Tuesday, May 26, 2015

महामिलन से पहले तलाक की राह पर जनता परिवार


तुम्हें गैरों से कब फुर्सत
हम कब अपने गम से खाली
चलो बस हो चुका मिलना
ना तुम खाली ना हम खाली


जनता परिवार के महामिलन से पहले यही पंक्तियाँ जेहन में आ रही हैं |  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बढ़ते प्रभाव के चलते जहाँ अपनी पुरानी एनर्जी को प्राप्त करने के मकसद से जनता परिवार ने  फिर से साथ आने का मन बनाया वहीँ इस महामिलन से पहले तलाक की खबरों ने बिहार में कुछ माह बाद बिछने जा रही राजनीतिक बिसात को उलट दिया है | असल में एक दौर में जहाँ  जनता पार्टी और जनता दल ने केंद्र में साथ साथ कदमताल की वहीँ कांग्रेस से लोहा लेने में भी यह सभी दल कभी अगुवा हुआ करते थे शायद यही वजह रही बिहार चुनाव से ठीक पहले सभी ने मोदी के खिलाफ मोर्चा खोलकर ना केवल भाजपा के रणनीतिकारों के सामने मुश्किलें खड़ी कर दी बल्कि बिहार को फिर से जातीय गठजोड़ की छाव तले ले जाने का काम किया लेकिन जनता परिवार के महामिलन का इन्तजार कर रहे लोगों के हाथ अब निराशा लगी है |

असल में जनता दल के महामिलन की सबसे बड़ी परेशानी किसी सर्वमान्य नेता के ना होने से खड़ी हुई है जो ठीक ऐसे समय लाइलाज हो गई है जब बिहार में विधान सभा चुनाव का बिगुल सितम्बर अक्टूबर में बजना तय है | यही नहीं असल परेशानी तो महाविलय को लेकर है क्युकि जो भी दल जनता परिवार में विलय का मन बना रहे थे वह सभी एक दौर में जनता परिवार के भीतर रहकर ना केवल सियासत साध चुके हैं बल्कि जे पी और कर्पूरी ठाकुर सरीखे नेताओ के साथ राजनीती का ककहरा सीखे हैं लेकिन नब्बे के दशक ने राजनीती को छत्रपो  की बिसात में जिस तरीके से बदला है उससे यह सभी नेता अलगअलग सूबों के झंडाबरदार बनकर राजनीती के अखाड़े में कदमताल कर रहे  हैं | भले ही आज के हालातों में पी एम मोदी जिस तरीके से सरकार चला रहे हैं उससे लगता तो यही है आने वाले दिनों में इस गठजोड़ का हिस्सा बनने जा रहे कई नेताओं की राजनीती के अच्छे दिन लद सकते हैं शायद इसी संकट के चलते छह पार्टियों के गठजोड़ ने बिहार चुनाव से पहले महामिलन की तैयारियों को अंतिम रूप दिया जिसमें समाजवादी पार्टी , जेडीयू ,राजेडी , जेडीएस , इनेलो और समाजवादी जनता पार्टी ने एकजुट होने पर सहमति जताई लेकिन महामिलन से पहले तलाक ने विलय की सारी  संभावनाओं को अब ख़त्म कर दिया है | 

बीते दिनों दिल्ली में बिहार के सी एम नीतीश कुमार और नेताजी के बीच मुलाक़ात भी नया गुल नहीं खिला सकी है जिसके बाद जनता पार्टी के महामिलन की बातें करना बेमानी सा लग रहा है क्युकि इसमें शामिल हर नेता अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग के साथ कदमताल कर रहा है और यही व्यक्तिगत स्वार्थ महामिलान की बिसात का सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए है | साथ ही साथ इसमें शामिल 6 पार्टियों के नेताओं को अपनी पार्टी की चमक ख़त्म होने का भय सता रहा है और कार्यकर्ताओ की राय को अहमियत ना देते हुए अगर यह सभी एक मंच पर आ जाते  हैं तो ऐसे में चुनावी प्रबंधन भी गड़बड़ा सकता है  और तो और सभी को दिल्ली में अपने झंडे दफ्तर और बंगले खोने से महरूम रह सकते हैं और चुनाव आयोग की चाबुक अगर चली तो कई नेताओं को बड़ा नुकसान भविष्य में झेलने को मजबूर होना पड़ सकता है शायद यही वजह है महामिलन वाली यह दोस्ती परवान नहीं चढ़ सकी है | 

