शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

तेलंगाना के चक्रव्यूह मे उलझती काँग्रेस

2014 की चुनावी बेला सामने आने से पहले काँग्रेस तेलंगाना के  चक्रव्यूह मे इस कदर उलझती जा रही है  जिससे पार पाना उसके लिए आसान नहीं दिखाई दे रहा | दस जनपथ के  संकेतो को अगर  डिकोड  करें तो  आगामी लोक सभा  चुनावो के मद्देनजर काँग्रेस के एक तबके मे तेलंगाना को लेकर एक खास तरह की पशोपेश की  स्थिति  पैदा हो रही है जिसमे लाभ से ज्यादा तेलंगाना पर काँग्रेस को नुकसान की संभावना दिखाई दे रही है जिसके चलते एक बार फिर तेलंगाना का मसला किनारे जाता दिख रहा है तो वही एक तबका तेलंगाना को साख ऊपर उठाने के लिए कारगर मुद्दे के तौर पर देख रहा है | 

 मौजूदा दौर मे काँग्रेस की  असल मुश्किल तेलंगाना ही नहीं बल्कि चुनावी साल मे तेलंगाना सरीखे कई इलाके हैं जहां अलग राज्य की चिंगारी उसके हाथ के  सामने न केवल  मुश्किलों को खड़ा  करेगी बल्कि तेलंगाना की तर्ज पर गोरखालैंड, बोडोलैंड, हरित प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड ,विदर्भ और न जाने क्या क्या मामले सामने आ सकते हैं | ऐसी सूरत मे छोटे छोटे राज्यो के रूप मे देश के बटने का खतरा  पैदा होता दिखाई देता है | लेकिन काँग्रेस की असल मुश्किल 2014 मे अपनी तीसरी बार केंद्र मे सरकार बनाना और आंध्र की सत्ता मे फिर वापसी करना है वह भी उन परिस्थितियो मे जब उपलब्धियों के  नाम पर बीते चार बरस मे उसके पास कहने को कुछ नहीं बचा है |ऐसे मे काँग्रेस की  वार रूम पॉलिटिक्स के कर्ता धर्ताओ का मानना है काँग्रेस को दक्षिण दुर्ग को बचाने की रणनीति पर काम करने की अभी  जरूरत है जिसमे आंध्र प्रदेश उसके सामने बड़ी चुनौती बना हुआ है | पिछली बार के  लोक सभा चुनावो मे काँग्रेस ने राजशेखर रेड्डी की अगुवाई मे आशातीत सफलता पायी थी लेकिन इस बार जगन मोहन रेड्डी की बगावत ने काँग्रेस को बैकफुट पर जाने को मजबूर कर दिया है | 

अब परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं और तेलंगाना काँग्रेस की  एक दुखती रग बन चुका है क्युकि बीते दौर मे इस मसले मे काँग्रेस के  साथ सभी दलो ने न केवल राजनीतिक रोटियाँ सेकी हैं बल्कि अवसरवाद का लाभ तेलंगाना राष्ट्रीय समिति  सरीखी पार्टियो ने लेने की पूरी कोशिश भी की है  और अब वही काँग्रेस काफी माथापच्चीसी के बाद इस मसले से किनारा करते हुई आन्ध्र मे अपना जनाधार बचाने मे लग गई है | वही पहली बार दस जनपथ की अगुवाई मे राहुल गांधी  दक्षिण दुर्ग को बचाने की रणनीति बन रही है ताकि आने वाले दिनो मे लोक सभा चुनावो मे अच्छी सीटें लाकर केंद्र मे अपनी मजबूत बिसात बिछाई जा सके |इसकी झलक बीते दिनों हुए मंत्रिमंडल विस्तार मे साफ दिखने के साथ ही चिरंजीवी की प्रजा राज्यम के काँग्रेस मे विलय से समझी जा सकती है | वहीं काँग्रेस के बागी जगनमोहन रेड्डी काँग्रेस की मुश्किलों को राज्य मे लगातार बढ़ाते  ही जा रहे हैं जिसके चलते चुनावी साल मे काँग्रेस की चिंताएँ बढ़नी लाज़मी है | बीते दिनों जब दस जनपथ तेलंगाना पर मंथन के लिए काँग्रेस के कोर ग्रुप के साथ मंथन कर रहा था तो एकबारगी लगा कि जल्द ही काँग्रेस तेलंगाना पर बड़ी घोषणा का पिटारा खोल सकती है लेकिन यह मुद्दा एक बार फिर ठंडे बस्ते मे चला  गया है |

काँग्रेस के रणनीतिकारों को लगता है कि अगर तेलंगाना बन भी गया तो इससे काँग्रेस घाटे मे ही रहेगी क्यूकि इसके बनने का सीधा लाभ तेलंगाना राष्ट्र समिति सरीखी पार्टियो को मिल सकता है जिन्होने समय समय पर अपने आंदोलन के जरिये पूरे प्रदेश मे ना केवल प्रदर्शन किए बल्कि तेलंगाना की बड़ी आबादी को अपने पक्ष मे लामबंद कर अपने अनुरूप बिसात बिछाने मे भी पिछले कुछ समय मे सफलता हासिल की | वहीं तेलंगाना को छोड़कर पूरे आन्ध्र मे इस समय जगन मोहन रेड्डी की तूती जिस तरह बोल रही है उसने पहली बार काँग्रेस की सियासतदानों की हवा एक तरह से निकाली हुई है जहां आने वाले दिनों मे वाई एस आर काँग्रेस , काँग्रेस को तगड़ी चुनौती देती नजर अगर आती है तो किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्युकि बीते चुनावो उप चुनावों मे उसने काँग्रेस की हवा सही मायनों मे निकालकर 2014 के चुनावो से पहले अपने बुलंद इरादे जता दिये हैं | ऐसे मे काँग्रेस उस दक्षिण के दुर्ग मे पहली बार हाँफ रही है जहां कभी राजशेखर रेड्डी के करिश्मे से उसने ना केवल सत्ता पायी बल्कि आन्ध्र  की राजनीति मे अपनी ठसक से चंद्रबाबू नायडू की टी डी पी सरीखी पार्टियो के जनाधार को सीधा नुकसान पहुंचाया |

