बुधवार, 9 नवंबर 2016

चुनौतियों के पहाड़ पर ट्रंप



किसी ने उन्हें  बड़बोला कहा तो किसी ने  उन्हें सनकी कहा । किसी ने  उन्हें महिलाओं के खिलाफ फब्तियां कसने वाला इंसान बताया तो  किसी ने उन्हें राजनीति  के मैदान का नोविस बताया । किसी ने उन्हें मुसलमानों का विरोधी बताया तो किसी ने उन्हें नस्लवादी के साथ घोर राष्ट्रवादी बताने से भी गुरेज नहीं किया लेकिन अमरीका के 45 वें राष्ट्रपति बनने से डोनाल्ड ट्रंप को कोई नहीं रोक पाया और जब यह खबर पूरी दुनिया ने सुनी तो मीडिया से लेकर तमाम  राजनीतिक पंडितों और हस्तियों  के  सारे अनुमान झटके में ध्वस्त  हो गए । अमरीकन मीडिया भी इस चुनाव में हिलेरी को जिस तरह नायक बनाकर  बैठा था उसे भी सहसा यकीन नहीं हुआ आखिर हारी हुई  बाजी ट्रंप ने कैसे जीत ली ?  

डॉनल्ड ट्रंप ने अमरीका के चुनाव में  धमाकेदार  वापसी कर सबको गलत साबित कर दिया और  इतिहास में हिलेरी की पहली महिला राष्ट्रपति बनने के अरमानों को भी उन्होंने पानी  में बहा दिया । अमरीका के आम नागरिक का मानना है चुनाव मीडिया के एक्जिट पोल में नहीं लडे जाते । अगर ऐसा होता तो हिलेरी पहले हीं राष्ट्रपति बन जाती  शायद दूसरी बार उनकी दावेदारी के आस पास ट्रंप भी नहीं फटकते  । आज वक्त का तकाजा देखिये  मोनिका लेविस्की के प्रकरण में जिस बिल क्लिंटन को अमरीका  के अख़बारों ने नायक बनाया उनकी  पत्नी हिलेरी के बहुत आगे होने का प्रोपेगेंडा  भी उसी अमरीकी मीडिया में देखने को मिला लेकिन अबकी बार वहां की मीडिया ने  जिस ट्रंप को राष्ट्रपति बनने लायक  तक नही माना आज व्हाइट हाउस के दरवाजे  उसी के  लिए  खुलने जा रहे हैं और वह अगले बरस  20 जनवरी को  शपथ ग्रहण करने जा रहे  है । 

अमरीका का इस बार का चुनाव कई मायनो में दिलचस्प रहा ।  इस चुनाव में जहाँ डेमोक्रेट पार्टी  के सामने लगातार तीसरी  बार हैट्रिक  जीत दर्ज करने की चुनौती खड़ी थी वही रिपब्लिकन ने  डेमोक्रेट्स को  हराने के लिए अपनी पूरी ताकत इस चुनाव में लगा दी  । हिलेरी क्लिंटन की अमेरिकन  पहली महिला राष्ट्रपति मिलने की मजबूत उम्मीदें ट्रंप ने एक झटके में  तोड़ दी । हिलेरी ने इस चुनाव में अपनी सारी उर्जा जहाँ  ट्रंप  घेरने  में खर्च कर दी वहीँ  ट्रंप ने अमरीका के मूल मुद्दों को राष्ट्रवाद तले  जोड़ते हुए एक सधी कैम्पेनिंग की और ओबामा की नाकाम नीतियों को कटघरे में खड़ा करके लोगों के बीच अमरीका हितों  की रक्षा करने का सीधा शिगूफा छोड़ा  | ओबामा के  हिलेरी के पक्ष में झुकाव दिखाने की अपील का भी व्यापक असर इस चुनाव में नजर नहीं आया ।   ट्रंप ने ओबामा की नीतियों पर सीधा वार करते हुए कहा कि पिछले 4  साल में ओबामा की लोकप्रियता का ग्राफ घटा है और चुनाव से पूर्व उनके  द्वारा किये गए वादे  भी पूरे नहीं हुए हैं लिहाजा अमेरिकी नीतियों के मामले में भारी अव्यवस्था देखने को मिली है जिसका परिणाम बढती बेरोजगारी के रूप में सबके सामने आया है ।  ट्रंप की  पूरी चुनावी कम्पैनिंग अमेरिकी अर्थव्यवस्था की डगमगाती हालात , बेरोजगारी ,इस्लामी आतंकवाद  के इर्द गिर्द ही घूमी  |  आर्थिक नीतियों की यही दुखती रग थी जो ओबामा की सबसे बड़ी मुश्किल इस दौर में बन गयी थी  है क्युकि चार साल पहले जिन उम्मीदों के साथ अमेरिकी जनता ने उन्हें राष्ट्रपति चुना था वह उम्मीदें बिगड़ी अर्थव्यवस्था के चलते धराशाई  हो गई  | ओबामा के दौर में 200 8  से अब तक जी डी  पी महज 15 प्रतिशत बढ़त पा सका  । मंदी  का दौर खत्म  होने के बाद भी घरेलू आय में उतनी वृद्धि नहीं हो सकी जितनी होनी चाहिए थी । 

