Sunday, 22 September 2024

सुशासन के संकल्पों को साकार करती 'मोहन सरकार '

शासन की संपूर्ण व्यवस्थाओं में जनता के प्रति जवाबदेही,पारदर्शिता और सेवा-भाव से सभी को समर्पित कार्यप्रणाली सुनिश्चित करना सुशासन का मूलमंत्र है। भारतवर्ष में आदिकाल से ही सुशासन की परंपरा रही है। आदिकाल की इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए डॉ. मोहन यादव के दूरदर्शी नेतृत्व में मध्य प्रदेश  भी सुशासन के नए अध्याय लिख रहा है। 

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री  डॉ. मोहन यादव ने 13 दिसम्बर 2023 को प्रदेश की बागडोर संभाली। उनके बागडोर संभालते ही प्रदेश में सुशासन का सूर्यादय हुआ है। प्रदेश सरकार सबका साथ-सबका विकास, सबका प्रयास और सबका विश्वास के मूलमंत्र को लेकर आगे बढ़ रही है। मुख्यमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व में 9 माह की अल्पावधि में कई जनहितकारी फैसलों से समाज के हर वर्ग के उत्थान के लिए प्रदेश सरकार ने अनेक कदम उठाए गए हैं। सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति का प्रतिफल है कि आज प्रदेश के हर कोने में मोहन सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण  स्वच्छ और ईमानदार प्रशासन और सरकारी काम-काज में पारदर्शिता लाना रहा है। आम आदमी की जिंदगी में बदलाव लाना मुख्यमंत्री डॉ. यादव का मुख्य उद्देश्य है। अल्प अवधि में  मोहन सरकार ने जनता से किए गए वादे पूर्ण करने की दिशा में कई ठोस कदम उठाए हैं, जिसके कारण प्रदेश में विकास का नया दौर शुरू हुआ है। सेवा, सुशासन, सुरक्षा एवं विकास के संकल्प को लेकर प्रदेश सरकार जनता की सेवा में दिन-रात लगी हुई है।  

मुख्यमंत्री डा.मोहन यादव ने अपने छोटे से कार्यकाल में अपने काम से न केवल जनता का दिल जीता है बल्कि अपने सख्त निर्णयों के माध्यम से राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने भी अपनी अलहदा पहचान बनाने में सफलता पाई है। उन्होनें योग्य अफसरों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर अपने बुलंद इरादों को सभी के सामने जता दिए। इस छोटे से कार्यकाल में उन्होनें अपनी खुद की नई टीम बनाई और सीएम आवास से लेकर मंत्रालय, संभाग और जिलों में बड़ी प्रशासनिक सर्जरी करने से भी परहेज नहीं किया। हर समय एक्शन में रहने वाले डा. मोहन यादव के तेवरों को देखकर आज प्रदेश में पूरी नौकरशाही सहमी हुई है। मंत्रालय का वल्लभ भवन एक दौर में दलालों का अड्ड़ा बना था।  वहाँ पर भी ताबड़तोड़ तबादलों से मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने खलबली मचा दी । हर किसी अधिकारी  के ट्रैक रिकार्ड को न केवल  खंगाला बल्कि कार्यक्षमताओं के अनुरूप सभी को नए कार्यों का प्रभार सौंपा। ख़ास बात ये है इस सरकार में  बेलगाम नौकरशाही पर भी नकेल कसी गई है जिस कारण  मध्यप्रदेश का डबल इंजन विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। नए मुखिया की  तीव्र गति से निर्णय लेने की क्षमताओं से  मध्यप्रदेश में एक  बदलाव  की नई  बयार देखने को मिल रही है। नई विकेन्द्रीकरण की व्यवस्था होने से अब प्रदेश के विकास कार्यों में न केवल तेजी आयी है बल्कि समय -समय पर  मॉनीटरिंग  किये जाने से जनता के हित में  तेजी से निर्णय लिये जा रहे हैं।

