Tuesday, May 26, 2009

राजनीती में खंडूरी को अभय दान , तो हरीश को जीवन दान ........



उत्तराखंड के मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी को एक बार फिर से अभय दान मिल गया है ....मुख्यमंत्री के लिए पंद्रहवीलोक सभा के नतीजे निराश करने वाले रहे है ...इस बार उत्तराखंड से भाजपा का पूरी तरह से सूपड़ा साफ़ हो गयाजिस कारण खंडूरी की चिंता बदने लगी थी ....वैसे ५ सीटो में भाजपा की पराजय के बाद खंडूरी के फीके चेहरे कीचमक साफ़ कहानी को बया कर रही थी लेकिन मीडिया में छनकरआ रही खबरे भी खंडूरी की विदाई की कहानीगड़ने लग गई थी... परन्तु अब ऐसा नही होने जा रहा है ...खंडूरी को अभयदान मिल गया है ....



उत्तराखंड के मुख्य मंत्री खंडूरी के लिए हाई कमान की यह लास्ट वार्निंग है ...अगर इसके बाद भी उन्होंने अपनी काम करने की" फौजी स्टाइल" को नही बदला तो अगली बार उनकी कुर्सी चली जायेगी ....लेकिन अभी यह नही कहा जा सकता की खंडूरी की कुर्सी पूरी तरह से सलामत है ..पूर्व मुख्य मंत्री कोश्यारी के राज्य सभा में जाने से खाली हुई "कपकोट" विधान सभा " सीट पर मतदान होना अभी बाकी है ...



इसके चुनाव परिणाम के नतीजे खंडूरी का भविष्य तय करेंगे... गौरतलब है इस समय उत्तराखंड में भाजपा के विधायको की संख्या ७० सदस्यीय विधान सभा में ३४ रह गई है ... अगर कपकोट की सीट कांग्रेस की झोली में चली जाती है तो खंडूरी की सरकार अल्पमत में आ जायेगी... हालाँकि अभी उत्तराखंड क्रांति दल के ३ विधायको का समर्थन उसके पास है लेकिन अगर वह हलिया लोक सभा चुनावो के परिणामो और कपकोट के परिणामो के बाद खंडूरी सरकार से अपना समर्थन वापस ले लेती है तो ऐसे में खंडूरी की कुर्सी जा सकती है .... वैसे भी कांग्रेस राज्य में ५ सीट जीतने के बाद आत्मविश्वास से भरी पड़ी है ...



हरिद्वार से इस बार लोक सभा चुनाव जीते हरीश रावत एक बार फिर से सक्रीय हो गए है और वह खंडूरी सरकार को गिराने की कोशिसो में जुट गए है ... बताया जाता है कपकोट के परिणामो के बाद वह अपना असली खेल शुरू करेंगे ....

मैंने हरीश रावत की राजनीती को बेहद करीब से देखा है ...उनकी राजनीती का छोटा खिलाड़ी मानना एक बड़ी भूल होगी ... भले ही उनके विरोधी लगातार एक के बाद एक हार के बाद यह दुष्प्रचार करते रहे हो , उनकी राजनीतिक पारी अब समाप्ति के कगार पर है लेकिन इस बार हरिद्वार को फतह कर उन्होंने साबित कर दिया है कि वह राजनीती के मझे खिलाड़ी है ...गौरतलब है हरीश रावत अभी तक राज्य की राजनीती से हासिये पर थे...


वह वर्त्तमान में भाजपा के प्रदेश प्रेजिडेंट बची सिंह रावत से ४ बार लगातार लोक सभा चुनावो में हार चुके है ...इसको देखते हुए लोगो का मानना था की हरीश की राजनीतिक पारी अब समाप्त हो चुकी है ... लेकिन लोगो का आंकलन ग़लत साबित हुआ ...हरीश का वनवास इस बार पूरा हो गया॥ अभी तक वह लोक सभा का चुनाव अल्मोडा पिथोरागढ़ संसदीय सीट से लड़ते थे लेकिन इस बार यह सीट रिज़र्व हो जाने के बाद उनकी हरिद्वार जाना पड़ा और उनकी हराने वाले बची सिंह रावत को नैनीताल से चुनाव लड़ना पड़ा जहाँ पर उनकी करारी हार हुई है ॥



वैसे भी नैनीताल तिवारी के समय से कांग्रेस का पुराना गद रहा है .. हरीश हरिद्वार जीत के बाद निश्चित ही मजबूत होंगे... क्युकि लगातार हार और कांग्रेस प्रदेश प्रेजिडेंट का कार्यकाल पूरा करने के बाद से वह अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे थे... अब इस जीत के बाद उनमे नया जोश आ गया है ॥ यह प्रदेश की जनता का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा बार बार उत्तराखंड की जनता ने हरीश रावत को नकार दिया॥



हरीश रावत से अपना मिलना जुलना लगा रहता है ॥ हालाँकि अभी कुछ वर्षो से उनकी मेरी कोई मुलाकात नही हुई है ...एक वाकया रावत जी से मेरी मुलाकात का रहा है जिसको आप सभी के साथ शेयर करना चाहता हूँ॥ एक बार मैंने उनसे इंटरव्यू में पुछा था रावत जी क्या आप मानते है की सत्ता राजयोग से मिलती है ? तो उनका सीधा सा जवाब था... हाँ ... पर क्या करे शायद हरीश की कुंडली में राजयोगतो है ही नही ...तभी वह उत्तराखंड के मुख्यमंत्री नही बन पाये... नारायण दत्त तिवारी के साथ उनके कटु संबंधो के चलते उनकी राजनीती को नुक्सान उठाना पड़ा ....



खैर में भी कहाँ से कहाँ पहुच जाता हूँ बात खंडूरी पर चल रही थी और बीच में हरीश रावत आ गए... हरीश पर फिर कभी बात विस्तार में की जायेगी ... लेकिन इतना तो तय है कांग्रेस की इस जीत के बाद हरीश रावत की दस जनपद में पकड़ मजबूत हो गई है...



वैसे भी हरीश रावत की अहमद पटेल के दरबार में मजबूत पकड़ पहले से ही रही है लेकिन उनकी राह में सबसे बड़ा रोड़ा बार बार नारायण दत्त तिवारी बनते थे जो अभी आंध्र के राज्यपाल है ..तिवारी की राय का सोनिया हमेशा से पालन करती रहती थी ॥ अब इस बार हरीश का कद राज्य के साथ केन्द्र में भी बड़ा है कांग्रेस के समय जनता की उम्मीद पर खरा उतरने की एक बड़ी चुनोती इस समय है....



सोनिया गाँधी को भी इस बारे में सोचना चाहिए ...राज्य की जनता ने मौजूदा जनादेश हाथ को दिया है लिहाजा उसकी भी यह नैतिक जिम्मेदारी बनती है की राज्य के विकास के लिए केन्द्र से भरपूर मदद दी जाए....कांग्रेस के पास लोगो का दिल जीतने की बड़ी चुनोती इस समय है ...अगर वह लोगो का दिल जीतने में कामयाब हो जाती है तो अगले चुनाव में उसको फायदा हो सकता है....



अब देखने वाली बात यह होगी अभी ५ सीट जीतने वाली कांग्रेस में उत्तराखंड से कोई नेता मनमोहन सिंह के मंत्री मंडल में शामिल होता है या नही ? वैसे पड़ोसी छोटे राज्य हिमांचल की बात करे तो यहाँ से वीरभद्र सिंह के मंत्रिमंडल में शामिल होने की सम्भावना है ...अगर जनता के फेसले का सम्मान कांग्रेस करती है तो निश्चित ही इस बार उत्तराखंड से किसी नेता को मंत्रिमंडल प्रतिनिधित्व का अवसर मिलना चाहिए ...



वैसे इस लिस्ट में उत्तराखंड से हरीश रावत आगे चल रहे है ... आप माने या नही माने रावत की पकड़ अहमद पटेल के दरबार में मजबूत है ...अब देखना है इस जीत के बाद हरीश का सिक्का सोनिया के दरबार में चलता है या नही ?अगर यह चल गया तो हरीश आने वाले समय में कांग्रेस के बड़े खेवनहार उत्तराखंड में होंगे ... सोनिया ,राहुल के आसरे अगर हरीश रावत की राजनीती अगर आगे बदती है तो यह उनके धुर विरोधियो के लिए खतरे की घंटी है ..संभवतया ऐसी सूरत में उत्तराखंड कांग्रेस के प्रेजिडेंट यशपाल आर्य के समर्थक हताश हो सकते है ॥



हरीश रावत के तिवारी जी के साथ सम्बन्ध कभी मधुर नही रहे.... यहाँ तक की राज्य के पहले चुनाव में कांग्रेस को भारी बहुमत से जीत दिलाने में हरीश रावत का बड़ा अहम योगदान रहा लेकिन सोनिया ने तिवारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा दिया तब से दोनों के बीच दूरिया जयादा हो गई .... हरीश रावत मुख्य मंत्री की लड़ाई में पंडित नारायण दत्त तिवारी से काफ़ी पीछे चले गए । ...



राज्य के दूसरे चुनाव में दोनों के बीच कटु संबंधो की बानगी देखिये २००७ में करारी हार के विषय में हरीश से पुछा तो उन्होंने कहा "जब सेनापति ही युद्घ से भाग गए तो बाकी सेना क्या करती ?" सेनापति से आशय तिवारी से था जो कांग्रेस का जहाज बीच में छोड़कर चले गए .... इस बार तिवारी सक्रीय राजनीती से दूर हो गए है वह आन्ध्र के राजभवन में आराम फरमा रहे है...लेकिन अभी भी वह अपने चेलो के साथ हरीश रावत की राजनीती पर संकट बनते रहे है ....



लेकिन इस बार हरीश ने हरिद्वार पर फतह करके यह साबित कर दिया है हरीश रावत के अन्दर अभी भी उत्तराखंड का गाँधी बन्ने का जोश बरकरार है...अब तिवारी की उत्तराखंड से विदाई के बाद हरीश की कुंडली में राजयोग बनता दिख रहा है ..तिवारी की खासमखास इंदिरा अब हरीश के गुट में आ गई है ..इस चुनाव में दोनों के बीच आपस में गहरा सनेह देखा गया .. अगर यह दिखावा नही है तो यह कांग्रेस के लिए आने वाले समय के हिसाब से अच्छी ख़बर है ॥ यहाँ पर बताते चले उत्तराखंड में तिवारी के मुख्य मंत्री बनने के दौर से ही कांग्रेस गुटबाजी से त्रस्त है जिसका खामियाजा कांग्रेस को अपोजिसन में बैठकर भुगतना पड़ रहा है ...


