गुरुवार, 31 जुलाई 2014

बूँद - बूँद पानी को मोहताज उत्तराखंड का कुमांऊ मंडल






पंकज चौहान दिल्ली के जनकपुरी में रहते हैं | दिल्ली की भीषण चिलचिलाती गर्मी से निजात पाने के लिए वह पिछले एक महीने से अपने सीमांत जनपद पिथौरागढ़ के तिलदुकरी स्थित आवास  में  रह  रहे हैं लेकिन पेयजल संकट ने उनका अमन चैन छीना हुआ है | वह कहते हैं पहाड़ो में अब हर दिन पानी मिल जायेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है लिहाजा टैंकर और अन्य वैकल्पिक साधनों से  वह अपने घर परिवार के लिए पानी का इंतजाम खुद करने में सुबह से लग जाते हैं | दिल्ली से पहाड़ की चदाई  चढ़ते हुए उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा  जिन पहाड़ो को पानी का बड़ा वाटर टैंक कहा जाता रहा है वहां के बाशिंदे पानी की बूँद बूँद के लिए मोहताज हो सकते हैं |

      चंद्रभागा के प्रकाश की कहानी भी पंकज चौहान जैसी ही है | सेना में काम करने वाले प्रकाश यूँ अपने परिवार के साथ छुट्टियाँ बिताने आये हैं लेकिन जिले के पानी के संकट ने उनकी दिनचर्या को  भी गड़बड़ा दिया है  | प्रकाश के दिन की शुरुवात  पानी के इंतजाम से शुरू हो जाती है | वह हर सुबह ऐंचोली से कही दूर सुकौली के धारे में जाकर अपने घर के लिए पानी का इंतजाम करने में लग जाते हैं क्युकि उनके नलो में पिछले कुछ समय से पानी की बूंद के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं | पिछले कुछ समय से पिथौरागढ़ शहर में पानी का बेतरतीब  संकट छाया हुआ है | यह कहानी पिथौरागढ़ शहर की नहीं पूरे कुमाऊ अंचल की है | कुमाऊ के विभिन्न गाँवों में आज भीषण पेयजल संकट छाया हुआ है | चढ़ते पारे के साथ ही पूरे अंचल का जल संकट दिनों दिन  गहराता जा रहा  है |

बात पिथौरागढ़ की करें तो यहाँ के लोग अपनी प्यास बुझाने के लिए प्राकृतिक जल स्रोतों और हैण्डपम्पो पर अब ज्यादा निर्भर होते जा रहे हैं | जिन लोगो की पहुँच से यह सब दूर है वह सभी मीलो दूर चलकर किसी तरह अपना काम चलाने को मजबूर हो गए हैं |  आलम यह है प्रशासन और जल संस्थान के आला अधिकारियो को वस्तुस्थिति का पता है लेकिन इसके बाद भी वह समस्या के निराकरण में कोई रूचि नहीं दिखा रहे हैं | उधर स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और राजनीती के चलते पिथौरागढ़वासी  पानी की समस्या  से जूझने को मजबूर हैं |  

            सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ बड़े राजनीतिक दिग्गजों का आशियाना रहा है |  सांसद  भगत सिंह कोश्यारी,  महेंद्र सिंह महरा , उक्रांद के दिग्गज नेता काशी सिह ऐरी , भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष  बिशन सिंह चुफाल , विधायक मयूख महर , भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता सुरेश जोशी सरीखे लोगो की कर्मभूमि यह सीमान्त जनपद रहा है | वहीँ मुख्यमंत्री हरीश रावत की  विधान सभा  धारचूला भी इसी पिथौरागढ़ सीमान्त जनपद में सम्मिलित रही है |    बीते दौर में भाजपा सरकार में प्रकाश पन्त सरीखे बड़े दिग्गज नेता ने कैबिनेट मंत्री के तौर पर राज्य में  ना केवल अपनी पहचान बनाई बल्कि पेयजल मंत्री की जिम्मेदारी को निभाया लेकिन खुद  उनके पेयजल मंत्री रहते ही उनके विधान सभा की जनता पानी की बूँद बूँद के लिए तरसती रही | वर्तमान में राज्य में कांग्रेस सरकार ने  आधे से ज्यादा कार्यकाल पूरा कर लिया है लेकिन इसके बाद भी पिथौरागढ़ का पेयजल संकट जस का तस बना हुआ है | सरयू .रामगंगा ,काली सरीखी नदियो के कारण जिस जगह को वाटर डैम कहा जाता हो वहां पर पानी की बूंद के लिए लोगो के तरसने की बात हजम नहीं होती | आम आदमी को साफ़ पेयजल तो दूर अपनी जरुरत का भी पानी इस समय उपलब्ध नहीं करवाया जा रहा जिसके चलते लोगो में आक्रोश साफ़ देखा जा सकता है | शहर निवासी हरीश पाण्डे कहते हैं “पानी की इलाके में सप्लाई समय पर नहीं होती | किसी दिन आधे घंटे तो कई दिन दस से पंद्रह मिनट पानी मिलता है | कई बार तो दो दो दिन छोड़कर नगर में पानी की सप्लाई होती है जिस कारण मुश्किलों का सामना करने को  मजबूर होना पड़ता है "


वर्तमान में जनपद की पेयजल सप्लाई  घाट , ठुलीगाड ,रई परियोजनाओ के जिम्मे है लेकिन यह सब बदती आबादी के लिहाज से सफेद हाथी साबित हो रही हैं | जल संस्थान से जुड़े लोगो की मानें तो इन तीन परियोजनाओ से प्रतिदिन साढे तीन सौ से चार सौ एमएलडी पानी ही उपलब्ध हो पा रहा है जिसके चलते पूरे जिले में पानी का संकट गहराता जा रहा है | स्थिति की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है जब पिथौरागढ़ के शहर वासियों को प्रति दिन पानी नहीं मिल पा रहा तो ग्रामीण इलाको की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है | पानी को लेकर आये दिन ज्ञापन और धरनों का दौर भी इस जनपद में हर इलाके में देखा जा सकता है लेकिन इन सबके बाद भी अधिकारियो के कान में जू तक नहीं रेंगती |
 

कुछ समय से पिथौरागढ़ की जनता पानी के गंभीर संकट से परेशान है | नगर के सामाजिक कार्यकर्ता और कुमौड़ वार्ड के एक दौर में सभासद रहे गोविन्द सिंह महर कहते हैं “ पहले पेयजल को लेकर इतनी खराब स्थति नहीं थी | जनप्रतिनिधियों की उदासीनता और अधिकारियों की मिलीभगत और वर्तमान में जनता की बुनियादी समस्याओ से जुड़ाव ना हो पाने के चलते यहाँ पानी को लेकर एक  गंभीर स्थिति  बन गयी है ”|   पिथौरागढ़ शहर में घाट पेयजल योजना  शुरू की गयी लेकिन बढती आबादी का भारी दबाव इस पर इतना पड़ा कि अब यह वेंटिलेटर पर चल रही है वहीँ ठुलीगाड तो रमगाड़ बन चुकी है जहाँ का पेयजल बुरी तरह प्रदूषित हो चला है | इस बार बरसात उम्मीद के अनुरूप ना हो पाने के चलते प्राकृतिक जल स्रोत भी सूख गए हैं वहीँ हैंडपंप भी पहाड़ो में फेल नजर आ रहे हैं |  राज्य सरकार के पेयजल मंत्री मंत्री प्रसाद नैथानी कहते हैं “ पेयजल संकट से निजात दिलवाने के लिए सरकार पूरी तरह प्रतिबद्ध है |  शासन से बाईस करोड़ रुपये की लागत से आंवला घाट से नई पेयजल लाइन को मंजूरी  मिल गयी है जिसके बाद बहुत हद तक जनपद का पानी का  संकट सुलझ जायेगा ”| लेकिन प्रगति का आलम यह है इस योजना में एक इंच भर  का काम शुरू नहीं हो पाया है | इतना जरुर है कागजो में और  राजनीतिक बयानों में यह योजना ऊँची उड़ान खूब भर चुकी है और सत्ता धारी दलों के नेता इसको अपनी बड़ी उपलब्धि बताने से पीछे भी नहीं हटते | 