साइबर तहसील डिजिटल इंडिया की दिशा में प्रदेश के नागरिकों को सुविधा प्रदान करने की दिशा में की गई बड़ी पहल है। इसके जरिए लोगों को कई कामों को करने में आसानी हुई है। खासतौर से  भूमि या भूखंड खरीदी बिक्री के बाद आने वाली कठिनाइयों को साइबर तहसील के जरिये काफी आसान कर दिया गया है।  इससे लोगों को भाग दौड़ से निजात मिल रही है और समय की भी बचत हो रही है। साइबर तहसील खोले जाने का सबसे प्रमुख उद्देश्य सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और लोगों को सुविधा पहुंचना है।  साइबर तहसील बनने के बाद रजिस्ट्री होने पर बिना किसी आवेदन के नामांतरण प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। साइबर तहसील में सार्वजनिक नोटिस की प्रक्रिया को भी सरल किया गया है। क्रेता- विक्रेता और गांव के निवासियों को एसएमएस के माध्यम से सार्वजनिक नोटिस जारी किया जाता है। इसके अलावा आपत्तियों को लेकर भी ऑनलाइन प्रक्रिया का पालन किया जाता है। एसएमएस में 10 दिनों के अंदर ऑनलाइन आपत्तियां दर्ज करने के लिए लिंक भी प्रदान किया जाता है। साइबर तहसील में पटवारी की सकारात्मक रिपोर्ट और कोई आपत्ति नहीं होने पर तुरंत नामांतरण आदेश जारी किया जाता है।  इसके अलावा भू अभिलेख अपडेट करने को लेकर भी रियल टाइम में तुरंत खसरा, नक्शा जैसे भू अभिलेख ऑनलाइन दर्ज हो जाते हैं। इतना ही नहीं प्रमाणित प्रति भी व्हाट्सएप और ईमेल के माध्यम से तुरंत भेज दी जाती है।   

मुख्यमंत्री की शपथ लेने के तुरंत बाद डा. मोहन यादव का पहला फैसला मध्यप्रदेश में धार्मिक स्थानों पर जोर से लाउड स्पीकर बजाने और खुले में मांस और अंडे की बिक्री पर सख्ती से रोक का रहा। इस फैसले का सभी ने तहे दिल से स्वागत किया। अपराधियों के घरों पर मोहन  सरकार  भी अपनी बुलडोजर नीति पर चल रही है जिससे अपराधियों के मन में खौफ बैठ गया है।मुख्यमंत्री डा.मोहन नई बसाहट के साथ  काम करना चाहते हैं जो त्वरित निर्णय ले सके। 

मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने अपने 100 दिनों के कार्यकाल में पहली बार हुकुमचंद मिल इंदौर के 4 हजार 800 श्रमिकों को उनका हक दिलाया। तीस वर्ष से अटके इस मामले को डॉ. मोहन यादव ने एक ही बैठक में निपटा दिया। मध्यप्रदेश  सरकार, राजस्थान सरकार और केंद्र सरकार के बीच 28 जनवरी को श्रमशक्ति भवन स्थित जल शक्ति मंत्रालय के कार्यालय में संशोधित पार्वती-कालीसिंध-चंबल-ईआरसीपी लिंक परियोजना के त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए जिससे मध्यप्रदेश के चंबल और मालवा अंचल के 13 जिलों की आम जनता को मिलेगा। कई बरसों से लटके इस मामले को  मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने जयपुर में एक ही बैठक में निपटा दिया। 

मप्र में राजस्व महाअभियान चला जिसमें  सीएम के निर्देश पर लाखों  प्रकरणों का निपटारा हुआ। अभियान्तर्गत डिजिटल क्रॉप सर्वेक्षण भी किया गया। किसानों और आमजन की सहूलियत के लिये पटवारी अपने  दायित्वों का निर्वहन  कर रहे हैं। अविवादित नामांतरण प्रकरणों का निराकरण 30 दिन में, विवादित नामांतरण प्रकरणों का निराकरण 150 दिन में किया जायेगा। बंटवारा प्रकरणों के निराकरण की समय-सीमा 90 दिन है और सीमांकन प्रकरणों को 45 दिन में निराकृत करने के निर्देश दिये गये हैं। राजस्व महाअभियान में उत्कृष्ट कार्य करने वाले अधिकारी कर्मचारियों को अब प्रदेश में  सम्मानित भी किया जा रहा है। राजस्व महा अभियान में  सही ढंग से मॉनीटरिंग भी की जा रही है। 

