Sunday, 17 March 2019

मसूद पर चीन पाक का नया याराना





पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद  पूरी दुनिया  जिस समय पाक को घेरने की  तरह एकजुटता दिखा रही थी  उस समय  चीन ने भी दबाव में आतंकवाद के विरोध का दिखावा तो किया लेकिन बहुत जल्द ही वह अपने करीबी अजीज  पाकिस्तान का बचाव करने में जुट गया |  सीआरपीएफ जवानों पर हुए हमले की चीन ने निंदा  की लेकिन इस हमले के मास्टरमाइंड सरगना मसूद अजहर का साथ नहीं छोड़ा । चीन ने एक बार फिर से अपना असली चेहरा भारत को दिखा दिया है | एक बार फिर से मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने की भारत की कोशिश  नाकाम साबित हुई हैं  । चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद  में  मसूद अजहर को ब्लैकलिस्टेड करने से बचा लिया। बीते 10 बरस में यह चौथा मौका है जब चीन ने इसके लिए अपने वीटो पावर का इस्तेमाल किया। फ्रांस, ब्रिटेन और अमेरिका जहाँ  अजहर के खिलाफ प्रस्ताव लाए थे वही अंतिम समय में चीन ने इस पर अड़ंगा लगा दिया, जबकि 14  देश  इस प्रस्ताव के समर्थन में खड़े रहे |

 चीन और पाकिस्तान की यह दोस्ती नई नहीं है |  पुराने पन्नो को टटोलें तो दोस्ती का यह सिलसला उस दौर से चल रहा है जब नेहरु के  हिंदी चीनी भाई भाई के दावो की हवा निकालकर चीन ने भारत पर युद्ध कर दिया था और  पडोसी पकिस्तान को भारत के खिलाफ लड़ने के लिए ना केवल उकसाया बल्कि अपनी हर इमदाद से पाकिस्तान को ही लाभ पहुचाया और अब पाकिस्तान की ही  पीठ को फिर से  थपथपाकर जिनपिंग ने अपनी शातिर चालबाजियों से भारत को झटका देने का काम किया है |  चीन एक लम्बे अरसे से ही  पाकिस्तानी सरकार और सेना को को मदद करता आया है।  चीन के सुरक्षा परिषद में वीटो के बाद अब  भारत चीन रिश्तों में तल्खी  आने की संभावना बढ़ी है | भारत जहाँ  आतंकवाद के खिलाफ अपनी रण्नीति के तहत पाकिस्तान और अजहर पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाने की कोशिश में जोर शोर से लगा है वहीँ पीाओके  से संचालित आतंकी संगठनों को भी  प्रतिबंधित करने की मांग कर रहा  है लेकिन चीन ने भारत की इस मांग को समर्थन देने से इंकार कर साफ संदेश दिया है कि वह पाक केसाथ ढाल बनकर ही खड़ा रहेगा । चीन ने कहा है वह बिना सबूतों के कार्रवाई के पक्ष में नहीं है । यही बात वह पहले भी दोहराता रहा है । अब यूएनएचसी के सदस्यों ने चीन को चेतावनी दी है। चीन से कहा गया है कि अगर वह मसूद अजहर को लेकर अपने रुख को नहीं बदलेगा तो दूसरी कार्रवाई के विकल्प खुले हैं। इस बीच मसूद अजहर के मसले पर भारत को बड़ी कामयाबी हाथ लगी है | फ्रांस की  सरकार ने अपने देश में मौजूद जैश-ए-मोहम्मद की संपत्तियों को फ्रीज करने का फैसला किया है | फ्रांस की सरकार ने  मौद्रिक और वित्तीय संहिता के तहत राष्ट्रीय स्तर पर मसूद अजहर की संपत्ति का फ्रीज करने की मंजूरी दी है |


