सोमवार, 5 दिसंबर 2016

बहुत याद आएंगी 'अम्मा '





दक्षिण भारत की राजनीति में अम्मा के नाम से मशहूर  तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता का सोमवार रात  निधन हो गया। वो बीते 22 सितंबर से अस्पताल में भर्ती थी । वे पूरे 73 दिनों से बीमार थीं लेकिन 13 नवंबर को उनकी सेहत में सुधार और उन्हें अस्पताल  से छुट्टी देने की खबरों के बीच  रविवार शाम अचानक उन्हें  दिल का दौरा पड़ा जिसके बाद उन्हें  सीसीयू में रखा गया था। चेन्नंई के अपोलो हॉस्पि‍टल के बाहर उनके समर्थकों की भारी  भीड़ जमा थी जो रोते-बिलखते नजर आये ।  ये पहला मौका नहीं था , जब जयललिता को लेकर दक्षिण  के लोग  इतने भावुक हुए । बीते बरस  उनकी भ्रष्टाचार मामले में  गिरफ्तारी ने भी एक तरह से तमिलनाडु की गति को थाम दिया था और उनके समर्थकों ने आत्महत्या तक  के प्रयास तक किए थे। देखा जाए तो दक्षिण भारत  उसके राजनेताओं के प्रति भावुक और बेहद संवदेनशील रहा  है। बात फिर चाहे द्रविड़ अांदोलन के ईवीरामास्वा मी पेरियार की हो, या एआईएडीएमके के एम.जी. रामचंद्रन की हो या विमान हादसे में दिवंगत हुए वाई  एस  राजशेखर रेड्डी की या  फिर तमिलनाडु के इतिहास की एक और सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता जयललिता जयराम की। जया की मौत से पूरा तमिलनाडु सडकों पर सैलाब बनकर उमड़ आया  जो यह बताता है तमिल राजनीती में जया का प्रभाव कितना व्यापक था और क्यों लोग उन्हें चाहते थे । 

कभी फिल्मों से राजनीति में दाखिल होने वाली जयललिता ने सोचा भी नहीं होगा  तमिल राजनीति में वह बड़ा मुकाम हासिल करेंगी। लेकिन तमिलनाडु की जनता ने उन्हें सिरमाथे बिठाया। जी रामचंद्रन ने जयललिता को राजनीति के गुर सिखाए। मुख्यमंत्री जयललिता के निधन से तमिलनाडू की राजनीती में जो रिक्तता आई है वह अब आसानी से भरी नहीं जा सकती क्युकि तमिलनाडु की राजनीती लम्बे समय से अम्मा और करूणानिधि के इर्द गिर्द ही घूमती रही है | जया से पहले उनके राजनीतिक गुरू एमजी  एमजीआर का दौर याद करें तो 32 बरस पहले भी उनके चर्चे गली गली में होते थे । संयोग देखिये जी रामचंद्रन भी अस्सी के दसहक में जब बीमार हुए  तो अपोलो  में ही भर्ती हुए । अन्तर सिर्फ इतना रहा जिस अपोलो ने जी रामचंद्रन को नया जीवन दिया कल  उसी अपोलो ने जया के सांसों की धड़कन रोक दी । 1969 में डीएमके पार्टी के करुणानिधि के मुख्यमंत्री बने तो भी तमिल की पूरी राजनीति अन्नाद्रमुक और द्रमुक के इर्द गिर्द ही घूमी | 90 के दशक में में करुणानिधि को पराजित करने के बाद जयललिता पहली बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी थीं। तब से अब तक वे चाहे सत्तासीन रही हों या विपक्ष में बैठी हों तमिलनाडु के राजनीतिक पटल पर अम्मा की चमक कभी फीकी नहीं पड़ी | उन्होंने एम जी आर की विरासत को ना केवल बखूबी  थामा बल्कि सिल्वर स्क्रीन  की तर्ज पर राजनीती की स्क्रीन पर धूमकेतु की तरह चमककर गरीबों को लाभ देने वाली कई योजनायें लाकर उनके दिलों में राज किया | 22 सितंबर को जया के अस्पताल जाने के दिन से ही उनकी सेहत के बारे में तमाम कयास लगते  रहे लेकिन 5 दिसम्बर की रात साढ़े 11 बजते बजते अम्मा इस दुनिया से विदा हो गई और अपने करोड़ों समर्थकों की आँखें नम कर गई | 


