रविवार, 17 अगस्त 2014

चुनावो के लिए कितना तैयार है दिल्ली ?



केन्द्र की सत्ता अपने नाम कर चुकी भाजपा की नजरें अब दिल्ली के सिंहासन को फतह करने में लगी हुई हैं लेकिन उसकी मुश्किल उसी की पार्टी के कुछ विधायको और आम आदमी पार्टी ने इस दौर में बढाई हुई है | भाजपा और आम आदमी पार्टी के कई विधायक दिल्ली में जहाँ दुबारा चुनाव कराने के मसले पर एकमत नहीं हैं वहीँ दोनों पार्टियों की असल मुश्किल दुबारा चुनाव जीतने को लेकर भी सामने खड़ी है |  हालाँकि दोनों पार्टियों के बड़े नेताओ का दावा है दिल्ली में  मौजूदा स्थिति में विधान सभा चुनाव ही एकमात्र विकल्प बचता है शायद यही वजह है जुलाई महीने में आम आदमी के संयोजक अरविंद केजरीवाल दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग से मुलाकात ने पहली बार इन सवालों को खड़ा किया है कि आम आदमी पार्टी की कोशिश अब जल्द चुनाव में कूदना बन चुकी है |  

पटपडगंज से  पार्टी के विधायक मनीष सिसोदिया की उपराज्यपाल  नजीब जंग से दिल्ली विधानसभा भंग कर चुनाव कराने की अपील भी इस बात की तस्दीक कराती है जल्द चुनाव होने का लाभ आम आदमी पार्टी  हर हाल में उठाना चाहती है क्युकि उसको लगता है हरियाणा , महाराष्ट्र ,जम्मू  झारखण्ड के बजाए दिल्ली में ही फोकस कर वह अपना जनाधार न केवल बढ़ा सकती है बल्कि केन्द्र  की नमो सरकार को भी कठघरे में खड़ा कर  सकती है | साथ ही आम आदमी पार्टी  अब उपराज्यपाल के सामने इस बात को कहने से भी किसी रूप में पीछे नहीं हट रही कि कोई भी पार्टी दूसरे पार्टी को समर्थन देने को तैयार नहीं है लिहाजा  जल्द से जल्द चुनाव का विकल्प ही दिल्ली के  सामने खड़ा है लेकिन भाजपा में एक तबका ऐसा है जो आम आदमी पार्टी के एक तिहाई विधायको पर डोरे डालकर उन्हें अपने पाले में कर सरकार बनाने का विकल्प पेश कर रहा है | 

बीते दिनों आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने जिस तरीके से भाजपा द्वारा कॉरपरेट फंडिंग के आसरे आम आदमी पार्टी के विधायको को खरीदने के आरोप मीडिया के सामने लगाये उससे यह सवाल फिर गहरा गया कि आम आदमी और भाजपा में सरकार बनाने की कोई नई कवायद  परदे के पीछे से चल रही है | दिल्ली में पिछले कुछ महीने  से जोड़-तोड़ की राजनीति का गरमा गरम दौर हमें देखने को मिल रहा है | यहाँ कभी आम आदमी पार्टी यह आरोप लगाती है कि भाजपा सरकार बनाने के लिए कांग्रेस विधायकों की खरीद-फरोख्त कर रही है तो कभी आम आदमी पार्टी विधायको के कांग्रेस के 6 विधायको से संपर्क साधने की खबरें सियासी गलियारों में कुलांचे मारती है लेकिन  फिर झटके में  कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अरविन्द सिंह लवली अंदरखाने आप और कांग्रेस विधायकों के सरकार बनाने को साथ आने को सिरे से नकार देते हैं | हालाँकि कांग्रेस के सूत्र इस बात को भी कहने  से पीछे नहीं हटते अगर आप का कोई विधायक कांग्रेस में शामिल होना चाहे तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए

 वहीँ भाजपा से जुड़े कुछ सूत्र बताते हैं भाजपा के विधायक  कांग्रेस और आप के विधायको में आपसी फूट डालकर उनको तोडना चाहते हैं वहीँ भाजपा के कुछ नेता  यह भी कहते हैं  कि हम ऐसी कोई पहल नहीं करना चाहते जिससे हमारी साख पर बट्टा लगे।  दिल्ली में कांग्रेस के वर्तमान  विधायको को आगामी समय में चुनाव होने पर बड़ा नुकसान  झेलने को मजबूर होना पड सकता है | उसके  कई विधायको की हालत  दिल्ली में उनके विधान सभा  क्षेत्र में ठीक नहीं हैं शायद इसका बड़ा कारण शीला दीक्षित के कद का कोई नेता दिल्ली कांग्रेस के पास ना होना है |  वहीँ भाजपा भी चुनाव को लेकर अपने पत्ते फेंटने की स्थिति में नहीं है | उसके तुरूप के इक्के हर्षवर्धन केंद्र की नमो सरकार में मंत्री हैं और जगदीश मुखी से लेकर आरती शर्मा और विजय गोयल से लेकर विजेंदर गुप्ता आउटडेटेड हो चुके हैं और इनको आगे कर भाजपा दिल्ली में कमल खिलाने में नाकाम रह सकती है  लेकिन दूसरी तरफ भाजपा  खुलकर  दिल्ली को लेकर सामने नहीं आ रही है  क्योंकि उसे मालूम है कि दिल्ली की जनता को उसने जो भरोसा दिलाया था वह उसे पूरा नहीं कर पाई है। 

भाजपा ने जिस महंगाई को मुद्दा बनाकर चुनाव लडा उसे वह दूर नहीं कर पाई साथ ही सबसे बड़ा दल होने के बाद भी वह सरकार बनाने से पीछे हट गयी और आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस के साथ मिलकर 49 दिनों की सरकार चलायी  जिसके  चलते  भाजपा की दिल्ली में  लोकप्रियता में  भारी गिरावट हाल के दिनों में देखने को मिली है | वहीँ केजरीवाल के हाथ भले ही मुख्यमंत्री पद की कुर्सी ना हो लेकिन समाज के मजदूर और पिछड़े तबके के साथ ही  मध्यम वर्ग  और युवाओ का एक बड़ा वोट बैंक उनके साथ आज भी जुड़ा हुआ है | दिल्ली भाजपा की असल परेशानी यहीं से शुरू होती है |  


दिल्ली में भाजपा के नव नियुक्त प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय का बीते दिनों अल्पमत सरकार भाजपा द्वारा बनाये जाने का विकल्प भी दिल्ली में नई संभावनाओ का द्वार खोल रहा है लेकिन प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ,  भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन जोड़ तोड़ की सरकार इस सूरत में बनाये जाने के पक्ष में नहीं है क्युकि आने वाले दिनों में हरियाणा , महाराष्ट्र , झारखंड , जम्मू सरीखे कई राज्यों में  चुनाव होने हैं और दिल्ली में जोड़ तोड़ की  भाजपा सरकार अगर बनी तो भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती है साथ में नरेन्द्र मोदी की भ्रष्टाचार को लेकर जीरो  टोलरेंस की छवि पर भी इसका सीधा प्रभाव पड़ने के आसार हैं हालाँकि अतीत में यूपी, झारखण्ड सरीखे राज्यों में भाजपा जोड़ तोड़ की सरकार बना चुकी है जिसका भारी नुकसान उसे झेलना पड़ा था अब इस बार जब केंद्र में वह नमो की अगुवाई में प्रचंड बहुमत लेकर सत्तासीन हुई है तो उसके सामने जनता की भारी अपेक्षाओ को पूरा करने का भारी दवाब है शायद यही वजह है वह कई  राज्यों के चुनावी  बरस में जोड़ तोड़ की सरकार बनाये जाने के सख्त खिलाफ दिख रही है | 

