कोरोनारूपी महामारी से जुड़ी हर मुश्किल घड़ी का सामना लाकडाउन में हमने भले ही मुस्कुराते हुए किया हो , लेकिन अनलाक में कोरोना अब अधिक दुर्गम सार्वजनिक चुनौती बन रहा है और रुला रहा है । कोरोना को लेकर सरकारी घोषणा एवं आकलन भी चुनावी घोषणा पत्र की तरह लगने लगे हैं। भारत में जब कोरोना के मामले नगण्य थे, सरकार और प्रशासन बहुत जागरूक था। जब मामले चरम पर थे, सरकारें निस्तेज हो गयी थी, यह कैसी विडम्बना एवं विरोधाभास है? कोरोना का खतरा एक बार फिर डरा रहा है, कोरोना पीड़ितों की संख्या फिर बढ़ने लगी है। कोरोना महामारी की दूसरी लहर में लापरवाही बहुत घातक साबित हो सकती है । दूसरी लहर में रोजाना सामने आने वाले नए मामलों की संख्या 20 हजार से 1 लाख पार करने में महज 25 दिन लगे जबकि पहली लहर में मात्र 76 दिनों में आंकड़ा 1 लाख पहुंचा था । इस दौर में 8 राज्य कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं और 80 फीसदी से अधिक मामले इन्हीं राज्यों में पाये गए हैं । इन बढ़ती कोरोना पीड़ितों की संख्या से केवल सरकार के चिन्तित होने से काम नहीं चलेगा, आम जनता को जागरूक एवं जिम्मेदार होना होगा। लोगों की थोड़ी-सी लापरवाही खतरे को बढ़ाती चली जा रही है। इस साल की शुरुवात में जनवरी फरवरी के महीने में ऐसा लगने लगा था कि अब कोरोना जाने वाला है, नए मामलों की संख्या 11,000 के पास पहुंचने लगी थी, लेकिन अब नए मामलों की संख्या रोजाना 50 हजार के पार कर चुकी है। रविवार को तो देश में 93 हजार से ज्यादा नए कोरोना संक्रमित मामले सामने आए हैं जिसने सभी के माथे पर फिर से चिंता की लकीरें खींच दी हैं । 9-10 सितंबर 2020 के आसपास हमने कोरोना का चरम देखा था, जब मामले रोज 97,000 के पार पहुंचने लगे थे। इसमें दुखद तथ्य यह है कि तब भी महाराष्ट्र सबसे आगे था और आज भी 60 प्रतिशत से ज्यादा मामले अकेले इसी राज्य से आ रहे हैं।
हम वही देखते हैं, जो सामने घटित होता है। पर यह क्यों घटित हुआ या कौन इसके लिये जिम्मेदार है? यह वक्त ही जान सकता है। आदमी तब सच बोलता है, जब किसी ओर से उसे छुपा नहीं सकता, पर वक्त सदैव ही सच को उद्घाटित कर देता है। देश के लिए यह सोचने का समय है, ताकि पिछले साल की तरह कोरोना संक्रमण वापसी न कर सके। आंखें खोलकर एक पर आंकड़ों को गौर से नए चश्में से देखना होगा। यक्ष प्रश्न है कि आखिर कोरोना को परास्त करते-करते क्यों दोबारा से कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ने लगी हैं इसलिये हमें कोरोना महामारी के दूसरे दौर के लिये अधिक सतर्क , सावधान एवं दायित्वशील होना होगा।
