गुरुवार, 23 फ़रवरी 2017

उत्तराखंड : जंग के बाद अब कुर्सी का जोड़ तोड़





उत्तराखंड का विधानसभा चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से निपट गया है । इस बार का चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक रहा । वह भी इस मायने में क्युकि राष्ट्रपति शासन के बाद कांग्रेस से निकाले गए कई नेता भाजपा में जहाँ शामिल हुए वहीँ वोट के इस मौसम में कांग्रेस में भी कमोवेश भाजपा सरीखे हालात रहे । कांग्रेस को भी कई सीटों पर बगावत का सामना करना पड़ा वहीँ भाजपा में भी बरसो से काम करने वाले कार्यकर्ताओं को दरकिनार करते हुए बागियों को गले लगाया गया । उत्तराखंड के चुनावी मिजाज की टोह लेने पर इस बार मतदाता के भीतर एक अलग तरह की ख़ामोशी नजर आयी । जल , जमीन , जंगल के मुद्दे  हाशिये पर जहाँ नजर आये वहीँ पलायन को लेकर दोनों राष्ट्रीय दलों की चुप्पी ने कई सवालों को खड़ा किया ।  बढ़ती बेरोजगारी पर किसी ने चिंता नहीं जताई । वहीँ  फ्री डेटा और मोबाइल लैपटॉप तक चुनावी मेनीफेस्टो सिमट कर रह गया ।

उत्तराखंड में परिणाम चाहे जैसे भी आएं लेकिन एक बात तो साफ़ है यहाँ पर मुख्य मुकाबला  भाजपा और कांग्रेस में ही है । राज्य गठन के बाद से कमोवेश हर चुनाव में दोनों  राजनीतिक दल बारी बारी से राज करते आये हैं । कांग्रेस ने इस बार जहाँ मुख्यमंत्री हरीश रावत के चेहरे को आगे किया वहीँ गुटबाजी से उलझ रही भाजपा पी एम मोदी के भरोसे मैदान में उतरी । पहाड़ों में सर्द  मौसम के बावजूद इस बार रिकॉर्ड 70 फीसदी मतदान हुआ जो अपने में एक रिकॉर्ड है । मतदाता पहली बार बूथों पर उत्साह के साथ नजर आये ।  बंपर वोटिंग को भाजपा और कांग्रेस  अपने अपने पक्ष में बता रही हैं। भाजपा सत्ता में  बदलाव की आस लगाए बैठी है  तो कांग्रेस को उम्मीद है हरदा अगले  पांच बरस  अपने नाम कर जायेंगे । इस चुनाव की सबसे बड़ी चिंता दोनों पार्टियों के बागी प्रत्याशियों ने बढ़ाई  हुई है । पिछले चुनावों में भाजपा की तरफ से खंडूरी चुनाव हार गए थे । वह मुख्यमंत्री का बड़ा चेहरा रहे थे  । वहीँ कांग्रेस की बात करें तो उसने भी मैदान नहीं छोड़ा । भाजपा 19  तो कांग्रेस 20  रही थी । यही कारण  था उन चुनावों में सत्ता की चाबी भी बागियों के पास रही । इस चुनावो में भी  पहाड़ी इलाकों  के साथ मैदानी इलाकों में बसपा का हाथी अगर चढ़ाई करता है और कुछ सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी अच्छा वोट पा लेते हैं तो इन दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के होश फाख्ता हो सकते हैं ।