अगर तेलंगाना की घोषणा का काँग्रेस कोई सिग्नल दे भी देती है तो फिर इसका लाभ आंध्र की दूसरी पार्टियो को कुछ हद तक मिलना तय है क्युकि आन्ध्र मे रीज़नल दल ऐसे मुद्दो के जरिये अपनी राजनीतिक रोटिया न केवल इस दौर मे सेक रहे हैं बल्कि अवसरवादिता के जरिये किसी भी गठबंधन का साथ देने को तैयार खड़े नजर आ रहे हैं क्युकि मुद्दा पहली बार सत्ता की मलाई खाने का हो चला  है जहां  बकरी और शेर एक घाट  के नीचे आने , पानी पीने को को तैयार खड़े बैठे हैं |

दरअसल आन्ध्र प्रदेश  मे तेलंगाना का मसला कोई नया नहीं है | यह मांग राज्य पुनर्गठन आयोग के दौर 1956 से चली आ रही है | 1969 मे एम चेन्ना रेड्डी के नेतृत्व मे मुल्कीरूल आन्दोलन मे अलग तेलंगाना को नई चिंगारी दी गई  लेकिन गौर करने लायक बात यह है ब्रिटिश शासन के दौर मे तेलंगाना कभी अंग्रेज़ो के सीधे नियंत्रण मे नहीं रहा | कुतुबशाही और मुगलिया सल्तनत के दौर के बाद शाही रजवाड़े के निजाम ने अपना राज यहाँ कायम किया |निजाम ने अंग्रेज़ो की  सत्ता तो स्वीकार कर वहाँ तेलंगाना मे अपना सिक्का गाड़े रखा | ब्रिटिश शासन के दौर मे रॉयल सीमा व आन्ध्र  इलाके मद्रास प्रेसीडेंसी मे आते थे मगर आजादी के बाद पो श्रीराम मुलु  की अगुवाई मे संयुक्त आन्ध्र का  बड़ा आंदोलन चला |


मद्रास प्रेसीडेंसी और तेलंगाना के निजाम ने हैदराबाद  के इलाको को एक ही राज्य मे भाषाई एकता के सुर मे तेलगु आधार बनाने का रास्ता आन्ध्र प्रदेश के रूप मे साफ किया | उस दौर मे तेलंगाना हैदराबाद के निजाम की रियासत का एक हिस्सा रहा था और मुल्की नाम से जाना जाता था | शेष दो हिस्से मद्रास प्रेसीडेंसी के अंदर आते थे  | वर्तमान मे आन्ध्र को  तीन हिस्सो मे बांटा जा सकता है | पहला इलाका तटवर्ती आन्ध्र , दूसरा रॉयल सीमा और तीसरा तेलंगाना है | तेलंगाना के जिस इलाके के लिए पिछले कुछ समय से आंदोलन चल रहा है उसमे आन्ध्र  के दस जिले शामिल हैं | सदियो से राजशाही के सीधे नियंत्रण मे रहने के चलते यह इलाका काफी पिछड़ा है | राज्य की तकरीबन 40 फीसदी आबादी तेलंगाना से आती है लेकिन यहाँ पर विकास  की बयार हाइटेक हैदराबाद सरीखी नहीं बही है जिसके चलते लोग उपेक्षित हैं और अलग राज्य  का सपना कई बरस से न केवल देख रहे हैं बल्कि के सी आर को  भी इस दौर मे अपना नया  मसीहा मान चुके हैं जो सड़क से लेकर संसद तक ना केवल अलग राज्य का राग अलाप रहे हैं बल्कि आन्ध्र प्रदेश  मे काँग्रेस और भाजपा की मुश्किलों को भी बड़ा रहे हैं |

निजाम वाले दौर मे भी तेलंगाना के प्राकृतिक संसाधनो का खूब दोहन हुआ और आज भी कमोवेश वैसे ही हालत हैं | राज्य के पचास फीसदी जंगल तेलंगाना मे पाये जाते हैं साथ ही यहाँ प्रचुर मात्रा मे प्राकृतिक संसाधन भी |  तेलंगाना से इतर तटवर्ती आन्ध्र  मे न केवल कारपोरेट घरानो ने बीते दशको मे बड़ा निवेश किया बल्कि  हैदराबाद सरीखे इलाके को देश के हाई टेक शहरो मे शामिल कर लिया | हैदराबाद की चमचमाहट देखकर आप सहज अनुमान लगा सकते हैं बीते दौर मे तेलंगाना विकास की दौड़ मे किस कदर पिछड़ गया होगा | शायद यही वजह थी आंध्र मे के सी आर अनशन कर और आंदोलन के रास्ते काँग्रेस के होश फाख्ता करते रहे और काँग्रेस भी बार बार आश्वासनों का  ही झुनझुना थमाकर उन्हे मनाती रही | लेकिन के सी आर नहीं माने और दो साल के भीतर उन्होने काँग्रेस गठबंधन से अलग होने का फैसला कर लिया | 

