Sunday, 7 June 2026

भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहब फाल्के

भारतीय फिल्म उद्योग के पितामह दादा साहब फाल्के का पूरा नाम धुन्दीराज गोविंद फाल्के था किंतु वह दादा साहब फाल्के के नाम से प्रसिद्ध हैं। दादा साहब फाल्के का जन्म 30 अप्रैल, 1870 को नासिक के निकट त्रयम्बकेश्वर में हुआ था। उनके पिता संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित विद्वान और मुम्बई के एलफिंस्टन कॉलेज के अध्यापक थे। अतः इनकी शिक्षा मुम्बई में ही हुई। वहीं उन्होंने हाई स्कूल के बाद जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट में कला को शिक्षा ग्रहण की फिर बड़ौदा के कलाभवन में रहकर अपनी कला का ज्ञान बढ़ाया। कुछ समय तक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग में काम करने के बाद उन्होंने अपना प्रिटिंग प्रेस खोला। प्रेस के लिए नई मशीनें खरीदने के लिए वे जर्मनी भी गए। उन्होंने एक मासिक पत्रिका का भी प्रकाशन किया। परन्तु इस सबसे दादा साहेब को सन्तोष नहीं हुआ।

 सन 1911 की बात है। दादा साहब को मुम्बई में ईसा मसीह के जीवन पर बनी एक फिल्म देखने का मौका मिला। वह मूक फिल्मों का जमाना था। दादा साहब ने फिल्म को देखकर सोचा कि ऐसी फिल्में हमें अपने देश के महापुरुषों के जीवन पर भी बनानी चाहिए। यहीं से उनके जीवन की धारा बदल गई। आरम्भिक प्रयोग करने के बाद वे लंदन गए और वहाँ पर दो महीनों रहकर सिनेमा को तकनीक को समझा और फिल्म निर्माण का सामान लेकर भारत लौटे।

 1912 में 'दादर' (मुम्बई) में 'फाल्के फिल्म' नाम से अपनी फिल्म कम्पनी शुरू की। फाल्के के जीवन में फ़िल्म निर्माण से जुड़ा रचनात्मक मोड़ सन 1910 'लाईफ आफ क्राइस्ट' फ़िल्म को देखने के बाद आया। उन्होंने यह फिल्म दिसंबर के आसपास मायानगरी मुंबई के 'वाटसन' होटल में देखी । वह फिल्म अनुभव से बहुत आंदोलित हुए और इसके बाद उस समय की और भी फिल्मों को देखा। सिनेमा के बारे में अधिक जानकारी हासिल करने के लिए अब वह अत्यधिक शोध करने लगे। इस क्रम में उन्हें आराम का कम समय मिला। निरंतर फिल्म देखने, अध्ययन और खोज से फाल्के बीमार पड़ गए। कहा जाता है कि अपनी बीमारी के दौर में भी उन्होंने अपने प्रयोग जारी रखते हुए 'मटर के पौधे' के विकास कालक्रम का छायांकन कर फिल्म बना दी। कालांतर में इन अनुभवों को फिल्म निर्माण में लगाया। फिल्म बनाने की मूल प्रेरणा फाल्के को 'क्राईस्ट का जीवन' देखने से मिली।

 इस फिल्म को देखकर उनके मन में विचार आया कि क्या भारत में भी इस तर्ज पर फिल्म बनाई जा सकती है? फिल्म कला को अपनाकर उन्होंने प्रश्न का ठोस उत्तर दिया। फिल्म उस समय मूलतः विदेशी उपक्रम था और फिल्म बनाने के अनिवार्य तकनीक उस समय भारत में उपलब्ध नहीं थी। फाल्के सिनेमा के जरूरी उपकरण लाने के लिए लंदन गए। लंदन में उनकी मुलाकात जाने-माने निर्माता और 'बाईस्कोप' पत्रिका के सम्पादक सेसिल हेपवोर्थ से हुई। कहा जाता है कि फाल्के को फिल्म सामग्री खरीदने मेंइन्होंने ही अपना बेहतर मार्गदर्शन किया। धुन्दीराज गोविंद फाल्के (दादा साहब फाल्के) ने फिल्म निर्माण, निर्देशन, पटकथा लेखन आदि विविध क्षेत्रों में भारतीय सिनेमा को अपना योगदान दिया था। उन्हें भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है।

