Friday, July 7, 2017

राजनीति की बिसात , हिट विकेट लालू प्रसाद






लालू प्रसाद यादव का नाम जेहन में आते ही बिहार को लेकर एक अलग तरह की छवि बनती है ।  सामाजिक न्याय और पिछड़ों के मसीहा कहलाने वाले लालू प्रसाद  को  अलहदा पहचान जे पी छाँव तले  मिली जब नीतीश , जॉर्ज , सुशील मोदी, शरद यादव, रविशंकर प्रसाद सरीखे नेताओं के साथ आपातकाल में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। जेपी आंदोलन के बाद लालू की राजनीति ऐसे  उफान पर रही जिसने मंडल कमंडल दौर में उनको बिहार का सरताज बना डाला । यह सच भी शायद किसी से छिपा हो उनके और राबड़ी देवी  के  कार्यकाल में  बिहार सबसे बुरे दौर में  कई बरस  पीछे  चला गया । माफिया  गुंडों की लालू  प्रसाद के दौर में जहाँ तूती  बोलती थी  वही अपहरण , रंगदारी , लूटपाट , गुंडागर्दी , रेप  की घटनाएं  उस समय आम बात थी । कानून व्यवस्था लुंज पुंज थी । पुलिस के पास आप अगर प्राथमिक रिपोर्ट दर्ज करवाने जाते थे तो रजिस्टर  में वह दर्ज भी नहीं हो पाती थी |  अपने कार्यकाल में उन्होंने जहाँ  करोड़ों  के वारे न्यारे किये वहीँ  उन्होंने कानून व्यवस्था  को तार तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी  । बिहार  उनके समय से ही पलायन का दंश झेल रहा है । उस दौर में लालू के खिलाफ जब घोटालों का जिन्न आता है  तो जेहन में सबसे पहले चारा घोटाले का जिक्र होता है जिसने 90 के दशक में लालू को चर्चित कर दिया। लालू प्रसाद  की राजनीती उस राजनीति की देन है जिसे बतौर प्रधानमंत्री वी पी ने हवा दी और  मंडल कमीशन को देश भर में लागू कर दिया गया। पिछड़ी राजनीति का यह तोहफा  लालू प्रसाद को  बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में मिला। यही नहीं आडवाणी के रथ को रोक और उन्हें गिरफ्तार कर लालू प्रसाद ने अपनी सांप्रदायिकता विरोधी छवि को देश में  जरूर मजबूत किया। उस दौर की शासन व्यवस्था का जिक्र करें तो उनका  कार्यकाल बिहार के लिए सबसे बुरे  दौर के रूप में  जाना जाता है जिसने लालूराज को जंगलराज से जोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।

गोपालगंज में एक यादव परिवार में जन्मे लालू यादव ने राजनीती का ककहरा जेपी आंदोलन से सीखा । उस दौर को याद करें तो  रैली के दौरान ही जब जेपी पर लाठियां बरसाई जाने लगीं तो लालू उन्हें बचाने के लिए उनकी पीठ पर लेट गए। कहा जाता है कि उनकी इस सूझ बूझ को देखते हुए उन्हें पहली बार लोकसभा का टिकट थमा दिया गया लेकिन लालू यादव का असल राजनीतिक सफर आपातकाल के बाद से शुरू हुआ जब वह पहली बार बिहार के छपरा से सांसद बने। बिहार के मुख्यमंत्री रहने के बाद वह केंद्र सरकार में रेल मंत्री भी बनें। बिहार में लालू जब सत्ता में थे तब  साधु, सुभाष, राबड़ी और लालू (ससुराल)  के इर्द-गिर्द ही सत्ता  घूमती  थी। ठेठ गवई, चुटीली  राजनीति करने वाले लालू प्रसाद ने उस दौर में एक नई परंपरा गढ़ी जब बिहार का नाम देश दुनिया में घोटालों ने ख़राब कर दिया । 1996 में जब चारा घोटाला सामने आया था तो मीडिया ने इसे खूब लपका । देश के कोने कोने में ऐसा पहली बार हुआ जब  जानवरों के चारे तक में घोटाले की बात सामने आई । तब इसे लेकर लालू पर खूब चुटकुले भी बने । 