आन्ध्र प्रदेश मे मौजूदा संकट अब ऐसा है कि तेलंगाना पर हर कोई आर पार की लड़ाई सीधे लड़ रहा है जिसमे काँग्रेस के कई विधायक भी शामिल हैं | यही नहीं कई विधायक भी अब सीधे इस्तीफ़ों के जरिये केन्द्र सरकार को सीधे ललकार रहे हैं तो वहीं भाजपा भी अब टी डी पी के सुर मे सुर मिलाती कदमताल तेलंगाना को लेकर पहली बार कर रही है क्युकि जल्द ही चुनावी डुगडुगी बजनी है और जनता के सामने जाकर इस मसले पर वोट पाये जा सकते हैं | जबकि अटल बिहारी वाले दौर मे यही दोनों पार्टी  तेलंगाना नहीं बना सकी जबकि उस दौर से  भाजपा अपने को छोटे राज्यो का बड़ा हितैषी साबित करती रही है  | इस दौर मे काँग्रेस ऐसी मुश्किल मे घिर गई है जहां से उसका रास्ता अब डगमग नजर आता है शायद इसकी बड़ी  वजह है काँग्रेस अब राज्य पुनर्गठन आयोग के नाम पर इस मसले को जैसे तैसे लोक सभा चुनावो तक लटकाए रखना चाहती है |

दरअसल नए राज्य के बारे मे काँग्रेस की नीति मे बड़ा खोट शुरुवात से देखा जा सकता है | भाषायी आधार पर राज्य की मांग को काँग्रेस ने उठाया जरूर लेकिन 1937 मे ठसक के साथ काँग्रेस जब सत्ता मे आई तो पार्टी ने भाषाई मांग को दोहरा दिया | 1953 मे पहली बार जब भारत सरकार ने फजल के नेतृत्व मे पहला राज्य पुनर्गठन आयोग बनाया तो नेहरू ने ही   उसकी रिपोर्ट को ठंडे बस्ते मे डाला | राममुलु के त्यागपत्र के बाद आन्ध्र प्रदेश का गठन हुआ तो उसमे  तेलंगाना के लोग शामिल होने को तैयार नहीं हुए परन्तु सरकार ने वहाँ के लोगो को भरोसा दिया तेलंगाना पर विशेष ध्यान उसके द्वारा दिया जाएगा पर ऐसा हुआ नहीं | पूरा ध्यान तो तटीय आन्ध्र  और रॉयल सीमा मे दिया गया जहां विकास की नयी बयार चल निकली |


तेलंगाना के  नेताओ ने  भी  अपने स्वार्थो  के कारण किसी भी दल के साथ जाने से परहेज नहीं किया  | मसलन के सी आर को ली लें तो वो कभी टी डी पी का दामन थामे थे | 2001 मे उन्होने चन्द्रबाबू नायडू  को अलविदा कहा क्युकि नायडू ने उनको मंत्री बनाने से साफ इंकार कर दिया था  जिसके बाद उन्होने तेलंगाना के सरोकारों की अलख जगाने के लिए टी आर एस बनाई | चुनावी साल मे केंद्र और राज्य मे सत्ता की मलाई खाई | 2004 मे काँग्रेस की कृपा से केंद्र मे मंत्री भी बने लेकिन 2006 मे ही तेलंगाना के मसले पर काँग्रेस से नाता तोड़ दिया |  2006 मे काँग्रेस से दूरी बनाकर अपनी खुद की बनाई लीक पर चल निकले लेकिन तेलंगाना के मसले पर उनकी सीटो  मे कुछ खास इजाफा नहीं देखा गया | बाद मे काँग्रेस ने श्रीकृष्णन आयोग की रिपोर्ट बनाकर मामले को ना केवल लटकाया बल्कि तेलंगाना के  मसले से ही पल्ला झाड़ने मे कोई हिचक नहीं दिखाई |

गृह मंत्रालय ने कभी भी इस मसले पर कोई सीधे बयान नहीं दिया | यहाँ पर सबसे बड़ी मुश्किल हैदराबाद को लेकर उभरी क्युकि तटीय आन्ध्र के कई नेताओ ने यहाँ  भारी निवेश किया बल्कि कारपोरेट घरानो ने भी अपने अनुकूल बिसात बिछाने मे सफलता हासिल की | ऐसे लोग इसे केंद्र शासित प्रदेश घोषित करने की मांग दोहराते रहे | आन्ध्र की राजनीति मे 294 विधान सभा सीटो मे से 119 सीटें तेलंगाना , 175 रायल सीमा और तटीय आन्ध्र की हैं | यही नहीं लोक सभा की 17 सीटें तेलंगाना से हैं और 25 सीटें शेष आन्ध्र से आती हैं | 

मुख्य रूप से पूरे आंध्र मे काँग्रेस को सबसे ज्यादा चुनौती अगर आने वाले समय मे कोई देने जा रहा है तो वह जगन मोहन रेड्डी ही हैं और बड़े पैमाने पर काँग्रेस के  विधायक, मुख्यमंत्री  किरण कुमार रेड्डी की कार्य शैली को लेकर इस समय नाराज चल रहे हैं | आने वाले दिनो मे इस बात की पूरी संभावना है चुनाव पास आने पर इनमे से कुछ लोग पाला बदल सकते हैं | वहीं दूसरी तरफ अगर तेलंगाना की घोषणा हो भी जाती है तो सीधा लाभ के सी आर  की पार्टी  को मिलना है साथ ही आन्ध्र  के  अखाड़े मे अब तेलगु देशम पार्टी की स्थिति भी इस चुनाव मे करो या मारो वाली हो गयी है क्युकि एन डी ए मे जाने के बाद चंद्रबाबू का मुस्लिम वोट उनके हाथ से छिटका है जिसकी भरपाई करना इतना आसान नहीं है |

हालांकि भाजपा आन्ध्र मे काँग्रेस को पटखनी देने  के  लिए जगन मोहन रेड्डी और चंद्रबाबू नायडू से समझौता  करने का मन बना रही है लेकिन कम से कम जैसे हालात  हैं उसको देखते हुए हमें नहीं लगता फिलहाल आन्ध्र प्रदेश  मे टीडी पी किसी बड़े दल के  साथ कोई समझौता  करने जा रही है | आंध्र की तकरीबन 32 फीसदी मुस्लिम  आबादी मे से 22 फीसदी वोट अकेले तेलंगाना से आते हैं जहां पर चन्द्रबाबू की कोशिश के सी आर की पार्टी के वोट बैंक मे सैंध लगाने की बन चुकी है | ऐसे मे फिलहाल काँग्रेस को सीधी लड़ाई जगन मोहन रेड्डी से लड़नी है |  काँग्रेस मान रही है के सी आर और चंद्रबाबू मुस्लिम वोट मे सैंध लगाएंगे जिससे वह अपने पुराने वोट के  आसरे सीटें  बढ़ा ले जाएगी | मुख्यमंत्री किरण कुमार रेड्डी भी अब दस जनपथ को समझाने मे लगे हैं |  तेलंगाना काँग्रेस की गले की फांस जरूर बन गया है लेकिन फिलहाल इसकी घोषणा से काँग्रेस को घाटा ही होना है और शायद यही वजह हैं काफी मान मनोव्वल के  बाद अब दस जनपथ ने भी पार्टी के नेताओ को बीते दिनों इस बात की नसीहत दे डाली है इस मसले पर वह मीडिया मे कुछ बयान नहीं दें |

काँग्रेस के आंकलन  और सर्वे रिपोर्टों का आधार क्या है यह तो मुख्यमंत्री रेड्डी और उनके नेता ही जाने लेकिन फिलहाल आन्ध्र मे काँग्रेस को नेस्तनाबूद करने की रणनीति विपक्षी दल  बना रहे हैं | उनकी कोशिश है आगामी चुनावो मे काँग्रेस को रोकने के  लिए  राज्य मे एक मोर्चा बनाया जाये जहां आकर सभी काँग्रेस  के सामने मुश्किल खड़ी करें लेकिन विपक्षी  दल भी अपने नफे नुकसान के अनुरूप  बिसात बिछा रहे हैं | पुराने अनुभव के  आधार पर फिलहाल टी डी पी भाजपा मे कोई खिचड़ी पकनी दूर की गोटी है वहीं वाई एस आर काँग्रेस के  किरण कुमार रेड्डी से समझौते के  आसार नहीं हैं |

मौजूदा आन्ध्र  की राजनीति का सच यह है यहाँ जगन अपने को काँग्रेस से बड़ा खिलाड़ी साबित करने के  मूड मे दिख रहे हैं तो वहीं भाजपा कर्नाटक मे कमल खिलाने के बाद आन्ध्र प्रदेश  मे अपनी संभावनाएँ टटोल रही है और खाता खोलने की जुगत मे है | राजनीति संभावनाओ का खेल है और अगर आन्ध्र  मे सभी दल अलग अलग चुनाव लड़ते हैं तो आने वाले समय  मे आंध्र की राजनीति मे एक बड़ा संघर्ष देखने को मिल सकता है | लेकिन फिलहाल तो काँग्रेस आन्ध्र  प्रदेश के विभाजन तो टालने का मूड बना चुकी है | वह इस तर्क को मजबूती के साथ लोगो के बीच पेश  भी करेगी कि छोटे राज्यो के पास विकास की चाबी नहीं है | मसलन भाजपा शासन मे बने उत्तराखंड , छत्तीसगढ़ और झारखंड की भी आज कोई बहुत अच्छी स्थिति  मे नहीं हैं  | सभी जगह भारी लूट खसोट मची है और वह सवाल पीछे चले गए हैं जिनके कारण  इन राज्यो  का गठन किया गया था तो समझा जा सकता है नौ दिन चले अड़ाई का कोस से किसी भी राज्य  के दिन नहीं बहुरने वाले | देखना होगा आने वाले समय  मे तेलंगाना मसले को किनारे कर काँग्रेस राज्य मे किस तरह अपनी बिसात मजबूत करती है जिससे साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे ?लेकिन फिलहाल तेलंगाना की डगर तो हमें  कम से कम मुश्किल  ही दिख रही है |  



रविवार, 14 जुलाई 2013

बालीवुड के प्राण सिल्वर स्क्रीन की जान




बालीवुड के प्राण अब  हमारे बीच नहीं रहे | बीते दिनों उनकी मौत का समाचार जैसे ही मुम्बई के लीलावती अस्पताल से आया तो पूरा देश शोक मे डूब गया | सिल्वर स्क्रीन पर प्राण ने अपनी ऐसी छाप छोडी जिसकी यादों से अपने को बाहर निकाल पाना किसी के लिए आसान नहीं होगा क्युकि सिनेमा के रंग मे अपने जीवंत अभिनय से प्राण ने नई जान फूँक दी थी  शायद तभी उस दौर मे यह जुमला कहा जाता था प्राण फिल्मों की जान |

मौजूदा दौर मे भारतीय फिल्मे जहां प्रेमी , प्रेमिका और प्यार के त्रिकोण पर बनी हों लेकिन आजादी के दौर को अगर आज याद करें तो उस समय ना केवल अच्छी कहानियाँ देखने को मिलती थी वरन डायलाग भी ऐसे आते थे जिसकी रील को जेहन से उतार पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा हो जाता था | यही नहीं उस दौर का  मधुर, प्रिय संगीत आज भी लोगो के दिलो के तार को झंकृत कर देता है | बीते दौर मे नायक और नायिका से ज्यादा नाम अगर फिल्म मे किसी का हुआ करता था तो वह खलनायक ही हुआ करता था और प्राण कई दशक तक सिल्वर स्क्रीन पर इसका झण्डा उठाते हुए लोगो के दिलो मे राज करते थे | पर्दे पर प्राण की एंट्री जहां दर्शको मे एक अलग तरह का क्रेज पैदा कर देती थी वहीं फिल्म मे काम करने वालों के प्राण के सामने पसीने छूटने लग जाते थे | प्राण ने हर किरदार को इस कदर जिया कि उनके अभिनय से उस फिल्म मे चार चाँद लग जाया करते थे | प्राण को कैसे याद करें आज  शब्द कम पड़ते  जा रहे हैं ? 

पुरानी दिल्ली के बल्लीमारन में 12 फरवरी 1920  को जन्मे  प्राण के अभिनय कॅरियर की शुरुआत 1942  में दलसुख पंचोली की फिल्म खानदान से हुई । उन्होंने 40  के दशक में ही  यमला जट    खजांची  कैसे कहूं और खामोश निगाहें जैसी फिल्मों में काम किया।  यही वह दौर भी था जब प्राण अपने को लीड रोल मे ढाल भी रहे थे और अपने अभिनय से शोहरत की बुलन्दियो पर पहुँचने के सपने भी देख रहे थे |
                                                                         
उन्होंने 1945- 46  में लाहौर में तकरीबन 20  फिल्मों में उन्होने  काम किया। लेकिन 1947  में विभाजन के कारण उनका कॅरियर ठहर सा  गया। इसके बाद उन्होंने 1948  में देव आनंद और कामिनी कौशल की जिद्दी के साथ बॉलिवुड में अपने कॅरियर की शुरुआत की।  जिद्दी उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुई | जिद्दी की जिद्द ने शेर खान के रूप मे सिनेमा को ऐसा कलाकार दिया जिसे आने वाली पीड़ियाँ शायद ही कभी भुला पाएँ | पचास से अस्सी के दशक तक प्राण एकलौते ऐसे कलाकार रहे जो सिल्वर स्क्रीन पर एकछत्र राज करते नजर आते थे | देवदास्, मधुमती, जिस देश मे गंगा बहती है , हाफ टिकट , कश्मीर की  कली, राम और श्याम इन जैसी फिल्म प्राण की सफलता मे चार चाँद लगा देती हैं और खास बात यह रही कि इन फिल्मों मे प्राण को नायक नायिका सरीखी रकम निर्देशको ने दी |  


दिलीप कुमार देव आनंद और राज कपूर की पचास  और साठ के दशक की फिल्मों में प्राण खलनायक के रूप में नजर आने लगे। दिलीप कुमार की आजाद प्राण ने अपने मधुमति देवदास दिल दिया दर्द लिया या देव आनंद की जिद्दी मुनीमजी और जब प्यार किया से होता है और राज कपूर की आह जिस देश में गंगा बहती है और दिल ही तो है में उनके अभिनय को काफी सराहा गया।

साठ के दशक में मनोज कुमार की फिल्मों का भी अभिन्न हिस्सा रहे प्राण के उपकार (1967) में मलंग चाचा  के किरदार को कौन भूल सकता है जिस पर कसमें वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या गीत फिल्माया गया था। वहीं उस दौर को याद करें को जेहन मे 1965 आता है जब  शही, पूरब  और पश्चिम  बेईमान सन्यासी और पत्थर के सनम जैसी मनोज कुमार की कई सुपरहिट फिल्मों में प्राण ने काम किया और ज़िंदगी मे कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा | सत्तर के दशक की जंजीर मे  प्राण की भूमिका को कौन भूल सकता है | उस दौर मे यारी है ईमान मेरा यार मेरी ज़िंदगी के गाने ने खूब धूम मचाई और अमिताभ के साथ प्राण को कामयाबी के शिखर पर पहुंचा दिया था | इसी दौर मे  प्राण के चर्चे देश से इतर विदेश तक मे  होने लगे जहां उनके नाम से लोग सिनेमा देखने कतार लगा दिया करते थे | प्राण के पहले वाले दौर मे हिन्दी सिनेमा की खलनायकी में केएन सिंह का जलवा था जो महफिल लूट लिया करते थे। प्राण  को समझने के लिए हमें  उस दौर के सिनेमा के सच को भी समझना  होगा जब सिल्वर स्क्रीन पर नायक से ज्यादा खलनायक पॉपुलर हो रहा था । तब खलनायक फिल्म का अनिवार्य हिस्सा होता था। उसके बिना कहानी पूरी ही नहीं हो सकती थी । हीरो की तरह उस पर नैतिकता का दबाव नहीं होता।  अमूमन पहले वे अपने लिए एक छवि गढ़ते हैं फिर वही छवि उनके लिए कारागार  साबित होती है जिसको ताउम्र वे तोड़ नहीं पाते। वहीं अपने प्राण इसके अपवाद थे। 

