Thursday, 28 October 2021

उत्तराखंड बनने के बाद अवधारणाएँ जस की तस बनी हुई हैं


 


 
उत्तराखंड क्रांति दल के शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की विधानसभा में चार बार प्रतिनिधित्व कर चुके हैं  राज्य निर्माण आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले ऐरी राज्य में उत्तराखंड क्रांति दल का बड़ा संगठन खड़ा नहीं कर पाए। अपनी साफ और ईमानदार छवि को वह पार्टी के वोट बैंक को बढ़ाने में इस्तेमाल नहीं कर पाए। पृथक राज्य के लिए चले जनांदोलन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है और एक दौर ऐसा भी रहा जब अविभाजित उत्तर प्रदेश में काशी सिंह ऐरी की तूती बोला करती थी परन्तु इसके बाद भी उनका दल उत्तराखंड में लोगों का विश्वास जीतने में कामयाब नहीं हो पाया है। कहीं न कहीं इन 21 बरसों में उक्रांद के कमजोर सांगठनिक ढांचे का फायदा राज्य में भाजपा और कांग्रेस ने उठाया है। पार्टी में समय –समय पर हुई टूट ने भी उक्रांद को भीतर से कमजोर किया है

 काशी सिंह ऐरी मानते है उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के प्रमुख मुद्दे रसातल में हैं। जिनके मन में उत्तराखंड को लेकर कोई पीड़ा नहीं थी उनके नुमाइंदे आज राज्य में शासन कर रहे हैं। 21 बरस  बीतने के बाद भी राज्य की स्थितियाँ अच्छी नहीं कही जा सकती हैं। पहाड़ों से पलायन बदस्तूर जारी है। जल ,जमीनजंगल जैसे मुद्दे हाशिये पर है। स्थायी राजधानी, परिसंपत्तियों के मामले आज तक नहीं सुलझे हैं। बेरोजगारी बढ़ रही है , समस्याएँ जस की तस बनी हैं जिसके चलते जनता अपने को ठगा महसूस कर रही है।

1993-95 और 2013-15  तक उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) के अध्यक्ष रहे काशी सिंह ऐरी पर एक बार फिर दल ने भरोसा जताते हुए उन्हें पिछले दिनों अपना नया  केंद्रीय अध्यक्ष चुना है। उत्तराखंड क्रांति दल के 20वें द्विवार्षिक अधिवेशन में उन्हें सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया है।

हर्षवर्धन पाण्डे के साथ काशी सिंह ऐरी ने आगामी चुनावों और उत्तराखंड के तमाम सवालों को लेकर खुलकर विस्तृत बातचीत की । प्रस्तुत है इस बातचीत के अंश :
 
नवंबर 2000 को उत्तराखंड का गठन हुआ। आज  21 बरस पूरे होने जा रहे हैं। इस सफर को राज्य निर्माण आंदोलन में भागीदार और एक अनुभवी नेता के तौर पर आप कैसे देखते हैं और कहाँ खड़ा पाते हैं ?

उत्तराखंड राज्य की मांग कोई ऐसी नहीं थी कि हमारा उत्तर प्रदेश से कोई झगड़ा था। हमारी जो मूल अवधारणा थी, उत्तराखंड की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक परिस्थिति यूपी से सर्वदा भिन्न है। बड़ा प्रदेश है और अगर अलग इकाई के रूप में गठित हो जाएगा तो हम अपनी भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक परिस्थिति जल ,जमीन, जंगल के हिसाब से प्लानिंग करेंगे और यहाँ विकास को आगे बढ़ाएँगे लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ है। अभी 21 साल होने जा रहे हैं यहाँ की जनता ने सत्ता काँग्रेस और भाजपा को सौंप दी। इनके जेहन में कोई परिकल्पना नहीं है । इन्होनें उत्तराखंड को उत्तर प्रदेश के एक हिस्से की तरह चलाया है। प्लानिंग में कोई फर्क नहीं है । होना तो ये चाहिए यहाँ के संसाधन के हिसाब से आप प्लानिंग करें। उनका सही ढंग से दोहन करें और यहाँ रोजगार के अवसर पैदा करें। यहाँ की आर्थिकी बढ़ाएँ। हमारा भौगोलिक क्षेत्र यूपी से अलहदा है तो यहाँ किस तरह की प्लानिंग होनी चाहिए ? किस तरह की विकास योजनाएँ होनी चाहिए और यहाँ हमारे जो संसाधन हैं। मसलन पानी है जो हमारा सबसे ज्यादा है । हम जम्मू कश्मीर, सिक्किम या पूर्वोत्तर जितने भी राज्य हैं,  हिमाचल से ज्यादा पानी की संपत्ति हमारे पास है लेकिन हमने उसका कोई सदुपयोग नहीं किया है । जंगल हमारा सबसे समृद्ध है। उसका भी कोई उपयोग नहीं किया है। हमारे यहाँ पर बागवानी , उद्यान की अपार संभावनाएँ मध्य हिमालय में हैं। यहाँ की टोपोग्राफी, यहाँ का अल्टीट्यूड,  लैटीट्यूड है वो अन्य प्रदेशों से भिन्न है। जल , जमीन और जंगल को लेकर प्लानिंग होनी चाहिए थी जिसके हिसाब से हम विकास योजनाएँ बनाएँ ताकि यहाँ के संसाधनों का सदुपयोग हो। उससे यहाँ के लोगों को रोजगार मिले वो तो बिल्कुल ही पीछे छूट गया है। सरकारों ने इन सबके बारे में कुछ सोचा तक नहीं है। हमने कई बार कहा जल , जमीन और जंगल के हिसाब से आप प्लानिंग करें। यू पी के हिसाब से प्लानिंग करना जरूरी नहीं है। अगर ऐसा ही था तो हम यूपी से क्यों अलग हुए ? नतीजा ये हुआ है 21 बरसों में हमें जहां पहुँचना था वहाँ न पहुँचते हुए उससे भी पीछे हुए हैं। लोग आज शिकायत कर रहे हैं इससे अच्छा तो यूपी था। ये इसलिए कह रहे हैं विकास तो हुआ नहीं है। हमारे संसाधनों की लूट जरूर जारी है। उससे यहाँ  के स्थानीय लोगों को कोई फायदा नहीं हुआ है। रोजगार नहीं बढ़ा है। उल्टे इन संसाधनों की भारी लूट और भ्रष्टाचार बढ़ा है। प्रदेश बनने का जो मकसद था वो एक तरह से पराजित हो गया है, खत्म हो गया है , पीछे रह गया है। आज जो स्थिति है बेरोजगारी बढ़ रही है। भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर बाहर के लोगों का कब्जा और लूट जारी है । इसी को लेकर आज लोग शिकायत कर रहे हैं। उत्तराखंड बनने के बाद जो अवधारणाएँ पहले की थी वो जस की तस बनी हुई हैं।