 पुराने पन्ने टटोलें  तो नब्बे के दशक में राष्ट्रीय उभार और केंद्र में सत्ता सुख लेने के बावजूद जनता दल अपने क्षेत्रीय नेताओं की महत्वाकांक्षा के चलते कई बार टुकड़ों में बंटता रहा और इससे अलग हुए दल अपनेअपने राज्यों में छत्रप बनकर सिमट से गए । फिर एक हो रहे इन दलों के नेताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती आपसी एकता को मजबूत बनाना तथा क्षेत्रीय नेताओं के अहम पर अंकुश थी जिसमे वह अभी तक सफल नहीं हो पाए हैं क्युकि अहं का टकराव सीटों कीं उलझन से लेकर अपने अस्तित्व को बचाने तकगले की फांस सरीखा बना हुआ है | साथ में सभी अपनी खुद की चमक फींकी होने और महामिलन के बाद अपेक्षित परिणाम ना आने की सूरत में भविष्य की राजनीती को लेकर भी बना है | और बड़ा सवाल इन 6  दलों के एकजुट होने तथा इनकी राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता का भी है | भले ही  जातीय गठजोड़ में  हम इन्हें  नजरअंदाज नहीं कर सकते लेकिन  एकता की स्थिरता पर यह शुरुवात से बड़ा प्रश्नचिह्न रहे हैं | तीसरे मोर्चे का राग वाला पुराना दौर भी हम देख चुके हैं और 15 वी लोक सभा से ठीक पहले इस तरह के मोर्चे का विफाल प्रयास इस तरह के मिलन पर कई सवाल खड़े कर देता है | जनता परिवार की मुश्किल और दुखती रग 6 पार्टियों पर हावी  परिवारवाद भी  है। इनकी  नीतियों से लेकर और कार्यशैली तक में परिवारवाद हावी है जिसकी वजह से लोगों के भीतर इनकी विश्वसनीयता संदिग्ध  है |शरद , नीतीश को अगर  छोड़ दिया जाए तो अन्य सभी दलों पर एक ख़ास परिवार का वर्चस्व है और यही ख़ास परिवार की धमक नीतियों के क्रियान्वयन से लेकर सरकार चलाने और अपनी पसंद के लोगों को रेवड़ियाँ देने में है | समाजवादी पार्टी से लेकर  राजद और  इनेलो से लेकर कर्नाटक में जनता दल एस हर जगह परिवारवादी सोच मजबूत है |

अक्टूबर 1988  में जनता पार्टी के धड़े लोकदल कांग्रेस एस और जनमोर्चा के आपस में विलय से जनता दल का गठन हुआ और ठीक एक वर्ष बाद हुए चुनाव में जनता दल के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी जिसे वामदलों और भाजपा ने बाहर से समर्थन दिया और वीपी सिंह प्रधानमंत्री के तख़्त तक पहुंचे |  नवंबर 1990 में भाजपा के समर्थन वापस लेने से यह सरकार गिर गई और यहीं से जनता दल की टूट का सिलसिला शुरू हुआ।पहली टूट पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के नेतृत्व में हुई। जनता दल से करीब 60 सांसदों के साथ समाजवादी जनता पार्टी ने चंद्रशेखर के नेतृत्व में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई लेकिन यह सरकार कुछ ही महीनों में गिर गई। जिसके बाद  मुलायम सिंह यादव  नेता जी ने अलग होकर सपा का गठन किया। चारा घोटाले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद का नाम आने पर जनता दल नेतृत्व द्वारा उन पर पद छोड़ने का दबाव बनाने पर यादव ने जनता दल से अलग होकर अपनी नई पार्टी राजद बना ली। 1996 में जनता दल को एक बार फिर केंद्र में सरकार बनाने का अवसर मिला। एचडी देवेगौड़ा और फिर इंद्र कुमार गुजराल कुछ समय के लिए बारी बारी से  प्रधानमंत्री भी  बने लेकिन  दोनों बार कांग्रेस ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी जिसके बाद  देवेगौड़ा ने 1999 में जनता दल से अलग होकर जनता दल एस का गठन कर लिया। बिहार की राजनीतिक उठापठक के बीच अक्टूबर 2003 में जनता दल और जॉर्ज की समता पार्टी के विलय से जनता दल यू अस्तित्व में आई जिसने भाजपा के साथ मिल कर कई वर्षों तक बिहार में सरकार न केवल चलाई बल्कि सुशासन देकर लोगों के मन में यह भरोसा और विश्वास मजबूत किया कि अब बिहार बदल रहा है | लेकिन  भाजपा द्वारा बीते बरस  नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार  घोषितकिए जाने पर नीतीश कुमार ने भी  उससे नाता तोड़ लिया और  लोक सभा चुनाव में हार के बाद मांझी के कंधे में सवार होकर अपनी सरकार चलाई | यह अलग बात है अब मांझी उनकी पार्टी छोड़ चुके हैं | जे डी एस भी कभी येदियुरप्पा के साथ कदमताल कर सरकार चला चुकी है लेकिन अब यह येदियुरप्पा से दूरी बनाकर ही चल रही है |