भाजपा के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का 11 , अशोका रोड में हाल के दिनों में दिया गया संबोधन भी मायने रखता है जब उन्होंने कार्यकर्ताओ से अब विभिन्न राज्यों में पार्टी को सत्ता में जोर शोर से लाने का आह्वान किया | इधर  दिल्ली में नजीब जंग ने मौजूदा माहौल को भांपते हुए  सभी पार्टियों से बात करने के बाद दिल्ली की फिजा का कोहरा साफ़ होने का कार्ड खेल दिया है |  हालाँकि भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व इस बात को भी समझ रहा है अभी जल्द चुनाव भाजपा के पक्ष में नहीं हैं क्युकि केन्द्र की भाजपा सरकार बमुश्किल अभी 60 दिन ही पूरे कर पायी है जो कि उसका हनीमून पीरियड ही है और प्रधानमंत्री मोदी भी खुद इस बात को दोहरा चुके हैं कांग्रेस सरकार के साठ बरसों की तुलना लोग उनके 60 दिनों के कार्यकाल से ना करें | लिहाजा इस बात की उम्मीद बंध रही है दिल्ली में भाजपा किसी भी तरह राष्ट्रपति शासन की अवधि आने वाले 6 महीने और बढाने में अपना पूरा जोर लगा दे और फिर फरवरी मार्च में दिल्ली में चुनावो के दंगल में नमो सरकार की उपलब्धियों के आसरे  कूदा जाये | तब तक केंद्र की नमो सरकार के पास उपलब्धियों का खजाना न केवल होगा बल्कि रोजमर्रा की महंगाई और क्रूड आयल के दाम भी अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में गिर चुके होंगे |  


दिल्ली में हाल के दिनों में  बिजली पानी  से लेकर पेट्रोल और सीएनजी के दामो में उतार चदाव देखने को मिला है |  दूसरी ओर अपने को चाय बेचने वाले का बेटा कह लोगों को कॉर्पोरेट के आसरे चमचमाते कायकल्प होने के सपने दिखाने वाले नरेंद्र मोदी से चुनाव निपटने के बाद  जनता की अपेक्षाएं इस कदर बड़ी हुई है आने वाले  पांच बरस में उनके पूरे होने पर सभी की नजरें लगी हुई हैं |  वैसे उनके 60 दिन के कार्यकाल  में आम आदमी ही सबसे ज्यादा  निराश हुआ है और महंगाई की सबसे अधिक मार इसी तबके ने झेली है |  

जिस नरेंद्र मोदी सरकार ने कांग्रेस मुक्त भारत का सपना लोक सभा चुनावो के चुनाव प्रचार के दौरान दिखाया था  वह  सरकार भी अब  कांग्रेस के पग चिन्हों पर चलती दिखाई दे रही है | बीमा और ऍफ़ डी आई सरीखे मसलो पर कभी कांग्रेस को घेरने वाली भाजपा आज सत्ता में आने के बाद अब इन सबको लागू करने का मन अपने बजट में बना चुकी है तो स्थितियों को बखूबी समझा जा सकता है | महंगाई  लगातार बढ़ रही  हैं लेकिन सरकार इसके लिए जमाखोरों को दोषी ठहरा रही है | कभी विपक्ष में रहने पर  भाजपा ने सत्ता में आने पर 30 फीसदी  की सब्सिडी और बिजली पर  700 करोड़ की सब्सिडी देने का वादा किया था जिससे उन्होंने आज पल्ला झाड लिया है |  

अगर चुनाव हुआ तो  दिल्ली की यह पब्लिक हर वादे का  जवाब  भाजपा से मांगेगी और अगर नमो सरकार की घोषणाएं दिल्ली में कोरी लफ्फाजी में ही आने वाले दिनों में रहती हैं तो दिल्ली भाजपा की मुश्किलें आने वाले चुनाव में बढ़नी तय हैं | साथ ही किसी चेहरे को आगे ना करने की बड़ी कीमत उसे आने वाले समय में उठाने को मजबूर होना पड सकता है | 

