हमारे हिन्दू पंचांग में एक वर्ष में कुल बारह संक्रांतियां होती हैं। मकर संक्रांति और कर्क संक्रांति दो अयनी संक्रांति हैं जिन्हें क्रमशः उत्तरायण संक्रांति और दक्षिणायन संक्रांति के नाम से भी जाना जाता है। इन्हें पंचांग में शीतकालीन संक्रांति और ग्रीष्म संक्रांति के रूप में भी माना जाता है। जब सूर्य उत्तरी गोलार्ध में जाता है, तो छह महीने की समय अवधि को उत्तरायण कहते हैं और जब सूर्य दक्षिणी गोलार्ध में जाता है, तो शेष छह महीने की समय अवधि को दक्षिणायन कहते हैं। मेष और तुला संक्रांति दो विषुव संक्रांति हैं जिन्हें क्रमशः वसंत संपत और शरद संपत के नाम से भी जाना जाता है। इन दोनों संक्रांतियों के लिए, संक्रांति से पहले और बाद की पंद्रह घटी के क्षणों को कार्यों के लिए शुभ माना जाता है। सिंह , कुंभ, वृषभ और वृश्चिक संक्रांति, चार विष्णुपदी संक्रांति हैं। इन सभी चार संक्रांतियों के लिए संक्रांति से पहले के सोलह घटी क्षणों को कार्यों के लिए शुभ माना जाता है। मीन, कन्या, मिथुन और धनु संक्रांति, चार षडशीत-मुखी संक्रांति हैं। इन सभी चार संक्रांतियों के लिए, संक्रांति के बाद के सोलह घटी क्षणों को कार्यों के लिए शुभ माना जाता है।
मकर संक्रांति का उत्सव भगवान सूर्य की पूजा के लिए विशेष रूप से समर्पित है। भक्त इस दिन भगवान सूर्य की पूजा कर आशीर्वाद मांगते हैं। इस दिन से वसंत ऋतु की शुरुआत और नई फसलों की कटाई शुरू होती है। मकर संक्रांति पर भक्त यमुना, गोदावरी, सरयू और सिंधु नदी में पवित्र स्नान करते हैं और भगवान सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस दिन यमुना स्नान और जरूरतमंद लोगों को भोजन दालें, अनाज, गेहूं का आटा और ऊनी कपड़े दान करना शुभ माना जाता है। भगवान सूर्य जब धनु राशि को छोड़ कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं तो इसे उत्तरायण काल कहा जाता है। इस अवसर पर प्राणी जगत में एक नये परिवर्तन की शुरूआत होती है जिसे जीवंत बनाने के लिए त्यौहार एवं उत्सव आयोजित किये जाते हैं। मकर संक्रांति में वसुधैव कुटुम्बकम की पावन भावना सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार की तरह रहने का संदेश देती है। उत्तरायण काल से सूर्य की उत्तरायण गति प्रारंभ होती है इसलिए इसको उत्तरायणी भी कहते हैं। उत्तर भारत में इसे मकर संक्रांति, तमिलनाडु में पोंगल, कर्नाटक, केरल। आंध्र प्रदेश में इसे केवल ‘संक्रांति कहते हैं। हरियाणा और पंजाब में इसे लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन, भगवान विष्णु ने राक्षसों के सिर काटकर और उन्हें एक पहाड़ के नीचे गाड़ दिया था और इस प्रकार उनके आतंक को हराया था जो नकारात्मकता के अंत का प्रतीक था। इसलिए यह दिन साधना, आध्यात्मिक अभ्यास या ध्यान के लिए बहुत अनुकूल है क्योंकि इस दिन वातावरण को 'चैतन्य', अर्थात 'ब्रह्मांडीय तेज़' से भरा हुआ माना जाता है। इसके अलावा मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव के प्रति एक विशेष पूजा भी अर्पित की जाती है जो अंधेरे पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। भक्त कृतज्ञता व्यक्त करने और समृद्ध फसल और उत्तरी गोलार्ध में सूर्य के प्रवेश के साथ सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए, आशीर्वाद मांगने हेतु अनेक अनुष्ठान करते हैं। मकर संक्रांति को भारत के विभिन्न हिस्सों में उत्तरायण के नाम से भी जाना जाता है।
