवि बनाई है तो इसका कारण राजनीती के प्रति उनका समर्पण और जनता के सरोकारों से खुद को जोड़ने वाला नेता रहा है |   हालांकि विपक्षी शिवराज पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगा चुके हैं लेकिन इससे शिवराज की विश्वसनीयता पर कोई असर नहीं पड़ा है क्युकि भ्रष्टाचार से जुड़े हर मामले में  उन्होंने खुलकर अपना पक्ष रखा है | यही नहीं व्यापम के जिस घोटाले पर जब विपक्ष ने उन पर आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया तब भी वह ईमानदारी से मीडिया के सामने अपना पक्ष रखने से पीछे नहीं रहे और जांच कमेटी बनाकर मिसाल कायम की |  

शिवराज चौहान का जन्म पांच मार्च, 1951  को एक किसान परिवार में हुआ। भोपाल के बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर किया। कॉलेज जीवन से ही चौहान की दिलचस्पी राजनीति में थी। वे 1975  में मॉडल सेकेंडरी स्कूल छात्रसंद्घ के नेता रहे। 1975  में आपातकाल लगा जिसके विरोध में शिवराज आगे आये और 1976-77 में भोपाल जेल में बंद भी रहे। इसके बाद 1977  में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संद्घ से जुड़े। इसके बाद भाजपा के साथ इनका सफर चल पड़ा। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय जनता युवा मोर्चा के विभिन्न पदों पर काम किया। चौहान पहली बार 1990  में बुधनी विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। 1991  से लगातार  पांच बार विदिशा लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए। सांसद रहते उन्होंने कई महत्वपूर्ण समितियों में काम भी किया।

विरोधियों को चुप्पी के साथ दरकिनार करने और अनर्गल बयानबाजी से बचनेवाले चौहान को 2005  में मध्यप्रदेश भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था। उस समय संगठन में भारी उथल-पुथल के साथ गुटबाजी चल रही थी। उमा भारती के जाने के बाद प्रदेश भाजपा काफी कमजोर हो गई थी। ऐसे समय में इन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया। 13 वीं विधानसभा चुनाव में अच्छे परिणाम हासिल करने की  बड़ी चुनौती  तल्कालीन समय में उनके सामने थी जिस पर चौहान खरे उतरे और भाजपा को जीत दिलाई। फिर से सीएम भी बने और बेहतरीन काम भी कर रहे हैं।

 1962 से लेकर अब तक सिर्फ कांग्रेस के दिग्विजय सिंह और भाजपा नेता शिवराज चौहान ही ऐसे मुख्यमंत्री रहे जिन्होंने 10 वर्ष समय तक लगातार शासन किया है । मध्यप्रदेश की जनता के लिए अभिशाप ही रहा कि जो भी शासन में रहा मूल समस्याओं पर किसी ने ध्यान नहीं दिया और वे आपसी खींचतान में लगे रहे लेकिन शिवराज ने न केवल मामा बन महिलाओं के दिलों में राज किया बल्कि जन जन तक अपनी पैठ विकास कार्यों से बनाई |  मध्य प्रदेश में शिवराज का परचम जिन उंचाईयों को छू रहा है  उससे  कांग्रेस की मुश्किलें दिनों दिन बढती ही जा रही है और सशक्त  और यशस्वी मुख्यमंत्री की छवि बनाकर झटके में शिवराज ने  मध्य प्रदेश की राजनीति में  दिग्गी राजा  के कद को एकदम से कम कर दिया है । कभी दिग्गी राजा के नाम से लोगों के बीच पहचाने जानेवाले कांग्रेसी नेता शिवराज की काट के लिए  आज अपने  किसी नेता पर भरोसा नहीं कर पा रहे वहीँ कांग्रेस की असल मुश्किल गुटबाजी ने बढाई हुई है | आज भी अरुण यादव के दौर में वही परिस्थितियों  से कांग्रेस जूझ रही है जो परिस्थितियां  सुरेश पचौरी के दौर में थी तो समझा जा सकता है कांग्रेस की मुश्किलें किस कदर प्रदेश में बढती ही जा रही हैं और ऐसे हालातों में कांग्रेस की मध्य प्रदेश में वापसी मुश्किल दिखाई दे रही है |  राज्य में कांग्रेस के नकारे जाने का सबसे बड़ा कारण दिग्गी राजा का विकास माडल रहा जिसमे मध्य प्रदेश की गिनती बीमारू राज्यों के तौर पर होती रही और धरातल पर विकास कहीं नहीं दिखाई दिया जिस कारण वोटरों ने कांग्रेस को नकार दिया और न जाने कब तक यह सिलसिला चलता रहेगा  ? भाजपा  के निशाने पर शुरू से दिग्गी राजा  रहे  और भाजपा ने 2003  में उमा भारती के नेतृत्व में राज्य में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। 

 शिवराज ने  मध्यप्रदेश को स्थायी सरकार न केवल दी बल्कि अपनी दूरगामी योजनाओ के आसरे लोगों के दिलो में नई आस कायम की । शिवराजसिंह चौहान  खुद किसान परिवार से रहे हैं लिहाजा  किसानों और आम आदमी के  सरोकारों  के प्रति वह काफी संवेदनशील रहे हैं । अपने दस बरस के कार्यकाल में उन्होंने कई योजनाओं को न केवल धरातल पर उतारने में सफलता पाई  बल्कि अन्य राज्यों को कन्याधन और लाडली लक्ष्मी सरीखी योजना लागू करवाने के लिए मजबूर किया ।  यही नहीं प्रदेश में कई औद्योगिक ईकाईयों की स्थापना कर यह साबित भी कर दिखाया अगर आप एक निश्चित विजन के साथ आगे बढ़े तो राज्य को विकास के पथ पर आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता |  मुख्यमंत्री पंचायत के नाम से आरंभ की गई योजना ने शिवराजसिंह के बारे में यह धारणा पुख्ता कर दी कि वह आम आदमी के मुख्यमंत्री है। यही नहीं विभिन्न प्रदेशो की सरकारें जहाँ महिलाओं को आरक्षण देने की हवाई बयानबाजी करने से बाज नहीं आई वहीँ  शिवराजसिंह चौहान ने सत्ता में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण  देकर अपनी कथनी और करनी को साकार किया । मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने समावेशी विकास का खाका खींचकर यह भी साबित किया कि उनकी नीतियों के केंद्र में आम आदमी है शायद यही वजह है शिवराज को आम इंसान ने दुलार दिया । 

इन दस बरसों में  शिवराज ने न केवल जनता के बीच घर घर जाकर लोगों की समस्याओं को सुना बल्कि किसानो की समस्याओं का समाधान करने की दिशा में कोई कसर नहीं छोडी ।  पेटलावाद हादसे और रतनगढ़ हादसे की विषम परिस्थितियों में भी शिवराज ने धैर्य नहीं छोड़ा और लोगों के बीच जाकर दुःख में सहभागी बने । 

दस बरस के अपने कार्यकाल में चुनाव दर चुनाव में विजय पताका फहराने वाले शिवराजसिंह चौहान ने सत्ता में कभी अपनी ठसक हावी नहीं होने दी । हंसी ठिठोली के साथ वह सत्ता और संगठन में अपनी कदमताल करते रहे और  विनम्र बनकर जनता जनार्दन को सबसे बड़ी ताकत बताते रहे ।  सत्ता को सेवा का माध्यम और खुद को पार्टी का अदना सा सेवक मानने वाले शिवराजसिंह लगातार ने दस वर्ष का कार्यकाल पूरा कर प्रदेश में पहला गैर-कांग्रेसी मुख्यमंत्री  होने का रिकार्ड  कायम कर लिया है और अब उनकी नजरें जन जन तक अपनी विकास यात्रा को पहुचाने की तरफ लगी हुई हैं क्युकि लोकतंत्र में जनता से बढ़कर कुछ नहीं है खुद शिव का दर्शन भी यह कहता है लोकतंत्र में हार-जीत होती रहती है। महत्वपूर्ण यह है कि हार से सबक लेकर हमें यह देखना चाहिए कि जनता में यदि कोई विपरीत भाव पैदा हुआ है तो उसे कैसे दूर किया जाए?     