डबल इंजन की सरकार तो कहती है हमने बहुत विकास किया है प्रदेश का । प्रचंड बहुमत की  सरकार में तीन सीएम बदले जा चुके हैं ।

डबल इंजन का मैं उदाहरण देता हूँ। आज हमारे पास चार इंजन हैं और उसके बावजूद हमारी एक लाख करोड़ रु से अधिक की संपत्ति यूपी के कब्जे में है। पहला इंजन उत्तराखंड में भाजपा की सरकार , दूसरा इंजन केन्द्र की मोदी सरकार , तीसरा इंजन यूपी में भाजपा सरकार , चौथा इंजन यूपी सीएम योगी जी हमारे पर्वतीय मूल के हैं। चार- चार इंजन लगाकर भी आज हम अपनी परिसंपत्तियों को वापस नहीं ले पाये हैं। रहा सवाल सीएम का जो आपने किया है मैं मानता हूँ चाहे भाजपा के सीएम हों काँग्रेस के सीएम ये अपने हाईकमान के मुनीम की तरह काम करते हैं। जैसा हाईकमान कहेगा उतना काम करते हैं। जितनी चाबी वो भरता है उतना ही चलते हैं। चाबी बंद कर दी तो नया मुनीम रख दो। ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

राज्य में अब तक की सरकारों में उक्रांद भी हिस्सेदार रहा है । चाहे वो खंडूड़ी सरकार हो या विजय बहुगुणा , हरीश रावत की सरकारों  में यूकेड़ी शामिल रही है । आदर्श राज्य न बन पाने का दोषी आप किसे मानते हैं ?

ये सवाल पैदा होता है लोग करते हैं आप भागीदार रहे। खंडूड़ी सरकार में हमारे एक मंत्री थे। हमने समर्थन इसलिए दिया था दुबारा चुनाव का सामना प्रदेश को नहीं करना पड़े। कोई भी दुबारा चुनाव में नहीं जाना चाहता था। हमने अपने 9 बिन्दु दिये थे और उन पर काम करने को कहा था। एक बिन्दु पर हमने कहा था पर्वतीय क्षेत्रों के लिए अलग  औद्योगिक नीति बनाएँ । नीति केवल कागजों में बनी है, आगे नहीं बढ़ी। जब काम नहीं किया भाजपा ने तो हमने समर्थन वापस लिया था और हम सरकार से अलग हो गए थे। 2012 की विजय  बहुगुणा सरकार या हरीश रावत सरकार में हमारा एक विधायक था। उसने समर्थन दिया वही मंत्री भी बना उसके बाद उसने पार्टी भी छोड़ दी। हमारे समर्थन का तो कोई मतलब ही नहीं था। तो इसलिए जो सवाल पूछते हैं वो पूरे परिप्रेक्ष्य को नहीं समझते। केवल ये एक जुमला हो गया आप भी सरकार की गोद में बैठे। ऐसा कुछ नहीं है ।

राज्य निर्माण आन्दोलन के दौर में जिस गियर में यूकेडी थी वो गियर कहीं पीछे छूट गया है । कुछ लोगों की अति महत्वाकांक्षा के चलते भी पार्टी को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा है ?

