Tuesday, 30 December 2025

हजारों सवाल, एक खामोशी…गहरे सवाल छोड़ गए मनमोहन

डा. मनमोहन सिंह का नाम भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में अमिट स्थान रखता है।  डॉ. मनमोहन  ने एक ऐसे नेता को खो दिया, जिसने न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की सशक्त उपस्थिति दर्ज कराई। उनकी सादगी, विद्वत्ता और दूरदर्शिता ने उन्हें एक असाधारण नेता बनाया। 1991 में जब भारत गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा था, डा. मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के रूप में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू की। विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म हो चुका था और देश कर्ज के बोझ तले दबा हुआ था। इस कठिन समय में, उन्होंने साहसिक निर्णय लेते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक बाजारों के लिए खोला। उनके नेतृत्व में किए गए सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर और प्रतिस्पर्धी बनाया। लाइसेंस राज का खात्मा, विदेशी निवेश को प्रोत्साहन और निजीकरण को बढ़ावा देना उनके सुधारों के मुख्य स्तंभ थे। इन नीतियों ने न केवल आर्थिक संकट को टाला, बल्कि भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल कर दिया। 2008 में जब अमरीका और पश्चिमी देशों में आर्थिक मंदी आई, तब भारत भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहा। उस समय डा. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे और उनकी आर्थिक नीतियों ने भारत को इस संकट से बचाने में अहम भूमिका निभाई। उनकी सरकार ने वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए तत्काल कदम उठाए। सार्वजनिक निवेश बढ़ाने, रोजगार सृजन और ग्रामीण क्षेत्रों में मांग को बढ़ावा देने के लिए मनरेगा जैसी योजनाओं को लागू किया गया। इन नीतियों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को मंदी के प्रभाव से उबरने में मदद की और ये साबित किया कि डा. सिंह न केवल एक कुशल अर्थशास्त्री हैं, बल्कि एक सक्षम संकट प्रबंधक भी। डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत ने अपने पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों को मजबूत करने पर जोर दिया।

सार्क (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन) को सक्रिय बनाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, और श्रीलंका के साथ व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा दिया। डा. सिंह का मानना था कि पड़ोसी देशों के साथ मजबूत संबंध क्षेत्रीय स्थिरता और विकास के लिए आवश्यक हैं। उनके कार्यकाल में भारत-पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता और सीमा पर तनाव को कम करने के प्रयास किए गए। डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत किया। उन्होंने भारत-अमरीका परमाणु समझौते को सफलतापूर्वक अंजाम दिया, जिसने भारत को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। ये समझौता उनकी कूटनीतिक कुशलता और दृढ़ निश्चय का परिचायक था। इसके अलावा, उन्होंने जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद और वैश्विक आर्थिक सहयोग जैसे मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज को मजबूती से रखा। उनके नेतृत्व में भारत ने ब्रिक्स और जी-20 जैसे मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाई। डा. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुसलमानों की स्थिति सुधारने के लिए कई प्रयास किए गए थे। उनका एक बड़ा कदम सच्चर आयोग का गठन था। यह आयोग भारतीय मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति का अध्ययन करने के लिए बनाया गया था।

मनमोहक जीवन

डा. मनमोहन सिंह का जन्म 26 सितंबर, 1932 को पंजाब के चकवाल जिला के गाह (अब पाकिस्तान में) गांव में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा पाकिस्तान और फिर भारत में हुई। मनमोहन सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज से पढ़ाई की और यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड से डीफिल की पढ़ाई की। डा. सिंह ने अपने करियर की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संगठनों में की। राजनीति में आने से पहले वह सरकार में कई अहम प्रशासनिक पदों पर रहे, जिनमें मुख्य आर्थिक सलाहकार, रिजर्व बैंक के गवर्नर और योजना आयोग के उपाध्यक्ष जैसे अहम पद शामिल हैं।

राजनीतिक सफर

1980 के दशक में डा. सिंह का राजनीतिक सफर शुरू हुआ। वह 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री बने और इसके बाद 2004 से 2014 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे। उन्होंने ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की। मनमोहन सिंह को आर्थिक उदारीकरण के साथ ही सूचना का हक कानून, मनरेगा, आधार कार्ड और आरटीई के साथ ही अमरीका के साथ ही असैन्य परमाणु समझौते के लिए हमेशा याद किया जाएगा। मनमोहन सिंह के परिवार की बात करें तो उनके परिवार में पत्नी गुरशरण कौर और तीन बेटियां और उनके परिवार शामिल हैं।

पांच ऐतिहासिक उपलब्धियां

1. आर्थिक उदारीकरण का सूत्रपात (1991)

2. आईटी और टेलीकॉम क्रांति

3. ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा)

4. भारत-अमरीका परमाणु समझौता (2008)

