शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

खतरे के मुहाने पर उत्तराखंड की सरोवर नगरी


बीते बरस जून में केदारनाथ में  आये जलजले की यादें अभी भी जेहन में बनी हुई हैं ।  पुरानी  यादो से आज भी मन बाहर नहीं निकल पाता क्युकि केदारघाटी की इस आपदा में कई लोगो ने उसके अपनों को न केवल खोया बल्कि इस आपदा का सीधा असर उत्तराखंड के पर्यटन उद्योग पर पड़ा जिसके चलते आज भी राज्य में पर्यटक आने से कतरा रहे हैं  । आपदा को लेकर सबसे संवेदनशील रहे उत्तराखंड की चिंता इस दौर में खुद आपदा प्रबंधन विभाग ने बढ़ाई हुई है  क्युकि  उसके अनुसार  सरोवर नगरी नैनीताल  के नेस्तनाबूद होने का खतरा मडरा रहा है  । संकट की भयावहता का अंदाजा खुद राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग की  रिपोर्ट से लगाया जा सकता है ।  इसे  अगर आधार बनाए  तो सरोवर नगरी के  तकरीबन  सौ साल पुराने  चार  से साढ़े  चार सौ मकान कभी भी जमींदोज हो सकते हैं। इन आशियानों  को  मरम्मत  की जरूरत है लेकिन शासन-प्रशासन इस खतरे को लेकर बिलकुल भी परेशान नहीं दिखायी  दे रहा ।  आलम यह है  सारे नियमों को ताक पर रख कर  भूगर्भीय दृष्टि से संवेदनशील पहाड़ी  भूमि पर यहाँ  बेतरतीब आवासीय निर्माण जोर शोर से जारी है ।
 

अगर यह सब बदस्तूर  जारी रहा तो सरोवर नगरी नैनीताल को  भी आने वाले दिनों में किसी गम्भीर संकट का सामना कर सकता  है । खास तौर से यह समय ऐसा है जब भीषण कड़ाके की ठण्ड ने पूरे प्रदेश में अपनी दस्तक दी हुई है और बदरा आकाश में छाये हुए है ।  आज भी इस पूरे इलाके में कई लोग बड़ी तादात  में  जर्जर हो चुके मकानों में  अपना आशियाना बनाये हुए रह रहे हैं ।  प्रदेश आपदा प्रबंधन विभाग की सर्वे रिपोर्ट  के अनुसार नगर के सौ साल से अधिक पुराने 450  मकानों की हालत बद से  बदतर हो चुकी है लेकिन इसके बाद भी लोग इन भवनो से अपना मोह नहीं छोड़  पाये हैं ।  भवनों को भूकंप की दृष्टि से  संवेदनशील होने के चलते जहाँ सरकार  के सामने मुश्किलें  खड़ी  होती दिखायी दे रही हैं वहीँ  आपदा प्रबंधन विभाग के खुद कान खड़े हो गए है।  दूसरी ओर  अनियंत्रित तरीके से हो रहे  निर्माण को लेकर भी नैनीताल के सामने स्थिति  असहज हो चली है ।  यह निर्माण यहां की ऐसी पहाड़ियों पर हो रहे हैं जिनको आईआईटी  इंजीनियरों  तक ने अपनी रिपोर्ट में असुरक्षित घोषित किया  हुआ है।  इसके बावजूद सरकारी और निजी निर्माण कम्पनिया  धड़ल्ले से यहां कंक्रीट के महल खड़े कर रही हैं लेकिन इन सबके बीच  गौर करने लायक बात यह है सूबे के मुखिया विजय बहुगुणा  ने केदारघाटी की आपदा से कोई सबक नहीं लिया है शायद यही वजह है उत्तराखंड में आज भी माफिया और सरकार  के कॉकटेल ने प्रकृति के सामने ऐसा संकट खड़ा कर दिया है जो आने वाले समय में कभी भी कोई बड़ा खतरा उत्पन्न कर सकता है । नैनीताल के बारे में यह आशंकाएं निर्मूल नहीं हैं क्युकि  पर्यावरणविदो ने कई सामाजिक कार्यकर्ताओ की राय में सुर मिलाते हुए  सर्वोच्च न्यायालय में ऐसे मामलों को लेकर एक जनहित याचिका कुछ बरस पहले  दायर की थी। इसकी सुनवाई के दौरान न्यायालय ने  नैनीताल को न केवल संवेदनशील माना बल्कि  कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो रहे नैनीताल की वादियो को लेकर भी सरकार की नीति को लेकर पहली बार सवाल भी उठाये थे ।  यही नहीं उस दौर में  सर्वोच्च न्यायालय ने नैनीताल ग्रुप हाउसिंग पर भी पूर्णतः प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद भी निर्माण यहाँ जारी ही रहे ।
 


