Sunday, 22 May 2016

5 राज्यों के जनादेश के मायने



     



 पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजे ममता , जयललिता और भाजपा  के लिए खास ही नहीं ऐतिहासिक भी रहे। पश्चिम बंगाल में ममता जहाँ  पुराने  वाम दुर्ग  को पूरी तरह  नेस्तनाबूद करने में सफल हुई  वहीँ  तमिलनाडु में जया की फिर से सत्ता में वापसी हुई ।  कांग्रेस असम में हैट्रिक लगाने के बाद पूरी तरह साफ़ हो गई तो केरल में भी उसे करारी  हार का सामना करना पड़ा । द्रमुक कांग्रेस की लाज पुदुचेरी ने बचाई | इन तमाम नतीजों के संकेत साफ हैं कि आज के वोटर का मिजाज बदल रहा है ।  अब वह विकास और स्थिर सरकार के लिए मतदान कर रहा है । 5  राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों ने साफ संकेत दिए हैं। मसलन कांग्रेस सिकुड़ रही है और  राज्यों में सत्ता से एक एक करके  बेदखल होकर कमजोर हो रही है वहीँ भाजपा असम में धमाकेदार उपस्थिति दर्ज करने के साथ दक्षिण के राज्यों में अपने वोट बैंक को  बढ़ा रही है । पश्चिम बंगाल में अपनी संख्या में बढ़ोत्तरी और केरल में खाता खोलकर भाजपा  ने  दिल्ली बिहार की करारी  पराजय पर मरहम लगा दिया है वहीँ पश्चिम बंगाल के जनादेश ने इशारा किया है  कांग्रेस के साथ हाथ मिलाकर भी वामपंथी दल  ढलान  पर हैं | कांग्रेस के लिए थोड़ी राहत  पुदुचेरी ने दी है | 

 पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण बात पश्चिम बंगाल में ममता की दो तिहाई बहुमत से जीत है |  वाम दुर्ग के पतन के साथ ही यहाँ पर  कांग्रेस  वाम गठजोड़ इस चुनाव में पूरी तरह  ढह गया । कांग्रेस इस चुनाव में जिस तरह साफ़ हुई है उससे पार्टी के भीतर कई सवाल उठ खड़े हुए हैं | आज देश में कांग्रेस जहाँ 6 फीसदी भू भाग पर सिमट चुकी है वहीँ भाजपा की ताकत बढ़कर अब 36 फीसदी भू भाग तक पहुँच चुकी है | इन नतीजों के बाद बीजेपी का राज 9 राज्यों में हो जाएगा |  इसके साथ ही बीजेपी की सरकार देश के 36 फीसदी आबादी पर होगी, एनडीए गठबंधन की बात करें तो यह आंकड़ा 43 के पार पहुँच गया है | 

कांग्रेस मुक्त भारत का नारा नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान दिया था और लगता है कि  यह नारा सही साबित हो रहा है|   कांग्रेस के लिए पांच राज्यों के चुनाव नतीजे  सबसे बुरे रहे | पश्चिम बंगाल में अप्रत्याशित कुछ भी नहीं रहा। वहां ममता के किला फतह करने और वाम दुर्ग के ध्वस्त होने का अनुमान  एग्जिट पोलों  में पहले से ही लगाया जा रहा था। इस सूबे में  वाम शासन वापस आना अब दूर की गोटी लगता है । कांग्रेस के साथ गठबंधन के बाद भी उसका वोट प्रतिशत ना बढ़ना अब उसके कैडर के सामने एक बड़ी चुनौती है ।  ममता बनर्जी की तृणमूल  ने दो तिहाई बहुमत हासिल किया। तृणमूल सिर्फ अपने बलबूते बहुमत ले आयी । लंबे संघर्ष  के बाद ममता बनर्जी का  दूसरी बार बहुमत के साथ राइटर्स बिल्डिंग में बैठने का सपना सच हो गया। अपनी विजय को ममता ने मां, माटी और मानुष की जीत बताया है। एक दौर में पश्चिम बंगाल में  शासन मतलब वाम का शासन हो गया था। उसने साढ़े तीन दशकों तक बदलाव की बयार को रोके रखा था। उसकी कमाल की किलेबंदी थी। राज्य के कोने-कोने में जाल फैला रखा था। जिसे उधेड़ पाना मुश्किल था। मगर ममता की आंधी से सब कुछ तहस-नहस हो गया। न किला बचा, न कैडर, न तिकड़म और जाल-ताल। कांग्रेस के साथ गठबंधन का भी वोटरों ने जनाजा निकाल दिया | 

 बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस ने जबरदस्त वापसी की | उनकी बादशाहत को लेफ्ट और कांग्रेस मिलकर भी चुनौती नहीं दे सका | ममता ने चुनाव में विकास के नारे को जोर-शोर से उठाया |  आम जनता और गरीबों के लिए वह कई  योजनाएं लेकर आईं | ममता की जीत में राज्य की 30 फीसदी अल्पसंख्यक आबादी  और मुस्लिम वोट बैंक का भी अहम रोल रहा | इसके अलावा दीदी की अनुसूचित जाति, जनजाति और महिला मतदाताओं में भी गहरी पैठ थी | ममता को इन लोगों ने दिल खोलकर वोट दिया|  विपक्ष ने शारदा घोटाले और नारद स्टिंग  और विवेकानंद फ्लाईओवर का मुद्दा भी इस चुनाव में जोर शोर से उछाला था लेकिन वोटरों ने इसे नकार दिया | ममता को इस चुनाव में 47% वोट हासिल हुए वहीँ  कांग्रेस को करीब 12 फीसदी वोट मिले |  लेफ्ट को करीब 20 फीसदी से ज्यादा वोट मिले |  बंगाल जीतने का  श्रेय ममता बनर्जी को जाता है जिनकी लोकप्रियता ने आज भी ग्रामीण इलाकों में उनके वोट बैंक को सुरक्षित रखा बल्कि जनता ने भी उनके विकास कार्यो पर अपनी मुहर लगाई ।