तमिल फिल्मों की लोकप्रिय स्टारजया का जन्म समृद्ध ब्राह्मण परिवार में हुआ था|  उनकी माँ संध्या कैरियर संवारने शाही मैसूर से चेन्नई आ गईं थीं |  जया उन्हीं के रास्ते पर चली और किशोरावस्था में ही उनका रुझान फिल्मों की ओर हो गया | एक्टिंग की शुरुआत के बाद देखते ही देखते वह दक्षिण भारतीय और खासकर तमिल फिल्मों की लोकप्रिय स्टार बन गईं |  नायिका के तौर पर जयललिता का सफर ‘वेन्निरा अदाई’ (द व्हाइट ड्रेस) से शुरू हुआ । जया  ने तमिल फिल्म 'वेन्नीरादई' से डेब्यू किया था, जो श्रीधर के निर्देशन में बनी थी ।  इस फिल्म ने अच्छी कमाई की थी और इस फिल्म के जरिए ही जयललिता ने लोगों के दिलों में अपनी अदाकारी की छाप छोड़ी थी । यही छवि उन्होंने 1972 में डीएमके से अलग होने के बाद तमिलनाडु की राजनीति में भी कायम रखी । जया ने साठ के दशक में पहले तो एमजीआर की हीरोईन के रूप में और फिर उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में कभी भी एमजीआर को, अपने निर्देशकों को, अपने प्रशंसकोंको निराश नहीं किया शायद यही वजह रही पहले फिल्म स्टार के तौर पर वह लोगों के दिलों में बसी और बाद में एक सशक्त राजनेता के तौर पर तमिल राजनीती में अपनी अलहदा पहचान बनाई जहाँ उनकी मर्जी के पत्ता भी नहीं हिलता था |  ऐसा रोजमर्रा के कामकाज में भी दिखता था । जब वह बीमार थी तो उनकी अनुपस्थिति में पूरी कैबिनेट उनकी फोटो सामने रखकर मीटिंग करती थी तो वहीँ  पेनिसेल्लिन भी उनकी फोटो साथ रखकर कामकाज निपटाते थे । 

जयललिता के पास लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतने का शानदार रिकॉर्ड रहा । जया ने राजनीतिक गठबंधन का इस्तेमाल अपनी ताकत बढ़ाने के लिए नहीं किया । वह अकेले ही राजनीती की राहों पर निष्कंटक होकर चली शायद यही वजह रही उनकी काम करने की शैली भी अलहदा  रही । 1952 में कुमारस्वामी राजा के बाद वह पहली सीएम बनीं जो 1996 में न सिर्फ विधानसभा चुनाव हार गईं बल्कि धरमपुरी जिले की अपनी बरगुर सीट भी नहीं बचा पाईं इसके बावजूद वह राजनीती के रण में डटी रही । 80 के दशक में राजनीती  में आने के बाद औपचारिक तौर पर उनकी शुरुआत तब हुई जब वह अन्नाद्रमुक में शामिल हुईं | 1987 में एम जी रामचंद्रन के निधन के बाद पार्टी को चलाने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई और उन्होंने व्यापक राजनीतिक सूझ-बूझ का परिचय दिया | रामचंद्रन ने करिश्माई छवि की अदाकारा-राजनेता को 1984 में राज्यसभा सदस्य बनाया जिनके साथ उन्होंने 28 फिल्में की । 1984 के विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव में पार्टी प्रभार का तब नेतृत्व किया जब अस्वस्थता के कारण प्रचार नहीं कर सके थे। वर्ष 1987 में रामचंद्रन के निधन के बाद राजनीति में वह खुलकर सामने आईं लेकिन अन्नाद्रमुक में फूट पड़ गई. ऐतिहासिक राजाजी हॉल में एमजीआर का शव पड़ा हुआ था और द्रमुक के एक नेता ने उन्हें मंच से हटाने की कोशिश की लेकिन 21 घंटे वह एम जी आर के पार्थिव शरीर के साथ खडी रही |  बाद में अन्नाद्रमुक दल दो धड़े में बंट गया जिसे जयललिता और रामचंद्रन की पत्नी जानकी के नाम पर अन्नाद्रमुक (जे)और अन्नाद्रमुक (जा) कहा गया । एमजीआर कैबिनेट में वरिष्ठ मंत्री आरएम वीरप्पन जैसे नेताओं के खेमे की वजह से अन्नाद्रमुक की निर्विवाद प्रमुख बनने की राह में अड़चन आई और उन्हें भीषण संघर्ष का सामना करना पड़ा ।  जयललिता ने बोदिनायाकन्नूर से 1989 में तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की और सदन में पहली महिला प्रतिपक्ष नेता बनीं। इस दौरान राजनीतिक और निजी जीवन में कुछ बदलाव आया जब जयललिता ने आरोप लगाया कि सत्तारुढ़ द्रमुक ने उनपर हमला किया और उनको परेशान किया गया। रामचंद्रन की मौत के बाद बंट चुकी अन्नाद्रमुक को उन्होंने 1990 में एकजुट कर 1991 में जबरदस्त बहुमत दिलाई ।  पांच साल के कार्यकाल में भ्रष्टाचार के आरोपों, अपने दत्तक पुत्र की शादी में जमकर दिखावा और उम्मीदों के अनुरूप प्रदर्शन नहीं करने के चलते उन्हें 1996 में अपने चिर प्रतिद्वंद्वी द्रमुक के हाथों सत्ता गंवानी पड़ी । इसके बाद उनके खिलाफ आय के ज्ञात स्रोत से अधिक संपत्ति सहित कई मामले दायर किये गए  । अदालती मामलों के बाद उन्हें दो बार पद छोड़ना पड़ा ।  