से में सवाल घूम फिर कर प्रधान मंत्री मोदी पर ही जाता है जिनको आगे कर वह दिल्ली का ताज अपने नाम कर सकती है लेकिन मोदी को भी इस बात को समझना जरुरी होगा कि लोक सभा चुनाव और विधान सभा के चुनावों में जनता का मूड अलग अलग होता है जिसके ट्रेंड को हम हाल के कुछ वर्षो से देश में बखूबी देख भी रहे हैं | अतः कहानी घूम फिरके विकास पर ही केन्द्रित होकर  जाती है जिसको प्रधान मंत्री मोदी भी बखूबी समझते हैं और वह खुद गुजरात में अपने माडल के आसरे भाजपा को दशको से सत्ता में लाते भी रहे हैं | ऐसा विकास का माडल उनको जल्द  दिल्ली के लिए भी प्रस्तुत करना होगा |  वैसे  देश को अभी  उनसे बड़ी आशाएं हैं |    

इस समय दिल्ली में अगर चुनाव हुए तो आम आदमी पार्टी पूरे फायदे में नजर आएगी | पार्टी का मनोबल अभी यहाँ काफी  ऊंचा है  जिसे वह भुनाना  भी चाहती है। जंतर मंतर पर बीते दिनों ई रिक्शा चालको और ऑटो चालको  को फिर साधकर केजरीवाल ने  जिस अंदाज में अपना शक्ति प्रदर्शन किया है उसने इस बात को तो बता ही दिया है देश में केजरीवाल का जादू भले ही ना चला हो लेकिन दिल्ली में आज भी केजरीवाल सब पर भारी पड रहे हैं  और शायद  इसकी  सबसे बड़ी वजह दिल्ली में उनके साथ जुडा मजबूत  जमीनी संगठन है |  

दिल्ली की गद्दी छोड़कर  लोक सभा चुनावो में जल्द कूदने को अपनी भारी भूल बता चुके केजरीवाल इस बात को समझ रहे हैं आम आदमी के वोटर के साथ वह  अपनी इस  भावनात्मक अपील के साथ  जुड़ना चाहते हैं वहीँ  जनता भी  केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद छोड़ने को  अभी भूली नहीं है। महंगाई पर भाजपा की विफलता , बिजली पानी की बड़ी कीमतों से दिल्ली में अगर कोई सबसे ज्यादा लाभ लेने की  स्थिति में आज  है तो वह आम आदमी पार्टी ही  है | 

कांग्रेस के पास शीला दीक्षित का विकल्प नहीं है वहीँ भाजपा  में हर्षवर्धन के कद काठी का कोई चेहरा नहीं है जो भाजपा को अच्छी सीटें दिल्ली में दिला सके | किरन बेदी का नाम भाजपा में इस समय सी एम के रूप में सियासी गलियारों में चल जरुर रहा है लेकिन पार्टी के दिल्ली के कई नेता यह नहीं चाहते  किरन बेदी की पार्टी में इंट्री  करवाकर सीधे  मुख्यमंत्री के सिंहासन पर उनको बैठा दिया जाए | 

वैसे भाजपा में अमित शाह और मोदी की जुगलबंदी अब न केवल अपने अनुरूप बिसात दिल्ली में  बिछाएगी बल्कि अब पहली बार पोटली और ब्रीफकेस के जरिये भाजपा में राजनीती करने वाले के दिन भी लद गए हैं |  इस सम्भावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता आने वाले समय में दिल्ली में भाजपा उसी को टिकट देगी जो मोदी और शाह की  सियासी  बिसात में फिट बैठेगा | बहरहाल भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी  तीनों दलों की दिल्ली के दंगल में  त्रिकोणीय लड़ाई के बीच यह कह पाना बड़ा मुश्किल है कि आने वाले विधान सभा चुनावो में कोई भी दल  अपने दम पर अकेले सरकार बना लेगा | फिलहाल तो चुनावी डुगडुगी बजने का इन्तजार ही हमें करना पड़ेगा |


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