दस बरस पूरा कर लेने के  बाद का  भावी सफर अब शिवराज चौहान के लिए आसान नहीं है। आने वाले समय में अगर एंटी इनकम्बेंसी के बीच उन्हें भाजपा का विजयरथ जारी रखना है तो अपने विकास मॉडल को जन जन तक पहुचाना पड़ेगा । केंद्र में भाजपा की सरकार होने के साथ अब शिवराज के सामने वैसी मुश्किलें भी नहीं हैं जैसी यू पी ए के दौर में थी | मध्यप्रदेश से मोदी सरकार में समुचित प्रतिनिधित्व होने के चलते अब सांसदों की भी यह नैतिक  जिम्मेदारी है कि वह प्रदेश के विकास के लिए एकजुट हों और प्रदेश सरकार के साथ बेहतर तालमेल कायम रखे | देश का मिजाज बदल रहा है और राज्यों के चुनाव और केंद्र के चुनाव में अब विकास सबसे बड़ी प्राथमिकता है लिहाजा शिवराज को भी समझना होगा वह विकास का मूल मंत्र आम लोगों तक कैसे पहुंचाएं इसकी चिंता जरूर सीएम को होनी चाहिए जिससे आने वाले विधानसभा चुनावों में भी भाजपा अपना विजयरथ जारी रख सके | विकास को प्राथमिकता में रख कर यदि उन्होंने अंतिम व्यक्ति के लिए फैसला नहीं लिया तो भाजपा को भी कांग्रेस की कार्बन कापी बनने  में देरी  नहीं लगेगी | लोगों की निगाहें अब न केवल  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तरफ लगी हैं बल्कि पार्टी आलाकमान की नज़रों में भी शिवराज भाजपा शासित राज्यों के सफल मुख्यमंत्री बन गए हैं और दस बरस के कार्यकाल में मध्य प्रदेश में शिवराज मामा का परचम नई बुलंदियों को छू रहा है|    

शिवराज को लेकर समय समय पर ऐसी चर्चाएं भी उठती रही हैं कि उनकी केन्द्र में वापसी तय है और मोदी के मंत्रिमंडल में उन्हें शामिल किया जा सकता है लेकिन फिलहाल तो ऎसी संभावनाएं दूर दूर तक नहीं हैं कि वह मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री पद छोड़कर किसी अन्य पद को पाना चाहेंगे | यूँ भी पार्टी आलाकमान का फैसला सर माथे पर होता है लेकिन शिवराज निष्कंटक होकर फिलहाल अपनी सारी उर्जा मध्य प्रदेश के विकास को नई गति देने में लगाना चाहते है इससे अच्छी बात प्रदेश के लिए कुछ नहीं हो सकती |

Friday, November 27, 2015

उत्तराखंड में भाजपा के लिए फिर से जरूरी बनने लगे खण्डूड़ी




बिहार की सत्ता गंवाने के बाद भाजपा बैकफुट पर है | बिहार की हार का असर अब उन राज्यों में देखने को मिल सकता है जहाँ आने वाले दिनों में चुनाव होने वाले हैं | बिहार चुनावों में शाह और मोदी की जोड़ी ने जिस अंदाज में स्थानीय नेतृत्व को नजरअंदाज कर बाहरी लोगों पर अपना भरोसा जताया उसका खामियाजा भाजपा को बिहार में उठाना पड़ा जिसकी टीस पार्टी को लम्बे समय तक सताती रहेगी | खासतौर से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को जिन्हें मीडिया के एक बड़े वर्ग ने आधुनिक राजनीति का चाणक्य करार दिया था |

बिहार की करारी हार के बाद अमित शाह पर पार्टी के बुजुर्ग नेताओं ने जिस अंदाज में हमले किये हैं उससे पहली बार संघ को मध्यस्थता के लिए सामने आना पड़ा जिसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा में बुजुर्ग नेताओं ने शाह से सुलह के बाद अपना मुह बंद रखने में भलाई समझी है लेकिन बिहार की करारी हार ने भाजपा में अमित शाह सरीखे चुनावी प्रबंधकों के चुनावी प्रबंधन पर पहली बार न केवल सवाल उठाये हैं बल्कि यह भी बतलाया है आने वाले दिनों में राज्यों के विधान सभा चुनावों में अगर भाजपा ने स्थानीय नेताओं के बजाए पी एम का मुखौटा ही आगे किया तो भाजपा की मुश्किलें बढ़नी तय हैं | बिहार की करारी हार के संकेतों को डिकोड करें तो अब भाजपा उन राज्यों में संभल कर चल रही है जहाँ पर चुनाव आने वाले वर्षो में होने जा रहे हैं | यू पी और उत्तराखंड सरीखे राज्यों में अब शायद भाजपा स्थानीय नेताओं को प्रोजेक्ट कर चुनाव लड़ने की संभावनाओं पर मंथन करने में जुटी हुई है |

 यू पी के साथ साथ उत्तराखंड में विधानसभा चुनावों की उलटी गिनती शुरू होते ही भाजपा की मुश्किलें बढती ही जा रही हैं | बात उत्तराखंड की करें तो 2017 के उत्तराखंड चुनावों की बिसात के केन्द्र में जिस तरह हरीश रावत आ गए हैं तो उनके मुकाबले के लिए भाजपा में वर्चस्व की जंग चल रही है | नेतृत्व के गंभीर संकट से जूझ रही उत्तराखंड भाजपा में इस समय पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी को 2017  की चुनाव समिति की कमान सौपकर भावी मुख्यमंत्री के तौर पर फिर से मैदान में उतार सकती है | 2012  के चुनावों से ठीक पहले निशंक को हटाकर जिस अंदाज में भाजपा आलाकमान ने विधान सभा चुनावों से ठीक पहले खण्डूड़ी को सी एम के रूप में प्रोजेक्ट किया था उसका लाभ भाजपा को इस रूप में मिला कि उत्तराखंड में खण्डूड़ी ने भाजपा के डूबते जहाज को तो बचा लिया लेकिन जहाज का कैप्टेन जनरल कोटद्वार में पार्टी के भीतरघात के चलते खुद चुनाव हार गया और शायद यही वजह रही 2012 के चुनावों में भाजपा कांग्रेस से महज एक सीट पीछे रही जिसके बाद खण्डूड़ी की हार ने निर्दलियों के साथ कांग्रेस के मुख्यमंत्री के रूप में विजय बहुगुणा की ताजपोशी का रास्ता साफ़ किया था |  