5. शिक्षा में सुधार

डा.मनमोहन सिंह के शांत स्वभाव और साधारण विचारों के कारण लोग इन्हें काफी पसंद करते थे। यही वजह थी कि प्रधानमंत्री रहते हुए भी इनके 2013 के एफिडेविट में सिर्फ एक कार  मारुति 800 पाई गई। मनमोहन सिंह के पास एक 1996 मॉडल की मारुति 800 कार रही। इस कार इन्हें इतना लगाव था कि बीएमडब्ल्यू को भी छोड़ दिया था। मनमोहन सिंह के पास को मारुति सुजुकी 800 कार थी, उसमें 796 सीसी का 3 सिलेंडर वाला इंजन मिलता थी जो 37 बीएचपी की पावर और 59 एनएम का टार्क जनरेट करने में सक्षम था।हालांकि 2004 से 2014 तक देश के प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह बीएमडब्ल्यू 7 सीरीज कार भी थी, जोकि देश की सबसे ज्यादा सुरक्षित कार थी। योगी सरकार में मंत्री असीम अरुण ने डा. मनमोहन सिंह के साथ अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि डा. साहब की अपनी एक गाड़ी थी। प्रधानमंत्री आवास में मारुति 800 , चमचमाती काली बीएमडब्ल्यू के पीछे खड़ी रहती थी। वह बार-बार मुझसे कहते, ‘असीम, मुझे इस लग्जरी कार में चलना पसंद नहीं, मेरी गाड़ी तो यह मारुति 800 है। बता दें कि असीम एक जमाने में मनमोहन सिंह की एसपीजी टीम में बॉडीगॉर्ड थे।

उर्दू में लिखे होते थे भाषण

डा. मनमोहन सिंह के निधन पर उनके मीडिया सलाहकार रहे संजय बारु ने पूर्व प्रधानमंत्री याद करते हुए उनसे जुड़े तमाम किस्से साझा किए। संजय बारू के मुताबिक मनमोहन सिंह को हिंदी पढऩा नहीं आता था। उनके भाषण या तो गुरुमुखी में या फिर उर्दू में लिखे होते थे। 2014 में अपनी किताब में भी संजय बारु ने इस बात का जिक्र किया था कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हिंदी नहीं पढ़ पाते हैं। उनके सभी भाषण भी उर्दू में लिखे होते थे। उन्होंने किताब में लिखा था कि मनमोहन सिंह हिंदी में बात तो कर सकते थे, लेकिन कभी देवनागरी लिपि या हिंदी भाषा में पढऩा नहीं सीखा। हालांकि, उर्दू पढऩा उन्हें बखूबी आता था। यही कारण था कि, मनमोहन सिंह अपने भाषण अंग्रेजी में दिया करते थे। उन्हें अपना पहला हिंदी भाषण देने के लिए तीन दिन तक प्रैक्टिस करनी पड़ी थी।

दादा-दादी ने पाला

डा. मनमोहन सिंह पाकिस्तान से विस्थापित होकर हल्द्वानी आए थे। बचपन में ही उनकी मां का निधन हो गया था। दादा-दादी ने ही उनके पालन पोषण किया। उन्होंने गांव में लालटेन की रोशनी में पढ़ाई की। पिता चाहते थे कि वह डाक्टर बनें, इसलिए प्री-मेडिकल कोर्स में दाखिला लिया। हालांकि, कुछ महीनों बाद ही उन्होंने कोर्स छोड़ दिया।

संसद के बाहर बोले थे, हजारों जवाबों से अच्छी मेरी खामोशी

किस्सा 27 अगस्त, 2012 का है, जब संसद का सत्र चल रहा था। मनमोहन सरकार पर कोयला ब्लॉक आबंटन में भ्रष्टाचार का आरोप लगा। तब मनमोहन सिंह ने कहा कि कोयला ब्लाक आबंटन को लेकर कैग की रिपोर्ट में अनियमितताओं के जो आरोप लगाए गए हैं, वे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और सरासर बेबुनियाद हैं। उन्होंने लोकसभा में बयान देने के बाद संसद भवन के बाहर मीडिया में भी बयान दिया। उन्होंने उनकी ‘खामोशी’ पर ताना कहने वालों को जवाब देते हुए शेर पढ़ा, ‘हजारों जवाबों से अच्छी है मेरी खामोशी, न जाने कितने सवालों की आबरू रखी’।

अकसर पहनते थे नीली पगड़ी

मनमोहन सिंह अकसर नीली पगड़ी पहनते थे। इसके पीछे क्या राज था, यह उन्होंने 11 अक्तूूबर, 2006 को कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में खोला था। उन्हें ड्यूक ऑफ एडिनबर्ग, प्रिंस फिलिप ने डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया था। तब प्रिंस फिलिप ने अपने भाषण में कहा था कि आप उनकी पगड़ी के रंग पर ध्यान दे सकते हैं। इस पर मनमोहन सिंह ने कहा कि नीला रंग उनके अल्मा मेटर कैंब्रिज का प्रतीक है। कैंब्रिज में बिताए मेरे दिनों की यादें बहुत गहरी हैं। हल्का नीला रंग मेरा पसंदीदा है, इसलिए यह अकसर मेरी पगड़ी पर दिखाई देता है।

एक अनूठा गौरव

डा.मनमोहन सिंह को भारत में एक रुपए से 100 रुपए तक के करंसी नोटों पर हस्ताक्षर करने वाली एकमात्र हस्ती होने का अनूठा गौरव प्राप्त है। देश में एक रुपए के नोट पर वित्त सचिव और दो रुपए और उससे ऊपर के नोट पर आरबीआई गवर्नर के हस्ताक्षर होते हैं। डाक्टर ङ्क्षसह ने दोनों पदों पर कार्य किया था।17अक्तूबर, 2022 को कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में वोट डालने पहुंचे। 17 अक्तूबर, 2022 को ही कांग्रेस प्रेजिडेंशिल इलेक्शन हुआ था। इस दौरान 90 साल के मनमोहन सिंह चुनाव में वोट डालने कांग्रेस हैडक्वॉर्टर पहुंचे। इस दौरान गेट के अंदर दाखिल होते हुए वह लडख़ड़ा गए थे।