भ्रष्टाचार के मामलों में 68 वर्षीय जयललिता को दो बार पद छोड़ना पड़ा लेकिन दोनों मौके पर वह नाटकीय तौर पर वापसी करने में सफल रहीं | पहली बार 2001 में दूसरी बार 2014 में . उच्चतम न्यायालय द्वारा तांसी मामले में चुनावी अयोग्यता ठहराने से सितंबर 2001 के बाद करीब छह महीने वह पद से दूर रहीं । बेंगलुरू में एक निचली अदालत द्वारा भ्रष्टाचार के एक मामले में दोषसिद्धि के बाद एक बार फिर विधायक से अयोग्य ठहराए जाने पर 29 सितंबर 2014 और 22 मई 2015 के बीच उन्हें मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा । बाद में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने फैसले को खारिज कर दिया ।  दो बार उन्हें जेल जाना पड़ा। पहली बार तब जब द्रमुक सरकार ने 1996 में भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया और दूसरी बार 2014 में लेकिन जयललिता दोनों मौके पर वापसी करने में सफल रहीं। 

वह पांच बार तमिलनाडु  में मुख्यमंत्री रहीं ।  तीन दशकों बाद इतिहास रचते हुए पार्टी को लगातार जीत दिलाकर वर्ष 2016 में भी उन्होंने सत्ता कायम रखी। जयललिता की लोकप्रियता का आलम यह था कि लोग उन्हें अम्मा के नाम से बुलाते थे ।  2014  के लोकसभा चुनावों में जब पूरा देश मोदी लहर के खुमार में था तो अन्नाद्रमुक ने तमिलनाडु की 39 सीटों में से 37  सीटों पर जीत दर्ज की। इसकी वजह जयललिता की जन कल्याणकारी योजनाएं रहीं। इसने उन्हें आम लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय बनाया। यह जयललिता की राजनीतिक पकड़ मजबूत करने का जरिया कहे या वोट बैंक की पॉलिशी की राज्य के कुल खर्च का 37  फीसदी सब्सिडी पर खर्च होता था । अम्मा ब्रांड के जरिए जयललिता ने लोगों की रसोई तक में अपनी पहुंच बनाई। इस ब्रांड ने बहुत हद तक गरीबों को महंगाई से छुटकारा भी दिलाने की कोशिश की। जयललिता तमिलनाडु की ऐसे नेताओं में शुमार रहीं जिसने अपने करिश्माई व्यक्तित्व से सत्ता पाई। कई बार उठापटक के बाद भी उन्होंने सत्ता हासिल की। उनकी छवि अन्नाद्रमुक के वन मैन लीडर के रूप में बरकरार रही । लेकिन अपने पहले कार्यकाल में धन और शक्ति का बेजा प्रदर्शन और विरोधियों के प्रति आक्रामक रुख ने उन्हें कद्दावर राजनीतिज्ञ भी बनाया। हालांकि तीसरे कार्यकाल जयललिता ने अपनी छवि कल्याणकारी योजनाएं चलाने वाली नेता की गढ़ी।

