सोमवार, 20 जनवरी 2014

लाइट , कैमरा, एक्शन और धरने पर 'आप '


आंदोलन चलाने  से लेकर  सरकार चलाने के चंद  दिन देखने के बाद अब आम आदमी पार्टी के भीतर के कुनबे से जिस तरह की विरोधी  आवाजें आयी हैं उससे आम आदमी  पार्टी की साख लोगो के बीच प्रभावित हो रही है । आप के विरोध में खड़े लक्ष्मी नगर से आप के विधायक  विनोद कुमार बिन्नी ने अब पैंतरा बदलते हुए केजरीवाल पर सीधा निशाना साधा है और कहा है केजरीवाल की  यह पार्टी अब आम आदमी की पार्टी नहीं बल्कि खास आदमी पार्टी बनकर  रह गई है, साथ ही उन्होंने कहा है आम आदमी पार्टी को सत्ता मिलने के बाद  आम जनता से जुड़े मुद्दे कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं । बिन्नी  ने 15 जनवरी को एक बार फिर बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। उन्होंने  केजरीवाल पर  जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया जिसके जवाब  में  केजरीवाल ने भी कहा कि पहले वह मंत्री पद मांग रहे थे और अब पूर्वी दिल्ली से लोकसभा का टिकट मांग रहे हैं। फिर क्या था  बिन्नी ने केजरीवाल को तानाशाह और धोखेबाज तक करार दे दिया।

 बिन्नी की यह बगावत आप के आतंरिक लोकतंत्र की पोल तो खोल रही है साथ में केजरीवाल को भी सीधे  निशाने पर ले रही है । बिन्नी ने केजरीवाल पर सबसे गम्भीर आरोप आप सरकार के  कांग्रेस के प्रति नरम रुख अपनाने को लेकर  लगाये है क्युक़ि  ध्यान दें तो  सत्ता में आने से  पहले  केजरीवाल ने  जहाँ भाजपा और कांग्रेस से समर्थन नहीं लेने ,ना किसी को समर्थन देने की बात दोहरायी थी  वहीँ उनके निशाने पर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित भी  थी जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के कई बड़े सबूत होने की बात केजरीवाल ने ना  केवल दोहराई थी बल्कि उनके खिलाफ घोटालो की जांच करवाने की  बात भी  बड़े मंचो  से कही थी लेकिन  आज केजरीवाल अगर विपक्षियो से ठोस सबूत लाने  की बात कर  रहे हैं तो उनकी नेकनीयती पर तो सवाल उठने लाजमी ही हैं ।वहीँ दूसरी तरफ अरविन्द यह मानते रहे है राजनीती में शुचिता और ईमानदारी लाना उनके हर विधायक का मकसद ना केवल इस दौर में है बल्कि स्वराज को आम आदमी तक पहुचाने में उनका हर कार्यकर्ता कंधे  से कन्धा मिलाकर चलेगा । लेकिन हाल के समय में घटित हुआ  बिन्नी  प्रकरण उनके दावो की पोल खोलने के साथ ही बिन्नी की मंत्री पद पाने  की लालसा को भी उजागर करता है ।

  रामलीला  मैदान में शपथ  ग्रहण से ठीक पहले भले ही बिन्नी के साथ मान मनोव्वल के बाद मामला शांत हो गया था   लेकिन सरकार  बनने  के बीस दिन बाद फिर  उनके बगावती तेवर आप की साख पर तो असर छोड़ते है साथ ही लोगो में उसकी विश्वसनीयता  को लेकर  भी  गम्भीर  सवाल  उठाते हैं । हाल के दिनों में आप के कई निर्णयो में भारी अंतर्विरोध देखने को मिले हैं जिसके बाद से यह सवाल भी बड़ा हो चला  है आने वाले दिनों में यह पार्टी किस राह पर चलेगी  जिसमे देश की अर्थ नीति से लेकर  आंतरिक सुरक्षा सरीखे मसले शामिल हैं ही साथ ही कॉर्पोरेट घरानो को लेकर आप की  नीति क्या रहेगी यह भी  आप की बड़ी पहेली होगी  और इन  सबके बीच आप के हर विधायक और नेता आये दिन किसी न किसी मसले पर घिरते ही जा रहे हैं ।

 केजरीवाल सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री राखी बिड़ला एक कार्यक्रम में जब कुछ दिनों पहले पहुंची  तो वहां उनकी गाड़ी के शीशे पर बच्चे की गेंद लग गई जिससे कार का शीशा टूट गया ।  इस घटना को उन्होंने अपने ऊपर हमले के रूप में पेश किया और थाने में केस दर्ज करा दिया जबकि  बच्चे की गेंद उनकी कार के शीशे पर लगी थी । इस घटना में भी केजरीवाल ने राखी का खूब पक्ष लिया था ।  वहीँ  केजरीवाल मंत्रिमंडल में स्वास्थ्य मंत्री  सत्येंद्र जैन ने सरकारी अस्पतालो के ताबड़तोड़ दौरे कर पहले मीडिया की खूब वाह वाही बटोरी लेकिन  जनकपुरी के एक अस्पताल के बाहर  एक नवजात को फेंकने का मामला सामने जब आया और मीडिया ने  कार्रवाई को लेकर सवाल पूछे  तो वह झल्ला गए और उन्होंने कहा कि यह मामला निजी अस्पताल का है,  इसके बाद भी  केजरीवाल ने उनका खूब बचाव किया । 

                     आम आदमी पार्टी में दिल्ली की सत्ता पाने के बाद एक  ख़ास बदलाव देखने को आया है । जहाँ पहले आप से जुड़ने वाले लोगो की संख्या कम थी वहीँ दिल्ली में चमत्कारिक जीत के बाद आप के कार्यकर्ता  तो उत्साहित हुए  ही पूरे देश और विदेश से उससे जुड़ने वाले सदस्य बढ़ते  गए शायद इसकी बड़ी वजह यह रही जनता केजरीवाल से बहुत उम्मीदें पालने लगी । इस  अति उत्साह में   आप ने जहाँ  लोक सभा की  सभी सीटो पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर डाला वहीँ आम जनता के लिए सचिवालय के दरवाजे इस तरह खोल दिए कि  कैबिनेट मंत्री सड़क पर जनता की समस्याएं सुनने बैठने लगा । खुद मुख्यमंत्री ने आनन फानन में जनता दरबार लगाने की घोषणा कर डाली लेकिन पहली बार जनता दरबार में  मची मारामारी के चलते जनता दरबार के अपने प्रोग्राम को ही अब  स्थगित करवा दिया । 

 दिल्ली में सरकार  बनाये जाने के बाद आप में  अलग अलग  विचारधारा से जुड़े लोगो का  संगम जुड़ना शुरू हुआ है। जहाँ भाजपा और कांग्रेस से नाराज एक बड़ा वोटर केजरीवाल में नायक -2  का अक्स देखने लगा वहीँ सामाजिक कार्यकर्ताओ से लेकर समाजवादी, कॉर्पोरेट से लेकर एक्टिविस्ट हर तरह का तबका केजरीवाल को  करिश्माई तुर्क मानने लगा ।  पार्टी में शामिल होने के बाद उनके सुर भी कई मौको पर बेमेल दिखायी दिए । मसलन प्रशांत भूषण को ही लें उन्होंने कई मौको पर कश्मीर को लेकर जनमत संग्रह कराने का पुराना मसला फिर से उठाया तो वहीँ मल्लिका साराभाई ने बड़बोले कुमार विश्वास को  अपरिपक्व  तक कह डाला  ।

