सोमवार, 9 फ़रवरी 2015

निकाय चुनावो में भी चला 'शिवराज' का मैजिक





 भोपाल, इंदौर, जबलपुर और छिंदवाड़ा की नगर निगमों में भी भारतीय जनता पार्टी की फतह के बाद मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री  शिवराज सिंह चौहान का कद राष्ट्रीय  राजनीती में एक बार फिर बढ़ गया है   ।  मध्य प्रदेश के इन नगर निगमों को जीतने के बाद शिवराज ने अपने को राजनीती के चाणक्य के रूप में  स्थापित किया है बल्कि  कब्जे के बाद शहरों से कांग्रेस का सफाया जिस तरीके से हुआ है उसने पहली बार इस बात को साबितकिया है प्रदेश में  कांग्रेस को सत्ता में वापसी के लिए लम्बा इन्तजार करना पड़  सकता है । । विधानसभा और फिर लोकसभा चुनावों  के बाद नगर निगम में  मिली कांग्रेस की  हार में बड़े सबक छिपे हुए हैं । इसने एकबात को साबित किया है अब अगर आपको चुनाव जीतना है तो खूब पसीना बहाना होगा और  जनता की नब्ज को पकड़ना होगा जिसे शिवराज ने मध्य प्रदेश में बखूबी पकड़ा है । वह इन चुनावो में ना केवल जीत के स्टारप्रचारक थे बल्कि भाजपा अध्यक्ष नंद  कुमार चौहान ने जिस तरीके से शिवराज के साथ बिसात बिछाई वह न केवल उनके बेहतर तालमेल की मिसाल थी बल्कि सत्ता और संगठन का बेहतर तालमेल भी नजर आया । 

कांग्रेस ने विधानसभा-लोकसभा चुनावों के बाद नगरीय निकाय चुनावों में अपने लगातार कमजोर प्रदर्शन को दोहराया है। नगर निगम चुनाव नतीजों से साफ हो गया है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं का भरोसा डगमगा गया है।चुनाव में उनके शीर्ष नेताओं के बीच  भारी गुटबाजी देखने को मिली । गुटबाजी की बीमारी सुरेश पचौरी के दौर से ही कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ रही है । अरुण यादव के दौर के आने के बाद भी परिस्थितियां कमोवेश वैसीही हैं जैसी कमोवेश बीते दौर में हुआ करती थी । कांग्रेस के पास मध्य प्रदेश में दिग्गी राजा , ज्योतिरादित्य , अरुण यादव , अजय सिंह, कमलनाथ, सुरेश पचौरी,  कांति  लाल भूरिया  के चेले चपौटों की अभी भी भारी फ़ौजही कागजो   है   ।  उसके इन  दिग्गज नेताओ  के इलाको में ही  कांग्रेस के हाथ सत्ता फिसल गयी।  मिसाल के तौर पर कांग्रेस के कद्दावर नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री  कमलनाथ अपने गृह क्षेत्र की सीट भी नहीं जीता  सके।छिंदवाड़ा नगर निगम में भाजपा ने  30 सीटों पर जीत हासिल की  जबकि छिंदवाड़ा ऐसी जगह है जहाँ कमलनाथ का जबरदस्त प्रभाव न केवल है बल्कि उनके अलावे वहां पर किसी का पत्ता तक नहीं खड़कता लेकिन इननिकाय चुनावो का सन्देश साफ़ है कमलनाथ को अपना गढ  अगर आने वाले वर्षो में मजबूत रखना है तो अभी से उन्हें खासी मेहनत  की जरुरत पड़ेगी नहीं तो शिवराज की आंधी में पूरी कांग्रेस ढह जायेगी । कांग्रेसअध्यक्ष अरुण यादव   के लिए निकाय चुनावो की हार निश्चित ही  खतरे की घंटी  है ।  इन चुनावो के बाद उनका सिंहासन खतरे में पड़ता नजर आ रहा है ।  कांग्रेस के साथ एक बड़ी बीमारी गुटबाजी की लग गयी है जो हरचुनाव में उसका खेल ख़राब कर देती है  ।  इस बार भी ऐसा ही हुआ है । वहीं भाजपा की जीत में  बूथ मैनेजमेंट  और कार्यकर्ताओ  के समर्पण और शिवराज सिंह चौहान से लेकर संगठन की मजबूत बिसात को हर छोटे बड़ेचुनाव  नजरअंदाज नहीं किया  सकता । भाजपा की जीत  के असल  नायक शिवराज ही रहे ।  मुख्यमंत्री ने ना केवल  कई किलोमीटर के रोड शो किए बल्कि भोपाल  में आलोक शर्मा के लिए अपना तन मन समर्पित किया। कांग्रेस टिकटों के चयन में ही नहीं पिछड़ी बल्कि कई बागी खिलाड़ियों ने चुनाव में उसका खेल  ही ख़राब कर दिया ।