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने श्रीराम पथ गमन न्यास की पहली बैठक में  अयोध्या की तर्ज पर  चित्रकूट में भी विकास कार्य करवाए जाने की बड़ी घोषणा की। जिन स्थानों से भगवान राम गुजरे और कृष्ण के कदम जहाँ जहां पड़े , सरकार ने उन स्थानों को सड़क मार्ग से जोड़ने का  ऐलान कर सनातन प्रेमियों का दिल जीतने का काम किया है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकसित भारत 2047 के विजन को आगे बढ़ाने के लिए मध्यप्रदेश की डॉ. मोहन यादव की सरकार ने  महाकाल की नगरी  उज्जैन, जबलपुर  ग्वालियर में ‘रीजनल इंडस्ट्रियल कॉन्क्लेव’ के सफल आयोजन किया जिसके माध्यम से प्रदेश में बड़ा निवेश आया है और रोजगार की दिशा में मोहन सरकार का यह बड़ा कदम है। किसानों के कल्याण के लिए मध्य प्रदेश सरकार  संकल्पित  नजर आती है। उसने सदैव किसानों की चिंता की है।  मोहन सरकार ने सोयाबीन के दाम 4892 रुपए समर्थन मूल्य पर करने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा था जिसे मोदी सरकार ने पास कर दिया है।  हाल ही में मध्यप्रदेश को फिर से  सोया स्टेट का दर्जा भी मिला है। मध्य प्रदेश राजस्थान और महाराष्ट्र को पीछे छोड़कर सोया स्टेट बना है।  

मध्यप्रदेश के गरीब और मध्यमवर्ग के परिवारों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा परिवार में कोई सदस्य  अगर बीमार पड़ गया तो उसे एयर एम्बुलेंस जैसी सुविधा मिलेगी लेकिन डॉ. मोहन ने अपने कार्यकाल में प्रदेश की जनता को इसकी  बड़ी सौगात दी।  मुख्यमंत्री डा.मोहन यादव ने अपने गुड गवर्नेंस के मॉडल को सभी के सामने पेश किया है जिसमें जनता  के हितों की अनदेखी होनी  फिलहाल तो मुश्किल दिखाई दे रही है। नया 'मोहन मॉडल 'सबकी जुबान पर चढ़ रहा है। एमपी की जनता भी उनके  निर्णयों पर हामी भरती नजर आ रही है। पक्ष और विपक्ष भी उनकी नीतियों और काम करने के अलहदा अंदाज का का तोड़ नहीं निकाल पा रहा है। मोहन सरकार की अब तक की दिशा देखकर स्पष्ट नजर आता है कि वह  पार्टी के संकल्प पत्र में किये गए वायदों को पूरा करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा संचालित योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन  और मोदी की हर गारंटी पूरा करने के लिए डॉ. मोहन यादव ने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। हालाँकि सरकार का 9 माह का कार्यकाल बहुत छोटा होता है लेकिन मोहन यादव ने अपने छोटे से कार्यकाल में इस बात को प्रदेश के भीतर स्थापित कर दिया है उन्हें कमतर आंकने की भूल कोई भी नहीं करे, वह मध्यप्रदेश की राजनीती नहीं बल्कि देश की सियासत में भी लम्बी रेस के घोड़े साबित होंगे।

Saturday, 21 September 2024

पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का अनुष्ठान है श्राद्ध

पूर्वजों की आत्मा की शांति पूजा के लिए वर्ष के 15 दिन बहुत खास माने जाते हैं, इन्हें पितृ पक्ष कहा जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि पितृपक्ष के दौरान हमारे पूर्वज पितृलोक से धरती लोक पर आते हैं इसलिए इस दौरान पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण या पिंडदान आदि करने का विधान है।  पितृ पक्ष में सोलह श्राद्ध करने से पितरों की आत्मा तृप्त होती है और पूर्वज परिजन को खुशहाली का आशीर्वाद  देते हैं।  मान्यता है कि पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से पितरों का ऋण चुकता हो जाता है और उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है।वह परिवारजन को खुशहाली का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।  

