शनिवार, 25 मई 2013

अमित शाह के आसरे यूपी में हिंदुत्व की वैतरणी पार करेगी भाजपा

दिल्ली का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। " यह कथन भारतीय राजनीती के सम्बन्ध में परोक्ष रूप से सही मालूम पड़ता है |  एक दौर वह था जब आजाद भारत के लगभग सभी राज्यों में मुख्यमंत्रियों का ताज ब्राहमण जाति के उम्मीदवार को मिलता था । ब्राहमण जाति के सत्ता के सर्वोच्च उतुंग शिखर पर चढ़ने के कारण सचिवालय से लेकर मंत्रीमंडल तक में उस दौर में ब्राह्मण बिरादरी का सेंसेक्स अपने उच्तम स्तर तक बना रहता था लेकिन धीरे धीरे समय बदला और यह ब्राह्मण समाज सत्ता से दूर जाता गया। आज बसपा सरीखी पार्टी की "सोशल इंजीनियरिंग " की बिसात पर यही ब्राह्मण समाज दलितों के साथ हाथ मिलाकर निचले स्तर पर बैठकर राजनीती की सवारी करता नजर आ रहा है । ऊपर  की   जा रही ये बातें आपको थोडी अटपटी लग रहीं हो परन्तु हम इस फंडे को बेहतर ढंग से समझ सकते है । यदि हम बात इस प्रसंग में भारत के 80 सांसदों वाले सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के सम्बन्ध में करे तो बात समझ में आ जाती है। आज उत्तर प्रदेश में यही हो रहा है। हालाँकि कुछ समय पहले तक बहुजन समाज के हितों की बात करने वाली बसपा ब्राह्मणों को "बेक फ़ुट" पर धकेल दिया करती थी उसके संस्थापक नेता कांशी राम कहा करते थे "तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार" । इन परिस्थितियों को समझने से पहले कांशी राम द्वारा  उस समय कही गई बात को  हमें समझना पड़ेगा ।   उस दौर में उन्होंने कहा था "मै ब्राह्मणों से कह रहा हूँ जात तोड़ो और समाज जोडो लेकिन यह तबका मेरी बात नही समझ पा रहा है एक समय आयेगा जब मै इन्ही के मुह से कहलाऊंगा जात और बंधन छोड़ो और समाज को जोड़ो " आज उत्तर प्रदेश मै यही हो रहां है ।  बड़े  पैमाने पर भाजपा और कांग्रेस का ब्राह्मण वोट आपस में छिटक गया है और यही वोट बसपा और सपा में बंट   गया है ।

किसी समय "चल गुंडन की छाती पर मुहर लगेगी हाथी पर" जैसे नारों को देने वाली बहिन जी ने  बीते सालो में नए नारे " हाथी नही गणेश है ब्रह्मा विष्णु महेश है" के आसरे अगर उत्तर प्रदेश में अपनी सियासी बिसात को बिछाने में सफलता पायी है तो इसका कारण देश के भीतर मौजूद विभिन्न समुदायों से जुड़े करोडो लोग है जिनके जरिये विभिन्न राजनीतिक दलों ने धर्म के नाम पर वोटरों को बांटकर अपनी सत्ता को मजबूत किया ।  अब आज के विकास वाले दौर में विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच मजहब और जात सरीखी सियासत का ग्राफ नीचे चला गया जिसके मर्म को अच्छे से पकड़कर बसपा सरीखी पार्टियों ने सोशल इंजीनियरिंग के जरिये ध्वस्त कर डाला । वह भी एक दौर था जब अपने को शिखर पर चढ़ा हुआ देखने पर ब्राह्मणों को यह नही सुहाता था कि कोई दलित उसके आस पास फटके ......