तमिलनाडु में जय ललिता की वापसी भी दिलचस्प है ।तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक और द्रविड़ मनेत्र कड़गम द्रमुक पुराने प्रतिद्वंद्वी रहे हैं। दोनों के हाथ में सत्ता आती जाती रहती हैऔर यहाँ सत्ता हर पांच बरस में बदलती ही रही है लेकिन इस बार ऐसा नहीं हो सका |   अम्मा की जीत ने 50 और 60 के दशक की यादें ताजा करने के साथ ही  80 के दशक में एम जी आर के करिश्मे की याद दिला दी । 28 साल बाद  तमिलनाडु में  कोई पार्टी दोबारा सत्ता में आई है |  अम्मा ने पहले  पिछला विधानसभा चुनाव जीता। इसके बाद मुख्य विपक्षी पार्टी के दिग्गज नेता 2 जी स्पेक्ट्रम की चपेट में आ गये। इसने अम्मा के लिए सारा मैदान खोल दिया | फिर लोक सभा चुनावों में अपनी सीटों में इजाफा कर दिया |  इस चुनाव में  जयललिता को जहाँ 41 फीसदी वोट मिले वहीँ डीएमके को 31 और कांग्रेस को 6.5 फीसदी |   बीजेपी भी  2  फीसदी  वोट अपने नाम कर गई | तमिल जनता ने जया के विकास कार्यो और उनकी योजनाओं पर अपनी मुहर लगाकर यह साफ़ कर दिया आज के चुनावों में विकास एक बड़ा मुद्दा बन गया है | 


 वहीँ  असम के नतीजे जरूर अहम हैं जहां कांग्रेस का सफाया इस अंदाज में होगा इसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी । गोगोई अपने दम पर सरकार बनाने का सब्जबाग़  केन्द्रीय नेतृत्व को दिखा रहे थे लेकिन एंटी इन्कम्बैंसी ने उनका खेल इस बार बिगाड़ दिया । साथ ही भाजपा की सधी हुई रणनीति से कांग्रेस असम में चित्त हो गई ।  इन नतीजों के साफ संकेत हैं कि जनता को अब विकास चाहिए चाहे वो कोई भी दल क्यों न हो। विचारधारा का जमाना बीत गया। दलों के नामों का भी कोई खास मतलब नहीं रहा | इस बार बीजेपी गठबंधन को 40  फीसदी से ज्यादा वोट मिले हैं | इसका बड़ा कारण कांग्रेस और बदरुद्दीन की ए आई यू डी एफ का अलग अलग लड़ना रहा जिससे दोनों के वोट बैक में बिखराव का सीधा फायदा भाजपा को मिला | साथ ही सर्वानन्द सोनेवाल के चेहरे को आगे कर भाजपा ने अपना मिशन असम पहले ही चला दिया था जिसके चेहरे का सीधा लाभ भाजपा को मिला | लोक सभा में जहाँ भाजपा ने 7 सीटें जीतकर सभी को चौंका दिया था वहीँ असम में सरकार बनाकर उसने नया इतिहास रच दिया |कांग्रेस से लगभग चार गुना सीटें लाना भाजपा की मजबूरी के साथ कांग्रेस की कमजोरी की ओर भी इशारा करता है। भाजपा और संघ के कैडर में इसे लेकर एक नया जोश भी है क्युकि असम से वह पूर्वोत्तर के पडोसी राज्यों में भी अपनी अखिल भारतीय पहचान को बना सकती है |  
 

पश्चिम बंगाल की तरह केरल में भी  यू डी एफ शासन हाथ से फिसला है। केरल विधानसभा सीटों के लिए हुए चुनावों में वाम मोर्चा के समर्थन वाली एलडीएफ  को  जीत  मिली है।  कांग्रेस के नेतृत्व वाला यू डी एफ को  इस चुनाव में करारी शिकस्त मिली है | केरल के मतदाताओं का यह मिजाज रहा है कि वे सत्ता पार्टी को रिपोर्ट नहीं करतै। यहां अपने गढ़ में वामपंथी ने अपनी थोड़ी बहुत प्रतिष्ठा बचा ली है जो पश्चिम बंगाल में गंवाई है। यहां एलडीएफ को  यू डी  एफ  से दो गुनी सीटें मिली है।एल डी एफ  की जीत  को भ्रष्टाचार के खिलाफ जीत के तौर पर देखा जा सकता है और तमिलनाडु, पुडुचेरी के नतीजे यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि मतदाता भ्रष्टाचार बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। लेकिन असम में कांग्रेस की हैट्रिक यह बताती है कि वहां स्थानीय विकास अब चुनावी मुद्दा बनता जा रहा है। पुडुचेरी में कांग्रेस को मुंह की खानी पड़ी थी। 30 सीट  वाले इस केन्द्र शासित प्रदेश में कांग्रेस (एनआई) और एडीएम के गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिल गया है। कांग्रेस केवल एक ही सीट पर जीत हासिल कर पाई है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि राज्यों के विधानसभा चुनाव में स्थानीय मुद्दे ही हावी रहे। उनके परिणामों को केन्द्र की पार्टी कांग्रेस की सफलता-असफलता से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। 
 