बतौर पीएम आखिरी प्रेस  कान्फ्रेंस तीन जनवरी, 2014

डा. मनमोहन सिंह ने तीन जनवरी, 2014 को बतौर पीएम आखिरी प्रेस कांफ्रेंस की थी। उन्होंने प्रेस कान्फ्रेंस कर अमरीका के साथ परमाणु करार की घोषणा की थी। आखिरी प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान उनके सामने 100 से ज्यादा पत्रकार-संपादक बैठे थे। यूपीए सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी हुई थी और सारे सवाल उसी से जुड़े थे। उस प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान डा. सिंह ने 62 अनस्क्रिप्टेड सवालों के जवाब दिए थे। तब मनमोहन सिंह ने खुद की आलोचना को लेकर कहा था कि उन्हें ‘कमजोर प्रधानमंत्री’ कहा जाता है, लेकिन ‘मीडिया की तुलना में इतिहास उनके प्रति अधिक उदार रहेगा।’

बेटियों ने बनाई अपनी अलग पहचान

मनमोहन सिंह की तीन बेटियां उपिंदर सिंह, अमृत सिंह और दमन सिंह हैं। पूर्व पीएम की तीनों बेटियों का भी अपने-अपने क्षेत्र का बड़ा नाम हैं।  मनमोहन सिंह की एक  बेटी उपिंदर सिंह एक जानी-मानी इतिहासकार और अशोका विश्वविद्यालय की डीन हैं। पूर्व में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की प्रमुख भी रह चुकी हैं। हाल ही में इनकी  प्राचीन भारत की अवधारणा- धर्म, राजनीति और पुरातत्व पर  बेहतरीन किताब  आई है। ये किताब दक्षिण एशिया के शुरुआती इतिहास के पुनर्निर्माण में हाल के दृष्टिकोणों और चुनौतियों पर प्रकाश डालती है। वह देश से लेकर विदेश तक की यूनिवर्सिटी में पढ़ चुकी हैं, पढ़ा चुकी हैं। कई रिसर्च कर चुकी हैं। मनमोहन सिंह की दूसरी बेटी अमृत सिंह एक मशहूर मानवाधिकार वकील हैं और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के लॉ स्कूल में प्रैक्टिस ऑफ लॉ की प्रोफेसर हैं। अमृत सिंह रूल ऑफ लॉ इम्पैक्ट लैब की कार्यकारी निदेशक भी हैं। दमन सिंह लेखन जगत में सक्रिय हैं और उन्होंने ही मनमोहन सिंह के जीवन पर किताब स्ट्रिक्टली पर्सनल मनमोहन एंड गुरशरण, ए मेमोयर लिखी है। इस किताब में मनमोहन सिंह के निजी जीवन के बारे में काफी जानकारी दी गई है। इसके अलावा दमन सिंह ने द सेक्रेड ग्रोव और नाइन बाइ नाइन भी लिखी हैं।

अमरीका से परमाणु डील पर अड़ गए थे मनमोहन 

डा. मनमोहन सिंह 2004 में प्रधानमंत्री बने। वह गठबंधन यूपीए सरकार चला रहे थे। भारत-संयुक्त राज्य अमरीका असैन्य परमाणु समझौते का लेफ्ट पार्टियों ने कड़ा विरोध किया। इसके बावजूद वह इस पर अड़े रहे। तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने मदद की। डा. सिंह कुछ दलों को मनाने में सफल रहे, जिन्होंने परमाणु समझौते के प्रति अपना विरोध वापस ले लिया। हालांकि, वामपंथी दलों ने इस सौदे का पुरजोर विरोध जारी रखा और सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। समाजवादी पार्टी ने पहले इसका विरोध करने में वाम मोर्चे का समर्थन किया था, लेकिन बाद में अपना रुख बदल दिया। मनमोहन सिंह की सरकार को विश्वास की परीक्षा से गुजरना पड़ा और वह 275-256 मतों से बच गई। डा मनमोहन सिंह और तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने 18 जुलाई, 2005 को सौदे की रूपरेखा पर एक संयुक्त घोषणा की और यह औपचारिक रूप से अक्तूूबर 2008 में लागू हुआ। यह भारत के लिए एक बड़ी जीत थी, जिसे अमरीका द्वारा परमाणु अछूत माना जाता था। इस सौदे ने न केवल भारत को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया, बल्कि इसने अमरीका को नागरिक कार्यक्रमों के लिए प्रौद्योगिकी के साथ भारत की सहायता करने की भी अनुमति दी।