जयललिता की मौत के बाद अब अन्नाद्रमुक के भीतर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं | बेशक पनीरसेल्वम ने सी एम की  कमान अपने हाथ में ले ली है लेकिन अब पार्टी के भविष्य को लेकर असमंजस है | अरसे से पार्टी का बड़ा चेहरा अम्मा  ही रही है और दूसरे किसी नेता को कभी पार्टी ने आगे नहीं किया | ऐसे में सवाल पूरी पार्टी को एकजुट रखने का है | दशकों से तमिल राजनीति में जया का सिक्का मजबूती के साथ चलता रहा और अन्ना द्रमुक का मतलब अम्मा और अम्मा का मतलब अन्नाद्रमुक रहा तो इसका साफ़ कारण जया ही रही । जया ने  शिक्षा और रोजगार में आरक्षण, लुभावने तोहफे बांटने और अम्मा कैंटीन सरीखी सहित कई  योजनाओं के आसरे तमिल राजनीती में नई लकीर खींच  दी । यही नहीं  गरीबों को सस्ती दरों पर लोकलुभावन उपहार भी उन्होंने अपने  कार्यकाल में दिए जिससे गरीब गोरबा जनता के सामने वह देवी मानी जाने लगी ।  जब वह अपोलो गई तो उनके लाखो समर्थक सडकों पर अपने लोकप्रिय नेता के स्वस्थ होने की कामना करने लगे ।  उत्तर से लेकर दस्क्षण , पूरब से लेकर पश्चिम उनकी सलामती की दुवाएं हर तरफ की जाने लगी जो उनके मॉस लीडर होने की उपयोगिता को साबित कर रहा था । 


जयललिता की मौत के बाद पनीरसेल्वम   मुख्यमंत्री पद की शपथ भी ले चुके हैं लेकिन सबको एकजुट रखने की बड़ी चुनौती अब उनके सामने है । शुरुवात से पनीरसेल्वम को उनका  विश्वासपात्र माना जाता रहा है । पूर्व में भ्रष्टाचार के मामले में दोषी करार दिए जाने के बाद जयललिता के पद से हटने पर पनीरसेल्वम मुख्यमंत्री बनाए गए थे। उन्हें शासन प्रशासन  चलाने का अच्छा अनुभव भी है । आज भी उन्हें ही मंत्रिमंडल के सदस्यों  ने सी एम बनने का मौका दिया है । इस  दुखद घडी में सबको साथ लेकर चलना जरूरी है । अब तक पार्टी में जया की सहमति  के कोई काम नहीं होता था । ऐसे में अब उनके जाने के बाद पार्टी के सभी निर्णयों में एक राय कायम  करनी मुश्किल हो जायेगी । अन्ना द्रमुक में अब किसी एक चेहरे को संगठनकर्ता की भूमिका में सामने आना होगा । मौजूदा  हालातों में पार्टी में महासचिव की कमान जया  की खास सलाहकार शशिकला संभाल सकती हैं। 

जयललिता के दौर में सरकार और पार्टी में अगर किसी की ठसक थी तो वह शशिकला  ही रही जिन्हें जया का दाहिना हाथ माना जाता था ।  पनीरसेल्वम को भी  सी एम  की कुर्सी  दो  बार मिली तो उसमे शशिकला की रजामंदी  थी।  अब पनीरसेल्वम के सी एम बनने के बाद शायद पूरी  पार्टी को वह अपने नियंत्रण में लें । चुनाव की फंडिंग से लेकर तमिल की हर चुनावी बिसात वह अपने हिसाब से बिछाएं । हालांकि अभी पनीरसेल्वम सी  एम बनाये  गए हैं लेकिन अभी तमिलनाडु में कोई चुनाव भी नहीं है लिहाजा  पनीरसेल्वम को जया के बेहतर विकल्प के रूप में खुद को पेश करने की जरूरत है । उनका आने वाला ट्रेक रिकॉर्ड भी अन्ना द्रमुक के भावी भविष्य को तय करेगा । इस बार तमिल चुनावों के दौरान  जया ने जो चुनावी वादे जनता से करे अब उनको जमीनी हकीकत में उतारने की कठिन चुनौती पनीरसेल्वम  के सामने खड़ी है  जहाँ  से उनको एक नई लकीर तमिल राजनीति में खींचने की जरूरत होगी । उनको खुद को अब साबित करना होगा । 