 दादा साहब ने 3 मई 1913 को बंबई के कोरोनेशन थिएटर में राजा हरिश्चंद्र नामक अपनी पहलों मूक फिल्म दर्शकों को दिखाई थी। दादा साहब फाल्के ने 1913 में पहली मूक फिल्म बनाई थी। 20 वर्षों में उन्होंने कुल 95 फिल्में और 26 लघु फिल्में बनाई। दादा साहब फाल्के के फिल्म निर्माण की खास बात यह है कि उन्होंने अपनी फिल्में बंबई के बजाय नासिक में बनाई। वर्ष 1913 में उनकी फिल्म भस्मासुर मोहिनी में पहली बार महिलाओं, दुर्गा खोटे  और कमला गोखले ने महिला किरदार निभाया। इससे पहले पुरुष ही महिला किरदार निभाते थे। 1917 तक वे 23 फिल्में बना चुके थे। उनकी इस सफलता से कुछ व्यवसायी इस उद्योग को ओर आकृष्ट हुए और दादा साहब की साझेदारी में 'हिन्दुस्तान सिनेमा कम्पनी' की स्थापना हुई। दादा साहब ने कुल 125 फिल्मों का निर्माण किया जिसमें से तीन-चौथाई उन्हीं की लिखी और निर्देशित थी।

 दादा साहब की अंतिम मूक फिल्म सेतुबंधन 1932 थी जिसे बाद में डब करके आवाज दी गई। उस समय डब करना भी सिनेमा का एक शुरुआती प्रयोग था। दादा साहब ने जो एकमात्र बोलती फिल्म बनाई उसका नाम गंगावतरण है। राजा हरिश्चंद्र की कामयाबी के बाद फाल्के ने नासिक जाने का निर्णय लिया। नासिक में आकर फाल्के ने अगली फिल्म 'मोहनी भस्मासुर' और 'सावित्री-सत्यवान' का निर्माण किया। इन फिल्मों के हिट होने से फाल्के उस दौर में देश में बहुत लोकप्रिय हुए और अब से हर एक फिल्म के 20 प्रिन्ट जारी होने लगे। इन फ़िल्मों में कुशल तकनीक के रुप में 'स्पेशल इफेक्ट' अर्थात विशेष प्रभाव का रचनात्मक प्रयोग हुआ। 'विशेष प्रभाव' और 'ट्रीक फोटोग्राफी' का प्रयोग दर्शकों के आकर्षण का कारण बना जो एक यह क्रांतिकारी पहल थी। उस समय की परिस्थितियों में यह एक बड़ी उपलब्धि थी। तब फिल्म निर्माण और प्रदर्शन के संसाधन जुटा पाना बहुत मुश्किल था।

 फाल्के तत्कालीन फिल्म उपकरणों को लेकर बेहद सजग रहे और सन 1914 में फिर से लंदन गए। लंदन से लौटकर - फाल्के ने सन 1917 में नासिक में - 'हिन्दुस्तान फिल्म कंपनी'स्थापित करते हुए अनेक फ़िल्में बनाई। अपने यादगार सफ़र के 25 वर्षों में दादा साहब ने राजा हरिश्चंद्र (1913), सत्यवान सावित्री (1914), लंका दहन (1917), श्री कृष्ण जन्म (1918), कालिया मर्दन (1919), कंस वध (1920), शकुंतला (1920), संत तुकाराम (1921) और भक्त गोरा (1923) समेत 100 से ज्यादा फ़िल्में बनाई।