अमेरिकी आर्थिक नीतियां जहाँ इस दौर में पटरी से उतरी दिखी वहीँ संघीय खर्चो पर बीते चार बरस में पहली बार नकेल कसी हुई दिखी  जिसकी सीधी मार विकास दर पर पड़ी | नए रोजगार पैदा नहीं हो पा रहे थे और रोजगार आउटसोर्स हो रहे थे जिनके चलते अमरीकी लोगों को रोजगार के समान अवसर नहीं मिल पा रहे थे  । युवा रोजगार अमरीका की सबसे बड़ी चुनौती थी जिस पहेली का हल  ओबामा भी अपने दूसरे कार्यकाल में नहीं खोज सके ।   यही नहीं अमेरिका में बेरोजगारी के लगातार बढ रहे आंकड़ो ने भी  हाल के वर्षो में ओबामा के सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा किया |  ब्यूरो ऑफ़ लेबर स्टेटिक्स द्वारा बताये गए आंकड़े भी भयावहता की तस्वीर आँखों के सामने पेश कर रहे थे  | ऐसे में ट्रंप के सामने बड़ी चुनौती  है कि वह कैसे अमरीकी नागरिको को रोजगार दे पाते हैं ।  डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले दिनों कहा था कि गैर-अमेरिकियों की नौकरियों पर नियंत्रण करेंगे लेकिन यह कैसे साकार हो पायेगा अब यह मुश्किल चुनौती ट्रंप के सामने हो चली है । अवैध प्रवासियों का मुद्दा भी अमरीकी चुनाव में इस बार गरमाया ऐसे में ट्रंप  के जीतने के बाद अवैध प्रवासियों का क्या होगा यह भी एक बड़ा सवाल है क्योंकि अमरीकी अर्थव्यवस्था अप्रवासियों से चल रही है । ट्रंप  मानते भी हैं अवैध अप्रवासियों का अमरीका में बस जाना अपराध और आतंकवाद को बढ़ावा देता है । ऐसे में क्या इन सबको वर्क वीजा मिल पायेगा यह भी देखने लायक बात है क्योंकि इस मुद्दे ने ट्रंप  को अमरीका का नायक बनाया है ।

 अमेरिकियों का वोट पाने के लिए ट्रंप अमेरिकी युवाओं के लिए नौकरियों की बात तो की है लेकिन  क्या इसको अमली जामा जल्द पहनाया जा सकता है  ? अगर ऐसा होता है तो अमरीकियों की नौकरियां गैर-अमेरिकियों के हाथ में नहीं जायेंगी । आतंकवाद को लेकर  भी ट्रंप  की नीति देखने लायक होगी क्योंकि इस  चुनाव में इस्लामिक आतंकवाद और आई एस आई एस के आतंक को लेकर उन्होंने अमरीकियों के वोट बड़े पैमाने में पाए हैं । ऐसे में आतंक और विदेश नीति के मोर्चे पर भी ट्रंप  की नीति देखने लायक रहेगी । जहां तक हेल्थ केयर की बात है तो ट्रंप  इस स्वास्थ्य नीति को शायद खत्म कर दें क्युकि वह इसे अर्थव्यवस्था के लिए भारी बोझ मानते हैं ।  अमीरों को भी टैक्स में छूट दिए जाने की नीति का भी शायद ट्रंप अमली जाम पहनाएं क्योंकि वह खुद कारोबारी जगत से जुड़े हैं ।  ट्रंप को वैसे तो आउटसाइडर कहा गया था लेकिन उन्होंने साबित कर दिया कि  वह इनसाइडर हिलेरी  से बेहतर हैं  । 