 कुमार  विश्र्वास ने औरतों, अल्पसंख्यकों और समलैंगिक महिलाओं के लिए जिस तरह की शब्दावली  का प्रयोग किया उस पर  साराभाई ने कड़ा ऐतराज जताया ।  वहीँ  विश्‍वास की मलयाली नर्सों पर 6 साल पहले की गई अभद्र टिप्‍पणी पर  उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज करने की मांग  की गई है तो हाल ही में 'आप' के साथ जुड़ने वाली मलयाली लेखिका सारा जोसफ ने भी इस मुद्दे पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्‍व से जवाब माँगा है  । इसके अलावा हाल ही में पार्टी में शामिल हुए कैप्टन गोपीनाथ ने भी दिल्ली सरकार के उस फैसले पर सवाल उठाये जिसमे केजरीवाल ने खुदरा में शीला सरकार के निर्णय को  ही पलट दिया था । यह मामला अभी शांत ही हुआ था कि अब आप फिर से नई  मुश्किलो में घिर गई है ।  आम आदमी पार्टी और पुलिस अधिकारियो के बीच विवाद ने इन दिनों दिल्ली की राजनीती में भूचाल ला दिया है ।

 आम आदमी पार्टी  की सरकार और दिल्ली पुलिस में इस कदर ठनी हुई है अब दिल्ली में केजरीवाल अपने कैबिनेट मंत्रियो के लाव लश्कर के साथ रेल भवन के सामने  धरने पर बैठ   गए हैं । यह पहला मौका है जब पहली बार कोई मुख्यमंत्री इस तरह सरकार का मुखिया होने के बावजूद अपनी मांगें मनवाने के लिए अनशन पर बैठा है । सरकार बनने के बाद जिस तरह आप के दो कैबिनेट मंत्रियो की पुलिस अधिकारियो के साथ तकरार बढी उसने आप के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े किये हैं । सवाल उस पुलिस को लेकर भी है जिसकी कार्यशैली हमेशा से विवादो में रही है और जो केंद्र सरकार के अधीन रहकर काम करती आयी है । । कुछ दिनों पहले दिल्ली सरकार के कानून मंत्री सोमनाथ भारती,  महिला एवं बाल विकास मंत्री  राखी बिड़ला   और दिल्ली पुलिस के अधिकारियो की नोक  झोक हुई उसने आप की राजनीती को एक बार फिर लाइट , कैमरा  और एक्शन मॉड  में लाकर खड़ा कर दिया है ।

 दरअसल पूरे प्रकरण पर दो कैबिनेट मंत्री और पुलिस आमने सामने हैं । पेशे से वकील और केजरीवाल सरकार में कानून मंत्री सोमनाथ भारती पर सबूत से छेड़छाड़ और गवाहों को प्रभावित करने का एक आरोप तो पहले से ही लगा हुआ है  । अब  सोमनाथ भारती का एक नया मामला  मालवीय नगर के एस एच ओ से जुड़ गया है  ।  भारती पर आरोप है कि उनके नेतृत्व में कुछ लोगों के समूह ने अफ्रीकी महिलाओं के घर पर रात  में छापा मारा। भारती का आरोप था कि  यह महिलाएं वेश्यावृत्ति में लिप्त हैं ।दिल्ली के क़ानून मंत्री सोमनाथ भारती ने पिछले हफ्ते दिल्ली पुलिस से दक्षिणी दिल्ली के एक घर पर यह  कहकर छापा मारने की मांग की थी कि वहां वेश्यावृत्ति   ड्रग्स  का धंधा होता है।

  सोमनाथ भारती ने कहा था कि दक्षिण दिल्ली के  इलाक़े में लोग  सेक्स रैकेट चलने की शिकायत उनसे कई दिनों से कर रहे थे ।  जिसके बाद वह  अपने कुछ कार्यकर्ताओं के साथ वहां पहुंचे थे और उन्होंने कुछ ग़लत होते देखा।  बाद में उस घर में रहने वाली महिलाओं और दूसरे अफ़्रीकी मूल के उनके कई साथियों ने यह  आरोप लगाया कि मंत्री के साथियों ने औरतों के साथ अभद्र व्यवहार किया । भारती के अनुसार उनके बार-बार कहने के बाद भी दिल्ली पुलिस ने लोगों की तलाशी नहीं ली और उन्हें जाने दिया जिसके बाद से विवाद गरमाया  हुआ है  तो वहीँ राखी बिडला का मामला  एक विवाहिता को ससुराल में जलाकर  मारने की कोशिश का रहा जिसकी सूचना  उन्हें सम्बंधित इलाके के लोगो से मिली और  लाव लश्कर के साथ अपने कार्यकर्ताओ को साथ लेकर उन्होंने भी  सीधे पुलिस को कार्यवाही करने को कहा जिस पर पुलिस मूक दर्शक बनी रही ।

 अब  मौके की  नजाकत समझते हुए मुख्यमंत्री  केजरीवाल ने भी मोर्चा खोल दिया है ।  पूरी दिल्ली सरकार धरने पर बैठ गई है । दिल्ली पुलिस के पांच अधिकारियो के ख़िलाफ़ कार्रवाई की मांग को लेकर सोमवार से धरने पर बैठे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा है कि पुलिस की मिलीभगत  के बिना  दिल्ली  में कोई भी  बड़ा अपराध नहीं हो सकता । दिल्‍ली पुलिस को केंद्र के बजाय दिल्‍ली सरकार के अधीन किए जाने की मांग को लेकर दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा आंदोलन किए जाने से दिल्ली की सियासत का पारा ठण्ड में   भी सातवें आसमान पर इन दिनों चढ़ा हुआ है । 

भले ही  केजरीवाल इसे आजादी की दूसरी लड़ाई नाम दे रहे हो लेकिन इस घटना ने एक सरकार के आंदोलनकारी चेहरे को एक बार फिर ना केवल उजागर किया है बल्कि यह सवाल भी उठाया है सरकार और दिल्ली पुलिस के बीच खेले जा रहे इस टी ट्वेंटी मुकाबले में आम जनता ही पिस  रही है और अपराधो के ग्राफ में इजाफा हो रहा है । आने वाले दिनों में आप की यह आंदोलनकारी और एक्टिविस्ट शैली  उसे कहाँ तक ले जायेगी फिलहाल कह  पाना मुश्किल है ?

रविवार, 12 जनवरी 2014

आज भी प्रासंगिक है विवेकानंद का जीवन दर्शन


(12 जनवरी जन्म दिन पर विशेष)

भारत के कण कण में कभी देवो का वास था और यहाँ की धरा को कभी  सोने की चिड़िया  भी  कहा जाता था ।  इसी धरा को कई महापुरुषों  ने अपने जन्म से धन्य  किया है ।  त्याग, सहनशीलता, गुरु भक्त और देशभक्त  सरीखे गुणों से युक्त महापुरुष इतिहास के  किसी भी कालखंड में मिलना मुश्किल हैं लेकिन विवेकानन्द जिन्हें उस दौर में नरेन्द्रनाथ नाम से पुकारा जाता था एक ऐसा नाम है जिन्होंने  करिश्माई व्यक्तित्व के किरदार को एक दौर में जिया । आज भी लोग गर्व से उनका नाम लेते हैं और युवा दिलो में  वह  एक आयकन  की भांति बसते हैं ।   इतिहास के पन्नो में विवेकानंद का दर्शन उन्हें एक ऐसे महाज्ञानी व्यक्तित्व के रूप में जगह देता है जिसने अपने ओजस्वी विचारो के द्वारा दुनिया के पटल पर भारत का नाम बुलंदियों के शिखर पर पहुँचाया । उनके द्वारा दिया गया वेदान्त दर्शन भारतीय  दर्शन की एक अनमोल धरोहर है ।
                  

विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में विश्वनाथ और भुवनेश्वरी  देवी के घर हुआ था । बचपन में नरेन्द्रनाथ नाम से जाने जाने वले विवेकानंद काफी चंचल प्रवृति के थे । उनकी माता भगवान की अनन्य उपासक थी लिहाजा माँ के सानिध्य में वह भी ईश्वर प्रेमी हो गए । बचपन में विवेकानंद की माँ इन्हें रामायण की कहानी सुनाती  थी तो इसको यह बड़ी तन्मयता से सुनते थे । रामायण में हनुमान के चरित्र ने उस दौर में इनके जीवन को खासा प्रभावित किया ।   साथ ही अपनी माँ  की तरह वह भी शिवशंकर के अनन्य भक्त हो गए । कई बार वह शिव से सीधा साक्षात्कार करते मालूम पड़ते थे और अपनी माँ से कहा करते कि  उनमे शंकर का वास है । यह सब सुनकर इनकी माँ चिंतित हो उठती कि उनका यह बेटा कहीं बाबा सन्यासी ना बन जाए । बचपन से ही नरेन्द्रनाथ पढाई  लिखाई  में रूचि लेने लगे । पढाई  में यह अव्वल दर्जे के छात्र थे इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है जो चीज एक बार यह पढ  लेते उसे कभी भूलते नहीं थे । 


 गुरुजनों के प्रति इनका सम्मान उस दौर में भी देखते ही बनता था । बड़े होने पर भी गुरु से इनका लगाव बना रहा । विवेकानंद का मानना था कि जीवन में सफल होने के लिए अच्छा  गुरु मिलना जरुरी है क्युकि  गुरु ही अन्धकार से ज्ञान के प्रकाश की तरफ ले जाता है । बचपन से ही गुरु के अलावे आध्यात्मिक  चीजो की तरफ इनका  झुकाव  हो गया और इसी दौरान मुलाकात  राम कृष्ण परमहंस से हुई जिन्होंने इन्हें अपना मानस पुत्र घोषित कर दिया ।  परमहंस की दी हुई हर शिक्षा को विवेकानंद ने अपने जीवन में ना केवल उतारा  बल्कि लोगो को भी इसके जरिये कई सन्देश दिए जिसने आगे बदने की राह खोली ।  


जीवन के अंतिम पडाव पर परमहंस सरीखे गुरु ने जब विवेकानंद को अपने पास बुलाया और कहा  अब मेरे जाने की घड़ी  आ गई है तो विवेकानंद बड़े भावुक हो गए लेकिन परमहंस  गुरु ने जनसेवा का जो गुरुमंत्र इन्हें दिया उसका प्रचार , प्रसार विवेकानंद ने देश , दुनिया में किया । विवेकानंद युवा तरुणाई पर भरोसा करते थे और ऐसा मानते थे अगर कुछ नौजवान उनको मिल जाएँ तो वह पूरी मानव जाति  की सोच को बदल सकते हैं । उनका जन्मदिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाए जाने का प्रमु्ख कारण उनका दर्शन, सिद्धांत,  विचार और उनके आदर्श हैं, जिनका उन्होंने स्वयं पालन किया और भारत के साथ अन्य देशों में भी उन्हें स्थापित किया। उनके ये विचार और आदर्श युवाओं में नई शक्ति और ऊर्जा का संचार कर सकते हैं।



किसी भी देश के युवा उसका भविष्य होते हैं। उन्हीं के हाथों में देश की उन्नति की बागडोर होती है। आज देश में  भ्रष्टाचार का बोलबाला है जो घुन बनकर देश को अंदर ही अंदर खाए जा रहे हैं। ऐसे में देश की युवा शक्ति को जागृत करना और उन्हें देश के प्रति कर्तव्यों का बोध कराना अत्यंत आवश्यक है। ऐसे माहौल में  विवेकानंद का  जीवन  दर्शन   युवाओ को एक नई  राह दिखा सकता है । विवेकानंद जी के विचारों में वह  तेज है जो सारे युवाओं को नई  दिशा दे सकता है   हैं । वह  आध्यात्मिक संत थे। उन्होंने सनातन धर्म को गतिशील तथा व्यावहारिक बनाया और सुदृढ़ सभ्यता के निर्माण के लिए आधुनिक मानव से विज्ञान व भौतिकवाद को भारत की आध्यात्मिक संस्कृति से जोड़ने  किया शायद   यही  वजह है भारत में स्वामी विवेकानंद के जन्म दिवस को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

स्वामी विवेकानंद की ओजस्वी वाणी भारत में तब उम्मीद की किरण लेकर आई जब हम अंग्रेजों के जुल्म सह रहे थे। हर तरफ  निराशा का माहौल देखा जा सकता    था  उन्होंने भारत के सोए हुए जनमानस  को जगाया और उनमें नई उमंग का संचार  किया।विवेकानंद वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बहुत महत्व देते थे। वह शिक्षा और ज्ञान को आस्था की कुंजी मानते हैं। 1897 में मद्रास में युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था 'जगत में बड़ी-बड़ी विजयी जातियां हो चुकी हैं। हम भी महान विजेता रह चुके हैं। हमारी विजय की गाथा को महान सम्राट अशोक ने धर्म और आध्यात्मिकता की ही विजयगाथा बताया है और अब समय आ गया है भारत फिर से विश्व पर विजय प्राप्त करे। यही मेरे जीवन का स्वप्न है और मैं चाहता हूं कि तुम में से प्रत्येक, जो कि मेरी बातें सुन रहा है, अपने-अपने मन में उसका पोषण करे और कार्यरूप में परिणत किए बिना न छोड़ें


11 सितम्बर  1893 का दिन इतिहास में  अमर है  । इस दिन अमेरिका में विश्व धर्म सम्मलेन का आयोजन किया जिसमे दुनिया के कोने कोने से लोगो ने शिरकत की । उस दौर में भारत के प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी इन्ही के कंधो पर थी । गेरुए कपडे पहने विवेकानन्द ने  अपनी वाणी से वहां पर मौजूद जनसमुदाय को मंत्र मुग्ध कर दिया ।  जहाँ सभी अपना भाषण   लिखकर लाये थे  वहीँ विवेकानंद ने अपना मौखिक भाषण दिया । दिल से जो निकला वही बोला और जनसमुदाय के अंतर्मन को मानो  झंकृत ही कर डाला । उनके शालीन अंदाज ने लोगो  को  उन्हें सुनने को मजबूर कर दिया ।  धर्म की  व्याख्या  करते हुए वह बोले जैसे सभी नदियां  अंत में समुद्र में जाकर मिलती है वैसे ही  वैसे ही दुनिया में अलग अलग धर्म अपनाने वाले मनुष्य को एक न एक दिन  ईश्वर  की शरण में   जाकर ही लौटना पड़ता है ।

 संसार में कोई  धर्म  न बड़ा है और ना ही छोटा । इस तरह उन्होंने यह कहा संसार के सभी धर्म समान है उनमे किसी भी तरह का भेद नहीं है । इस प्रकार उन्होंने अपने ओजस्वी विचारों के जरिये हिंदुत्व की नई परिभाषा उस दौर में गड़ने का काम किया ।प्रसिद्ध भारतीय साहित्य के प्रथम नोबलिस्ट गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर भी विवेकानंद से प्रभावित थे। उन्होंने कहा था यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए। उनमें आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएँगे, नकारात्मक कुछ भी नहीं। भारत को विदेशों में प्रतिष्ठा दिलाने में विवेकानंद प्रथम थे। 