देश अभी भी कोरोना की मार से पस्त है। एक तरफ कोरोना सप्ताह दर सप्ताह नए-नए रिकॉर्ड बना रहा है तो दूसरी तरफ लापरवाही पहले की तुलना में कई गुना अधिक बढ़ गई है। आज लोगों में लापरवाही भी बढ़ रही है। लोग भीड़भाड़ वाले इलाकों में जाने से अब परहेज नहीं कर रहे हैं । मास्क और सेनिटाइजर का उपयोग हमारे दैनिक जीवन में कम होता जा रहा है । आए दिन बैंकों , बाज़ारों में लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है जहां पर सोशल डिस्टेन्सिंग तार तार हो रही है। कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है । खुद देश के प्रधानमंत्री अनलाक के दौरान देश के नाम अपने संदेश में ये कह चुके हैं जब तक सभी को दवाई नहीं तब तक ढिलाई नहीं । इसके बावजूद भी जनता सब घोर लापरवाही बरत रहे हैं । निजी वाहनों , सरकारी वाहनों और रोडवेज की बसों में तो बहुत बुरा हाल है । इन सब जगहों पर सामाजिक दूरी है नहीं , अधिकांश यात्री , चालक और परिचालक मास्क तक मास्क नहीं लगा रहे और खुले आम घूम रहे हैं । पढ़े लिखे लोगों की इसी जमात की लापरवाही जिले में कोरोना के एक बार फैलने का बड़ा कारण बन सकती है । यदि ऐसी ही लापरवाही आगे भी चलती रही तो देश में कोरोना की दूसरी लहर विकराल हो जाएगी ।
कोरोना से बचने के लिए कुछ नियमों का पालन जरूरी है । इसमें निश्चित दूरी का पालन और चेहरे पर मास्क लगाना अनिवार्य है । इन्हीं कुछ नियमों के साथ सवारी वाहनों को चलने की छूट दी गई थी । शुरुवात में तो वाहन चालकों और आम लोगों ने इन नियमों का पालन किया लेकिन धीरे धीरे सभी ने इनकी अनदेखी करना शुरू कर दिया । अब देश के किसी भी रूट पर देख लें , नियमों का कहीं कोई पालन नहीं हो रहा । लोग बेरोकटोक घूम रहे हैं , सामाजिक दूरी का पालन नहीं कर रहे हैं और बिना मास्क पहने एक दूसरे से मिल रहे हैं । ट्रेन , बस में यात्रा करने अधिकांश यात्रियों के चेहरे बिना मास्क के साफ देखे जा सकते हैं । सब्जी और ठेले वालों की दुकानों का भी यही हाल है । दुकानदार बिना गलब्ज और मास्क के सामान दे रहे हैं और लोग दुकानों में टूट पड़ रहे हैं । कमोवेश यही हाल निजी वाहनों में सवारी करने वाले यात्रियों का भी है । जो थोड़े बहुत लोग मास्क लगा भी रहे हैं वो भी गलत तरीके से । यात्री तो छोड़िए खुद वाहनों के चालक तक अपने चेहरे पर मास्क नहीं लगा रहे हैं और वाहनों और बसों के कंडक्टर बगैर मास्क के ही टिकट काट रहे हैं । हालत कितने गंभीर हैं समझे जा सकते हैं और ऐसे बसों और वाहनों में कोई कोरोना संक्रमित हो तो कई लोगों को वह अपनी चपेट में ले सकता है । देश में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के हालात भी बुरे हैं । मास्क लगाना ये अपनी शान के खिलाफ समझते हैं । स्कूलों और कालेज में भी छात्र , छात्राएँ बगैर मास्क के आवाजाही कर रहे हैं । इन हालातों को देखते हुए देश में तो कोरोना वायरस पर नियंत्रण की उम्मीद करना बेमानी है । इस तरह से तो किसी भी हालात में कोरोना का खतरा नहीं टल पाएगा।