अब कांग्रेस की यह बीमारी भाजपा में आ गई है ... इस चुनाव में भाजपा को गुटबाजी ले डूबी.. पार्टी की एकजुटतामें कमी देखने को मिली कांग्रेस गुटबाजी से शरू से त्रस्त्र रही है पर इस बार बीजेपी उसका लाभ ले पाने में कामयाबनही हो सकी... खंडूरी अकेले दम पर चुनाव प्रचार करते रहे॥ उनके मंत्रियो ने उनको धोखे में रखा ..बताया जाताहै इस बार खंडूरी को सबक सिखाने की पूरी तैयारी बीजेपी के विधायको ने कर रखी थी॥



खंडूरी उनकी नजरो मेंशुरू से खटकते रहे है॥ इसका कारण जनरल की साफगोई है॥ वह विकास में पारदर्शिता के सपोटर शुरू से रहेहै... तभी अटल जी की सरकार में उनको केन्द्रीय भूतल परिवहन जैसा भारी भरकम मंत्रालय दिया गया जहाँखंडूरी ने खासी वाह वाही बटोरी... इसकी के चलते अटल के आर्शीवाद के चलते उनको उत्तराखंडलाया गया॥ परन्तु यहाँ पर नेताओं के निजी हित इतने ज्यादे हो गए वह इन सब को पूरा नही कर पायेजिसके चलते नेता उनसे असंतुस्ट हो गए॥



खंडूरी राज्य के विकास में कोई कोताही नही बरतना चाहते है... वहसभी काम अपने अनुसार करने के आदी रहे है॥ तभी भाजपा के विधायको को उनकी यह स्टाइल नही भाती है ॥ जिस कारण वह बार बार खंडूरी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले रहते है ... अभी लोक सभा चुनावो से पहले राज्य में बीजेपी ने खंडूरी के नेतृत्व में लगातार ९ चुनाव जीते है... लेकिन इस बार भाजपा की चुनावो में करारी हार हो गयी है॥



ख़ुद खंडूरी को इस बात की आशा नही थी की जनता उनको नकार देगी॥ दरअसल यह हार पार्टी की सामूहिक हार है॥ भाजपा में अभी तक खंडूरी के विरोध का सिलसिला नही थमा है ... हालाँकि खंडूरी को हटाने की मुहीम वालेअभी तक चारो खाने चित नजर आए है ... लेकिन खंडूरी को हटाने वाले की चाल बार बार चलने वाले भगत सिंहकोशियारी एक बार फिर सक्रीय हो गए है ...



भगत सिंह कोशियारी को खंडूरी अपनी राजनीतिक चालो द्वारापरेशान कर चुके है लेकिन भगत फिर सक्रीय हो गए है ॥ कोशियारी की मुख्यमंत्री पद को पाने की लालसा अभीकम नही हुई है ॥ वह बार बार अपने पाले में कई विधायको को लेते रहे है ....पिछली बार तो स्थिति यहाँ तक आ गई थी भाजपा के कई विधायको के इस्तीफे की ख़बर दिल्ली में उड़ने लगी थी लेकिन बाद में राजनाथ के बयान केबाद मामला शांत हुआ ॥ उन्होंने साफ़ तौर पर कहा खंडूरी को हटाने का कोई सवाल नही है॥



तभी से कोश्यारी इस कदर बैचैन थे , वह खंडूरी की कही न कही कमी को पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व को दिखाना चाहते थे .. परन्तु केन्द्रीयनेतृत्व हमेसा खंडूरी का साथ देता रहा ... उल्टा खंडूरी के इशारो पर कोश्यारी को राज्य की विधायकी से इस्तीफादेकर हरीश रावत के राज्य सभा कोटे से खाली हुई सीट से राज्य सभा भेज दिया गया॥ अभी तक ग्रह भी खंडूरीका साथ दे रहे थे परन्तु इस बार पाँच सीट हारने के बाद से खंडूरी को हटाने की उनकी मुहीम को फिर बल मिलनाशुरू हो गया है.....


वैसे बताया जाता है कोश्यारी ने अपनी इच्छा से आलाकमान को अवगत करवा दिया है॥ सूत्रोकी माने तो कोश्यारी का कहना है की अगर खंडूरी को पहले ही हटा दिया जाता तो आज उत्तराखंड में पार्टी का इसकदर सूपड़ा साफ़ नही होता.. लेकिन यहाँ बताते चले हाई कमान खंडूरी को हटाने के मूड में नही दिखाईदेता॥ भले ही खंडूरी ने इस चुनाव में हार की जिम्मेदारी अपने सर ले ली है परन्तु सच्चाई यह है खंडूरी के मंत्रियोने इस चुनाव में खंडूरी को धोखे में रखा....जिसके चलते बड़े पैमाने पर खंडूरी के हेवीवैट मंत्रियो के चुनाव विधानसभाओ में पार्टी बुरी तरह से हार गई॥


अब खंडूरी की रिपोर्ट लेने कुछ समय पहले मुख्तार अब्बास नकवी और थावर गहलोत को देहरादून भेजा गयाथा॥ उन्होंने अपनी रिपोर्ट राजनाथ को दे दी है॥ इसमे बताया जाता है की सभी को एकजुट होकर कपकोट चुनावजीतने के मंत्र दिए गए ॥ भाजपा अब जोखिम नही लेना चाहती है॥


अगर कपकोट उपचुनाव वह हार जाती है तोवह अल्प मत में आ जायेगी..इसके बाद विकास नगर में चुनाव होना है॥ यहाँ से मुन्ना चौहानविधायक थे जो लोक सभा चुनाव मेंपार्टी से नाराज हो गए और बसपा के हाथी पर टिहरी से लड़े थे॥ अगरकपकोट के बाद विकास नगर भी भाजपा नही जीत पाती है तो भाजपा से उत्तराखंड क्रांति दल अपना समर्थनवापस ले सकता है... ऐसे में खंडूरी की चिंता बढ जायेगी॥पार्टी का पूरा फोकस अब कपकोट में है॥ खंडूरी अब कपकोट में है॥ बची सिंह रावत और कोश्यारी एकजुट होकर भाजपा को जीताने की कोशिसो में जुटेहै.. अब देखते है आगे आगे होता है क्या ?

Tuesday, May 19, 2009

सिंग इज किंग ........




..............सारा आंकलन ग़लत साबित हुआ... सभी को आस थी इस बार की लोक सभा भी त्रिशंकु होगी पर जबचुनाव परिणाम आए तो सभी राजनीती के पंडित भौचक्के रह गए ... सभी का सोचना था इस बार छोटे दल के हाथसत्ता की चाबी रहेगी वह सरकार बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.... पर ऐसा हुआ ही नही ..... कांग्रेस ने २० सालो के बाद अकेले अपने दम पर २०० से ज्यादा सीट जीतने में सफलता हासिल की ....इस जीतका पूरा क्रेडिट सोनिया मनमोहन के साथ राहुल गाँधी को जाता है .....


युवा तुर्क कार्ड चल गया इस बार ....उत्तरप्रदेश में अकेले लड़ने का राहुल का फेसला सही साबित हुआ और वर्षो से खोया जनाधार पाने में कांग्रेस इस बारसफल साबित हुई है ....राहुल ने इस चुनाव में बड़े पैमाने पर चुनावी सभाए करी ....साथ ही संगठन के लिए बड़ेकाम भी जिसका परिणाम आज सभी के सामने है...अभी राहुल को बहुत आगे जाना है ...अपने दिग्गी राजा कीमाने तो राहुल लम्बी सपर्धा के घोडे है ...........


दरअसल इस चुनाव में कांग्रेस को भी यह उम्मीद नही थी ,उसका प्रदर्शन इस कदर बढ़िया रहेगा वह २०० के आकडेको पार कर लेगी...इसका आभास इस बात से लगाया जा सकता था , चुनाव परिणाम आने से पहले सोनिया गाँधीसंप्रग के सभी पुराने घटकों के साथ बात करने लग गई थी....यह कही न कही इस बात को दिखाता है की कांग्रेस भी संप्रग के २६१ के आंकड़े को लेकर आश्वस्त नही थी ...


पर जनता जनार्दन ने इस बार अपना फेसला कांग्रेस के फेवर में सुना दिया ....कांग्रेस के युवराज का जलवा इस १५वी लोक सभा में चल गया .... दलित , आदिवासियों के घर जाकर युवराज ने उनका हाल चाल जानना शुरू करदिया था.... यही से लगने लगा था की वह अब राजनीती को बारीकी से समझने की कोशिसो को करने में लगे हुएहै॥ अब यह अलग बात है की माया मेमसाहब सरीखी नेत्रियों को उनके दलितों के घर जाने पर आपत्ति हुआ करतीथी ..जो भी हो राहुल बाबा की भारत यात्रा इस चुनाव में रंग लायी है..देश की बड़ी तादात इस बार युवाओ की थीउनके सामने मनमोहन का विकल्प था तो वही दूसरी .....तरफ़ पी ऍम इन वेटिंग आडवानी का॥ जनता नेआडवानी को नकार दिया ... मनमोहन की साफ़ छवि इस चुनाव में कांग्रेस के काम आई और भाजपा सरीखीपार्टियों का प्रदर्शन अपने राज्यों में ख़राब हो गया....


जनादेश ने साफ जता दिया है अब देश में जाती धर्म, सौदेबाजी वाली राजनीती नही चलेगी .....जनता इन सब सेआजिज आ चुकी है....वह जानती है विधान सभा में किसको वोट देना है और नगर निगम, पंचायत में किसको...?वीपी सिंह ने एक दौर में कहा था की देश में कुछ वर्षो तक गटबंधन राजनीती


का दौर रहेगा लेकिन इस बार का चुनाव इस बात का इशारा कर रहा है भारतीय राजनीती अब इसके चंगुल से मुक्तहोने जा रही है..आने वाले समय में देश की राजनीती दो धुर्वीय रहने की पूरी सम्भावना नजर आ रही है॥


जहाँ तक कांग्रेस की सफलता का सवाल है तो उसकी कई योजनाओ ने इस बार असर दिखाया है... रोजगारगारंटी, सूचना का अधिकार,किसानो की ऋण माफ़ी , परमाणु करारनिश्चित ही मनमोहन सिंह के लिए फायदे का सौदासाबित हुआ है.....आर्थिक मंदी के दौर में कांग्रेस पार्टी की मजबूत नीतियी के चलते भारत पर उतना प्रभाव नहीपड़ा जितना अन्य देशो में पड़ा है....मनमोहन को आगे कर सोनिया ने सही फेसला लिया...आज भी उनकीमध्यम वर्ग में "मिस्टर क्लीन " की छवि बनी है जिसका लाभ लेने में कांग्रेस सफल रही...अब मनमोहन के नेत्रित्व में देश में आर्थिक सुधार तेजी से आगे बढेंगे ऐसी उम्मीद है.....इस बार वाम सरीखे दल भी उनकी राह का रोड़ा नही बनेंगे जो बार बार सरकार की टांग खीचते आ रहे थे....


वही भाजपा की लुटिया इस चुनाव में डूब गई..पिछली बार "भारत उदय " ले डूबा था इस बार "हाई टेक "प्रचारआडवानी का जहाज डुबो गया...पार्टी में आडवानी के नाम को लेकर एका नही था..राजनाथ आडवानी ३६ काआंकडा जगजाहिर ही था...राजनाथ के साथ जेटली का तकरार भी पार्टी को इस चुनाव में भारी पड़ी है..भाजपा केपास कोई मुद्दा ही नही था.....आडवानी बार बार मनमोहन को कोसते रहते थे "लोक सभा चुनाव लड़ने से वह क्योंडर रहे है॥ सत्ता का असली केन्द्र १० जनपद है॥ मनमोहन कमजोर है..."यह सब लोगो को नही भाया ...ख़ुदआडवानी का सपना अधूरा रह गया.....पी ऍम बन्ने का सपना टूट गया ....साथ ही वामपंथियों का हाल भी बेहालहो गया....केरल और पश्चिम बंगाल से वामपथियों का सफाया हो गया....


बहरहाल कहने को तो बहुत कुछ है पर लब्बोलुआब यह है की जनता ने इस बार स्थिर सरकार के लिए कांग्रेस कोवोट दिया है .... जनता की आशाओ पर खरा उतरने की एक बड़ी चुनोती उसके सामने है ॥ अच्छी बात यह है कीइस बार सहयोगियों से कांग्रेस को कम दबाव झेलना पड़ेगा.....क्युकि संप्रग २६१ तक पहुच चुका है ॥ जनादेशकांग्रेस के फेवर में रहा है इस लिहाज से सभी अहम् मंत्रालय वह अपने पास रखना पसंद करेगी.....