उनसे प्रभावित पश्चिमी लेखक रोमां रोलां का यह कथन रोमांचित करता है‘उनके द्वितीय होने की कल्पना करना भी असंभव है। वे जहाँ भी गए, सर्वप्रथम हुए। हर कोई उनमें अपने नेता का दिग्दर्शन करता। वे ईश्वर के प्रतिनिधि थे और सब पर प्रभुत्व प्राप्त कर लेना ही उनकी विशिष्टता थी। स्वामी विवेकानंद के उपदेशात्मक वचनों में  कहते थे “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।”इसके माध्यम से उन्होंने देशवासियों को अंधकार से बाहर निकलकर ज्ञानार्जन की प्रेरणा दी थी ।



17 सितम्बर 1893 को शिकागो में धर्म सभा में उन्होंने भारत को "हिन्दू राष्ट्र " के नाम से सम्बोधित किया और स्वयं के "हिन्दू होने पर गर्व " महसूस किया | उन्होंने सभा को बताया  हिन्दू धर्म पर प्रबंध  ही हिन्दुत्व की राष्ट्रीय परिभाषा है | इसे समझने पर हमें हमारे विशाल देश की बाहरी विविधता में  एकता के दर्शन होते हैं |शिकागो से वापसी पर उन्होंने कहा केवल अंध देख नहीं पाते और विक्षिप्त बुद्धि समझ नहीं पाते कि यह सोया देश अब जाग उठा है |अपने पूर्व गौरव को प्राप्त करने के लिए इसे अब कोई नहीं रोक सकता | उन्होंने सभी हिन्दुओं को सब भेदों से ऊपर उठकर अपनी राष्ट्रीय पहचान पर गर्व करने का ककहरा  ना  केवल सुनाया  बल्कि दुनि या  में  भारत  के नाम के झंडे  गाड़  दिए ।  


भारत वर्ष के सन्दर्भ में उन्होंने कहा  भारत  पवित्र भूमि है,भारत मेरा तीर्थ है,भारत मेरा सर्वस्व है,भारत की पुण्य भूमि का अतीत गौरवमय है यही वह भारत वर्ष है जहाँ मानव,प्रकृति एवं अंतर्जगत की रहस्यों की जिज्ञासाओं के अंकुर पनपे थे | उन्होंने कहा था चिंतन मनन कर राष्ट्र चेतना जाग्रत करो लेकिन आध्यात्मिकता का आधार न छोडो | उनका  मत था कि पाश्चात्य जगत का अमृत हमारे लिए विष हो सकता है | युवाओं का आह्वान करते हुए स्वामी जी कहा करते थे भारत के राष्ट्रीय आदर्श सेवा व त्याग हैं | नैतिकता ,तेजस्विता,कर्मण्यता का अभाव न हो | उपनिषद ज्ञान के भंडार हैं ,उनमे अद्भुत ज्ञान शक्ति है ,उसका अनुसरण कर अपनी निज पहचान व राष्ट्र का अभिमान स्थापित करो |



जिस समय शिकागो में 1893 में धर्म सम्मलेन हुआ ,उस समय पाश्चात्य जगत भारत को हीन द्रष्टि से देखता था |वहां के लोगों ने बहुत प्रयास किया कि विवेकानंद को सर्व धर्म परिषद् में बोलने का समय ही ना मिले, मगर एक अमेरिकी प्रोफ़ेसर के प्रयास से उन्हें थोडा समय मिला |   भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जायेगा  कहकर स्वामी जी ने पुन: भारत को विश्व गुरु पद पर प्रतिष्ठित कर दिया |गुरुदेव रविंदर नाथ टैगोर  ने  विवेकानन्द  के बारे में कहा   है यदि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद को पढ़िए। 

 मद्रास की एक सभा को संबोधित करते हुए  स्वामीजी ने कहा  भारत की समस्या अन्य देशों की समस्याओं की तुलना से ज्यादा  पेचीदा है। जात, धर्म, भाषा, सरकार ये सब मिलकर राष्ट्र बनता है। फिर भारत जैसे राष्ट्र का एक अनोखा इतिहास है जहां आर्य, द्रविड़, मुसलमान मुगल एवं यूरोपीय साथ-साथ बसते हैं। बावजूद हमारे में एक पवित्र बंधन, पवित्र परम्परा रह  1894 में न्यूयार्क में उन्होंने वेदांत सोसाईटी बनाई|

 1896 की  विदेश यात्रा के बाद विवेकानंद ने पुरे देश का दौरा किया | उन्होंने कहा एक शताब्दी के ब्रिटिश शासन ने जो आघात किया है उतना अब तक के कोई आक्रान्ता नहीं कर पाए | भारत के मन को तोड़ने का कार्य ब्रिटिश लेखकों ,शिक्षाविदों ने सफलता पूर्वक किया |  स्वामी विवेकानंद ने बार-बार कहा कि भारत के पतन का कारण धर्म नहीं है अपितु धर्म के मार्ग से दूर जाने के कारण ही भारत का पतन हुआ है | जब जब हम धर्म को भूल गए तभी हमारा पतन हुआ है और धर्म के जागरण से ही हम पुनह नवोत्थान की और बढे हैं | वहीँ 1900 की शुरुवात में सेन फ्रांसिस्को में भी इसकी एक शाखा खोली ।

   भारत आकर रामकृष्ण मिशन की स्थापना भी इनके  प्रयासों से ही हुई । इस दरमियान धर्म के प्रचार और प्रसार के लिए कई दौरे भी  किये  जहाँ अपने वेदांत दर्शन के जरिये उन्होंने लोगो की सोच बदलने का काम सच्चे अर्थो में किया । विवेकानन्द  के द्वारा दिया गया वेदान्त दर्शन एक अनमोल धरोहर है । विवेकानन्द एक कर्मशील व्यक्ति थे और अपने विचारो के जरिये उन्होंने समाज के सोये जनमानस को जगाने का काम किया ।  वह मानते थे प्रत्येक व्यक्ति में अच्छे आदर्शो  और भाव का समन्वय होना जरुरी है साथ ही शिक्षा को परिभाषित करते हुए यह कहा अपने पैरो पर खड़ा होने जो चीज सिखाये वह शिक्षा है ।

  स्वामी विवेकानन्द का लक्ष्य समाज सेवा, जनशिक्षा, धार्मिक पुनरूत्थान और शिक्षा के द्वारा जागरुकता लाना, मानव की सेवा आदि था। विश्व कवि रवीन्द्र नाथ टैगोर का कहना था- भारत को समझना है तो उसे स्वामी विवेकानन्द का जीवन दर्शन समझना होगा। स्वामी विवेकानन्द के शैक्षिक चिंतन में शुद्धता और शक्ति को आत्मसात करना है। अपने शैक्षिक चिंतन के आधार पर भारतीय संस्कृति की ख्याति यूरोप और अमेरिका में फैलाने में वे सफल हुए थे। उनका कहना था कि भारत में शिक्षा के प्रसार के फलस्वरूप समाज शास्त्रीय अर्थपूर्ण सामाजिक गतिशीलता नहीं आ पाई है।

 वह भारतीय समाज का पूरी तरह सुधार चाहते थे। उन्होंने ऐसे भारत की कल्पना की जो अंध विश्वास, पाखंड, अकर्मण्यता, जड़ता और आधुनिक सनक और कमजोरियों से स्वतंत्र होकर आगे बढ़ सके। विवेकानन्द ने वेदांत को नया रूप देकर उसे मोक्ष में बदलने का काम सही मायनों में करके दिखाया । 4 जुलाई 1902 को उनका देहावसान हो गया । विवेकानन्द को  आज हम इस रूप में याद करे कि  उनके द्वारा दिया गया दर्शन हम अपने में आत्मसात करें, साथ ही अपने जीवन में कर्म को प्रधानता दें तो कुछ बात बनेगीं  । बेहतर होगा युवा पीड़ी उनके विचारो से कुछ सीखे  और उनको आयकन बनाने के बजाए उनकी शिक्षा को अपने में उतारे और प्रगति पथ पर चले ।