महत्वाकांक्षा और कुछ लोगों के आपसी मतभेद के कारण भी पार्टी को काफी नुकसान हुआ है। इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन एक बात मैं आपको बताऊँ आप नोट करना चाहें तो करें। 2002 में जब राज्य का पहला विधानसभा का चुनाव हुआ था,  हमने राज्य बनाया था । रात- दिन एक करके पूरा सब कुछ तन, मन धन लगाकर राज्य बनाया। उसके बाद भी जनता ने हमें 4 विधायक दिये। ये कोई अच्छा जनादेश थोड़ी था और  जनता ने हमारे उस त्याग को नकार सा दिया। तब तो हम किसी के समर्थन में भी नहीं थे। एक टाइम किसी के विरोध में नहीं थे । पार्टी एक थी। ये भी एक कारण हो सकता है बिना किसी लड़ाई- झगड़े के हम 2002 के चुनावों में गए थे। 4 सीटें मिली थी। अच्छा जनादेश थोड़ी था। ये जनता को भी इस बारे में सोचना चाहिए राज्य बनाने वाले लोगों को,  जिनके दिलों दिमाग में राज्य की परिकल्पना थी , यहाँ के विकास की , रोजगार की बात थी उनको तो कभी जनादेश दिया ही नहीं।  

गांधी जी जिस तरह आज़ादी के बाद काँग्रेस को खत्म करना चाहते थे। इसी तरह आपके कुछ नेता इसे खत्म करना चाहते थे । क्या ये कदम सही होता उस दौर में ? साथ ही संयुक्त संघर्ष समिति राज्य आन्दोलन के लिए जो आपने बनाई उसको जो माईलेज मिलना चाहिए था वो नहीं मिला ?

वो नहीं मिला। साथ में इसमें एक बात मैं और बताना चाहता हूँ कि 1994 में जब सारी जनता आन्दोलन के लिए तैयार हो गयी तो भाजपा काँग्रेस के लोग जिनका राज्य को समर्थन नहीं था लेकिन उसके नीचे के कैडर भी चाहते थे कि हम आंदोलन में आएँ । इसके अलावा जो कर्मचारी , विद्यार्थी , वकील , व्यापार संघ के लोग थे, वे भी चाहते थे हम आंदोलन में  आएँ। हम लोगों का ये था यूकेडी के झंडे के नीचे नहीं आएंगे। हमने अपना संगठन पीछे किया और संयुक्त संघर्ष समिति बनाई। उसके तहत आन्दोलन हुआ और राज्य हासिल हुआ। हमारा दल कमजोर हुआ। ये मैं मानता हूँ लेकिन हम लोगों का जो अभीष्ट था। हमारा जो लक्ष्य था, मिशन था, राज्य बनाना उसमें हम सफल रहे।

राज्य गठन के बाद बेलगाम नौकरशाही को साधना यहाँ हर राजनीतिक दल के लिए बड़ी चुनौती रही है । क्या सिर्फ बेलगाम नौकरशाही से राज्य का बेड़ा गर्क हुआ है या राजनेता भी जिम्मेदार हैं जिनके पास कोई विजन नहीं है ?

बिल्कुल आपने ये सही कहा। नौकरशाह तो ऐसा ही करेगा। नौकरशाह उस घोड़े की तरह है घोड़े में बैठे सहसवार को लगता है ये मेरे को कंट्रोल करेगा तो उसके मुताबिक चलेगा। दूसरे को लगता है वो अपने हिसाब से चलेगा। उसको साधने के लिए आपके पास दिमाग होना चाहिए। वो नहीं है। थोड़ा बहुत तिवारी जी का अनुभव रहा। शुरुवात में 2002 से 2007 के बीच में उन्होनें सरकार भी चलाई, नौकरशाहों को भी काबू में रखा। उसके बाद तो समझिए बिल्कुल बेलगाम रही है अभी भी बेलगाम है।

क्या इस बार उक्रांद एकजुट है ? पूरी ताकत के साथ आप लड़ेंगे चुनाव ?

बिल्कुल, हम पूरी ताकत से लड़ेंगे। 70 सीटों पर हम लड़ने की कोशिश कर रहे हैं। जो उत्तराखंड के क्षेत्रीय दल, संगठन हैं उत्तराखंड के सरोकारों से जुड़े रहे हैं। चाहे वो छोटे दल हों जनसंगठन हों,  उनसे सीट शेयरिंग पर हमारी बातचीत चल रही है। उनके साथ तालमेल जरूर करेंगे। वरना हम अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।

राज्य के शुरुवाती दो चुनाव में उक्रांद ठीक-ठाक स्थिति में था लेकिन मुझे लगता है रामनगर में आपकी पार्टी के अधिवेशन के बाद से स्थितियाँ पूरी तरह से पार्टी में बादल गयी। अगर उस समय आप कमान अपने हाथों में लेते तो शायाद पार्टी अभी मजबूत स्थिति होती ?

मैं बिल्कुल आपकी इस बात से सहमत हूँ। 2010 में रामनगर में पार्टी का अधिवेशन हुआ। 99 प्रतिशत लोग चाहते थे कमान मैं संभालूँ । कुछ नेताओं ने इसका विरोध किया और मैंने दल न टूटे इसलिए अपनी दावेदारी वापस ले ली। फिर उसके बाद हमारे नेताओं की नासमझी महत्वाकांक्षा थी। वो आगे आई और मेरे प्रयासों के बावजूद दल टूटा और उसके बाद हमको नुकसान होता गया।

एक सवाल उक्रांद के बारे में उठता रहा है यहाँ सेकंड और थर्ड लाईन लीडरशिप नहीं है। भविष्य को देखते हुए क्या आप इसे तैयार कर रहे हैं ?

सेकंड और थर्ड लाईन है और फर्स्ट लाईन भी जो काम करे दिशा निर्देश  दे। जब फर्स्ट लाइन  अच्छी तरह से ट्रैक बनाएगी तो सेकंड लाईन काम करेगी। अभी तो ट्रैक बनाना ही छूट गया हमारा। सही ट्रैक बनाना है उत्तराखंड के विकास का, उत्तराखंड के रोजगार का, लोगों की  भलाई का वो ट्रैक बनाने का प्रयास हम कर रहे हैं तभी सेकंड लाईन आगे आएगी ।

युवाओं को साधने की हर दल कोशिशें कर रहा है। क्या उक्रांद जो टिकट देगा उसमें युवाओं और अनुभव  दोनों का सम्मिश्रण होगा ?