लालू पर  90  के दशक  में मौजूदा झारखंड की चाईबासा ट्रेजरी से लाखों  रुपए निकालने का केस चल रहा था। तब चाईबासा बिहार में ही हुआ करता था। लालू यादव पर चाईबासा ट्रेजरी से पैसा निकालकर पशुपालन विभाग में ट्रांसफर कराने का केस था। पूरा चारा घोटाला करीब 950 करोड़ रुपए का था जिसमें ये केस तकरीबन 38 करोड़ रुपए की अवैध निकासी का था। अविभाजित बिहार में जगन्नाथ मिश्र से लेकर लालू यादव के सीएम रहने के दौरान फर्जी बिल के जरिए पशुओं को चारा खिलाने के नाम पर निकाला गया था।  चारा घोटाले के चाईबासा ट्रेजरी केस में लालू यादव के साथ जगन्नाथ मिश्र को भी दोषी पाया गया। 

1997 में लालू के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल होने के बाद जब उन्हें सी एम पद छोड़ना पड़ा  तो वह अपनी पत्नी राबड़ी को सिंहासन  सौंप जेल चले गए और इसी दौर में  आय से अधिक संपत्ति का भी मामला उनके खिलाफ दर्ज हो चुका था ।लालू को कुछ दिनों बाद बेल मिली लेकिन 2000 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में लालू और राबड़ी को कोर्ट में सरेंडर करना पड़ा जहाँ  राबड़ी को तो बेल मिल गई लेकिन लालू फिर जेल गए ।  2006 में आय से अधिक संपत्ति के मामले में वह और राबड़ी बरी हो गए । 2013 में लालू में रांची की सीबीआई कोर्ट ने लालू सहित 44 लोगों को सजा सुनाई । इसके साथ ही लालू को लोकसभा की सदस्यता छोड़नी पड़ी थी । वह जेल भी गए और सशर्त जमानत पर बाहर भी आ गए । 
2 बरस पूर्व बिहार चुनावों के समय यह कहा गया लालू यादव की भावी राजनीति की मियाद पूरी हो गई  , लेकिन  सत्ता और चुनाव लड़ने से उनके दूर होने के बाद भी वह बिहार में सबसे अधिक सीट लेकर आये और नीतीश का राजतिलक करवाया | इसी दौर मे  सुप्रीम कोर्ट  ने 21 बरस पुराने 950 करोड़ के चारा घोटाले के सभी चार मामलों में लालू प्रसाद यादव पर अलग-अलग मुकदमे चलाने के निर्देश दिए  साथ ही  जगन्नाथ मिश्र और तत्कालीन ब्यूरोक्रेट सजल चक्रवर्ती पर भी साथ-साथ केस चलाने का ऐलान करके मुश्किलों को बढ़ा दिया । यह वही मामला रहा  जिसमें 2014 में झारखंड उच्च न्यायालय ने यह कहकर रोक लगा दी थी कि एक ही मामले में एक ही व्यक्ति पर समान गवाहों के साथ अलग-अलग केस नहीं चल सकता। 

अदालत ने इस मामले में सारी कार्रवाई तय समय-सीमा में पूरी करने की शर्त भी रखी है।  वैसे अगर देखें  तो लालू प्रसाद की राजनीति पर तब तक कोई खास असर पड़ता नहीं दिखाई देता, जब तक कि वह इन या ऐसे मामलों में सजा पाकर पूरी तरह जेल न चले जाएं। पिछले कुछ महीनों से दोनों मंत्री पुत्रों सहित लालू यादव खुद भी मिट्टी घोटाले के ताजा जिन्न और लालू-शहाबुद्दीन टेलीफोन वार्ता से विपक्ष के निशाने पर थे लेकिन हालिया दिनों मे सी बी आई की रेड में लालू यादव का पूरा कुनबा ही  नई मुसीबत में घिरता दिख रहा है |

लालू यादव पर आरोप है कि उन्होंने रेलमंत्री रहते हुए बड़ी वित्तीय गड़बड़ियां की जिसमें उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बिहार के उप मुख्यमंत्री और उनके बेटे तेजस्वी यादव के अलावा चार अन्य लोगों का नाम आया है | सीबीआई ने इस मामले में भ्रष्टाचार का नया केस दर्ज करते हुए पटना में सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी देवी के आवास सहित पटना, रांची, गुरुग्राम और भुवनेश्वर में 12 जगहों पर छापेमारी की  जिसके बाद उनकी पार्टी की  कई मुश्किलों में इस फैसले ने इजाफा कर दिया है।  मामले की जड़े  तत्कालीन एनडीए सरकार के उस फैसले तक जाती हैं जब उसने रेलवे के होटलों की कैटरिंग सेवाओं का प्रबंधन आईआरसीटीसी को सौंपने का फैसला किया था |