उत्तराखंड में  खांटी कांग्रेसी हरीश रावत के कद के आगे सिवाए खण्डूड़ी के उत्तराखंड भाजपा का कोई चेहरा सामने नहीं टिकता शायद यही वजह है वर्तमान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत के विकल्प पर भी इन दिनों भाजपा में भारी असमंजस मौजूद है और अभी तक सस्पेंस कायम है | इन्द्रप्रस्थ  और बिहार की जंग बुरी तरह हारने के बाद भाजपा ऐसे कद्दावर नेता को उत्तराखंड का सेनापति बनाना चाहती है जो कांग्रेसी दिग्गज नेता हरीश रावत को कड़ी टक्कर दे सके | स्थानीय नेताओं की उपेक्षा और बुजुर्ग नेताओं को दरकिनार करने जैसे विवादों से जूझ रहा पार्टी का केन्द्रीय नेतृत्व उत्तराखंड को लेकर मौजूदा अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत के विकल्प को लेकर असमंजस में है
मुख्यमंत्री हरीश रावत ने फरवरी 2014 में अपनी ताजपोशी के बाद से जिस तरह टी ट्वेंटी अंदाज में पूरे उत्तराखंड में बैटिंग की है उससे भाजपा की दिलों की धडकनें बढ़ी हुई हैं | चुनावी मॉड में होने के कारण उनके द्वारा ताबड़तोड़ घोषणाएं की जा रही हैं | भले ही यह सभी घोषणाएं पूरी ना हो पाएं लेकिन राज्य में हरीश रावत ने विजय बहुगुणा के सी एम पद से हटने के बाद कांग्रेस को मजबूत स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है |  खण्डूड़ी , कोश्यारी  और निशंक के केंद्र में जाने के बाद से राज्य में  दूसरी पंक्ति में भाजपा का बड़ा जनाधार वाला कोई ऐसा नेता नहीं बचा है जिसके करिश्मे के बूते भाजपा की वैतरणी पार हो सके लिहाजा भाजपा आलाकमान भी अब 11 अशोका रोड में इस बात को लेकर मंथन करने में जुटा है कि भाजपा की इस त्रिमूर्ति का साथ लिए बिना 2017 में भाजपा का बेडा पार लगना नामुमकिन है लिहाजा वह भी फूंक फूक कर कदम रख रही है |

 पहाड़ों में अभी सर्द मौसम चल रहा है और यहाँ के मिजाज को देखते हुए इस बात की संभावना प्रबल हैं कि अगले बरस अक्तूबर नवम्बर में चुनावी डुगडुगी बज जाए | ऐसे माहौल में बिहार गंवाने के बाद भाजपा उत्तराखंड में खण्डूड़ी के करिश्मे को मैजिक बनाने की संभावनाओं पर मंथन करने में लगी हुई है | हरियाणा , महाराष्ट्र और झारखंड से इतर उत्तराखंड में किसी चेहरे को प्रोजेक्ट न करने की अपनी रणनीति को उसे सिरे से  बदलने को मजबूर होना पड़ सकता है |

जानकार भी मानते हैं कि उत्तराखंड की मुख्य लड़ाई हिमाचल सरीखी ही रही है और यहाँ की राजनीती भी भाजपा और कांग्रेस के इर्द गिर्द ही घूमती रही है लिहाजा किसी को प्रोजेक्ट करने से मुकाबला रोचक हो सकता है | उत्तराखंड में बारी बारी से हर 5 बरस में यह दोनों राष्ट्रीय दल अपनी सरकार बनाने के लिए सामने आते रहे हैं | भाजपा में खण्डूड़ी 75 पार कर चुके हैं लिहाजा वह मोदी की टीम के खांचे में फिट नहीं बैठते मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल होने की उनकी संभावनाएं उत्तराखंड से सबसे प्रबल थी लेकिन उनकी उम्र बड़ी बाधक बन गई थी लेकिन भाजपा आलाकमान देर सबेर अब इस बात को समझ रहा है कि उत्तराखंड के चुनावी समर में खण्डूड़ी उसका तुरूप का इक्का एक बार फिर से साबित हो सकते हैं लिहाजा कई पार्टी के बड़े नेता उनके नेतृत्व में रावत सरकार के खिलाफ न केवल बड़ी  जंग लड़ने का मन बना रहे हैं बल्कि चुनावी चेहरे के रूप में एक्शन मोड में जनरल खण्डूड़ी को लाने का मन बना रहे हैं |

खण्डूड़ी के साथ सबसे बड़ी बात उनकी साफगोई है | उनकी पूरे राज्य में मजबूत पकड़ रही है | साथ ही संघ का आशीर्वाद अब भी उनके साथ है | भाजपा में अटल आडवाणी और डॉ जोशी युग भले ही ढलान पर हो लेकिन मार्गदर्शक मंडल के आडवाणी और डॉ जोशी की गुड बुक में आज भी खण्डूड़ी का नाम लिया जाता है जिसका कारण राजनीति में उनका समर्पण और ईमानदारी रही है जिसके तहत अतीत में वाजपेयी सरकार में खण्डूड़ी स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के आसरे पूरे देश में नई लकीर खींच दी और यू पी ए सरकार ने भी इस बात को माना केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्री के तौर पर खण्डूड़ी के कार्यकाल में सडकों का बड़ा जाल न केवल बिछा बल्कि प्रतिदिन कई किलोमीटर सड़क ने कुलांचे मारे जिसके आस पास वर्तमान मोदी सरकार के कैबिनेट मंत्री तक भी नहीं फटक सकते

उत्तराखंड के नैनीताल से भाजपा सांसद कोश्यारी की भी संघ पर मजबूत पकड़ रही है लेकिन कम प्रशासनिक पकड़ के चलते भाजपा उन्हें  आगामी चुनाव  में पूरी तरह आगे करने का रिस्क मोल नहीं लेना चाहती | वैसे पार्टी को इन दोनों नेताओं की कार्यशैली पर किसी तरह का कोई संदेह भी नहीं है | ईमानदारी के मामले में दोनों पाक साफ़ हैं | जहाँ खंडूरी की गिनती वाजपेयी सरकार के सबसे ईमानदार मंत्रियों के रूप में न केवल होती रही बल्कि उत्तराखंड में अपने दूसरे टर्म में खण्डूड़ी ने जिस अंदाज में सरकार चलाई उसकी मिसाल आज तक देखने को नहीं मिलती उस दौर को याद करें तो ना केवल नौकरशाही उनसे खौफ खाती थी बल्कि माफियाओं और बिल्डरों के नेक्सस को तोड़ने में उन्होंने  पहली  बार सफलता पाई | यह अलग बात थी भाजपा के कुछ नेताओं की जेबे उस दौर में गरम नहीं हो सकी जिसके चलते खंडूरी ने बेदाग़ सरकार चलाने में सफलता पाई |

 वहीँ  भगत सिंह कोश्यारी की भी पूरे राज्य में जबरदस्त पकड़ रही है और संघ के साथ ही राजनाथ सिंह का उन पर ख़ासा वरदहस्त  रहा है जिसका इजहार खुद राजनाथ सिंह ने उत्तराखंड की एक सभा में किया था जब  उन्होने बड़े मंच से खुद कहा था उत्तराखंड में उन्हें कोश्यारी के जैसी कर्मठता और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति देखने को नहीं मिलती क्युकि उन पर किसी तरह का कोई दाग नहीं है | उनकी संगठानिक छमताओं पर हर किसी को यकीन है जिसकी मिसाल 2007  के विधान सभा चुनावों में देखने को मिली जहाँ उन्होंने कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी की सरकार से प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर  लोहा लिया और अपनी सधी चाल से भाजपा की सत्ता में वापसी का रास्ता तैयार किया था | यह अलग बात है भाजपा में जब मुख्यमंत्री बनाने की बारी आई तो विधायकों का बड़ा समर्थन कोश्यारी के साथ होने के बाद भी जनरल खण्डूड़ी  की ताजपोशी कर दी गई |