लेकिन आज हालत एकदम उलट हैं ।  उत्तर प्रदेश का ब्राहमण समाज उस नेत्री की छाया मे काम करने में असहज महसूस नहीं करता   जिसने फ़ोर्ब्स पत्रिका की महिलाओ की सूची मे अपना स्थान हाल के वर्षो में ना केवल बनाया है बल्कि माया ने त्याग की मूरत कही जाने वाली कांग्रेस की "सोनिया " को भी पीछे छोड़ दिया है तो यह राजनीती के नए बदलते  मिजाज  को बतलाता है । ."एक समय आयेगा जब पत्थर भी गाना गायेगा मेरे बाग़ का मुरझाया फूल फिर से खिल खिला जाएगा" .....किसी कवि द्वारा कही गयी इस कविता मे गहरा भाव छिपा है समय बदलने के साथ सभी दल अपने को ढाल लेते है सो बसपा के साथ भी  बीते दौर में  यही हुआ है उसमे नया सोशल बदलाव आ गया है.... हाल के समय में उसकी नीतिया बदल गयी है सभी को साथ लेने का नया चलन शुरू हुआ जिसे सोशल इंजीनियरिंग नाम दिया गया है इस फोर्मुले को लगाने मे सतीश चंद्र मिश्रा का बड़ा योगदान रहा जिनको यह अच्छी से पता था किस प्रकार सभी पार्टियों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है ......

आज यह हाथी सभी के लिए बड़ा सर दर्द बन गया है ...इससे भी बड़ा संकट यह है कि  उत्तर प्रदेश का ब्राहमण समाज बहिन माया की कप्तानी मे इंडियन पोल लीग का हर गेम खेलने को तैयार दिखता है । वही सत्तारुढ समाजवादी पार्टी भी अब समझ  रही है अगर  आने वाले दिनों में केंद्र में बड़ी ताकत के रूप में उसको उभरना है तो रास्ता उत्तर प्रदेश से ही जाएगा जहाँ पर वह ब्राह्मण और हिन्दुओ के प्रति उदार रवैया अपनाकर  ही अपनी बिसात  मजबूत कर सकती है ।    यह सवाल सबसे अधिक उत्तर प्रदेश में  जिसको कचोट रहा है वह है  उत्तर प्रदेश  की भाजपा ।  यू पी  मे पार्टी की सेहत सही नही चल रही है.....  इस बीमारी का तोड़ निकालने मे किसी डॉक्टर को सफलता नही मिल पा रही है..... डॉक्टर के कई दल सेहत को चेक करने वहां जा चुके है लेकिन फिर भी तबियत में सुधार नही आ पा रहा है ... हर बार .डॉक्टरो के दल को भी बेरंग वापस लौटना पड़ रहा है।  बीजेपी की प्रदेश  मे डगमग हालत के चलते उसका हाई कमान भी चिंतित है ।  चिंता लाजमी भी है क्युकि चार  राज्यों के विधान सभा के चुनाव होने जा रहे है ऐसे में बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपने गृह प्रदेश को लेकर  अभी से हाथ पैर मारने में लग गए है।
हाल ही मे   प्रदेश में   चुनाव प्रचार की कमान  पूरी तरह  नरेन्द्र मोदी के दाहिने हाथ अमित शाह  को   सौपे जाने को विश्लेषक  एक नई  कड़ी का हिस्सा मान रहे है । . सूत्र बताते है कि संघ माया द्वारा जीते गए पिछले विधान सभा के चुनावो से कुछ सबक लेना चाह रहा है लेकिन राजनाथ  की इस साल बिछाई  गई बिसात में संघ की एक भी नहीं चल रही ।   इसी के चलते  इस बार  चुनाव में उत्तर प्रदेश में कद्दावर नेताओ को एक एक करके चुनावो से किनारे लगाया जा रहा है ।  राजनाथ  की बिसात  " जिताऊ " उम्मीदवारों के रास्ते जहाँ गुजरती  है वही  संघ का रास्ता उसके स्वयंसेवको  और पार्टी का झंडा लम्बे समय से उठाये नेताओ के आसरे गुजरता है  ।   दिल्ली मे पार्टी के एक नेता की माने तो इस बार अपने हाई टेक फोर्मुले के सहारे राजनाथ  माया के साथ जा मिले ब्राहमण वोट बैंक को वापस अपनी तरफ लेने की कोशिशे ना केवल  तेज कर रहे हैं बल्कि कांग्रेस के वोट बैंक पर सपा के जरिये सेंध   लगा रहे हैं । अगर भाजपा का इस बार का हिंदुत्व कार्ड अमित शाह के जरिये चल गया तो  जा रहा है  भाजपा और सपा को लाभ मिलना तय है ।  पार्टी के नेताओ का मानना है कि  ब्राहमण   वोट बैंक शुरू से उसके  साथ रहा है लेकिन बीते कुछ  चुनावो मे यह माया मैडम के साथ जा मिला तो वहीँ इस बार के विधान सभा चुनावो में यह सपा के पास गया ।  इसको फिर से अपनी  ओर लाकर ही  उत्तर  प्रदेश  में पार्टी की ख़राब हालत सुधर सकती है शायद इसी के मद्देनजर भाजपा के नाथ  की बिसात में जहाँ वह एक छोर  पर  खुद  राजनाथ खड़े   हैं  तो दूसरी तरफ नरेन्द्र मोदी के  कार्ड को खेलकर उसने ब्राहमण और ठाकुर  वोट के अलावे अन्य पिछड़े वोट  को अपने  पाले में लाने का नया फ़ॉर्मूला बिछाया है ।