 रेलवे बोर्ड ने 2001 में फैसला लिया कि कैटरिंग सर्विस और रांची तथा पुरी स्थित रेलवे के होटल बीएनआर का संचालन भारतीय रेलवे से लेकर आईआरसीटीसी को दे दिया जाएगा |  

इसके ठीक बाद जब 2004 में लालू रेलमंत्री बने, तो उन्होंने सुजाता होटल्स के मलिक हर्ष और विनय कोचर, लालू यादव के करीबी पीसी गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता और आईआरसीटीसी के अधिकारियों के साथ मिलकर कथित तौर पर आपराधिक साजिश रची |  इन लोगों ने साजिश के तहत होटलों पर अधिकार पाने के लिए  योजना बनाई | सीबीआई के मुताबिक, इसी साजिश के तहत विनय कोचर ने 25 फरवरी, 2005 को पटना में तीन एकड़ की प्राइम लैंड महज 1.47 करोड़ रुपये में डिलाइट मार्केटिंग को बेच दी, जो कि सर्किल रेट से काफी कम थी | 

 इस कंपनी का मालिकाना हक प्रेमचंद गुप्ता की पत्नी सरला गुप्ता के पास था, लेकिन यह लालू प्रसाद  की ही बेनामी कंपनी थी | इस सौदे के दिन ही रेलवे बोर्ड ने बीएनआर होटल आईआरसीटीसी को सौंपने का ऐलान किया और फिर दोनों होटलों का प्रबंधन कोचर बंधुओं की कंपनी को सौंप दिया गया |  इसके लिए जो टेंडर निकाला गया वह भी गलत था |   इस मामले में तत्कालीन प्रबंध निदेशक पीके गोयल ने कथित रूप से धांधली की | टेंडर की शर्तों में फेरबदल हुआ , ताकि इस टेंडर के लिए सुजाता होटल को एकमात्र दावेदार बनाया जा सके|  

यहां दोनों होटलों के लिए  15 से ज्यादा टेंडर दस्तावेज हासिल किए गए, लेकिन सुजाता होटल के अलावा किसी दूसरी कंपनी का कोई रिकॉर्ड नहीं है | सीबीआई ने दावा किया कि साल 2010 और 2014 के बीच डिलाइट मार्केटिंग का मालिकाना हक भी सरला गुप्ता से लारा प्रोजेक्ट्स के हाथों में चला गया, जिसका स्वामित्व राबड़ी देवी और तेजस्वी यादव के पास है जो नीतीश सरकार मे अभी अहम  उपमुख्य मंत्री पद मे हैं |  पटना की उस जमीन की कीमत भी तब तक सर्किल रेट के अनुसार बढ़कर 32.5 करोड़ रुपये हो गई | 

 सीबीआई का आरोप है कि पीसी गुप्ता के परिवार के सदस्यों ने 32.5 करोड़ रुपये नेटवर्थ की कंपनी का शेयर मात्र 65 लाख रुपये के मामूली दाम पर लालू प्रसाद यादव के परिवार को ट्रांसफर कर दिया सीबीआई ने इस मामले में लालू प्रसाद यादव, राबड़ी देवी, तेजस्वी प्रसाद यादव, सरला गुप्ता, विजय कोचर, विनय कोचर, लारा प्रोजेक्ट्स और आईआरसीटीसी के पूर्व महानिदेशक पीके गोयल के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 , 120बी के अलावा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 पीसी एक्ट की धाराओं 13(2) और 13 (डी) के तहत एफआईआर दर्ज किया है |  

रांची और पुरी के चाणक्य बीएनआर होटल जोकि रेलवे के हेरिटेज होटल थे | लालू यादव ने रेल मंत्री रहते हुए इन होटलों को अपने करीबियों को लीज पर बेच डाला जो  होटल अंग्रेजों के जमाने के थे इसीलिए इसका ऐतिहासिक महत्व था पर अब नहीं रहा क्योंकि इन होटल्स को पूरा रेनोवेटेड कर दिया गया है |  लालू प्रसाद एवं उनके परिवार के खिलाफ एक हजार करोड़ की बेनामी संपत्ति का मामला रांची और पुरी से जुड़ा हुआ है | 


लालू प्रसाद जब रेल मंत्री थे तब रेल मंत्रालय ने रांची एवं पुरी के ऐतिहासिक होटल बीएनआर को लीज पर देने का निर्णय लिया | इस लीज के लिए रांची के कुछ होटल व्यवसाइयों के अलावा झारखंड से राज्यसभा के सांसद प्रेमचंद गुप्ता की कंपनी दोनों होटलों को लेने में सफल रहे और रांची के बीएनआर होटल को पटना के प्रसिद्ध होटल चाणक्य के संचालक हर्ष कोचर को 60 साल के लिए लीज पर मिल गया | पहले तो लीज की अवधि 30 वर्ष रखी गयी, परन्तु बाद में इसकी अवधि बढ़ाकर साठ साल कर दी गई |  आरोप है कि इन दोनों होटलों को लीज पर देने की जितनी कीमत राज्य सरकार को मिलनी चाहिए वह नहीं मिली  | 

ताजा फैसला लालू प्रसाद के खिलाफ  हमलों को और धार देगा राजनीतिक उठापटक बढ़ेगी क्युकि दोनों पुत्र इस समय नीतीश सरकार में ताकतवर मंत्री  हैं | यह भी तय है कि फैसला लालू प्रसाद की राजनीति से ज्यादा बिहार के महागठबंधन की राजनीति पर असर डालेगा और यही असल में देखने की बात होगी। कहना न होगा कि हाल में लगे आरोपों के बाद जिस तरह की बातें सामने आईं, जिस तरह महागठबंधन के बड़े साथी लालू प्रसाद के बचाव के बजाय जद-यू अपनी छवि को लेकर सतर्क दिखा है उसने भी भविष्य के संकेत दिए हैं। 


यह फैसला लालू की मुश्किलों को और बढ़ा सकता है क्युकि 2005 के हलफनामे मे उन्होने अपनी संपत्ति 87 लाख के आस पास बताई थी लेकिन सी बी आई की मानें तो लालू के पूरे कुनबे ने 1000 करोड़ से भी अधिक की अकूत बेनामी सम्पत्ति बटोरी है वह भी उस दौर मे जब यूपीए के उस दौर में जब लालू की ठसक से सब कुछ काम  आसानी से हो जाया करते थे | हाल में लालू के  ठिकानों पर आयकर विभाग के ताबड़तोड़ छापों  के बाद तो लालू की मुश्किलें और बढ़ गई हैं ।


 इस घटना के बाद बिहार में राजनीतिक हालत तेजी से बदल रहे हैं । लोग महागठबंधन के भविष्य पर भी अब सवालिया निशान लगा रहे हैं । नीतीश कुमार अब मुश्किल में पड़ते जा रहे हैं |  लालू पर लगातार शिकंजा कसे जाने और  तेजस्वी और तेज प्रताप के भी भ्रष्टाचार के मसले पर घिरने से उनकी पार्टी की भी खूब किरकिरी हो रही है । इधर सुशील मोदी ने भी लालू का साथ छोड़ने का राग कुछ महीनों पहले छेड़कर  भाजपा और जद यू के पास आने की संभावनाओं से इनकार नहीं किया है।

 नीतीश ने भी हाल के दिनों में वह खुद पी एम पद के दावेदार नहीं कहकर एक बड़ा राजनीतिक बयान  दिया है जिसके कई बड़े मायने बिहार की राजनीती में निकाले जा रहे हैं । बिहार में सत्ताधारी जदयू को डर है कि लालू प्रसाद का करियर अगर समाप्त हुआ तो नीतीश की साफ़ सुथरी छवि पर भी ग्रहण लगना  तय है वहीँ लालू प्रसाद जानते हैं कि दोनों बेटों को वारिस बनाकर  उनकी पार्टी एक नई शुरुवात की तरह बढ़ रही थी लेकिन उनके खिलाफ चार केसों पर अगर बड़ा फैसला आ जाता है और आयकर विभाग के हालिया मामलों में भी अलग अलग सजा हुई तो उनको अपने वोट बैंक सेना केवल  हाथ गंवाना पड़  सकता है बल्कि राजद की लालटेन का भी सूपडा बिहार की राजनीति से साफ हो सकता है । साथ ही नीतीश  कुमार भी उनसे दूरी बना सकते हैं ।

इधर लालू के बिना राजद में सब सून सून  होने का अंदेशा भी बन रहा है। अगर ऐसा होता है तो नीतीश के लिए बिहार मे अकेले चलो की लड़ाई आसान नहीं होने वाली |  अब इस मामले में  के ताजा रुख  और आयकर विभाग के तमाम जानकारों की पड़ताल को देखते हुए लालू यादव और कुनबे  को  निर्दोष करार दिए जाने की संभावना नहीं के बराबर बन रही है ।  ऊपर से आय से अधिक संपत्ति मामले में उनकी नई मुश्किल बढती ही जा रही है । 

सबसे बड़ा सवाल अब यह है क्या सुशासन बाबू  तेजस्वी को मंत्री मंडल से बाहर निकालेंगे ? फिलहाल संकेतों को डिकोडे करें तो जेडीयू लालू के खिलाफ चुप्पी को  अपनी ढाल बना रही है | सूत्र बता रहे हैं छापे के बाद पार्टी की हुई आपात बैठक मे भी पार्टी हाई कमान की तरफ से इस मामले पर चुप रहने को कहा गया है | पार्टी प्रवक्ताओं को भी इस मसले पर कुछ भी उगलने से साफ इंकार कर दिया गया है |   जेडीयू  इस वक्त वेट एंड वाच  की मुद्रा मे है | 


 नीतीश कुमार के बारे मे माना जाता है वह पार्टी के बड़े फैसले खुद से लेते हैं | चाहे 2014 मे भाजपा के साथ ना जाने का फैसला रहा हो या नोटबंदी के समर्थन का | हर फैसले मे नीतीश की छाप दिखाई दी है | यह हाल के दौर मे रामनाथ कोविन्द की राष्ट्रपति की उम्मीदवारी के समर्थन मे भी दिखाई दिया है | नीतीश ने ही सबसे पहले विपक्ष की एकजुटता को दरकिनार करते हुए रामनाथ का समर्थन किया था और उनको बधाई देने सीधे राजभवन पहुँच गए | छापे और मुकदमें के बाद अब  नीतीश लालू के खिलाफ सोच समझकर अपना तीर कमान से निकालेंगे | दिल्ली में 23 जुलाई को जेडीयू के राष्ट्रीय़ कार्यकारिणी की बैठक होने जा रही है |  माना जा है कि तब तक गठबंधन की गांठ भी साफ हो जाएंगी |  

बहरहाल जो भी हो आने वाले दिनों में अब लालू  प्रसाद के सामने  भारी संकट खड़ा हो गया है । सुप्रीम कोर्ट का लालू के खिलाफ पहले के फैसलों पर साफ  कहना है  चार अलग-अलग मामलों में लालू पर  मुकदमा चलेगा, फिर सजा का एलान होगा। इस फैसले के बाद अर्णव गोस्वामी के रिपब्लिक चैनल पर आये आडियो टेप ने बिहार मे तहलका मचा दिया  था जहाँ लालू जेल में शाहबुद्दीन से बात करते नजर आ रहे थे । इस टेप ने बिहार के सत्ता गलियारों में लालू  की हनक और नीतीश के लाचार सी एम के सच को दिखाने का काम किया  जिसके बाद जे डी यू  और राजद को ना उगलते बन रहा था ना निगलते ।

रही सही कसर अब आयकर विभाग की हालिया छापेमारी ने बढ़ा दी है जहां लालू का पूरा कुनबा घिरता दिख रहा है । देखना होगा लालू प्रसाद इस मुश्किल से कैसे बाहर आते हैं जहाँ उनकी साख एक बार फिर सवालों के घेरे में है तो दूसरी तरफ राज़द और महागठबंधन के बिखरने का अंदेशा भी नजर आ रहा है । क्या राजनीति की बिसात पर अबकी बार हिटविकेट होंगे लालू प्रसाद ? फिलहाल इस सवाल के जवाब के लिए जुलाई महीने के आखिर तक और इन्तजार करना पड़ेगा ।

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