 अब भाजपा में इस बात को लेकर मंथन चल रहा है कि कोश्यारी और खंडूरी को साधकर उत्तराखंड में हरीश सरकार को चुनौती दी जाए | उत्तराखंड में नए भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद की बिसात जिस तरह  उलझती ही जा रही है और दावेदारों की भारी भरकम फ़ौज हर दिन दिल्ली दरबार में हाजरी लगा  रही है उसके मद्देनजर शायद भाजपा आलाकमान अब खुद अपना फैसला आने वाले दिनों में सुनाये जिसके तहत कोश्यारी को प्रदेश अध्यक्ष और खण्डूड़ी को चुनाव समिति की कमान सौंप दी जाए और निशंक और सतपाल महाराज को मोदी मंत्रिमंडल विस्तार में जगह मिल जाए  | निशंक तो बाबा रामदेव के साथ गलबहियां कर मोदी मंत्रिमंडल में मई 2014 से ही दावेदारी करने में लगे हुए हैं लेकिन सतपाल महाराज के भाजपा में आने के बाद उन्हें भी भाजपा नजरअंदाज नहीं कर सकती | मोदी निशंक को मंत्रिमंडल विस्तार में जगह देने में कामयाब अगर नहीं हो पाते हैं तो फिर कोश्यारी को केंद्र में बड़ी जिम्मेदारी दी जा सकती है | ऐसे में बहुत संभव है निशंक को पार्टी संगठन में राष्ट्रीय महासचिव का ओहदा दिया जा सकता है |

 पिछले दिनों  भाजपा के एक गुप्त सर्वे में भाजपा की चुनावी संभावनाओं पर मंथन हुआ है जिसमे यह बात  खुलकर सामने आई है अगर मजबूत विकल्प पर भाजपा ने विचार नहीं किया तो हरीश रावत 2017 में कांग्रेस की उत्तराखंड में दुबारा वापसी करने में सक्षम हैं | इस गोपनीय सर्वे और फीड  ने संघ मुख्यालय नागपुर से लेकर 11 अशोका रोड तक हलचल मचाने का काम शुरू कर दिया है | अब इसी को ध्यान में रखकर भाजपा में एक बार फिर खण्डूड़ी जरूरी बन गए हैं | पार्टी के अंदरूनी सर्वे में भी यह खुलासा हुआ है खण्डूड़ी को प्रोजेक्ट कर चुनाव लड़ने में भाजपा हरीश के मुकाबले में सक्षम है | वैसे जनता की नजर में खण्डूड़ी आज भी सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं और पिछले चुनाव में कोटद्वार में हार के बाद से आम जनता के मन में उन्हें लेकर सहानुभूति की लहर अब भी बरकरार है शायद यही वजह है भाजपा आलाकमान अब इसी सहानुभूति की लेकर को एक बार फिर पार्टी के पक्ष में कैश करने की योजना बना रहा है | यही नहीं भाजपा संगठन प्रभारियों और केन्द्रीय कमेटी के फीड में भी खण्डूड़ी का नाम ऐसे चेहरे के रूप में सामने आ रहा है जो चुनावी बरस में अप्रत्याशित तौर पर भाजपा का बेडा पार कर सकते हैं और खुद पी एम मोदी खण्डूड़ी के भरोसे समर में कूदने का मन बना रहे हैं |

 उत्तराखंड की बात करें तो यहाँ पर मोदी लहर फींकी पड़ चुकी है | अगर लहर रहती तो भाजपा उत्तराखंड के डोईवाला ,धारचूला, सोमेश्वर  सरीखे उपचुनाव ना केवल जीतती बल्कि पंचायत चुनावों में भी बढ़त बनाने में सक्षम रहती लेकिन उत्तराखंड में हरीश रावत ने अपनी संगठानिक छमताओं के आसरे  कांग्रेस को हर चुनाव में भाजपा के मुकाबले ना केवल आगे किया है बल्कि कांग्रेस में बगावाती सुरों को भी नरम किया है | वैसे विजय बहुगुणा के दौर में कांग्रेस में हर दिन विधायक बगावती तेवर अपनाया करते थे जिससे सरकार और संगठन की कई मौकों पर किरकिरी होती रहती थी लेकिन अपनी ताजपोशी के बाद हरदा का सिक्का ना केवल उत्तराखंड में मजबूत हो रहा है बल्कि दस जनपथ में भी वह अपनी मजबूत पैठ बनाते जा रहे हैं | अम्बिका सोनी से लेकर अहमद पटेल और राहुल गाँधी से लेकर सोनिया गांधी हर कोई इस दौर में हरीश सरकार के कामकाज से संतुष्ट बताये जा रहे हैं | सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी तो उत्तराखंड में हरीश रावत के कामकाज की तारीफ़ करने का कोई मौका नहीं छोड़ते | लिहाजा कांग्रेस अगले चुनावों में हरीश रावत को फ्रीहैंड देने के मूड में है यानी कांग्रेस में टिकटों के  चयन से लेकर प्रचार प्रसार का पूरा जिम्मा हरीश रावत के इर्द गिर्द ही सिमटेगा और वही नेता ज्यादा टिकट पाने में कामयाब रहेगा जिसकी निकटता हरीश रावत के साथ होगी लिहाजा भाजपा में भी खंडूरी और कोश्यारी की जोड़ी को आगे कर मिशन 2017 की बिसात बिछाई जा रही है जिसमे कोश्यारी को संगठन की कमान देने के साथ ही परदे के पीछे से चुनाव समिति की कमान खण्डूड़ी के जिम्मे देने के साथ ही चुनावी चौसर बिछाये जाने की संभावनाओं पर  गहनता से मंथन चल रहा है | भाजपा के उत्तराखंड प्रभारी श्याम जाजू के स्थान पर केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद को लाने की संभावनाओं से भी आने वाले दिनों में इनकार नहीं किया जा सकता | रवि शंकर प्रसाद 2007 के चुनावों में भी उत्तराखंड भाजपा के प्रभारी रह चुके हैं लिहाजा पार्टी उनके अनुभव का लाभ भी लेना चाह रही है |   

    बिहार चुनावो के परिणाम के बाद भाजपा प्रधानमन्त्री और  बाहरी नेताओ के भरोसे उत्तराखंड को नहीं छोड़ना चाहती | चुनावों में बहुत कम समय बचा है लिहाजा भाजपा किसी भी तरह टिकटों के चयन और बिसात बिछाने में पीछे नहीं रहना चाहती | भाजपा में बड़ा खेमा ऐसा है जो हरीश रावत की सधी हुई चालों से इस समय परेशान है | हरीश रावत जनता के बीच जाकर जिस तरह पहाड़ों से लेकर मैदान तक में लोगों के बीच अपनी योजनाओं को लागू कर रहे हैं उसके देर सबेर परिणाम कांग्रेस के हक़ में मिलने तय हैं | ऐसे में भाजपा किसी लो प्रोफाइल नेता तो अगर हरीश रावत के मुकाबिल खड़ा करती है तो पार्टी बमुश्किल दहाई वाला आंकड़ा छू पाएगी ऐसे में पार्टी अपने दो सर्वाधिक अनुभवी मुख्यमंत्री  खंडूरी और कोश्यारी को सामने रख हरीश सरकार के खिलाफ माइलेज लेना चाहती है |