लाकड़ाउन के बाद जब देश अनलाक हुआ तों बाज़ारों में भीड़ उमड़ने पर संक्रमण का खतरा था। संक्रमण न फैले इसके लिए सरकार ने मास्क और शारीरिक दूरी का पालन कराने की बात भी कही थी। कुछ दिन तक तों इसका शुरुवाती असर दिखाई दिया लेकिन अब बाज़ारों में सारे नियम टूट चुके हैं। कुछ लोग मास्क पहनकर आते हैं और कुछ शो पीस की तरह इसे अपने चेहरे पर लटकाते हुए घूमते हैं। कोरोना की टेस्टिंग का रेट भी देश में नहीं बढ़ पाया है । स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली भी इस दौर में सवालों के घेरे में है । जहां बीते बरस सितंबर अक्टूबर माह में कोरोना की प्रतिदिन औसतन हजारों के आसपास सैम्पलिं हर जिले में हो रही थी , वहीं आज आलम ये है जिलों में प्रतिदिन बमुश्किल 100 से 500 सैंपल लिए जा रहे हैं और थर्मल स्क्रीनिंग करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जा रही है । कोविड 19 की गाइडलाइन का पालन करने को कहीं से कहीं तक गंभीर कोई नहीं दिख रहा जिसके चलते देश में मामले बढ़ रहे हैं । कोरोना के प्रति ये लापरवाही कहीं पूरे नगर के लिए मुसीबत न बन जाये ।
देश में टीकाकरण अभियान में बहुत भारी भीड़ उमड़ रही है लेकिन प्रशासन के पास पर्याप्त इंतजामात नहीं हैं । दूरदराज़ इलाकों में लोगों को घंटों गर्मी में लाइन में खड़ा होना पड़ रहा है । कमरों में लोगों के बैठने के लिए भी जगह कम पड़ रही है । कोविड के खतरों को देखते हुए बीमार लोगों शासन की गाइडलाइन के तहत ही टीकाकरण कराया जा रहा है जो केवल कागजों में दर्ज है । वैक्सीन लगाने वाले कोरोना के हमारे वारियर भी अब मास्क पहनने के नाम पर औपचारिकता ही निभा रहे हैं । सोशल डिस्टैंसिंग भी अब इनके लिए दूर की गोटी हो चुकी है । टीकाकरण बूथ पर पहचान पत्र, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या अन्य फोटोयुक्त आईडी के आधार पर पंजीकरण तो हो रहा है वहीं टीकाकरण के बीच गंभीर बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए शासन ने गाइडलाइन जारी की है जिसमें कहा गया है कि गंभीर बीमारी से ग्रस्त 45 से 59 साल उम्र तक के ऐसे लोग जिन्हें ब्लड प्रेशर, कैंसर, हृदय रोग , सांस संबंधी बीमारी है, तो तो उन्हें अपने साथ इलाज करने वाले डॉक्टर का पर्चा और उनका परामर्श दिखाना होगा। इसे पहले पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा फिर मौजूद स्वास्थ्य विशेषज्ञों के विचार के बाद ही उन्हें टीका लगेगा लेकिन अब ऐसा कहीं नहीं हो रहा है और सारी कवायद कागज में डाटा फिट हर दिन बढ़त बढ़ाने तक सिमटती जा रही है । अब तो वैक्सीन लगाने का सिलसिला रफ्तार पकड़ चुका है । क्या स्वस्थ क्या गंभीर बीमार सब एक श्रेणी के हो चले हैं । भारत ही नहीं दुनिया के विकसित देश भी इस भयावह बीमारी से जूझ रहे हैं। वैज्ञानिक अप्रैल के मध्य में कोरोना की दूसरी लहर के पीक स्तर पर पहुंचने का अनुमान लगा रहे हैं। दुनिया को इस महामारी से जूझते हुए एक वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। हालांकि वैक्सीन भी आ चुकी है परन्तु वैक्सीन लगवाने की रफ्तार बेहद धीमी है। भारत में अभी तक मात्र छह करोड़ लोगों को ही वैक्सीन लग पाई है। सरकारें अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं। कहीं पर पूर्ण तो कहीं पर आंशिक पाबंदियां लगाई गई हैं। बेशक इस प्रकार की पाबंदियां, लॉकडाउन इस महामारी का हल नहीं परन्तु इस प्रकार की पाबंदियों द्वारा कोरोना की रफ्तार को कुछ कम अवश्य किया जा सकता है।