देवभूमि उत्तराखण्ड में मकर संकांति की पहली रात्रि को जागरण की परम्परा है। इस दिन सात्विक भोजन के उपरान्त रात्रि काल में लोग आग जलाकर उसके चारों ओर बैठ जाते हैं और अपनी प्राचीन परम्परा एवं मर्यादाओं पर आधारित कथा-कहानियां तथा आदर्शों को याद करते हैं। प्रातःकाल नदियों, तालाबों, जल बााराओं पर जाकर सूर्योदय से पूर्व स्नान करते हैं और अपने पूर्वजों की पूजा करते हुए बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लिया जाता है। कूर्मांचल क्षेत्र में इसे महारानी जिया की जयन्ती के रूप में तथा घुघुतिया त्यौहार के रूप में भी मनाया जाता है। भगवान भास्कर के मकर में प्रवेश करने पर उत्तराखंड के कुमाऊं में घुघुतिया त्यार मनाया जाता है। मकर संक्रांति पर पवित्र नदियों में स्नान करने के साथ दान व पुण्य का महत्व तो है। कुमाऊं में मीठे पानी में से गूंथे आटे से विशेष पकवान बनाने का भी चलन है। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल आदि क्षेत्रों में इस दिन गोधूलि के बाद आग जलाकर अग्नि पूजा करते हुए तिल, गुड़, चावल और भुने हुए मक्के की आहुति दी जाती है। इस सामग्री को तिलचौली कहा जाता है। इस अवसर पर लोग मूंगफली, तिल की गजक, रेवड़ियां आपस में बांटकर खुशियां मनाते हैं। बहुएं घर-घर जाकर लोकगीत गाते हुए मंगल गीत गाती हैं। नई बहू और नवजात बच्चे के लिए लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इसके साथ पारंपरिक मक्के की रोटी और सरसों के साग का भी लुत्फ उठाया जाता है। उत्तर प्रदेश में यह पर्व माघ मेले के नाम से जाना जाता है। 14 जनवरी से प्रयागराज में हर साल माघ मेले की शुरूआत होती है। 14 दिसम्बर से 14 जनवरी का समय खर मास के नाम से जाना जाता है। 14 जनवरी यानी मकर संकांति से अच्छे दिनों की शुरूआत होती है। माघ मेला पहला स्नान मकर संतंति से शुरू होकर शिवरात्रि तक चलता है। संक्रांति के दिन स्नान के बाद दान करने का चलन है। मकर संक्रांति के अवसर पर उत्तराखण्ड के सभी तीर्थों में बड़ा मेले लगते हैं जिसमें बागेश्वर का उत्तरायणी मेला, गौचर मेला, देव प्रयाग मेला आदि प्रसिद्ध हैं। गंगा, यमुना, सरयू, गोमती, रामगंगा, कौशिकी गंगा, अलकनंदा, भागीरथी आदि सभी नदियों के पवित्र तटों पर स्नान, बयान, साधना व अनुष्ठान करने की परम्परा है। अनेक नदी तटों पर मेले भी लगते हैं। पुण्य स्नान रामेश्वर, चित्रशिला व अन्य स्थानों में भी होते हैं। इस दिन गंगा स्नान करके तिल के मिष्ठान आदि को ब्राह्मणों व पूज्य व्यक्तियों को दान दिया जाता है। उत्तर भारत के अनेक भागों में इस दिन खिचड़ी सेवन एवं खिचड़ी दान का अत्यधिक महत्व होता है। महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संकांति पर कपास, तेल, नमक आदि चीजें अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तिल, गुड़ के हलवे के बांटने की प्रथा भी है। लोग एक दूसरे को तिल और गुड़ देते हैं और देते समय बोलते हैं- ‘‘तिल गूल बया आणि गोड़ गोड़ बोला’ अर्थात तिल गुड़ लो और मीठा मीठा बोलो। इस दिन महिलाएं आपस में तिल, गुड़, रोली और हल्दी बांटती हैं। असम में मकर संकांति को माघ-बिहू अथवा भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं। राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास का आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। साथ ही महिलाएं किसी भी सौभाग्यसूचक वस्तु का चौदह की संख्या में पूजन एवं संकल्प कर दान देती हैं। अतः मकर संकांति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखती है। बंगाल में इस पर्व पर स्नान पश्चात तिल दान करने की प्रथा है। यहां गंगासागर में प्रति वर्ष विशाल मेला लगता है। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी। मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए व्रत किया था। इस दिन गंगासागर में स्नान-दान के लिए लाखों लोगों की भीड़ लगी होती है। लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं। वर्ष में केवल एक दिन मकर संक्रांति को यहां लोगों की अपार भीड़ होती है इसीलिए कहा जाता है- ‘सारे तीरथ बार-बार गंगा सागर एक बार।’