उन्होंने तकरीबन साढ़े चार सौ फिल्मों में काम किया लेकिन एक फिल्म की छवि को दूसरे में दोहराया नहीं। उनकी खासियत यह थी कि वे अपनी हर फिल्म में एक अलग संसार बसाते दिखते थे  । चाहे वह हलाक्हो या कश्मीर की कली राम और श्याम कश्मीर की कली पत्थर के सनम सावन की घटा  हो। मनोज कुमार की फिल्म उपकार उनके फिल्मी कॅरियर का टर्निंग प्वाइंट साबित हुई। लोगों के जेहन में आज भी उस फिल्म का बैसाखियों पर झूलता तल्ख बातें करता मलंग चाचा दिखता है  जिसने मन्ना डे के गाए गीत कस्मे वादे प्यार महफूज वफा सब बातें है बातों की क्या को अपने जीवंत अभिनय से यादगार  बना दिया। इसके बाद तो उन्होंने कई फिल्मों में चरित्र  को ऐसे जिया जिसमें बहुत सी फिल्मे  यादगार बन गयी ।  बेईमान जंजीर विक्टोरिया नम्बर २०३ विश्वनाथ ऐसी ही फिल्में हैं। अपने कॅरियर के अंतिम दौर में उन्होंने सिर्फ चरित्र भूमिकाएं ही अदा कीं। प्राण की अदायगी की विशेषता यह थी कि वे पात्रों को अपने भीतर आत्मा के स्तर तक उतार लेते थे। लोगों ने उन्हें खलनायक और चरित्र अभिनेता दोनों ही रूप में बेइंतहा दुलार दिया। उनकी सफल फिल्मों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। एक दौर ऐसा भी था जब प्राण को फिल्म के हीरो से अधिक पैसा मिलने लगा था। सत्तर के दशक में प्राण ने खलनायक की बजाय अधिक चरित्र भूमिकाएं कीं। तीन बार बेस्ट स्पोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर, 1997 मे लाइफ टाइम एचिवमेंट  पुरस्कार से उन्हें  नवाजा  गया वहीं  वर्ष २००० में स्टारडस्ट ने उन्हें विलन ऑफ द मिलेनियम चुना और वर्ष 2001 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण सम्मान मिला |

प्राण आत्ममुग्धता से बहुत दूर थे। इस बात से परेशान हो जाते थे कि मैंने यह सीन ठीक ढंग से नहीं किया ये संवाद ठीक से नहीं बोला। प्राण अपने गेटअप को लेकर काफी सजग थे। जंजीर वाले शेर खान की पठान छवि रेड विंग दाढ़ी आदि के गेटअप में कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं था पर सिनेमा के पर्दे पर वह अमर हो गया। जंजीर में पहले नायक की भूमिका देवानंद को ऑफर की गयी थी लेकिन प्राण ने अमिताभ के नाम की सिफारिश की थी। इस सिफारिश ने हिन्दी सिनेमा को एक  एक युग दे दिया। कुछ इसी तरह की मदद किसी जमाने में मंटो ने की थी और प्राण के रूप में हिन्दी सिनेमा को यादगार अभिनेता मिल गया। प्राण ने कई पीढ़ियों के साथ काम किया।  दिलीप कुमार देवानंद राजकपूर राजेश खन्ना अमिताभ बच्चन का मुक़ाबला करने वाले एक मात्र  खलनायक प्राण ही थे। अगर दिलीप कुमार को पहला सुपर स्टार माना जाता है तो प्राण को भी पहला सुपर विलेन माना जाना चाहिए। रक्तरंजित आंखें  और खास तरह का तिरस्कार भाव वाले चरित्र उनके खलनायक की पहचान थी। वे नायकों से ज्यादा फीस लेते थे। नायक से ज्यादा खलनायक प्राण को दर्शक पसंद करते थे।

 तुमने ठीक सुना बरखुरदार चोरों के भी उसूल होते हैं .....इस देश में राशन पर सिर्फ भाषण है
..... शेर खान बहुत कम लोगों से हाथ मिलाता है इंस्पेक्टर साहब..... तुम गोली नहीं चला सकते क्युकि मैं रिवाल्वर खाली रखता हूँ.... जेल मे जाओ पर रघुबीर की जेल मे नहीं.....  इस इलाके मे नए आए हो साहब .....  वरना शेर खान को कौन नहीं जानता ?