लॉकडाउन के दौरान आने वाली समस्याओं से जनता भी रूबरू हो चुकी है। सरकारी प्रयास तभी सफल होते हैं जब जनता की उसमें सहभागिता होती है। कोरोना को रोकने की जिम्मेदारी केवल सरकार की है यह सोचने की भूल मानव जीवन पर भारी पड़ सकती है। कोरोना से बचने के लिए हर एक व्यक्ति को जागरूक होना होगा और खुद का बचाव करना होगा।हमारे शरीर में कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाना भी कोरोना के पुन: उभरने का एक कारण है। अभी भी लॉकडाउन से संक्रमण को थामा जा सकता है। बेशक पिछले साल यही उपाय अधिक कारगर रहा था, लेकिन इसका फायदा यह मिला कि कोरोना के खिलाफ हम अधिक सावधान हो गए, कमियां एवं त्रुटियां सुधार लीं। अस्पतालों की सेहत सुधार ली लेकिन अब साधन-सुविधाओं से अधिक सावधानी ही बचाव का सबसे जरूरी उपाय है। मास्क पहनना, शारीरिक दूरी का पालन करना और सार्वजनिक जगहों पर जाने से बचना कहीं ज्यादा प्रभावी उपचार है। मानसिक और सामाजिक सेहत के लिए हमारा घर से बाहर निकलना जरूरी है। मगर हां, निकलते वक्त हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी। अभी लापरवाही एवं गैर-जिम्मेदाराना हरकत किसी अपराध से कम नहीं है। जनता को यह बात समझने की आज जरूरत है ।
कोरोनारूपी महामारी से जुड़ी हर मुश्किल घड़ी का सामना लाकडाउन में हमने भले ही मुस्कुराते हुए किया हो , लेकिन अनलाक में कोरोना अब अधिक दुर्गम सार्वजनिक चुनौती बन रहा है और रुला रहा है । कोरोना को लेकर सरकारी घोषणा एवं आकलन भी चुनावी घोषणा पत्र की तरह लगने लगे हैं। भारत में जब कोरोना के मामले नगण्य थे, सरकार और प्रशासन बहुत जागरूक था। जब मामले चरम पर थे, सरकारें निस्तेज हो गयी थी, यह कैसी विडम्बना एवं विरोधाभास है? कोरोना का खतरा एक बार फिर डरा रहा है, कोरोना पीड़ितों की संख्या फिर बढ़ने लगी है। कोरोना महामारी की दूसरी लहर में लापरवाही बहुत घातक साबित हो सकती है । दूसरी लहर में रोजाना सामने आने वाले नए मामलों की संख्या 20 हजार से 1 लाख पार करने में महज 25 दिन लगे जबकि पहली लहर में मात्र 76 दिनों में आंकड़ा 1 लाख पहुंचा था । इस दौर में 8 राज्य कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित हुए हैं और 80 फीसदी से अधिक मामले इन्हीं राज्यों में पाये गए हैं । इन बढ़ती कोरोना पीड़ितों की संख्या से केवल सरकार के चिन्तित होने से काम नहीं चलेगा, आम जनता को जागरूक एवं जिम्मेदार होना होगा। लोगों की थोड़ी-सी लापरवाही खतरे को बढ़ाती चली जा रही है। इस साल की शुरुवात में जनवरी फरवरी के महीने में ऐसा लगने लगा था कि अब कोरोना जाने वाला है, नए मामलों की संख्या 11,000 के पास पहुंचने लगी थी, लेकिन अब नए मामलों की संख्या रोजाना 50 हजार के पार कर चुकी है। रविवार को तो देश में 93 हजार से ज्यादा नए कोरोना संक्रमित मामले सामने आए हैं जिसने सभी के माथे पर फिर से चिंता की लकीरें खींच दी हैं । 9-10 सितंबर 2020 के आसपास हमने कोरोना का चरम देखा था, जब मामले रोज 97,000 के पार पहुंचने लगे थे। इसमें दुखद तथ्य यह है कि तब भी महाराष्ट्र सबसे आगे था और आज भी 60 प्रतिशत से ज्यादा मामले अकेले इसी राज्य से आ रहे हैं।
हम वही देखते हैं, जो सामने घटित होता है। पर यह क्यों घटित हुआ या कौन इसके लिये जिम्मेदार है? यह वक्त ही जान सकता है। आदमी तब सच बोलता है, जब किसी ओर से उसे छुपा नहीं सकता, पर वक्त सदैव ही सच को उद्घाटित कर देता है। देश के लिए यह सोचने का समय है, ताकि पिछले साल की तरह कोरोना संक्रमण वापसी न कर सके। आंखें खोलकर एक पर आंकड़ों को गौर से नए चश्में से देखना होगा। यक्ष प्रश्न है कि आखिर कोरोना को परास्त करते-करते क्यों दोबारा से कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ने लगी हैं इसलिये हमें कोरोना महामारी के दूसरे दौर के लिये अधिक सतर्क , सावधान एवं दायित्वशील होना होगा।
देश अभी भी कोरोना की मार से पस्त है। एक तरफ कोरोना सप्ताह दर सप्ताह नए-नए रिकॉर्ड बना रहा है तो दूसरी तरफ लापरवाही पहले की तुलना में कई गुना अधिक बढ़ गई है। आज लोगों में लापरवाही भी बढ़ रही है। लोग भीड़भाड़ वाले इलाकों में जाने से अब परहेज नहीं कर रहे हैं । मास्क और सेनिटाइजर का उपयोग हमारे दैनिक जीवन में कम होता जा रहा है । आए दिन बैंकों , बाज़ारों में लोगों की भारी भीड़ उमड़ रही है जहां पर सोशल डिस्टेन्सिंग तार तार हो रही है। कोरोना का खतरा अभी टला नहीं है । खुद देश के प्रधानमंत्री अनलाक के दौरान देश के नाम अपने संदेश में ये कह चुके हैं जब तक सभी को दवाई नहीं तब तक ढिलाई नहीं । इसके बावजूद भी जनता सब घोर लापरवाही बरत रहे हैं । निजी वाहनों , सरकारी वाहनों और रोडवेज की बसों में तो बहुत बुरा हाल है । इन सब जगहों पर सामाजिक दूरी है नहीं , अधिकांश यात्री , चालक और परिचालक मास्क तक मास्क नहीं लगा रहे और खुले आम घूम रहे हैं । पढ़े लिखे लोगों की इसी जमात की लापरवाही जिले में कोरोना के एक बार फैलने का बड़ा कारण बन सकती है । यदि ऐसी ही लापरवाही आगे भी चलती रही तो देश में कोरोना की दूसरी लहर विकराल हो जाएगी ।
कोरोना से बचने के लिए कुछ नियमों का पालन जरूरी है । इसमें निश्चित दूरी का पालन और चेहरे पर मास्क लगाना अनिवार्य है । इन्हीं कुछ नियमों के साथ सवारी वाहनों को चलने की छूट दी गई थी । शुरुवात में तो वाहन चालकों और आम लोगों ने इन नियमों का पालन किया लेकिन धीरे धीरे सभी ने इनकी अनदेखी करना शुरू कर दिया । अब देश के किसी भी रूट पर देख लें , नियमों का कहीं कोई पालन नहीं हो रहा । लोग बेरोकटोक घूम रहे हैं , सामाजिक दूरी का पालन नहीं कर रहे हैं और बिना मास्क पहने एक दूसरे से मिल