यह बताने कि जरुरत किसी को नहीं कि राजनाथ और कलराज के समर्थक उत्तर प्रदेश में शुरू  से एक दूसरे के आमने सामने खड़े रहते थे । . पहली  बार अपनी बिसात में  राजनाथ ने नई व्यूह रचना इस प्रकार की है जिसके जरिये हिन्दू वोट बैंक को पार्टी अपने पाले में ला सके ।. यही नहीं इस बार राजनाथ  ने  जहाँ  एक ओर  प्रदेश  अध्यक्ष लक्ष्मी कान्त वाजपेयी  खेमे को भी चुनावी चौसर बिछाने में साथ लिया है तो वहीँ  कल्याण सिंह ,  उमा भारती को "स्टार प्रचारक " बनाकर और पिछड़ी जातियों के एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में लाने की  गोल बंदी कर डाली है  ।  इतना जरुर है इन सबके  जरिये पहली बार राजनाथ  ने संघ की हिंदुत्व प्रयोगशाला के सबसे बड़े झंडाबरदार  योगी आदित्यनाथ और विनय कटियार सरीखे नेता को अगर टिकट चयन से दूर रखा है तो समझा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के चुनावो में किस तरह  संघ ने अपने लाडले राजनाथ पर पूरा भरोसा जताया है ।  यही नहीं इस बार  राजनाथ  ने टिकट  जीतने वाले उम्मीदवारो  को देने के  अपने इरादे जता दिए है जिससे लम्बे समय से पार्टी का झंडा उठाये हुए नेताओ की दाल  गलनी मुश्किल दिख  रही है क्युकि वही नेता टिकट   पाने में कामयाब होगा जो अमित शाह और नरेन्द्र मोदी की चुनावी बिसात में फिट बैठेगा । वही अमित शाह को आगे कर मोदी ने उत्तर प्रदेश में अपना बड़ा दाव चलकर एक बार फिर अपने कदम दिल्ली के सिंहासन की तरफ बड़ा दिए हैं । मोदी इस बात को बखूबी समझ रहे हैं अगर भाजपा ने आगामी लोक सभा चुनाव में दिल्ली में सरकार बनानी है तो  लिटमस टेस्ट उत्तर प्रदेश में ही होगा । यहाँ अच्छा  करने  पर ही पार्टी केंद्र में सरकार  बनाने का दावा ठोक  सकती है ।       .  
 कुछ महीने पहले से ही पार्टी संसदीय बोर्ड में  हिंदुत्व के मुद्दे पर चर्चा की अटकलें सुनाई दे रही थी  ।  उत्तर प्रदेश भाजपा की  हिंदुत्व प्रयोगशाला का पहला पड़ाव रहा है जहाँ राम लहर की  धुन बजाकर  भाजपा  ने कभी राज्य में अपनी सरकार बनाई थी ।  पार्टी  के नेता मानते है हिंदुत्व की आधी मे वह केन्द्र मे सत्ता मे आयी लेकिन अपने कार्यकाल मे उसने कई मुद्दों को ठंडे बस्ते मे डाल दिया जिस कारण केन्द्र में यू पी ऐ की सरकार आ गयी और बीजेपी अवसान की ओर चली गयी ......इस बार पार्टी फिर हिन्दुत्व पर वापस लौटने  का मन बना रही है हालाँकि राजनाथ ने  अमित शाह को उत्तर प्रदेश में उतारे जाने  पर सीधे कुछ भी कहने से परहेज किया है लेकिन पार्टी की चाल  ढाल देखकर ऐसा लगता है कि वह अपनी हिंदुत्व की आत्मा को अलग कर नही चल सकती और मोदी उसकी इस बिसात में उत्तर प्रदेश में तारणहार बन सकते हैं । अयोध्या आन्दोलन के दौर में उत्तर प्रदेश में  की  नैय्या  इसी हिन्दू कार्ड ने पार लगाई और अब भाजपा मोदी के जरिये राजनीति के मैदान पर ध्रुवीकरण वाला वही फार्मूला चल रही है  जिसने नब्बे के दशक में भाजपा को बड़ी पार्टी के रूप में ना केवल उभारा  बल्कि हिंदुत्व की छाँव तले  उसे राष्ट्रवाद से जोड़ा ।  आज के दौर में भाजपा के पास मोदी के अलावा कोई  चेहरा  नहीं है जो बड़े पैमाने पर  वोटो का ध्रुवीकरण कर पार्टी की सीटें बड़ा सके  और इसी को ब्रांड बनाकर भाजपा विकास के जरिये मोदिनोमिक्स की छाँव तले उत्तर प्रदेश के अखाड़े में कदमताल  कर रही है ।  बड़ा सवाल यह है कि वह सबको साथ लेने के किस फोर्मुले पर चलेगी ? इतिहास गवाह है केंद्र में सत्ता  हथियाने के बाद पार्टी मे पिछडे नेताओ को उपेक्षित बीते कुछ समय  से रखा जाता रहा है।