बिल्कुल हम युवाओं की भागीदारी बढ़ाएँगे और अनुभव को भी तरजीह देंगे। कुल मिलाकर  हम इस बात पर मुतमईन हैं । थोड़ा बहुत हमें भी इसका अहसास हो रहा है। युवा भी अब समझने लगा है। भाजपा और काँग्रेस के साथ –साथ रहते हुए अपनी चेतना को अपनी चेतना को खत्म किया है और उत्तराखंड के सवालों का हल नहीं निकला है।

कोई दल परिवर्तन यात्रा निकाल रहा है तो कोई रोजगार यात्रा लेकिन उक्रांद मैदान में कहीं नजर नहीं आ रहा है ? एक सवाल उठता है इस राज्य में जल , जमीन , जंगल पर्यावरण जैसे तमाम मुद्दे हैं लेकिन फिर भी उक्रांद आंदोलन करना भूलता जा रहा है ?

हाँ ,मैं मानता हूँ उस तीव्रता और व्यापकता में आंदोलन नहीं हुए हैं क्योंकि हमारी भी एक सीमा है। हमारे आंदोलन में आने वाले लोगों की भी एक सीमा है। हमारे पास ताकत नहीं है और जनता भी ताकत के साथ जाने की आदी हो चुकी है। हम विचार कर रहे हैं किस तरह से लोगों की चेतना वापस  लाई जाए और इन सारे सवालों पर सरकार को घेरा जाए चाहे सरकार किसी की  भी बनें ।

बेरोजगारी इस प्रदेश का सबसे बड़ा मुद्दा है। प्रचंड बहुमत की सरकार ने साढ़े चार साल तक तो कोई नियुक्तियाँ नहीं निकाली लेकिन जब चुनाव पास आ रहे हैं तो वो भर्तियों का पिटारा खोल रही है।  क्या ये भी पूरी तरह से चुनावी जुमला तो नहीं है ?

पूरी तरह से जुमला है। एक अखबार की घोषणा है। टीवी की घोषणाएँ हैं। आप देखिये ये 23000 पदों को जो भरने की बात कर रहे हैं ये चुनावी जुमला है मैं आपको दावे एक साथ कह रहा हूँ। चुनाव हो जाएंगे लेकिन 23000 नौकरियों का अता – पता नहीं होगा। ये यहाँ के जुमले हैं और ये जनता को ऐसे ही ठगते रहे हैं। तो इस बात को यहाँ का युवा अब समझ रहा है और हम भी समझाने की कोशिश करेंगे ये जुमलेबाजी है। रोजगार के बारे में कोई नीति , कोई विजन नहीं है ।

किन मुद्दों को लेकर आप जनता के बीच जा रहे हैं ?

राज्य की नीति और चुनावों के मुद्दों को लेकर चलने वाला दल उक्रांद है । राजधानी का सवाल है , बेरोजगारी ,भ्रष्टाचार , परिसीमन , भू कानून जैसे कई मुद्दे है जिनको लेकर हम जनता के बीच जाएंगे । यही मुद्दे लेकर हम चुनाव में भी जाएंगे ।

15 जनवरी 1994 में कभी बागेश्वर में सरयू नदी के तट पर नए राज्य की राजधानी गैरसैण को बनाने का संकल्प लिया था।  गैरसैण में आज तक वो संकल्प अधूरा है ? भाजपा काँग्रेस ने राजधानी के नाम पर प्रपंच ही किया है ।  उक्रांद का क्या स्टैंड है इस विषय में ?

हमारा तो स्पष्ट मत है स्थायी राजधानी गैरसैण को बनाए। बिना इसे बनाए इस प्रदेश का भला नहीं होने वाला है। आपने प्रपंच शब्द का इस्तेमाल किया जो सही है क्योंकि दोनों राजनीतिक दलों ने अब तक जनता की आंखो में धूल झौंकने का ही काम किया है । स्पष्ट बात है।  भारत सरकार का पहला जीओ, जब राज्य बना था तो ये था अस्थायी व्यवस्था राजधानी के लिए देहरादून में की जाती है। स्थायी राजधानी के लिए चुनी हुई सरकार विधान सभा में प्रस्ताव रखेगी। उस प्रस्ताव के आधार पर राजधानी बनेगी। एक विधानसभा के आधार पर एक प्रस्ताव तक नहीं आया और प्रपंच बाहर से कर रहे हैं तो ये चाहते नहीं हैं। ये ग्रीष्मकालीन या भराड़ीसैण में विधानसभा सत्र बुला लें , कैबिनेट बुला लें ये सब प्रपंच है । असली बात ये है कि विधान सभा में प्रस्ताव लाकर उसे पारित करके गैरसैण को स्थायी राजधानी घोषित करें तभी इस बात का समाधान होगा। 

सत्ता में आने पर उक्रांद की प्राथमिकताएँ क्या रहेंगी ?