ऋषियों ने हमारे संपूर्ण जीवन चक्र को सोलह संस्कारों में बांधा है। जहां गर्भदान  प्रथम संस्कार है वहीँ  अंत्येष्टि अंतिम। भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिनों को पितृ पक्ष कहा जाता है। शास्त्रों में मनुष्यों पर उत्पन्न होते ही तीन ऋण बताए गए हैं- देव ऋण, ऋषिऋण और पितृऋण। श्राद्ध के द्वारा पितृ ऋण से निवृत्ति प्राप्त होती है इसलिए पितृ पक्ष के दौरान भक्ति पूर्वक तर्पण (पितरों को जल देना) करना चाहिए।

हिंदू धर्म में श्राद्ध और तर्पण को अत्यधिक महत्व दिया गया है। यह प्रक्रिया पितरों (पूर्वजों) के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक तरीका है। शास्त्रों के अनुसार, श्राद्ध और तर्पण से पितरों की आत्मा को शाति मिलती है और उनकी कृपा से परिवार में सुख, शांति, और समृद्धि आती है।  पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान बड़ी संख्या में किया जाता है।  सही मायनों में कहा जाए तो श्राद्ध का उद्देश्य पितरों की आत्मा को तृप्ति प्रदान करना है। मान्यता है कि पितरों का आशीर्वाद न मिलने से रक्त संबंधित व्यक्ति और उसके परिवार में समस्या आ सकती है।  ब्रह्म पुराण और विष्णु पुराण सहित अन्य पुराणों के अनुसार, श्राद्ध और तर्पण के माध्यम से हम पितरों को जल. अन्न और अन्य सामग्री अर्पित करते हैं, जिससे उनको आत्मा संतुष्ट होती है।   विशेष रूप से पितृ पक्ष (सोलह श्राद्ध) में यह प्रक्रिया को जाती है।  

 भारतीय पुराणों में तीन ऋणों का उल्लेख है- देव ऋण , मनुष्य ऋण और पितृ ऋण।   देव पूजन जितना आवश्यक है पितरों के निमित्त श्राद्ध कर्म करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।   सभी 18 महापुराणों में श्राद्ध, तर्पण और पितरों के पूजन का विभिन्न रूपों में उल्लेख मिलता है।  शास्त्रों में विशेष तिथि श्राद्ध के दिन दैहिक कर्म करने के बाद विभिन्न प्रकार के श्राद्ध होते हैं जैसे कि एकोदिष्ट श्राद्ध, नित्य श्राद्ध, नैमित्तिक श्राद्ध, सोरस श्राद्ध (सोलह बाद्ध) और महालय श्राद्ध इन्हें समय-समय पर किया जाना चाहिए क्योंकि पितरों की अपेक्षाएं और भावनाएं हमारे साथ जुड़ी होती हैं।यदि पितर अतृप्त होते हैं तो उनके रक्त संबंधी या करीबी को प्रभावित करते हैं जिससे उन्हें समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। श्राद्ध के प्रतीक कुश, तिल, गाय, कौआ, कुत्ते को श्राद्ध के तत्व के प्रतीक के रूप में माना जाता है । कुश के अग्रभाग में ब्रह्मा, मध्य भाग में विष्णु,मूल भाग में भोलेशंकर भगवान का निवास माना गया है ।कौआ  यम का प्रतीक है जो दिशाओं का फलक बताता है। गौ माता तो हिंदू धर्म में सारी वैतरणी को पार लगाने वाली माता के रूप में देखा जाता है। दिन की शुरुआत से पहले गाय को पहली रोटी देने की परम्परा अपने देश में बरसों से चली आ रही है।  

 धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितृपक्ष  या श्राद्ध पक्ष में दान का विशेष महत्व माना गया है जिससे पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कहते हैं पितृ पक्ष के इन 15 दिनों में अपने पितरों के नाम का दान जरूर करना चाहिए जिससे महापुण्य की प्राप्ति होती है लेकिन कुछ ऐसी भी चीजें हैं जिनका पितृ पक्ष में दान नहीं करना चाहिए।  पितृ पक्ष में लोहे से बने बर्तनों का कभी भी दान नहीं करना चाहिए इसके अलावा आप चाहें तो पीतल, सोने और चांदी के बर्तनों का दान कर सकते हैं।  पितृ पक्ष में चमड़े से बनी चीजों या वस्तुएं का इस्तेमाल निषेध है। माना जाता है कि पितृ पक्ष में चमड़े का प्रयोग बहुत अशुभ होता है।  