नैनीताल में खतरे की जद  में आ रहे   साढ़े चार सौ से अधिक मकानो को  एक सदी से अधिक समय पूरा हो चुका है।  बीते बरस यहां हुए एक  सर्वे में यह आकड़ा सामने आया है ।  भूकंप की दृष्टि से ऐसे  कई और भवनों को अति संवेदनशील माना जा रहा है। बीते  दिनों उत्तराखंड  सरकार ने भी  आपदा प्रबंधन विभाग के तहत  नगर के भवनों की रिपोर्ट सार्वजनिक की है। इसमे से साढ़े  चार सौ  भवन ऐसे पाए गए जो सन 1890  से भी पहले के बने हुए हैं। । इनमें से अधिकांश भवनो को  अति संवेदनशील श्रेणी में रखा गया है।गौरतलब है कि भूकंप और भू-स्खलन की दृष्टि से नैनीताल अति संवेदनशील श्रेणी में आता है। पुराने दौर के पन्ने  टटोलें  तो नैनीताल की संवेदनशीलता को  ब्रिटिश शासको ने भी भांप लिया था शायद  यही वजह रही उन्होंने वक्त की नजाकत को अपने अंदाज में भांपकर  कई  कठोर कदम भी  उठाए । 1817 में यहां पर पहली बार आए सैटलमेंट कमिशनर जी डब्ल्यू को नैनीताल की संस्कृति और सभ्यता से बेहद लगाव था। उनका तो   मानना था कि अगर कोई विदेशी यहां पर पहुंचा तो इस स्थल की पवित्रता भंग हो जाएगी और संभवतः आने वाले समय में इसके अस्तित्व को खतरा पैदा हो जाएगा। उसकी यह बात अब सोलह आने सच साबित हो रही है क्युकि माफियाओ और राजनेताओ की एक बड़ी लॉबी  पहाड़ो में बाहरी लोगो को बसाने के लिए इस दौर में एक से बढ़कर एक  सपने दिखा रही है शायद यही वजह है इस दौर में पहाड़ में जमीन के दामो ने कुलाचे मारकर नया इतिहास गढ़ा  है और वहीं  पहली बार पहाड़ी इलाको से लेकर तराई के कई इलाको पर भू माफियाओ की गिद्ध दृष्टि लगी हुई है जहाँ हर किसी की नजर बाजार में  बड़े मुनाफे को कमाने की हो चली है । इसी की आड़ में इन इलाको में रिजॉर्ट  खोलने का धंधा भी जोर शोर से चल रहा है जहाँ हर कोई बहती गंगा में डुबकी लगाना चाहता है । 


 नैनीताल वर्ष 1880  में नैनीताल भूकंप की त्रासदी देख  चुका है। इस दौरान हुए भयानक भूस्खलन में  151  लोगों की मौत हो गई थी। इस घटना के बाद ब्रिटिश शासकों ने शहर की संवेदनशीलता को देखते हुए रखरखाव के व्यापक कार्यक्रम शुरू किये तथा एक सुरक्षा कमेटी का गठन किया। पूरे शहर में नालों का जाल बिछा दिया गया।  अस्सी  के दशक में यहां कई  नाले बनाये गए  जिनका  उद्देश्य था कि इनके जरिये  बरसात का पानी सीधे झील में चला जाये और बरसाती पानी जमीन में रिसकर भूस्खलन की पुनरावृत्ति न कर सके लेकिन चमक धमक और सैर सपाटे के लिए जाने जानी वाली इस नगरी की सुंदरता की परवाह इस दौर में  किसी को नहीं है । आपदा से बचाव की कोई तैयारी  नहीं है क्युकि हमें  आपदा से पहले जागना नहीं आता । क्या कीजियेगा इस दौर में सारी  कवायद अपनी कुर्सी बचाने से लेकर आपदा प्रबंधन को लेकर आने वाले पैसे में लूट खसोट तक ही सिमट कर  रह गई है । आम आदमी की किसी को परवाह नहीं है । इस दौर में  ना ही सैटलमेंट कमिशनर जी डब्ल्यू सरीखा कोई विदेशी शासक बचा है और ना ही  मुख्यमंत्री की कुर्सी  जनरल  बी सी खंडूरी के पास है जिनसे माफिया से लेकर राजनेताओ की एक बड़ी लॉबी खौफ  खाती थी ।   

 

आईआईटी  के इंजीनियरो ने भी अपनी रिपोर्ट में इस क्षेत्र को अत्याधिक असुरक्षित घोषित किया  हुआ है जिसमें कहा गया है कि नैनीताल के इलाके में पहाड़ की बोझ उठाने की क्षमता समाप्त हो चुकी है जिसके  चलते यहाँ पर  किसी भी तरह का निर्माण की राह मुश्किल दिख रही  है।  अगर ऐसा ही चलता रहा  और खुद ना खास्ता यदि कोई बड़ी  भूगर्भीय हलचल होती है तो इसका खामियाजा पूरी सरोवर नगरी  को ही  भुगतना पड़ेगा जिसकी सीधी मार यहाँ के पर्यटन व्यवसाय पर ग्रहण लगा सकती है । देखना है आने वाले समय में सरकार इस चुनौती से किस तरह निपटती है ?

1 टिप्पणी:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मानव जीवन से अधिक मूल्यवान कुछ भी नहीं, उसके लिये कुछ भी करना पड़े।