मंगलवार, 7 जनवरी 2014

"भगवा" कूचे में येदियुरप्पा की दस्तक



जिस समय भाजपा अपने चुनावी प्रबंधको को साथ लेकर "आप "की  रेड कार्पेट का तोड़ ढूंढने में लगी हुई थी   उसी समय भाजपा की कर्नाटक इकाई बेंगलूरु   में  अपने राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार और राज्य इकाई अध्यक्ष प्रहलाद जोशी के साथ अपने बिछड़े साथी और पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा  की भाजपा में विलय की पटकथा  लिख रही  थी  । बहुप्रतीक्षित विलय की पटकथा  ठीक उस समय लिखी गई, जब कर्नाटक भाजपा के प्रतिनिधिमंडल ने येदियुरप्पा से विलय के निमंत्रण के लिए मुलाकात की। इस  आमंत्रण को उन्होंने सहर्ष  स्वीकार  करते हुए केजीपी के भाजपा में  विलय के फैसले पर  अपनी हामी भरने में देरी नहीं लगायी । हमेशा अपनी शर्तो के आसरे  कर्नाटक  में  सियासत करने वाले येदियुरप्पा इस बार खामोश नजर आये ।  शायद इसकी बड़ी वजह कर्नाटक  में  उनकी पार्टी केजीबी का बुरा हश्र हो , लेकिन "नमो" को प्रधानमंत्री बनाने के संकल्प के साथ उन्होंने  अपनी पार्टी केजेपी का भाजपा में विलय कर  ही दिया। दक्षिण में भाजपा की पहली सरकार बनवाने में अहम भूमिका निभाने वाले येद्दयुरप्पा की वापसी के लिए आधार पहले ही तैयार हो गया था।

दरअसल, विधानसभा चुनाव में उनकी  पार्टी की करारी हार ने  येदियुरप्पा की भावी राजनीती पर ग्रहण सा लगा दिया था और उसी समय से उन्होंने "नमो मंत्र" की माला जपनी शुरू कर दी थी जिसके बाद मोदी की तारीफो में कसीदे पड़कर चीजो को अपने पक्ष में करने की कोशिशे कर्नाटक में तेज हो गयी थी लेकिन भ्रष्टाचार के मसले पर कोई समझौता  ना करने वाली   भाजपा को  लिंगायत वोट बैंक के चलते अब येदियुरप्पा   की सेवाएं लेने को मजबूर होना पड़  रहा है  । भाजपा के शीर्ष  नेतृत्व को भी  जल्द यह महसूस हो गया  कि प्रभावी लिंगायत समुदाय के सर्वमान्य  नेता के रूप में येद्दयुरप्पा ही  राज्य में भाजपा का आधार बढ़ा सकते हैं। भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद उन्हें  दो बरस पहले मुख्यमंत्री पद से हटाया गया था। बाद में नाराज येद्दयुरप्पा ने पार्टी छोड़ दी थी जिसके बाद उन्होंने अपनी खुद की पार्टी बनायी और कर्नाटक के विधान सभा चुनावो में महज छह  सीटें पायी लेकिन भाजपा के खेल को उन्होंने पूरी तरह बीते बरस ख़राब कर दिया था । राज्य इकाई की ओर से भी केंद्रीय नेतृत्व को आशंका जताई गई थी कि विधानसभा चुनाव की तर्ज पर ही अगर दोनों पार्टिया चुनाव लड़ी  तो लोकस भा चुनाव में भी भाजपा का सूपड़ा साफ़ हो सकता है लिहाजा पार्टी ने अपने मिशन 272 के तहत उनको साथ लेने की ठानी ।वैसे भी पिछले लोक सभा चुनाव में  राज्य में येदियुरप्पा  की मदद से  ही भाजपा ने 18 सीटें जीती थी ।

 येदियुरप्पा को समझने के लिए हमें   बीते दो बरस की तरफ रुख करना होगा जब उन्होंने   भाजपा की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा  30 नवम्बर ,2011   को ही दे दिया था लेकिन  उन्होंने अपनी खुद की पार्टी ' कर्नाटक जनता पार्टी ' को राज्य  के सियासी अखाड़े में उतारकर पहली बार आरएसएस और भाजपा की ठेंगा दिखाते हुए भाजपा को येदियुरप्पा होने के मायने बता दिए ।

                 भाजपा में येदियुरप्पा अपने को  पद से हटाए जाने के बाद से लगातार अपने को असहज महसूस कर रहे थे और समय समय पर  संगठन को पार्टी छोड़ने की घुड़की देते रहते थे ।सदानंद गौड़ा के राज्य के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद पार्टी ने येदियुरप्पा के कहने पर राज्य के विधान सभा अध्यक्ष जगदीश  शेट्टार को  12 जुलाई  2012  में मुख्यमंत्री पद के लिए प्रमोट किया लेकिन येदियुरप्पा की दाल उनके साथ भी नहीं गल पाई  क्युकि  सत्ता सुख भोगते भोगते येदियुरप्पा की पार्टी में  ठसक  लगातार  बढती  ही गई और आये दिन वह आलाकमान के सामने अपनी मांगे मनवाने के लिए अपना शक्ति  प्रदर्शन करते रहते थे । यही वजह थी उन्हें पार्टी में मुख्यमंत्री पद से इतर कोई पद नहीं चाहिए था । औरंगजेब  की बीजापुर और गोलकुंडा विजय ने दक्षिण भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना का रास्ता तैयार किया  था  इसी तर्ज पर कर्नाटक  में कमल खिलाने में येदियुरप्पा की भूमिका किसी से छिपी नहीं थी लिहाजा    पार्टी ने येदियुरप्पा को मनाने की लाख कोशिशे की लेकिन मोहन भागवत  से लेकर सुरेश सोनी और अरुण जेटली से लेकर वेंकैया नायडू सबका प्रबंधन डेमेज कंट्रोल के लिए काम नहीं आ सका । रही सही कसर उनके धुर विरोधी रहे भाजपा   राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार ने पूरी कर दी जिन पर येदियुरप्पा सरकार को अस्थिर करने के आरोप उस दौर में लगे जिनका येदियुरप्पा के साथ खुद छत्तीस  का आंकड़ा जगजाहिर रहा।

 कर्नाटक  की पूरी राजनीती वोक्कलिक्का और लिंगायत के इर्द गिर्द ही घूमती  है जिसमे लिंगायत की बड़ी महत्वपूर्ण  भूमिका है । जहाँ  एक दौर  में  विधान सभा चुनावो में इसी लिंगायत समूह के व्यापक समर्थन के बूते येदियुरप्पा के मुख्यमंत्री बनने  का रास्ता साफ़ हुआ था वहीँ  जब येदियुरप्पा द्वारा शेट्टार को नया मुख्यमंत्री बनाया गया था तो वह भी उनकी बिरादरी से ही ताल्लुक रखते थे । आने वाले लोक सभा  चुनाव में यही लिंगायत वोट एक बार फिर हार जीत के समीकरणों  को प्रभावित करेंगे ।  कर्नाटक में   येदियुरप्पा के प्रभाव को हम नकार नहीं सकते ।   राज्य  की तकरीबन 7 करोड़ की आबादी में लिंगायतो की तादात 17 फीसदी है तो वहीँ वोक्कलिक्का 15 फीसदी  हैं जिन पर येदियुरप्पा की सबसे मजबूत पकड़ है । गौर करने लायक बात यह होगी कर्नाटक के आने वाले  चुनावो में इन दोनों समुदायों का कितना समर्थन भाजपा में वापस आने  के बाद येदियुरप्पा अपनी पार्टी के  लिए जुटा  पाते हैं ।