सबसे पहले सख्त भूकानून लाएँगे ।राजधानी का सवाल हल करेंगे। रोजगार की दीर्घकालिक और अल्पकालिक नीति बनाएँगे और जो हमारी भौगोलिक , सामाजिक, आर्थिक परिस्थिति है उसको आधार बनाते हुए हम यहाँ विकास की प्लानिंग करेंगे , यहाँ की  योजना बनाएँगे। यही हमारी प्राथमिकता है ।

उक्रांद में टिकटों का बंटवारा कब तक होगा ?
हमने तो इसके लिए अक्तूबर माह की सीमा तय की थी लेकिन 15 नवंबर तक हम कुछ टिकटों की घोषणा  कर लेंगे ऐसी मुझे उम्मीद है।

छोटे दलों के साथ भी क्या इस बार आप समझौता करेंगे या इस बार विचारधारा से कोई समझौता नहीं । जल , जमीन , जंगल पर ही फोकस ?

मैंने पहले भी कहा जो क्षेत्रीय दल-संगठन यहाँ सक्रिय हैं जैसे रक्षा मोर्चा , महिला मोर्चा ,परिवर्तन पार्टी सरीखे संगठन काम कर रहे हैं। उनके साथ हमने प्रारम्भिक बैठक की है। आगे भी बातचीत करेंगे। उनके साथ सीट शेयर करेंगे और ये कोशिश करेंगे भाजपा और काँग्रेस के खिलाफ जो वोट है वो बंटे नहीं। वो इकठ्ठा रहे तब एक सार्थक दिशा में हम आगे बढ़ सकते हैं । इस दिशा में हम प्रयासरत हैं।

  प्रवासी और युवा इस राज्य कि बड़ी ताकत रहे हैं । क्या उक्रांद इन सबको अपने साथ जोड़ने की दिशा में भी काम कर रहा है इस बार ?\

प्रयासरत हैं हम। हमने इसके लिए अलग से एक पालिटिकल अफेयर्स कमेटी बनाई है जो इन सब चीजों को देख रही है।

पहाड़ में विकास को लेकर उक्रांद का माडल हम जानना चाहते हैं ?

हमारा माडल बहुत स्पष्ट है। यहाँ के जल, जमीन , जंगल के आधार पर प्लानिंग होनी चाहिए । यहाँ की सामाजिक –आर्थिकी की जो परंपरा है ,जो यहाँ की सोच है इससे आगे बढ़ाकर अगर सरकार प्लानिंग करे तो यहाँ रोजगार भी मिलेगा। यहाँ के संसाधनों का उपयोग भी होगा और यहाँ से पलायन भी रुकेगा तो यही है हमारी प्राथमिकता भी ।

खंडूड़ी जी ने लोकायुक्त की बात की थी। भाजपा ने भी अपने घोषणापत्र में दावा किया था 100 दिन में लोकायुक्त लाएँगे लेकिन लोकायुक्त का मुद्दा साढ़े चार साल में कहीं भटक सा गया।  ये पार्टियों के ऐजेंडे में ही नहीं है या लाना नहीं चाहते भाजपा और काँग्रेस दोनों  ?

दोनों राजनीति राजनीतिक दल भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए हैं और उस भ्रष्टाचार को उजागर नहीं करना चाहते। अगर काँग्रेस सत्ता में आती है तो भाजपा ने घोटाले कर दिये। भाजपा सरकार में आई तो काँग्रेस ने 56 घोटाले कर दिये। एक भी घोटाले की जांच नहीं हुई । एक चौकीदार तक सस्पेंड नहीं हुआ है अब तक  इसलिए ये इनका जो नाटक है ड्रामा है ,प्रपंच है ये कुछ लोकायुक्त लाने वाले नहीं हैं । लोकायुक्त अगर कोई लाएगा तो वो उक्रांद ही है अगर वो सत्ता में आया तो ।

पूर्व सीएम त्रिवेन्द्र रावत के दौर में इन्वेस्टर मीट के नाम पर बड़े -बड़े दावे किए गए लेकिन \हासिल कुछ भी नहीं हुआ। पहाड़ों में भी  आज तक कोई उद्योग नहीं लगा । क्या ये भी जुमलेबाजी थी ?

इन्वेस्टर मीट के नाम पर करोड़ों रु इन्होनें खर्च किए लेकिन हासिल शून्य हुआ । खंडूड़ी जी के समय में हमारे दबाव से ही सही पर्वतीय इलाकों के लिए अलग से औद्योगिक नीति बनी । मैंने आपसे पहले भी कहा ये सब कागजों में है। करना कुछ नहीं है। जनता को बरगलाने , ध्यान भटकाने के लिए ये मीट भी करेंगे। ये पलायन आयोग भी बनाएँगे। इस किस्म की  चोंचलेबाजी भी करेंगे लेकिन ये करने  वाले कुछ भी  नहीं है ।

मूल निवास प्रमाणपत्र का महत्व स्थायी निवास प्रमाण पत्र की तुलना में कम हो गया है । जिलों की कई तहसीलों में आजकल युवा काफी परेशान हो रहे हैं ?

