रविवार, 11 अक्तूबर 2015

सूचना अधिकार के दस बरस




आरटीआई यानी सूचना का अधिकार कानून देश के इतिहास में अब तक के सबसे कारगर और प्रभावी कानूनों में से एक शायद यही क़ानून होगा जो सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने वाला  अमोघ हथियार है जिसके इस्तेमाल से कई बार सरकारी कार्य प्रणाली की कलई खुल चुकी है । देश में हुए कई छोटे-बड़े घोटालों और सार्वजनिक भ्रष्टाचार को सार्वजनिक करने में इसी कानून की अहम भूमिका रही है। 2005 में यूपीए सरकार ने देश को सूचना अधिकार के रूप में एक कारगर अस्त्र प्रदान किया | इसको लागू करने के पीछे दो मुख्य उददेश्य थे | कामकाजी प्रक्रिया को जानने का हक़ देकर पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना साथ ही सरकारी कामकाज में टालमटोल वाली संस्कृति से उत्पन्न भ्रष्टाचार को कम करना | सरकार की कोशिश थी कि इस अधिकार के आने के बाद लोगो को सूचनाये आसानी से मिल जाएगी और यह अधिकार लोकतंत्र के सशक्तीकरण की दिशा मे एक मील का पत्थर साबित होगा लेकिन मौजूदा दौर में सूचनाए पाना भी इस देश में आसान नही रहा | लोगो को समय पर सूचनाए न मिले पाने की घटनाये आये दिन समाचार पत्रों में छाई  हैं जो यह साबित करने के लिए काफी है क्या यह देश कानून से चल सकता है ?    

स्वीडन ऐसा प्रथम देश था जिसने 1766 में अपने देश के नागरिको को सबसे पहले संवैधानिक रूप से यह अधिकार प्रदान किया | भारत में प्रथम प्रेस आयोग के गठन के समय से ही सूचना अधिकार की विकास यात्रा 1952 में शुरू हो गई |  इसके बाद इस अधिकार को लेकर हरी झंडी मिलने से पहले कई बैठकों का लम्बा दौर चला जिसका नतीजा सिफर ही रहा | सूचना अधिकार को आम जन तक पहुचाने की पहल सार्थक रूप से वी पी सिंह के जमाने में शुरू हुई लेकिन इस दौरान बनाये गए प्रावधान इतने लचर थे कि उस दौर में वी पी सिंह को भी इसे ख़ारिज करने पर मजबूर होना पड़ा था | 90 के दशक में संयुक्त मोर्चा की गुजराल सरकार  और फिर बाद मे एनडीए की सरकारों के समय इसमें सकारात्मक पहल नही हो पाई | यूपीए सरकार के पहले साल के कार्यकाल में अरुणा राय, अरविन्द केजरीवाल सरीखे सामाजिक कार्यकर्ताओ की मेहनत रंग लाई जिसके चलते सरकार को सूचना का अधिकार लागू करने पर मजबूर होना पड़ा था |  

 सूचना के अधिकार के तहत देश के किसी भी नागरिक को किसी भी सरकारी कार्यालय से सूचना मांगने का हक़ है| यह अधिकार लोगो को अधिकार सम्पन्न तो बनाता जरुर है लेकिन मौजूदा समय में हमारे देश के सरकारी विभागों में सूचना मांगे जाने के एवज  में टरकाने वाली कार्यसंस्कृति कम नही हुई है जिसके चलते कई सूचनाओ को देने में कर्मचारी आनाकानी करते हैं | अगर यह कानून सही ढंग से अमल में लाया जाए तो आम आदमी  के पास इससे सशक्त अधिकार शायद ही कोई होगा लेकिन हर विभाग में लालफीताशाही का साम्राज्य पहले भी कायम था और आज अभी भी  है |    