नमो के कांग्रेस मुक्त भारत की परिकल्पना अब मध्य प्रदेश  होती दिख रही है । शिवराज ने मध्य प्रदेश में जिस तरीके से सबको साथ लेकर अपना मध्य प्रदेश बनाने की ठानी है वह उनकी दूरगामी सोच का परिचायक है । मुख्यमंत्री के रूप में जिस तरीके से शिवराज ने मध्य प्रदेश में काम किया है और उसे बीमारू राज्य से बाहर निकाला है उससे अब भाजपा का शिवराज मॉडल आने वाले दिनों में भाजपा शासित  राज्यों के लिए रोल मॉडलबन सकता है ।  निकाय चुनाव के  हालिया परिणाम भाजपा के पक्ष में आने से निश्चित ही शिवराज मजबूत होंगे । हाल के दिनों में कैलाश विजयवर्गीय के राष्ट्रीय राजनीती में  चुनावी प्रबंधक के रूप में उभरने से कुछ लोगयह मान रहे थे हरियाणा में भाजपा की सरकार बनने के बाद अब राज्य में कैलाश विजयवर्गीय  को शिवराज का उत्तराधिकारी माना जा रहा था  लेकिन इस जीत के बाद शिवराज जिस तरीके से मजबूत हुए हैं उसने यहसाबित किया है फिलहाल जिस अंदाज में वह  मजबूती  कदम बडा  रहे हैं उससे लगता तो यही है उनके कद को चुनौती  दे पाने की स्थिति में फिलहाल कोई नेता दूर दूर तक उनके आस पास भी नहीं फटकता । 

  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने रोड शो  में विकास का तड़का लगाया और अपनी उपलब्धियों के आसरे मतदाताओ का दिल जीत लिया । भोपाल में पिछली बार बाबूलाल गौर की बहु कृष्णा गौर महापौर बनी थी । उससेपहले के दौर को याद करें तो यहाँ पर दस बरस से भी ज्यादा समय से कांग्रेस का एकछत्र राज था । इस बार भी यहाँ पर भाजपा के  आलोक शर्मा  ने कमल खिलाया है । जबलपुर में भी भाजपा ने जीत का सिलसिला जारीरखा है । यहां से भाजपा की स्वाती गोड़बोले ने शरत तिवरी को हराया  पिछली बार  जबलपुर में भी भाजपा के प्रभात साहू ने ही भाजपा का झंडा फहराया था । वहीं इंदौर में लंबे समय तक महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रहीअर्चना जायसवाल को भी महापौर सीट के लिए शिकस्त का सामना करना पड़ा । "मिनी मुंबई" के नाम से जाने जाने वाले इंदौर में भाजपा  विधायक मालनी गौड़ ने भी भाजपा  की सरकार बनाने में सफलता हासिल की ।पिछली बार भाजपा के कृष्ण मुरारी मोघे ने यहाँ सफलता कायम की थी । तब उन्होंने यहाँ पर कांग्रेस के पंकज संघवी को  हराया था । संघवी ने  उस दौर  में पैसा पानी की तरह बहा दिया था पर इसके बाद भी वह नही जीतसके थे। संगठन और सरकार के जबरदस्त तालमेल से भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत का सपना साकार होता जा रहा है। आने वाले 4 वर्षों में अब कोई चुनाव नहीं है, लेकिन हाल ही में हुए चुनावों से कांग्रेस को सबक लेनेकी आवश्कता है ताकि वह अपनी खोई प्रतिष्ठा पुन: प्राप्त कर सकें।

निकाय चुनावो में कमल के खिलाने के बाद शिवराज ने साबित कर दिया है मध्य प्रदेश में उनका राज किसलिए चलता है । इस जीत के बाद केन्द्रीय स्तर पर उनका कद एक बार फिर बढ़  गया है  ।  संभवतया केन्द्रीयनेतृत्व अब  मध्य प्रदेश को लेकर लिए जाने वाले हर निर्णय में उनको फ्री हैण्ड दे । वहीँ  कांग्रेस को चाहिए वह बचे  वर्षो में  मजबूती से विपक्ष की भूमिका निभाए अन्यथा शिवराज अकेले ही सभी पर भारी पड़ जायेंगे ,इससे अब शायद ही कोई इंकार करे ।  कांग्रेस को  चुनावो के बाद अब  इन बातो की दिशा में गंभीरता से विचार करने की जरुरत है ।

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