                      हालाँकि कुछ समय पूर्व येदियुरप्पा  की  कांग्रेस  में शामिल होने की अटकले भी मीडिया में खूब चली क्युकि  भाजपा से नाराज येदियुरप्पा ने  कई मौको पर जहाँ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और उनकी पार्टी के  विषय में तारीफों  के पुल  बांधे वहीँ बीते बरस सोनिया की येदियुरप्पा के गुरु से हुई मुलाकात के राजनीतिक गलियारों में  कई  सियासी अर्थ निकाले  जाने लगे थे लेकिन येदियुरप्पा अपने संगठन  के बूते कर्नाटक की सियासत में अपना खुद का मुकाम बनाना चाहते थे जो भाजपा और कांग्रेस से इतर एक अलग दल के रूप में ही  उन्हें नजर  भी आया लेकिन कर्नाटक सरीखे बड़े दक्षिण के दुर्ग में के जी पी की करारी हार के बाद येदियुरप्पा बैक फुट  पर चले गये जिसके बाद से वह सार्वजनिक मंचो से नमो नमो का गान करते रहे । भाजपा से बाहर  रहकर भी उन्होंने  प्रधानमंत्री पद के लिए नमो को अपना पूर्ण समर्थन देने और तन , मन ,धन न्योछावर करने की घोषणा की जिसके बाद से ही उनकी पार्टी में वापसी की अटकलें तेज हो गई थी  । 

                             राजनीती  संभावनाओ का खेल है । यहाँ किसी भी पल कुछ भी संभव हो सकता है । इसी सियासत के अखाड़े में बगावत और फिर वापसी  की भी पुरानी  अदावत  रही हैं । कर्नाटक की राजनीती में येदियुरप्पा का एक बड़ा नाम है  उनका साथ भाजपा  को फिर  मिलने से आने वाले  लोक सभा चुनावो में भाजपा जरुर कुछ उम्मीद कर सकती है लेकिन भ्रष्टाचार के जिस आरोप के चलते उनकी कुर्सी गई उससे पार्टी की साख पर जो बट्टा लगा उसकी भरपाई  इतनी आसान होती हो कम  से कम  हमें नहीं दिखायी देती ।   पार्टी छोड़ते समय येदियुरप्पा की आंखो से आंसू जरुर छलके  लेकिन उनकी समझ में यह नहीं आया कि  उनकी कुर्सी भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते चली गई । इसके बाद उत्तराखंड में घोटालो की गंगा बहाने के आरोप  ने  रमेश पोखरियाल "निशंक" की भी उत्तराखंड के  मुख्यमंत्री पद से विदाई कराई थी । रेड्डी बंधुओ को  लाभ  पहुचाने के आरोप में लोकायुक्त जस्टिस  संतोष हेगड़े  की एक रिपोर्ट ने  कर्नाटक  में खनन के कारपोरेट गठजोड़ को न केवल सामने ला दिया बल्कि इसमें सीधे तौर पर येदियुरप्पा के साथ रेड्डी  बंधुओ  को कठघरे में खड़ा किया ।  येदियुरप्पा पर अपने रिश्तेदारो को सरकारी जमीन सस्ते में अलॉट करने , अपनी करीबी मंत्री शोभा करंदलाजे  को एक बिल्डर से  छह  करोड़ रुपये दिलवाने और खनन लाबी से अपनी " प्रेरणा एजुकेशन सोसाइटी" के लिए बीस करोड़ रुपये की रिश्वत के आरोप लगे जिनकी जांच अभी भी जारी है ।   इसी के साथ  येदियुरप्पा की  भावी राजनीती पर ग्रहण लग गया । अपने  दामन  को पाक साफ़ बताने वाले येदियुरप्पा  शायद यह भूल गए राजनीती जज्बातों से नहीं चलती । वह पार्टी के वफादार सिपाही जरुर थे लेकिन इसका यह मतलब नहीं था पार्टी उन्हें करोडो के वारे न्यारे करने की खुली छूट देती ।
    
                       बहरहाल यह कोई पहला मौका नहीं है जब सियासत के अखाड़े में किसी जनाधार वाले नेता ने  पार्टी को गुडबाय  बोलकर फिर पार्टी में वापसी की है  ।  भाजपा में इससे पहले कल्याण सिंह ने एक दौर में भाजपा छोड़ी । 2010 में राष्ट्रीय  क्रांति पार्टी बनाई लेकिन कुछ कर नहीं पाए । मौलाना मुलायम नेताजी का भी दामन  थामा  लेकिन भाजपा छोड़ने के बाद से  उनका राजनीतिक करियर समाप्त ही  हो गया और अब आखरी पारी में भाजपा में वापस आने के बाद कल्याण सिंह का पुराना करिश्मा तो गायब है ही साथ में  विश्वसनीयता में  भी भारी कमी आयी है । मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती को ही लीजिए  । राष्ट्रीय  जनशक्ति पार्टी बनाई लेकिन कुछ खास करिश्मा  वह भी नहीं कर पाई  और मजबूर होकर डेढ़  बरस पहले   यू पी के चुनावो से ठीक पहले उनकी दुबारा भाजपा में वापसी हुई । दिल्ली में  भाजपा  की सियासी जमीन  तैयार करने वाले  मदन लाल खुराना  को ही देख लें  एक दौर में उनका भी पार्टी से मोहभंग हो गया था लेकिन अपने खुद के दम पर वह सियासत में कुछ खास करिश्मा नहीं कर पाए । गुजरात में केशुभाई पटेल को ही देख लें  मोदी का बाल बाका  आज तक नहीं कर पाए । गुजरात के अखाड़े में अपनी अलग पार्टी  बनाकर मोदी के विरुद्ध वह कदम ताल भी किये लेकिन नतीजा सिफर ही हुआ और अब उनकी भी भाजपा में वापसी का माहौल बन रहा है  । केशुभाई ने अगस्त 2012 में भाजपा से अलग होकर गुजरात जनता पार्टी (जीपीपी) बनाई थी और गुजरात विधानसभा चुनाव में दो सीटें जीती थीं। एक साल पहले गुजरात में भाजपा से नाराज होकर अलग पार्टी बनाने वाले केशुभाई पटेल अब फिर से भाजपा में शामिल हो सकते हैं।शंकर सिंह बाघेला को ही देखें  भाजपा छोड़ने के बाद कांग्रेस में जाकर कुछ ख़ास करिश्मा नहीं कर पाए ।2006 में अर्जुन मुंडा ने भी भाजपा को अलविदा कहा था लेकिन आज तक वह झारखण्ड में अपने बूते कोई बड़ा आधार अपने लिए तैयार नहीं कर सके हैं ।येदियुरप्पा के भविष्य के साथ अगर हम इन सबको जोडें तो एक बात साफ़ है जिन लोगो ने भी पार्टी से किनारे जाकर बगावत का झंडा  थामा वह सफल नहीं हो पाए और  लोगो के बीच उनकी साख और विश्वसनीयता को लेकर पहली बार सवाल उठे । यही नहीं दूसरी पार्टियों में जाने के बाद भी उन्हें वो सम्मान नहीं मिल पाया  जो उनकी मूल पार्टी में मिला  करता था ।
                                    