ओबामा ने कहा था, जब मनमोहन बोलते हैं तो दुनिया सुनती है

आर्थिक उदारीकरण में मनमोहन सिंह के विशेष योगदान के लिए उन्हें पूरी दुनिया में याद किया जाता है। अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी एक बार मनमोहन सिंह की तारीफ करते हुए कहा था कि ‘जब मनमोहन सिंह बोलते हैं, तो पूरी दुनिया सुनती है।’ ओबामा ने अपनी किताब ‘ए प्रॉमिस लैंड’ में भी मनमोहन सिंह की जमकर तारीफ की थी। बराक ओबामा की यह किताब 2020 में आई थी।

किताब में ओबामा ने लिखा था कि मनमोहन सिंह भारत की अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण के इंजीनियर रहे हैं। उन्होंने लाखों भारतीयों को गरीबी के दुश्चक्र से बाहर निकाला है। ओबामा ने बताया था कि उनके और मनमोहन सिंह के बीच गर्मजोशी भरे रिश्ते थे। ओबामा ने लिखा कि मेरी नजर में मनमोहन सिंह बुद्धिमान, विचार और राजनीतिक रूप से ईमानदार व्यक्ति हैं। भारत के आर्थिक कायाकल्प के चीफ आर्किटेक्ट के रूप में पू्र्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह मुझे विकास के प्रतीक के रूप में दिखे।  छोटे सिख समुदाय का सदस्य जिसे कई बार सताया भी गया जो कि इस देश के सबसे बड़े पद तक पहुंचा और वे एक ऐसे विनम्र टेक्नोक्रेट थे  जिन्होंने लोगों का विश्वास उनकी भावनाओं को अपील कर नहीं जीता बल्कि लोगों को उच्च जीवन स्तर देकर वे कामयाब हुए। 2010 में मनमोहन सिंह से मुलाकात के बाद ओबामा ने कहा था कि जब भारत के प्रधानमंत्री बोलते हैं तो पूरी दुनिया सुनती है। यह मुलाकात तब हुई थी जब डा. मनमोहन सिंह जी-20 शिखर सम्मेलन में भाग लेने टोरंटो पहुंचे थे।


Monday, 22 December 2025

राजनीति के अजातशत्रु ' अटल '

 

अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय राजनीति का भीष्म पितामह भी कहा जाता है।उन्होंने करीब 5 दशक तक सियासत पर अपनी गहरी छाप छोड़ी। अटल भारतीय राजनीति के उन विरले राजनेताओं में से एक थे जिन्हें उनके विरोधी भी पूर्ण सम्मान देते थे। वे केवल एक प्रधानमंत्री नहीं बल्कि एक कवि, प्रखर पत्रकार, ओजस्वीवक्ता, दार्शनिक और एक संवेदनशील इंसान थे। उनका व्यक्तित्व इतना बहुआयामी था कि इसे एक लेख में समेटना असंभव है। उनकी सबसे बड़ी पहचान यह रही कि उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को एक क्षेत्रीय पार्टी से राष्ट्रीय स्तर की प्रमुख राजनीतिक शक्ति के केंद्र के रूप में उभारा और भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।

अटल भारतीय राजनीति के एक अद्वितीय और प्रभावशाली नेता रहे। उनका जीवन सिद्धांतों, नैतिकता और समर्पण का प्रतीक था। उन्होनें न केवल भारतीय राजनीति में अपनी अलहदा पहचान बनाई बल्कि वैश्विक स्तर पर भी सम्मान अर्जित किया। सही मायनों में कहा जाए तो अटल को राजनीति का अजातशत्रु कहा जाता है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी से द्वेष नहीं रखा और हर विचारधारा का तहे दिल से सम्मान किया शायद यही वजह रही उनके दरवाजे पर हर नेता, कार्यकर्ता और आमजन की दस्तक हुआ करती थी।

अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर 1924 को ग्वालियर, मध्यप्रदेश में हुआ। उनके पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी एक स्कूल शिक्षक थे जिन्होंने उन्हें शिक्षा और जीवन के मूल्यों की अहमियत सिखाई। अटल जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्वालियर से प्राप्त की और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने राजनीति विज्ञान में भी गहरी रुचि ली और एक अच्छे वक्ता के रूप में अपनी पहचान बनाई। उनकी बीए की शिक्षा ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज में हुई इसके बाद 1945 में उन्होंने कानपुर के डीएवी कॉलेज में राजनीति शास्त्र से एमए में दाखिला लिया। 1947 में एमए की पढ़ाई पूरी करने के बाद उसी कॉलेज में एलएलबी में एडमिशन लिया। उनके पिता ने भी उनके साथ यहां एलएलबी में दाखिला लिया हालांकि इस कोर्स को वह बीच में छोड़कर पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए।