हमने इस मुद्दे को उठाकर आंदोलन किए हैं और हम चाहते हैं कि जो स्थायी निवास प्रमाण पत्र है वो मानक नहीं होना चाहिए। मूल निवास प्रमाण पत्र का जो कट आफ ईयर है वो 1950 होना चाहिए।  अगर ऐसा होगा  तब यहाँ के युवाओं को न्याय मिलेगा।

भू कानून को लेकर अपनी पार्टी की स्थिति स्पष्ट करें ।

भू कानून के संदर्भ में हमने राज्य आंदोलन के दौरान ही कहा था  कि संविधान का आर्टिकल  371 है , 370 जम्मू और कश्मीर का है । 371 में विभिन्न राज्यों की,  जो विशिष्ट समस्याएँ है। संविधान में रखकर उनका समाधान किया गया है। हमने कहा था आर्टिकल 371  के तहत उत्तराखंड के लिए ऐसे प्रावधान किए जाएँ कि यहाँ जमीन खरीद- फरोख्त बिल्कुल ना हो सके। बाहर का कोई भी व्यक्ति यहाँ पर जमीन ना खरीद सके। फिर हमने लड़ाई लड़ी तो तिवारी जी के समय पर एक रस्म अदाएगी की गई। खंडूड़ी जी के समय में एक भू कानून लाया गया जिसमें  उन्होनें 500 मीटर की जगह 250 मीटर कर दिया लेकिन जो लुफ़ूल्स थे वे वैसे ही रख दिये। नतीजा ये हुआ जमीन की खरीद- फरोख्त जारी रही और 2018 में टीएसआर ने तो सारा गेट ही खोल दिया जो चाहे जितनी जमीन खरीद ले और उसकी का नतीजा है आज पर्वतीय क्षेत्र के डाणे-काने सब बिक रहे हैं ।

गैरसैण में उत्तराखंड के तमाम राजनेता और कैबिनेट मंत्री अपनी जमीन खरीद चुके हैं ।

ये भू कानून तो जरूरी है। कम से कम ये तो होना चाहिए हिमाचल की तरह सख्त होना चाहिए ।

देश में इस समय फ्री पॉलिटिक्स पर ज़ोर दिया जा रहा है। आप पार्टी उत्तराखंड में गारंटी कार्ड दे रही है। फ्री बिजली पानी की बात काँग्रेस भी कर रही है। क्या ये सब चीजें जनता को अकर्मण्य तो नहीं बना देगी ?

फ्री की पालिटिक्स नहीं होनी चाहिए। हम तो ये कहते हैं हमारी बिजली है , हमारा पानी है आप फ्री करने वाले कौन होते हैं ? हमको अगर आगे बढ़ना है तो हमारी बिजली , पानी की व्यवस्था ठीक होनी चाहिए। उसको सुचारु होना चाहिए। वे यहाँ के लोगों को मिले तब हम देखेंगे उसको फ्री किया जा सकता है कि नहीं।

आप जुम्मा गाँव पिछले दिनों घूम आए हैं। आज प्रदेश में 500 गाँव ऐसे हैं जिनको सरकार विस्थापित नहीं कर पाई है । इस संबंध में क्या कहता है आपका ?

अभी मेरे ख्याल से 500 से अधिक गाँव हैं । हमने तो इनको 2010 में प्रस्ताव दिया था आज नहीं। 2010 में कहा था हमारे जो विस्थापित होने वाले गाँव हैं उनको तराई और भाबर के फारेस्ट एरिया में विस्थापित कर दीजिए। जितनी जमीन आप उनको वहाँ देते हैं उतनी ही जमीन यहाँ है । इसको आप रिजर्व फारेस्ट एरिया घोषित कर दो । तो उसका नतीजा क्या होगा न तो  रिजर्व फारेस्ट एरिया घटेगा और वो विस्थापित भी हो जाएंगे लेकिन 2010 का ये प्रस्ताव अभी तक लंबित है। इन्होनें भारत सरकार को कोई प्रस्ताव नहीं दिया है । ये नौटंकीबाजी है और कल के दिन इनको और मुश्किलें आने वाली हैं। विस्थापन कहाँ किया आपने जरा बताइये । एक गधेरे से निकालकर दूसरे गधेरे डाल दिया आपने तो। उस गधेरे में आपदा आ जाएगी तो क्या करेंगे आप। ये स्थायी हल नहीं है । स्थायी हल ये है आप रिजर्व फारेस्ट एरिया बढ़ाओ।  जो भी जमीन आपको तराई -भाबर में मिले या पहाड़ में मिले तो सही जगह है उसमें बसाओ और उन गांवों को फारेस्ट एरिया घोषित कर दो।  न फारेस्ट कम होगा और उनका पुनर्वास  भी हो जाएगा।

किसान आंदोलन उत्तराखंड में राष्ट्रीय दलों की संभावनाओं को कितना खत्म करेगा तराई में । पहाड़ में प्रभाव न हो लेकिन तराई में तो प्रभाव देखा जा रहा है ।

निश्चित तौर पर तराई में बड़ा प्रभाव है। पहाड़ के किसानों को भी समझना चाहिए। यहाँ तो किसान कम ही हैं लेकिन ये सवाल अनाज खाने का भी है। कल के दिन अनाज हमको फ्री मिलेगा कि नहीं मिलेगा। ये अदानी -अंबानी और तमाम सारे लोग अनाज खरीदने धीरे- धीरे  सारे खेत अपने पास कर लेंगे और मुहमांगे दामों में बेचेंगे। कल के दिन हमारे तो खाने के लाले पड़ जाएंगे। तो किसान आंदोलन केवल किसानों तक ही सीमित नहीं है। आम उपभोक्ता गरीब तबके तक भी सीमित है। गरीब आदमी भी अनाज कहाँ से खाएगा ? अदानी- अंबानी अनाज से पता नहीं क्या –क्या बनाएँगे ? अनाज भी नहीं रहने देंगे तो विदेशों में अनाज की  कमी हो जाएगी ।

प्रदेश अंतर्राष्ट्रीय सीमा से घिरा हुआ है। पिछले दिनों पलायन भी तेजी से राज्य में बड़ा है। कोविड में तमाम प्रवासी यहाँ पहाड़ आए और जमीन न होने के चलते वापस लौट गए। कहीं न  कहीं सरकारें भी इनको कैश कर पाने में नाकामयाब साबित हुई हैं । हरिद्वार , उधमसिंह नगर , नैनीताल में  डेमोग्राफिक बदलाव को कितना बड़ा खतरा आप मान रहे हैं ?