पुदुचेरी में इस बार द्रमुक  और कांग्रेस  गठबंधन की जीत हुई है |  इस जीत के साथ ही कांग्रेस ने रंगासामी  से बदला ले लिया है |  रंगासामी  ने एन आई एन आर सी का गठन कांग्रेस से अलग होकर ही किया था |   पुदुचचेरी के इस विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी एआईएनआरसी 30 में से महज 8 सीटें ही जीत पाई और तीन बार मुख्यमंत्री रहे एन रंगासामी अपनी पार्टी को हार से नहीं बचा पाए | कुल मिलाकर चार राज्य के विधानसभा चुनाव के नतीजों से कांग्रेस ने दो राज्य असम और केरल गंवा दिए। तमिलनाडु में निराशा मिली है। पश्चिम बंगाल में उनकी भद्द पिटी है। भाजपा के लिए ये अच्छे दिनों की शुरुवात है लेकिन 2017 में यू पी , पंजाब , उत्तराखंड सरीखे कई राज्यों में यह मैजिक कितना चल पाता है यह देखने वाली बात होगी |

Tuesday, 17 May 2016

अमर सिंह की घर वापसी के मायने


 उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी  ने राज्यसभा और प्रदेश विधान परिषद के आगामी चुनाव के लिए अपने उम्मीदवार  मंगलवार को सर्वसम्मति से तय कर घोषित कर दिए। इनमें हाल में सपा में वापस आये पूर्व केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा के अलावा अमर सिंह तथा बिल्डर संजय सेठ भी शामिल हैं।गौरतलब है कि बोर्ड के सदस्य सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव और प्रदेश के वरिष्ठ काबीना मंत्री आजम खां अमर सिंह के मुखर विरोधी रहे हैं। राज्यसभा भेजे जाने के मद्देनजर अमर सिंह की सपा में वापसी के सवाल पर यादव ने कहा कि इस बारे में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव कोई निर्णय लेंगे। बहरहाल, राज्यसभा का अधिकृत प्रत्याशी बनाने के बाद अमर सिंह की सपा में वापसी मात्र औपचारिकता भर  रह गई है।

बीते मंगलवार  को सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के आवास का नजारा देखने लायक था | नेता जी के प्रति अमर सिंह का प्रेम एक बार फिर जागने के कयास लगने शुरू हो गए हैं और पहली बार इन मुलाकातों के बाद एक नई तरह की किस्सागोई समाजवादी राजनीति को लेकर शुरू हो गयी है | यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण  है क्युकि सूबे के युवा सी एम अखिलेश भी इस दौरान  नेताजी से मिले और अमर सिंह के मसले पर  साथ बैठकर उन्होंने  अपनी  भावी राजनीति को लेकर कई चर्चाएँ भी की  | सभी ने अपने रणनीतिकारों को साधकर  कई घंटे बैठकर  यू पी की सियासत को साधने और मिशन 2017 को लेकर भी  मैराथन मंथन किया  | राज्य सभा की सीटों पर अपने प्रत्याशियों के नाम के एलान के साथ ही उत्तर प्रदेश की  राजनीतिक  बिसात के केंद्र  में अमर सिंह एक बार फिर आ गये हैं ।  दरअसल सपा ने अपने सभी  राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी जिसमें अमर सिंह का नाम भी शामिल  है ।  इसके बाद से ही अमर सिंह का सेंसेक्स  एक बार फिर सातवें  आसमान पर चढ़ गया है ।  ऐसे में संभावना है कि उन्हें  राज्य सभा का टिकट मिलने के बाद देर सबेर उनकी सपा में घर वापसी तय  है ।

यह तीसरा ऐसा  मौका है  जब अमर सिंह नेता जी के साथ मिलकर हाल के दिनों में गलबहियां  सक्रियता बढाकर उत्तर प्रदेश के हालात को लेकर  चर्चा की है   |  इससे पहले छोटे लोहिया के रूप में पहचान रखने वाले खांटी समाजवादी जनेश्वर मिश्र के नाम पर बने पार्क के उद्घाटन के मौके पर दोनों ने साथ मिलकर सार्वजनिक मंच पहली बार साझा किया था हालांकि इस  समारोह में  भी सपा से निकाले गए अमर सिंह के आने की खबरें हवा में तैरने लगी थी लेकिन समाजवादी पार्टी से जुडे़ कार्यकर्ताओं से लेकर विधायकों तक को उम्मीद नहीं थी कि अमर सिंह सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के साथ मंच साझा कर सकते हैं  लेकिन राजनीती में कुछ भी संभव है लिहाजा इस बार भी नेताजी के  साथ बैठने से कई कयासों को न केवल हवा मिलनी शुरू हुई  बल्कि अमर सिंह के सपा प्रेम के जागने के प्रमाण मिलने शुरू हो गए लेकिन विरोधियों के चलते नेताजी उन्हें वापस लाने के सहस नहीं जुटा पाए । 

लोकसभा चुनाव में भाजपा के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के ब्रह्मास्त्र को छोड़ने के बाद अब सपा को समाजवादी राजनीति साधने के लिए एक ऐसे कुशल प्रबंधक की आवश्यकता है जो नमो के शाह की बराबरी कर सके लिहाजा नेता जी भी अमर सिंह के साथ अब गलबहियां करने में लगे हुए हैं | वह एक दौर में नेता जी के हनुमान रह चुके हैं |  नेता जी भी इस बात को बखूबी समझ रहे हैं अगर यू पी में उन्हें मोदी के अश्वमेघ घोड़े की लगाम रोकनी है तो अमर सिंह सरीखे लोगो को पार्टी में वापस लाकर ही 2017  में होने वाले विधान सभा चुनाव तक  अपना जनाधार ना केवल मजबूत किया जा सकता है बल्कि कॉरपरेट की छाँव तले समाजवादी कुनबे में विस्तार किया जा सकता है | अमर की पार्टी में दोबारा  वापसी की अटकलें अब राज्य सभा का टिकट मिलने के साथ ही  फिलहाल तेज हो चली हैं। 