तमिलनाडु में इस त्यौहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाते हैं। प्रथम दिन भोगी-पोंगल, द्वितीय दिन सूर्य-पोंगल, तृतीय दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल, चौथे दिन कन्या-पोंगल। इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकट्ठा कर जलाया जाता है दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिए स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्यदेव को प्रसाद भी चढ़ाया जाता है। उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। इस दिन बेटी और जमाईं राजा का विशेष रूप से स्वागत किया जाता है।
मकर संक्रांति का त्यौहार कृषि से जुड़ा है।यह कटाई के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है। यह दिन, भारत में किसानों के लिए बहुत महत्व रखता है। इस त्यौहार को तमिलनाडु में पोंगल, असम में बिहू, पंजाब में लोहड़ी, उत्तरी राज्यों में माघ बिहू और केरल में मकर विलाक्कू के रूप में मनाया जाता है। किसान मानते हैं कि जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है तो यह सर्दियों के मौसम के अंत का प्रतीक होता है। यह आने वाले गर्म और लंबे दिनों की शुरुआत का भी प्रतीक है। यह खेतों में शीतकालीन फ़सलों के पकने के लिए भी अनुकूल समय होता है। इस त्यौहार से जुड़ी मुख्य फ़सल गन्ना है। इस त्यौहार के दौरान, तैयार किए जाने वाले कई पारंपरिक व्यंजनों में गुड़ का मुख्य रूप से उपयोग किया जाता है जो गन्ने से बनाया जाता है। इस फ़सल उत्सव को मनाने के लिए, भक्त, पवित्र नदियों, मुख्य रूप से गंगा में डुबकी लगाते हैं और इसके किनारे बैठकर तप, ध्यान और अनेक अनुष्ठान भी करते हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूंकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं अतः इस दिन को मकर संतंति के नाम से जाना जाता है। महाभारतकाल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थी।
शास्त्रों के अनुसार, दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता का प्रतीक तथा उत्तरायण को देवताओं का दिन अर्थात सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है इसलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद् तर्पण आदि धार्मिक क्रियाकलापों का विशेष महत्व है। मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा स्नान एवं दान को अत्यंत शुभ माना गया है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग और गंगा सागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं लेकिन कर्क व मकर राशियों के जातकों में सूर्य का प्रवेश धार्मिक दृष्टि से अत्यंत फलदायक है। भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है। मकर संक्रांति से पहले सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है अर्थात भारत से दूर होता है। इसी कारण यहां रातें बड़ी एवं दिन छोटे होते हैं। मकर संक्रांति के बाद से सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध की ओर आना शुरू हो जाता है। अतः इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं और गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है।
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