मसलन  अगर कांग्रेस के पन्ने टटोलें तो राजगोपालाचारी से लेकर जगजीवन राम , चौधरी चरण सिंह से लेकर कामराज , मोरार जी देसाई  से लेकर नारायण दत्त तिवारी, अर्जुन सिंह  से लेकर नटवर सिंह तक सभी ने एक दौर में पार्टी छोड़ी लेकिन अपना अलग मुकाम नहीं बना सके । इन सबके बीच क्या येदियुरप्पा  कर्नाटक  के कीचड़  में कमल को आने वाले समय में क्या खिला पाएंगे  यह एक बड़ा सवाल जरुर है जो जेहन में आता जरुर है लेकिन  लेकिन येदियुरप्पा की गिनती कर्नाटक में एक बड़े नेता के तौर पर होती है  जिसने " नमस्ते प्रजा  वत्सले  मातृभूमे " से लेकर  इमरजेंसी  के दौर और संगठानिक  छमताओ से लेकर दक्षिण में भाजपा के सत्तासीन होने के मिजाज को बहुत निकटता  से बीते 42 बरस में  महसूस किया है । यही नहीं येदियुरप्पा  ने सरकार से लेकर  संगठन हर स्तर पर लोहा अपने बूते  मनवाया है । जहाँ 2004 में तत्कालीन  कांग्रेसी सीं एम धरम सिंह की सरकार से समर्थन वापस लेने के लिए जनता दल  सेकुलर को उन्होंने  ही  राजी  किया वहीँ  जेडीएस के आसरे कर्नाटक  की राजनीती में गठबंधन की बिसात बिछाई । यही नहीं उस दौर को अगर याद करें तो जब  कुमारस्वामी  बारी बारी से सरकार चलाने  के गठबंधन के फैसले से मुकर  गए तो येदियुरप्पा ही वह शख्स  भाजपा में थे जिन्होंने अकेले चुनाव में कूदने का मन बनाया और 2008 में पहली बार भाजपा को अपने दम पर जिताया । लेकिन सी एम बनने  के बाद से येदियुरप्पा लगातार विवादों में घिरे रहे । उस दौर में सरकारी  जमीन अपने रिश्तेदारों को  डिनोटिफाई करवाने के आरोपों से उनकी जहाँ खूब भद्द पिटी  वहीँ अपनी बेहद करीबी मंत्री शोभा करंदलाजे को एक बिल्डर से करोडो की  घूस दिलवाने के आरोपों के साथ ही उन पर अपने एनजीओ  के लिए खनन माफिया से भारी  भरकम रिश्वत लेने के आरोप भी लगे । इसके बाद लोकायुक्त संतोष हेगड़े  की एक  रिपोर्ट ने 30 जुलाई 2011 को उनकी मुख्यमंत्री  पद की कुर्सी छीन  ली । उसके बाद कर्नाटक  में भाजपा के दो मुख्यमंत्रियों के हाथ राज्य में कमान आयी  जिनमे सदानंद गौड़ा , जगदीश शेट्टार शामिल रहे जिनको आगे कर भाजपा अभी हाल में  सत्ता में  वापसी नहीं कर पायी ।

 अब   कर्नाटक  में  के जी पी का बुरा हश्र देखकर येदियुरप्पा बिना शर्तो के साथ भाजपा में वापसी कर रहे हैं ।  मायने साफ़ हैं अब सबको साथ लेकर चलना है  और 2014  की "नमो" वाली  बिसात को अपने बूते ही बिछाना  है । कर्नाटक  में रीजनल पार्टियों में बंगारप्पा और रामकृष्ण हेगड़े  की पार्टियों का नाम जेहन में उभरता है लेकिन यह दोनों दल अभी तक कर्नाटक में  कुछ खास करिश्मा नहीं कर पाए हैं । कांग्रेस राज्य में सत्ता में जरुर है लेकिन  हाल के विधानसभा  चुनावो  के ट्रेंड को देखते हुए  लोक सभा चुनावो का पिछला इतिहास दोहराना उसके  लिए आसान नहीं होगा क्युकि पूरी देश में कांग्रेस के खिलाफ जबरदस्त सत्ता विरोधी लेकर कमोवेश हर राज्य में देखी जा सकती है   । हालांकि कर्नाटक  की  सीधी लड़ाई  इस बार भी भाजपा और कांग्रेस में ही है लेकिन राज्य में येदियुरप्पा के कार्यकाल में  जो भाजपा  कई गुटो में बट गयी थी अब उसी के कई नेता येदियुरप्पा  को कितना पचा पाएंगे यह देखने वाली बात होगी । साथ में बाद सवाल यह भी है  भ्रष्टाचार के आरोपो में लोकायुक्त जांच में घिरे येदियुरप्पा को साथ लेकर भाजपा   राज्य में लोक सभा की कुछ सीटें जरुर ले आये लेकिन उसकी साख को जो धक्का लगा है उसकी भरपाई कर पाना इतना आसान नहीं होगा  वह भी ऐसे दौर में जब बीते एक  दो बरस में पूरे देश में  भष्टाचार  विरोधी लहर ने एक पार्टी को दिल्ली में सत्ता तक पंहुचा दिया है और जिसने पारम्परिक राजनीती के मुह पर ऐसा तमाचा मारा है जिसकी टीस पारिवारिक विरासत को सम्भालने वाले हमारे राजनेताओ को इस चुनावी बेला में सबसे ज्यादा  सता रही है  ।   ऐसे में लाख टके का सवाल यह है क्या येदियुरप्पा अपने बूते राज्य में नमो के लिए  सियासी बिसात बिछा पाएंगे   फिलहाल कुछ कहा पाना मुश्किल है क्युकि इसके लिए  जून 2014 तक का तो  इन्तजार हमें  करना ही  होगा । 

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

खतरे के मुहाने पर उत्तराखंड की सरोवर नगरी


बीते बरस जून में केदारनाथ में  आये जलजले की यादें अभी भी जेहन में बनी हुई हैं ।  पुरानी  यादो से आज भी मन बाहर नहीं निकल पाता क्युकि केदारघाटी की इस आपदा में कई लोगो ने उसके अपनों को न केवल खोया बल्कि इस आपदा का सीधा असर उत्तराखंड के पर्यटन उद्योग पर पड़ा जिसके चलते आज भी राज्य में पर्यटक आने से कतरा रहे हैं  । आपदा को लेकर सबसे संवेदनशील रहे उत्तराखंड की चिंता इस दौर में खुद आपदा प्रबंधन विभाग ने बढ़ाई हुई है  क्युकि  उसके अनुसार  सरोवर नगरी नैनीताल  के नेस्तनाबूद होने का खतरा मडरा रहा है  । संकट की भयावहता का अंदाजा खुद राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग की  रिपोर्ट से लगाया जा सकता है ।  इसे  अगर आधार बनाए  तो सरोवर नगरी के  तकरीबन  सौ साल पुराने  चार  से साढ़े  चार सौ मकान कभी भी जमींदोज हो सकते हैं। इन आशियानों  को  मरम्मत  की जरूरत है लेकिन शासन-प्रशासन इस खतरे को लेकर बिलकुल भी परेशान नहीं दिखायी  दे रहा ।  आलम यह है  सारे नियमों को ताक पर रख कर  भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील पहाड़ी  भूमि पर यहाँ  बेतरतीब आवासीय निर्माण जोर शोर से जारी है ।
 