इस अधिकार के लागू होने के 10  बरस बाद भी देश की नौकरशाही इस अधिकार का गला घोटने  में तुली हुई है | निश्चित समय में सूचना न दिए जाने पर इस अधिकार के तहत अधिकारियो के विरुद्ध दंड देने का प्रावधान है लेकिन आज भी देश के भीतर  हालत यह है कि अधिकारियो और कर्मचारियों पर कोई कार्यवाही नही हुई है | कई राज्यों में जहाँ सूचना अधिकारियो का टोटा बना हुआ है वहीँ कई जगह टायर्ड नौकरशाही के आसरे सूचना अधिकार का बाजा बजाया जा रहा है |  जिन अधिकारियो ने अपनी पूरी जिन्दगी रिश्वत लेकर गुजारी है क्या देश का आम आदमी उनसे उम्मीद रख सकता है कि वह लोगो को समय पर सूचनाए दे सकते हैं | शायद अब समय आ गया है जब केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को इस दिशा में गंभीरता से विचार करने की जरुरत है कि वह लोगो को सही सूचनाए मुहैया करवाने की दिशा में ध्यान दें | अभी भी कई लोगो को सूचनाए देश में जहाँ आसानी से नही मिल रही हैं वही केंद्रीय सूचना आयोग में  आवेदनकर्ताओ ने अधिकारियो और कर्मचारियों के विरुद्ध शिकायतों का अम्बार लगाया हुआ है जिस पर सुनवाई तो दूर कारवाही तक नही हो पा रही है |

 गैर सरकारी संस्था कॉमनवेल्थ ह्यूमन राईट इनिशिएटिव की रिपोर्ट बताती है कि इस क़ानून की धार भोथरी कर दी गई है |  5 राज्यों में सूचना आयुक्तों के पद खाली हैं जिनमे तेलंगाना सरीखा नया राज्य भी शामिल है | खुद केंद्र में ही केंद्रीय सूचना आयुक्त का पद खाली रहा | नई नियुक्ति तब हुई जब मामला न्यायपालिका के संज्ञान में आया | 2014 में सूचना आयुक्तों के 14 फीसदी पद खाली थे यह संख्या बढ़कर अब 20 फीसदी पहुच चुकी है | कानून के प्रावधानों के तहत प्रत्येक सूचना आयोग में 11 आयुक्त होने चाहिए लेकिन असम में 9 , मध्य प्रदेश , राजस्थान , सिक्किम , मेघालय में सिर्फ  एक ही सूचना आयुक्त काम कर रहे हैं तो वहीँ गोवा, हिमाचल, झारखण्ड , मणिपुर, मिजोरम , नागालैंड, उडीसा , बंगाल में सिर्फ दो दो सूचना आयुक्त ही कम कर रहे हैं | गुजरात में 7 , तमिलनाडू और छत्तीसगढ़ में सूचना आयुक्तों के 8 पद रिक्त पड़े हैं | आज भी देश के भीतर बड़ी आबादी ऐसी है जो गावो का प्रतिनिधित्व करती है उसके पास इस अधिकार को लेकर ज्यादा  जानकारी नही है |  ब्लाक स्तर  और ग्राम स्तर पर एक आम नागरिक की फरियाद हमारे सरकारी अधिकारी नही सुनते जिसके चलते वह निराशा में जीता है और हमारे अधिकारी शान और शौकत वाली जिन्दगी का तमगा हासिल कर लेते है | अभी भी  ग्रामीण स्तर  पर इस अधिकार के बारे में लोगो को जागरूक करने की जरुरत है तभी आने वाले वर्षो में यह अधिकार आम जनता का अधिकार बन सकेगा और इस काम में मीडिया की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और मीडिया की एजेंडा सेटिंग थियोरी को अगर आधार बनाया जाए तो मीडिया इसमें लोगों को यह बताने की कोशिश करता है कि कौन सा मुद्दा उसके लिए महत्वपूर्ण  है और कौन सा गौड़  इस आधार पर मीडिया अगर आरटीआइ के प्रचार प्रसार में जागरूक रहे तो यह अधिकार लोगों को निश्चित ही अधिकार सम्पन्न बनाएगा | 