वहाँ पर निश्चित तौर पर आबादी बढ़ी है इसलिए बढ़ी है बाहर से लोग आकार बस गए हैं। राज्य  से बाहर के लोग। दूसरा पहाड़ में भी लोग पलायन करके वहाँ जा रहे हैं। जाहिर है ऐसे में जनसंख्या बढ़नी लाज़मी है। पहाड़ में जनसंख्या ऐसे में कम होगी। आने वाले समय में जब परिसीमन होगा तो उसमें अगर जनसंख्या के आधार पर आप परिसीमन करेंगे तो पहाड़ की सीटें और घट जाएंगी। अभी तो 6 सीटें घटी हैं पहले परिसीमन में। अब यही सिलसिला चला तो निश्चित रूप से पहाड़ में और सीटें कम होंगी और पहाड़ का राजनीतिक अस्तित्व ही ख़त्म हो जाएगा।

पिछले दिनों धामी सरकार ने केंद्र सरकार को पंतनगर विवि को केन्द्रीय विवि बनाने का एक प्रस्ताव भेजा है । आप मुखर रहे हैं इसके खिलाफ। ये स्थानीय युवाओं के साथ बड़ा कुठराघात तो नहीं है ?

बहुत बड़ा कुठराघात है। पंतनगर हमारा राज्य विवि है । पंतनगर में अभी मोटे तौर पर 85 फीसदी सीटों पर प्रवेश उत्तराखंड के लोगों के होते हैं। 15 फीसदी आल इंडिया मेरिट से आते हैं । जिस दिन के आरक्षण खत्म हो जाएगा तो हमारे बच्चों को आल इंडिया मेरिट से आना पड़ेगा जिसका सीधा प्रभाव यहाँ के युवाओं पर पड़ेगा। हम तो ये कहते हैं आप केंद्र सरकार से नया विवि मांगिए। अपने बने- बनाए विवि को केंद्र को देकर आप उत्तराखंड के नौनिहालों के साथ न्याय कर रहे हैं ? ये सोचना चाहिए ।

पिछले दिनों हल्द्वानी के उत्तराखंड मुक्त विवि में बड़े पैमाने पर बैकडोर इंट्री हुई है। आप इस मामले को नहीं उठा रहे हैं ?

बिल्कुल हम उठाएंगे । इस तरह से बैकडोर नियुक्तियाँ यही तो भ्रष्टाचार है। इसी के लिए तो इस राज्य को लोकायुक्त चाहिए। हमने मुद्दा उठाया लेकिन चूंकि सरकार में वो हैं इसलिए कोई एक्शन नहीं लेते। इस पर अंकुश lगाने के लिए ही लोकायुक्त है और अब कितने लोग कोर्ट जाएंगे कब तक जाएंगे ? इसलिए लोकायुक्त होगा तो इस प्रक्रिया में जो धांधली है भ्रष्टाचार है , बैकडोर इंट्री है । उस पर अंकुश लगाने के लिए लोकायुक्त की जरूरत है।

पंतनगर कारीडोर पूर्व सीएम स्वर्गीय एन डी तिवारी के नाम पिछले दिनों सीएम पुष्कर धामी ने किया है। इसी तरह कुमाऊँ विवि का नाम भी उनके नाम से करने की बात हो रही है। व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कुमाऊँ विवि का नाम करना ही है तो प्रोफेसर डी डी पंत के नाम से होना चाहिए ?

उन्होनें पार्टी बनाई है। हम उनके शिष्य रहे हैं। वो काफी प्रकांड विद्वान रहे हैं।  जिन पर देश और उत्तराखंड को गर्व है। इससे ज्यादा जस्टिफाई बात नहीं हो सकती कि कुमाऊँ विवि का अगर नामकरण करना है तो डॉ डी डी पंत के नाम से होना चाहिए। 

आप गढ़वाल घूम आए हैं । देवस्थानम क्या बड़ा मुद्दा बनेगा आगामी चुनाव में ? हालांकि सरकार ने मनोहरकान्त ध्यानी की अगुवाई में एक कमेटी बनवाई है।

इनको किसी मसले का हल नहीं करना है तभी कमेटी बनाई। कभी आयोग बना दो। हम देवस्थानम बोर्ड के खिलाफ हैं लेकिन अगर आप तीर्थस्थान के विकास के लिए बोर्ड बनाना चाहते हैं तो बोर्ड बनाने के अलावा भी कई तरीके हैं उसको आप करिए। देवस्थानम का जो कांसेप्ट इन्होनें बनाया है वो उचित नहीं है।

आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण सरकारें आज तक नहीं कर पाई हैं ?