लालू ,पासवानसरीखे लोग इस बार अपनी हेकडी नही मार सकेंगे कि फलाना विभाग हमको दो ........नही तो हम तुमको समर्थननही देंगे? पासवान को भी बिहार की जनता ने दिखा दिया है काम नही करोगे तो ऐसा ही हस्र होगा....अबविपक्षियों को चाहिए वह जनादेश का सम्मान करे और ५ साल तक सरकार की कमियों को जोरदार ढंग से उजागरकरे ॥ ५ साल सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभाए.......


बीते ५ सालो में भाजपा को यह बात समझ नही आई... वहइस बात को समझ ही नही पायी क्यों अटल जी का " भारत उदय" बीजेपी की नैया पिछली बार पार नही लग सकी .. कम से कम इस बार इस गलती को सुधारे जाने की कोशिस उसके द्वारा होनी चाहिए थी जो नही हुई..... लुधियाना में आडवानी के रास्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के "मेगा शो" को देखनेसे तो ऐसालग रहा था जैसेआडवानी इस बार पी ऍम बनकर ही रहेंगे....राजनाथ का आत्मविश्वास भी चुनाव परिणामो से पहले इस बात को बता रहा था पार्टी ने पिछली हार से सबक लिया है ... पर परिणाम आने पर सभी के अनुमानों की हवा निकल गई ...


पार्टी में वाजपेयी _आडवानी युग अब खत्म हो चुका है ....आडवानी के साथ "मोदी फैक्टर "की भी इस चुनाव मेंहवा निकल चुकी है ....भले ही अपने गुजरात में वह हिंदू ह्रदय सम्राट जननेता हो लेकिन पूरे देश में उनकी कैसीछवि है यह इस चुनाव में सभी के सामने आ गई है...वह पार्टी के बड़े स्टार प्रचारक इस चुनाव में थे ॥


सबसे ज्यादाचुनाव प्रचार उनके द्वारा किया गया पर सीटो पर फायदा होने के बजाये पार्टी को घाटा हुआ है ..... २०१४ के लिए पार्टी को अभी से तैयारीशुरू कर देनी चाहिए....साथ ही कोई नया नेतृत्व सामने लाना होगा....८० के बुदापे में ओबामा जैसा पी ऍम वेटिंगलाने से काम नही चलेगा ....राहुल के मुकाबले के लिए २०१४ में राहुल की टक्कर का कोई नेता खोजनाहोगा....तभी बात बनेगी.... मात्र "मजबूत नेता निर्णायक सरकार " और इन्टरनेट के प्रचार के सहारे सरकार बनने की कल्पना करना "मुंगेरी लाल के हसीं सपने" देखने जैसा है....


बड़ी पार्टी की कतार में आना है तो आपकोग्रासरूट लेवल तक जाना होगा..... गाव गाव में अपना संगठन तैयार करना होगा..... आडवानी जी केवल विन्ध्य में भगवा लहराने से काम नही चलेगा.....पूरे देश में पार्टी को पाँव पसारने होंगे....कांग्रेस अब राहुल के नेतृत्व मेंयही करेगी....गाव गाव तक उसकी पकड़ मजबूत है... पार्टी का पूरब, पश्चिम, उत्तर दक्षिण में आधार है ही .... कांग्रेस के युवराज अब उसमे खाद डालने का काम करेंगे ताकि २०१४ तक उसमे अच्छी फसल लहरा जाए औरराहुल गाँधी २०१४ में प्रधानमंत्री रुपी ताज अकेले अपनी कांग्रेस पार्टी के बूते हासिल करे ....

Monday, May 11, 2009

उत्तर पर भारी पड़े है दक्षिण के सितारे ...........(लोक सभा का महासमर )









































...रामपुर की सीमा में अपना घुसना होता रहता है..... आप अगर मुरादाबाद के रास्ते उत्तराखंड जाना चाहे ,तो रामपुर आपके रास्ते में पड़ेगा.... आजकल रामपुर खासा सुर्खियों में है... क्युकि यहाँ से समाजवादी पार्टी की प्रत्याशी "जया प्रदा" मैदान में है ...मुलायम के लंगोटिया यार आजम खान यहाँ जयाके खिलाफ मोर्चा खोले हुए है....अमर सिंह भी उनके निशाने पर इस बार बने है...



खैर ,आप भी कह रहे होंगे रामपुर पर अपनी बात करते करते में कहाँ आजम खान ,मुलायम तक चले गया .....रामपुर का जिक्र आते ही" जया प्रदा " का नाम याद आ गया ॥ जया का नाम इस बार के फिल्मी जगत के प्रत्याशियों के साथ है जो चुनाव मैदान में राष्ट्रीय पार्टियों के टिकेट पर चुनाव लड़ रही है ...उनकी बात करने पर हमारे देश के उन फिल्मी हस्तियों के बारे में उमड़ घुमड़ कर तस्वीर बन जाती है जो फिल्मो से राजनीती की रपटीली राहो में चले आए .....


जया से फिल्मी सितारों के राजनीती में आने को लेकर अभी कुछ दिनों पहले कुछ सवाल मीडिया वाले पूछ रहे थे....जया का कहना था जब सभी लोग राजनीति में आ रहे है तो फिल्मी कलाकारों के उसमे आने में क्या बुरा है?वह करूणानिधि ,जयललिता,चिरंजीवी जैसे कई नामो को गिना देती है जिन्होंने फिल्मी राजनीती में ऊँचा मुकाम हासिल किया ॥ कभी यह सभी फिल्मी परदे पर अपने लटके झटको से सभी को कायल कर देते थे....यहीं नही जया प्रदा तो "रोनाल्ड रीगन " जैसे नाम को भी गिना देती है ... उनकी माने तो रीगन जैसे कई लोगो ने हॉलीवुड से राजनीती के अखाडे में कदम रखकर राष्ट्रपति की कुर्सी हासिल करने में सफलता पायी थी...


जया का कहना अलग है... उनके इस बयान से मेरा दिमाग ठनक गया ... बड़ा सवाल यह उठता है ...राजनीती में हमारे उत्तर के कलाकार क्यों दक्षिण के कलाकारों के सामने फिसड्डी साबित हो जाते है? दक्षिण की बात करे तो यहाँ करूणानिधि, अन टी रामाराव ,जयललिता, सी अन अनादुरै , ऍम जी रामचंद्रन जैसे कई नाम गिनाये जा सकते है जिन्होंने दक्षिण की राजनीती को अपने प्रभाव से प्रभावित किया है ..लेकिन इस प्रसंग में अगर हम बात उत्तर के सितारों की करे तो यहाँ कुछ ख़ास प्रभाव नही देखा गया है... आज भी आलम यह है हमारे उत्तर के कई सितारे गुमनामी के अंधेरो में खोकर रह गए है ...'


आईये बात उत्तर से करे.... यहाँ पर पहले के ज़माने से फिल्मी कलाकारों का राजनीती से जुडाव रहा है..इस प्रसंग में पृथ्वी राज कपूर,सुनील दत्त, नर्गिस जैसे कई नाम गिनाये जा सकते है जिन्होंने फिल्मी पर्दे से सीधे राजनीती के मैदान में एंट्री मारकर सभी का ध्यान खीचा था ॥इसके बाद से तो सभी दल में फिल्मी कलाकारों को टिकेट देने की होड़ लग गई.....कांग्रेस से यह सिलसिला राजीव गाँधी के समय से शुरू हुआ जब इलाहाबाद से अभिताभ बच्चन को हेम्वंती नंदन बहुगुणा के खिलाफ लड़ने केलिए टिकेट दिया गया ॥ तब अमिताभ ने बहुगुणा जैसे दिग्गज नेता को धूल चटाई .. यही नही उस दौर में वैजंतीमाला को भी राजीव ने टिकेट दिया परन्तु उस के बाद वह कहाँ गुम हो गए इसका पता नही?

टीवी पर लटके झटके लगाकर नाचना गाना एक अलग बात है .... यह सब राजनीती में नही चलता पर हमारे उत्तर के सितारे इस बात को नही समझ पाते है ...वह अपने फ़िल्म से जुड़े होने के चक्कर में वोटर को लुभाने की कोशिश करने में जुटे रहते है....परन्तु उनको राजनीती की ए बी सी ही पता नही होती...दरअसल हमारे दक्षिण के सितारे शायद इस कारन आगे रहते है क्युकि वह जब अपनी पार्टी बनाते है तो वह अपने बूते संगठन खड़ा करते है ...जिसके पीछे एक लम्बी टीम होती है॥


यही नही फिल्मो से जुड़े होने के चलते उनके सपोर्टर की तादात भी ज्यादा होती है जो उनसे बदलाव की उम्मीद करते है..दक्षिण में अभी इस कारनामे को करूणानिधि ,जयललिता , अन टी रामाराव ,ऍम जी रामचंद्रन ने साकार किया है॥ अपने चिरंजीवी भी अब इसी रास्ते को पकड़ चुके है ....आने वाले समय में कई कलाकार और राजनीती का रुख कर सकते है..इस बार चीरू पूरे रंग में नजर आरहे है..प्रजा राज्यम ने चंद्रबाबू से मुकाबले की ठान ली है...तेलगु गौरव के नाम पर इस पार्टी को अन टी रामाराव ने ८० के दशक में पैदा किया ...


तब से बड़े पैमाने पर इससे अभिनेता अभिनेत्रिया जुड़ती रही है ॥ यही नही इस चुनाव में चीरू के मुकाबले के लिए चंद्रबाबू ने बड़े पैमाने पर वहां के सितारों को प्रचारमें उतारा है॥ चीरू की माने तो दक्षिण के कलाकारों ने एक आन्दोलन पैदा करने में सफलता पायी है ॥ गरीब कमजोर तबके तक विकास कार्य पहुचाना उनका मुख्य उद्देस्य है जिसको वह अंजाम दे रहे है...


इस कड़ी में आंध्र की" लेडी अमिताभ " विजय शान्ति का नाम भी शामिल है जो अपनी पार्टी के तेलंगाना रास्ट्रीय समिति में विलय के बाद चुनाव लड़ रही है ताकि लोगो की समस्या का समाधान आसानी से हो सके ....


तमिलनाडु की कहानी भी आंध्र प्रदेश जैसी ही है ॥ यहाँ से ३९ सांसद आते है ..तमिल सिनेमा से निकले ऍम जी राम चंद्रन का प्रभाव कों कोई भूल सकता है क्या? जयललिता आज उन्ही के नाम पर तमिलनाडु के बड़े तबके के वोट अपने पाले में लाती है ...राम चंद्रन जैसे शिवाजी गणेशन , करूणानिधि ,सी अन अन्ना दुराई जैसे कई और नाम शामिल है जिन्होंने तमिल सिनेमा से निकलकर अपने को तमिलनाडु की राजनीती में चमकाकर रख दिया॥


अब बात उत्तर भारत की करते है ...उत्तर भारत में पृथ्वी राज कपूर, नर्गिस जैसे कई नाम गिनाये जा सकते है ...आपातकाल के समय देवानंद ने भी एक अलग पार्टी बना ली थी परन्तु बाद में वह कहाँ गुम्म हो गई इसका पता नही ? एक दो को छोड़ दे तो हमारे उत्तर के कलाकार राजनीती के मोर्चे पर ज्यादा सफल नही हो पाए..अभिताभ ने बहुगुणा जैसे दिग्गी नेता को हरा दिया था..८४ के चुनाव में जीत के बाद बहुगुणा की खासी किरकिरी हुई थी ....