अटल को छात्र जीवन से ही राजनीति में गहरी रुचि थी। विक्टोरिया कॉलेज में पढ़ाई के दौरान अटल कॉलेज के संघ मंत्री और उपाध्यक्ष भी बने। उस दौर में उनकी सक्रियता ग्वालियर में आर्य समाज आंदोलन की युवा शाखा आर्य कुमार सभा से शुरू हुई।1944 में वह इस सभा के महासचिव भी बने। अटल जी का परिवार पहले से ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से प्रेरित था यही वजह रही उस  छात्र दौर में में ही वह आरएसएस से जुड़ गए और तभी से तमाम भाषण , वाद -विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। भारत छोड़ो आंदोलन के दौर में उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उस दौर को याद करें तो यही वह दौर था जब भारत ब्रिटिश उपनिवेश का दंश झेलने के बाद आजाद हुआ था और देश बंटवारे के त्रासदी से गुजर रहा था। बंटवारे के चलते दंगों के कारण उन्होंने कानून की पढ़ाई को बीच में ही छोड़ दी। उन्होंने अपना करियर एक पत्रकार के रूप में शुरू किया। पत्रकार के रूप में उन्होंने लम्बे समय तक राष्ट्रधर्म, पांचजन्य और वीर अर्जुन आदि राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अनेक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया। बाबा साहब आप्टे से प्रभावित होकर उन्होंने 1940 से 1944 के दौरान संघ के अधिकारी प्रशिक्षण शिविर में हिस्सा लिया और 1947 में प्रचारक बन गए। 1951 में वह भारतीय जनसंघ में शामिल हो गए। उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय सचिव नियुक्त किया गया। इसी वर्ष 21 अक्टूबर को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने दक्षिणपंथी राजनीतिक दल की नींव रखी थी। डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पं दीनदयाल उपाध्याय और प्रोफेसर बलराज मधोक इसके संस्थापक संघ थे। इस दौरान संघ ने ब्रिटिश राज के शासनकाल के दौरान शुरू किए गए अपने काम को जारी रखने और अपनी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए एक राजनीतिक दल के गठन पर विचार करना शुरू कर दिया था। 1957 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए। सही मायनों में उनका राजनीतिक सफर भारतीय जनसंघ से जुड़कर शुरू हुआ। वे भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से प्रेरित थे और उनकी विचारधारा को अपनाया। इसके बाद उनका राजनीतिक करियर लगातार उन्नति की ओर बढ़ता गया।

 वे भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य रहे और पार्टी को एक नई दिशा देने में उनकी भूमिका अहम रही। वाजपेयी जी की सबसे बड़ी खूबी सहिष्णुता और समन्वय थी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन से जुड़कर भी उन्होंने कभी हिंदुत्व को संकीर्ण अर्थों में नहीं लिया। अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व बहुत ही मिलनसार था। उनके विपक्ष के साथ भी हमेशा सम्बन्ध मधुर रहे। 1975 में आपातकाल लगाने का अटल बिहारी वाजपेयी ने खुलकर विरोध किया था। 1977 के लोकसभा चुनाव के बाद देश में पहली बार मोरारजी देसाई के नेतृत्व में बनी गैर कांग्रेसी सरकार में अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने तो उन्होंने पूरे विश्व में भारत की छवि बनाई। विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र में हिंदी में भाषण देने वाले देश के पहले वक्ता बने। अपनी भाषण कला से दुनिया का दिल जीत लिया। अटल जी के भाषण के मुरीद सब थे, फिर चाहे वे विपक्ष का नेता ही क्‍यों ना रहा हो। तत्कालीन प्रधानमंत्री  जवाहरलाल नेहरू भी उनसे खासा प्रभावित रहते थे। एक बार नेहरू ने जनसंघ की आलोचना की तो अटल ने कहा मैं जानता हूं पंडित जी रोजाना शीर्षासन करते हैं। वह शीर्षासन करें, मुझे उससे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन मेरी पार्टी की तस्‍वीर उल्‍टी ना देखें। यह सुनते ही जवाहर लाल नेहरू ठहाका मारकर हंस पड़ें। भले ही नेहरू राजनीत‍ि में अटल के विरोधी रहे हों, लेकिन उनके मुरीद भी थे। एक बार नेहरू ने भारत यात्रा पर आए एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री से वाजपेयी को मिलवाते हुए कहा था इनसे मिलिए, ये विपक्ष के उभरते हुए युवा नेता हैं। हमेशा मेरी आलोचना करते हैं लेकिन इनमें मैं भविष्य की बहुत संभावनाएं देखता हूं। 1961 में जब नेहरू ने राष्‍ट्रीय एकता परिषद का गठन किया तो उसमें वाजपेयी को शामिल किया जबकि परिषद में में दिग्‍गज नेता और लोग शामिल थे। अटल उसमें सबसे युवा थे लोकसभा में चुनकर आये थे लेकिन 1962 में परिषद की पहली बैठक होनी थी तब वे लोकसभा के सदस्‍य नहीं रह गये थे। इसके बाद जब वाजपेयी बलरामपुर से चुनाव लड़े तो नेहरू उनके खिलाफ प्रचार करने नहीं गये। 29 मई 1964 मई 1964 में नेहरू के निधन के बाद वाजपेयी ने जो श्रद्धांजलि नेहरू को दी, उसे अपने आप में एक यादगार भाषण कहा जाता है। उनके भाषण से पूरा सदन भावुक ही हो गया था। 

उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे मजबूत व्यक्तित्वों के साथ काम किया और क्षेत्रीय क्षत्रपों को न केवल मजबूत किया बल्कि अपनी सरकार में हर किसी को काम करने की पूरी आज़ादी दी। 1998-2004 की एनडीए सरकार में 24 दलों का गठबंधन था जिसे पंचमेल खिचड़ी कहा गया लेकिन भारतीय राजनीती में गठबंधन युग को  उन्होंने कुशलता से संभाला। उनके कार्यकाल में भारत ने आर्थिक और बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाई। स्वर्णिम चतुर्भुज योजना हो या टेलीकॉम क्रांति, भारत को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र घोषित करना हर जगह उन्होनें अपने विजन से देश को नई दिशा देने का काम किया। सरकार और निजी क्षेत्र के बीच साझेदारी को बढ़ावा देने से लेकर सूचना प्रौद्योगिकी और इंटरनेट क्रांति की नींव अटल ने अपने मजबूत कार्यकाल में रखकर दुनिया में भारत की धाक जमाई। 