अगर यह सब बदस्तूर  जारी रहा तो सरोवर नगरी नैनीताल को  भी आने वाले दिनों में किसी गम्भीर संकट का सामना कर सकता  है । खास तौर से यह समय ऐसा है जब भीषण कड़ाके की ठण्ड ने पूरे प्रदेश में अपनी दस्तक दी हुई है और बदरा आकाश में छाये हुए है ।  आज भी इस पूरे इलाके में कई लोग बड़ी तादात  में  जर्जर हो चुके मकानों में  अपना आशियाना बनाये हुए रह रहे हैं ।  प्रदेश आपदा प्रबंधन विभाग की सर्वे रिपोर्ट  के अनुसार नगर के सौ साल से अधिक पुराने 450  मकानों की हालत बद से  बदतर हो चुकी है लेकिन इसके बाद भी लोग इन भवनो से अपना मोह नहीं छोड़  पाये हैं ।  भवनों को भूकंप की दृष्टि से  संवेदनशील होने के चलते जहाँ सरकार  के सामने मुश्किलें  खड़ी  होती दिखायी दे रही हैं वहीँ  आपदा प्रबंधन विभाग के खुद कान खड़े हो गए है।  दूसरी ओर  अनियंत्रित तरीके से हो रहे  निर्माण को लेकर भी नैनीताल के सामने स्थिति  असहज हो चली है ।  यह निर्माण यहां की ऐसी पहाड़ियों पर हो रहे हैं जिनको आईआईटी  इंजीनियरों  तक ने अपनी रिपोर्ट में असुरक्षित घोषित किया  हुआ है।  इसके बावजूद सरकारी और निजी निर्माण कम्पनिया  धड़ल्ले से यहां कंक्रीट के महल खड़े कर रही हैं लेकिन इन सबके बीच  गौर करने लायक बात यह है सूबे के मुखिया विजय बहुगुणा  ने केदारघाटी की आपदा से कोई सबक नहीं लिया है शायद यही वजह है उत्तराखंड में आज भी माफिया और सरकार  के कॉकटेल ने प्रकृति के सामने ऐसा संकट खड़ा कर दिया है जो आने वाले समय में कभी भी कोई बड़ा खतरा उत्पन्न कर सकता है । नैनीताल के बारे में यह आशंकाएं निर्मूल नहीं हैं क्युकि  पर्यावरणविदो ने कई सामाजिक कार्यकर्ताओ की राय में सुर मिलाते हुए  सर्वोच्च न्यायालय में ऐसे मामलों को लेकर एक जनहित याचिका कुछ बरस पहले  दायर की थी। इसकी सुनवाई के दौरान न्यायालय ने  नैनीताल को न केवल संवेदनशील माना बल्कि  कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहे नैनीताल की वादियो को लेकर भी सरकार की नीति को लेकर पहली बार सवाल भी उठाये थे ।  यही नहीं उस दौर में  सर्वोच्च न्यायालय ने नैनीताल ग्रुप हाउसिंग पर भी पूर्णतः प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद भी निर्माण यहाँ जारी ही रहे ।
 


नैनीताल में खतरे की जद  में आ रहे   साढ़े चार सौ से अधिक मकानो को  एक सदी से अधिक समय पूरा हो चुका है।  बीते बरस यहां हुए एक  सर्वे में यह आकड़ा सामने आया है ।  भूकंप की दृष्टि से ऐसे  कई और भवनों को अति संवेदनशील माना जा रहा है। बीते  दिनों उत्तराखंड  सरकार ने भी  आपदा प्रबंधन विभाग के तहत  नगर के भवनों की रिपोर्ट सार्वजनिक की है। इसमे से साढ़े  चार सौ  भवन ऐसे पाए गए जो सन 1890  से भी पहले के बने हुए हैं। । इनमें से अधिकांश भवनो को  अति संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है।गौरतलब है कि भूकंप और भू-स्खलन की दृष्टि से नैनीताल अति संवेदनशील श्रेणी में आता है। पुराने दौर के पन्ने  टटोलें  तो नैनीताल की संवेदनशीलता को  ब्रिटिश शासको ने भी भांप लिया था शायद  यही वजह रही उन्होंने वक्त की नजाकत को अपने अंदाज में भांपकर  कई  कठोर कदम भी  उठाए । 1817 में यहां पर पहली बार आए सैटलमेंट कमिशनर जी डब्ल्यू को नैनीताल की संस्कृति और सभ्यता से बेहद लगाव था। उनका तो   मानना था कि अगर कोई विदेशी यहां पर पहुंचा तो इस स्थल की पवित्रता भंग हो जाएगी और संभवतः आने वाले समय में इसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो जाएगा। उसकी यह बात अब सोलह आने सच साबित हो रही है क्युकि माफियाओ और राजनेताओ की एक बड़ी लॉबी  पहाड़ो में बाहरी लोगो को बसाने के लिए इस दौर में एक से बढ़कर एक  सपने दिखा रही है शायद यही वजह है इस दौर में पहाड़ में जमीन के दामो ने कुलाचे मारकर नया इतिहास गढ़ा  है और वहीं  पहली बार पहाड़ी इलाको से लेकर तराई के कई इलाको पर भू माफियाओ की गिद्ध दृष्टि लगी हुई है जहाँ हर किसी की नजर बाजार में  बड़े मुनाफे को कमाने की हो चली है । इसी की आड़ में इन इलाको में रिजॉर्ट  खोलने का धंधा भी जोर शोर से चल रहा है जहाँ हर कोई बहती गंगा में डुबकी लगाना चाहता है । 


 नैनीताल वर्ष 1880  में नैनीताल भूकंप की त्रासदी देख  चुका है। इस दौरान हुए भयानक भूस्खलन में  151  लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद ब्रिटिश शासकों ने शहर की संवेदनशीलता को देखते हुए रखरखाव के व्यापक कार्यक्रम शुरू किये तथा एक सुरक्षा कमेटी का गठन किया। पूरे शहर में नालों का जाल बिछा दिया गया।  अस्सी  के दशक में यहां कई  नाले बनाये गए  जिनका  उद्देश्य था कि इनके जरिये  बरसात का पानी सीधे झील में चला जाये और बरसाती पानी जमीन में रिसकर भूस्खलन की पुनरावृत्ति न कर सके लेकिन चमक धमक और सैर सपाटे के लिए जाने जानी वाली इस नगरी की सुंदरता की परवाह इस दौर में  किसी को नहीं है । आपदा से बचाव की कोई तैयारी  नहीं है क्युकि हमें  आपदा से पहले जागना नहीं आता । क्या कीजियेगा इस दौर में सारी  कवायद अपनी कुर्सी बचाने से लेकर आपदा प्रबंधन को लेकर आने वाले पैसे में लूट खसोट तक ही सिमट कर  रह गई है । आम आदमी की किसी को परवाह नहीं है । इस दौर में  ना ही सैटलमेंट कमिशनर जी डब्ल्यू सरीखा कोई विदेशी शासक बचा है और ना ही  मुख्यमंत्री की कुर्सी  जनरल  बी सी खंडूरी के पास है जिनसे माफिया से लेकर राजनेताओ की एक बड़ी लॉबी खौफ  खाती थी ।   

 

आईआईटी  के इंजीनियरो ने भी अपनी रिपोर्ट में इस क्षेत्र को अत्याधिक असुरक्षित घोषित किया  हुआ है जिसमें कहा गया है कि नैनीताल के इलाके में पहाड़ की बोझ उठाने की क्षमता समाप्त हो चुकी है जिसके  चलते यहाँ पर  किसी भी तरह का निर्माण की राह मुश्किल दिख रही  है।  अगर ऐसा ही चलता रहा  और खुद ना खास्ता यदि कोई बड़ी  भूगर्भीय हलचल होती है तो इसका खामियाजा पूरी सरोवर नगरी  को ही  भुगतना पड़ेगा जिसकी सीधी मार यहाँ के पर्यटन व्यवसाय पर ग्रहण लगा सकती है । देखना है आने वाले समय में सरकार इस चुनौती से किस तरह निपटती है ?