इसके अलावा, पितृ पक्ष में पुराने कपड़े भी दान में देना अच्छा नहीं माना जाता है। पितृ पक्ष में हमेशा ब्राह्मणों को नए वस्त्र ही दान करने चाहिए।   हिंदू पूजा और सभी अनुष्ठानों में काले रंग का इस्तेमाल करना निषेध होता है, साथ ही अशुभ भी होता है इसलिए पितृ पक्ष में काले रंग के वस्त्र दान करने से बचें। पितृ पक्ष में किसी भी तरह का तेल दान में नहीं करना  चाहिए। सरसों के तेल के दान से बचना चाहिए।इसी तरह से  श्राद्ध पक्ष में पितरों को सिर्फ शुद्ध एवं ताजा भोजन ही अर्पित करना चाहिए।  पितरों को गलती से भी झूठा या बचा खाना नहीं देना चाहिए।  पितृ  पक्ष में अगर कोई जानवर या पक्षी आपके घर आए, तो उसे भोजन जरूर कराना चाहिए। मान्यता है कि  है कि पूर्वज इन रुपूण में कभी भी आपके घर आ सकते हैं। हमारे पुराने घरों में चिड़ियाँ को दाना डालने की भी पुराणी परंपरा रही है।  पितृ  पक्ष में पत्तल पर भोजन करें और ब्राह्राणों को भी पत्तल में भोजन कराएं, तो यह फलदायी होता है।  पूजा-अनुष्ठान, उद्यापन, कथा, विवाह आदि में चाहे ब्राह्मणों की परीक्षा न करें, लेकिन पितृ कार्य में अवश्य करें। समस्त लक्षणों से युक्त, हाथ का सच्चा, व्याकरण का विद्वान, शील एवं सद्गुणों से युक्त, तीन पीढ़ियों से विख्यात ब्राहाणों के द्वारा संयत रहकर श्राद्ध सम्पन्न करे तो यह परिवार के लिए फलदायी रहता है ।

 श्राद्ध पांच प्रकार के होते हैं जिनमें पितृपक्ष के श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाते हैं। इन में अपराह्न व्यापिनी तिथि की प्रधानता है। जिनकी मृत्यु तिथि का ज्ञान न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या को करना चाहिए। श्राद्ध हमेशा मृत्यु होने वाले दिन करना चाहिए। अग्नि में जलकर, विष खाकर, दुर्घटना में या पानी में डूबकर, शस्त्र आदि से जिनकी मृत्यु हुई हो उनका श्राद्ध चर्तुदशी को करना चाहिए। आश्विन कृष्ण पक्ष में सनातन संस्कृति को मानने वाले सभी लोगों को प्रतिदिन अपने पूर्वजों का श्रद्धा पूर्वक स्मरण करना चाहिए, इससे पितर संतृप्त हो कर हमें आशीर्वाद देते हैं। आज की नई पीढ़ी इन सब चीजों को ढकोसला बताती है जो सही नहीं है।  भारतीय कर्मकांड को आज  विज्ञान  भी मान रहा है। आश्विन मास का कृष्ण पक्ष पितरों के लिए महापर्व का समय है। इसमें ये पिंडदान और तिलांजलि की आशा लेकर पृथ्वी लोक पर आते हैं इसलिए श्राद्ध का कभी भी परित्याग न करें, अपने पितरों को संतुष्ट जरूर करें तभी आपके जीवन में खुशहाली  आ सकती है ।