जनपद के गंगोलीहाट , बेरीनाग और धारचूला , डीडीहाट में भी लोगो को पिथौरागढ़ सरीखी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है | दिनों दिन पानी का संकट यहाँ के गाँवों में गहराता जा रहा है | गंगोलीहाट निवासी जीतेश कहते हैं “पानी को लेकर गंगोलीहाट की जनता लम्बे समय से परेशान है लेकिन जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के चलते लोगो को  जरुरत का पानी भी नहीं मिल पा रहा”| त्रिपुरादेवी स्थित स्वयं सेवी संस्था में काम करने वाले बना निवासी डी के पन्त  बताते हैं “बेरीनाग में भी पानी की भीषण किल्लत हो रही है | गाँवो के लोग दूर दराज के इलाको से पानी ढोकर किसी तरह अपना  काम चला रहे हैं” |
धारचूला में भी कमोवेश बेरीनाग सरीखा  हाल है | राकेश तिवारी बताते हैं “कई इलाको में पेयजल आपूर्ति ठप्प पड़ी हुई है | पेयजल संकट की असल मार गाँव वाले झेल रहे हैं ”| वैसे भी प्राकृतिक आपदाओं की दृष्टि से यहाँ के कई इलाके संवेदनशील हैं और इन इलाको में प्रतिदिन पानी नहीं पहुचने से लोगो को मुश्किलात पेश आ रहे हैं |
                                                                                                                 
   नेपाल सीमा से सटे चम्पावत के कई गाँवों में पानी का संकट गहराया हुआ है | यूँ तो गर्मियों में हर साल यहाँ समस्या रहती है लेकिन इस  बार हालत बहुत ख़राब  हो चले हैं | विद्युत कटौती  से भी कई ग्रामीण इलाके परेशान हैं वही प्रशासन से लेकर जनप्रतिनिधि बढती आबादी के मुताबिक पानी की कमी का रोना रो रहे हैं | लोहाघाट में कई लोग टैंकरों से पानी लेने को जहाँ मजबूर हैं वहीँ बाराकोट में सबसे खराब स्थिति है | मल्ली लमाई निवासी एमसीपी एसोसियेट के मालिक मुकेश चन्द्र पांडे कहते हैं “ उत्तराखंड के घर घर में छुट भैय्ये नेताओ की भरमार इतनी ज्यादा हो गयी है कि यहाँ की इस राजनीती से जनता को सबसे ज्यादा नुक्सान झेलने को मजबूर होना पड रहा है | यही वजह है यहाँ के जनप्रतिनिधि अपने अपने इलाके में पेयजल भी उपलब्ध नहीं करवा पा रहे  जबकि सत्ता में आने से पहले यह तरह तरह के सब्जबाग लोगो को दिखाते आये हैं” |

               बाराकोट के नदेडा गाँव के निवासी चंद्रशेखर जोशी कहते हैं “नदेडा के साथ ही भनार , पेठलती के किसानो को सबसे ज्यादा इस पेयजल संकट से परेशानियों का सामना करना पड रहा है |  पानी के बिना उनकी खेती जहाँ चौपट होने के कगार पर है वहीं मवेशियों को पालने वाले परिवारों को मुश्किलों का सामना करना पड रहा है ”|   


कुमाऊ के प्रवेश द्वार माने जाने वाले हल्द्वानी में इस मौसम में लोग बूँद बूँद पानी के लिए तरसते नजर आ रहे हैं | कठघरिया, बमोरी , मानपुर पश्चिम, देवालचौड , तीनपानी सरीखे दर्जन भर से ज्यादा इलाको में गंभीर संकट खड़ा है | समय पर पेयजल आपूर्ति  नहीं हो पाने से यहाँ रहने वाले लोगो को  आये दिन कई मुश्किलों का सामना करने को मजबूर होना पड  रहा है | यहाँ के कई इलाको में पानी को लेकर लम्बी  लम्बी लाइनें  सुबह से ही लगनी शुरू हो जाती हैं जिसको लेकर लोगो में कहा सुनी होना भी अब आम बात हो चुकी है | लामाचौड, कुसुमखेडा , ऊंचा पुल के कई इलाके ऐसे हैं जहाँ पर बिजली की कटौती  होने से आये दिन परेशानियाँ झेलनी पड  रही हैं |

नैनीताल जनपद में भी ओखलकांडा , रामगढ़ , भीमताल, भवाली , बेतालघाट विकासखंडो के कई गाँवों में पानी की समस्या बनी हुई है | पिछले कुछ वर्षो से इन इलाको में भी पानी की समय पर सप्लाई ना होने से संकट गहरा गया है | बदती गर्मी से पानी की समस्या गंभीर होती जा रही है | पहाड़ो का मौसम चक्र  भी तेजी से बदल रहा है | पहले कभी पहाड़ो में इतनी गर्मी नहीं पड़ी जितनी हाल के वर्षो में पड़ी है जिसके चलते उमस बढने से लोगो की मुश्किलें बढ़  रही हैं | रही सही कसर लो वोल्टेज और बिजली की कटौती  ने पूरी  कर डाली है | ट्यूबवेल और हैंडपंप भी अब गर्मी में पानी नहीं उठा पा रहे हैं | अल्मोड़ा जिले में भी कमोवेश यही हाल है | पानी का संकट अब गहराता ही जा रहा है | प्रशासन द्वारा लोगो को प्रतिदिन पानी उपलब्ध करवाए जाने के निर्देशों के बाद भी विभागीय अधिकारी हालत ठीक करने में रूचि नहीं ले रहे हैं | जल संस्थान और जल निगम पानी की कमी और मानसून ठीक ना रहने का हवाला देकर अपने काम से पल्ला झाड रहे हैं | 

अल्मोड़ा में लोधिया , पाली, ल्वाली. हवालबाग ,नादुली  सरीखे दर्जन भर से ज्यादा इलाके पानी की समस्या से परेशान हैं | अल्मोड़ा निवासी शंकर कहते हैं “अब समय आ गया है जब पानी के संकट से निजात दिलवाने के लिए लोगो को अपने स्तर पर नए रास्ते खोजने होंगे | वाटर शेड मैनेजमेंट सरीखे कार्यक्रम इस दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकते हैं | वर्षा के जल के संग्रहण से भी बहुत हद तक यह समस्या दूर हो सकती है | बागेश्वर में भी पानी की भारी किल्लत चल रही है | पेयजल आपूर्ति ठप्प पड़ने से जनजीवन प्रभावित हो रहा है | कई स्थानों में पानी की आपूर्ति समय पर नहीं होती | गरुण , भराडी, काफलीगैर , कपकोट से सटे कई इलाको के लोगो के सामने पेयजल की विकट समस्या बनी हुई है |  