उत्तराखण्ड में हुए रिकॉर्ड मतदान के बारे में अलग अलग तरह के कयास लगने शुरू हो गए हैं ।   भाजपा की मानें तो उत्तराखंड में प्रधानमंत्री मोदी का जादू अभी भी कम नहीं हुआ  है । साथ ही हरीश रावत के खिलाफ  एंटी इंकेबेंसी  इस बार रंग लायी है  वहीँ  दूसरी तरफ कांग्रेस मान रही है नोटबंदी और बढ़ती महंगाई और मोदी सरकार के प्रति निराशा  के चलते बड़ी संख्या में लोग  मतदान केंद्रों तक पहुंचे हैं । पिछले कुछ समय से देश के मिजाज को अगर हम परखें तो एक ख़ास बात यह पायी गयी है रिकॉर्ड मतदान  अब सत्ता विरोधी  साबित नहीं हुआ है । बिहार , बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी रिकॉर्ड मतदान को बदलाव का संकेत माना गया था। इसके बावजूद नतीजे एकदम उलट आए और इन सभी राज्यो में पार्टी की वापसी हुई । उत्तराखंड में भाजपा ने इस चुनाव में अपने स्टार प्रचारकों की भारी भीड़ उतारी वहीँ प्रधानमंत्री मोदी को पिथौरागढ़ जैसे सीमान्त जनपद की रैली में उतारा ।  वहीँ  टिकटों के चयन से लेकर चुनाव प्रचार में  कांग्रेस  भाजपा की तुलना में पिछड़ती रही। यहाँ कांग्रेस केवल हरीश रावत के मैजिक के आगे निर्भर रही ।प्रधान मंत्री मोदी ने  राज्य में हुई ताबड़तोड़ रैलियों में पहाड़ के पानी से लेकर पहाड़  की जवानी तक के मुद्दों  को हवा दी । पलायन पर चिंता जताने के साथ ही उन्होंने  टूरिज्म को बढ़ावा देने की बात कही । साथ ही अपनी रैलियों में सेना का जिक्र जरूर किया । उत्तराखंड में बड़े पैमाने पर लोग सेना में हैं लिहाजा मोदी सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर वन रैंक वन  पेंशन  जैसे मुद्दे  उठाने से पीछे नहीं रहे । उन्होंने रावत सरकार के भ्रष्टाचार  को लेकर सवाल दागे और सत्ता परिवर्तन की तरफ इशारा किया ।  मोदी की रैलियों में जबरदस्त भीड़ नजर आयी । श्रीनगर और पिथौरागढ़ जैसे जिलों में दूर दूर से उनको सुनने  लोग आये । अब उनके भाषण का क्या असर हुआ यह तो 11 मार्च को आने वाले नतीजों के बाद ही पता चल पायेगा वहीँ कांग्रेस मुख्यमंत्री हरीश रावत पर पूरी तरह से निर्भर  रही। चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में  पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने हरिद्वार जनपद में रोड शो किया। रावत पर उनके विरोधी गढ़वाल और कुमाऊं में भेद करने का आरोप लगाते रहे हैं  लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान  कुमाऊं और गढ़वाल के सुदूर क्षेत्रों में वह अकेले चुनाव प्रचार करने पहुंचे  साथ ही इस बार उन्होंने कुमाऊ और गढ़वाल दो सीटों से चुनाव लड़ा । इसके पीछे रणनीति दोनों इलाकों में कांग्रेस की ताकत को मजबूत करने की रही । बड़े पैमाने पर लोग कांग्रेस छोड़  गए जिससे पार्टी में रावत की कार्यशैली  को लेकर सवाल भी उठते  रहे । विपरीत और विषम हालातों में  रावत अगर उत्तराखंड में वापसी कर जाते हैं  तो पार्टी में उनका कद बहुत बढ़ जाएगा साथ ही  कांग्रेस आलाकमान के सामने वह और अधिक मजबूत होंगे। पार्टी के अंदर उनके विरोधियों को मजबूरन शांत होना पड़ेगा।

उत्तराखंड में  रिकॉर्ड मतदान होने के बावजूद यह साफ नहीं है कि सरकार किसकी बनेगी।  दिल्ली और बिहार में तमाम राजनीतिक पंडितों के अनुमान ध्वस्त हो गए । बिहार में भी 2015  में   ज्यादा मतदान हुआ था ।  यहाँ राजनीतिक पंडित लालू के साथ नीतीश के महागठबंधन को नुकसान होने की बात कर रहे थे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। लालू , नीतीश और कांग्रेस महागठबंधन को पूर्ण बहुमत से कहीं ज्यादा सीटें मिलीं।  बंगाल और तमिलनाडु में भी राजनीतिक पंडितों से मतदाताओं का मिजाज  समझने में चूक हुई।  तमिलनाडु में रिकॉर्ड मतदान के बावजूद पुनः जयललिता की सरकार बनी। वहां रिकॉर्ड मतदान का कारण सत्ता विरोधी लहर नहीं थी। प्रदेश के मतदाताओं ने जिस तरह का उत्साह दिखाया है इससे राजनीतिक दलों की नींद उडी हुई है । फिर बिहार , बंगाल , तमिलनाडु , दिल्ली की तर्ज पर अगर इसे देखे तो हवा का रुख सत्ता के साथ भी हो सकता है । वैसे उत्तराखंड में बारी बरी से भाजपा और कांग्रेस की सरकार बनती रही है । तीसरी ताकत के रूप में उत्तराखंड क्रांति दल जरूर है लेकिन पिछले 16 बरस में आपसी टूट से उसे नुकसान  झेलने को मजबूर होना पड़ा है । राज्य के मैदानी इलाकों में बसपा का कई जगह प्रभाव अभी भी कायम है । ऐसे में अगर कोई बड़ा उलट फेर होता है और खुदा ना खास्ता बागी  जीत ना पाएं लेकिन भाजपा और कांग्रेस का खेल खराब तो कर ही सकते हैं ।

उत्तराखंड गठन  के बाद हुए पहले आम चुनाव में 54  फीसदी मतदान हुआ । तब कांग्रेस की सरकार बनी जिसके मुखिया  नारायण  दत्त  तिवारी थे  । 2007  में मतदान का आंकड़ा 59  फीसदी पर पहुंच गया तब भाजपा ने वापसी की जिसकी कमान बी सी खंडूरी के हाथ रही ।  2012  के बरस में  मतदान का प्रतिशत 65 फीसदी पर कर  गया  जो इस बार 70  पहुंच गया है। ध्यान देने वाली बात यह है उत्तराखण्ड में हर चुनाव के बाद निजाम भी बदले हैं ।   इस लिहाज से कुछ कुछ सत्ता परिवर्तन और एंटी इंकम्बेन्सी के आसार भी दिख रहे हैं  । फिलहाल नजरें 11 मार्च की तरफ हैं जहाँ यह निर्धारित होगा क्या मोदी का विजय रथ रावत रोकते हैं या 2014  के लोक सभा चुनावों की तर्ज पर  मोदी उत्तराखंड में अपने मैजिक के आसरे रावत की लुटिया डुबोकर कांग्रेस मुक्त उत्तराखंड कर पाते हैं  ?

कोई टिप्पणी नहीं: