बुधवार, 1 मार्च 2017

चुनावी शोर तले मणिपुर पर ख़ामोशी





इस समय देश की सियासत परवान चढ़ रही है । जिधर देखो उधर चुनावी चर्चा चल रही है । इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस दौर में तमाम न्यूज चैनलों में भी न्यूज़रूम चुनावी दंगल का शो  बनकर रह  गया है । कुछ समय से सभी चैनल पंजाब और यू पी पर जहाँ  पैनी नजर रखे हुए थे वहीँ अभी हाल यह है चुनावी चर्चा केवल और केवल उत्तर प्रदेश के चुनावों तक जाकर सिमट गयी है । राष्ट्रीय मीडिया की बात करें तो तकरीबन 90 फीसदी चर्चा पंजाब और उत्तर प्रदेश  तक है जबकि गोवा , उत्तराखंड सरीखे राज्यों को बमुश्किल 10  फ़ीसदी  प्रतिनिधित्व मिल पाया । शायद इसकी वजह इन राज्यों  का आबादी के लिहाज से छोटा  होना हो सकता है । साथ की केन्द्र  में भी इन राज्यो का वजन कम है क्योंकि यहाँ लोक सभा की बहुत कम सीटें हैं । यही हाल मणिपुर को लेकर भी है । आगामी  4  मार्च और 8  मार्च को वहां पर दो चरण में मतदान होना है लेकिन राष्ट्रीय मीडिया में मणिपुर की चर्चा नहीं के बराबर है । इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी मणिपुर से जुड़े सरोकारों की सुध इस दौर में नहीं ले पा रहा है शायद इसलिए क्युकि पूर्वोत्त्तर की समस्याओं पर चर्चा करने की फुरसत मीडिया के पास नहीं है और वहां पर टी आर पी के मीटर भी नहीं लगे हैं जो न्यूज चैनलों को प्रतिस्पर्धा में टॉप  5 तक पहुंच सकें । 

 छोटे से पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर की  मीडिया द्वारा अनदेखी कई सवालों को खड़ा करती है । राजनेताओं का मणिपुर सरीखे पूर्वोत्तर के राज्यों से कोई सरोकार नहीं है शायद इसकी वजह यह है  यहाँ से लोकसभा के  2 सांसद हैं इसलिए कांग्रेस और  भाजपा सरीखे राष्ट्रीय दल  भी मणिपुर के मसलो पर चुप्पी साधने से बाज नहीं आते । मणिपुर के जमीनी  हालातों से मीडिया अनजान है । पिछले कुछ समय से वहां पर बड़े पैमाने पर आर्थिक नाकेबंदी चल रही है लेकिन मुख्यधारा के मीडिया में इसी लेकर कोई हलचल नहीं है । शायद ही कोई न्यूज़ चैनल ऐसा होगा जिसने  इस चुनाव में मणिपुर के सवालों और आम जनता के सरोकारों से जुडी खबरों को अपने चैनल में प्रमुखता के साथ जगह दी हो । आर्थिक नाकेबंदी की एक आध खबरें प्रिंट मीडिया के माध्यम से ही प्रकाश में आईं  ।

मणिपुर  के हालात बहुत अच्छे नहीं है । चुनावी माहौल  के बीच आज भी मणिपुर के विरुद्ध नाकेबंदी  चल रही है। इसकी शुरूआत नवम्बर में हुई थी जब राज्य  सरकार ने मणिपुर में  नए जिले बनाने की घोषणा की । मणिपुर में जाति और जमीन की खाई दिनों दिन गहराती जा रही है । राज्य में नगा और कूकी समुदाय के बीच पुराना संघर्ष है ।  दोनों समुदायों के बीच हुई हिंसा में कई लोग मारे जा चुके हैं ।  चुनाव के पास होते ही अब संघर्ष तेज हो रहा है और हर पार्टी इस जंग का इस्लेमाल अपने फायदे के लिए करना चाहती है ।  चुनावी बरस में राज्य सरकार द्वारा  मणिपुर के जिले का विभाजन  करने का कदम मणिपुर के लोगों और सरकार के गले की हड्डी बन चुका है।  मणिपुर की कुल जनसंख्या में 60  प्रतिशत लोग मैतई समुदाय से आते हैं ।  ऐसे में साफ है कि राज्य की राजनीति में मैतई समुदाय का वर्चस्व ही पहाड़ और घाटी के बीच बढ़ती दूरियों की एक बड़ी वजह इस चुनाव में  भी है।

 मणिपुर के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी मैतई समुदाय से आते हैं और वह इस चुनाव में मैतई समुदाय को अपने पक्ष में लामबंद कर कांग्रेस की जीत का सपना लगातार चौथी बार भी देख रहे हैं । मणिपुर में कांग्रेस  हैट्रिक लगा चुकी है ।  इबोबा सरकार  मैतई  समुदाय का खुलकर पक्ष लेते रहते हैं जिसे लेकर लोगों में भारी रोष देखा जा सकता है ।  इस चुनाव में पहाड़ और घाटी के बीच ही वोटों का विभाजन होने का अंदेशा है । ख़ास बात यह है मणिपुर में कुल 60 विधानसभा सीटों में से 40 सीटें घाटी में हैं जबकि पहाड़ पर विधानसभा की 20 सीटें हैं ।मैदानी इलाकों का प्रतिनिधित्व जायद होने के चलते पहाड़ के लोगों की सरकार के गठन में उतनी भूमिका नहीं रहती है । ऐसे में  कांग्रेस मैतई समुदाय से बड़ी उम्मीद लगाए बैठी है और चुनावो से पहले खुलकर उनके पक्ष में लामबंद होती दिखती है । इस बार भी  सरकार ने  नगा बहुल वाले पहाड़ी जिलों का बंटवारा कर दो नए जिले बनाए है जिसने चुनावों से पहले घाटी और पहाड़ के बीच दरार पैदा कर दी है । इसी  कार्ड के चलते इबोबी सरकार चुनाव जीतने का सपना देख रही है । कांग्रेस के खिलाफ  सत्ता विरोधी लहर तो है लेकिन  मैतई समुदाय के पक्ष में माहौल होने के चलते  सत्तारूढ़  कांग्रेस ने सब मैनेज कर लिया है । पूर्वोत्तर में आसाम की तरह भाजपा मणिपुर में अपना वोट बैंक बनाने की जुगत में है । इसके लिए इस बार पार्टी ने पूरी ताकत लगाई है । नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस  के साथ उसका गठबंधन  इसी  का  नतीजा  है । 

  मानवाधिकार कायकर्ता इरोम शर्मिला  भी  राजनीतिक अखाड़े में कूद पड़ी हैं और चुनाव लड़ रही हैं। वह विवादित सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम को रद्द किए जाने की मांग करती आ रही हैं। मणिपुर विधानसभा के लिए इरोम शर्मिला की नई नवेली पार्टी, पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस अलायंस ने  सिर्फ तीन प्रत्याशी ही खड़े किये हैं । शर्मिला स्वयं थोबल विधानसभा क्षेत्र से मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के विरुद्ध लड़ रही हैं।  इरोम शर्मिला ने पार्टी तो बना ली है पर उनके पास धनबल , बाहुबल नहीं है ना ही कार्यकर्ताओं की भारी भरकम फ़ौज जो  राष्ट्रीय दलों का मुकाबला कर सके । मणिपुर की लगभग साठ फीसदी आबादी इम्फाल के इर्द-गिर्द घाटी में रहती है। शेष कुकी, नगा, ज़ोमी कबीले के लोग पहाड़ों में निवास करते हैं। घाटी में मैतेई, मणिपुरी ब्राह्मण, विष्णुप्रिय मणिपुरी के अलावा आबादी का 8.3 प्रतिशत पांगल है जिनका  राजनीति और व्यापार में दखल रहता है। मैतेई आबादी को प्रभावित करने के मकसद से इबोई सिंह ने नये सिरे से जिले बनाने की घोषणा की थी जिसके विरुद्ध नगा बहुल इलाकों में लंबे समय तक नाकेबंदी का मंजऱ था।  इबोबी सिंह  बिना चिंता के मैदान में इस बार भी  डटे  हुए हैं । भाजपा के लिए राह मुश्किल भरी इसलिए भी है  भाजपा को नागा जाति की समर्थक पार्टी के तौर पर पूर्वोत्तर में देखा जाता है । एक मुश्त वोट अगर मैतयी के पड़ते हैं  तो बाजी कांग्रेस के नाम होने में देर नहीं लगेगी इसलिए भाजपा भी यहाँ फूंक फूंक कर कदम रख रही है । 

मैतेयी और नागा जातियों की मौजूद दौर में  खाई  ने नागालैंड और मणिपुर के दोनों राज्यों के बीच भी तनाव पैदा कर दिया है।   यूनाइटेड नागा कौंसिल जैसे गुट मणिपुर से आने वाले ट्रकों और अन्य वाहनों को अपने यहां से गुजरने नहीं देते इसलिए कई  बार मणिपुर की आर्थिक  नाकाबंदी हो चुकी है।राष्ट्रीय मीडिया और  ने मणिपुर की इतनी अधिक अनदेखी की है कि अपने  चैनल में मणिपुर को नहीं के बराबर स्पेस दिया ।  केंद्र सरकार  मणिपुर में एक नवंबर से अनिश्चितकालीन आर्थिक नाकाबंदी को लेकर मूकदर्शक  बनी हुई है । इस नाकेबंदी  की वजह से मणिपुर में लोगों को खाने-पीने समेत जरूरी सामानों की किल्लत पैदा हो गई । पेट्रोल के दाम 350  रुपये लीटर बढ़ गए । रसोई गैस का सिलेंडर 2000 रुपये  तक पहुँच गया । यही नहीं नेशनल हाइवे 2  भी बंद होने से मणिपुर में गुजर बसर कर पाना मुश्किल हो गया लेकिन मीडिया मणिपुर पर खामोश रहा ।   आर्थिक नाकेबंदी का प्रभाव  इंफाल के  कई हिस्सों में देखा जा सकता था जहाँ लोग  कर्फ्यू के साये में जीवन बिता रहे थे । इन इलाकों में नागा समूहों द्वारा  ब्लास्ट भी किये गए । साथ ही  विरोध प्रदर्शन में  वाहनों में आग भी लगी । पुलिस और अर्धसैनिक बलों के जवान हिंसा वाले इलाकों में  तमाशा देखते रहे और आंसू गैस से आगे मामला बढ़ नहीं पाया । सीएम ओकराम ईबोबी सिंह के नए जिले बनाने की घोषणा से  नागा समूह ने 1 नवंबर से वहां नाकाबंदी शुरु कर दी जिससे जनजीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ और दिल्ली केंद्रित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने मणिपुर के  बदतर हालातों की खबरों को स्पेस देना मुनासिब नहीं समझा । 

मणिपुर में जारी आर्थिक नाकेबंदी और क्षेत्रीय अखंडता को कांग्रेस  ने बड़ा मुद्दा बनाया है और दो तिहाई बहुमत इस बार भी पाने की उम्मीद लगायी है वहीं कांग्रेस ने इस नाकेबंदी के लिए भाजपा को जिम्मेदार बताया है  । ईरोम  बेशक  अखाड़े में हैं लेकिन 3  प्रत्याशियों की ताकत मणिपुर का भाग्य बदलने का माद्दा नहीं रखती है । वह भी तब जब चुनाव हाइटेक हो गया है जहाँ राष्ट्रीय दलों  के वार रूम से सब चीजें  मैनेज हो रही हैं ।   राज्य में भाजपा बीते बरस  से ही सत्ता में आने के सपने देख रही है लेकिन कांग्रेसी नेताओं  के पिटे चेहरों के बूते वह मणिपुर फतह कर जाएगी ऐसा मुश्किल दिखता  है । मणिपुर में  जिलों को विभाजित  करने का कार्ड चलकर मणिपुर में  कांग्रेस ने सत्ता विरोधी लहर को खत्म सा  कर दिया है । कांग्रेस ने जहाँ मैतयी को अपने पक्ष में कर लिया है वहीँ मैदानी इलाकों में भी उसका प्रतिनिधित्व ज्यादा होने से हाथ मजबूत दिख रहा है । पहाड़ी इलाकों में सीटें कम होने से बाजी कांग्रेस के नाम होने के आसार दिख रहे हैं क्योंकि वही सिकंदर बनेगा जिसका सिक्का 40 सीट पर मजबूत होगा । फिलहाल समीकरण कांग्रेस के पक्ष में मजबूत दिखाई दे रहे हैं लेकिन राजनीति की बिसात पर कौन प्यादा बनता है और कौन वजीर इसका फैसला 11 मार्च को चलेगा । 

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