इस विलय के अगुआ के तौर पर लालू सक्रिय रहे हैं और नेताजी को इस नए महामोर्चे का नेता भी घोषित किया जा चुका है |  लोकसभा चुनाव के बाद आगामी बिहार विधानसभा चुनाव राजद और जदयू दोनों का भविष्य  तय करने जा रहे हैं | लोकसभा में भाजपा से करारी हार मिलने के बाद बीते बरस  विधानसभा के  उपचुनाव में राजद जदयू जब साथ लड़े तो परिणाम आशाजनक रहे क्युकि इनके साथ आने से माई समीकरण को न केवल मजबूती मिली बल्कि भाजपा के वोट बैंक में  गिरावट साफ़ देखीगईशायद इसी के मद्देनजर  लालू  महाविलय की माला जपनी शुरू कर दिए |  बिहार और यूपी के उपचुनावों में मोदी का विजयरथ थम जाने से साफ लगा अगर मोदी के खिलाफ कोई महामोर्चा किसी भी राज्य में बनाया जाए तो भाजपा को पानी पिलाया जा सकता है। शायद इसी के चलते नेताजी को आगे कर लालू ने मोदी से दो दो हाथ करने के लिए बिहार के अखाड़े में महामोर्चा की तैयारियां कर ली जिससे बिहार में भाजपा का कमल मुरझा जाए और बिहार में महामोर्चे के फतह करने की सूरत में केंद्र में मोदी सरकार को घेरा जा सके लेकिन यह सारी कोशिशे अब परवान नहीं चढ़ पाई |

बीते दौर को याद करें तो जनता दल या अन्य दलों के एकता के प्रयासों में नेताजी की भूमिका बड़ी रही थी। 1996  में जब नरसिंहराव सरकार से लोगो का मोहभंग हो गया तो नेताजी ही वह शख्स  थे जिसने समाजवादियो , वामपंथियों, लोहियावादी विचारधारा के लोगो को एक साथ   लाकर उस दौर में शरद पवार के साथ मिलकर एक नई  बिसात केंद्र की राजनीती में चंद्रशेखर को  आगे लाकर बिछाई थी ।  2004 में कांग्रेसभाजपा नीत एनडीए से अलग अन्य राजनीतिक गठबंधन पर मोर्चा बनाने के जितने प्रयास किए उसमे नेताजी मुख्य सूत्रधार थे |  यूपीए1  में सपा , इनेलो , टीडीपी , नेशनल कॉन्फ्रेंस , एजीपी आदि ने मिलकर यूनाइटेड नेशनल प्रोग्रेसिव एलायंस (यूएनपीए) बनाया था उसके झंडाबरदार भीनेताजी ही थे |   न्यूक्लिअर डील के मसले पर भी नेता जी ने कांग्रेस सरकार को न केवल बचाया बल्कि समय आने पर अपना पासा फेंककर यह बताया कि राजनीती में उनकी बिसात को कमजोर ना माना जाए | यही नहीं 2012 में राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ममता बनर्जी और अन्य  नेताओं के साथ उनकी मोर्चेबंदी ने भी  उन्हें राजनीती का चतुर सुजान साबित कियाऔर अब एक बार फिर जनता पार्टी के महामिलन के बहाने वह 6 पार्टियों को साथ लाने की पुरजोर कोशिश भी किये लेकिन परिणाम सामने नहीं आ पाए |   बिहार में अगर लालू और नीतीश अलग अलग चुनाव लड़ते हैं तो यह भाजपा के लिए फायदे का सौदा होगा | इधर लालू ने इस मोर्चे में मुसहर जाति के अगुआ नेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री मांझी को साथ लाने की बात कहकर महामोर्चे में नयी बहस को जन्म दे दिया | लालू अगर माझी को अपने साथ लाने में कामयाब हो गए तो दलितों ,मुस्लिम , यादव और पिछडो का गठजोड़ असरदार साबित हो सकता है | वहीँ नीतीश बिहार में बड़े लोकप्रिय नेता हैं और बेशक वही सी एम पद का चेहरा भी रहेंगे लेकिन बीते दौर को याद करें तो  नीतीश भी अपना वोट बैंक तभी बड़ा सके जब वह भाजपा के साथ गठबंधन कर लालू और कांग्रेस के सामने चुनौती पेश कर पाए  | जीतन राम मांझी को हटाकर उन्होंने पिछडो के साथ अन्याय किया है | स्वाभाविक है आने वाले समय में उनकी पार्टी को मांझीफैक्टर से बड़ा नुकसान झेलना पड़ सकता है | अब अगर नीतीश लालू की कही बात पर यकीन कर लें और महामोर्चे में मांझी को भी साथ ले आयें तो इससे उनकी साख तो धूमिल होगी ही साथ में जनता के बीच उनकी खासी छीछालेदारी भी होगी | वैसे भी भाजपा से अलग होने के बाद जनता और कार्यकर्ताओं के तबके में उनको लेकर नाराजगी है | मांझी को हटाकर जब सी एम की कुर्सी उन्होंने दुबारा हासिल की तो इस भूल का उन्हें अहसास भी है शायद तभी उन्होंने माफ़ी भी मांगी है | यह चुनावी स्टंट है या वोटर के मन में उतरने की नई छवि यह तो आने वाला समय ही बतायेगा लेकिन जो भी हो बिहार चुनाव के काउन  डाउन से पहले महामोर्चे के बेसुरे राग ने अमित शाह और मोदी के चेहरों पर मुस्कान लौटा दी है क्युकि जनता पार्टी का यह महामोर्चा बिहार के जातीय समीकरणों पर सबसे भारी साबित हो सकता था अब इस मोर्चे के महामिलन न होने से भाजपा को लाभ मिलना तय है |




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