भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता को एक नीति निर्देशक सिद्धांत के रूप में शामिल किया गया है, जो भारत के समस्त राज्य क्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का निर्देश देता है। इसका उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेना और संपत्ति जैसे व्यक्तिगत मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू करना है, चाहे उनकी धार्मिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो। यह “एक देश, एक कानून” की अवधारणा को मजबूत करता है और लिंग समानता, राष्ट्रीय एकता तथा सामाजिक सुधार को बढ़ावा देता है।
मध्यप्रदेश में डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने हाल ही में यूसीसी लागू करने की दिशा में आगे कदम बढ़ाये हैं। सरकार ने इसके लिए 5 सदस्यीय हाईलेवल कमेटी का गठन किया है जिसमें रिटायर्ड जस्टिस रंजना देसाई को अध्यक्ष, सेवानिवृत्त आईएएस शत्रुघन सिंह, कानूनविद अनूप नायर, शिक्षाविद गोपाल शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता बुधपाल सिह को सदस्य बनाया गया है। वहीं अपर सचिव अजय कटेसरिया इस कमेटी के सदस्य सचिव रहेंगे। सुप्रीम कोर्ट की रिटायर्ड जज रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता वाली यह समिति विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे कानूनों की समीक्षा करेगी। कमेटी को 60 दिन के अंदर विस्तृत रिपोर्ट और ड्राफ्ट बिल सरकार को सौंपेगी।
विधि व विधायी कार्य विभाग द्वारा जारी आदेश में कहा गया है कि वर्तमान परिस्थितियों में नागरिकों के बीच समानता, न्याय, सामाजिक समरसता और विधिक स्पष्टता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विवाह, विवाह-विच्छेद, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, दत्तक ग्रहण और लिव-इन संबंधों से जुड़े कानूनों की समीक्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसी के मद्देनजर यह समिति गठित की गई है। समिति को राज्य में लागू विभिन्न व्यक्तिगत एवं पारिवारिक विधियों का परीक्षण करने की जिम्मेदारी दी गई है।
उत्तराखंड और गुजरात में अपनाए गए मॉडल और प्रक्रियाओं का अध्ययन, मध्यप्रदेश की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संतुलित कानूनी ढांचा सुझाना, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों और शिक्षाविदों से सुझाव लना, जनसुनवाई और परामर्श बैठकें आयोजित करना, महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों पर विचार करना, लिव-इन संबंधों के पंजीयन और उससे जुड़े अधिकारों पर सुझाव देना और प्रस्तावित कानून के विधिक और प्रशासनिक पहलुओं की समीक्षा करना शामिल हैं। समिति मध्यप्रदेश की स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुझाव देगी। यूसीसी के प्रावधानों का अध्ययन करने और संभावित चुनौतियों पर सुझाव देने को भी कहा गया है। मोहन सरकार ने इस प्रक्रिया को ज्यादा समावेशी बनाने के संकेत दिए हैं। समिति आम लोगों, धार्मिक संगठनों और विभिन्न वर्गों के विशेषज्ञों से सुझाव लेगी, ताकि प्रस्तावित कानून व्यावहारिक और संतुलित हो सके। इसके लिए प्रदेशभर में परामर्श बैठकों की भी कार्ययोजना तैयार की जा आ रही है।
अप्रैल 2026 में हुई कैबिनेट बैठक में मुख्यमंत्री मोहन यादव ने गृह विभाग को निर्देश दिए कि उत्तराखंड और गुजरात में लागू यूसीसी मॉडल का अध्ययन कर राज्य के लिए ड्राफ्ट तैयार किया जाए। मुख्यमंत्री के सीधे निर्देश पर गृह विभाग ड्राफ्ट बिल तैयार करने में जुट गया है। सरकार का लक्ष्य है कि दिवाली 2026 या वर्ष के अंत तक यूसीसी को लागू कर दिया जाए।
मोहन सरकार यूसीसी को लिंग न्याय, सामाजिक समानता और प्रशासनिक सुव्यवस्था से जोड़ रही है। इसमें बहुविवाह पर रोक, लड़कियों-बेटों को समान उत्तराधिकार, विवाह एवं लिव-इन संबंधों का अनिवार्य पंजीकरण, तलाक की प्रक्रिया को सरल और निष्पक्ष बनाना जैसी बातें शामिल हो सकती हैं। इससे महिलाओं को व्यक्तिगत कानूनों की जटिलताओं से मुक्ति मिलेगी और कानूनी विवादों में कमी आएगी। सरकार इसे राष्ट्रीय एकता और संवैधानिक मूल्यों को मजबूत करने का कदम मान रही है। यूसीसी पर मोहन सरकार की सक्रियता से लगता है कि मध्यप्रदेश सबके लिए एक कानून की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। मध्यप्रदेश में बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी है इसलिए कांग्रेस समेत कुछ विपक्षी दलों ने चिंता जताई है कि यूसीसी आदिवासी रीति-रिवाजों और पहचान पर असर डाल सकता है। सरकार को इन संवेदनशील मुद्दों पर विशेष छूट या संतुलित प्रावधान रखने की जरूरत होगी।
यूसीसी पर मोहन सरकार की बढ़ती सक्रियता निश्चित ही उत्तराखंड और गुजरात के बाद मध्यप्रदेश को यूसीसी लागू करने वाले तीसरे बड़े राज्य के रूप में स्थापित कर सकते हैं। एमपी की मोहन सरकार के ये कदम यूसीसी को मात्र चुनावी वादे से आगे ले जाकर व्यावहारिक रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। यह कदम न केवल कानूनी समानता सुनिश्चित करेगा, बल्कि सामाजिक सुधार और महिला सशक्तिकरण को भी नई गति देगा।
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