बहरहाल  जो भी हो गर्मी के इस मौसम में उत्तराखंड का  पूरा  कुमाऊ मंडल  प्यासा नजर आ रहा है | उत्तराखंड में पिछले कुछ समय से मौसम में नए तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं | पहले जहाँ  इतनी प्रचंड गर्मी नहीं पड़ती थी वहीँ हाल के समय में चिलचिलाती गर्मी में सारे रिकार्डो को तोड़ डाला है | गाँवों में एक समय पंखे तक नहीं चला करते थे और वातावरण भी काफी ठंडा  रहता था लेकिन आज पहाड़ के  गाँवों में भी लोगो को शिलिंग फैन लगाने को अगर मजबूर होना  पड रहा है तो स्थिति की गंभीरता को समझा जा  सकता है | पहाड़ो में ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं | नदियों के जल में जहा गिरावट देखी  जा रही है वहीँ समय पर वर्षा ना होने से प्राकृतिक जल स्रोत भी अब जवाब देने लगे हैं | पानी के संरक्षण के लिए कोई आने वाले दिनों में  कारगर उपाय अगर पहाड़ो में नहीं खोजे गए  तो वह दिन दूर नहीं जब पानी की बूँद बूँद के लिए लोगो को तरसना पड  सकता है | सामाजिक कार्यकर्ता गोविन्द सिंह महर कहते हैं “ आज पहाड़ो की नदियों को बचाने की जरुरत है” |हिमालय के लिए अलग से एक मंत्रालय बनाये जाने की वकालत करते हुए वह कहते हैं अगर पहाड़ की नदियों को नहीं बचाया गया तो आने वाले दिनों में भयावह संकट खड़ा हो सकता है | सरकार को पानी की समस्या सुलझाने के लिए काम करने की इच्छाशक्ति दिखाने की जरुरत है |  जो भी हो पहाड़ो का इस संकट को देखकर इस बात का तो आभास हमें हो ही गया है कि समय रहते अगर पानी को लेकर कोई नई लकीर नहीं खिंची तो आने वाले दिनों में यह एक गंभीर समस्या बन सकती है |


रविवार, 20 जुलाई 2014

आपदा के बाद …




कभी तीर्थ यत्रियो की चहल पहल से गुलजार रहने वाली केदारघाटी में वीरानगी दिखाई दे रही है | आज भी पिछले बरस के भयानक जलजले की यादो से यहाँ के बाशिंदे बाहर नहीं आ पा रहे  हैं | पिछले साल मची तबाही में यहाँ मीडिया का जैसा रेला लगा वह भी अब थम गया है लेकिन केदारनाथ  से अपनी रोजी रोटी चलाने  वाले कई लोगो के चेहरों पर अब भी पिछले साल आई भीषण तबाही में अपनों के खोने का गम साफ़ महसूस किया जा सकता है | बीते बरस तक जिस केदारनाथ में  केदार बाबा के दर्शनों को लम्बी लम्बी कतारें दिखती थी वही आज आलम यह है यह कतारें सैकड़ो में सिमट कर रह गयी है | पिछले साल प्रकृति ने केदारघाटी में जैसा तांडव मचाया उसने इस इलाके के पूरे नक़्शे को ही बदल कर रख दिया है | पुनर्वास , पुनर्निर्माण और आपदा राहत के नाम पर चमत्कारिक काम विज्ञापनों में किये जाने के दावे कर रही यहाँ की राज्य सरकार के दावे इस बरसात में फिर सामने आने लगे हैं | पिछले कुछ दिनों  से राज्य में हो रही भीषण बरसात ने सरकार के ढुलमुल रवैये की एक बार फिर पोल खोल दी है जिस कारण सरकार को मजबूर होकर  मौसम खुलने तक चार धाम यात्रा को स्थगित करने का  एलान करना पड़ा है | अभी भी कई यात्री चार धाम के यात्रा पथ में फंसे हुए हैं लिहाजा पानी सर पर होने के समय  राज्य सरकार को केंद्र से मिग विमान  की मांग करनी पड़ रही है |


    पिछले कुछ समय से आपदा प्रबंधन के नाम पर जैसी लूट खसोट इस  छोटे से राज्य उत्तराखंड  में मची है वैसी मिसाल अन्यत्र हमें देखने को नहीं मिलती | आपदा प्रबंधन को यहाँ ऐसी दुधारू गाय बना दिया गया है जिसका इस्तेमाल  हमेशा अपने हितो के लिए किया जाता रहा है | बीते कई बरस से आपदा प्रबंधन के नाम पर यहाँ के प्रशासनिक अमले ने नौकरशाहों के साथ विदेश दौरे जमकर किये |  पता नहीं इन दौरों में पानी की तरह पैसा बहाने के बाद भी कैसा प्रबंधन इन्होने सीखा जो एक साल बीतने  के बाद भी चार धाम यात्रा का पथ दुरुस्त नहीं कर सके | नौकरशाहों और राजनेताओ के काकटेल ने आपदा राहत के नाम पर पिछले कुछ समय से न केवल भारी लूट खसोट मचाई बल्कि आपदा के बजट से   चहेते ठेकेदारों की ही जेब गर्म की हैं | पिछले साल केदारनाथ में आई भीषण आपदा के बाद केंद्र सरकार और देश विदेश के कई सामाजिक संगठनो और राज्य सरकारों की तरफ से अरबो रुपये बटोरने के बाद भी चार धाम का यात्रा पथ  और राज्य की माली हालत खस्ता है | उत्तराखंड सरकार के पर्यटन प्रदेश , हर्बल स्टेट के दावे खोखले साबित हो रहे हैं | आज भी पर्यटक उत्तराखंड आने से सीधे कतरा रहे हैं |

         जलजले का एक साल बीतने के बाद भी केदारघाटी की वीरानगी बहुत कुछ कहानी खुद ही बयां कर रही है | कभी यात्रा के भारी शोर गुल से गुलजार रहने वाली केदारघाटी आज शांत है | कुछ यात्री भले ही आस्था के इस यात्रा पथ में अपनी जान जोखिम में डालकर उबड़ खाबड़ मार्गो से यात्रा कर रहे हों लेकिन अब यहाँ पहले जैसी बात नहीं दिखाई देती | आपदा के ठीक एक साल बाद भी केदारघाटी में कई नर कंकालो का मिलना सरकार और प्रशासन के दावो की पोल खुद ही खोल देते हैं | देश में कई लोग अब भी ऐसे हैं जिन्होंने  केदारनाथ  में अपने परिजनों को खोया | उनका अंतिम संस्कार तो दूर आज  शव तक  नहीं मिल पाए हैं लेकिन यहाँ की सरकार सेना , सरकार के सर्च आपरेशनो और मीडिया मेनेजमेंट का हवाला देकर खुद अपनी पीठ थपथपाने से पीछे नहीं हटती | बीते बरस के हादसे ने  विजय बहुगुणा का विकेट भले ही गिरा दिया हो लेकिन उनके बाद हरीश रावत ने भले ही बैटिंग कर रहे हों  लेकिन राज्य की बेलगाम नौकरशाही का कॉकस उनको  भी  सही से काम नहीं करने दे रहा ऊपर से इस छोटे से राज्य का दुर्भाग्य यह है यहाँ गली मुहल्लों में पनप रहे छुटभैय्ये नेताओ और राजनेताओ के चहेते ठेकेदारो ने राज्य का बेडा गर्क कर दिया है जिससे जनता जनार्दन के सरोकार कहीं पीछे छूटते जा रहे हैं |   

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

अमर रहेगा 'काका' का किरदार




“ बाबू मोशाय हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं जिसकी डोर ऊपर वाले के हाथ में है | कौन कब कहाँ उठेगा कोई नहीं जानता ”

यह संवाद बानगी भर है | सत्तर के दशक को याद करें | ऋषिकेश मुखर्जी ने पहली बार जिन्दगी और मौत की पहेली को इस कदर परोसा कि हर कोई जिन्दगी की पहेली का हल खोजने में जुट गया और पहली बार सलिल चौधरी के संगीत ने दिल के तारो को इस कदर झंकृत किया कि तंज संवाद के साथ इस फिल्म की  बेहतर अदाकारी ने लोगो के दिलो में गहरी छाप छोड़ने में देर नहीं लगाई |     काका का जब भी जिक्र होगा वह आनंद के बिना अधूरा रहेगा शायद यही वजह है आज भी काका इस फिल्म में आयकन के रूप में अमर हैं | इस फिल्म में कैंसर  पीड़ित के किरदार को उन्होंने जिस तरीके से जिया वह बालीवुड में भावी पीढ़ी के लिए तो कम से कम नजीर ही बन चुका है  | इस फिल्म में जिन्दगी के आखरी पड़ाव  में मुंबई आने वाले आनंद सहगल की मुलाकात डॉ भास्कर मुखर्जी से होती है | आनंद से मिलकर भास्कर जिन्दगी के मायने सीखता है और आनंद की मौत के बाद अंत में यह कहने को मजबूर हो जाता है कि “आनंद मरा नहीं आनंद मरते नहीं ’’