 फाल्के पर जार्ज मेलिस का स्पष्ट प्रभाव देखा गया। उसे दृश्य निर्माण की सुलझी हुई संवेदना के साथ प्रशंसनीय तकनीकी ज्ञान भी था। भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहब से फाल्के ने जब भारत की पहली फीचर फिल्म बनाने के लिए तैयारी की तो फिल्म को नायिका उनके लिए उस दौर की एक बड़ी गंभीर समस्या बन गई। सन 1913 में बनी फिल्म उन राजा हरिश्चंद्र में तारामती की विशेष भूमिका थी। फाल्के की मन इच्छा थी कि नायिका की भूमिका कोई युवती ही करे। इसके लिए दादा साहब ने पहले नाटक मंडली से जुड़ी अभिनेत्रियों से बात की लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि कोई कैमरे के सामने आने को तैयार नहीं हुई। यहां तक कि दादा साहब ने अभिनेत्री की खोज के लिए इश्तहार भी बंटवाए, लेकिन उसका भी कोई फायदा नहीं मिला। जब तारामती की भूमिका के लिए अंतत कोई कलाकार नहीं मिला तो विवश हो फाल्के कोठे वालियों के पास पहुंचे। उनसे हिरोइन बनने का आग्रह किया लेकिन उन्होंने भी टका-सा जवाब दे दिया।

हारकर दादा साहब ने फैसला किया कि किसी पुरुष से ही तारामती की भूमिका कराई जाए और उसी पल से कलाकार की तलाश शुरू हो गई। तभी एक दिन उन्हें एक ईरानी के रेस्तरां में एक रसोइया नजर आया। दादा ने रसोइया से बात की। कहने-सुनने के बाद वह काम करने के लिए तैयार हो गया, लेकिन दादा फाल्के की मुसीबत अभी खत्म नहीं हुई थी।

दरअसल, रिहर्सल के बाद जब शूटिंग का समय आया तो निर्माता निर्देशक फाल्के ने रसोइये से कहा कल से शूटिंग करेंगे, तुम अपनी मूंछें साफ़ कराके आना। दादा साहब की यह बात सुनकर रसोइया, जो अभिनेत्री का रोल करने वाला था, चौंक गया। उन्होंने जवाब दिया मैं मूंछें कैसे साफ़ करा सकता हूं? मूंछें तो मर्द मराठा की शान हैं। रसोइये की बातें सुनकर दादा फाल्के ने समझाया भला मूंछ वाली तारामती कैसे हो सकती है? वह तो नारी है और नारी की कोई मूंछ नहीं होती। फिर मूंछ का क्या है, शूटिंग पूरी होते ही रख लेना।काफी समझाने के बाद रसोइया मूंछ साफ कराने के लिए तैयार हुआ। वह रसोइया, जो भारत की पहली फीचर फिल्म की पहली हिरोइन बन रहा था, उसका नाम सालुके था।

 फाल्के शताब्दी वर्ष 1969 में भारतीय सिनेमा की ओर फाल्के के अभूतपूर्व योगदान के सम्मान में 'दादा साहब फाल्के सम्मान' शुरु हुआ। राष्ट्रीय स्तर का यह सर्वोच्च सिने पुरस्कार सिनेमा में उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया जाता है। उनकी स्मृति में यह पुरस्कार प्रतिवर्ष दिया जाता है। 1938 में भारतीय सिनेमा ने रजत जयंती पूरी की। इस अवसर पर चंदुलाल शाह और सत्यमूर्ति की अध्यक्षता में सामारोह आयोजित हुआ। दादा साहब फाल्के को बुलाया तो अवश्य गया किन्तु उन्हें कुछ विशेष नहीं मिला। समारोह में उपस्थित 'प्रभात फिल्मस' के शांताराम ने फाल्के की आर्थिक सहायता की पहल की। पहल करते हुए वहां आए निर्माताओं, निर्देशक, वितरकों से धनराशि जमाकर फाल्के को भेज दिया। इस राशि से नासिक में फाल्के के लिए घर बना। उनके जीवन के अंतिम दिन यहीं बीते। 16 फरवरी, 1944 को नासिक में ही भारतीय सिनेमा जगत के पितामह कहे जाने वाले दादा साहब फाल्के का निधन हुआ।

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