इसके बाद ऐसा लगता था की अमिताभ राजनीती से जुड़े रहेंगे परन्तु क्या हुआ वह राजनीती से दूर हो गए॥ यही हाल गोविंदा का भी हुआ है ॥ २००४ में राम नाईक को हराया था..आज कांग्रेस पार्टी ही उनको चुनाव में टिकेट देने से डर रही है..गोविंदा के समझ में शायद अब आया है राजनीती और फिल्मी रंगमंच में अभिनय करना कितना मुश्किल होता है॥ गोविंदा संसद में कभी कभार उपस्थित होते थे ....यही नही अपने संसदीय इलाके में उन्होंने बहुत कम रुख किया और सांसद निधि का बहुत पैसा बचाए रखा....खर्च करने से पीछे हट्टे रहे....
यही बात बीजेपी के टिकेट पर बीकानेर से लड़ने वाले धर्मेन्द्र पर भी लागू होती है..चुनाव जीतने के बाद वह संसद से तो नदारद ही रहे उनके संसदीय इलाके में उनके दर्शन दुर्लभ हो गए थे जिस कारन वह इस बार फिर से लड़ने का साहस नही जुटा पाये....पार्टी को पहले ही उन्होंने टिकेट के लिए मना कर दिया॥


मसलन मेरा यह कहना है हमारे उत्तर के कलाकारों को यह समझना चाहिए की राजनीती एक अलग फील्ड है यहाँ लटके झटके मारने रटाये डायलोग बोलने से काम नही चलता॥ जनता से सीधे संवाद कायम करना पड़ता है॥ फिल्मी दुनिया की हकीकत और राजनीती के मैदान में जमी आसमा का अन्तर है....


फ़िल्म में हीरो नम्बर १, कुली नम्बर १ बनना आसान होता है परन्तु राजनीती में नम्बर १ बन्ने के लिए करिश्माई होना चाहिए॥ यहाँ लटके झटको से काम नही चलता है.....नेताओ के द्वारा इन फिल्मी कलाकारों को लाने के पीछे बड़ी मंशा यह होती है इलाके में एक प्रचार के द्वारा फिजा बदल जायेगी...साथ में यह सितारे पार्टी के स्टार प्रचारक भी साबित हो जायेंगे .....


लगभग सभी पार्टिया आज उत्तर भारत के इन स्टारों पर निर्भर हो गई है.... भाजपा क्या कांग्रेस भी आज इन पर निर्भर है? सपा तो पूरी तरह से इनपर निर्भर है... अमर सिंह के फिल्मी घरानों से सम्बन्ध बड़े मधुर है ..... यह नजदीकिया होना कोई नई बात भी नही है....
आज भी पार्टिया इन सितारों को टिकेट देने में पीछे नही है ..अभी रामपुर से सपा के टिकेट पर जाया प्रदा लड़ रही है...


पुराने सितारों में भाजपा से गुरदासपुर सीट से विनोद खन्ना फिर मैदान में है तो वहीशत्रुघ्न सिन्हा पटना साहिब से लड़ रहे है॥ उनके विरोधी के रूप में शेखर सुमन है जो कांग्रेस से लड़ रहे है..लखनऊ से सपा के टिकेट पर नफीसा अली मैदान में है ...


प्रकाश झा बिहार में लड़ रहे है लोकजन शक्ति पार्टी के टिकेट पर ...बंगाल फिल्मी इंडस्ट्री से ताल्लुक रखने वाले कबीर सुमन भी इस बार मैदान में है... रिजल्ट बताते है की पिछली बार सात लोगो ने फिल्मी रंगमंच से संसद का सफर तय किया था..देखते है इस बार लोग फिल्मो से संसद का सफर तय करते है...?

बहरहाल जो भी हो, यह तो तय है फिल्मी सितारों का उपयोग भीड़ खीचने को किया जाता रहा है और आगे भी रहेगा.... अब तक की कहानी यह है दक्षिण के सितारे उत्तर के सितारों पर भारी पड़े है...इसका कारन यह भी हो सकता है की जहाँ दक्षिण के सितारों के पास चुनाव में बड़ा नेटवर्क होता है वहीँ काम करने का एक एजेंडा भी जिसके अनुसार वह चलते है और जनता भी उनके और खिची चली आती है ....


अन टी रामाराव ,जयललिता, करूणानिधि, शिवाजी गणेशन हो सभी राजनीती में आगे इसलिए रहे क्युकी केवल फिल्मी हस्ती होने के कारन इनको वोट नही मिले ॥ सभी के पास एक विजन था ....और बिना इस के कुछ भी सम्भव नही हो सकता ....कम से कम हमारे उत्तर के सितारों पर यह बात लागू नही होती ॥ वह भाजपा या कांग्रेस सरीखी बड़ी पार्टियों में जाते है जिनके पास अपना कोई कार्यक्रम नही होता॥ वह फिल्मोके चमत्कार को यहाँ दिखाना चाहते है जिसमे वह सफल साबित नही हो पाते ....


अगर एक बार गलती से गाजे बाजे के साथ संसद पहुच भी गए तो दुबारा चुनाव लड़ने का साहस नही जुटा पाते...खुदा ना खास्ता , राजनीती की राह सबसे अलग है ......बसंती से शादी ना करने को लेकर शराब की बोतल पकड़कर मीनार से कूद जाना तो फिल्मो में आसान काम है लेकिन राजनीती की पिच पर देर तक बैटिंग कर पाने के लिए खूब पसीना बहाना पड़ता है देर तक फिल्ड में टिके रहने की कला तो होनी ही चाहिए साथ ही विपक्षी की काट का कारगर ब्रहमास्त्र अपने कवच में होना चाहिए.....


फिर जनता जनार्दन के द्वारे भी जाना पड़ता है ॥ पूरे ५ साल अगर उनके पास नही गए कुछ काम नही कराये तो अगले चुनाव में जनता के जूते खाने को भी तैयार रहना चाहिए ........

लोक सभा का महासमर आपको कैसा लग रहा है इस पर अपनी राय देना
मत भूलियेगा... मुझे आपकी राय की प्रतीक्षा रहेगी........ महासमर की हर पोस्ट पड़कर अपने कमेन्ट दीजिये










Wednesday, May 6, 2009

ना सूत .... ना कपास ....जुलाहों में लट्ठम लट्टा .......( भाग ४)















आईये ,अब बात तीसरे मोर्चे से शुरू करे ...... यहाँ भी किसी एक के नाम पर सहमती नही है ....२००७ के विधान सभा चुनावो में उत्तर प्रदेश को फतह करने के बाद से माया मेमसाहब दलित प्रधानमंत्री बन्ने के सपने देखने लगी है....अभी वह पूरे देश में अकेले चुनाव लड़ रही है ॥ सतीश चंद्र मिश्रा को आस है की उत्तर प्रदेश में कम से कम ५० सीट जीतने में माया इस बार सफल होंगी...लेकिन माया का सपना बिना तीसरे मोर्चे के पूरा नही हो पायेगा....


तीसरा मोर्चा माया की दावेदारी को लेकर सहमत नही है .... हालाँकि माया को उम्मीद है १६ मई को चुनाव परिणामो के बाद तीसरे मोर्चे के सभी नेता उसको प्रधानमंत्री के रूप में पेश कर देंगे...जिससे देश की पहली दलित महिला प्रधानमंत्री बनने का खवाब पूरा हो जाएगा...

लेकिन इस बार माया की डगर आसान नही लगती ....


उत्तर प्रदेश में बीते २ वर्षो में ब्राह्मण समाज का बीएसपी से मोहभंग हो गया है ...साथ ही राज्य में कानून व्यवस्था की स्थिति लचर हो गई है....जो हाथी की जमीन को दरका सकती है....संभवतया इस बार सपा राज्य में अच्छी बदत बनाने में कामयाब हो जाए ... यह चुनाव निश्चित ही माया मेमसाहब की २ वर्षो के कार्यो का मूल्यांकन करेगा....


अगर तीसरा मोर्चा माया के नाम पर सहमत नही होता है तो माया अपने विलल्प खुले रखेंगी....वह मुलायम के साथ वाले मोर्चे पर जाना पसंद नही करेंगी.....ऐसे हालातो में एक विकल्प उनके पास यह रहेगा वह आडवानी को प्रधानमंत्री बनाने पर सहमत हो जाए और उनको अपना समर्थन दे ....ख़ुद भाजपा भी शायद उनको ऊप प्रधानमंत्री बनाये जाने की बात करे...


वैसे राजनीती में कब क्या हो जाए हम कुछ नही कह सकते....
सपा को ही देख लीजिये॥ कल तक जो अमर सिंह सोनिया पर उनका फोन टेप करने का आरोप लगाता था परमाणु करार पर उनकी पार्टी ने यू पी ऐ की नाक बचाने का काम किया था....आज वही पार्टी कांग्रेस से अलग हो गई है....माया पहले भी उत्तर प्रदेश में बीजेपी का साथ दे चुकी है लिहाजा इस बार भी बीजेपी बसपा जुगलबंदी बन जाए तो कोई नई बात नही होगी....


बीजेपी के जेटली इस मुहीम को नया रूप देने में जुटे हुए है...दिल्ली से जुड़े एक सूत्र की माने को जेटली की इस मसले पर सतीश चंद्र मिश्रा से कई बार बात भी हो चुकी है...वैसे जबसे माया ने सर्व जन समाज वाला फार्मूला लगाया है तब से सवर्ण समाज के प्रति उसका नजरिया बदल गया है..देखना होगा क्या माया मेमसाहब इस बार प्रधानमंत्री बन पाएँगी...? जहाँ तक तीसरे मोर्चे का सवाल है उसने पहले ही कह दिया है उसका प्रधानमंत्री चुनाव के बाद आम सहमती से तय किया जाएगा.....



पी ऍम इन वेटिंग की इस लिस्ट में तीसरे मोर्चे से प्रकाश करात का नाम भी जुड़ गया है ...करात पूर्व में सयुक्त मोर्चा सरकार के समय की गई गलती को फिर नही करना चाहते है॥ उस समय ज्योति बासु प्रधानमंत्री बनने के करीब पहुच गयेथे परन्तु वाम मोर्चे की केन्द्रीय कमेटी की बैठक में पारित एक प्रस्ताव के चलते वह पी ऍम बनने से रह गए .... इस बैठक में यह निर्णय हुआ की वाम तभी सरकार में शामिल होगा जब वह पूरे देश में अपनी स्थिति मजबूत कर लेगा...


बासु के प्रधानमंत्री न बन पाने का मलाल आज भी करात जैसे नेताओ को सता रहा है ..इसी कारन से करात जैसे नेता ने इस चुनाव से पहले से ही अपनी इच्छा का इजहार कर दिया है...हालाँकि आजकल कामरेड हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे नेता के नही होने के चलते करात जैसे नेता अपनी राजनीतिक रोटी सेकने का काम ज्यादा करते है ...


अब बात चौथे मोर्चे की ॥


यहाँ से लालू मैदान में है जो दौड़ में सबसे आगे चल रहे है...लालू के बिहार में कांग्रेस को किनारे कर पासवान के साथ हाथ मिला लिया ..उनके साले साधू यादव कांग्रेस के पाले में जाकर लालू का खेल ख़राब कर रहे है..हालाँकि कुछ समय पहले तक यह कहा जाता था की लालू की रोटी सोनिया की रसोई में बना करती है लेकिन इस बार उन्होंने कांग्रेस ने उनसे दो दो हाथ करने की ठानी है..बाबरी मस्जिद का दोष वह कांग्रेस पर लगा रहे है.... आग में घी डालने का काम प्रणव मुखर्जी ने किया ॥


जब बिहार में कुछ दिनों पहले उन्होंने एक सभा में यह कह डाला लालू अगली सरकार में शामिल होने के सपने नही देखे..कल शकील अहमद ने प्रणव के सुर में सुर मिलाया...

