Monday, 5 January 2026

अंकिता भंडारी केस : पहाड़ से लेकर मैदान तक उत्तराखंड की सियासत में उबाल

तीन बरस पहले उत्तराखंड को झकझोर देने वाले अंकिता भंडारी हत्याकांड के अनसुलझे राज अब परत दर परत खुलते जा रहे हैं। इस मामले को उत्तराखंड की राजनीती की एप्सटीन फाइल्स माना जा रहा है जहाँ नेताओं पर यौन शोषण करने के सीधे आरोप लग रहे हैं।  हाल ही में भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर और अभिनेत्री  उर्मिला सनावर के बीच सोशल मीडिया पर हुई बहस ने इस केस को एक बार फिर से नया मोड़ दे दिया है।  खुद को सुरेश की पत्नी बताने वाली उर्मिला ने दावा दिया है कि अंकिता पर स्पेशल सर्विस के लिए दबाव डालने वाला वीआईपी कोई और नहीं बल्कि भाजपा के ही नेता थे। उन्होंने भाजपा के केंद्रीय महासचिव दुष्यंत गौतम समेत कई पदाधिकारियों पर भी घिनौने कृत्य के आरोप लगाए हैं। हालाँकि सुरेश राठौर और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत गौतम उर्फ़ गट्टू ने इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया है।  इस खुलासे के बाद उत्तराखंड की राजनीती में भूचाल आ गया है और धामी सरकार पर सीधे सवाल उठ रहे हैं आखिर क्यों उसने इस प्रकरण पर ख़ामोशी की चादर ओड़ ली है और इन सब आरोपों के बीच भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत गौतम ने राज्य सरकार से अपील की है उन पर सोशल मीडिया पर चल रहे ऑडियो और वीडियो हटाए जाएँ। गौतम का साफ़ कहना है इससे उनकी छवि खराब हो रही है और उनके खिलाफ साजिश की जा रही है। उन्होनें उत्तराखंड के गृह सचिव शैलेश बगौली  को बाकायदा इस बारे में एक पत्र भी लिखा है।  

अंकिता भंडारी उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के एक छोटे से गाँव डोभ-श्रीकोट की 19 बरस की बेटी थी। घर की गरीबी का सपना लेकर वह 2022 में पहाड़ों से निकलकर सीधे मैदान में आई और ऋषिकेश के यमकेश्वर ब्लाक के वनंतारा रिसॉर्ट के रिसेप्शनिस्ट की 10 हजार रु. की नौकरी करने लगी। नौकरी शुरू किये अभी 15 दिन भी नहीं हुए थे कि रिसॉर्ट के मालिक पुलकित आर्य ने अंकिता पर दबाव डाला कि वह एक वीआईपी गेस्ट स्पेशल सर्विस दे। अंकिता ने इससे साफ़ इंकार कर दिया। उसने अपने दोस्त पुष्पदीप को व्हाट्सएप पर और रिसॉर्ट के साथी विवेक आर्य को बताया कि उसे जान का खतरा है। पुलकित आर्य भाजपा के पूर्व में मंत्री विनोद आर्य के बेटे हैं। 18 सितम्बर 2022 को अंकिता का फ़ोन बंद हो गया और वह लापता हो गई। 6 दिन बाद 24 सितम्बर को पास की चिल्ला नहर से उसकी गली हुई लाश मिली। जांच में पता चला पुलकित आर्य ने अपने दो साथियों रिसॉर्ट मैनेजर सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता के साथ मिलकर अंकिता पर हमला किया और उसे नहर में फेंक दिया, जहाँ डूबने से उसकी मौत हो गई। इसके बाद जो हुआ वह न्याय के बजाय पूरी तरह से सबूत मिटाने की कोशिश लगता है।  रिसॉर्ट के उस हिस्से को आधी रात में यमकेश्वर की भाजपा विधायक रेनू बिष्ट ने बुलडोजर से तोड़ दिया गया जहाँ अंकिता रहती थी। मुख्यमंत्री धामी और तत्कालीन पुलिस प्रमुख ने एक्स हैंडल पर कहा था कि उन्होनें त्वरित न्याय कर दिया है लेकिन सवाल यह है अंकिता प्रकरण पर अगर सबूत मिटाए गए तो असली न्याय कैसे होगा ? इस प्रकरण में पहले मामला पुलिस को सौंपा गया लेकिन जनता के गुस्से के बाद धामी सरकार ने एसआईटी बैठाई। दिसंबर 2022 में 500 पेज की चार्जशीट कोर्ट में दाखिल हुई जिसमें वीआईपी का जिक्र तो कई जगह आया लेकिन उसका नाम पता करने की कोशिश कहीं भी नहीं की गई। अंकिता की मां ने वीआईपी का नाम तक बताया था लेकिन सरकार के हाथों खेल रही राज्य की पुलिस ने उनसे पूछताछ तक नहीं की। 30 मई 2025 को कोटद्वार की अदालत ने पुलकित आर्य,सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को दोषी ठहराया और तीनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। आरोपियों ने उत्तराखंड हाईकोर्ट में अपील की लेकिन वीआईपी से पर्दा आज तक नहीं हटा। तमाम सामाजिक संगठनों ने मांग की कि वीआईपी को सामने लाओ और सजा दो। सुप्रीम कोर्ट के वकील कॉलिन गोंसाल्विस ने भी इस मसले पर अपनी आवाज उठायी।