तमिलनाडु की राजनीती भी जातीय दलदल में उलझी है । सभी लोगों का विश्वास  जीतने की बड़ी चुनौती अब पनीरसेल्वम  के सामने है । पनीरसेल्वम भी तेवर जाति से हैं और शशिकला भी लिहाजा आने वाले समय के मद्देनजर उनको फूंक फूंक  कर कदम रखने की जरूरत है । अगर पार्टी के भीतर कोई नेता असंतुष्ट  हो गया तो पार्टी में बिखराव का खतरा उत्पन्न हो सकता है इसलिए सभी को साधना जरूरी हो चला है ।  उधर जया  की मौत के बाद विपक्षी  द्रमुक की भी सियासी उठापठक में दिलचस्पी  बढ़ सकती है । राजनीती में कुछ भी हो सकता है । आने वाले दिनों में अगर पनीरसेल्वम सही शासन दे पाने में विफल होते हैं तो द्रमुक पनीरसेल्वम के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद कर अन्ना द्रमुक की ताकत के कमजोर भी कर सकती है । 

पनीरसेल्वम अगर तमिलनाडु में अच्छी सरकार दे पाते हैं तो बहुत संभव हो सकता है पनीरसेल्वम पार्टी में खुद को बड़े नेता के तौर पर स्थापित करने  में सफल हो सकते हैं । उनको अब जया के यस मैन की छवि से बाहर आना पड़ेगा तभी कुछ बात बन पायेगी ।  द्रमुक के मुखिया  करूणानिधि  का स्वास्थ्य भी अभी सही नहीं है । स्टालिन को बेशक उन्होंने कमान दी है लेकिन उनकी पार्टी में भी  यह जगजाहिर ही रहा करूणानिधि के करिश्मे को दोहरा पाना मुश्किल है । पार्टी को उन्होंने फर्श से अर्श तक पहुचाया । यह अलग बात है  टू  जी के भ्रष्टाचार ने उनकी पार्टी की साख मतदाताओं के बीच गिराने का काम किया है । 2014  के लोकसभा चुनाव और इस बरस के विधान सभा चुनावों में द्रमुक की हालात पतली हो गयी । वहां से पार्टी को फिर से उठाना स्टॅलिन के सामने मुश्किल है जब उनके विरोधी भी पार्टी के भीतर बढ़ रहे हैं और हवा द्रमुक के बिलकुल विपरीत दिशा में बह रही है । ऐसे में अन्ना द्रमुक को अगर जनता का विश्वास जीतना है तो जया के अधूरे  काम पूरे करने होंगे । पनीरसेल्वम के पास अभी बहुत समय बचा है । तमिलनाडु  की राजनीती द्रमुक और अन्नाद्रमुक के आगे पीछे ही घूमती रहती है । आने वाले दिनों में भी फिलहाल यही ट्रेंड हमें देखने को मिलेगा । जहाँ तक राष्ट्रीय दलों की बात है तो कांग्रेस की तमिलनाडु में वापसी दूऱ  की गोटी है  । भाजपा दक्षिण में बिना चेहरे के जीत नहीं सकती । हालाँकि संघ का प्रभाव तमिलनाडु के कई हिस्सों में जरूर है लेकिन बिना चेहरों के राजनीती में कोई जंग नहीं जीती जाती । तमिलनाडु में बिना कप्तान के भाजपा  पसार नहीं सकती । भाजपा रजनीकांत पर डोरे डालकर अपनी जमीन मजबूर कर सकती है लेकिन वह उसकेपाले में आएंगे इसकी गारंटी नहीं है । एक दौर में रजनीकांत की जया से निकटता की खबरें आयी थी लेकिन इसे रस बीत गया है । फिर भी राजनीती में कुछ भी संभव है । बड़ा सवाल है क्या रजनीकांत का भाजपा में एक चैनल अगर नहीं खुलता है  क्या  वो जया की पार्टी में अपने लिए संभावना तलाश सकते हैं ? यह फिलहाल भविष्य के गर्भ में है । 

 मौजूदा  दौर ऐसा है जहाँ राष्ट्रीय राजनीती का लोकलाइजेशन हो गया है । अब हर राज्य में छत्रप अपना असर दिखा रहे हैं । विधान सभा में किसी दल की अगर सरकार बन रही है तो यह जरूरी नहीं  महानगर पालिका के चुनावों और केन्द्र के चुनाव में भी वही दल  सत्तासीन हो जाए । ऐसे में अन्नाद्रमुक को जया के अधूरे कामों को आगे बढ़ाने की जरूरत है । जयललिता  की असामयिक मौत के बाद उनके वोटरों में सहानुभूति की लहर भी अन्नाद्रमुक की भावी राह को न केवल आसान कर सकती है बल्कि उसके वोट बैंक को भी नहीं छिटकने  देगी । देखना होगा पनीरसेल्वम जयललिता के जाने के बाद पार्टी को किस तरह संभालते हैं ? फिलहाल इस बारे में कुछ कह पाना बहुत जल्दबाजी होगी । 

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