मुलायम सिंह यादव भी प्रधानमंत्री की दौड़ में है....संयुक्त मोर्चा सरकार के दौर में भी उनका नाम पी ऍम के रूप में चला था॥


परन्तु लालू की असहमति के बाद उनको रक्षा मंत्री बनने से ही संतोष करना पड़ा था... इस बार लालू पासवान मुलायम गठजोड़ ने कांग्रेस की नीद ख़राब कर रखी है क्युकी उत्तर प्रदेश बिहार में भाजपा , कांग्रेस जैसे दल आज हाशिये पर है ... अतः इन तीनो के एक मंच पर आने से कांग्रेस की परेशानी इस चुनाव में बद सकती है॥


इसी कारन कल उसके युवराज ने जेडीयू और टीडी पी जैसे पर अपने डोरे डालने शुरू कर दिए है ..अगर चौथा मोर्चा अच्छी सीट लाने में सफल हो जाता है तो तो केन्द्र का भावी प्रधानमंत्री तय करने में यह मोर्चा महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा..रही बात तीसरे मोर्चे की तो देखना होगा क्या यह १६ मई के बाद तक एकजुट रह पाटा है या नही क्युकी तीसरे और चौथे मोर्चे का कांसेप्ट अपने देश में अभी तक सफल नही होपाया है ॥ पहले भी हम संयुक्त मोर्चा सरकार का हस्र देख चुके है॥?


इस दौड़ में राम विलास पासवान भी शामिल है... भला पासवान का क्या कसूर ? जब देवेगौडा, गुजराल सरीखे लोग प्रधानमंत्री बन सकते है तो पासवान क्यों नही॥? माया मेमसाहब के द्वारा अपनी दावेदारी जताए जाने के बाद पासवान के सर में दर्द हो गया है जिस कारन वह अपने को सबसे बड़ा दलितों का मसीहा साबित करने में जुटे

है...


इस कतार में शरद पवार का नाम भी शामिल है ॥ उम्मीद है तीसरे मोर्चे के सहारे वह मराठा प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा करने में सफल हो जाए...पवार के सभी दल के नेताओ के साथ सम्बन्ध मधुर है ॥ यह नेता चुनाव परिणामो के बाद उनको पी ऍम के रूप में प्रोजेक्ट कर सकते है॥ उम्मीद है शरद पवार के मराठी मानुष शिगूफा आने के बाद शिव सेना भी उनको अपना समर्थन कर दे....


अभी "डार्क होर्स" के रूप में एक नाम और सामने आ रहा है ॥ वह बिहार के मुख्य मंत्री नीतीश कुमार का है..नीतीश केन्द्र में रेल मंत्री रह चुके है जहाँ पर उनके काम की खासी सराहना की गई थी...इसी स्वच्छ छवि के चलते वह केन्द्र की राजनीती से अपने राज्य की राजनीती में लाये गए ॥


उन्होंने बिहार में लालू के जंगल राज का खत्म किया और रास्ट्रीय राजनीती में बिहार को बीते २ सालो में चमकाकर रख दिया...इस दौरान वहां पर बड़े पैमाने पर विकास कार्य करवाए है .... अब इस बार यह सम्भावना बनती दिख रही है अगर ऊपर के किसी नाम पर सहमती नही बन पाती है तो नीतीश कुमार प्रधानमंत्री के डार्क "होर्स " के रूप में सामने आ सकते है ...
संभवतया , ऐसे हालातो में भाजपा जैसे दल भी उनको समर्थन करने पर विचार कर सकते है ..वैसे भी राजनीती में सम्बन्ध बनने में देरी नही लगती॥ फिर यह तो भारतीय लोकत्रंत है

बहरहाल , जो भी हो प्रधान मंत्री की कुर्सी एक है ... दावेदार अनेक है ॥ यह तो वही बात हुई "एक अनार सौ बीमार".....अब देखना है १६ मई के बाद क्या स्थिति बनती है? क्या इन सभी में से कोई प्रधानमंत्री बन पायेगा या "बेक डोर " से कोई नया "डार्क होर्स" अपनी इंट्री मारेगा?

दिल थामकर बैठिये........ दिल्ली पहुचने में अब १६ मई ज्यादा दूर नही है ........


आपको हमारी लोक सभा महासमर यात्रा कैसे लग रही है इस पर अपनी बेबाक राय मुझे जरूर रखे.... आपके कमेन्ट का इन्तजार रहेगा ..............

ना सूत ना कपास .... जुलाहों में लट्ठम लट्टा.... (भाग ३)....लोक सभा का महासमर....






आडवानी की राह की एक अन्य दिक्कत उनका उग्र हिन्दुत्ववादी चेहरा है.... वाजपेयी जब तक नेता थे तब तक यह पता नही चलता था घर के अन्दर खिचडी बन रही है या चावल रोटी॥ आज आलम यह है पार्टी में सभी नेता अपने को तीस मार खान समझने लगे है..... नेता किसी भी विषय पर अपने ब्यान पार्टी लाइन से हटकर देने से भी पीछे नही रहते.... वाजपेयी की छवि के उनके विरोधी भी कायल थे॥ लेकिन आडवानी का चेहरा आज भी पहले जैसा ही बना है... वह अपनी उग्र हिंदुत्व की छवी से बाहर निकलने में सफल नही हो पा रहे है..काठ की हांडी दुबारा नही चद्ती परन्तु भाजपा की सबसे बड़ी दिक्कत यह है की चुनावो के समय उसको राम की याद आ जाती है ... इस बार भी आडवानी जी को याद आ गई है और पार्टी राम की शरण में चले गई है बड़ा सवाल यह है क्या इस बार देश का मतदाता राम के मसले पर आडवाणी के साथ चला जाएगा॥ इस पर हमको शक लगता है...


चुनाव प्रचार के दौरान आडवाणी के द्वारा बार बार मनमोहन पर हमले तेज किए गए ... आम तौर पर शालीन माने जाने वाले मनमोहन इस बार शेर की तरह से गरज उठे .... भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह पहला मौका है जब प्रधान मंत्री और विपक्षी नेता के बीच संबंधो में तल्खी इस कदर बाद गई की अब वह दोनों किसी मंच पर मुलाकात होने पर वह एक दूसरे से नजर मिलाना पसंद नही करते॥ दरअसल आडवानी मनमोहन को इस बात के लिए बार बार कोसते रहे है वह एक कमजोर प्रधानमंत्री है...


सत्ता का केन्द्र दस जनपद है ॥ आख़िर आदमी की भी तो सहने की एक सीमा होती है.... पिछले पाँच सालो से मनमोहन ने उनको कोई जवाब नही दिया .... जब से सोनिया ने उनको कांग्रेस से भावी प्रधान मंत्री घोषित किया है तब से मनमोहन नए अवतार में अवतरित हो गए है... ऐसे मनमोहक अवतार को देखकर सभी चकित है.... आडवानी के कमजोर प्रधानमंत्री के तमगे को मनमोहन ने कंधार से धो दिया है॥ कंधार आडवाणी की दुखती रग है जिस पर मनमोहन ने हाथ रख दिया है...



दरअसल परमाणु करार पर अपनी साख को दाव पर लगाने के बाद से मनमोहन ने यह साबित कर दिया है वह एक कमजोर प्रधानमंत्री नही है... आडवानी और अन्य दल भले ही उनको कटपुतली प्रधानमंत्री कहे पर यह सच्चाई है मनमोहन ने पाच साल कुशलता पूर्वक सरकार चलाकर अपने को साबित कर दिखाया है... उनको हम जननेता की कोटि में नही रख सकते जो चुनावी रैली में भीड़ खीच सके .....


लेकिन उनमे कुशल प्रशासक के सारे गुण नजर आते है..... भले ही वह आडवानी की तरह भाषण नही दे सकते पर आज भी देश के मध्यम वर्ग में उनकी छवि अच्छी बनी है॥ अभी बीते दिनों दिल्ली की एक चुनावी कंपनी के सर्वे में यह बात उभर कर सामने आई... इसका कारन उनकी शालीनता है... इन सब को धयान में रखते हुए सोनिया ने उनको प्रधान मंत्री का उम्मीद वार घोषित किया ....ताकि मनमोहन का मनमोहक चेहरा देश के गरीब से गरीब को रास आए और मनमोहन के साथ कांग्रेस की भी जय हो.....हो



बड़ा सवाल आज यह है क्या मनमोहन पी ऍम बन पायेंगे? आज का समय गटबंधन राजनीती का है ॥ कोई भी दल अपने बूते २७२ का जादुई आंकडा नही जुटा पायेगा.... भाजपा हो या कांग्रेस दोनों को सरकार बनाने के लिए अन्य दल पर आश्रित रहना पड़ेगा...


अगर कांग्रेस इस बार भी सरकार बनने के मुहाने पर खड़ी होती है तो अन्य दल के सहयोग के बिना वह सरकार बना पाने की स्थिति में नही होगी॥ यही हाल बीजेपी का भी है... अभी की कहानी यह है की यू पी ऐ के घटक मनमोहन के नाम पर सहमत नही है॥ वह अपने को उससे अलग कर चुके है ... वह साफ़ कह चुके है मनमोहन केवल कांग्रेस के उम्मीद वार है ....


यह बयान कही न कही मनमोहन की प्रधान मंत्री बनने की सम्भावना पर पलीता लगा रहा है .... उनकी इस राह का सबसे बड़ा रोड़ा वाम दल बने है.... जो इस बार मनमोहन को समर्थन देने से पहले दस बार सोचेंगे....वैसे भी परमाणु करार के बाद से वाम दल मनमोहन की सूरत देखना पसंद नही करते...


ऐसे में मनमोहन का पी ऍम बन्ने का सपना धूल धूसरित होता दिखाई दे रहा है ....साथ ही कांग्रेस में मनमोहन को फिर से आगे करने को लेकर इस बार एका नजर नही आता...पार्टी में अन्दर ही अन्दर मतभेद है... पर सोनिया के चलते कोई कुछ कहने की स्थिति में नही है...कई नेताओ के मन में इस बात की कसक है मनमोहन के चलते उनकी पी ऍम बन्ने की आकांशा पूरी नही हो पा रही है...


ऐसे नेताओ में कई नाम गिनाये जा सकते है .... अर्जुन सिंह, प्रणव मुखर्जी, ऐ के एंटोनी सभी लाइन में खड़े है....अर्जुन सिंह तो इस बार इस कतार से बहार हो गए ॥ उनका स्वास्थ्य सही नही चल रहा ऊपर से कांग्रेस ने उनकी बेटी वीणा सिंह को मध्य प्रदेश से टिकट नही दिया जिस कारन वह अपने को उपेक्षित समझ रहे है...


वैसे अब उनकी पारी ख़तम हो गई है... अगर मनमोहन पर सहमती नही बन पाती है तो एक सम्भावना यह है की सोनिया गाँधी प्रणव मुखर्जी का दाव परिणामो के बाद खेले.... प्रणव उसी पश्चिम बंगाल से आते है जहाँ वामपंथियों का पुराना किला है ॥ वैसे भी जब जब मनमोहन पर संकट आया है तब तब प्रणव को वामपंथियों के पास सुलह के लिए भेजा जाता रहा है जिस कारन वह पार्टी में संकट मोचक बनकर उभरे है...


मनमोहन की जगह पर प्रणव का समर्थन करने से वाम दल को कोई दिक्कत पेश नही आएगी.... वैसे यहाँ पर आपको यह बताते चले की प्रणव की दिली इच्छा आज भी प्रधानमंत्री बनना है ॥ मनमोहन के समय भी उनका नाम प्रधानमंत्री के लिए जोर शोर से चला था परन्तु मनमोहन अपनी मिस्टर क्लीन छवि के कारन सभी पर भारी पड़े थे... प्रणव बाबु इस बार अपनी इच्छा को नही छुपा पाये...