 जब पार्टी मे यह तय हो चुका है वह आगामी चुनाव मे अपने ओल्ड एजेंडे पर चल रही है तो ऐसे मे पार्टी के लिए उत्तर प्रदेश  सबसे बड़ी रन भूमि बन गया है । यही वह प्रदेश है जहाँ की सांसद  संख्या दिल्ली का ताज तय करती है। तभी तो माया जी यहाँ से अपने सर्वाधिक सांसद जितवाकर दिल्ली मे प्रधानमंत्री बन्ने के सपने अभी से देख रही है जिसके बारे में उन्होंने अपनी किताब "बहनजी " मे भी बताया है तो वहीँ पहली बार नेताजी उत्तर प्रदेश को साधकर केंद्र का रस्स्ता अपने लिए  कर रहे हैं । वैसे भी पूत के पाव पालने मे ही दिखाए देते है । बीजेपी भी इसको अच्छी तरह से जानती है, तभी वह आजकल बसपा की सोशल इंजीनियरिंग का तोड़  निकालने मे जुटी है।   साथ ही वह समाजवादी पार्टी  द्वारा  कराए जा रहे ब्राह्मण सम्मेलनों से परेशानी  में  है ।


बीजेपी के अन्दर के सूत्र बताते है कि ब्राह्मणों को लुभाने की मंशा  से पार्टी ने अपने  ट्रंप  कार्ड फैक दिए है जो पार्टी का जहाज उत्तर प्रदेश  में  बचाने की  पूरी कोशिश  करेंगे। . पहला कार्ड राजनाथ  सिंह  का है जो इसी गृह प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं ।  वह ख़ुद  ठाकुर  है ।  दूसरा कार्ड राज्य मे मौजूद पार्टी अध्यक्ष लक्ष्मी कान्त वाजपेयी  का है  का है जो खुद  ब्राह्मण है।  तीसरा  कार्ड  जो  फेंका  गया है वह है  वरुण गाँधी जिनको पार्टी महासचिव बनाकर इस बार अपने संसदीय बोर्ड में ले आई है ।   उत्तर प्रदेश में अपने भड़काऊ भाषणों के जरिये वह दूसरे  हिन्दू ह्रदय सम्राट  का झंडा लम्बे समय  से  उठाये हुए   है । लखनऊ  में   अटल बिहारी की खडाऊं पहनकर  लाल जी टंडन लखनऊ से सांसद तो है ही साथ ही यू पी की सियासत को बखूबी समझते है  ।  अब इन्ही के संसदीय इलाके से भाजपा उत्तर प्रदेश में अपना मिशन मोदी अमित शाह के आसरे चलने जा रही है जिनकी गिनती कुशल संगठनकर्ता के रूप में होती   आई है और अपने चुनावी प्रबंधन   को  उन्होंने  गुजरात में साबित भी  किया है ।  मोदी उत्तर प्रदेश के अखाड़े में फैंके जा रहे ऐसे इक्के हैं  जिसके जरिये पार्टी पिछडो के एक बड़े वोट बैंक को अपने पाले में लाने की जुगत में है साथ ही मोदी के नाम पर उत्तर प्रदेश चुनावो में भाजपा के चुनावी प्रबंधन में कॉर्पोरेट घरानों के फाईनेंसर  बनेंगे क्युकि  वह संघ  के साथ ही कॉर्पोरेट के लाडले हैं   ।  वैसे भी चुनाव  पैसो  के बल पर इस  देश में  लड़े   जा रहे है और यही कॉर्पोरेट घराने उत्तर प्रदेश में मोदी की बिसात बिछायेंगे ।    पार्टी का मानना है  राज्य मे ब्राहमणों   की बड़ी संख्या  १६ वी  लोक सभा चुनाव मे उसका गणित सुधार सकती है साथ मे हिंदुत्व का मुखोटा फिर से पहनने  से उसका खोया जनाधार  वापस आ सकता है । वैसे भी ९० के दशक  मे राम मन्दिर की लहर ने हिंदू वोट को उसकी ओर खीचा था जिसके बूते सेण्टर मे न केवल उसकी  सीटें  बढ़ी  बल्कि केंद्र  मे वाजपेयी की सरकार भी सही से चली भी  थी । .