एक हफ्ते पहले सोशल मीडिया पर भाजपा के पूर्व विधायक सुरेश राठौर और उर्मिला सनावर के बीच झगड़ा हुआ। उर्मिला ने एक वीडियो में खुलासा किया कि वह वीआईपी दुष्यंत गौतम है जो भाजपा का बड़ा नेता है। उन्होनें यह भी कहा अकेले गौतम ही नहीं इस मामले में भाजपा के अन्य पदाधिकारियों की भी गहरी संलिप्तता है। उर्मिला ने यह भी कहा अंकिता के कमरे में बुलडोजर चलवाने वाली महिला का नाम भी उन्हें पता है साथ में उन्होंने भाजपा के कई नेताओं पर यौन दुराचार करने के आरोप भी लगाए जिससे ठण्ड में उत्तराखंड की राजनीती गर्म हो गई। विपक्षी दल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने पीसीसी दफ्तर दिल्ली में इस पर बड़ी प्रेस कांफ्रेंस उर्मिला के वीडियो के साथ कर दी और साफ कहा अंकिता प्रकरण की सीबीआई जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो। गोदियाल ने इस पर धामी सरकार को अल्टीमेटम देने के साथ ही राज्यव्यापी आंदोलन की चेतावनी दी है।     

अंकिता प्रकरण में धामी सरकार पर लगातार दबाव बनता जा रहा है। जनता सरकार से पूछ रही है वीआईपी कौन है और सरकार मौन क्यों है?  अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर उत्तराखंड भारतीय जनता पार्टी में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की चुप्पी भी इस प्रकरण के रहस्य को उजागर कर रही है। सरकार में शामिल भाजपा के तमाम मंत्रियों की जुबां पर ताले लग गए हैं। अंकिता भंडारी मामले में कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल ने बीते दिनों एक कॉन्फ्रेंस की जिसमें वह भी पत्रकारों के सवालों से बचते नजर आए। घटना के तोड़े गए रिसॉर्ट को लेकर पूछे गए सवाल पर सुबोध उनियाल कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे सके। आम जनमानस में यह धारणा तेजी से बनी है धामी सरकार इस मामले में लीपापोती कर रही है। अंकिता प्रकरण में सबूतों से बड़े पैमाने पर छेड़छाड़ की गई है। भारतीय दंड संहिता के मुताबिक सबूतों को मिटाना भी खड़ एक बड़े अपराध की श्रेणी में आता है। अगर अपराधी निर्दोष थे तो सबूतों से कैसा डर? और सबसे बड़ा सवाल वह जमीन जो आयुर्वेदिक दवाइयों के लिए ली गई थी, उस पर रिसॉर्ट कैसे बना गया?

अंकिता केस सिर्फ हत्या का का नहीं, यौन शोषण और सत्ता के दुरूपयोग से भी जुड़ा है।  अंकिता ने अपनी इज्जत बचाने की कोशिश की लेकिन उसे जान देकर कीमत चुकानी पड़ी। उर्मिला के आरोप बताते हैं सत्ता के सिंहासन पर बैठे बड़े- बड़े सूरमा इसमें शामिल हो सकते हैं। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा देने वाली भाजपा सरकार ने अपने राज्य की बेटी की अस्मिता बचाने के लिए क्या किया? इस घटना से धामी सरकार पूरी तरह से बैकफुट पर है। आगे जांच होगी या नहीं यह देखना अभी बाकी है?