रहे हैं । ट्रेन , बस में यात्रा करने अधिकांश यात्रियों के चेहरे बिना मास्क के साफ देखे जा सकते हैं । सब्जी और ठेले वालों की दुकानों का भी यही हाल है । दुकानदार बिना गलब्ज और मास्क के सामान दे रहे हैं और लोग दुकानों में टूट पड़ रहे हैं । कमोवेश यही हाल निजी वाहनों में सवारी करने वाले यात्रियों का भी है । जो थोड़े बहुत लोग मास्क लगा भी रहे हैं वो भी गलत तरीके से । यात्री तो छोड़िए खुद वाहनों के चालक तक अपने चेहरे पर मास्क नहीं लगा रहे हैं और वाहनों और बसों के कंडक्टर बगैर मास्क के ही टिकट काट रहे हैं । हालत कितने गंभीर हैं समझे जा सकते हैं और ऐसे बसों और वाहनों में कोई कोरोना संक्रमित हो तो कई लोगों को वह अपनी चपेट में ले सकता है । देश में जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के हालात भी बुरे हैं । मास्क लगाना ये अपनी शान के खिलाफ समझते हैं । स्कूलों और कालेज में भी छात्र , छात्राएँ बगैर मास्क के आवाजाही कर रहे हैं । इन हालातों को देखते हुए देश में तो कोरोना वायरस पर नियंत्रण की उम्मीद करना बेमानी है । इस तरह से तो किसी भी हालात में कोरोना का खतरा नहीं टल पाएगा।
लाकड़ाउन के बाद जब देश अनलाक हुआ तों बाज़ारों में भीड़ उमड़ने पर संक्रमण का खतरा था। संक्रमण न फैले इसके लिए सरकार ने मास्क और शारीरिक दूरी का पालन कराने की बात भी कही थी। कुछ दिन तक तों इसका शुरुवाती असर दिखाई दिया लेकिन अब बाज़ारों में सारे नियम टूट चुके हैं। कुछ लोग मास्क पहनकर आते हैं और कुछ शो पीस की तरह इसे अपने चेहरे पर लटकाते हुए घूमते हैं। कोरोना की टेस्टिंग का रेट भी देश में नहीं बढ़ पाया है । स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली भी इस दौर में सवालों के घेरे में है । जहां बीते बरस सितंबर अक्टूबर माह में कोरोना की प्रतिदिन औसतन हजारों के आसपास सैम्पलिं हर जिले में हो रही थी , वहीं आज आलम ये है जिलों में प्रतिदिन बमुश्किल 100 से 500 सैंपल लिए जा रहे हैं और थर्मल स्क्रीनिंग करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जा रही है । कोविड 19 की गाइडलाइन का पालन करने को कहीं से कहीं तक गंभीर कोई नहीं दिख रहा जिसके चलते देश में मामले बढ़ रहे हैं । कोरोना के प्रति ये लापरवाही कहीं पूरे नगर के लिए मुसीबत न बन जाये ।
देश में टीकाकरण अभियान में बहुत भारी भीड़ उमड़ रही है लेकिन प्रशासन के पास पर्याप्त इंतजामात नहीं हैं । दूरदराज़ इलाकों में लोगों को घंटों गर्मी में लाइन में खड़ा होना पड़ रहा है । कमरों में लोगों के बैठने के लिए भी जगह कम पड़ रही है । कोविड के खतरों को देखते हुए बीमार लोगों शासन की गाइडलाइन के तहत ही टीकाकरण कराया जा रहा है जो केवल कागजों में दर्ज है । वैक्सीन लगाने वाले कोरोना के हमारे वारियर भी अब मास्क पहनने के नाम पर औपचारिकता ही निभा रहे हैं । सोशल डिस्टैंसिंग भी अब इनके लिए दूर की गोटी हो चुकी है । टीकाकरण बूथ पर