हालाँकि सब कुछ तय करने की चाबी खुद नेता जी के हाथो में है लेकिन  अब उनकी पार्टी में वापसी को लेकरबड़ी भूमिका देखने को मिल सकती है |  नेता जी के साथ हाल के दिनों में  अमर सिंह की मुलाकातों ने एक बार फिर उनके सपा में शामिल होने के कयासों को बल तो दे ही  दिया है |  हालाँकि एक दौर में  अमर सिंह  ने खुद कहा था कि वह किसी राजनीतिक दल में शामिल होने नहीं जा रहे हैं ।  सक्रिय राजनीति में उनकी जिंदगी के 19  साल खर्च हुए हैं और अब वह भविष्य  में राज्यसभा का अपना कार्यकाल पूरा करने के बाद दोबारा प्रयास नहीं करेंगे लेकिन राजनीती तो संभावनाओं का खेल है । यहाँ कुछ भी संभव है लिहाजा अमर सिंह भी  बीती बातें भुलाकर राज्य सभा में जाने को बेताब हैं ।

अमर सिंह की सपा में एक दौर में ठसक का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1995 में पार्टी ज्वॉइन करने के बाद नेताजी और सपा दोनों  को दिल्ली में स्थापित करने में उनका बहुत बड़ा योगदान रहा है।  तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने और उसमें नेताजी  की भूमिका बढ़ाने में भी अमर सिंह ही बड़े  सूत्रधार थे वहीँ इंडो यू एस न्यूक्लियर डील में भी कड़ी का काम अमर सिंह ने ही किया जब उनके सांसदों ने मनमोहन सरकार की लाज यू पीए सरकार को  बाहर से समर्थन देकर बचायी |  यू पी की जमीन से इतर पहली बार विभिन्न राज्यों में पंख पसारने में अमर सिंह के मैनेजमेंट के किस्से आज भी समाजवादी कार्यकर्ता नहीं भूले हैं | सपा में शामिल होने के बाद किसी एक नेता का इतना औरा सपा में इतना नहीं होगा जितना उनका था। उन्होंने पार्टी को फिल्मी सितारों के आसरे एक पंचसितारा रंग देने की  भरपूर कोशिश की थी। एक वक्त था जब अमर सिंह फैसले लेते थे और मुलायम उन फैसलों को स्वीकार कर लेते थे।दोनों एक जिस्म दो जान थे । उनके लिए गए फैसलो पर रजामंदी हुआ करतीं थी ।  बाद में एक वक्त ऐसा भी आया जब वह मुलायम के बेहद करीबी आजम खान के लिए गले की हड्डी बन गए | सपा में अमर सिंह की गिनती एक दौर में नौकरशाहों  से लेकर  बालीवुड उद्योगपतियों के बीच खूब जोर शोर से होती थी लेकिन पंद्रहवी लोक सभा चुनाव में मिली पराजय और आतंरिक गुटबाजी ने अमर सिंह की राजनीती का बंटाधार कर दिया | 2010  में उन्हें पार्टी से  बाहर निकाल दिया गया  जिसके बाद 2012  में विधान सभा चुनाव और 201 4 के लोक सभा चुनाव में सपा के विरोध में उन्होने अपने उम्मीदवार खड़े किये लेकिन करारी हार का सामना करने को मजबूर उन्हें होना पड़ा |  आजम खान को जहाँ उनके दौर में पार्टी से निकाल  दिया गया वहीँ अमर सिंह  के रहते एक दौर में  आजम खान सपा में नहीं टिक  सके |  यह अलग बात है आजम खान अमर की विदाई और कुछ समय जुदाई के बाद वह खुद सपा में चले आये |

 अमर सिंह के पार्टी में बढ़ते प्रभाव का नतीजा यह हुआ कि पार्टी के संस्थापक रहे नेता धीरे-धीरे दूर होने लगे। उनका आरोप था कि अमर के चलते पार्टी अपना परंपरागत  वोट बैंक खोती जा रही है। आखिरकार वह वक्त भी आ गया जब उन्हें मुलायम सिंह नजर अंदाज करने लगे। देखते ही देखते हालात बिगड़ते चले गए। उन्होंने बयान दे दिया कि मुलायम सिंह और उनके परिवार ने उनकी गंभीर बीमारी के दौरान कोई सहानुभूति नहीं रखी। इसके बाद  पार्टी ने अमर सिंह, जया प्रदा और 4 अन्य विधायकों को निष्कासित कर दिया। अमर सिंह की अगर सपा में दुबारा इंट्री होती  है तो  नगर विकास मंत्री आजम खां पार्टी से बाहर जाने का रास्ता तैयार कर सकते हैं | कल सपा  संसदीय  बोर्ड की मीटिंग को भी वह बीच में छोड़ कर चले गए ऐसी खबरें मीडिया में हैं  ।  बीते कुछ महीनो पहले आजम खां ने इस संभावना से इनकार नहीं किया था कि यदि अमर सिंह सपा में वापस आए तो उन्हें बाहर जाना पड़ सकता है | उन्होने तो खुले मंच से यहां तक कह दिया था अमर सिंह के आने के बाद खुद उनका अस्तित्व खतरे में पड  सकता है | नेताजी के बर्थडे के मौके पर भी अमर सिंह और आजम खान को लेकर खूब तलवारें भी बीते बरस  सैफई में खिंची | जहाँ  मुलायम सिंह के जन्मदिन के कार्यक्रम में  बीते बरस अमर सिंह के आने पर आजम ने करारा हमला किया वहीँ यह कहा  कि जब तूफान आता है तो कूड़ा करकट भी घर में आ जाता है। आजम खान और अमर सिंह के बीच संबंध काफी समय से तल्ख़ रहे हैं । अमर सिंह ने कहा था कि उन्होंने मुलायम के साथ 14 साल काम किया है । वह मुलायम की पार्टी में हों या ना हों लेकिन उनके दिल में जरूर हैं । अमर सिंह की इसी बात पर निशाना साधते हुए आजम ने उन्हें इशारों ही इशारों में 'कूड़ा-करकट' कहा था जिसके बाद से शीत युद्ध का दौर आज तक  थमा नहीं है ।