बेशक बीते एक दशक की यात्रा  में संसद में इस अधिकार को पारित करवाकर सरकार ने यह सन्देश देने की कोशिश जरुर की है कि अब आम आदमी सरकारी तंत्र के आगे नतमस्तक नही है बल्कि जरुरत पड़ने पर इस अमोघ  अस्त्र को शासन  से जवाबदारी के लिए इस्तेमाल कर सकता है | इसकी बानगी सूचना अधिकार के लागू  होने के कुछ महीनों बाद ही दिखाई देने लगी जब देश के कई लोगो ने कई दुरूह सुचनाये विभागों से हासिल की जिसका जिक्र मीडिया ने अपनी खबरों  में बखूबी किया भी वहीँ  मीडिया ने भी इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल अपनी खबरों की पैकेजिंग करने में किया | खोजी पत्रकारिता के लिए सूचना का अधिकार मुख्य हथियार साबित हो सकता है और इसकी मदद से खोजपरक पत्रकारिता की जा सकती है। आरटीआइ के लागू होने से पहले भी खोजी पत्रकारिता होती रही है। लेकिन वर्तमान परिवेश में इसका बड़ा लाभ लिया जा सकता है।  सूचना का अधिकार अधिनियम ने बीते दस बरसों में एक नयी क्रांति को जन्म देने के साथ ही सरकार को और जवाबदेह बनाया है |  नेताओ अधिकारियों विधायिका और कार्य पालिका की सांठगाँठ की पोले खोली है और कई भ्रष्टाचार उजागर किये हैं | आलम यह है कि इस अधिकार से कई  मंत्रियों तक को  कुर्सी से हाथ धोना पड़ा है | सूचना अधिकार क़ानून लागू होने के बाद सकारात्मक परिणाम कई मोर्चो पर देखने को मिले हैं |  चूँकि सरकारी कामों में पारदर्शिता बढ़ी है अतः इसे शुभ संकेत के रूप में देख सकते हैं और कहा जा सकता है अब यह अधिकार केवल वैधानिक नहीं रहा इसकी ताकत दिनों दिन बढ़ रही है और लोगों में जागरूकता भी आ रही है यही नहीं  अब गोपनीयता की आड़ में भ्रष्टाचार की गुंजाईश भी घटी है |  सूचना अधिकार की अब तक सबसे बड़ी सफलताओं में से यह एक बड़ी सफलता है जिसने भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं और आला अधिकारियों के होंश उड़ा दिए हैं और मीडिया में खबरें आने के बाद  देश भर के नेताओं और अधिकारियों में यह सन्देश गया है कि पैसे के लालच में कुर्सी जा सकती है जिससे समाज में थोडा भय तो दिखाई ही देता है लेकिन इसका स्याह पक्ष यह भी है कि पावरफुल नेताओं और अधिकारियों की पोल खोलने का खामयाजा भी सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं को भुगतना पड़ता है|  उन पर हमले होते हैं और  कई कार्यकर्ता मारे जाते हैं |  यह एक चिंता का विषय बन गया है | 
  
एक स्वयंसेवी संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2010 में महाराष्ट्र में छह आरटीआइ कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई और कई पर हमले किए गए। गुजरात में एक आरटीआइ कार्यकर्ता अमित जेठवा की जान चली गयी |  गिर के जंगलों में हो रहे अवैध खनन के खिलाफ जेठवा ने  उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी। इसके कुछ समय बाद ही मोटरसाइकिल सवार बदमाशों ने गुजरात उच्च न्यायालय के नजदीक जेठवा की गोली मारकर हत्या कर दी थी। हत्या के सिलसिले में पुलिस ने एक  सांसद के भतीजे को राजकोट हवाई अड्डे के पास से गिरफ्तार किया गया। कई आरटीआइ एक्टिविस्टो की हत्या भी इस अधिकार के तहत सूचना मांगे जाने के चलते इस देश में हुई हैं जो यह बताने के लिए काफी है इस दौर में आम आदमी के सरोकार हाशिये  पर चले गए है और उसको सूचना मांगने के एवज में गोली खाने पर भी मजबूर होना पड सकता है | यह इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि  इस दौर में सूचना अधिकार होने के बाद भी सूचना मांगने की राह  इस दौर में कितना मुश्किल हो चली  है यही नहीं आकंडे  यह भी बताते हैं बीते 10 सालों में 40 आरटीआइ एक्टिविस्टों की हत्या कर दी गई | महाराष्ट्र सूचना मांगने वालों की हत्या और उत्पीडन में पूरे देश में अव्वल रहा है | वहां अब तक तकरीबन 53 आवेदनकर्ताओं पर जानलेवा हमले हो चुके हैं जिनमे 9 लोगों की जान जा चुकी है | गुजरात में 34 आवेदकों पर हमले हो चुके हैं जिनमे 3 लोग मारे जा चुके हैं | बिहार में 6 लोग सूचना माँगने के चलते मारे जा चुके हैं | सूचना अधिकार के तहत भ्रष्टाचार को उजागर करने वालों का क्या हश्र होता है यह जानकर आश्चर्य होगा कि एक्टिविस्टों को भी अब इस देश के समाज के ठेकेदार प्रताड़ित ही नहीं करते वरन उनको जान से भी हाथ धोना पड़ रहा है |  झारखंड के ललित मेहता, नियामत अंसारी , कामेश्वर यादव ने नरेगा में नेताओं और खनन माफियाओं के काकस को बेनकाब किया तो जब्बदारण गोधवी ( गुजरात) , सतीश शेट्टी, अरुण सामंत, विट्टल  गीता , दत्तात्रय पाटिल (महाराष्ट्र ), विजय प्रताप (यू पी) सहला मसूद ( मध्य प्रदेश ), सत्येन्द्र दुबे ने आरटीआइ के जरिये ही भ्रष्टाचार उजागर किया लेकिन इन्हें इसके बदले मौत मिली | क्या यही है हमारी सरकारों और सामज के ठेकेदारों का दायित्व और क्या इसी के चलते यह कानून बीते दस बरस पहले से लागू है ? 