बीते दिनों एक टीवी प्रोग्राम में उन्होंने इस बात का इजहार कर दिया... प्रणव का कहना था हिन्दी भाषी नही होना उनकी सबसे बड़ी अड़चन है ॥ १६ मई के बाद अगर मनमोहन पर सहमती नही बन पाती है तो भाजपा को रोकने के लिए वाम दल फिर से कांग्रेस के साथ जा सकते है...ऐसे में अन्तिम लोक सभा चुनाव में प्रणव बाबु की इच्छा पूरी हो सकती है ....



वैसे कांग्रेस ने भी इन दिनों भाजपा की तर्ज पर चुनावी वार रूम अभियान चला रखा है... उसके सभी नेता मनमोहन को प्रधानमंत्री बनाने के लिए एडी चोटी का जोर लगाये हुए है ... जहाँ भाजपा की कमान सुधीन्द्र कुलकर्णी, प्रकाश जावडेकर , जेटली , प्रद्युत बोरा जैसे लोगो के हाथ में है वही कांग्रेस में यह चेंबर पॉलिटिक्स के उस्ताद माने जाने वाले सोनिया के सिपेसालार अहमद पटेल के हाथो में है ...


जय राम रमेश , ऍम लाल बोरा , आनंद शर्मा, अभिषेक मनु सिंघवी , गुलाम नवी आजाद सरीखे लोग पटेल की मदद इस काम में कर रहे है ..... कांग्रेस पार्टी में आम तौर पर यह जुमला कसा जाता रहा है वह दस जनपद से संचालित होती है लेकिन इस बार वह १५ रकाबगंज से संचालित हो रही है ... अब देखते है क्या मनमोहन १६ मई के बाद फिर से प्रधानमंत्री की कुर्सी बरकरार रख पाते है या नही या कांग्रेस से कोई अन्य नाम सामने आता है .............(जारी रहेगा... चौथा भाग शेष है .......)

Tuesday, May 5, 2009

ना सूत... ना कपास .. जुलाहों में .. लट्ठम .. लट्टा....(भाग२)


आडवाणी जी आपका राजनाथ के साथ ३६ का आंकडा जगजाहिर ही है ... इस बार सुधांशु मित्तल मामले में यह सही से उजागर हो गया ॥ राजनाथ के साथ जेटली की ठन गई॥आपने पूरे मामले से कन्नी काट ली... जेटली को मित्तल का पूर्वोत्तर का प्रभारी बनाया जाना नागवार गुजरा...

इस पर मीडिया में कई दिनों तक गहमागहमी बनी रही... परन्तु जेटली मुह लटकाए ही रहे॥ यहाँ तक कि मीडिया में केमरे के सामने यह बात सही ढंग से उजागर हो गई .. जेटली सभी के साथ प्रेस कांफ्रेंस में तो पहुचते थे परन्तु उनका ध्यान हर समय भटका रहता था॥ इस मामले पर आडवानी कुछ नही कर सके परन्तु संघ को यह नागवार गुजरा॥

संघ ने सोचा कि यह मन मुटाव मतदाताओ संदेश देने का काम कर रहा है लिहाजा उसने जेटली की क्लास ले डाली.... जबरन जेटली ने राजनाथ के घर जाके सब ठीक होने का संकेत दिया॥ लेकिन यह आपस में मीडिया के साथ गले मिलने का यह एक नाटक था जो समाप्त नही हुआ॥ आज भी जेटली मित्तल से खफा है पर संघ के साथ बैठक के बाद जेटली का राजनाथ मिलना जरुरी हो गया था क्युकी इससे कार्यकर्ताओ में ग़लत संदेश जा रहा था॥ साथ ही यह दिख रहा था की पार्टी में आडवानी दूसरी पात के नेताओ के साथ तालमेल कायम कर पाने में सफल नही हो पा रहे है॥

वैसे सच मानिये राजनाथ अभी भी आडवानी को पीं ऍम पदपर नही देखना चाहते है॥ अब यह तो संघ की मजबूरी है की उसने पहले से ही आडवानी को पी ऍम और अटल का उत्तराधिकारी घोषित कर दिया..अगर राजनाथ का बस चलता तो वह भी अपनी दावेदारी इस पद के लिए पेश कर देते ...मुरली मनोहर आज भले ही भाजपा में उपेक्षित है लेकिन वह भी आडवानी को प्रधानमंत्री देखना पसंद नही करते॥

याद करिए वाजपयी वाला दौर ॥ तब भाजपा में १ ,२,३ पर अटल, आडवानी, मुरली शामिल थे ॥ तब आडवानी मुरली को २ पर देखना पसंद नही करते थे हालाँकि वाजपेयी के सिपेसलारो में वह गिने जाते थे लेकिन आडवानी के कद के आगे मुरली नही ठहर पाये.. भले ही जिन्ना की मजार पर जाकर आडवानी ने उनको धर्म निरपेक्ष कहा हो लेकिन इन सबके बाद भी संघ ने उन पर सहमती १ साल पहले ही दे दी थी कही न कही यह आडवानी की पार्टी में अपनी पकड़ को मजबूत करता है..लेकिन दूसरी पात के नेता आडवानी का नाम घोषित होते ही हताश हो चले है॥ जसवंत सिंह जैसे नेता आज खुले तौर पर उनसे दो दो हात करने को तैयार रहते है॥

आडवानी जानते है यह उनका अन्तिम चुनाव है शायद इसके बाद ५ साल बाद वह प्रधानमंत्री पद नही पा सकेंगे क्युकी तब उनका स्वास्थ्य भी सही नही रहे लिहाजा वह चुनाव प्रचार में हाई टेक तरीको को अपनाने से पीछे नही है ॥ इस बार भाजपा ने ४० लोगो की मदद से चुनावी वार रूम बनाया है जिसमे आईटी, बैंकिंग,जैसे फील्डों से लोग उनके इन्टरनेट प्रचार में जुटे हुए है॥



सुधीन्द्र कुलकर्णी दिल्ली में २६ तुगलक क्रिसेंट पर इसकी कामन को अपने हाथो में लिए हुए है ॥ वह चुनाव पर पैनी नजर रखे हुए है॥ आंकडो के जरिये जी वी एल नरसिम्हन भाजपा की संभावनाओं पर नजर रख रहे है॥ अब यह तो वक्त ही बताएगा की क्या आडवानी पी ऍम बन पायेंगे ?



वैसे बीजेपी की हालत इस समय ख़राब हो चले है॥ पार्टी के अन्दर इतने जयादा झगडे है की वह अब सार्वजानिक होने लगे है ॥ हालाँकि वाजपेयी के रहते सब ठीक ठाक रहता था॥ और पार्टी के अन्दर क्या खिचडी पकरही है या दाल चावल यह पता नही चल पट था॥ लेकिन जा से अडवाणी आए है तब से पार्टी अपनी राह से भटक गई है॥ नेताओ में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ मच गई है॥



सबसे बड़ी बात यह है आज आडवानी को बड़े सहयोगी भी नही मिल पारहे है ॥ साथ ही अटल जी की कमी खल रही है.. फर्नांडीज का न होना भी भाजपा की राह को मुस्किल बना रहा है..आज साउथ में पार्टी को कोई सहयोगी ही नही मिल पा रहे है ..ममता आज कांग्रेस के साथ है॥ वही जयललिता तीसरे मोर्चे के साथ चली गई है ॥ चंद्रबाबू भी तीसरे मोर्चे के साथ है ..ऐसे में ५ ,६ दलों के साथ आडवानी कैसे प्रधान मंत्री बन पायेंगे यह असंभव लगता है॥ आडवानी जी विन्ध्य में भगवा लहराने से काम नही चलेगा.....



आज का दौर गठबंधन राजनीती का है बिना सहयोगियों के कोई बहुमत के आस पास नही फटक सकता ॥ फिर यह चुनाव वैसे ही मुद्दा विहीन हो गया है॥शरद यादव फर्नांडेज की तरह चुस्ती नही दिखा पा रहे है॥ जिस कारन भाजपा को इस चुनाव में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है.. वैसे ही लालू प्रसाद आपकी प्रधानमत्री की कुंडली पर अपनी पी एच दी पूरी कर चुके है ॥ अगर यह सही साबित हो जाती है तो आप का रेलवे से टिकेट कन्फर्म नही होपायेगा॥ आर ऐ सी मिल जाता हो बात होती॥ लेकिन अगर चुनावो में बीजेपी बुरी तरह पिटती है तो आप पी ऍम इन वेटिंग ही बने रहोगे.....(जारी रहेगा)

Monday, May 4, 2009

ना सूत.. न कपास ....जुलाहों में..लट्ठम लट्टा ....(भाग १)

उपर की यह उक्ति भारतीय राजनेताओ पर फिट बैठती है ... अभी लोक सभा के चुनाव चल रहे है ..... चुनावो केसभी चरण पूरे भी नही हो पाये है कि अपने राजनेताओ में कुर्सी हथियाने की कवायद शुरू हो गई है ...

इन नेताओने आज देश का भट्टा बैठा दिया है... राजनीती में आज शुचिता जैसी बातें गुम हो चुकी है.... १५ वी लोक सभा मेंकोई मुद्दे नही है... आज एक दूसरे पर आरो़प वाली नई राजनीती शुरू हो गई है...ऐसे में सभी राजनेताओ में एकदूसरे को नीचा दिखाने का चलन शुरू हो गया है.... जनता के मुद्दे हासिये पर चले गए है .... भारतीय राजनीती काबाजार इन दिनों पी ऍम वेटिंग के नाम पर कुलाचे मार रहा है...सबसे पहले भाजपा की बात शुरू करते है.... आडवानी को पिछले १ साल से पीं ऍम बन्ने की तैयारियों में जुटे है...

संघ के द्वारा जब से उनको पी ऍम इन वेटिंगघोषित किया गया है तब से वह रात को सही से सो भी नही पा रहे है .... ८० की उम्र में ओबामा जैसा जोश दिखा रहेहै.... गूगल पर कुछ भी सर्च मारो ... कमाल है अपने आडवानी साहब ही तस्वीरो में छाए है ... पड़ोसी अखबारों कोभी खोल लो तो आडवानी का चमकता दमकता चेहरा पी ऍम इन वेटिंग के रूप में दिखाई देता है... बीजेपी का वाररूम हो या प्रचार सामग्री हर जगह अपने आडवानी ही .... उनके रणनीति कारो ने उनको पी ऍम बनाने के लिए एडीचोटी का जोर लगाया है...

बीजेपी के एक राज्य स्तरीय कैबिनेट मंत्री की माने तो इस बार पार्टी आडवानी को पी ऍमबनाने के लिए एकजुट है ... पैसा प्रचार सामग्री में पानी कि तरह बहाया जा रहा है... प्रचार का नया तरीकाआजमाया जा रहा है... आडवानी को युवा के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है.... अभी कुछ समय पहले तकआडवानी के जिम जाने पर खासी बहस तेज हो गई थी... बताया जाता है कि जिम जाकर आडवानी यह दिखाने किकोशिश करने में लगे थे भले ही वह ८० का पड़ाव पार कर चुके है लेकिन आज की डेट में उनसे स्वस्थ नेता कोईनही है जिसमे युवा होने के सभी गुण दिखाई देते है...

आडवानी जी आपने पी ऍम को निश्चित ही नौटंकी बना कररख दिया है... क्या आपके जिम शिम जाने और इन्टरनेट की तर्ज पर प्रचार करने से आपको प्रधान मंत्री की कुर्सीमिल जायेगी? होगा तो वही जिसके भाग्य में पी ऍम बनना लिखा होगा वही बनकर रहेगा..... यार हद ही हो गई ...