राजनाथ  पार्टी की केंद्र में सत्ता  में वापसी   के लिए उत्तर प्रदेश  पर टकटकी लगाये हुए है..... वह इस बात को जानते है कि  पार्टी की  उत्तर प्रदेश  में  इस बार पतली हालत होने पर उनका सपना पूरा नही हो पायेगा।  वैसे भी उत्तर प्रदेश   फतह के बिना दिल्ली मे सरकार की कल्पना करना मुंगेरी  लाल के हसीन  सपने देखने जैसा है अतः पार्टी पहले इस यू पी  की चुनोती से पार पाना चाहती है । लोक सभा के लिए बीजेपी  अभी से कमर कस चुकी है । पार्टी द्वारा पिछले  चुनाव मे अपने एजेंडे से भटकने के कारण  संघ भी इस  बार अपने को यू पी के चुनावो से दूर कर रहा है। . संघ मानता है बसपा की हाथी की बदती धमक कमल के लिए बड़ा खतरा बनती जा रही है.... दलित और मुस्लिम वोट शुरू  से कांग्रेस के साथ रहा है लेकिन पिछले कुछ  चुनाव मे यह बसपा और सपा  के साथ जा मिला..... प्रदेश के ब्राहमण मतदाताओ  के  मुलायम   के  साथ इस विधान सभा चुनाव में  जाने से भाजपा  की हालत  सबसे ख़राब हो गयी है अतः राजनाथ  का रास्ता  ब्राहमणों के वोट बैंक  को बीजेपी के साथ लेने की कोशिशो  मे जुटा है। .

 बीजेपी बीते  चुनावो  से इस बार सबक ले रही है। . समय समय पर उत्तर प्रदेश  को लेकर मीटिंग हो रही है।    चार राज्यों के विधान सभा  चुनाव से पहले  उत्तर प्रदेश को लेकर गंभीर मंथन हो रहा है ।   यू पी की पीठ पर जमकर नेट अभ्यास किया जा रहा है । बीजेपी के अध्यक्ष  राजनाथ    के पास विरोधियो को राजनीती की पिच  पर मौत देने का तोड़  है।  चेस के मैच पर अगर गोटी बिछी    हो तो राजनाथ  विरोधियो की हर चाल को पहले ही जान जाते है । .अपनी छमताओ  को वह बीते कुछ वर्षो मे  बिहार, हिमांचल, उत्तराखंड , गुजरात मे साबित कर चुके है । अब बारी उनके खुद के प्रदेश उत्तर प्रदेश की है जहाँ के वह  मुख्य मंत्री भी रह चुके है ।  यह  बड़ा प्रदेश है ।  हालात  अन्य प्रदेश से अलग है..... यहाँ पर खेलने के लिए बड़ा दिल रखना पड़ता है।  मैच टेस्ट क्रिकेट की तरह है जहाँ नेट पर जमकर पसीना बहाना पड़ता है साथ मे लंबे समय तक मैदान में टिकने  की कला भी  होनी चाहिए.... गेदबाज के एक्शन से पहले बोल परखने की कला होनी चाहिए.... पार्टी की  उत्तर प्रदेश  में हालत सही करने का जिम्मा अब राजनाथ   और मोदी   के कंधो  मे है । उनको अच्छा तभी कहा जा सकता है जब वह पार्टी को  प्रदेश  मे अच्छी सीट दिलाने में मदद करें.....इस बार अमित शाह को सह प्रभारी के रूप में   रामेश्वर चौरसिया का भी   जा रहा है जो बिहार से ताल्लुक रखते हैं और जो अमित शाह के साथ युवा मोर्चे में भी संगठन का काम देख चुके हैं ।