हमने तो इसके लिए आयोग बनाने की मांग की। इससे आंदोलनकारियों के साथ न्याय नहीं हुआ है । आगे भी नहीं होगा। जब तक आयोग नहीं बनता है। आयोग सब चीजों की जांच करके सही आदमी का चिन्हीकरण नहीं करता है, तब तक ये बिलकुल गलत तरीका है चिन्हीकरण का।  हमने इस बात को रखा है लेकिन वे शासनादेश के आधार पर चिन्हीकरण करते हैं।

तकनीकी शिक्षा का राज्य में बेड़ा गर्क हो गया है ।  स्कूल , आईटीआई लगातार बंद हो रहे हैं
इन्होनें बिल्डिंगें तो बना ली। स्कूल , आईटीआई जगह-जगह खोल दिए।उसके लिए जो व्यवस्था होनी चाहिए थी वो नहीं हुई । न तो फ़ैकल्टी है अपने पास न ही उसके उचित ट्रेड हैं। ये भी एक आईवाश है।

अलग हिमालयन नीति की मांग इस राज्य में होती आई है । ग्रीन बोनस की  मांग तो उक्रांद भी उठाता आया है ।

सही कहा आपने ग्रीन बोनस की मांग हमारी पार्टी करती आई है । जब योजना आयोग मोदी सरकार ने भंग नहीं किया था तो 1000 करोड़ रु प्रतिवर्ष देने की बात आयोग ने की थी ।  हमने 10000 करोड़ रु प्रतिवर्ष कम से कम  देने की  मांग की थी क्योंकि हम पर्यावरण की  रक्षा कर रहे हैं। जंगलों को बचा रहे हैं। अगर ईधन के रूप में हम जंगलों को काटेंगे तो आपका पर्यावरण कैसे बचेगा? इसलिए पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए इस क्षेत्र में निशुल्क गैस केंद्र सरकार को देनी चाहिए ग्रीन बोनस के अलावा।

डीडीहाट जिले का मसला इन दिनों काफी तूल पकड़ रहा है । छोटी इकाइयों के गठन का हिमायती तो उक्रांद भी राज्य आंदोलन के दौर से रहा है ।  आपने अपने ब्लू प्रिंट में कई जिलों के गठन  की  बात एक दौर में की थी ।

हमने अपने ब्लू प्रिंट में 23 जिले रखे हैं। उक्रांद तो शुरुवात से ही छोटी प्रशासनिक इकाइयों के गटहन का पक्षधर रहा है। इन्होनें कुछ तहसीलें तो बना दी हैं लेकिन जिले नहीं बनाए हैं। डीडीहाट ही नहीं अन्य  जिले भी बनने चाहिए।

उत्तराखंड में पिछले कुछ समय से राजनीति का स्तर बहुत ज्यादा गिर गया है। नागनाथ –सांपनाथ का दौर चल रहा है । जहां सत्ता दिख रही है  वहाँ घूम जा रहे हैं। इसे कैसे देख रहे हैं आप क्या ये जनता के साथ बड़ा धोखा  नहीं है ?

ये तो एक तरह से धोखा है जनता के साथ और जनता  को ही इनको सबक सिखाना चाहिए लेकिन वो सबक नहीं सीखा रही है। आप आज काँग्रेस में कल भाजपा में। फिर काँग्रेस में जा रहे हैं, इनको सबक कौन सिखाएगा। अगर जनता हरा देती इनको तो ये जो सत्ता की दलाली , राजनीति करते हैं। पैसा खर्च करो और जीत जाओ।  कोई सिद्धांत , न नीति -  नियम है तो इस पर रोक तो जनता को ही लगानी होगी।

पिथौरागढ़ का आकाशवाणी केंद्र लंबे समय से सफ़ेद हाथी बना है। नेपाल के एफएम स्टेशन यहाँ पर आसानी से सुने जा सकते हैं लेकिन आकाशवाणी के नहीं। हवाई पट्टी में दशकों से उड़ानें तो चालू नहीं हो पायी लेकिन हवाई बयान उड़ते ही रहे हैं ?

यही विकास का विडम्बना है। 90 के दशक एक एयरपोर्ट और आकाशवाणी केंद्र की आज हालात ये है। क्या अर्थ लगाते हैं इसका? ये सरकारें जनता  की सुन रही हैं या अपनी सत्ता की दलाली में मस्त हैं । चार- चार इंजन होकर भी काम नहीं हो पा रहे हैं।

राज्य आंदोलन से जुड़े तमाम लोग आपको सीएम के रूप में देखना चाहते हैं। क्या ये मुराद इस बार पूरी होगी ?

हम तो चाहेंगे कल ही सीएम बन जाएँ। चुनाव आने वाले हैं। 2022 में अगर जनता चाहती है यहाँ विकास हो और उत्तराखंड बनने का कुछ सिला हासिल हो तो जनता को ही परिवर्तन करना चाहिए। भाजपा –काँग्रेस , काँग्रेस भाजपा , इस दल से उस दल में , उस दल से इस दल की राजनीति को जनता को ठुकराना चाहिए तभी हमारा नंबर आएगा और तभी हम सी एम बन सकते हैं ।

अब तक जो उक्रांद राज्य में हाशिये पर था ऐरी जी,  क्या हम उम्मीद करें  इस  बार वो पटरी पर आएगा और मजबूती के साथ चुनाव में जाएगा ?

हम मजबूती के साथ इस बार लड़ेंगे। अभी युवाओं में भी थोड़ी चेतना आई है कि हमारा क्षेत्रीय दल होना चाहिए और उसके हिसाब से काम होना चाहिए और हम उस चेतना को बढ़ाने का काम कर रहे हैं। मैं सोचता हूँ 2022 में अच्छे नतीजे आएंगे इसके।