इस चुनाव में 29 राज्यों पर ट्रंप का सिक्का मजबूती के साथ चला । स्विंग स्टेट पर भी उन्होंने अपनी मजबूत पकड़ दिखाई । न्यू जर्सी से लेकर ओहायो , फ्लोरिडा से लेकर नार्थ कैरोलीना हर जगह रिपब्लिक गढ़ नजर आया । हिलेरी क्लिंटन के साथ सबसे बड़ी दिक्कत भरोसे और क्रेडिबिलिटी  की रही । शुरुवाती बहसों में तो उन्होंने  ट्रंप पर बढ़त बना ली लेकिन अंतिम बहस से ठीक पहले  हिलेरी के ईमेल स्कैंडल ने इतना तूल पकड़ा कि डेमोक्रेट इस मसले पर बैकफुट पर आ गए  ।निजी ईमेल सर्वर के इस्तेमालसे जुड़े मामले में जांच फिलहाल शुरू करने की ऍफ़ बी आई प्रमुख की नीति ने अंतिम दौर में ट्रंप को मुकाबले में लाकर खड़ा किया और हिलेरी जाल में फँस गई । श्वेत लोगों और अल्पसंख्यकों, शहरियों और ग्रामीणों, मजदूरों और बड़ी नौकरियां करने वालों के बीच बढ़ती खाई का  ट्रंप ने  भरपूर फायदा उठाया । निजी ईमेल विवाद से लेकर अपने पारिवारिक फाउंडेशन को मिले धन के इस्तेमाल तक लगातार उनके सामने ऐसे विवाद आए जो खुद डेमोक्रैट्स को परेशान करते रहे ।

 ट्रंप  ने डेमोक्रेट के गढ़ में तो सेंध लगाई साथ ही श्वेत मतदाता का बड़ा हिस्सा ट्रंप के पक्ष में लामबंद होता दिखा जिसमे किसानों से कामकाजी वर्ग का बड़ा वोट शामिल रहा जिनकी नब्ज को ट्रंप  ने अपनी रैलियों में भी बखूबी पकड़ा और चुनाव में खूब पसीना बहाया । अमरीकी लोग अर्थव्यवस्था और अमेरिका के विदेशों में प्रदर्शन से संतुष्ट नहीं थे ।  ट्रंप ने  इनको बड़ा मुद्दा बनाया और अपनी नाव पार लगा दी ।

इस चुनाव में  ट्रंप  ने अपना एजेंडा साफ़ करते हुए कहा है रोजगार के अवसर ज्यादा बढ़ाना उनकी पहली प्राथमिकता रहेगी | | जहाँ तक हाल के वर्षो में ओबामा की विदेश नीति का सवाल है तो इस मोर्चे पर पहली बार ओबामा ने नई लीक पर चलने का साहस  दिखाया  | वह ऐसे पहले राष्ट्रपति रहे जिसने मुस्लिम राष्ट्रों का दौरा कर उनके साथ बीते दौर के गिले शिकवे भुलाकर एक नई  पारी की शुरुवात कर जताया  है कि अमरीका सभी देशो के साथ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व कायम करने की अपनी नीति का पक्षधर रहा है | यही नहीं अपने धुर विरोधी चीन, रूस की यात्रा द्वारा ओबामा ने यह जताया है कि वह बदलते दौर  के मद्देनजर खुद को बदलने के लिए बेकरार खड़ा है | दुनिया के सभी देश बदल रहे हैं अतः उसे भी बदलना होगा नहीं तो यूरोप की तरह वह भी अर्श से फर्श पर आ सकता है |  लेकिन  ट्रंप  मुस्लिमो के खिलाफ कई भड़काऊ बयान देते रहे हैं । चीन और मेक्सिको को  वह चुनाव प्रचार  में लताड़ लगा चुके हैं वहीँ ओबामा की ईराक और अफगानिस्तान की नीति पर और पूरी  विदेश नीति को कटघरे में खड़ा करते रहे हैं । 