 २००२ के  चुनाव में बीजेपी को विधान सभा मे ४०२ सीट् मे ५१ सीट ही मिल पाई..... १४६ मे उसके जमानत जब्त हो गयी इसके बाद वहां के चुनाव मे पार्टी चार  नम्बर पर आ गयी । इसके  बाद तो पार्टी का  २००७   मे ऐसा जनाजा  निकला  पार्टी की माली  हालत  खस्ता  हो गयी। . ऐसे मे अपने राजनाथ ,अमित शाह  के सामने  उत्तर प्रदेश की  पुरानी  खोयी हुई जमीन को बचाने की बड़ी चुनौती  है.......  देखना होगा   गडकरी कि इस नयी बिसात में वह क्या करिश्माँ कर पाते   हैं ।    वह भी ऐसे समय में जब  राज्य में पार्टी के पुराने  संजय जोशी, विनय कटियार, योगी आदित्यनाथ   सरीखे चेहरे हाशिये  पर है। लोक सभा चुनावो की बात  तो उत्तर प्रदेश मे भाजपा का ग्राफ  लगातार नीचे जा रहा है ।   छियानब्बे   से पार्टी यहाँ पार्टी दस सीट  से  ज्यादा नहीं जीत पायी है ।



 राजनाथ  की इस बार  की  बिसात में अगर अमित शाह , रामेश्वर चौरसिया   की चौसर बिछी है तो वही  असंतुष्ट नेताओ से  पार पाना भी भाजपा की बड़ी मुश्किल बन सकता  है क्युकि अगर इस चुनाव में योगी, कटियार , उमा  भारती , कलराज ,संजय जोशी सरीखे कई कद्दावर नेताओ की  एक भी नहीं चलेगी  और उनके जैसे कई कार्यकर्ता जो पार्टी का झंडा  वर्षो  से उठाये है वह भी अगर इस दौर में मोदी की बिसात पर प्यादा भर बन हाशिये  में चले गए हो तो ऐसे में कीचड में कमल खिलने में  परेशानी हो सकती है ।  वैसे भी पिछले दिनों बाबू सिंह कुशवाहा  के मुद्दे पर पार्टी की खासी किरकिरी हो चुकी है तो वहीँ लगातार एक के बाद एक चुनाव हारने और अपने सुरक्षित गड़ो  को ना  पाने की कसक कार्यकर्ताओ  में आज भी हैं जो इस दौर में  मान रहे हैं "पार्टी विथ दिफरेन्स " का  भी चलन भी कांग्रेस की  बी टीम जैसा हो चला है ।   ऐसे में चुनावी डगर  मुश्किल दिख रही है।  फिर भी संघ  की गोद से  निकले राजनाथ  सिंह अगर कलराज , योगी ,कटियार  लाल जी टंडन , उमा भारती, कल्याण सिंह सरीखे चेहरों के अलावे बीते पांच अध्यक्षों की चौकड़ी को दरकिनार कर अमित शाह और नमो  के  जरिये  पूरे उत्तर प्रदेश को  साधने की कोशिश कर रहे है तो उसे उत्तर प्रदेश में भाजपा के डूबते जहाज को बचाने की अंतिम कोशिशो के तौर पर  ही देखा जाना चाहिए......

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