अटल ने तीन बार देश के पीएम पद की कमान संभाली। 1996 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और अटल 13 दिन तक देश के प्रधानमंत्री रहे। 1998 में वाजपेयी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने। 13 महीने के इस कार्यकाल में अटल बिहारी वाजपेयी ने सम्पूर्ण विश्व को भारत की धमक का अहसास कराया। अमेरिका और यूरोपीय संघ समेत कई देशों ने भारत पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए लेकिन उसके बाद भी भारत उनके कुशल नेतृत्व में भारत किसी के आगे नहीं झुका। अटल जी ने भारत-पाकिस्तान संबंधों में भी सकारात्मक बदलाव की कोशिश की। लाहौर बस यात्रा दुश्मन देश के साथ शांति की पहल का सबसे बड़ा उदाहरण है। मुशर्रफ के साथ पाक के साथ सम्बन्ध सुधारने की भरसक कोशिश अटल ने की। उन्होनें  1999 में पहली बार दिल्ली से लाहौर तक बस सेवा शुरू कराई और पड़ोसी और आगरा समिट करवाकर पाक के साथ नए सम्बन्ध बनाने हेतु एक नए युग की शुरुआत की लेकिन ये मित्रता अधिक दिनों तक नहीं चल सकी। पाकिस्तानी सेना ने कारगिल क्षेत्र में बड़ी घुसपैठ की जहाँ  पाक को हार का सामना करना पड़ा। इस विजय का श्रेय अटल बिहारी वाजपेयी के खाते में गया जिसके बाद 1999 के लोकसभा के आम चुनावों में भाजपा फिर सबसे बड़ी पार्टी बनी और मिली जुली सरकार बनायी। कारगिल युद्ध के दौरान भी उन्होंने पाकिस्तान को संदेश दिया कि हम युद्ध नहीं चाहते, लेकिन अगर मजबूर किया गया तो जवाब देंगे।

अटल की विदेश नीति जबरदस्त रही। उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद भारत ने कई वैश्विक मंचों पर अपनी ताकत दिखाई। उनके नेतृत्व में भारत वैश्विक राजनीति के केंद्र में स्थापित हुआ जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा को प्राथमिकता मिली। अटलबिहारी वाजपेयी  गठबंधन की राजनीती के सबसे बड़े जनक रहे। दो दर्जन से अधिक दलों को साथ लेकर सरकार चलाना बहुत कठिन काम उस दौर में समझा गया लेकिन अटल जी ने अपनी दूरदृष्टि से यह संभव कर दिखाया। उनकी सरकार ने गठबंधन की राजनीति को एक नई राह दिखाई। अटल में सबको साथ लेकर चलने की जबरदस्त कला थी जो उन्होनें अपनी गठबंधन सरकार के कुशल नेतृत्व के माध्यम से पूरी दुनिया को दिखाया। अटल बिहारी वाजपेयी का व्यक्तित्व एक उदार चरित्र का प्रतीक था। उनके भाषणों में गहरी सोच और गहराई दिखाई देती थी साथ ही उनका कवि दिल इस भाषण की कला में चार चाँद लगा देता था। अटल समाज के वंचित और शोषित तबके की आवाज को मुखरता के साथ उठाया करते थे। उन्होनें अपने पूरे जीवन में राजनीति को जनसेवा के एक साधन के रूप में देखा। उनकी राजनीती में सुशासन,के गुण दिखाई देते थे। वे अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के प्रति भी सम्मान का भाव रखते थे शायद यही वजह रही कि उन्हें राजनीति के अजातशत्रु कहा गया। अटल ने भारत के चारों कोनों को सड़क मार्ग से जोड़ने के लिए तत्कालीन केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री बी. सी. खंड़ूडी के नेतृत्व में स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना की शुरुआत की। उनकी सरकार ने सुशासन को सही मायनों में साबित करके दिखाया और गाँव के अंतिम छोर तक विकास की किरण पहुंचाने का काम किया। अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता के लिए नहीं, बल्कि देश के लिए जीते थे।

उनके प्रधानमंत्रित्व काल में भारत-अमेरिका संबंधों में नया अध्याय जुड़ा जब 2000 में बिल क्लिंटन की भारत यात्रा हुई और 2001 में जॉर्ज बुश के साथ निकटता से संबंधों में बड़ी गर्मजोशी आई जिससे परमाणु समझौते की नींव पड़ी जो बाद में मनमोहन सरकार में पूर्ण हुआ। अटल की सरकार ने के रहते देश में हर क्षेत्र में विकास की नई गौरवगाथा लिखी गई। 2004 में जब लोकसभा चुनाव हुआ तब उनके नेतृत्व में शाइनिंग इंडिया और फील गुड फैक्टर का नारा देकर चुनाव लड़ा गया लेकिन इन चुनावों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बनी और भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा। इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने राजनीति से सन्यास ले लिया।

अटल नेतृत्व क्षमता ने देश की राजनीति को एक नई ऊँचाई पर पहुंचाया। वे भारतीय राजनीति के ऐसे सितारे कहे जा सकते हैं जिनकी चमक और धमक देश की राजनीती में हमेशा बनी रहेगी। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 2015 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया। अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति में एक ऐसे नेता थे जिन्होंने कविता की भाषा में राजनीति की और राजनीति की भाषा में कविता की। उन्होंने कट्टरता से दूर रहकर समावेशी राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व किया। उनकी सबसे बड़ी विरासत यह रही कि उन्होंने भारत को वैश्विक मंच पर एक आत्मविश्वासी और सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।

अटल का 16 अगस्त 2018 को 93 साल की उम्र में दिल्ली के एम्स में इलाज के दौरान निधन हो गया। उनका व्यक्तित्व हिमालय के समान विराट था। विरोधी को भी साथ ले कर चलने की उनकी भावना का हर कोई मुरीद था। सही मायनों में अगर कहा जाए तो  अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष थे। देश अटल जी के योगदान को कभी भुला नहीं पायेगा। वाजपेयी जी एक संवेदनशील कवि, एक राष्ट्रवादी पत्रकार, जननेता, राष्ट्रनायक थे।आज जब हम राजनीति में नफरत, तिरस्कार और ध्रुवीकरण देखते हैं तब अटल का व्यक्तित्व संयम, गरिमा, मानवता और देशभक्ति का जीता-जागता प्रतीक बन जाता है। भारत ने कई प्रधानमंत्री देखे लेकिन अटल सरीखा दूसरा  नेता नहीं देखा।

 

Sunday, 7 December 2025

मोहन के विरासत से विकास मंत्र से अब बुंदेलखंड को मिलेगी नई रफ्तार

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने जब से प्रदेश की कमान संभाली है, तब से उनकी कार्यशैली और दूरदर्शिता ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। जल की कमी, खराब सड़कें और औद्योगिक पिछड़ापन दशकों से बुंदेलखंड की सबसे बड़ी त्रासदी रहे हैं। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पद संभालते ही प्रदेश के हर क्षेत्र को समान रूप से विकसित करने का संकल्प लिया है। डॉ. मोहन यादव ने सत्ता संभालते ही बुंदेलखंड को अपनी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर रखा। बुंदेलखंड क्षेत्र, जो दशकों से उपेक्षा और पिछड़ेपन का दंश झेलता आ रहा था, अब मोहन के नेतृत्व में एक नई उड़ान भरने को तैयार है।


बुंदेलखंड की सबसे बड़ी समस्या जल संकट रहा है। इसे प्राथमिकता देते हुए मोहन सरकार ने अपने कार्यकाल में कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को गति दी है। एक तरफ केन-बेतवा लिंक परियोजना को अभी तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है वहीँ दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह और सागर जिलों में कई सिंचाई योजनाओं को मंजूरी दी गई है। इसी प्रकार नदियों और तालाबों के जीर्णोद्धार के साथ-साथ जल संग्रहण संरचनाओं का निर्माण भी तेज हुआ है। पिछले दो वर्षों में सरकार ने न केवल केंद्रीय योजनाओं को गति दी, बल्कि राज्य स्तर पर अभूतपूर्व प्रयास किए हैं। 2024 में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना सरीखी राष्ट्रीय परियोजना को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने केंद्र और राज्य स्तर पर समन्वय स्थापित कर तेजी से आगे बढ़ाया है। इस परियोजना से बुंदेलखंड के 13 जिलों में 10.62 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। आने वाले दिनों में नर्मदा-सोनार लिंक परियोजना भी बुंदेलखंड के लिए वरदान साबित होगी जिससे यहाँ का जलसंकट हमेशा के लिए दूर हो जाएगा। सोनार नदी को नर्मदा से जोड़ने का सर्वे जल्द शुरू होगा। इससे बुंदेलखंड की सूखी नदियां कभी न सूखेंगी और क्षेत्र की धरती पहले से कहीं अधिक उपजाऊ बनेगी। इसी तरह से पार्वती-कालीसिंध-चंबल नदी जोड़ो परियोजना और ताप्ती बेसिन मेगा रिचार्ज परियोजना भी बुंदेलखंड के पानी के संकट को समाप्त कर देंगी। महाराष्ट्र के साथ एमओयू पर हस्ताक्षर हो चुके हैं जिससे बुंदेलखंड के समूचे अंचल में पेयजल और सिंचाई की समस्या हल हो जाएगी। 