चुनावी बरस होने के चलते हरीश रावत जहाँ राज्य में युवाओं के लिए आने वाले दिनों में नौकरियों का बड़ा पिटारा खोलने जा रहे हैं वहीं उनके द्वारा देहरादून में शुरू की गई इंदिरा अम्मा योजना अब पूरे प्रदेश में लागू कर दी गई है जिसके शुरुवाती परिणाम कांग्रेस के हक़ में जाते दिख रहे है | यही नहीं पर्वतीय इलाकों में पलायन रोकने की दिशा में स्थानीय उत्पाद को बढ़ावा देने के आलावे  कई योजनाये अपने पिटारे में पेश की गई है जिससे पहाड़ और मैदान में भेद समाप्त हो रहा है और पहली बार खांटी कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत उत्तराखंड के जनसरोकारों से न केवल जुड़ने की कोशिश कर रहे हैं बल्कि पलायन को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं | वह पहाडी जनभावनाओं के अनुरूप आने वाले दिनों में गैरसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाने का बड़ा दाव चुनावों से ठीक पहले खेलने की कोशिशों में जुटे हैं ताकि 2017 में पहाड़ों में कांग्रेस मजबूत हो सके | यही नहीं  2013 की केदारनाथ आपदा के बाद जिस अंदाज में दिन रात काम कर रावत ने केदारनाथ का पुनर्निर्माण किया है वह काबिलेतारीफ है और पहली बार आपदा से केदारनाथ धाम उबरा है | यही वजह है इस बरस केदारनाथ की यात्रा पर पिछले बरस के मुकाबले भक्तों की भीड़ बहुत अधिक रही | खुद केंद्रीय जल संसाधन मंत्री उमा भारती रावत सरकार के द्वारा केदारघाटी में किये गए पुनर्निर्माण कार्यों से संतुष्ट हैं

 भाजपा की असल परेशानी उत्तराखंड में यहीं से शुरू होती है | राज्य में कांग्रेस सरकार को घेरने के कई मौके आये लेकिन  भाजपा हर बार चूक गई इसका बड़ा कारण खण्डूड़ी, कोश्यारी और निशंक का सांसद बन जाना रहा लिहाजा कोई नेता हरीश सरकार के खिलाफ बयानबाजी के अलावे मोर्चा नहीं खोल सका | विजय बहुगुणा के सी एम रहते जहां भाजपा आगामी चुनावों में अपनी जीत निश्चित मानकर चल रही थी वहीँ बदले हालातों में कमान हरीश रावत के आने के बाद उसे अब अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर होना पड़ रहा है | ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार को घेरने के कई मौके आये  | आबकारी नीति से लेकर खनन, माफियाओं के बड़े नेटवर्क की सक्रियता से लेकर जमीनों को खुर्द बुर्द करने का खुला खेल रावत सरकार के कार्यकाल में ना केवल चला है बल्कि हर विभागों में अरबों के वारे न्यारे हुए हैं लेकिन भाजपा राज्य में मित्र विपक्ष की छवि ही बना पाई है | हरीश रावत को वह उनके सचिव शाहिद के स्टिंग के जरिये घेरने में भी पूरी तरह विफल जहाँ रही वहीँ इस दौर में आपदा और खनन सरीखे बड़े मुद्दों में सिवाए बयानबाजी और प्रेस कांफ्रेंस के भाजपा हरीश रावत सरकार के कोई आन्दोलन भी खड़ा नहीं कर सकी है |  हरीश सरकार की ऍफ़ एल 2 नीति भी विवादों से भरी रही है और बीते दिनों पूर्व गृह मंत्री चिदंबरम जिस अंदाज में सरकार के खिलाफ पैरवी करने नैनीताल हाईकोर्ट चले आये उसने  मुख्यमंत्री और कांग्रेस की घिग्घी बाधने का काम किया है लेकिन भाजपा इस पर भी कांग्रेस को घेरने में पूरी तरह विफाल रही है | यही नहीं हाल ही में गैरसैण में सम्पन्न विधानसभा सत्र में भी सत्र ना चलने देने के पीछे भाजपा ने हरीश रावत को जिम्मेदार माना है | नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट ने हाल ही में यह बयान भी दिया था कि मुख्यमंत्री रावत का व्यवहार सत्र के दौरान छात्र संघ अध्यक्ष जैसा रहा |

गैरसैंण में विधानसभा के सत्र के दौरान भट्ट का यह बयान भी किसी के गले नहीं उतर रहा कि कांग्रेस सरकार सदन में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश के बाद से ही विपक्ष के सदस्यों के सब्र का बांध गैरसैंण विधानसभा में टूटा था । तीन नवंबर को गैरसैंण में सदन में गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाने पर विपक्ष ने सरकार से अपना रुख स्पष्ट करने की मांग की  थी इसके लिए विपक्ष बाकायदा काम रोको प्रस्ताव लेकर आया था। इस प्रस्ताव को विधानसभा अध्यक्ष ने स्वीकार नहीं किया था। इससे गुस्साए विपक्ष ने सदन में जमकर हंगामा किया था।  विपक्ष बाकायदा काम रोको प्रस्ताव लेकर आया था। इस प्रस्ताव को विधानसभा अध्यक्ष ने स्वीकार नहीं किया था। इससे गुस्साए विपक्ष ने सदन में जमकर हंगामा किया था | नेता प्रतिपक्ष अजय भट्ट और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष तीरथ सिंह रावत हाथ में माइक लेकर मेजों पर चढ़ गए थे। विपक्ष का आरोप था कि सरकार के इशारे पर सदन में असामाजिक तत्त्व घुस गए जिसके चलते सदन नहीं चल पाया राजभवन ने खुद अब विधानसभा से गैरसैण सत्र की जो फुटेज मगाई है उसमे यह साफ़ है कि गैरसैण सत्र मे कोई भी बाहरी व्यक्ति सदन के भीतर नहीं घुसा इससे भाजपा में अजय भट्ट की लीडरशिप पर सवाल ही नहीं पूरी भाजपा  कठघरे में खडी नजर आ रही है | प्रदेश अध्यक्ष तीरथ रावत का कार्यकाल भी निराशाजनक रहा है | उनके नेतृत्व में प्रदेश में भाजपा की धार कुंद हुई है | यही कारण है चुनावी बरस में  आलकमान खण्डूड़ी और कोश्यारी को लेकर फिर से अपने पत्ते फेंटने लगा है और भाजपा को भी लगता है अगर कोश्यारी और खंडूरी फिर से साथ आते हैं तो राज्य में भाजपा की सरकार बन सकती है|   ऐसे बदलते हालात में  खण्डूड़ी ही एक मात्र ऐसा चेहरा हैं जो पार्टी के नायक बनकर हरीश रावत सरकार को संकट में डाल सकते हैं |