असल में चीन के पाक में कई आर्थिक हित  जुड़े हुए हैं | वह  वहां 46 अरब डॉलर का भारी भरकम निवेश कर चुका  है। इनमें से अधिकांश समझौते दोनों देशों के बीच 3,000 किलोमीटर लंबा आर्थिक गलियारा बनाने से जुड़े हुए हैं  जो चीन के शिनजियांग प्रांत को पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से जोड़ेगा जिससे चीन की पहुँच सीधे अरब सागर तक हो जायेगी | यह आर्थिक गलियारा चीन के सुदूर पश्चिमी इलाके को अरब सागर में पाक के दक्षिण पश्चिमी ग्वादर बंदरगाह तक न केवल जोड़ेगा बल्कि इससे चीन की धमक पाक अधिकृत कश्मीर तक भी बढ़ने की प्रबल संभावनाएं दिखाई दे रही हैं जिसके तहत सड़क , रेल बिजली और पाइप लाइन  और उर्जा जैसे कई प्रोजेक्ट के चकाचौंध तले चीन अपनी विस्तारवादी नीति को अमली जामा पहनायेगा और उसके सीधे निशाने पर भारत होगा | इससे पश्चिम एशिया के तेल आपूर्तिकर्ता देशों से चीन की दूरी 12 हजार किलोमीटर तक कम हो जाएगी। लेकिन  भारत के लिए चिंता की बात यह है कि यह प्रस्तावित गलियारा भविष्य में पाकिस्तान के लिए फायदे का सौदा बन सकता है | इसके जरिये पाकिस्तान ना केवल भारत पर सीधे नजर रख सकता है बल्कि सीमा पार से अपनी आतंकी गतिविधियों को नया रंग भी दे सकता है लिहाजा भारत की चिंताएं बढ़नी लाजमी हैं | इससे सड़क, रेलवे व पाइप लाइन के जरिये चीन खनिज तेल और अन्य सामग्री सीधे चीन तक ले जा सकेगा |  चीन का पाकिस्तान का साथ देने की एक वजह कि पाक में चीन सीपैक में 55 बिलियन डॉलर  का निवेश करने जा रहा है । चीन भारत को अपना सबसे बड़ा आर्थिक प्रतिद्वंद्वी मानता है। वह मसूद के खिलाफ जाता तो भारत मजबूत दिखता।  2016 - 2017 में  संयुक्त राष्ट्र में मसूद को वैश्विक आतंकी  घोषित करने के लिए प्रस्ताव दिया था तब भी चीन ने अड़ंगा लगाया था।