सुपर स्टार राजेश खन्ना के करियर की यह ऐसी फिल्म थी जिसकी यादें आज भी जेहन में बनी हैं और शायद यही वजह है काका के बेमिसाल अभिनय ने इसके जरिये भारतीय सिनेमा में एक नई लकीर खींचने का काम किया | कुर्ता पहने आनंद इस फिल्म में जब समुन्दर के किनारे जिन्दगी ‘ कैसी ये पहेली हाए कभी ये हंसाये कभी ये रुलाये ’  गाना गाता है तो वह गाना लोगो को अपने आगोश में इस कदर ले लेता है कि अकेले पलो में  भी यह दिल को सुकून दे देता है तो इसकी बड़ी वजह आनंद की बेहतर संवाद अदायिगी के साथ बेहतरीन संगीत है | आनंद के आसरे राजेश खन्ना ने अपने को सिल्वर स्क्रीन पर इस कदर उकेरा कि हर दर्शक उनके अभिनय के कसीदे ही पढने लगा | भारतीय सिनेमा में यही फिल्म है जो हमें सिखाती है मौत तो एक ना एक दिन आनी ही है लेकिन हम जीना नहीं छोड़ सकते | जिन्दगी का फलसफा यह होना चाहिए जिन्दगी  बड़ी होनी चाहिए लम्बी नहीं | जिन्दगी को आनंद ने परिभाषित करते हुए कहा जिन्दगी जितनी जियो दिल खोलकर जियो |

29 दिसंबर 1942 को राजेश खन्ना का जन्म अमृतसर में हुआ था | स्कूली दिनों में उनका नाम जतिन खन्ना था और वहीँ से कई नाटको में अभिनय के साथ ही उन्होंने अपना अभिनय का सफ़र शुरू कर दिया था | उनके चाचा ने उनकी अभिनय के फील्ड में आने की काफी हौंसलाअफजाई की और उन्होंने उनका नाम जतिन से परिवर्तित कर राजेश खन्ना कर दिया | 1965 में यूनाइटेड प्रोड्यूसर्स और फिल्म फेयर के टैलेंट हंट ने राजेश खन्ना के फ़िल्मी सफ़र को नई उड़ान देने का काम किया | दसियों हजार लडको को पछाड़कर राजेश ने पहले पायदान पर कब्ज़ा जमाने में सफलता प्राप्त की |  1967 में  उनकी पहली फिल्म चेतन आनंद की आखरी ख़त थी जहाँ से उनका फ़िल्मी सफ़र शुरू हुआ | इसके बाद राज, बहारो के सपने , औरत , डोली, इतेफाक सरीखी सफल फिल्मो से उनके नाम के चर्चे सब करने लगे | 1969 में रिलीज हुई आराधना और दो रास्ते और फिर उसके बाद आनंद की सफलता ने उनकी लोकप्रियता के ग्राफ में ऐसा इजाफा कर दिया कि घर घर में राजेश नाम ने अपनी दस्तक देनी शुरू कर दी | आराधना में हुस्न की परी शर्मीला टैगोर के साथ उन्होंने सिल्वर स्क्रीन पर ऐसी रोमांस की कैमिस्ट्री बैठाई कि युवतियों की रातो की नीदें ही उड़ गयी | उस दौर में राजेश के गाने किशोर कुमार ने गाये और उनकी दिलकश आवाज का जादू आज भी राजेश के अभिनय को देखते समय महसूस किया जा सकता है | हाथी मेरे साथी , कटी पतंग , सच्चा झूठा , महबूब की मेहंदी , आन मिलो सजना , आपकी कसम सरीखी फिल्मो में अपनी अभिनय से उन्होंने अभिनय के मानो झंडे ही गाड दिए | उस समय का दौर ऐसा हो चला कि लडकियों को राजेश खन्ना ने अपने मोहपाश में इस कदर जकड़ लिया मानो हर लड़की उनकी दीवानी हो गयी | उस समय कहीं अगर किसी लड़की को राजेश खन्ना की सफ़ेद रंग की गाडी मिलती तो वह उसको चूम ही लेती थी | यही नहीं उनकी लिपस्टिक से राजेश की सफ़ेद रंग की कार रंग बिरंगी हो जाती थी | लडकियों ने राजेश खन्ना में रोमांटिक हीरो की छवि देखी | 

राजेश खन्ना ने अपने फ़िल्मी सफ़र में तकरीबन 163 फिल्मो में काम किया जिनमे 100 से ज्यादा फिल्म बॉक्स ऑफिस में हिट रही | 1969 से 1972 तक राजेश खन्ना ने लगातार पंद्रह सुपर हिट फिल्में हिंदी सिनेमा को दी | इस बेमिसाल रिकॉर्ड के आस पास तक भी आज कोई नहीं फटक  पाता है | अपने अभिनय के लिए उनको तीन बार फिल्मफेयर का अवार्ड मिला | अमर प्रेम और आप की  कसम  में राजेश खन्ना की ट्यूनिंग शर्मीला टैगोर और मुमताज के साथ ऐसी बैठ गयी कि इन्होने सफलता के झंडे ही गाढे और कई फिल्में हिट साबित हुई | राजेश और मुमताज़ दोनों के बँगले मुम्बई में पास पास थे अतदोनों की अच्छी पटरी बैठी। जब राजेश ने डिम्पल के साथ शादी कर ली तब कहीं जाकर मुमताज़ ने भी उस जमाने के अरबपति मयूर माधवानी के साथ विवाह करने का निश्चय किया।


1974 में मुमताज़ ने अपनी शादी के बाद भी राजेश के साथ आप की कसमरोटी और प्रेम कहानी जैसी तीन फिल्में पूरी कीं और उसके बाद फिल्मों से हमेशा हमेशा के लिये सन्यास ले लिया। यही नहीं मुमताज़ ने बम्बई को भी अलविदा कह दिया और अपने पति के साथ विदेश में जाकर बस गयी। इससे राजेश खन्ना को जबर्दस्त आघात लगा।1975 के बाद राजेश खन्ना का फ़िल्मी सफ़र फीका पड़ गया | इस दौरान कई फिल्म कुछ खास करिश्मा नहीं कर सकी | इसी दौर में स्टारडम  का क्रेज शुरू होता है और पहली बार सिल्वर स्क्रीन पर अमिताभ एंग्रीमैन की छवि गढ़ते नजर आते हैं | इसके बाद कई जगह अभिनय जगत में रोल पाने को लेकर राजेश और अमिताभ आमने सामने आते हैं लेकिन दोनों के लिए एक फिल्म में आने की डगर आसान नहीं लगती |

      1978 के बाद  राजेश खन्ना ने दर्द, धनवान, अवतार , अगर तुम ना होते  जैसी फिल्में भी की लेकिन वह सफल नहीं  हो सकी | राजेश खन्ना निजी जिन्दगी में भी रोमांटिक रहे | 70 के दशक में ही उनका अंजू महेन्दू से अफेयर जोर शोर से चला लेकिन जल्द ही ब्रेक अप भी हो गया | राजेश ने अपने से पंद्रह साल छोटी डिम्पल कपाडिया से 1973 में शादी कर ली | चांदनी रात में समुन्दर के किनारे दोनों की लव स्टोरी ने उस दौर में खूब सुर्खियाँ बटोरी और कई लडकियों के दिल को भी तोड़ दिया | 1984 में डिम्पल  भी उनसे अलग हो गयी |  राजेश खन्ना का नाम एक दौर में सौतन की नायिका टीना मुनीम से भी जुड़ा जिनके साथ उन्होंने अधिकार, फिफ्टी फिफ्टी , बेवफाई ,सुराग जैसी फिल्में भी की |