ये चंद संवाद अलग-अलग फिल्मों के हैं जिसे एक ही अभिनेता प्राण ने पर्दे पर अभिनीत किया  और हर बार के बोलने में उनका एक खास अंदाज रहा है जिसके लिए वे हिन्दी सिनेमा में अलग से जाने-पहचाने जाते हैं। प्राण को केन्द्रीय सूचना प्रसारण  मंत्री मनीष तिवारी ने हाल ही में दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित कर उस नायाब प्रतिभा को सम्मान दिया गया है जहां नायक और खलनायक का भेद मिट जाता है। हमारे यहां नायकों को ही सम्मान देने की परंपरा रही है चाहे वह फिल्मी पर्दे के ही क्यों न हो जिस दौर में प्राण  अभिनय कि बुलन्दियो को छू रहे थे  उस दौर मे आओ सुनाये प्यार की एक कहानी और एक था राजा एक थी रानी का जलवा दिखता था |  दोनों के बीच में अवरोधक बना खलनायक होता था। उस दौर  में फिल्म के हर पोस्टर पर लिखा होता था हीरो-हीराइन का नाम और साथ में  प्राण तो समझा जा सकता है प्राण पर्दे पर अपने किस अंदाज के लिए जाने जाते होंगे ? बालीवुड मे यह प्राण के नाम का ही खौफ था कि पर्दे पर उनके अभिनय तो देखकर हर किसी के हाथ पाँव फूल जाते थे | यही नहीं उस दौर मे कोई अपने बच्चे का नाम प्राण नहीं रखना चाहता था | सच मे प्राण के बिना शायद उस दौर का सिनेमा  भी नीरस  लगता | प्राण ने हर रोल को चुनौती के साथ निभाया और हर फिल्म मे अपना सौ प्रतिशत देने की कोशिश की | प्राण एक ऐसे इकलौते  कलाकार थे जो लोगो के दिलो मे भी बसते  थे साथ ही हीरोइन उनके नाम से खौफ भी  खाती थी | प्राण अपने सिगरेट के खास कश के लिए भी जाने जाते थे तो वहीं वह जेल  मे जाकर ये पुलिस स्टेशन है  तुम्हारे बाप का घर नहीं कहने वाले अमिताभ सरीखे नायक को भी वही धमका सकते थे | यही नहीं वह किसी छोटे या बड़े आदमी के पास से जाकर सिगार तो क्या शराब तक छीन सकते थे | प्राण सीना ठोककर अपनी बात कहते थे यही कारण रहा हर रोल को उन्होने अपनी उपस्थिति से बड़ा बना दिया | प्राण कॉमेडी भी करते थे तो सबको गुदगुदाते थे | प्रेमिका से प्यार करते थे तो उसके रूठने पर मनाते भी थे | डान बनकर पुलिस  के पसीने निकाल देते थे तो वहीं ग्रेट शौमेन राज कपूर के रोल को फीका कर देते थे | दिलीप कुमार के विलेन , मनोज कुमार के मलंग चाचा और अशोक कुमार के दोस्त के रूप मे उनको हमेशा याद रखा जाता रहेगा | 60 साल के सिनेमा मे कई पीड़ियाँ चली गई पर प्राण तो प्राण ही थे जिनका जादू शायद ही देश की पुरानी और नई पीड़ी भुला पाएगी | वो  मुसकुराता चेहरा , बुलंद आवाज आज खामोश जरूर है लेकिन बॉलीवुड के ये प्राण लंबे समय तक लोगो के दिलो मे बसेंगे  और सिल्वर स्क्रीन अब  उनकी यादों से ही  गुलजार रहेगी लेकिन संयोग देखिये शिवाजी पार्क के  वैकुंठ धाम मे जब प्राण का अंतिम संस्कार हो रहा था तो अमिताभ , राजबब्बर , अनुपम खेर, राजा मुराद , शाटगन वाली वही पुरानी पीड़ी अन्त्येष्टि मे नजर आ रही थी | नई पीड़ी ने टिवीटर , फेसबुक पर अपनी संवेदना जताई पर अंतिम संस्कार से नदारद दिखाई दी | यह सवाल मन को कहीं न कहीं कचोटता है कि बॉलीवुड के प्राण सिल्वर स्क्रीन की जान थे |  
                                              

शनिवार, 13 जुलाई 2013

10 जनपथ की कालकोठरी मे कैद काँग्रेस

संसदीय राजनीती के मायने भले ही इस दौर में बदल गए हों और उसमे सत्ता का केन्द्रीयकरण देखकर अब 
उसे विकेंद्रीकृत किये जाने की बातकी जा रही हो लेकिन देश की पुरानी पार्टी कांग्रेस में परिवारवाद के साथ ही सत्ता के केन्द्रीकरण का दौर नही थम रहा है .....दरअसल आज़ादी के बादसे ही कांग्रेस में सत्ता का मतलब एक परिवार के बीच सत्ता का केन्द्रीकरण रहा है....फिर चाहे वो दौर पंडित जवाहरलाल  का हो या इंदिरागाँधी या फिर राजीव गाँधी का ... राजीव गाँधी के दौर के खत्म होने के बाद एक दौर ऐसा भी आया जब कांग्रेस पार्टी कीसत्ता लडखडाती नजरआई..... उस समय पार्टी के अध्यक्ष पद की कमान सीता राम केसरी के हाथो में थी..... यही वह दौर था जिस समय कांग्रेस पार्टी सबसे बुरे दौर सेगुजरी..... यही वह दौर था जब भाजपा ने पहली बार गठबंधन सरकार का युग शुरू किया और अपने बूते गठबंधन की बिछाई बिसात मे  केन्द्र की सत्ता पायी थी.... 
उस शाइनिंग इंडिया  वाले दौर दौर में किसी ने शायद कल्पना  भी नही की थी कि एक दिन फिर यही कांग्रेस पार्टी भाजपा को सत्ता से बेदखल कर केन्द्र में सरकार बना पाने मेंसफल हो जाएगी.... यही नही वामपंथियों की बैसाखियों के आसरे 
अपनेपहले कार्यकाल में टिकी रहने वाली कांग्रेस अन्य पार्टियों से जोड़ तोड़ करसत्ता पर काबिज हो जाएगी और "मनमोहनशतरंज की बिसात पर सभी को पछाड़कर दुबारा "किंगबन जायेंगे ऐसी कल्पना भी शायद किसी ने नही की होगी ......