पहचान पत्र, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस या अन्य फोटोयुक्त आईडी के आधार पर पंजीकरण तो हो रहा है वहीं टीकाकरण के बीच गंभीर बीमारी से ग्रस्त लोगों के लिए शासन ने गाइडलाइन जारी की है जिसमें कहा गया है कि गंभीर बीमारी से ग्रस्त 45 से 59 साल उम्र तक के ऐसे लोग जिन्हें ब्लड प्रेशर, कैंसर, हृदय रोग , सांस संबंधी बीमारी है, तो तो उन्हें अपने साथ इलाज करने वाले डॉक्टर का पर्चा और उनका परामर्श दिखाना होगा। इसे पहले पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा फिर मौजूद स्वास्थ्य विशेषज्ञों के विचार के बाद ही उन्हें टीका लगेगा लेकिन अब ऐसा कहीं नहीं हो रहा है और सारी कवायद कागज में डाटा फिट हर दिन बढ़त बढ़ाने तक सिमटती जा रही है । अब तो वैक्सीन लगाने का सिलसिला रफ्तार पकड़ चुका है । क्या स्वस्थ क्या गंभीर बीमार सब एक श्रेणी के हो चले हैं ।
भारत ही नहीं दुनिया के विकसित देश भी इस भयावह बीमारी से जूझ रहे हैं। वैज्ञानिक अप्रैल के मध्य में कोरोना की दूसरी लहर के पीक स्तर पर पहुंचने का अनुमान लगा रहे हैं। दुनिया को इस महामारी से जूझते हुए एक वर्ष से अधिक का समय हो चुका है। हालांकि वैक्सीन भी आ चुकी है परन्तु वैक्सीन लगवाने की रफ्तार बेहद धीमी है। भारत में अभी तक मात्र छह करोड़ लोगों को ही वैक्सीन लग पाई है। सरकारें अपने स्तर पर प्रयास कर रही हैं। कहीं पर पूर्ण तो कहीं पर आंशिक पाबंदियां लगाई गई हैं। बेशक इस प्रकार की पाबंदियां, लॉकडाउन इस महामारी का हल नहीं परन्तु इस प्रकार की पाबंदियों द्वारा कोरोना की रफ्तार को कुछ कम अवश्य किया जा सकता है।
लॉकडाउन के दौरान आने वाली समस्याओं से जनता भी रूबरू हो चुकी है। सरकारी प्रयास तभी सफल होते हैं जब जनता की उसमें सहभागिता होती है। कोरोना को रोकने की जिम्मेदारी केवल सरकार की है यह सोचने की भूल मानव जीवन पर भारी पड़ सकती है। कोरोना से बचने के लिए हर एक व्यक्ति को जागरूक होना होगा और खुद का बचाव करना होगा।हमारे शरीर में कोरोना के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता खत्म हो जाना भी कोरोना के पुन: उभरने का एक कारण है। अभी भी लॉकडाउन से संक्रमण को थामा जा सकता है। बेशक पिछले साल यही उपाय अधिक कारगर रहा था, लेकिन इसका फायदा यह मिला कि कोरोना के खिलाफ हम अधिक सावधान हो गए, कमियां एवं त्रुटियां सुधार लीं। अस्पतालों की सेहत सुधार ली लेकिन अब साधन-सुविधाओं से अधिक सावधानी ही बचाव का सबसे जरूरी उपाय है। मास्क पहनना, शारीरिक दूरी का पालन करना और सार्वजनिक जगहों पर जाने से बचना कहीं ज्यादा प्रभावी उपचार है। मानसिक और सामाजिक सेहत के लिए हमारा घर से बाहर निकलना जरूरी है। मगर हां, निकलते वक्त हमें पूरी सावधानी बरतनी होगी। अभी लापरवाही एवं गैर-जिम्मेदाराना हरकत किसी अपराध से कम नहीं है। जनता को यह बात समझने की आज जरूरत है ।
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