 संभवतया खण्डूड़ी के चेहरा बनाये जाने के बाद कांग्रेस को भी अपनी रणनीति बदलने को मजबूर होना पड़ जाए क्युकि खण्डूड़ी सरकार की पाक साफ़ छवि रही है और दूसरे टर्म में जनता से जुड़े  कई बड़े निर्णय लिये गये थे। खण्डूड़ी की ईमानदार छवि ने जहाँ  मजबूत लोकायुक्त की सौगात अन्ना की तर्ज पर  पूरे राज्य को दी वहीँ उनके शासन में लूट खसौट पर रोक लगी | माफियाओं  और बिल्डरों  की लाबी उनसे जहाँ खौफ खाने लगी वहीँ राज्य की बेलगाम नौकरशाही पहली बार पटरी पर भी आई यही नहीं ट्रांसफर के जिस उद्योग ने पिछली सरकारों के सामने बड़े कुलाचे मारे वह  स्थानांतरण कानून की शक्ल ले पाया जिससे नेताओं की लूट खसोट पर भी रोक लगी | सरकारी नौकरियों में साक्षात्कार की व्यवस्था खत्म करने से लेकर भ्रष्टाचार उन्मूलन विभाग की स्थापना और राज्य की बेशकीमती जमीनों को बाहरी व्यक्तियों को देने पर रोक से लेकर गरीबों को सस्ता राशन देने की योजनाओं के आसरे उन्होंने उत्तराखंड में नई  लकीर खींचने का काम किया | उत्तराखण्ड में अन्ना टीम के मुताबिक लोकायुक्त बिल को सदन में पारित करा मुख्यमंत्री बीसी खण्डूड़ी ने प्रदेश में लोगों के बीच अलग छवि बनाने के साथ ही यह बताने में कोई कसर नहीं छोडी भ्रष्ट सियासत में जनता के हितों को प्राथमिकता देना उनका पहला कर्तव्य है ।उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री की दूसरी पारी भ्रष्टाचार के खिलाफ जिस अंदाज में उन्होंने खेली इससे उनकी छवि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले एक योद्धा के रूप में आम जनता में बनी | खण्डूड़ी ने अपने दूसरे टर्म में ताबड़तोड़ फैसले लिए। उन्होंने अन्ना टीम के साथ विचार- विमर्श कर एक सशक्त लोकपाल कानून बना डाला। राज्य में 'ट्रांसफर उद्योग' पर रोक लगाने की नीयत से एक ऐसा कानून तैयार किया जिससे सरकारी कर्मचारियों को भारी राहत मिली | लोकपाल कानून बनाने से खण्डूड़ी की छवि में जबरदस्त सुधार हुआ। भाजपा ने 2012 में खण्डूड़ी पर दांव लगाया   लेकिन पार्टी के कुछ नेताओं के भीतरघात ने उन्हें हरा दिया | भाजपा अगर 2017 में  सत्ता में वापसी चाहती है तो  अब खण्डूड़ी पर बड़ा जुआ उसे खेलना ही होगा |  

शायद यही वजह है आज भी केंद्रीय नेतृत्व की नजर में भाजपा के भीतर बीसी खण्डूड़ी 75 पार होने के बाद भी उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार के रूप में उभर रहे हैं और पार्टी के भीतर  खण्डूड़ी के हाथ चुनाव समिति की कमान देने को लेकर सियासी सरगोशियाँ तेज हैं | जो लकीर अपने राज्य में पाक साफ़ ईमानदार सरकार के नाम पर खण्डूड़ी ने अपने कार्यकाल में खींची  उससे उनकी सरकार ने जनता के दिलो में अलग छाप छोडी  वह निश्चित ही आने वाले चुनावों में भाजपा को संजीवनी देने का तो काम तो करेगी ही | यह अलग बात है कांग्रेस ने खण्डूड़ी की खींची लकीर को मिटाने की कोशिश की है |


पहले दौर के पायलट सर्वे और फीड के बाद भाजपा बम बम है | भाजपा से जुड़े सूत्रों की मानें तो राज्य में विधानसभावार उम्मीदवारों और सिटिंग एम एल ए को लेकर पार्टी अब एक फाइनल सर्वे करने जा रही है जिसके सम्पन्न होने के बाद  टिकटों को लेकर रायशुमारी की जाएगी | इस सर्वे में पार्टी किसी चेहरे पर दाव खेलने के बारे में जनता की सीढ़ी नब्ज टटोलने की भी कोशिश करेगी  | वैसे अब तक राज्य गठन के बाद हुए हर एजेंसी के सर्वे में खण्डूड़ी ही भाजपा में सब पर भारी पड़े हैं और आज भी लोकप्रियता के मामले में वह उत्तराखंड के सभी मुख्यमंत्रियों पर भारी पड़ते हैं खुद सत्तारूढ़ कांग्रेस के नेता भी इस बात को मानते हैं हरीश रावत के मुकाबले के लिए अगर भाजपा में खण्डूड़ी सामने लाये जाते हैं तो उत्तराखंड में मुकाबला कांटे का रहेगा क्युकि उनकी लोकप्रियता हरीश रावत की तरह पूरे राज्य में है | ऐसे में देखना दिलचस्प होगा क्या आने वाले दिनों में भाजपा उत्तराखंड में खण्डूड़ी को सीधे प्रोजेक्ट कर हरीश रावत सरकार के खिलाफ अपना ब्रह्मास्त्र छोडती है या चुनाव समिति की कमान सौपकर उन्हें भावी मुख्यमंत्री के तौर पर आगे रखती है

Monday, November 16, 2015

आतंक के साये में फ्रांस




फ्रांस की राजधानी पेरिस में हुए आतंकवादी हमले ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया है | ज्यादा समय नहीं बीता जब साल की शुरुवात में ही एक विवादित कार्टून प्रकाशित करने की सजा के तौर पर हमलावरों ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में एक दर्जन से अधिक लोगों की हत्या कर दी थी | उस हमले का सिलसिला तीन दिनों तक पेरिस के विभिन्न हिस्सों में चलता रहा लेकिन इस बार का हमला पूरी तरह सुनियोजित रहा और इसकी तुलना अगर भारत के मुंबई 26/11 और अमरीका के 9/11 से की जा रही है तो इसकी ख़ास वजहें हैं | असल में जिस रणनीति के साथ आतंकियों ने इसे अंजाम दिया और हमले के जो तौर तरीके अपनाए वह ट्वीन टावर, मुंबई सरीखे ही रहे जहाँ आतंकियों ने भीड़ भाड़ वाले स्थानों को अपना निशाना बनाया | धमाके कितने भीषण रहे होंगे इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आतंकी हमलों के बाद स्टेट डी फ्रांस स्टेडियम में भारी अफरातफरी मच गई | फ्रांस के राष्ट्रपति ओलांद  भी इसी स्टेडियम में बैठकर फ़्रांस और जर्मनी के बीच खेले जा रहे फुटबाल मैच का आनंद ले रहे थे | शुक्र रहा सुरक्षाकर्मियों  का जिन्होंने हमले के बाद उन्हें सकुशल बाहर निकालने में सफलता पाई लेकिन असल निशाना तो बैताक्ला थियेटर था जहाँ पर 1500 से ज्यादा लोगों की भारी भीड़ अमरीकी रॉक बैंड की थाप पर ना केवल थिरक रही थी बल्कि सुगम संध्या का आनंद लेने पहुंची थी लेकिन किसे पता था घंटे भर बीतने के बाद चीख , पुकार और फायरिंग के बीच वहां पर खून का खुला खेल शुरू हो जाएगा और लोगों को सुरक्षित भागने के लिए जमीन के ऊपर पड़ी लाशो से गुजारना पड़ेगा |  यही नहीं आतंकियों ने पेरिस में बर्बरतापूर्वक निहत्थे लोगों पर गोलियां बरसाई  और जोर जोर से अल्ला हो अकबर के नारे लागाने के साथ ही भागते मासूमों पर बारूद भी फेंका | आतंकियों के हौंसले किस कदर बुलंद थे यह इस बात से समझा जा सकता है कि उन्होंने सड़क से लेकर स्टेडियम , कैफे से लेकर कंसर्ट हाल तक को अपना निशाना एक सुनियोजित रणनीति के तहत बनाया |

 पेरिस को निशाना बनाकर आतंकियों ने अपने खतरनाक मंसूबे पूरी दुनिया के सामने जाहिर कर दिए हैं | पेरिस हमले की जिम्मेदारी खतरनाक संगठन आई एस आई एस ने ली है और अब पूरे यूरोप के सामने संकट के बादल मडरा गए हैं | फ्रांस में हुए इन भीषण धमाकों ने दूसरे विश्वयुद्ध की यादें ताजा कर दी हैं जहाँ पूरा देश आपातकाल के साये में जी रहा है | आम आदमी अभी भी  दहशत के साये में जी रहा है तो पुलिस भी सघन तलाशी अभियान चलाये हुए है जहाँ उसकी पकड़ में कुछ लोग आये हैं वहीँ 8 आतंकी  मौके पर ही ढेर हो चुके हैं | इस घटना के बाद देश की सीमाएं पूरी तरह सील हैं तो पूरे देश में कर्फ्यू सीखी स्थितियां चरम पर पहुँच चुकी हैं |