सीआईसी की जानकारी के अनुसार 2006 -07 से 2012-13 के बीच 7 बरसों में आयोग में 147924 अपीलें पंजीकृत हुई हैं | उक्त अवधि में 116333 अपीलों और शिकायतों का निपटारा किया गया है | इस तरह 7 वर्ष में 31591 अपीलें लंबित हैं | आरटीआइ असेसमेंट एंड एडवोकेसी ग्रुप के अनुसार दिसंबर 2013 तक सबसे अधिक शिकायतें यू पी (48442), महाराष्ट्र (32390) , सी आई सी ( 26115) में सबसे अधिक मामले लंबित हैं | रिपोर्ट को अगर आधार बनाएं तो 2012-13 में सबसे ज्यादा अपीलें महाराष्ट्र (73968) में प्राप्त की गई जिसके बाद केंद्रीय सूचना आयोग( 62723) और फिर यू पी (62008 ) का नंबर आता है | निपटारे के मामले में भी महाराष्ट्र सूचना आयोग में सबसे अधिक (61442)अपीलें निपटाई गई | इसके बाद यू पी (60865) और केंद्रीय सूचना आयोग (47662 ) शामिल रहे |  

 सूचना का अधिकार कानून तब मजबूत कहा जायेगा जब भारत का प्रत्येक नागरिक इस अधिकार का प्रयोग करना प्रारंभ करेगा। सूचना के अधिकार ने आज आम आदमी को उन लोगों से लड़ने की शक्ति दी है जिनसे लडने के बारे में वो कभी सोच भी नहीं सकता था | आज सूचना अधिकार से मीडिया को कितनी शक्ति मिल गयी है यह इस बात से समझी जा सकती है किसी भी मसले पर सूचनाये पाना अब पहले जितना मुश्किल भरा नहीं रहा  आज  मीडिया को चाहिए वह इस अमोघ अस्त्र से का अधिक से अधिक उपयोग करे और भ्रष्ट नेताओं एवं नौकरशाहों क असल सच को आम जनता के सामने ला सके | सूचना के अधिकार की  सामजिक परिवर्तन में अहम भूमिका हैं |  सूचना का अधिकार लोकतंत्र  में आम आदमी के लिए एक हथियार  है जिससे वह अपने हक की  लड़ाई  लड़ रहा  हैं |  देश में सिर्फ यही एक कानून है जो सरकारी मशीनरी को सामाजिक सरोकार पर मजबूर कर सकता है |  सूचना के अधिकार ने लोगों को न सिर्फ एक रास्ता मुहैया कराया है  बल्कि सूचना हासिल कर सरकारों और प्रतिष्ठानों की कार्यप्रणाली में भी सकारात्मक सुधार कराने की कोशिशें की हैं | केंद्रीय मंत्रियों के अपार विदेश दौरे हों या किसी मुख्यमंत्री के आवास में चायपानी पर हुआ अपार खर्च,  प्रशासन की  मनमानी हो या  जजों की संपत्ति का ब्यौरा हो इस बहाने किसी न किसी रूप में एक दबाव तो बनता ही है और फिर यह सूचनाएं अगर मीडिया के माध्यम से लोगों तक पहुच रही हैं तो इसे मीडिया के लिए शुभ संकेत कहा जा सकता है | 


सूचना अधिकार की सबसे बड़ी चिंता यह  है कि कानून में उन लोगों की सुरक्षा के लिए कोई प्रावधान नहीं है जिन्हें व्हिसलब्लोअर्स कहा जाता है |  वे जो गलत के खिलाफ बोलते हैं, आवाज उठाते हैं उन एक्टिविस्टों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय सूचना आयोग और उसके अधीन समस्त राज्यों के सूचना आयोगों की मशीनरी के पास कोई ठोस प्रबंध या औजार नहीं हैं |  इस अधिकार की  सबसे बड़ी खामी यह है कि इसमें जवाबदेही तय करने की कोई व्यवस्था नहीं है शायद यही वजह है कि इस शिथिलता के चलते  लम्बी आपत्तियों का निपटारा आज तक नहीं हो पाया है  | पर्याप्त ढांचागत विकास ना होने के चलते लोक सूचना अधिकारियों के यहाँ काम करने का बोझ भी लगातार बढ़ रहा है साथ ही आपत्तियों के निस्तारण के लिए सूचना अधिकारीयों के यहाँ कोई अधिकतम समय सीमा निर्धारित न किये जाने से आये दिन आम आदमी की दुश्वारियां बीते एक दशक में बढ़ी हैं | सूचना अधिकार से जुडी एक विडम्बना यह भी है कि यह अधिकार तो आम  जन को दे दिया गया है लेकिन इस अधिकार के विपरीत 1923 के सरकारी गोपनीयता क़ानून को समाप्त नहीं किया गया है जिससे विरोधाभास की स्थितिया पैदा हुई हैं | पारदर्शिता के मामले में यह क़ानून अवरोधक है इसलिए सूचना अधिकार कानून को कारगर और प्रभावी बनाने के लिए इसे समाप्त किया जाना जरूरी है |  सूचना अधिकार को असरदार बनाने के लिए सरकार  को चाहिए वह इसकी कमियों पर ध्यान दे और ऐसा सिस्टम विकसित करे जिससे आम आदमी को सूचना पाने में कोई दिक्कतें ना हों |  सबसे बड़ी समस्या हमारे देश में यह है आज भी हमारे ऑफिसों में लालफीताशाही का साम्राज्य कायम है और अधिकारी और कर्मचारी लोगों के प्रति जबाबदेह नहीं हैं | सबसे बड़ी समस्या  नौकरशाही के जबरदस्त दखल से पैदा हुई है जो किसी भी काम को सुस्त चाल से करना चाहते हैं ऐसे में सरकारों को अच्छी कार्यसंस्कृति  विकसित करने  पर बल देना होगा | साथ ही सूचना अधिकार के प्रसार में मीडिया तत्परता दिखा सकता है | आज मीडिया को चहिये वह आरटीआई को प्रोत्साहित करे और आमजन इन्टरनेट के माध्यम से सूचना प्राप्त करना शुरू कर दें तो देश में यह बड़ी क्रांति का सूत्रपात होगा। सूचना के अधिकार को आमजन का अधिकार बनाने में मीडिया की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है लिहाजा अपने-अपने स्तर पर यदि मीडिया सूचना के अधिकार को प्रोत्साहित करने का उपक्रम प्रारंभ करता है तो सूचना का अधिकार कानून  की  धार भारत में मजबूत होगी  | जो भी हो सूचना अधिकार क़ानून के होने से देश में सुशासन की अवधारणा मजबूत हुई है सरकारी  काम काज  में जहाँ पारदर्शिता बढ़ी  है वहीँ भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक अंकुश लगा है यह उपलब्धियां निश्चित ही एक जिम्मेदार लोकतंत्र के अच्छे दिनों के लिए एक शुभ संकेत हैं |    

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