अमिताभ बच्चन के उभार ने राजेश खन्ना का जादू फींका कर दिया | 1994 में उन्होंने एक बार फिर खुदाई फिल्म से परदे पर वापसी की कोशिश की तो वहीँ ढलते दौर में  उन्होंने सफ़ल फिल्म सौतेला भाई , आ अब लौट चलेंक्या दिल ने कहाप्यार ज़िन्दगी हैवफा जैसी फिल्मों में उन्होंने अभिनय किया लेकिन इन फिल्मों को कोई खास सफलता नहीं मिली।राजीव गाँधी के अनुरोध पर वह नब्बे के दशक में पहली बार राजनीती में आये और लालकृष्ण आडवानी, शॉट गन सरीखे लोगो को कड़ी टक्कर दी और नई  दिल्ली से लोक सभा सांसद भी बनें |बाद में फिल्मो की तरह राजनीती का मैदान भी उन्हें रास नही आया और जल्द तौबा करने में भी देरी नहीं लगाई | 2005 में उन्हें उनके शानदार अभिनय के लिए ‘ फिल्मफेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट’ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया | काका ने अपने दौर में अभिनय से जिस बुलंदियों को छुआ वहां तक किसी भी कलाकार का पहुचना आसान नहीं है |
जून  2012 में यह सूचना आयी कि राजेश खन्ना पिछले कुछ दिनों से काफी अस्वस्थ चल रहे हैं|  23 जून 2012 को उन्हें स्वास्थ्य सम्बन्धी जटिल रोगों के उपचार हेतु लीलावती अस्पताल ले जाया गया जहाँ सघन चिकित्सा कक्ष में उनका उपचार चला और वे वहाँ से जुलाई 2012 को डिस्चार्ज हो गये। उस समय वह पूरी तरहस्वस्थ हैं  ऐसी रिपोर्ट दी गयी थी |  14 जुलाई 2012 को उन्हें मुम्बई के लीलावती अस्पताल में पुन: भर्ती कराया गया और 18 जुलाई 2012 को  सुपरस्टार राजेश खन्ना ने आंखरी सांस ली और दुनिया को अलविदा कहा | रोमांटिक हीरो के रूप में काका आज भी हमारे दिलो में बसते हैं | हिंदी सिनेमा का यह आनंद भले ही आज हमारे बीच नहीं हो लेकिन उसका किरदार कभी मरेगा नहीं |  

बुधवार, 16 जुलाई 2014

जर्मनी ने मार लिया फुटबाल का मैदान

                  

अर्जेंटीना को 1-0 से शिकस्त देकर जर्मनी ने फीफा वर्ल्ड कप जीतकर इतिहास रच दिया क्युकि पहली बार लैटिन अमरीकी धरती ने चैम्पियन बनने का स्वाद न केवल चखा  बल्कि जर्मनी के एकीकरण के बाद यह पहला फुटबाल विश्वकप का  खिताब है जो उसने अपने नाम किया है | इससे पहले तीन बार जर्मनी की टीम विश्व कप के फाइनल को अपने नाम कर चुकी है  और  फाइनल अपने नाम कर वह चौथी बार खिताब पर कब्ज़ा करने में सफल रही | इस विश्व कप में जर्मनी की  अपने युवा खिलाडियों से सजी टीम ने  पूरी दुनिया को प्रभावित किया और हर मैच में अपने आकर्षक खेल से करोडो फ़ुटबाल प्रेमियों का दिल जीत लिया | 

सेमीफ़ाइनल में  ब्राजील पर  7 -1 की विजय के बाद न केवल जर्मन खिलाडियों के हौंसले बुलंद थे बल्कि इस जीत के बाद फ़ाइनल में वह अर्जन्टीना पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने में सफल हुई | जर्मनी और अर्जन्टीना के बीच खेले गए फ़ाइनल मैच का रोमांच अंतिम समय तक बना रहा क्युकि निर्धारित नब्बे मिनट के खेल में कोई भी टीम गोल करने में कामयाब नहीं हो सकी जिस कारण मैच  तीस मिनट के एक्स्ट्रा टाइम तक जा पंहुचा और  जर्मन खिलाडी मारियो गोएट्जे ने मैच के 113 वे मिनट में गोल दागकर मैच में जर्मनी को एकमात्र  गोल की  बढ़त दिलाने का काम किया जिसने  उसे जीत का करीब पहुचा दिया | जर्मनी के कोच जोकिम लोउ ने मिरास्लोव क्लोजा की जगह मारियो को जैसे ही मैदान में उतारा वैसे ही इस युवा खिलाडी ने फाइनल में अपने करिश्मे से सबका दिल जीत लिया |  इसमें कोई दो राय नहीं इस बार के फीफा विश्व कप के हर मैच में अर्जन्टीना की टीम ने अच्छे खेल का प्रदर्शन किया लेकिन फ़ाइनल में टीम बहुत ज्यादा डिफेंसिव हो गई जिसके चलते अंतिम समय में टीम की रक्षापंक्ति बिखरती नजर आई | 

जर्मनी की टीम इससे पहले  1954. 1974 और फिर 1990 में फीफा चैम्पियन रही है | 2014 के फाइनल मैच में भी मुकाबला बहुत रोमांचक रहा और अर्जन्टीना की टीम ने जर्मनी की टीम को कड़ी टक्कर दी शायद यही वजह रही जर्मनी गोल बनाने के कई मौको को गंवाती नजर आई  वहीँ अर्जन्टीना की टीम इस विश्व कप में लियोनल मैसी पर ज्यादा निर्भर रही जिसकी कीमत उसे फाइनल मैच में चुकानी  पड़ी | जर्मन रक्षा पंक्ति के निशाने पर  मैसी रहे जिनको कई मौको पर रोककर जर्मनी ने मैच में अपनी पकड़ मजबूत की वही जर्मनी की टीम ने अपने टिकी –टाका खेल से इस विश्व कप में नई इबारत गढ़ने का काम किया और यह बता दिया अगर छोटे छोटे पासो के साथ खेला जाए तो विपक्षियो को उनकी रक्षापंक्ति के साथ भेदा जा सकता है | 

इस विश्व कप में अर्जन्टीना की टीम मैसी पर बहुत ज्यादा निर्भर हो गयी जिसके चलते फाइनल में भी मैसी पर दबावों का ऐसा पहाड़ खड़ा हो गया जिसके बोझ तले वह अपना वास्तविक खेल खेलने में नाकाम रहे | फ़ाइनल मैच देखने ब्राजील पहुचे अर्जन्टीना  के करोडो समर्थको को यकीन ही नहीं हो रहा था क्या यह वही मैसी हैं जो अपने लाजवाब खेल के लिए जाने जाते रहे हैं | फाइनल मैच के अंतिम समय में गोएट्ज के एक गोल दागने के बाद मैसी को एक सुनहरा मौका बराबरी पर आने के लिए मिला लेकिन वह मौका चूक गए शायद इसकी बड़ी वजह यह रही खेल में किसी भी खिलाडी का दिन होता है और फ़ाइनल मैसी का दिन नहीं था और उनके करोडो समर्थक उनके प्रदर्शन से निराश हो गए | फ़ाइनल मैच में अपने स्टार खिलाडी के न चलने का गम क्या होता है यह अर्जन्टीना के समर्थको के हाव भावो को देखकर समझा जा सकता है जिनकी आँखों में मायूसी के  आंसू नजर आ रहे थे | 

जर्मनी की टीम ने 24 बरस के लम्बे इन्तजार के बाद इतिहास में अपना नाम दर्ज कर दिया | इस विश्व कप में जर्मनी के पास मूलर, क्लोजा , ओजिल सरीखे खिलाडियों की तिकड़ी थी जो किसी भी पल मैच का रुख अपनी तरफ मोड़ने में कामयाब रही थी लेकिन फाइनल में सारे सूरमा विपक्षियो के आगे फीके पड़ गए | वैसे भी जर्मनी की टीम का दुर्भाग्य यह रहा कई मौको पर जर्मनी की टीम वर्ल्ड कप का सेमीफाइनल खेलती आई थी लेकिन फाइनल में या तो वह बाहर हो जाती थी या फ़ाइनल में वह रनर अप  टीम रहती थी लेकिन इस बार भाग्य ने जर्मनी के खिलाडियों का साथ बखूबी दिया और फ़ाइनल में खिलाडियों की टीम स्प्रिट ने एक नया जज्बा जगाया जिसको अर्जन्टीना की टीम सही से हैंडल करने में कामयाब नहीं हुई | हार के बाद मायूसी मैसी के चेहरे पर साफ़ झलक रही थी | भले ही मैसी गोल्डन बाल का अवार्ड जीतने में कामयाब रहे लेकिन पेले और मेराडोना के सपने को साकार नहीं कर सके यह सवाल उन्हें अब बार बार कचोटता रहेगा जब जब वह मैदान में फ़ुटबाल लेकर जायेंगे |

    यह फीफा विश्वकप कई मायनों में इस बार खास रहा | मैचो में रोमांच बना रहा और कई मजबूत समझे जाने वाली पिछली विश्व कप विजेता स्पेन सरीखी  टीम की  लीग मैच में ही विदाई हो गयी | वहीँ कोस्टारिका सरीखी टीम ने इंग्लैंड ,इटली का बोरिया बिस्तरा बाध दिया और अपनी ख़ास छाप छोड़ी  |  फ्रांस , हालैंड , ब्राजील और कोलंबिया अंतिम आठ में जगह बनाने में सफल जरुर हुई लेकिन इसके बाद उनकी आगे की डगर कठिन हो गयी | कोलंबिया के रोड्रिगेज  ने 6 गोल बनाकर गोल्डन बूट भले ही अपने नाम कर लिया लेकिन ब्राजील से हारकर  वह कोई बड़ा उलटफेर करने में कामयाब नहीं रही | 

स बार कई सितारे जहाँ बुलंदियों के शिखर पर जा पहुचे वहीँ कई ऐसे भी रहे जिनका जादू फीका रहा | क्लोजा , मूलर, रोबेन ,मैसी  , स्नाइडर ने जहाँ प्रशंसको के दिलो में अपनी जगह बनाई वहीँ क्रिस्टियानो रोनाल्डो,  पिक , कैसिलास , बालोटेली, स्टीवन सरीखे खिलाडियों की चमक फीफा में फीकी पड़ी | वहीँ जर्मनी के खिलाडी क्लोजा के लिए यह साल ऐतिहासिक रहा जब उन्होंने रोनाल्डो द्वारा विश्व कप में बनाये गए 15 गोलों का रिकॉर्ड तोड़ दिया | एक महीने से ज्यादा समय से चला यह  फीफा विश्व कप कई सुनहरी यादो के साथ कडवी यादें भी छोड़ गया | 


ब्राजील की  अपने घर में जर्मनी के हाथो  करारी हार से शायद ही  उसके प्रशंसक आने वाले दिनों में उबरे जिसने फ़ाइनल में पहुचने से उसे रोक  दिया |  यही नहीं उसके स्टार खिलाडी नेमार की रीड की हड्डी में फेक्चर ने भी करोडो प्रशंसको का दिल तोड़ दिया जो ब्राजील को इस विश्व कप में प्रबल दावेदार बता रहे थे |  वहीँ सुआरेज चिलिनी को काटने के विवाद ने फ़ुटबाल की खेल भावना को ही इस बार  तार तार कर दिया | यह फीफा पर एक बड़ा कलंक हैं जिससे शायद ही वह कभी उतर पाए | वहीँ भ्रष्टाचार और फिक्सिंग के साए में फीफा के डूबे रहने की खबरों ने खेल भावना पर न केवल सवाल उठाये बल्कि फ़ुटबाल की सबसे बड़ी संस्था को अपने गिरेबान में झांकने को मजबूर कर दिया | 


जो भी हो विश्व कप आयोजन से पूर्व ब्राजील में खेल की तैयारियों को लेकर कई तरह के सवाल जरुर उठाये गए लेकिन ब्राजील ने अपने शानदार आयोजन से इस विश्व कप को यादगार बना दिया | ब्राजील में विश्व कप के दौरान खास तरह का चकाचौंध देखने को मिला | पूरा शहर रात में रौशनी से नहाया लग रहा था |  टिकट को लेकर मारामारी भी खूब मची और फाइनल में तो टिकटों की कालाबाजारी
भी चरम पर पहुच गयी जहाँ टिकट पाने के लिए लोगो को अपनी जेबें भी गरम करनी पड़ी |  एशिया में भी फीफा का जलवा देखने को मिला | लोगो ने जमकर देर रात तक जागकर  टी वी स्क्रीनों में  मैच का लुफ्त उठाया | 

भारत में भी करोडो लोगो ने इस बार फीफा के मैचो का आनंद अपने घर में लिया और बता दिया क्रिकेट के अलावे  फ़ुटबाल  की दीवानगी भी यहाँ सर चढ़कर  बोल रही है | ‘क्रिकेट चालीसा’ टी वी में अब तक चलाते रहे भारतीय समाचार चैनलों ने भी पहली बार फुटबाल विश्व कप के मैचो को लेकर अपने विशेष प्रोग्राम चलाये जिस कारण लोगो में फुटबाल के मैचो को लेकर विशेष उत्सुकता देखने को मिली |  भारतीय टी वी चैनलों का यह संकेत खेलो की सेहत के लिए कम से कम बहुत अच्छा  कहा जा सकता है |  अगर क्रिकेट से इतर अन्य खेलो के लिए मीडिया इसी तरह की कवरेज को प्रमुखता दे तो सभी खेलो के ‘अच्छे दिन `’ जल्द  आ सकते हैं |  

मंगलवार, 8 जुलाई 2014

इराक में नए संकट की आहट




इराक वर्तमान में जिस प्रचंड संकट के दौर से गुजर रहा है उसने पहली बार पूरी दुनिया के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं | मौजूदा दौर में एक सवाल जो सभी के जेहन में है , वह यह है क्या सद्दाम हुसैन के जाने के बाद  इराक  एक नई करवट लेने की दिशा में बढ़ रहा है जहाँ पहली बार शिया , सुन्नी और कुर्दों का टकराव विभाजन की उस लकीर को खींच रहा है जहाँ के आवाम के बीच बढ़ती दूरियां दुनिया के सामने भीषण संकट की तरफ इशारा कर रही हैं तो इसमें किसी तरह का कोई आश्चर्य नहीं | पिछले कुछ समय से अरब देशो और पूरे मध्य एशिया में जिस तरह बदलाव की नई बयार चली उसने कई सवालों को पहली बार  जन्म दिया है | 2010 में अफ्रीका  के छोटे से देश  ट्यूनीशिया से उठी चिंगारी ने  पूरे अरब जगत मे  जहाँ सुनामी ला  दी  वहीँ  मध्य पूर्व के जिन देशों  मे  लोकतंत्र की बयार बही वहां क्रान्ति का सीधा मतलब सैनिक तख्तापलट रहा । 2010 - 11 के साल को उथल पुथल के साल के रूप में हम  देख सकते है । इसी दौर में ट्यूनीशिया के शासक  को जहां देश  छोडना पडा वहीं  मिस्र  में एकछत्र राज कर रहे मुबारक की सत्ता का अंत भी इसी दौर मे  हुआ । वहीं यमन, जॉर्डन , अल्जीरिया , सीरिया  , लीबिया भी इसकी  लपटों में आ गये । अरब देशों  के इन जनान्दोलनों में युवाओं ने संगठित होकर भागीदारी की और संचार माध्यमों से अपनी सरकारों की मुश्किलों को बढाने का काम किया । लेकिन इस बार इराक की बयार शिया और सुन्नियो के बीच  भयानक टकराव का इशारा कर रही है जो पूरी दुनिया के लिए खतरनाक स्थिति  है | वहीँ इस पूरे मामले में अमेरिकी नीति नियंताओ की बेरूखी भी यह बता रही है अमेरिका अब इराक को उसके मौजूदा संकट से निकालने में वह दिलचस्पी दिखाने से दूर दिख रहा है जैसी वह सद्दाम सरकार को सबक सिखाने वाले दौर में दिखाता था तो यह कई सवालों को तो खड़ा ही करता है |

    इराक की मौजूदा आबादी में तकरीबन 65  फीसदी शिया और 32 फीसदी सुन्नी हैं लेकिन इराक के आवाम का संकट यह है इराक में लम्बे समय से सुन्नियो का शासन रहा है लेकिन वर्तमान समय में सुन्नी लड़ाके खाड़ी देशो के सहयोग से शियाओ को किनारे करने का खेल खेल रहे हैं जिसमे उन्हें इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक एंड सीरिया सरीखे संगठनो का पुरजोर समर्थन मिल रहा है जिसमे जमात अंसार अल इस्लाम , जैश रिजाल अल तरीका अल नक्शबंदिया, इस्लामिक आर्मी ऑफ़ इरान , जैश अल मुजाहिद्दीन सरीखे संगठन  भी अब विद्रोही भूमिका में हो चले हैं जिससे जूझ पाने में अमरीका सरीखा राष्ट्र भी पहली बार हांफता दिख रहा है | इस संकट की असल शुरुवात बीते माह उस समय हुई जब सुन्नी समुदाय के निशाने पर इराक की शिया बाहुल्य सरकार आ गयी जिसके बाद आई एस आई एस ने उत्तरी इराक में अपना तहस नहस अभियान चला दिया जहाँ हिंसा और आतंक का ऐसा खुला खेल चला जिसमे कई मासूम इराकी नागरिक और विदेशी कामगार मारे गए | कई इलाको में इनकी समानांतर सरकार ने इराकी सरकार की मुश्किलें बढाने का काम किया जिससे जूझ पाने में वह पूरी तरह विफल नजर आई | आज अगर इराक में संकट बढा है तो इसमें अमेरिका को भी कम  जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्युकि जैविक हथियारों का हवाला देकर उसने सद्दाम की बादशाहत को न केवल चुनौती दी बल्कि सद्दाम को फांसी पर लटका दिया | उसकी मंशा इराक के तेल भण्डार पर कब्ज़ा जमाने की  थी जिसके जरिये वह पूरी दुनिया में अरबो डालरों के मुनाफे को बनाने के हसीन  सपने पालने लगा | अमेरिका के इरान के साथ सम्बन्ध छत्तीस के आंकड़े पर बसे हुए हैं और इस समय जिस तरह का त्रिकोण अरब की राजनीती में बन रहा है उसमे अमरीका खुद अपने बनाये जाल में फंसता  नजर आ रहा है | 

मौजूदा दौर में  अब नजरें इरान की तरफ लगी हुई हैं क्युकि अमेरिका को आईना दिखाने के लिए शायद ही इससे बेहतर अवसर उसे  कभी भविष्य में मिले | वैसे भी अमेरिका समय समय पर इरान को लेकर अपने तल्ख़ तेवर दिखाता रहा है और अभी जिस तरह के गंभीर हालात इराक में बन रहे हैं उसने ओबामा प्रशासन के साथ व्हाइट हाउस तक को बैक फुट पर ला दिया है क्युकि पहली बार ईरान अपने अंदाज में इराक को बचाने की जद्दोजेहद में इस कदर लगा है वह अपने धार्मिक स्थलों का हवाला देकर इराक के विरोधियो को निशाने पर ले रहा है   | इधर सीरिया में भी दिनों दिन खराब होते हालत इराक की मुश्किलों को बढाने का काम कर रहे हैं | आई एस आई एस ने सीरिया के पूर्वी हिस्से में स्थित सबसे बड़े तेल के इलाके पर अपना कब्ज़ा कर लिया है जो इराक के लिए भी अब खतरा बनता जा रहा है | खतरे की आहत अमरीका  ने महसूस की है शायद यही वजह है अब ओबामा दुनिया के नेताओ को साथ लेकर इराक में सक्रियता बढाने के संकेत इशारो इशारों में दे  रहे हैं |   वैसे भी अफगानिस्तान से लेकर इराक तक अमरीका के सामने मुश्किलात पेश आ रहे हैं क्युकि इन जगहों में अमरीकी कार्यवाहियों की पूरी दुनिया में भर्त्सना हो रही है | आने वाले दिनों में अफगानिस्तान से अमरीकी फौजियों की वापसी के बाद नए हालात  भारत अफगानिस्तान सीमा में बन सकते हैं इससे इनकार नहीं किया जा सकता  | ऐसी सूरत में अफगानिस्तान सेना के तालिबानी लड़ाको  से लड़ने में पसीने छूट  सकते हैं  इसलिए स्थिति भयावह नजर आ रही है |  आज इराक जिस भीषण मुहाने पर खड़ा नजर आता है ऐसा रूप सद्दाम के दौर में भी देखने को नहीं मिलता था | 


द्दाम के दौर में शिया और कुर्दों की भारी उपेक्षा हुई जिसके बाद सद्दाम को इन जातियों के विरोधी नेता के तौर पर पूरी दुनिया में प्रचारित किया गया लेकिन सद्दाम ने अपनी नीतियों तले पूरी अरब दुनिया में जैसी जगह बनाई उसकी मिसाल अब तक देखने को नहीं मिलती | पूरी अरब दुनिया उनके नाम से खौफ खाती थी और पश्चिम के देशो के सहयोग ने उनके पाँव इराक में जमाने में बड़ी मदद की थी लेकिन 2003  में अमरीका और ब्रिटेन की बिछाई बिसात में किस तरह सद्दाम फंसे इसे इस बात से ही महसूस किया जा सकता है उनकी बाथ पार्टी का अंत करने में उनकी शासन करने की फौजी स्टाइल ही सबसे बड़ा बाधक बनी जिसका परिणाम यह हुआ उन पर जैविक हथियार रखने का आरोप लगाकर संयुक्त राष्ट्र संघ के फैसले से बेपरवाह होकर उनको कुर्सी से बेदखल कर दिया गया और उन पर मुक़दमा चलाकर उन्हें फांसी की सजा दे दी गयी | इसके बाद अमरीका ने वहां पर सरकार बनाने की कवायद शुरू की | वहीँ 2011  में उसने वहां से पल्ला झाड़ते हुए इराकी सैन्य बलों के हवाले कानून व्यवस्था छोड़ दी | मलिकी सरकार के आने के बाद इराक में जिस तरह शियाओ का वर्चस्व बढ़ा इससे सुन्नियो में भारी रोष बढ़ गया जिसका नतीजा हम सबके सामने दिख रहा है | 


राक सरकार के आज चरमपंथियों से लड़ने में पसीने छूट रहे हैं और वह अमरीकी प्रशासन की इमदाद के भरोसे संकट से निजात दिलाने की कागजी नीतियां बनाने में ही जुटा हुआ है | अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है पहले ऐसे आसार नजर आ रहे थे अमरीका इराक को बचाने की मुहिम में ड्रोन हमले कर सकता है लेकिन फिलहाल व्हाइट  हॉउस से छनकर आ रही खबरें कह रही हैं कि अमरीका इराक संकट को सलाहकारों , ड्रोन हमले से सुलझाना चाहता है | आज मध्य पूर्व एशिया  इस्लामी चरमपंथियों के नियंत्रण से परेशान है | इनका सपना इस्लामी साम्राज्य को किसी तरह पंख लगाना है जिसमे अभी सीरिया , लीबिया और इराक फायदे का सौदा बन रहे हैं | आई एस आई एस का बढ़ता दखल निश्चित ही उसकी ताकत को बताने के लिए काफी है | 