  वैसे अमर सिंह को सपा में वापस लाए जाने की तैयारी  2014 के लोकसभा चुनाव से पहले ही एक बार शुरू हो गई थी लेकिन आजम खां के वीटो के बाद सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने अपना इरादा बदल दिया था। अब इस बार क्या होगा यह देखना बाकी है क्युकि आजम के अलावे सपा में अमर विरोधियो की लम्बी चौड़ी फेहिरस्त मौजूद है ।    इतिहास समय समय पर खुद को दोहराता है और संयोग देखिये सपा के पूर्व महासचिव बेनी प्रसाद वर्मा ने भी अमर सिंह के कारण ही समाजवादी पार्टी को एक समय अलविदा कहा था। अब लगभग 6 साल बाद न सिर्फ अमर सिंह का  नेता जी के साथ मिलन होना तय है बल्कि वही बेनी प्रसाद न केवल सपा को दुबारा ज्वाइन कर चुके हैं बल्कि अमर सिंह के साथ फिर राज्यसभा में इंट्री करने को बेताब हैं । 

 अमर सिंह की  मैनेजरी  के किस्से  यू पी की सियासत में कोई नए नहीं हैं । नेताजी आज भी उन्हें पसंद करते हैं  और राज्य सभा में भेजे जाने के बाद अब  आने वाले दिनों में समाजवादी सियासत का एक नया मिजाज हमें देखने को मिल सकता है |  अमर सिंह  और आजम खां का छत्तीस का आंकड़ा  भले ही जगजाहिर है लेकिन नेता जी और अमर सिंह का दोस्ताना  आज भी सलामत है शायद यही वजह है  अमर सिंह ने हर उस मौके को भुनाने का  प्रयास किया है जहाँ उन्हें फायदा  नजर आता है |  जनेश्वर पार्क के उद्घाटन के मौके पर भी कई बरस पहले  वह  नेता जी की तारीफों के पुल बांधकर साफ संकेत दे चुके थे  साईकिल  की सवारी करने में उन्हें कोई ऐतराज नहीं है | राजनीती में  किसी के दरवाजे कभी बंद नहीं किये जा सकते  और संयोग देखिये अमर सिंह के कारण ही  कभी एक समय आजम खां ने सपा को टाटा  कहा था |  जिस दौर में  आजम खां ने सपा का साथ छोड़ा था उस वक्त भी समाजवादी खेमे में अमर सिंह को निकाले जाने के समय जश्न का माहौल देखा गया ।  जिस तरह से अमर सिंह को सपा के कुछ बडे़ नेता पसन्द नहीं करते थे ठीक वही स्थिति सपा में आजम खां की भी  हो चली है| 

लोकसभा चुनाव के दौरान आजम खां ने  मुस्लिम वोट बैंक पूरा सपा के साथ लाने के बड़े दावे किये थे लेकिन नमो की लोकसभा चुनावो में चली सुनामी और राज्यों में मोदी के हुदहुद ने सपा के जनाधार का ऐसा बंटाधार कर दिया कि लोक सभा चुनावो में सपा की खासी दुर्गति हो गयी |  नेता जी को  आजम खां  पर पूरा भरोसा था  लेकिन नेताजी परिवार के अलावा सपा का पूरा कुनबा लोकसभा चुनाव में साफ हो गया  |  अब  नए  सिरे से वोटरों को साधने के लिए नेता जी यू पी की राजनीति  को  अपने अंदाज में साध रहे हैं  ।  इन्हीं परिस्थितियों से निपटने के लिए नेता जी  ने अमर सिंह की वापसी  का एक नया चैनल इस समय खोल दिया है | । हालांकि पार्टी में उनकी वापसी को लेकर ज्यादातर नेताओं ने हामी नहीं भरी है लेकिन आजम खान और शिव पाल यादव उनकी वापसी पर सबसे बड़ी रेड कार्पेट बिछा  रहे हैं | यही अमर सिंह की सबसे बड़ी मुश्किल इस दौर में बन चुकी   है |

 अमर सिंह अखिलेश और नेता जी की खिचड़ी साथ पकने के बाद से ही दिल्ली में  1 6 अशोका रोड से लेकर 5  कालिदास मार्ग  लखनऊ तक हलचल मची हुई है | अमर सिंह नेता जी  से अपने घनिष्ठ सम्बन्धो का फायदा उठाने  का कोई मौका  कम से कम  अभी तो नहीं छोड़ना चाहते हैं |  शायद ही आगे चलकर उन्हें  इससे  बेहतर मौका कभी मिले | वैसे भी इस समय सपा अपने दम पर पूर्ण बहुमत की सरकार  उत्तर प्रदेश में चला रही है |  नेता जी भी बड़े दूरदर्शी हैं | वक्त के मिजाज को वह बेहतर ढंग से पढना जानते हैं | 1996 में अपने पैंतरे से उन्होंने केंद्र में कांग्रेस को आने से जहाँ रोका वहीँ बाद में वह खुद रक्षा मंत्री बन गए |  2004 आते ही  वह कांग्रेस को परमाणु करार पर बाहर  से समर्थन का एलान करते हैं  तो यह उनकी समझ बूझ को सभी के सामने लाने का काम करता है | फिर राजनीती का यह चतुरसुजान इस बात को बखूबी समझ रहा है अगर कांग्रेस और भाजपा के खिलाफ एकजुट नहीं हुए तो आने वाले दौर में उनके जैसे छत्रपों की राजनीति पर सबसे बड़ा ग्रहण लग सकता है शायद इसीलिए वह इस सियासत का तोड़ खोजने निकले हैं जहाँ उनकी बिसात में अमर सिंह  ही अब सबसे फिट बैठते हैं | नेता जी  इस राजनीती के डी एन ए को भी बखूबी समझ रहे हैं | ऐसे में अमर सिंह की घर वापसी अब राज्य सभा में इंट्री के बाद तय मानी जा रही है ।

Monday, 25 April 2016

नीतीश चले पी एम बनने




बिहार  की सत्ता पर ठसक के साथ तीसरी बार काबिज होने वाले जेडीयू अध्यक्ष और सूबे के सीएम नीतीश कुमार ने मिशन 2019 के लिए अभी से चुनावी  बिगुल फूंक दिया है । नीतीश ने 2019 लोकसभा चुनाव की ज़मीन तैयार करते हुए बड़ा बयान दिया है।  उन्होंने  जद यू की कमान संभालने के बाद बड़ा ऐलान  कर दिया कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ महा गठबंधन  बनाने में वह  उत्प्रेरक की भूमिका निभायेंगे जिससे 2019 में मोदी सरकार की विदाई हो सकेगी । साथ ही उन्होंने यह भी  कहा है कि अगर बीजेपी का हराना है तो तमाम पार्टियों को बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने की जरूरत है। पटना के श्री कृष्ण मेमोरियल हाल में जद यू की राष्ट्रीय परिषद् में नीतीश की हुंकार के बाद लग रहा है कि पी एम  मोदी के खिलाफ वह उसी तरह की गोलबंदी सभी दलों को साधकर करना चाहते हैं जैसा प्रयोग उन्होंने  बीते बरस बिहार में किया  ।
 
मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत की तर्ज पर नीतीश ने अब नया नारा संघ मुक्त भारत का दिया है । उन्होंने भरोसा ही नहीं उम्मीद जताई है भाजपा को महागठबंधन की तर्ज पर पराजित किया जा सकता है।   तो क्या माना जाए नीतीश ने बिहार से निकलकर पहली बार राष्ट्रीय राजनीती में सक्रिय होने के संकेत दे दिए हैं और क्या पहली बार बिहार के महागठबंधन की तर्ज पर सभी दल नीतीश की छाँव तले एकजुट होकर मोदी सरकार के खिलाफ बड़ी मोर्चाबंदी करने जा रहे हैं  । इन शुरुवाती संकेतों को डिकोड करें तो जद यू की कमान अपने  हाथ में लेते  ही नीतीश कुमार के निशाने पर अभी से 2019 आ चुका है जिसके खिलाफ वह माहौल बनाने में जुट गए हैं जिसकी शुरुवात आने वाले दिनों में उनके लखनऊ के दौरे से होने जा रही है । यह भाजपा को शिकस्त देने के लिए गैर भाजपाई दलों को एक झंडे के नीचे लाने की कोशिश मानी जा सकती है क्युकि दिल्ली का रास्ता यूपी  से होकर गुजरता है ।  भारतीय राजनीती के सन्दर्भ  में यह कथन परोक्ष रूप से फिट बैठता है। 

दिल्ली से दूर पटना में श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल में नीतीश कुमार जब अपनी राष्ट्रीय कार्यकारणी के अधिवेशन के दौरान अपना भाषण दे  रहे थे तो उनकी नजरें शायद  भारतीय राजनीती की इस ऐतिहासिक इबारत की ओर भी जा रही थी । शायद इसलिए उन्होंने  लोक सभा चुनावो  से पहले  गैर भाजपा दलों और अपने कार्यकर्ताओ को तैयार  रहने की सलाह इशारो इशारो में दे डाली।

 इस राष्ट्रीय कार्यकारणी की बैठक  में नीतीश  कुमार  की पीऍम बनने की हसरतें भी हिलारें मार रही थी शायद तभी आत्मविश्वास से लबरेज नीतीश  ने दावा कर डाला राष्ट्रीय स्तर पर महागठबंधन  बनाने में उनकी भूमिका सिर्फ उत्प्रेरक की होगी ।  उत्प्रेरक किसी भी क्रिया की गति को बढाने में सहायक है  लिहाजा नीतीश ने भी अपनी सार्थकता को इशारो इशारो में बता दी  ।  वहीँ जद यू को भी उम्मीद है नीतीश की साफ़ छवि और सुशासन बाबू की छवि को ढाल बनाकर 2019 से पहले वह गैर भाजपा दलों को अपने पाले में लाकर गठबंधन में स्वीकार्यता बढ़ा सकते हैं । यूँ  तो  2019 की  चुनावी बिसात अभी बहुत दूर है मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काट की तैयारी नीतीश अभी से करने लगे हैं। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव मोदी के मुकाबले नीतीश कुमार को सामने ला रहे हैं। ।   बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव भी उनका इस समय  भरपूर साथ दे रहे हैं। लालू ने तो यहां तक कह दिया कि नीतीश एक दिन भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे तो हमें खुशी होगी।
 
उम्मीदों और देश की मौजूदा स्थिति के मद्देनजर नीतीश  द्वारा भाजपा के खिलाफ गोलबंदी का प्रयोग आसान  नहीं लगता क्युकि  बिना उत्तर प्रदेश फतह किये बिना दिल्ली में अगली सरकार के गठन में अहम भूमिका निभाने के सपने देखना मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखने जैसा है । यू पी में इस महागठबंधन  के मजबूत  होने की सूरत में ही नीतीश प्रधान मंत्री पद की दावेदारी कर सकते हैं लेकिन यहाँ  पर भी राजनीती के दिग्गज नेताजी को साधना नीतीश के लिए  आसान नहीं होगा । नेताजी  महागठबंधन  से  बिहार चुनावों से पहले ही खुद बाहर हो चुके हैं  ।  सपा  और बसपा के इर्द गिर्द ही यू पी की  राजनीती घूमती रही है लेकिन यह दोनों दल अपने गिले शिकवे भुलाकर साथ आयेंगे ऐसा कहना दूर की  गोटी है ।  रही बात अजीत सिंह की  तो उनका पश्चिमी यू पी पर जबरदस्त प्रभाव है लेकिन फिलहाल वह नेताजी के आसरे खुद राज्य सभा में जाने की जुगत में दिखाई दे रहे हैं । भला वह अपनी पार्टी का विलय  नीतीश की पार्टी में करवाकर  क्यों अपने पैर कुल्हाड़ी मारेंगे  । ऐसा ही हाल झारखंड के पूर्व  मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी का है  जिनका कोई नावलेवा  अब नहीं बचा है । तो  ऐसे हालतों  में नीतीश के पी एम के  सपनों को भला  कैसे पंख लग पायेंगे ?

 नीतीश के बारे में कहा जा रहा है वह आने वाले दिनों में अपनी पार्टी जद यू ,राजद,  झारखंड विकास मोर्चा , आर एल  डी का विलय कर जनविकास दल नाम की नई पार्टी खड़ी करना चाहते हैं लेकिन भाजपा के मजबूत होने के चलते इनका यह प्रयोग पूरे देश में साकार हो पायेगा इसमें संशय है । बिहार देश नहीं है और देश का मतलब इस दौर में बिहार नहीं है । हर राज्य की परिस्थितिया कमोवेश अलग अलग हैं और आज का वोटर भी अब बदल चुका है । राष्ट्रीय राजनीती अपनी जगह है और राज्यों में छत्रपों के वर्चस्व  हो हम नहीं नकार सकते । मुलायम सिंह , मायावती , नवीन पटनायक , जयललिता , ममता ,केजरीवाल, उमर अब्दुल्ला क्यों अपने राज्यों को नीतीश की पार्टी के हवाले कर देंगे और अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारेंगे ? नीतीश का साथ बिहार में कांग्रेस ने दिया । सोनिया का प्रयोग बिहार में सफल रहा लेकिन देश के मसले पर कांग्रेस भी अपनी 131 बरस पुरानी साख क्यों नीतीश के साथ जाने से खोएगी ? इस बीच कांग्रेस ने नीतीश को अपना समर्थन देने पर सतर्कता बरती है  ।

नीतीश कुमार ने इसके साथ ही  संघ मुक्त भारत की बात कही है। उन्होंने लोकतंत्र की रक्षा के लिए गैर भाजपा दलों से एकजुट होने की अपील  की है।उन्होंने भरोसा दिलाया कि भाजपा विरोधी दलों कांग्रेस वामदल और अन्य क्षेत्रीय दलों को 2019  से पहले एक साथ लाने के लिए प्रयासरत रहेंगे।नीतीश के बयान  की प्रतिक्रिया में बीजेपी का कहना है कि वह नीतीश के महामोर्चा गठित करने के प्रयासों से परेशान नहीं है। इस बीच कांग्रेस ने नीतीश को अपना समर्थन देने पर सतर्कता बरती है  ।  बीजेपी प्रवक्ता ने कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हुए पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी से यह स्पष्ट करने को कहा कि क्या राहुल गांधी ऐसे किसी मोर्चे की अगुवाई करेंगे या केवल उसका हिस्सा भर होंगे ।  राजनीती संभावनाओ का खेल है और यहाँ  महत्वाकांशा हिलारे मारती रहती है। इस समय नीतीश के साथ भी यही हो रहा है ।
 
यह पहला मौका नहीं है जब अलग मोर्चा बनाने की बात कही गई है। कई बार ऐसे प्रयास हो चुके हैं मगर यह मोर्चे बहुत दूर तक सफर तय नहीं कर पाए।1996 में नेताजी  ने अपने पैतरे से केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनाने की मंशा पर जहाँ पानी फेरा था वही बाद में  वह रक्षा मंत्री बन गए। 1999  में अटल बिहारी की सरकार गिरने के बाद  अपनी  दूरदर्शिता से कांग्रेस को गच्चा देकर उसे सरकार  बनाने से रोक दिया था । वही नेताजी ने  2004 में न्यूक्लिअर डील पर यू पीए 1 को संसद में विश्वासमत प्राप्त करने में जहाँ मदद की वहीँ  यू पीए 2 के तीन साल के जश्न में वह  शरीक भी  हुए  तो वहीँ मौका आने पर कांग्रेस के साथ रहकर उसी के खिलाफ तीखे तेवर दिखने से बाज नहीं आये । उसकी नीतियों को कोसते हैं और तीसरे मोर्चे का राग अपनी राष्ट्रीय  कार्यकारणी में  कई  बार अलापते रहे  जिसमे वह भाजपा -कांग्रेस दोनों को किनारे कर लोहियावादी, समाजवादी , वामपंथियों को साथ लेकर राजनीति की नई लकीर उसी तर्ज पर खींचते  दिखाई  दिए  जो उन्होंने 1996 में नरसिंह राव के मोहभंग के बाद खींची थी  । इसके बाद देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल को साधकर तीसरे मोर्चे का दाव  खेल गया लेकिन यह प्रयोग भी असफल रहा ।  यू पी ए के  दौर में प्रोग्रेसिव  अलाइंस  बनाने  की बातें भी खूब हुई लेकिन चुनाव से पहले यह प्रयोग  भी फुस्स हो गया ।
 