 पुराणों में भी श्राद्ध और तर्पण का विशेष  उल्लेख मिलता है।  विष्णु पुराण में पितरों के श्राद्ध और तर्पण का महत्त्व बताया गया है।  इसमें कहा गया है कि पितरों को अर्पित जल और अन्न से उनकी आत्मा को शांति मिलती है।  इसी तरह से  ब्रह्म पुराण  में  पितरों के लिए श्राद्ध की विधियों का विवरण इस पुराण में मिलता है जिसमें  यह भी बताया गया है कि पितरों की आत्मा को शांति प्रदान करने के लिए विशेष तिथि पर श्राद्ध करना आवश्यक है।  शिव पुराण में श्राद्ध की प्रक्रिया और इसके लाभों का उल्लेख मिलता है।  भागवत पुराण में पितरों के तर्पण और श्राद्ध की विधियां और उनका महत्व वर्णित है।  इसमें पितरों को अर्पित सामग्री की विधि भी बताई गई है।  मत्स्य पुराण में  पितरों के श्राद्ध की विभिन्न विधियों, जैसे एकोदिष्ट और नित्य श्राद्ध, का विवरण इस पुराण में मिलता है।  नारद पुराण में भी पितरों के प्रति श्राद्ध की विधियां और इसके महत्व का विस्तृत वर्णन किया गया है।  वामन पुराण में  पितरों के श्राद्ध और तर्पण की प्रक्रिया का उल्लेख मिलता है जिसमें पितरों को शांति देने के उपाय बताए गए हैं। कूर्म पुराण में  पितरों की आत्मा को शांति देने के लिए श्राद्ध की प्रक्रियाओं का वर्णन  किया गया है।  इसी तरह से लिंग पुराण में पितरों के श्राद्ध और तर्पण की विधियों का वर्णन किया गया ‌ है और यह बताया गया है कि इससे पितरों को शांति मिलती है।गरुड़ पुराण, श्रीभगवत पुराण, सत्यम्बुधि पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण, स्मृति पुराण, प्रदीप पुराण, अग्नि पुराण, श्री भागवत पुराण और कालिक पुराण में भी पितरों के श्राद्ध की विधियां, आत्मा को शाति देने के लिए प्रक्रियाओं और धार्मिक महत्व के बारे में बताया गया है।

 आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में उनकी मृत्यु तिथि को (मृत्यु किसी भी मास या पक्ष में हुई हो) जल, तिल, चावल, जौ और कुश पिंड बनाकर या केवल सांकल्पिक विधि से उनका श्राद्ध करना, गौ ग्रास निकालना और उनके निमित्त ब्राह्मणों को भोजन करा देने से पितृ प्रसन्न होते हैं और उनकी प्रसन्नता हमें जीवन में पितृ ऋण और पितृ दोषों से मुक्त करा देती है। शास्त्रों के अनुसार, पितरों की आज्ञा का पालन और उनके लिए श्राद्ध करना संतान की सार्थकता को सिद्ध करता है। यह भी कहा गया है कि एक बार गया श्राद्ध करने से संतान होना सार्थक होता है. पितरों के निमित्त श्राद्ध एक महत्वपूर्ण अंग है, जो परिवार में शांति और समृद्धि का कारण बनता है।  श्राद्धकर्ता  को पितृपक्ष में क्षौर कर्म यानी बाल या नाखून नहीं कटवाने चाहिए। ब्रह्मचर्य का पालन, पान खाना, किसी भी प्रकार के नशीले पदार्थों का सेवन, तेल मालिश और परान्न भोजी ये सात बातें श्राद्धकर्ता के लिए वर्जित हैं। श्राद्ध के अंत में क्षमा प्रार्थना जरूर करें।      



Thursday, 19 September 2024

प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छता के संकल्पों को साकार कर रहा है मध्यप्रदेश



प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छता  भारत मिशन के संकल्प को साकार करने के दिशा में मध्यप्रदेश ने उल्लेखनीय प्रगति की है।  मध्यप्रदेश ने इस मिशन के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। स्वच्छ भारत मिशन का उद्देश्य भारत को साफ-सुथरा बनाना है, जिसमें प्रमुख रूप से खुले में शौच से मुक्ति और ठोस और तरल कचरे का उचित प्रबंधन शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में शुरू हुए इस मिशन के तहत मध्यप्रदेश ने अपने स्वच्छता लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ठोस नीतियां और योजनाएं बनाई हैं। 