उत्तराखंड में महिलाओं से जुड़े अधिकांश मामलों में भाजपा नेताओं के नाम सामने आए हैं। कई में जांच चल रही है या कोर्ट में सबूतों के आधार पर फैसला हुआ है। चाहे अल्मोड़ा में भाजपा ब्लॉक प्रमुख पर 14 साल की नाबालिग से रेप का मामला हो या  नैनीताल में भाजपा नेता मुकेश बोरा पर रेप का मामला, हरिद्वार में भाजपा नेता आदित्य राज सैनी पर नाबालिग की गैंगरेप और हत्या का मामला हो या एक पूर्व भाजपा महिला नेता पर अपनी नाबालिग बेटी के साथ गैंगरेप कराने का मामला इन सब मामलों के तार भाजपा से ही जुड़े हैं जिसके बाद पार्टी ने इन सभी नेताओं को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाकर खुद को बरी कर लिया जिसके बाद ये मामले कांग्रेस द्वारा भाजपा सरकार पर महिलाओं की सुरक्षा में नाकामी के आरोप लगाने का मुख्य आधार बने। अंकिता प्रकरण में भी उर्मिला के खुलासे भाजपा की परेशानी बढ़ाने का काम कर रहे हैं। 

अंकिता भंडारी केस में जब से कथित ऑडियो-वीडियो वायरल हुए हैं, तब से ही भाजपा बुरी तरह फंस गई है। उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और हरिद्वार से सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने सीबीआई जांच की मांग की है। यमकेश्वर की पूर्व जिला पंचायत सदस्य आरती गौड़ ने अंकिता भंडारी हत्याकांड की सीबीआई जांच की मांग करते हुए भारतीय जनता पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। पूर्व भाजपा जिला पंचायत सदस्य आरती गौड़ ने सीएम धामी को पत्र लिखकर सीबीआई जांच की मांग की है। वह सरकार से इस मामले में निष्पक्ष जांच और दोषियों को सज़ा की मांग कर रही थी और उनकी मांग पूरी न होने पर उन्होंने पार्टी छोड़ दी । उनके अलावा भाजपा नेता विजया बर्थवाल ने भी इस पूरे मामले की जांच सीबीआई से कराने की मांग की है। पूर्व कैबिनेट मंत्री और उत्तराखंड महिला आयोग की अध्यक्ष विजया बर्थवाल ने भी मांग की है कि इस मामले की जांच सीबीआई से कराई जाए ताकि सच सामने आ सके। उन्होंने कहा जनता को यह भरोसा होना चाहिए कि न्याय और सच्चाई की कोई आवाज दबाई नहीं जाएगी। इसके बाद भाजपा के एक और नेता अजेंद्र अजय ने भी सीबीआई जांच की मांग कर डाली है। ऋषिकेश के बीजेपी युवा मोर्चा के जिला मंत्री अंकित बहुखंडी ने  भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। 

उत्तराखंड के चर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में हुए नए खुलासों ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। विपक्षी कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि मामले में कथित वीआईपी की संलिप्तता छिपाई जा रही है और सीबीआई जांच से सरकार भाग रही है। अंकिता की लड़ाई अब केवल अंकिता के परिवार की नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड की लड़ाई बनती जा रही है। पूर्व सीएम हरीश रावत और पार्टी नेताओं ने धामी सरकार से कैबिनेट बैठक बुलाकर सीबीआई को जांच सौंपने की मांग की है। कांग्रेस का आरोप है कि सबूत मिटाने की कोशिश की गई और वीआईपी को बचाया जा रहा है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह  धामी ने इस नए विवाद पर अभी सार्वजनिक बयान नहीं दिया है जिसे विपक्ष उनकी मुश्किलें बढ़ने का संकेत बता रहा है। सीबीआई जांच की मांग से उत्तराखंड में इन दिनों सियासी तनाव बढ़ा हुआ है जहां सभी की नजरें दिल्ली आलाकमान की तरफ लगी हुई हैं। विपक्ष इस मुद्दे को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर हो रहा है और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहा है। चुनावी साल से ठीक पहले उत्तराखंड की राजनीति में इस घटनाक्रम को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है और आने वाले दिनों में इसके  गहरे राजनीतिक असर  की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता।