गुरुवार, 31 मई 2012

सूचना की राह .......

                            


२००५ में यूपीए सरकार ने देश को सूचना अधिकार के रूप में एक कारगर अस्त्र  प्रदान किया ... इसको लागू करने के पीछे दो मुख्य उददेश्य थे....  कामकाजी प्रक्रिया को जानने का हक़ देकर पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना .. साथ ही सरकारी कामकाज में टालमटोल वाली संस्कृति से उत्पन्न भ्रष्टाचार को कम करना.... सरकार की कोशिश थी कि इस अधिकार के आने के बाद लोगो को सूचनाये आसानी से मिल  जाएगी और यह अधिकार लोकतंत्र के सशक्तीकरण की दिशा मे एक मील का पत्थर साबित होगा.... लेकिन मौजूदा दौर में सूचनाए पाना भी इस देश में आसान नही रहा ....लोगो को समय पर सूचनाए न मिले पाने की घटनाये आये दिन समाचार पत्रों में छाई  हैं  जो यह साबित करने के लिए काफी है  क्या यह देश कानून से  चल  सकता है ? 

स्वीडन ऐसा प्रथम देश था जिसने १७६६ में अपने देश के नागरिको को सबसे पहले संवैधानिक  रूप से यह अधिकार  प्रदान किया ....भारत में प्रथम प्रेस आयोग के गठन के समय से ही सूचना अधिकार की विकास यात्रा १९५२ में शुरू हो गई.... इसके बाद इस अधिकार को लेकर हरी झंडी मिलने से पहले कई बैठकों का लम्बा दौर चला जिसका नतीजा सिफर ही रहा .. सूचना अधिकार को आम जन तक पहुचाने की पहल सार्थक रूप  से  वी पी सिंह के जमाने में शुरू हुई लेकिन इस दौरान बनाये गए प्रावधान इतने लचर थे कि उस दौर में वी पी सिंह को भी इसे ख़ारिज करने पर मजबूर होना पड़ा था... ९० के दशक में संयुक्त मोर्चा की गुजराल सरकार  और फिर बाद मे एनडीए की सरकारों के समय इसमें सकारात्मक पहल नही हो पाई..... यूपीए सरकार के पहले  साल के कार्यकाल में अरुणा राय, अरविन्द केजरीवाल सरीखे सामाजिक कार्यकर्ताओ की मेहनत रंग लाई जिसके चलते सरकार को सूचना का अधिकार लागू करने पर मजबूर होना पड़ा था ... यह अलग बात है मौजूदा सरकार की  अन्ना के जनलोकपाल को लेकर वैसी नीयत नही है जैसी मनरेगा और इस सूचना के  अधिकार को लेकर थी......           
  

सूचना के अधिकार के तहत देश के किसी भी नागरिक को किसी भी सरकारी कार्यालय से सूचना मांगने का हक़ है....सम्बंधित विभाग को ३० दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध करवानी होगी अन्यथा  उस पर प्रति दिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जाएगा.... इस अधिकार की धारा में यह प्रावधान स्पष्ट रूप से है कि हर राज्य में एक मुख्य सूचना आयुक्त का कार्यालय होगा...आवश्यक  सूचना  जिले में ना मिल पाने पर मुख्यसूचना आयुक्त कार्यालय में शिकायत की जा सकेगी.... यह अधिकार लोगो को अधिकार सम्पन्न तो बनाता जरुर है लेकिन मौजूदा कानून में कई सूचनाए गोपनीयता के दायरे में रखी गई है ... ऐसी सूचना जिसका देश की संप्रभुता , अखंडता , सुरक्षा पर प्रभाव पड़ता हो उसे इस अधिकार में शामिल नही किया गया है लेकिन  मौजूदा समय में हमारे देश के सरकारी विभागों में  सूचना मांगे जाने के एवज  में  टरकाने वाली कार्यसंस्कृति कम नही हुई है जिसके चलते कई सूचनाओ को देने में कर्मचारी  आनाकानी करते है ........अगर यह कानून सही ढंग से अमल में लाया जाए तो आम  आदमी  के पास इससे सशक्त अधिकार शायद ही कोई होगा.... लेकिन हर विभाग में लालफीताशाही का साम्राज्य   भी कायम था और आज अभी भी  है....      

                     इस अधिकार के लागू होने के कई बरस बाद भी देश की नौकरशाही इस अधिकार का गला घोटने  में तुली हुई है....निश्चित समय में सूचना न दिए जाने पर इस अधिकार के तहत अधिकारियो के विरुद्ध दंड देने का प्रावधान है लेकिन आज भी देश के भीतर  हालत यह है कि अधिकारियो और कर्मचारियों पर कोई कार्यवाही नही हुई है.... कई राज्यों में जहाँ सूचना अधिकारियो का टोटा बना हुआ है वहीँ कई जगह टायर्ड नौकरशाही के आसरे सूचना अधिकार का बाजा बजाया जा रहा है.... जिन अधिकारियो ने अपनी पूरी जिन्दगी रिश्वत लेकर गुजारी है क्या देश का आम आदमी उनसे उम्मीद रख सकता है कि वह लोगो को समय पर सूचनाए दे सकते है.... 

शायद अब समय आ गया है जब केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करने की जरुरत है कि वह लोगो को सही सूचनाए मुहैया करवाने की दिशा में ध्यान दें.... अभी भी कई लोगो को सूचनाए देश में जहाँ आसानी से नही मिल रही हैं वही केंद्रीय सूचना आयोग में  आवेदनकर्ताओ ने अधिकारियो और कर्मचारियों के विरुद्ध शिकायतों का अम्बार लगाया हुआ है जिस पर सुनवाई तो दूर कारवाही तक नही हो पा रही है........आज भी देश के भीतर बड़ी आबादी ऐसी है जो गावो का प्रतिनिधित्व करती है ... उसके पास इस अधिकार को लेकर ज्यादा  जानकारी नही है.. ब्लाक स्तर  और ग्राम स्तर पर एक आम नागरिक की फरियाद हमारे सरकारी अधिकारी नही सुनते जिसके चलते वह निराशा में जीता है और हमारे अधिकारी शान और शौकत वाली जिन्दगी का तमगा हासिल कर लेते है.... अभी भी  ग्रामीण स्तर  पर इस अधिकार के बारे में लोगो को जागरूक करने की जरुरत है तभी आने वाले वर्षो में यह अधिकार आम जनता का अधिकार बन सकेगा........
   
   संसद में इस अधिकार को पारित करवाकर सरकार ने यह सन्देश देने की कोशिश जरुर की है कि अब आम आदमी सरकारी तंत्र के आगे नतमस्तक नही है बल्कि जरुरत पड़ने पर इस अमोघ  अस्त्र को शासन  से जवाबदारी के लिए इस्तेमाल कर सकता है....इसकी बानगी सूचना अधिकार के लागू  होने के कुछ महीनों बाद ही दिखाई देने लगी जब देश के कई लोगो ने कई दुरूह सुचनाये विभागों से हासिल की..... मीडिया ने भी इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल अपनी खबरों को बनाने में किया .... लेकिन  असल तस्वीर भी ऐसी ही नही है.... इन ७ बरसों में अमित जेठवा जैसे कई सक्रिय आरटीआई एक्टिविस्टो की हत्या भी इस अधिकार के तहत सूचना मांगे जाने के चलते इस देश में हुई हैं जो यह बताने के लिए काफी है इस दौर में आम आदमी के सरोकार हाशिये  पर चले गए है और उसको सूचना मांगने के एवज में गोली खाने पर भी मजबूर होना पद सकता है... यह इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि  इस दौर में सूचना अधिकार होने के बाद भी सूचना मांगने की राह  इस दौर में कितना मुश्किल हो चली  है..... 



1 टिप्पणी:

MITHLESH KUMAR VERMA ने कहा…

जनहित मेँ जारी माननीय मुख्यमंत्री महोदय मध्यप्रदेश शासन भोपाल महोदय जी से विन्रम निवेदन है कि जनसंसाधन विकास एवं जीव कल्याण समिति नरसिँहपुर म.प्र. द्रारा संचालित 4/16/01/10298/08 स्वपोषित स्व-रोजगार राष्ट्रीय गरीबी उन्मूलन परियोजना मेँ लोगो से 251 की राशि जमा कराई जाती है तथा लोगो को 10,000 प्रति महीने देने का वादा करती है यह संस्था गरीबी,बेरोजगारी,भुखमरी,अशिक्षा,नशामुक्ति,दहेज प्रथा,कन्या भ्रूण हत्या,जैसी सामाजिक बुराईयो को खत्म करना इसका उद्देश्य है अगर यह NGO है तो शासन क्योँ इस संस्था की मदद नही कर रही।सही है या फर्जी शासन इसकी जाँच कराये जिससे कि गरीब,बेरोजगार व्यक्तियोँ को इससे बचाया जा सके। मिथलेश वर्मा 9893775163 www.jsvjks.com