भारत में इस तरह से किसी को पी ऍम इन वेटिंग बनाने कि परम्परा ही नही थी... इस १५ वी लोक सभा में आपनेइस बार वेटिंग की नई परम्परा का आगाज कर दिया जिसके लिए हम सभी आपके आभारी है... आप पिछले १साल से भारत के पी ऍम इन वेटिंग बनकर जिस तरीके से प्रचार कर रहे है उसको देखते हुए अगर इस १५ वी लोकसभा में सभी ने अपने को पी ऍम इन् वेटिंग की लम्बी लिस्ट में शामिल कर लिया तो इसमे बुरा क्या हुआ? सभीको पी ऍम बन्ने का हक़ है.... केवल आप ही नही है इस पद के दावेदार...वैसे मैंने आप जैसा नेता नही देखा... आपमेंदेश को आगे लेकर जाने की सारी योग्यताये है इस बात से मै इनकार नही कर सकता...

आप हिंदुस्तान के सबसेस्वस्थ राजनेता आज की डेट में है इस बात से भी मै इनकार नही कर सकता ... आपने बीजेपी को इकाई के अंक सेसैकडे के अंको तक पहुचाया है इस बात के लिए भी आप बधायी के पात्र है... पर पता नही क्यों आडवानी जी मुझकोयह लगता है इस बार आप प्रधानमंत्री बन्ने के लिए उतावले बने है ...

सबसे दुःख की बात तो यह है इस चुनाव मेंअटल बिहारी वाजपेयी जी नही है जिस कारण उनकी कमी आपकी पार्टी को ही नही पूरे देश को खल रही है... आपके रथ के एक सारथी के इस चुनाव में साथ नही होने से इस चुनाव में भाजपा के लिए आगे की डगर आसाननही लग रही है....आडवाणी जी बुरा मत मानियेगा.... आपके सितारे इस चुनाव में मुझको गर्दिश में नजर आ रहे हैवैसे राजनीती में किसकी व्यक्तिगत आकांशा पी ऍम बन्ने की नही होगी? शायद सभी की होगी ?

अटल जी केरहते पार्टी में जो अनुशासन और एकता रहती थी अब शायद वह भाजपा में बीते दिनों की बात हो गई है ... आपकीछवि अटल जी की तरह उदार नही है ... भले ही आप अपनी इस उग्र हिंदुत्व वादी छवि को तोड़ने के लिए तरह तरहके टोटके अपनाए ... इसको पहले जैसा ही रहना है...

आप मुसलमानों के बीच जाकर अपने तो अटल जी जैसा पेशकरने से बाज आएये तो सही रहेगा... बड़े होने के साथ आदमी का स्वभाव जैसा रहता है उसमे आगे चलकर किसीभी तरह का बदलाव आने की सम्भावना नही लगती ... ऐसा आपके साथ भी है... अतः इस ढोंग को बंद करे तोअच्छा रहेगा....अटल जी ने आज अपने को स्वास्थ्य कारणों से राजनीती से भले ही दूर कर लिए हो लेकिन आपकीपार्टी को चाहिए कि उनके दिशा निर्देश आप इस चुनावों में लेते रहे...

अटल जी जब तक पार्टी में थे तो उनके बाददूसरा स्थान पार्टी में आपका हुआ करता था॥ उस दौर में नारे लगा करते थे भाजपा के लाल "अटल , आडवानी, मुरली मनोहर".... साथी ही अबकी बारी अटल बिहारी का नारा भी मैं नही भूला हूँ बचपन में गली कूचो में इस गानेके बोल बीजेपी के प्रचार में सुने है...लेकिन आडवानी जी इस बार "अबकी बारी आडवानी " के नारे फीके पड़ गयेहैआपकीपार्टी में आपको पी ऍम बन्ने को लेकर एका नही है॥ दूसरी पात के नेताओ में आपको लेकर मदभेद हैराजनाथ सिंह के साथ आपका ३६ का आंकडा अभी भी जारी है ... शीत युद्घ ख़तम नही हुआ है.... कुछ महीनेपहले सुधांशु मित्तल की पूर्वोतर के प्रभारी के तौर पर की गई तैनाती के बाद इन अटकलों को फिर एक बार बलमिलना शुरू हो गया ...

मुरली मनोहर जोशी जैसे नेता को आप पार्टी में आगे नही देखना चाहते थे ... इसी के चलतेआपके उनके साथ वाजपेयी के समय से ही मतभेद रहे है॥ आज वह भी हाशियेमें चले गये है ॥ भले ही डॉ जोशीआज चुनाव प्रचार की कमान अपने हाथो में संभाले हुए है पर वह भी आपके धुर विरोधी है॥

राजनाथ के साथआपका ३६ का आंकडा जगजाहिर है ...ऐसे मैं आपके पी ऍम इन वेटिंग बन्ने का सपना शायद ही साकार हो पायेगाजसवंत सिंह के साथ आपके मतभेद राजस्थान के चुनावो में उजागर हुए थे॥ वसुंधरा राजे सिंधिया का राजशीकाम करने का ढर्रा जसवंत को नही भाया पर आपने वसुंधरा को फटकार नही लगायी जिसके चलते राजस्थान मेंबीजेपी का जहाज डूब गया ॥

आडवानी जी इतना ही नही आपकी " माय कंट्री माय लाइफ " के विमोचन के बादआपने यह बयान दिया की कंधार में आतंकियों को छोड़ने के फेसले के समय वह बैठक में मौजूद नही थे ... यहबयां पूरी तरह से झूठा है ... आपकी पार्टी के कई नेताओ के साथ वाजपेयी सरकार में रक्षा सलाहकार रहेब्रिजेशमिश्रा ने आपके दावो की हवा निकाल दी ॥ अब आप सफाई देते नही फिरना .... अपने को बड़ा तीस मारखान माने आप बैठे है ॥ यह सत्ता के प्रति इतना लोभ सही नही है आडवानी जी...

सभी के साथ आपकी ट्यूनिंगसही से मैच नही कर रही है जिस कारन मुझको आपकी प्रधान मंत्री वाली राह काँटों से भरी दिखाई दे रही है ...दूसरीबात यह है आप शायद अपना मुह बंद करे नही रहे सकते है... बार बार एक ही बात चुनावो में कहे जा रहे है ... मनमोहन सबसे कमजोर प्रधानमंत्री है....

सत्ता का केन्द्र दस जनपद है... यह सब क्या है ॥ मनमोहन जी जितनेशालीन नेता है उसकी मिसाल आज तक शायद भारतीय लोकत्रंत्र के इतिहास में देखने को नही मिलती है॥ उनकीइसी शालीनता और विद्वत्ता ने उनको देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुचाया है ... आडवाणी जी उनमेसहनशीलता भी है तभी तो वह आपकी दस जनपद वाली हर बात को सुनते आ रहे थे॥ लेकिन सहने की भी एकसीमा होती है .... फिर बीच बीच में आपकी नई ललकार ...

सीधे मनमोहन को टेलीविज़न में बहस करने का न्योतादे डाला ... मनमोहन जी ने इस पर कुछ बयान देने से मना कर दिया .... कांग्रेस ने बचाव का रास्ता अपना लिया... आप भी कभी कभी क्या कर देते है आडवानी जी ? अब आप पर माना ८० के बुदापे में ओबामा जैसा बन्ने का जोशजो चदा है तो इसका मतलब यह तो नही की आप वह सब करने की बात कहे जो अमेरिका में होता आया है... वहांतो केवल २ पार्टिया है ...लेकिन भारत में तो पार्टियों की भरमार है ॥ ऐसे में अमेरिका की तरह यहाँ पर बहस होनीमुस्किल दिखाई देती है ...

अब अपने मनमोहन जी भी प्रधानमंत्री बनकर होशियार हो गए है ॥ उनमे पी ऍम केजीन आने लगे है... तभी को आपकी दुखतीरग कंधार और अयोध्या पर हाथ रख दिया उन्होंने.... मनमोहनजी नेआपसे कहा कंधार के समय यह लोह पुरूष क्यों पिघल गया? बात भी सही है आडवानी जी ...

आपका समय कौनसा सही था॥ कंधार आपके समय हुआ॥ गोधरा के समय आपके दुलारे" मोदी" ने राज धर्म का पालन नही किया ... ऐसा बयान अटल जी ने ख़ुद दिया था... संसद , मंदिरों पर हमले हुए... आप की पार्टी भी तो कौन सी सही है ? दूध केधुले आप भी नही हो....?

कुल मिलकर सार यह है की मनमोहन पर आरोप लगाने से पहले आपने अपनी पार्टी केगिरेबान में झांकना चाहिए था....जो भी हो मनमोहन शालीन है... बुद्धिमान है.... हाँ, यह अलग बात है की वहआपकी तरह लच्छे दार स्पीच नही दे सकते .... पर आपको अर्थ व्यवस्था पर अच्छा पड़ा सकते है ...

यह शुक्र है कीमनमोहन जी के रहते इस बार भारत पर वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते आंशिक असर बना रहा ॥ नही तो सभी केपसीने ही छूट जाते...आडवानी जी आपको यह किसी भी तरह शोभा नही देता की आप मनमोहन जी के ख़िलाफ़बार बार आग उगले ... ऐसे तो भारत में आने वाले दिनों में प्रधान मंत्री और विपक्षी नेताओ के बीच सम्बन्ध ख़राबहो जायेंगे....

आडवानी जी मुझको लगता है आप पर इस चुनाव में शनि का प्रकोप चल रहा है ॥ तभी तो कुछ नकुछ होते रहता है॥ कभी आपके " भेरव बाबा" आपके खिलाफ ताल ठोकते नजर आते है तो कभी " टाटा , अम्बानी, सुनील भारती की तिकडी "मोदी" को पी ऍम के लायक मानती है... कुछ समय बाद यह विवाद भी शांतहो जाता है...

फिर कुछ समय बाद आपकी पार्टी के अरुण जेटली और अरुण शोरी जैसे नेता इस बात की शुरूवातफिर से " मोदी" को पी ऍम के रूप में प्रोजेक्ट करने से करते है... फिर आप इस पर आडवानी जी अपना बचावकरते नजर आते है... " मोदी की काट का नया फार्मूला आपके द्वारा मीडिया के सामने अपने मध्य प्रदेश के " शिवराज" का नाम पी ऍम के रूप में आगे करने के रूप में लाया जाता है...

अब हम और जनता जनार्दन इसको क्यासमझे...? आडवाणी जी मेरी इस बात पर शायद आपको नाक लग जाए... बुरा नही मानियेगा तो एक बात कहनाचाहूँगा... आपको प्रधान मंत्री बनने की इतनी जल्दी क्या है ॥

इस जल्दी में आप कब क्या कह जाए इसकामुझकोभरोसा नही रह जाता है अब कुछ रोज पहल एक पत्रिकाको यह कहने की क्या जरूरत थी अगर इस बार पी ऍमनही बन पाया तो राजनीती से हमेसा के लिए संन्यास ले लूँगा ... आडवानी जी यह बयाँ भी आपकी हताशा कोबताता है ...अब कम से कम आडवानी जी १६ मई तक तो इस पर चुप ही रहना चाहिए था...उसके बाद आप अपनारुख स्पस्ट करते तो बेहतर रहता... लेकिन शायद चुप रहना तो आपकी फितरत में ही शामिल नही है... अब देखतेहै ऐसे विषम हालातो में क्या आपका पी ऍम बन्ने की डगर कितनी आसान होती है ? वैसे आपकी राह कई शूलो सेभरी दिख रही है॥ रास्ते में अन्धकार ही अन्धकार है ........ (जारी .....)..... ... ... ...

Friday, May 1, 2009

टंडन की नाक का सवाल बनी लखनऊ संसदीय सीट ........
