 प्रदेश में प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिवस  17 सितंबर से “स्वच्छता ही सेवा-2024” अभियान शुरू हुआ है जो इस वर्ष  गांधी जयंती तक पूरे प्रदेश में चलाया जाएगा। यह अभियान ‘स्वभाव स्वच्छता-संस्कार स्वच्छता’ थीम पर केन्द्रित है  जिसमें जन-भागीदारी के अभियान से अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने की कोशिश रहेगी। स्वच्छता अभियान में इस वर्ष  स्थानीय निकायों की भागीदारी पर भी विशेष जोर  सरकार द्वारा दिया गया है। स्वच्छता को जन -जन अपने व्यवहार में आत्मसात करे , इस हेतु  प्रदेश में वृहद स्तर पर विभिन्न गतिविधियाँ  भी संचालित की  जा रही हैं । प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का कहना है  कि प्रदेश में स्वच्छता ही सेवा अभियान की इस वर्ष की थीम स्वभाव स्वच्छता-संस्कार स्वच्छता रखी गई है। 'स्वच्छता ही सेवा' अभियान के शुभारंभ अवसर पर मंत्रीगण अपने-अपने प्रभार के जिलों में शामिल हुए हैं  जिसने इस अभियान को  एक नई गति देने का काम किया है। अभियान की शुरूआत में 17 सितम्बर को प्रदेश में किफायती दाम पर दवाईयाँ उपलब्ध कराने वाले जनऔषधि केन्द्रों का शुभारंभ भी किया गया । 'स्वच्छता ही सेवा' अभियान का समापन 2 अक्टूबर "महात्मा गांधी जयंती" पर प्रदेश भर में होगा। इस दिन महात्मा गांधी के स्वच्छता संबंधी विचारों को जन-जन तक पहुंचाने के प्रयास किये जायेंगे। राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर होने वाले कार्यक्रमों से ऑनलाइन अधिक से अधिक लोगों को जोड़ने का प्रयास होगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर सफाई कर्मचारियों के लिए एक महत्वपूर्ण घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने कहा कि, सफाई कर्मचारियों को स्टार रेटिंग प्रणाली के आधार पर पुरस्कृत किया जाएगा। खास बात यह है कि सफाई कर्मचारियों द्वारा अर्जित प्रत्येक स्टार के लिए उन्हें एक हजार रुपए का नकद पुरस्कार दिया जाएगा। यानी एक स्टार पाने वाले कर्मचारी को एक हजार रुपए और सात स्टार पाने वाले प्रत्येक कर्मचारी को सात-सात हजार रुपए दिए जाएंगे।

मध्यप्रदेश ने खुले में शौच से मुक्ति प्राप्त करने में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। राज्य ने ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में शौचालय निर्माण पर जोर दिया है। पंचायतों और नगरपालिकाओं के सहयोग से, हजारों व्यक्तिगत स्वच्छता शौचालयों का निर्माण किया गया है। इसके साथ ही, स्वच्छता के प्रति लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए व्यापक अभियानों का संचालन भी किया गया है। वर्ष 2014 से वर्ष 2019 तक सरकार और जनता की सक्रिय भागीओदारी के माध्यम से प्रदेश में स्वच्छ भारत मिशन के तहत पहले चरण में 70 लाख से अधिक घरों में नए शौचालय बने जिससे सभी 51 हजार ग्राम तय समय सीमा से पहल खुले में शौच से मुक्त हुए।  इस अभियान में 50 हजार से अधिक स्थानीय स्वच्छताकर्मियों  ने प्रेरक भूमिका निभाई।  इसी तरह प्रदेश में वर्ष 2020 से स्वच्छ भारत का दूसरा चरण शुरू हुआ जिसमें 2024 तक सरकार ने सभी ग्रामों को शौच से मुक्त बनाये रखते हुए ठोस और तरल अपशिष्ट के प्रबंधन मॉडल द्वारा मॉडल श्रेणी में ओडीएफ प्लस बनाने का लक्ष्य रखा गया। इसके लिए प्रदेश में अभी तक 8  लाख से अधिक नए शौचालय बनाने के साथ ही 16 हजार से अधिक सामुदायिक स्वच्छता परिसर बनाये गए और 41 हजार से अधिक गाँवों को ओडीएफ प्लस मॉडल बनाया गया है।  मध्यप्रदेश ने ठोस और तरल कचरे के प्रबंधन में भी कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। राज्य सरकार ने कचरे को सेग्रीगेट करने, उसका पुनर्चक्रण करने, और उसे कम करने के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। खासकर बड़े शहरों जैसे भोपाल, इंदौर, और जबलपुर में स्वच्छता प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए उन्नत तकनीकों और प्रणालियों का उपयोग किया गया है। 25 हजार से अधिक स्वच्छता मित्रों को इस कार्य में शामिल किया गया साथ ही 900 स्वसहायता समूहों को शामिल करने के साथ ही उनकी आजीविका में भी वृद्धि हुई। वर्तमान में प्रदेश के भीतर ग्रामों में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन के लिए एमआरएफ  बनाये जा रहे हैं जिसमें  शहरी निकायों का भी निरंतर सहयोग मिल रहा है। पशुओं के गोबर से खाद और बायो गैस बनाने की दिशा में गोवर्धन योजना से भी  विशेष लाभ मिल रहा है।  