दरअसल इस समूचे दौर में कांग्रेस पार्टी की परिभाषा के मायने बदल चुके है ....उसमे अब परिवारवाद की थोड़ी महक है और कही ना कहींभरोसेमंद "ट्रबल शूटरोका भी समन्वय.....इसी के आसरे उसने यू पी   से यू पी   की छलांग लगाई है ....और पहली बार वह हाफती हुई लड़खड़ाकर सत्ता की दहलीज पर पहुँचती दिख  रही है क्युकि इस दौर मे भाजपा नमो नमो के जाप से अपने को नहीं बचा पा रही है और नए सहयोगी एन डी ए को मिलने  दूर की गोटी हो चले हैं | साथ ही नमो को सीधे पी एम के रूप मे प्रोजेक्ट करने पर भी भाजपा मे अंदरखाने भारी अंतर
विरोध देखा जा सकता है | ऐसी सूरत मे तमाम दागो के बावजूद काँग्रेस फिर से अपने लिए केंद्र मे नई संभावनाएँ  देख रही है | उसे पूरा भरोसा  है चुनाव के बाद कई नए  पुराने सहयोगी हाथ के साथ आ ही जाएंगे |   इस काम मे वह अपने भरोसेमंद लोगो को साथ ले रही है जिसमे दस जनपथ अपने अनुरूप नई बिसात बिछाता नजर आ रहा है जहां इस बार सोशल मीडिया से लेकर चुनाव प्रचार और वार रूम पॉलिटिक्स से लेकर राज्यो के नए प्रभारियो के जरिये चुनावी संग्राम मे कूदने का मन बनाया जा चुका है और पहली बार खाद्य सुरक्षा सरीखी नीतियो को जल्द से जल्द अमली जामा पहनाने की कोशिशे दस जनपथ की तरफ से हो रही है ताकि जल्द चुनावी जुआ खेले जाने की सूरत मे काँग्रेस को परोक्ष रूप से लाभ मिल सके | 

सोनिया गाँधी ने जब से हिचकोलेखाती कांग्रेस की नैय्या पार लगाने की कमान खुद  संभाली है तब से सही मायनों में कांग्रेस की सत्ता का संचालन १० जनपथ से हो रहा है ..... यहाँपर सोनिया के भरोसेमंद कांग्रेस की कमान को ना केवल संभाले हुए है बल्कि पी ऍम  तक को इनके आगे नतमस्तक होना पड़ता है .....

इस दौर में कांग्रेस की सियासत १० जनपथ से तय हो रही है जहा पर कांग्रेस के 
सिपहसलार समूची व्यवस्था को इस तरह संभाल रहे है कि उनकेहर निर्णय पर सोनिया की सहमती जरुरी बन जाती है.... दस जनपथ की कमान पूरी तरह से इस समय अहमद 
पटेल के जिम्मे हैजिनकेनिर्देशों पर इस समय पूरी पार्टी चल रही है....."अहमद भाईके नाम से मशहूर इस शख्स के हर निर्णय के पीछे सोनिया गाँधी की सहमती रहती है.... सोनिया के "फ्री हैण्ड " मिलने के चलते कम से कम कांग्रेस में तो आज कोई भी 
अहमद पटेल को नजरअंदाज नही कर सकता है...
     कांग्रेस में अहमद पटेल की हैसियत देखिये बिना उनकी हरी झंडी के बिना कांग्रेस में पत्ता तक नही हिला करता ....कांग्रेस में "अहमद भाई"की ताकत का अंदाजा इसी बात से 
लगाया जा सकता है कि पार्टी के किसी भी छोटे या बड़े नेता या कार्यकर्ता को सोनिया से मिलने के लिए सीधेअहमद पटेल से अनुमति लेनी पड़ती है.....अहमद की इसी रसूख के आगे पार्टी के कई कार्यकर्ता अपने को उपेक्षित महसूस करते है लेकिनसोनिया मैडम के 
आगे कोई भी अपनी जुबान खोलने को तैयार नही होता है .... कांग्रेस के एक कैबिनेट मंत्री ने मुझे बीते दिनों बताया कि कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्य मंत्री अहमद पटेल से 
अनुमति लेकर ही सोनिया से मिलते है ....

अहमद भाई को समझने के लिए हमें ७० के दशक की ओर रुख करना होगा.....यही वह 
दौर था जब अहमद गुजरात की गलियों में अपनी पहचानबना रहे थे.....उस दौर में अहमद पटेल "बाबू भाईके नाम से जाने जाते थे और १९७७ से १९८२ तक उन्होंने गुजरात यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष पदकी कमान संभाली .....७७ के ही दौर में वो भरूच कोपरेटिव बैंक के निदेशक भी रहे.....

इसी समय उनकी निकटता राजीव के पिता फिरोज गाँधी से भी बढ़ गई क्युकि राजीव के पिता फिरोज का सम्बन्ध अहमद पटेल के गृह नगर सेपुराना था.....