दो बरस पहले  ही लोकसभा चुनाव के समय नेताजी  ने तमाम छोटे दलों को जोड़ कर भाजपा और कांग्रेस के सामने तीसरे मोर्चा के रूप में सशक्त चुनौती पेश करने की पहल की थी पर वह नाकामयाब रहे। अब नीतीश कुमार हर हर मोदी का भय दिखाकर सभी पार्टियों को जोड़ने की बात कर रहे हैं।   दरअसल जब लोग भाजपा और कांग्रेस से ऊब जाते हैं तब वह तीसरे विकल्प की तरफ चले जाते हैं। लेकिन जब यह दल सत्ता में रहते हैं तो इनके राजनीतिक हित  टकराने लगते हैं।  देश में अब माहौल बदल  चुका है । विकास के नाम पर ही अब वोट मिल रहे हैं इस बात को हमें समझने पड़ेगा । आज का भारत नब्बे के दशक वाला नहीं रहा जब मंडल कमंडल ने देश की राजनीती को झटके में बदल दाल था ।  आज  हर क्षेत्रीय दल का अपना समीकरण है तो पार्टियां भी जातीय  राजनीती के दंगल से अपने को बाहर नहीं निकाल पा रही हैं । देश में क्षेत्रीय स्तर पर सभी विपक्षी दलों के आपस में टकराव हैं। जहां सपा होगी वहां बसपा के लिए साथ देना गवारा नहीं होगा। द्रमुक और अन्नाद्रमुक  एक साथ नहीं होना चाहेंगे। इस तरह अगर देखें तो नीतीश का सभी पार्टियों को साथ लाने का सपना तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक विपक्षी दल अपने राजनीतिक स्वार्थों से ऊपर न उठें।
 
 राजनीती  की  नई  बिसात  में  2019  से ठीक पहले नीतीश  कुछ ऐसी खिचड़ी पकाना चाह रहे हैं जिससे भाजपा  से इतर एक नयी मोर्चाबंदी केंद्र  में शुरू हो सके जिसकी कमान वह खुद अपने हाथो में लेकर  केन्द्र  में  आने का  दावा  पेश कर सकें ।  1996  में जब नरसिंहराव सरकार से लोगो का मोहभंग हो गया तो नेताजी ही वह शख्स  थे जिसने समाजवादियो , वामपंथियों, लोहियावादी विचारधारा के लोगो को एक साथ   लाकर उस दौर में शरद पवार के साथ मिलकर एक नई  बिसात केंद्र की राजनीती में चंद्रशेखर को  आगे लाकर बिछाई थी । उसी तर्ज पर  चलते हुए नीतीश  अपना राग गा रहे हैं  ,साथ में तीसरे मोर्चे के लिए भी हामी भरते दिख रहे हैं ।  दशकों  बाद वह  गैर भाजपाई  मोर्चे के लिए अपनी शतरंजी बिसात बिछाने में लग गए हैं ।  राजनीती के अखाड़े का यह चतुर  सुजान अब इस बात को बखूबी समझ रहा है अगर भाजपा  के खिलाफ अभी एक नहीं हुए तो समय हाथ से निकल जायेगा। वैसे भी नीतीश कुमार के पास  पी ऍम बनने का सुनहरा मौका शायद ही होगा जिसमे  1996 की  तीसरे मोर्चे  से  हुई गलतियों से सीख लेकर एक नई  दिशा में देश को ले जाने का साहस दिखा सकते है ।  

वैसे भी इस समय कांग्रेस ढलान  पर है तो भाजपा  पर भी  साढ़े  साती चल रही है । मोदी  के लिए आने वाले 3  बरस  चुनौतियों  भरे रहेंगे वहीँ नीतीश के सामने भी आने वाले बरसों  में उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती है । मोदी के सामने पूरा देश है तो नीतीश के सामने बिहार । मोदी गुजरात मॉडल के बूते जब 7  रेस कोर्स का सफर तय कर सकते हैं तो नीतीश भी अपने बिहार मॉडल और सुशासन बाबू के आसरे देश में नई  लकीर  खींचने का माद्दा तो रखते हैं  शायद यही वजह है  जद  यू  के कैडर मे जोश है और तीसरी  बार बिहार फतह करने के बाद बिहार मॉडल और नीतीश के आसरे  अब दिल्ली जीतने की तैयारी  है ।  तीसरे मोर्चे की सियासत को आगे बढाने  का यही बेहतर समय है । नीतीश  इसके मर्म को शायद समझ भी रहे हैं । ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि राजनीती  के अखाड़े में नीतीश  का यह दाव  कितना कारगर होता है और आने वाले दिनों में छत्रप किस तरह उनके इस कदम पर ताथैय्या  करते हैं । फिलहाल इसका इन्तजार सबको है ।