बुंदेलखंड की भौगोलिक स्थिति ऐसी रही है कि यहां पहुंचना हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इसका कायाकल्प करने की ठानी दशकों से सूखा और पिछड़ापन इस क्षेत्र की पहचान बने थे अब इस क्षेत्र में पिछले डेढ़ वर्षों में सड़क, रेल और हवाई संपर्क ने अभूतपूर्व विकास किया है। ख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बुंदेलखंड को कनेक्टिविटी की नई गति दी है। सागर-दमोह-कटनी-लखनादौन को जोड़ने वाली चार लेन सड़क परियोजना को मंजूरी हो या टीकमगढ़ से सागर तक नई रेल लाइन और छतरपुर-टीकमगढ़-झांसी रेल लाइन का विस्तार कनेक्टिविटी में अब बुंदेलखंड किसी भी तरह से पीछे नहीं है। खजुराहो,दतिया सागर और ग्वालियर एयरपोर्ट के उन्नयन और नए हवाई अड्डों की कार्ययोजना ने बुंदेलखंड की हवाई कनेक्टिविटी को मजबूत किया है। डेढ़ दशक से रुके प्रोजेक्ट अब रिकॉर्ड समय में पूरे हो रहे हैं। बुंदेलखंड की कनेक्टिविटी बेहतर होने से यहाँ पर्यटन, उद्योग और रोज़गार के नए द्वार खुल रहे हैं। बेहतर कनेक्टिविटी होने से यहाँ पर अब परियोजनाएं न केवल आवागमन को आसान बनाएंगी, बल्कि पर्यटन और व्यापार को भी बढ़ावा देंगी।

 मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की दूरदर्शिता और दृढ़ संकल्प ने बुन्देलखंड में शिक्षा, स्वास्थ्य क्षेत्र में कई ऐतिहासिक पहल की हैं। चिकित्सा महाविद्यालयों में एमबीबीएस और पीजी मेडिकल सीटों की संख्या में वृद्धि से लेकर तकनीकी रूप से उक्त स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार तक राज्य ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। एक तरह जहाँ पन्ना, दमोह और टीकमगढ़ में नए मेडिकल कॉलेज शुरू हुए हैं वहीँ सागर में कैंसर हॉस्पिटल की घोषणा के साथ ही हर जिले में उच्च स्तरीय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना जैसे कदम बुंदेलखंड के युवाओं को को घर के पास ही अच्छी शिक्षा और इलाज की सुविधा देंगे।प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत के मिशन के साथ कदम से कदम मिलाते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बुंदेलखंड को शिक्षा, स्वास्थ्य क्षेत्र को सशक्त बनाने के लिए जो कार्य कर रहे  हैं, वे आने वाले वर्षों में  बुंदेलखंड की सूरत को बदलकर रख देंगे।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बुंदेलखंड को निवेश के लिए आकर्षक गंतव्य बनाने पर जोर दे रही है। इसी कड़ी में सागर में रीजनल इंडस्ट्री कॉन्क्लेव आयोजित किया जा चुका है। प्रदेश में औद्योगिक विकास को प्रोत्साहित करना और निवेशकों को आकर्षित करना इस आयोजन का मुख्य लक्ष्य था। इस कॉन्क्लेव में लगभग 23,000 करोड़ के निवेश प्रस्ताव प्राप्त हुए और 27,800 से अधिक रोजगार के अवसर पैदा हुए। डिफेंस कॉरिडोर के तहत टीकमगढ़ और झांसी में कई बड़े प्रोजेक्ट पर कार्य प्रगति पर है वहीँ खजुराहो, ओरछा, पन्ना टाइगर रिजर्व और चंदेरी के पर्यटन सर्किट को विश्वस्तरीय बनाने की कार्ययोजना पर राज्य सरकार काम कर रही है। बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे जैसे बड़े प्रोजेक्ट से यह क्षेत्र दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर से जुड़ेगा जिससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और पलायन की समस्या कम होगी।

विरासत से विकास के अपने मिशन और सांस्कृतिक धरोहरों को नई ऊंचाइयों पर ले जाते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अगुवाई में राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक 9 दिसंबर को खजुराहो में आयोजित होगी। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में विख्यात खजुराहो की प्राचीन मंदिर वास्तुकला और चंदेल राजवंश की अमर विरासत के बीच होने वाली यह बैठक न केवल प्रशासनिक समीक्षा का मंच बनेगी, बल्कि 'विरासत से विकास' के संकल्प को मजबूत करने का प्रतीकात्मक संदेश भी देगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'विरासत भी और विकास भी' के दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में यह कदम मध्य प्रदेश सरकार की प्रतिबद्धता को उजागर करता है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पूर्व की बैठकों में बार-बार जोर दिया है कि राज्य का विकास प्राचीन गौरव को नष्ट किए बिना ही संभव है। पचमढ़ी और इंदौर जैसी पिछली कैबिनेट बैठकों की तर्ज पर खजुराहो में भी सांस्कृतिक पुनरुत्थान और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के संयोजन पर विशेष फोकस होगा। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए और स्थानीय कारीगरों के लिए कौशल विकास योजनाओं पर महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं। यह आयोजन न केवल प्रशासनिक दक्षता को परखेगा, बल्कि मध्य प्रदेश को 'विरासत से विकास' की मिसाल के रूप में स्थापित करेगा।मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का बुंदेलखंड के प्रति विशेष लगाव और संवेदनशीलता साफ दिखाई देती है। वे स्वयं अधिकारियों को समय-सीमा में इस इलाके की कई परियोजनाएं पूरी करने के निर्देश दे रहे हैं। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की दूरगामी सोच और त्वरित निर्णय लेने की शैली ने यह विश्वास जगाया है कि अब बुंदेलखंड पिछड़ापन का पर्याय नहीं रहेगा। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में यह क्षेत्र न केवल मध्यप्रदेश बल्कि पूरे देश के लिए विकास का नया मॉडल बनेगा।