उन्होंने बराक ओबामा के शासन की विदेश नीति पर जो सवाल उठाए और आइएसआइएस के गुप्त समर्थन तक के आरोप लगाए अब  इस मसले पर ऊँट किस करवट बैठता है यह देखना होगा ? रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने ट्रंप की जीत पर बधाई देकर एक नई शुरुवात की है । बड़ा सवाल है क्या इस जीत के बाद रूस और अमरीका का शीत युद्ध  थम जाएगा और सीरिया के संकट पर और बगदादी के खात्मे को लेकर कोई रजामंदी हो सकती है ?   ट्रंप  चीन को अमरीका के लिए बड़ा खतरा मानते रहे हैं और मेक्सिको की ड्रैग और तस्करी की दीवार को ध्वस्त करना चाहते हैं  |  

                   इस चुनाव पर पूरी दुनिया के साथ भारत की नजरें भी लगी हुई हैं | अगर ओबामा ने भारत को एशिया  में बड़ा साझीदार माना है तो वहीँ रिपब्लिकन भी इस सच को नहीं झुठला सकते क्युकि बुश के कार्यकाल में ही पहली बार भारत और अमरीका की दोस्ती वाजपेयी के दौर में ही परवान चढ़ी  थी | उस दौर में इंडो यू एस  न्यूक्लियर डील को अंजाम दिया गया था जो आज मोदिनोमिक्स  की  छाँव  तले आर्थिक सुधारो यानी  एफ डी आई तक आगे बढ़ चुकी है जहाँ पूरा  बाजार अमरीकी कंपनियों के हवाले है और भारत अमरीकी सम्बन्ध सबसे बेहतर दौर में हैं । यकीन जानिए आज के दौर में अगर अमेरीका की  सबसे बड़ी जरुरत भारत है क्युकि वह आज वह एशिया की उभरती ताकत है शायद इसी के चलते वहां के दोनों दल आज भारत को उसका एक बड़ा साझीदार मानने से गुरेज नहीं करते |चीन की घेरेबंदी के लिए भी भारत को साधना अमरीका की आज बड़ी जरूरत बन चुकी है ।  जहां तक भारत  अमरीकी संबंधों का सवाल है तो  ट्रंप  ने मोदी की तारीफों के कसीदे पड़कर भारतीय समुदाय का पुरजोर  समर्थन इस चुनाव में पाया है ।  भारतीयों ने खुलकर  ट्रंप को वोट दिया है । ट्रंप भारतीयों की नौकरी अब छीनेंगे या ऍफ़ डी  आई के रास्ते भारत के बाज़ार में  सेंधमारी कर अमरीकी अर्थव्यवस्था में कुलांचे मारेंगे यह देखने  लायक बात रहेगी । 

उनकी सबसे बड़ी कामयाबी आतंकवादियों के विरुद्ध कड़े रुख को दिखाने की  होगी  जिसमे  इस्लामिक आतंक के खिलाफ उनकी नीति  उनकी भावी प्राथमिकताओं  को तय करेगी ।  पाकिस्तान को वह आतंक का सबसे  बड़ा गढ़ बताते रहे हैं । इस मसले पर वह क्या रुख अपनाएंगे यह भी देखना होगा क्युकि अमरीका की हर बरस दी जाने वाली  इमदाद से ही पाकिस्तान का हुक्का पानी चलता रहा है और रिपब्लिकन कई बार ओबामा प्रशासन को इस मसले पर घेरते रहे हैं ।

 ट्रंप तो कई बार यह भी कह चुके हैं कि पकिस्तान के परमाणु हथियार सुरक्षित नहीं हैं । ऐसे में पाक के प्रति उनके हर रुख पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी । बहरहाल जो भी हो यह सच है दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ट्रंप की जीत राष्ट्रवाद की जीत है ।  पुरी दुनिया की नजरें अब ट्रंप पर हैं क्युकि अगले बरस व्हाइट  हॉउस उनके स्वागत के लिए बेक़रार है । 

कोई टिप्पणी नहीं: