मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

मैं फिल्म निर्देशक कम थियेटर निर्देशक ज्यादा हूँ.....


"गाँधी माई फादर " जैसी फिल्म बनाकर फिरोज अब्बास खान ने खुद को बालीवुड में फिल्म निर्देशक के तौर पर स्थापित किया है... वैसे बताते चले फिरोज साहब की गिनती थियेटर मंझे खिलाडियों में होती है.... जिन्होंने "सालगिरह" , "तुम्हारी अमृता", "विक्रेता रामलाल और गाँधी विरुद्ध " जैसे नाटको का कुशल निर्देशन किया ... २००७ में उनके द्वारा बनाई गई फिल्म "गाँधी माईफादर " ने कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीते जिसमे "दर्शन जरीवाला " ने गाँधी किरदार के रोल के लिए खासी लोकप्रियता बटोरी..... यही नही इस मूवी ने विशेष जूरी को "बेस्ट स्क्रीन प्ले एशिया प्रशांत पुरस्कार" समेत कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीते जिससे फिरोज को काफी लोकप्रियता मिली.... फिरोज आज भी अपने को थियेटर निर्देशक मानते है... बीते दिनों मेरी और मेरे साथी ललित की उनसे मुलाकात के मुख्य अंश ----


गाँधी माई फादर आखिरकार आपने बना ही ली.....गाँधी जैसे विराट व्यक्कित्व के किरदार को तीन घंटो के कैनवास पर उकेरना कितना मुश्किल काम था .....? साथ ही आपसे जानना चाहेंगे किस विचार ने इस किरदार के बारे में मूवी बनाने की प्रेरणा आपको दी...?
लम्बे अरसे से थियेटर से जुड़ा रहा....अभी भी पूरी तन्मयता के साथ काम कर रहा हू ..... थियेटर करते वक्त मेरे मन में फिल्म बनाने को लेकर उत्सुकता पैदा हुई....कई लोगो ने उस समय कहा आपको ऐसी फिल्म बनानी चाहिए जो थियेटर से एक दम अलग हटकर हो.... तभी मैंने तय कर लिया था मुझे अलग हटकर फिल्म बनानी है... फिर गाँधी जी जैसे विराट व्यक्तित्व पर फिल्म बनाने का आईडिया यही से जेनेरेट हुआ.....इसके लिए मैंने गाँधी जी पर नए तरीके से रिसर्च की और नयी सोच को लेकर लोगो के बीच गया.......

गाँधी माई फादर आपकी मूवी मैंने देखी ... बापू के हर एस्पेक्ट को छूने की कोशिश आपने की है....गाँधी जी पर रिसर्च के दौरान आपको क्या क्या दिक्कते आई?
फिल्म बनाने का आईडिया आने के बाद जेहन में कई तरह के सवाल उभरे ...मन में ख्याल आया इतने बड़े व्यक्तित्व के हर पहलू को उजागर करने की कोशिश के दौरान किसी भी तरह की गलती ना होने पाये ....गाँधी जी की कहानी को लेकर जो काम किया है उसमे सबसे जरुरी था जिस व्यक्तित्व को हम महात्मा कह रहे है आखिर क्यों कह रहे है ? मुझे एक पल लगा एक ऐसा आदमी जिसके पीछे सारा देश खड़ा है सारा समाज खड़ा है वही महात्मा है .... इस पर रिसर्च के लिए मैं कई बार दक्षिण अफ्रीका गया .... वहां पर गाँधी जी ने काफी लम्बा समय बिताया था.....वहां कई इतिहासकारों ने मुझसे बात की जिससे गाँधी जी को गहराई से समझ पाया .....

"गाँधी माई फादर "के लिए आपने किन किन श्रोतो और सन्दर्भ का सहारा लिया जिससे आपको गाँधी जी पर फिल्म बनाने में सरलता हुई ?
मेरा सबसे बड़ा श्रोत चंडी लाल दलाल थे जो महात्मा गाँधी जी के लेखाकार थे....उनकी किताबो ने फिल्म निर्माण में मेरी मदद की ....इसके अलावा लीलम बंसाली, हेमंत कुलकर्णी की किताबो ने भी मुझे नयी राह दिखलाई....महाराष्ट्र के इतिहासकार अजीज फडके से भी समय समय पर मेरी मुलाकात होती रही... रोबर्ट सेन की बायोग्राफी ने भी मुझे काफी लाभ पहुचाया.....

उदारीकरण
के बाद मल्टीप्लेक्स का युग आया है ....तकनीकी विकास के साथ इस दौर में फिल्म बनाने की तकनीक भी बदली है....इस समय लोगो की डिमांड भी फिल्म को लेकर अलग तरह की है...ऐसे में आप दर्शको से क्या अपेक्षा रखते है?

दर्शको से आज के दौर में मैं क्या अपेक्षा करू ? कौन सी फिल्म अच्छी है कौन सी फिल्म बुरी है यह तय करना तो दर्शको का काम है देखिये कहा भी जाता है "लाइफ ब्लो डा बेल्ट बेल्ट इस ब्लो" यह तो आपको तय करना है जो आज के दौर में संभव नही हो रहा है ....गाँधी माई फादर की बात करू तो इसे बनाने में पांच साल तो मेरे रिसर्च में ही चले गए ....


आज का दौर अब्बास साहब एक अलग तरह का दौर है.... अजब गजब कहानियो की फिल्मे हुआ करती है .... साथ ही कम बजट और कम समय में फिल्मे पूरी भी हो जा रही है ?

हाँ , आपकी बात सही है... आज सभी को फिल्म निर्माण की जल्दी है....पुराना दौर एक अलग तरह का दौर होता था... संगीत , गीत के साथ कहानी भी उस दौर में अलग प्रभाव छोडती थी.... लेकिन आज रिसर्च नाम की कोई चीज ही नही बची है सिनेमा में .... मैंने गाँधी माई फादर बनाने में पांच साल तो रिसर्च में ही बिता दिए... दूसरा कोई निर्देशक होता तो पांच साल में पचास फिल्मे बना देता .....


पिछले दिनों हमारे समाज में " डेल्ही बेली" जैसी फिल्मे आई ... क्या आप उसे फिल्म मानते है? उसमे अशिष्ट भाषा का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हुआ ?

देखिये मेरा मानना है थोडा बहुत तो चल जाता है लेकिन डेल्ही बेली ने तो हद ही कर दी.... ज्यादा अशिष्ट भाषा की फिल्मो को आप परिवार क साथ बैठकर नही देख सकते.... दूसरा आज के लोगो में फिल्म देखने का नजरिया भी बिलकुल बदल गया है.... जिसके चलते निर्देशक भी ये तय करने लगे है आपको क्या चाहिए?


आप थियेटर के मंझे खिलाडी है.... "गाँधी माई फादर " बना ली तो क्या हुआ ? मैं तो आज भी आपको थियेटर के कलाकार के रूप में देखता हू.....थियेटर की वर्तमान सूरते हाल पर आपका क्या कहना है ?

मैंने तो आपको पहले ही कह दिया मैं फिल्म निर्देशक कम थियेटर निर्देशक ज्यादा हू.... बालीवुड में आज कई थियेटर के कलाकार काम कर रहे है.....मुझे नही लगता आज भी कोई अच्छी कलाकारी में उनसे ज्यादा निपुण है......थियेटर के साथ खास बात यह है इसमें दर्शक आपके प्ले को तुरंत फीडबैक दे देता है जबकि फिल्म में ऐसा नही है......


हबीब तनवीर साहब को आज आप कैसे याद करते है? आखिरी दिनों में क्या आपकी उनसे कोई मुलाकात हुई ?

तनवीर साहब से मेरे बहुत ही मधुर सम्बन्ध रहे है.....आखिरी बार जब वह नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा आये तो उन्हें पता चला मेरा प्ले है... उन्होंने उसको देखा उसमे मैंने रामलाल की भूमिका निभाई ....तनवीर जी ने नाटक के बाद खुद मुझे शाबासी दी थी..... मै समझता हू उनके जैसा अब तक ना तो कोई थियेटरकार था ना कभी होगा ......

2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

थियेटर देखना अभी चालू किया है, कई बातें समझ में भी आ रही हैं।

संगीता पुरी ने कहा…

ज्ञानवर्द्धक लेख .. अच्‍छा लगा !!