मेरे ताऊ जी लखनऊ के इंदिरा नगर इलाके में रहते
है..... कभी कभार उनसे फ़ोन पर बात चीत होती रहती है ... इस बार भारत में लोक तंत्र का सबसे बड़ा महापर्व आयोजित हो रहा है अतः मैं भी उनसे चुनावो के चलते बात करने को विवश हो गया .... वैसे भी राजनीती को बचपन से काफ़ी करीब से देखने का मौका मुझको मिलता रहा है और कई बार चुनावो पर अपन ने रिपोर्टिंग भी की है... अविभाजित उत्तर प्रदेश के दौर में अपना लखनऊ जाना होता रहा है... बचपन में मै़ने क्या देखा यह तो मुझको सही से याद नही है लेकिन वाजपेयी जी के संसद पहुचने वाला समय मुझको सही से याद है...
भले ही मैं उस समय में छोटा था लेकिन मुझको यह बात सही से याद है यह वह ९० का दौर था जब वाजपेयी की पूरेदेश में खासी धूम थी.... उनको सुनने के लिए लोगो की भारी भीड़ उमड़ आती थी... यही नही टीवी पर उनके बोलनेका अंदाज हर किसी को भाता था.... वाजपेयी जब चुनावी रेलियो को संबोधित करते थे तो लखनऊ में उनकीसभाओं में भारी जन सेलाब उमड़ आता था.....
कल जब लखनऊ में वोटिंग का दिन था तो मैं भोपाल में था ..... भोपाल में रहकर लखनऊ की बचपन वाली यादमुझको आने लगी ... इस के चलते अपने ताऊ जी से फ़ोन पर ही लखनऊ का हाल चाल जानने लगा... वह बता रहेथे लखनऊ में भगवान् भास्कर अपना प्रचंड रूप दिखा रहे है ..... मैंने ताऊ जी से कहा यह कोई नई बात नही है ... सभी जगह की सूरतेहाल एक जैसी है... इधर भोपाल में भी पारा चदा है तो उधर दिल्ली में भी गर्मी से लोगो केपसीने छूट रहे है.... इसी के चलते लखनऊ में कम मतदान होने की आशंका वह सुबह से ही वयक्त कर रहे थे...... और हुआ भी ऐसा ही... ताउजी के साथ हुई मेरी बात सोलह आने सच साबित हुई.... लखनऊ में वोट का परसेंट इसबार गिर गया .... जिसके चलते सभी लोगो का गणित गडबडा गया है... कोई यह कह पाने की स्थिति में ही नही हैकी वह लखनऊ से भारी बहुमत से जीत रहा है.... इस बार जिस बात ने मेरा दिल कचोटा वह यह है की लखनऊ सेवाजपेयी जी ने चुनाव नही लड़ा....
१९९१ से २००४ तक लगातार बार संसद पहुचाने में लखनऊ वालो का बड़ा योगदान वाजपेयी के साथ रहा... लेकिन इस बार स्वास्थ्य कारणों से वाजपेयी जी ने अपने को राजनीती से दूर कर लिया था.... उनके फेंस में इसबार गहरी निराशा है... वैसे लखनऊ की सीट पर आखरी समय तक सस्पेंस बना रहा ... इधर समाज वादी पार्टी नेसंजू बाबा को अपना प्रत्याशी पहले ही घोषित कर दिया था ... वही बीएसपी ने एक वर्ष से अखिलेश दास को अपनाउम्मीद वार घोषित कर दिया था... परन्तु बीजेपी और कांग्रेस सरीखी पार्टिया लखनऊ को लेकर असमंजस केभवर में फसी थी ... संजू बाबा ने तो चुनाव प्रचार में ही इस बात को कह दिया था अगर वाजपेयी यहाँ से चुनाव फिरलड़ते है तो वह लखनऊ से हट जायेंगे ..... क्युकी वाजपेयी उनके लिए पिता समान है.... लेकिन बाद में कोर्ट केफच्चर के चलते संजय को मैदान से हटना पड़ा.... साथ में अमर सिंह सरीखे हनुमानों की नई गांधीगिरी की भी हवानिकल गई.... पहले कांग्रेस में इस बात की चर्चा जोर शोर से थी वह यहाँ पर सपा के उम्मीद वार को अपना समर्थनदेगी ... लेकिन बाद में सपा की कांग्रेस के साथ दोस्ती परवान नही चढ़ पायी जिसके चलते सपा ने पूरे प्रदेश मेंअपने उम्मीद वार को घोषित कर दिया.... संजू के मैदान से हटने के बाद बीजेपी से लाल जी टंडन का नाम सामनेआया फिर सपा ने नफीसा अली को मैदान में उतार दिया .... आखरी समय में कांग्रेस ने यहाँ से रीता बहुगुणा कोमैदान में उतार कर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया ....

लखनऊ में मतदान कल पूरा हो गया... मतदाताओ ने अपने मत का इजहार कर दिया.... अब उम्मीद वारो केभाग्य का फेसला आगामी १६ मई को होगा..... उसी दिन यह पता चल पायेगा की क्या लाल जी टंडन अटल कीपुरानी संसदीय सीट पर बीजेपी का जलवा बरकरार रख पाने में सफल हो पाते है या नही...? क्या बीएसपी की ओरसे अखिलेश दास हाथी की सवारी लखनऊ में करते नजर आयेगे.... यह सवाल आज अभी पहेली बना हुआ है.... अपने एक लखनवी दोस्त की माने तो इस बार का मुकाबला रोमांचक मोड़ पर चला है? कोई यह कह पाने कीस्थिति में नही है कौन सा प्रत्याशी लखनऊ का चुनाव जीतता है?
अटल बिहारी वाजपेयी पिछले चुनावो से यहाँ का प्रतिनिधित्व करते रहे है.... यह वह दौर रहा जब वाजपेयीजन जन के बीच अपनी विशेष पहचान बनाने में कामयाब हुए.... जनता उनकी व्यक्तिगत छवी को देखते हुए वोटदिया करती थी..... मुझको याद है बचपन में उनकी चुनावी सभाओ में लोगो की भारी भीड़ लखनऊ में जमा होजाती थी.... उनकी विरोधी भी वाजपेयी की जमकर प्रशंसा करते थे लेकिन चुनावो में कोई भी उनके आगे नहीटिक पाता था.... यह वाजपेयी के उदार व्यक्तित्व का ही कमाल था की उन्होंने कर्ण सिंह, राज बब्बर , मुजफरअली जैसी हस्तियों को चुनावो में पटखनी दी... बताया जाता है वाजपेयी के नाम पर लखनऊ की जनता उनकोवोट देती रही है.... इस बार राजनीती से उनके सन्यास लेने के चलते उनके प्रशंसको में गहरी नाराजगी है.... अबदेखना होगा इस बार क्या बीजेपी के लाल अटल जी की सीट बचा पाने में सफल हो पाते है या नही?
लखनऊ की मेरी पुरानी यादे
है... लखनऊ रहने वाले हर व्यक्ति के जेहन में अटल के नाम पर उनका एक शेर सभीलोगो के दिलो दिमाग में गूजता रहता है वाजपेयी जी अपनी चुनावी सभाओ में कहा करते थे" हम पे फिदालखनऊ ओर हम फीदा लखनऊ " इस बार लोगो को बहुत मायूशी हुई है.... वाजपेयी आज स्वास्थ्य कारणोंसे राजनीती से दूर हो चले है... ऐसे में लोगो का मिजाज १५ वी लोक सभा में किस ओर जाएगा यह कह पानाअसंभव लगता है? वैसे यहाँ वाजपेयी के एक अपील टंडन को विजयी बनाने के लिए की लेकिन इसका इस बार मतदाताओ में उतना असर नही है....
हालाँकि इस बार थोड़ा बहुत बाहरी भीतरी उम्मीद वार होने का मसला भी जोर शोर से उठ रहा है ... अगर इसनेथोड़ा बहुत असर दिखाया तो लाल जी की नैया पार हो जायेगी.... लेकिन जिस तरीके से कल लखनऊ के सर्वेसामने आए है तो वह बदलाव की बयार को साफ़ बता रहे है .... इसका कारण वाजपेयी का मैदान में नही होना हैअगर वह मैदान में होते तो लखनऊ में कमल इस बार भी खिल जाता .... इस बार उनके मैदान में होने सेसभी का गणित गडबडा गया है...
बीएसपी के अखिलेश दास यहाँ पर सभी पर भारी पड़ते दिखाई दे रहे है ऐसा मेरा मानना है लखनऊ में अपनेसभी परिचित भी इस बार बदलाव की ओर इशारा कर रहे है .... जहाँ तक अखिलेश दास की बात है तो वह पहलेवह पर मेयर भी रह चुके है... इस लिहाज से उनका वह अच्छा खासा जना धार बन गया था... यही नही उन्होंने साल पहले से ही चुनाव लड़ने की अपनी तैयारी पूरी कर ली थी...वह दीपावली , होली ईद जैसे पर्वो पर लोगो केबीच जाकर अपना संपर्क बढाते रहे है जो उनका बड़ा प्लस पॉइंट है.... कार्यकर्ताओ को साथ लेकर चलते हैजिनका उनको लाभ होता दिखाई दे रहा है॥ दास ने पहले से ही अपनी मजबूत पकड़ बना ली थी॥ लखनऊ मेंउनके बड़े बड़े होअर्डिंग पहले से ही गली कूचो में दिखाई देने लगे थे... इस कारन वह दौड़ में आगे निकल गए ... अब कोई भी आज उनके आगे नही फटकता है रही बात लाल जी की तो वह लखनऊ के लिए रीता बहुगुणा, नफीसा जैसे नए नही है ... मूल रूप से वही से उनका जुडाव है ... अटल का वरद हस्त उन पर शुरू से रहा है .... अटल के सांसद प्रतिनिधि रहने के कारन उनको लखनऊ की अच्छी समझ है... लेकिन यह कह पाना मुश्किल हैक्या वोटर कल उनके साथ रहा होगा? अखिलेश दास के बारे में कहा जा रहा था उन्होंने लखनऊ में इस बार चुनावमें पानी की तरह पैसा बहाया है ... अब देखना होगा क्या लोग हाथी को लखनऊ में चडाते है या नही? वैसे बसपा केसाथ अगर इस बार दलित और ब्राह्मण साथ साथ गया तो बीजेपी की परेशानिया तेज हो जाएँगी... कांग्रेस कीरीता बहुगुणा की राह आसान नही लगती... नंदन बहुगुणा की बेटी होना उनका एक मजबूत पॉइंट है ... लेकिन यहाँ पर कांग्रेस कभी भी सही से नही उभर पायी॥ कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक उसके पाले से बीएसपीमें गया है... मुस्लिम इस बार नफीसा के साथ चले जाने से कांग्रेस की हालत पस्त हो गई है ..ऐसे में यहाँ परलड़ाई बीजेपी और बीएसपी के बीच है... नफीसा के बदले अगर यहाँ से संजू बाबा चुनाव लड़ते तो शायद नवाबो केशहर में हवा का रुख साइकिल की ओर हो सकता था... संजय के आने से लाल जी टंडन और अखिलेश का खेलबिगड़ सकता था लेकिन क्या करे सपा के हनुमान अमर सिंह के उम्मीद वार जब संजू बाबा चुनाव लड़ने के योग्यही नही रह गए... नफीसा लखनऊ में है ... पहले भी वह लोक सभा का चुनाव हार चुकी है.... ऐसे में उनके लिएलखनऊ जीतने की राह आसान नही है ... बाहरी होने का शोर कल लखनऊ में सुना जा रहा था...इस बार सपा कोबेक वर्ड क्लास के बड़े वोट से महरूम होना पड़ सकता है .... लेकिन सबसे ज्यादा चिंता की बात वाजपेयी कीखडाऊ लिए लाल जी टंडन के सामने है... उनके लिए यह लखनऊ की सीट इस बार नाक का सवाल बन गईहै....देखते है १६ मई को क्या वह वाजपेयी के साथ बीजेपी की इस सीट पर नाक बचा पाने में कामयाब हो पाते है यानही...? ...

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