 इंदौर की गिनती आज देश के सबसे स्वच्छ शहरों में अगर हो रही है तो इसका कारण स्वच्छता का संकल्प ही रहा है जिसने कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में विशेष पहचान बनाई है। इंदौर ने देश में हुए 'स्वच्छता सर्वेक्षण' में लगातार सातवीं  बार  शीर्ष स्थान प्राप्त किया है, जिससे स्पष्ट होता है कि यहाँ के नागरिक और प्रशासन दोनों मिलकर स्वच्छता के लिए प्रतिबद्ध हैं। इंदौर को साफ बनाने में वहां के  नगर निगम जनभागीदारी की  बड़ी भूमिका रही है। आज इंदौर की सफाई प्रणाली पूरे देश को प्रेरणा देने का काम कर रही है। इंदौर शहर से निकले वाले कचरे से गैस  बनाई जाती है जिससे शहर में सीएनजी बसों का परिचालन होता है। कचरे से गैस बनाने के लिए इंदौर में एशिया का सबसे बड़ा प्लांट है, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

एमपी के जन- भागीदारी मॉडल ने  हाल के वर्षों में देश में  विशेष पहचान  बनाई है।  स्वच्छता के उद्देश्यों को साकार करने में मध्यप्रदेश के नागरिकों की भागीदारी भी बड़ी महत्वपूर्ण है। मध्यप्रदेश ने स्थानीय समुदायों को स्वच्छता अभियानों में शामिल करने के लिए कई कार्यक्रम चलाए हैं। स्वच्छता संबंधी कार्यशालाएं, जागरूकता अभियानों और स्कूलों में स्वच्छता शिक्षा जैसी विशिष्ट पहल के माध्यम से, राज्य ने नागरिकों को इस मिशन में सक्रिय भागीदार बनाया है। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रेरणा से  'एक पेड़ माँ के नाम' जैसे  पौध-रोपण के कार्यक्रम भी  प्रदेश के हर कोने में आयोजित किए जा रहे हैं जिसका लोगों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। स्वच्छता संबंधी चुनौतियों के  समाधान हेतु राज्य सरकार ने  स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और कचरा निस्तारण के लिए नई तकनीकों का भी उपयोग किया है। मध्यप्रदेश सरकार भविष्य में स्वच्छता मिशन को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई योजनाएं बना रही है। सतत विकास लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए सरकार  डिजिटल तकनीक, नवाचार और जनभागीदारी के मॉडल के जरिये अपने स्वच्छता लक्ष्यों को  साकार करने की दिशा में तेजी से अग्रसर है।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के स्वच्छता संकल्प को साकार करने के लिए मध्यप्रदेश ने उत्कृष्ट प्रयास किए हैं। स्वच्छ भारत मिशन के तहत राज्य की योजनाएं और पहल न केवल स्वच्छता के मानक स्थापित कर रही हैं, बल्कि  आम नागरिकों के जीवन स्तर को भी ऊपर उठाने का काम कर रही है। मध्यप्रदेश की प्रतिबद्धता और योजनाओं से यह स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी की प्रेरणा और मार्गदर्शन से  राज्य भविष्य में स्वच्छता के क्षेत्र में और भी नई ऊँचाइयों को छूने के लिए तैयार है।