हालंकि इस हमले के तुरंत बाद फ्रांस सरकार हरकत में आ गई और उसके राष्ट्रपति ओलांद ने आई एस आई एस को सबक सिखाने के लिए सीरिया के रक्का में हवाई ताबड़तोड़ कार्यवाहियों को अंजाम दिया  लेकिन  हमले से एक बात साफ़ हो गई है आई एस आई एस की चुनौतियों से पार पाना दुनिया के लिए अभी  कोई आसान काम नहीं है क्युकि आज वह अपने साथ बड़े लडाकाओं की भारी भरकम फ़ौज न केवल खड़ी कर चुका है बल्कि अपने साथ अत्याधुनिक हथियारों का बड़ा जखीरा भी रखे हुए है | ख़ास बात यह है कि आई एस आई एस  की ताकत को बढाने में कई देश न केवल उसे फंडिंग कर रहे हैं बल्कि  युवाओं को इस्लाम के नाम पर उकसाया जा रहा है | आतंक के इस रास्ते पर चलने वाले युवाओं को  मिलने वाली मुहमांगी रकम भी उन्हें आतंकवाद की राह पकड़ने को मजबूर कर रही है | पेरिस के इन हमलों के पीछे ऐसे युवाओं की भूमिका सामने आ रही है जिनकी उम्र 30 बरस से कम है जो यह बताने के लिए काफी है आई एस आई एस पूरी दुनिया से ऐसे युवाओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिशों में सफल रहा है  | फ्रांस की ही बात की जाए तो उसकी गिनती हाल के वर्षो में ऐसे देश के रूप में होने लगी है जहाँ के युवा  आई एस में शामिल होने के लिए सीरिया को अपना आशियाना बनाये हुए हैं और कट्टरता का नकाब ओढे हुए हैं | ऐसे युवा आई एस के साथ मिलकर पूरी दुनिया में खूनी खेल खेलने के लिए तैयार बैठे दिखाई देते हैं |

फ्रांस की सरकार  सीरिया की असद सरकार के खिलाफ है और आई एस आई एस को नेस्तनाबूद करने के प्रयासों में अमरीका की गोद में बैठकर आतंकियों के खिलाफ खेल रही है |  पिछले कुछ समय से फ़्रांस जेहादी आतंकवाद के खिलाफ जिस तरीके से एकजुट होकर मोर्चा खोले हुए है  शायद इसी बदले की भावना से आतंकवादियों ने पेरिस को निशाना बनाया |  अमरीका के नेतृत्व में कई यूरोपीय देश की सेनायें इस समय इन आतंकवादियों के खिलाफ मिलजुलकर लड़ रही हैं लेकिन अभी तक आई एस आई एस के  साम्राज्य को तहस नहस नहीं किया जा सका है जो एक बड़ी चिंता का विषय इस समय बना हुआ है |  आई एस आई एस ने पेरिस में सुनियोजित तरीके से  हमलों को अंजाम दिया और समय भी ऐसा चुना जब शहर में भीड़ भाड अधिक रहती है | आतंकियों के हमलों से फ्रांस के नागरिक सहमे नजर आते हैं |  इन हमलों में सवा सौ से अधिक लोग अपनी जान गवा चुके हैं वहीँ ढाई सौ से अधिक लोग घायल हुए हैं |

फ्रांस के लिए यह बरस सबसे बुरा साबित हुआ है | नए साल की शुरुआत जहाँ फ्रांस की मशहूर व्यंग्य पत्रिका चार्ली एब्दो के कार्यालय से हुई जिसमें दो बंदूकधारियों ने  पत्रिका के संपादक स्टीफन सहित 12 लोगों की हत्या कर दी थी वहीँ शहर के  विभिन्न हमलों में कुछ लोग भी मारे गए थे लेकिन वो हमला हाल के हमलों जैसा भीषण नहीं था | अभी के हालत आम इंसान के मन में एक अजीब सा डर पैदा कर देते हैं | आतंकियों की कोशिश पेरिस में व्यापक नुकसान करने की थी और एक आतंकी की पहचान जिस तरह फ़्रांसीसी नागरिक के रूप में हुई है उसने पहली बार झटके में कई सवालों को खड़ा किया है और यह सोचने पर मजबूर किया है किया आतंकी स्लीपर सेल के आसारे खुनी खेल खेलने का ताना बाना बुनने में लगे हुए हैं जहाँ स्थानीय लोगों को कट्टरपंथी बनाने में आमादा हैं |  

एक आतंकी  के पास से मिले सीरयाई पासपोर्ट से यह सवाल भी खड़ा  हुआ है कि पेरिस हमले के आतंकियों  के तार सधे सीधे सीरया से जुड़ते चले जा रहे हैं जहाँ उन्हें आई एस आई एस ने न केवल ट्रेनिंग दी बल्कि कट्टरपंथी बनने को मजबूर कर दिया | फ्रांस की सेना जिस तरह सरिया और ईराक में अमरीकी सरकार के साथ मिलकर कदमताल कर रही है उससे  यह सवाल पेचीदा हो चला है कहीं आतंकवादियों ने यह सब जानकर फ़्रांस को अपना निशाना तो नहीं बनाया हुआ है | असल में इसका सबसे बड़ा कारण यही है | साथ ही फ्रांस में यूरोपियन देशों की सबसे अधिक मुस्लिम आबादी रहती है और यूरोप के इस गेटवे तक आसानी से पहुंचा जा सकता है शायद इसी को ध्यान में रखते हुए आतंकवादियों ने पेरिस को चुना जिससे पूरे यूरोप को धमकाया जा सके | इस आतंकी हमले का सीधा प्रभाव अब शायद शरणार्थियों के संकट को बढ़ाएगा | 

फ्रांस यूरोप के उन देशो में शामिल है जिन्होंने सीरिया के संकट के चलते कई शरणार्थियों को शरण देने पर रजामंदी जताई थी लेकिन संभवतया इस संकट के बाद अब मुस्लिमों को शरण देने में अपने कदम फ्रांस  की सरकार को शायद पीछे खींचने पड़े क्युकि शरणार्थियों के वेश मे आई एस अपने लडाके फ़्रांस भेजे जो कुछ समय बीतने के बाद इसी तरह का आतंक का खूनी खेल दुबारा शुरू कर दें क्युकि अब आतंक का नया चेहरा आई एस बन रहा है जहाँ वह स्लीपर सेल के मदद से बड़ी कार्यवाहियों को अंजाम देने में लगा हुआ है | 

चार्ली एब्दों पर हमले के बाद आई एस ने फ्रांस के खिलाफ फिर से बड़े हमलों की चेतावनियाँ  भी जारी की थी लेकिन फ़्रांस की सरकार ने इसे हल्के में लिया जिसका परिणाम सबके सामने है | पूरी मानवता आज पेरिस के हमलों से शर्मसार हुई है | 