पिछले कुछ समय से जिस तरह संगठित होकर इसने इस इलाके में अपनी पैठ को मजबूत किया है उससे नूरी एल मलिकी की सरकार के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मडरा रहे हैं | खुद मलिकी मीडिया के सामने इस बात को दोहरा रहे हैं कोई भी आपात सरकार चरमपंथियों को रोकने में असहज ही रहेगी जब उसके पास संसाधनों की भारी कमी हो और अमरीका सरीखा  विकसित राष्ट्र इराक के मोर्चे पर अपने पत्ते किसी भी तरह खोलने की स्थिति में नहीं दिखाई दे रहा है  | अमरीका को अब इराक को बचाने के लिए किसी दूरगामी रणनीति पर काम करने की जरुरत है जिसमे वह तेहरान को साधकर कई अन्य मित्र राष्ट्रों को साथ लेकर किसी बड़ी कार्ययोजना से चरमपंथियों को करारा जवाब दे सकता है |

अगर इराक संकट इसी तरह बढ़ता गया और  मलिकी सरकार हाथ पर हाथ धरे  बैठी रही तो इसके पूरे दुनिया के सामने गहरे अंजाम होंगे | भारत के लिए भी यह स्थिति निश्चित तौर पर गंभीर है क्युकि कई हजार लोग इराक में अपनी रोजी रोटी के लिए वहां गए हुए हैं | मौसुल , नजफ़, कुर्दिस्तान सरीखे कई शहरों में भारतीय कामगारों की बड़ी  फ़ौज काम कर रही है और वह इन हिंसा ग्रस्त इलाको में अभी भी फँसी हुई है | हालाँकि भारत सरकार ने तिकरित में केरल की 46 नर्सो को सुरक्षित निकाल कर भारत पहुंचा दिया है लेकिन अभी भी इराक के कई  शहरों में भारतीय खतरे में हैं | यह सभी स्वदेश वापसी की आस लगाये बैठे हैं लेकिन जिन कंपनियों में ये काम करते हैं उन सभी कंपनियों में इनका वेतन फंसा हुआ है | अगर इराक संकट नहीं सुलझता तो  भारत के लिए असल संकट तेल को लेकर भी शुरू होने वाला है |भारत का अस्सी फीसदी तेल इराक से आयत होता है | अगर संकट बढ़ा तो तेल के दामो में प्रति बैरल  भारी इजाफा होगा जिसकी मार भारतीय अर्थ व्यवस्था  को झेलने को मजबूर होना पड सकता है | अच्छे दिन आने की उम्मीद लगाये बैठी देश की जनता पहले की रेल के बड़े किराए , महंगाई की करारी मार झेल रही है  | ऐसे में बड़े तेल के दाम आम आदमी को तो सीधा प्रभावित करेंगे | ऐसे में बजट के निपटने के बाद अब मोदी की सबसे बड़ी परीक्षा ईराक संकट को लेकर होगी |  अब इन सब बदली परिस्थितियों के बीच  विदेश नीति के मोर्चे पर नमो की कूटनीति का पूरे देश को इन्तजार है |

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

अंतरिक्ष में भारत की ऊँची उड़ान



भारत ने पीएसएलवी –सी23 रॉकेट के जरिये चार देशो के पांच उपग्रहों का सफलता पूर्वक परीक्षण कर ना केवल बड़ी उपलब्धि हासिल की है बल्कि अन्तरिक्ष विज्ञान की दिशा में यह कदम  इसरो के लिए मील का पत्थर साबित हुआ है | प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना जायज  है इस सफलता से भारतीय वैज्ञानिको ने अपनी प्रतिभा का लोहा  पूरी दुनिया में मनवाया है और इससे भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों को पूरी दुनिया में मान्यता मिली है | मोदी ने भारत के चन्द्र अभियान के लिए पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी का नाम गिनाते हुए उनके मंगल मिशन का जिक्र किया |  उन्होंने इस खास मौके पर यह कहा भारत के वैज्ञानिको ने पूरी दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है और अब हम मंगल मिशन की तरफ मजबूती से आगे बढ़ रहे हैं |

           इतिहास के पुराने पन्नो की तरफ झांकें तो भारत ने 1975 में रूसी यान के माध्यम से आर्य भट्ट का सफल परीक्षण कर अपने कदम अन्तरिक्ष में बढाये तब से इसरो ने इस दिशा में काफी प्रगति कर ली है | चार विकसित देशो के उपग्रह आज अन्तरिक्ष में भेजने का काम अपने दम पर कर इसरो ने  अपनी कामयाबी के झंडे पूरी दुनिया के सामने गाढ़ दिए हैं | हाल के वर्षो में भारत का नाम अगर पूरी दुनिया में बन रहा है तो इसका बड़ा कारण यहाँ की प्रतिभा और मेधा है | हमारे वैज्ञानिको की लगन और मेहनत का फल है आज अंतरिक्ष की इस ऊँची उड़ान में भारत सरीखा विकासशील देश उन विकसित देशो की जमात में खड़ा हो गया है जो हमसे बहुत आगे खड़े थे | यह पल इस मायने में भी ख़ास है क्युकि कम लागत में उपग्रह प्रक्षेपण की इतनी सस्ती सेवाएं अन्य देशो में उपलब्ध नहीं है जितनी भारत में हैं | एक अनुमान के मुताबिक भारत के मंगल अभियान में साढे चार सौ करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है जो काफी कम है वहीँ यह उपलब्धि इस बात को भी बतलाती है अगर भारतीय प्रतिभाओ को सुविधाएं और प्रोत्साहन दिया जाये तो अन्तरिक्ष में वह  सिरमौर बनने का माद्दा रखते हैं | इसरो की कामयाबी का परिणाम है आज भारत ने इस अन्तरिक्ष अभियान से न केवल आर्थिक लाभ कमाया है बल्कि अमरीका और रूस के साथ ही यूरोपीय देशो को कड़ी टक्कर दी है |           

 अन्तरिक्ष कार्यक्रम में भारत का यह बढ़ते कदम निश्चित ही अब मौसम में होने वाले बदलाव से पूरी दुनिया को वाकिफ करा  सकेंगे जिससे  अन्तरिक्ष के गूढ़ रहस्यों को भी समझने में मदद मिल सकेगी , साथ ही मौसम की सटीक भविष्यवाणी करने में यह  मददगार हो सकेंगे | तकनीक और विज्ञान के आसरे ही कोई भी देश उन्नति कर सकता है इसका ध्यान रखना जरुरी है | आज सरकार की कोशिश शोध को बढ़ावा देने और विज्ञान को लोकप्रिय बनाने की होनी चाहिए | आज बड़े पैमाने पर हमारे यहाँ  की प्रतिभा का ब्रेन ड्रेंन हो रहा है जो हमारे लिए चिंता की बात है | इस समय प्रतिभा पलायन को रोकने के लिए कुछ कदम सरकार को उठाने होंगे |  

विज्ञान और तकनीक को लोकप्रिय बनाकर उसे प्रोत्साहित कर ही हमारा देश प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकता है | यह बात प्रधानमंत्री मोदी भी बखूबी महसूस कर रहे हैं शायद तभी मोदी ने ‘ये दिल मांगे मोर’ का नारा दिया और वैज्ञानिको से ऐसा  दक्षेस उपग्रह विकसित करने को कहा जिसे अपने पडोसी देशो को उपहार के तौर पर समर्पित किया जा सके | जो भी हो अन्तरिक्ष के बड़े बाजार में इस उपलब्धि ने भारत का मान बढाने का काम तो  किया है साथ ही  सेटेलाईट और प्रक्षेपण में भी भारत की धाक जमा दी है |