पेरिस हमलों की पूरी दुनिया ने एकसुर में निंदा की है और तुर्की के अन्तालिया में जी 20 देशों के सम्मेलन में भी पेरिस हमलों की छाया साफ देखी गई | वहां पर सभी देशों ने कड़े शब्दों में इन हमलों की ना केवल निंदा की बल्कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को मिल जुलकर लड़ने का एलान किया है लेकिन मात्र एलान भर से कुछ नहीं होना है क्युकि आतंकवाद से लड़ने की नीति किसी भी देश के पास नहीं है | आज सभी देशों को चाहिए वह एकजुट होकर आतंक के खिलाफ बड़ी लड़ाई लडने के लिए खुद से तैयारी करें | अमरीका की बात करें तो जी 20 में ओबामा ने भी खुलकर आई एस आई एस के खिलाफ कार्यवाही की बातें दोहराई हैं लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि पूरी दुनिया आज अमरीका की गलत नीतियों का परिणाम भोग रही है | ईराक से लेकर अफगानिस्तान और सीरिया से लेकर अरब देशों में काम कर रही सरकारों को अपदस्त करने का खुला खेल जो अमरीकी सरकारों के दौर में चला है उसके परिणाम पेरिस सरीखे हमलों के रूप में हमारे सामने आ रहे हैं जहाँ बेगुनाह नागरिक मारे जा रहे हैं | 

कभी मास्को पर हमला हो जाता है तो कभी विमान शर्म अल शेख से उड़ान भरने के कुछ पलों बाद दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है | कभी चार्ली हेब्दो के दफ्तर को निशाना बनाया जाता है तो कभी कंसर्ट हाल में एकत्रित मासूमों पर लोग बंधक बनाकर मारे जा रहे हैं | एक लम्बे अरसे से अक्सर बड़े बड़े मंचो से सभी देश आतंकवादी ताकतों के खिलाफ एकजुट होने की बातें करते नहीं थकते लेकिन उसके बाद इन बैठकों का नतीजा ढाक के तीन पात सरीखा ही रहता है | 

आतंक का कोई रंग और मजहब नहीं होता लेकिन राजनीति और मुल्कों के टकराव के रास्तों के रंग ने आतंक के चेहरे को स्याह बना डाला है | हिंसा का खूनी खेल खेलने वाले कुछ आतंकी संगठन  कुछ देशों के लिए जहाँ आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे हैं वहीँ कुछ देश परोक्ष रूप से ऐसे खतरनाक आतंकी संगठनो को मदद भी दे रहे हैं जिससे आतंकवादियों के खिलाफ लड़ने की उनकी नीयत पर भारी सवाल भी खड़े होते हैं | गुड तालिबान बेड तालिबान , गुड पाकिस्तान  बेड पाकिस्तान  अब ऐसे नारों से काम नहीं चलेगा | भारत की ही बात करें तो पहले पूरी दुनिया हमारे देश की आतंकी घटनाओं पर ध्यान नहीं देती थी लेकिन अमरीका , फ्रांस के हमलों ने विकसित दशों के सोचने के तौर तरीकों में बदलाव हाल के वर्षो में तो जरूर ला दिया है शायद तभी जी 20 में प्रधानमन्त्री मोदी को यह कहने को मजबूर होना पड़ा कि यह समय आतंकवाद को परिभाषित करने का है जिसमे आतंकवाद के जन्म दाताओं  कि सही पहचान जरूरी है और फिर उनके साथ कार्यवाही करने का मानक एक होना चाहिए | 

आतंकवादियों के खिलाफ दोहरे मापदंड उठाने की नीतियों का प्रतिफल आज पूरी दुनिया पेरिस सरीखे हमलो के रूप में देख रही है | अब समय आ गया है जब पूरी दुनिया को आतंक के इस दानव के खिलाफ कोई बड़ी कार्यवाही एक साथ करने के लिए तैयार हो जाना चाहिए | 

आई एस आई एस के खिलाफ अब बड़ी कार्यवाही का समय निश्चित ही आ गया है इसके लिए जरूरी है  कोई रास्ता अमरीका और रूस से निकले क्युकि आई एस से लड़ने के मसले पर दोनों के दोहरे मापदंड साफ़ दिख रहे हैं | जहाँ रूस ने आई एस आई एस के ठिकानों पर जबाबी कार्यवाही कर यह साबित किया है कि वह अल बगदादी के साम्राज्य का खात्मा कर ही चैन से बैठेगा वहीँ अमरीका दोमुही बातें कर अपना विरोध पहले से ही जता चुका है | 

अब ऐसे हालातों में आतंकवाद के मसले पर नई लकीर कैसे खिंच पायेगी यह सवाल दिनों दिन गहराता ही जा रहा है लेकिन उससे भी बड़ा सवाल पेरिस के फिर से अपने पैरों में खड़े होने का भी है क्युकि इस भीषण आतंकवादी हमले ने पेरिस शहर की सांसें ही थाम कर रख दी | धमाकों की आवाजों से जहाँ पूरा शहर काँप उठा वहीँ नेशनल स्टेडियम में बैठे दर्शक अभी तक धमाकों से सहमे हैं और वो भीषण मंजर याद कर रोने लगते हैं तो समझा जा सकता है फ़्रांस के दिल में यह किस तरह की भीषण चोट रही | 

10 महीने पहले जब चार्ली के दफ्तर पर हमला हुआ था तो  लाखों लोगों ने पत्रिका के पक्ष में और आतंकवाद के विरुद्ध एकजुटता का प्रदर्शन किया था | नागरिकों ने अपनी तख्तियों पर मैं चार्ली हूं का नारा लिख रखा था |  यह एकता मार्च एक तरह से फ्रीडम ऑफ स्पीच के पक्ष में भी था लेकिन देखना होगा क्या फ़्रांस की जनता इन भीषण हमलों के दोषियों के खिलाफ  एकजुटता का प्रदर्शन चार्ली सरीखे मार्च को निकालकर कर पाती है या नहीं क्युकि आतंक के विरुद्ध आंधी को पेरिस शहर से ही गति दी जा सकती है और फिर पूरा यूरोप फ़्रांस की छतरी तले आकर पूरी दुनिया को एकजुटता का पाठ निश्चित ही पढा सकता है | वैसे भी इन हमलों के तुरंत बाद फ़्रांस के राष्ट्रपति ओलांद ने कहा भी है फ्रांस आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता से खड़ा रहेगा और इस संकल्प का समर्थन पूरी दुनिया करेगी | उम्मीद की जानी चाहिए इस बार कोई न कोई रास्ता जरूर निकलेगा |

आतंकवाद आज वैश्विक समुदाय के सामने बडी समस्या का रुप ले चुका है जिससे निपटना किसी चुनौती से कम नहीं है |  निःसंदेह कुछ देश आतंक के नए चेहरों को खाद पानी अपनी सरजमीं पर दे रहे हैं लेकिन आज ऐसे दलों को दुनिया से अलग करने की जरूरत है |  साझा प्रयास करने की नई पहल संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व  में ही अब शुरू हो सकती है | जी 20 देशों का एक मंच से आतंक के खिलाफ निपटने का ऐलान सराहनीय है |  इसी तरह अन्य देशों को आतंक के खिलाफ बड़ी लकीर अब खींचनी ही होगी  | इस्लाम के नाम पर जहाँ लोगों को गुमराह  किया जा रहा है वहीँ कट्टरपंथी ताकतें अब युवाओं को आतंक का नया ककहरा सिखाने में लगी हुई हैं | 

आज आई एस  के रूप में आतंक का नया चेहरा  हम सबके सामने है जहाँ  बडी संख्या में युवा ऐसे संगठनो की की तरफ पूरी दुनिया से उन्मुख हो रहे हैं जिनका मकसद  बेगुनाहों को मारना और किसी ख़ास विचारधारा के लिए काम करना बन गया है | ऐसी ताकतों के खिलाफ पूरी दुनिया की एकजुटता नई लकीर खींच सकती है | देखना होगा आपसी गिले शिकवे भुलाते हुए क्या सभी देश आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक जंग अब  पेरिस हमलों के बाद लड़ पाते हैं या नहीं ?