अब असल संकट तो ग्वादर बंदरगाह को लेकर उभर रहा है जिसका निर्माण करने के लिए चीन और पाकिस्तान  का याराना पूरी दुनिया के सामने उजागर हो गया है | चीन की योजना है कि मध्य पूर्व से आने वाला तेल पहले ग्वादर बंदरगाह तक और फिर वहां से प्रस्तावित रास्ते से सड़क और रेल मार्ग से  सीमा तक पहुंचाया जा सके |  चीनी पैसे से ग्वादर बंदरगाह का पहला चरण 2006 में पूरा हो गया था लेकिन चीन ने ग्वादर को फिर अपना तुरूप का इक्का विस्तारवादी रणनीति के लिए बनाने  का फ़ैसला किया है | इसका फायदा यह होगा कि चीन खाड़ी क्षेत्र, अफ़्रीका, यूरोप और दुनिया के हिस्सों से आसानी से जुड़ जाएगा और भविष्य में यहाँ पैर जमाने से यह  इलाका चीन की नौसेना के लिए एक अड्डा बन जाए और  चीन पाकिस्तानी नौसेना के साथ मिलकर यहाँ से भारत विरोधी गतिविधियों पर काम करे | भारत की घेराबंदी के लिए चीन  श्रीलंका में भी एक बंदरगाह की बड़ी परियोजना में निवेश कर हिंद महासागर में भारत की घेराबंदी की शातिर चालबाजी कर चुका है। अरब सागर से लेकर हिंद महासागर तक भारत की घेराबंदी की हर चाल में भारत ही घिर रहा है |  चीन की मंशा अब पूरी दुनिया पर राज करने और अमरीकी वर्चस्व को तोड़कर पूरी दुनिया में चीन के उत्पाद को पहुचाने की है जिसके जरिये वह समुद्री मार्गो से लेकर पड़ोसियों को जल और थल जैसे स्थानों पर घेरकर अपना नया गलियारा पूरी दुनिया के लिए खोल रहा है और बाद दुनिया पर राज करने की उसकी मंशा अब किसी से छिपी नहीं है। इससे उसके आर्थिक हित तो जुड़े हैं साथ ही  वह इस क्षेत्र में अपना दबदबा आर्थिक  और सामरिक ताकत के जरिये भी भी कायम करना चाहता है। | जब भारत पाक  पर सीमा पार से आतंकी घटनाओं को रोकने के लिए दबाव डाल रहा हो और मसूद अजहर के खिलाफ पूरी दुनिया एकजुट है तब चीन पाक के साथ ढाल बनकर खड़ा है क्युकि मसूद अजहर पाकिस्तानी सेना और आईएसआई का चहेता है जबकि एशिया में पाकिस्तान चीन का सबसे करीबी मित्र है। साथ ही चीन को पाकिस्तान की अपने महत्वाकांक्षी ओबीओआर प्रोजेक्ट के लिए जरूरत है। इसलिए वह मसूद को बार-बार बचा रहा है और पकिस्तान के साथ अपने सम्बन्ध ख़राब करने का रिस्क किसी कीमत पर नहीं लेना चाहता |  चीन की योजना है कि शिंजियांग से पाकिस्तान के नियंत्रण वाले जम्मू-कश्मीर होते हुए ग्वादर बंदरगाह तक एक  आर्थिक गलियारा तैयार किया जाए ताकि वह स्ट्रेट ऑफ मलक्का वाला समुद्री रास्ता लेने से बच जाये |  हिंद महासागर में भारत की बढ़ती भूमिका पर अंकुश लगाने और एशिया  में अपना वर्चस्व स्थापित करने की यह चीनी योजना निश्चय ही भारत के लिए काफी बड़ी चुनौती पेश कर सकती है |

Monday, 25 February 2019

छवि बदलने को बेकरार मोहम्मद बिन सलमान

     
            
आमतौर पर  सऊदी अरब का नाम जेहन में आते ही शेखों की अलग तरह की छवि बनती है और विलासिता पूर्ण जीवन होने के चलते यहाँ की फिजा में एक अलग तरह की शांति देखने को मिलती है शायद यही वजह है यहाँ पर मजदूर कामगारों की तादात बहुत ज्यादा है  इसीलिए यहां करीब कई  दशकों से कोई राजनीतिक हलचल नहीं हुई  लेकिन 2015  में जब से नए किंग सलमान ने सत्ता संभाली  तब से यहां राजनीतिक उथल-पुथल जारी है। असल में वजह भी सलमान बने हैं  जिन्होंने सऊदी से संबंधित कई बड़े फैसले  अपनी ताजपोशी के बाद  से लिए हैं।  आमतौर पर यह माना जाता है सऊदी अरब का समाज बहुत ही रूढ़िवादी  है लिहाजा यहाँ  कटटरपंथ किसी भी बदलाव को स्वीकार नहीं करता लेकिन मोहम्मद बिन सलमान ने अपने कार्यकाल में  भ्रष्टाचार को लेकर कई अहम फैसले लिए हैं जिससे जाहिर होता है कि वह सऊदी अरब को आधुनिक विचारों का देश बनाना चाहते हैं और अपनी खुद की छवि को  बदलने के लिए वह  बेकरार हैं और पूरी दुनिया घूमकर वह सऊदी अरब को लेकर एक नई  लकीर खींचना चाहते हैं | 

 मोहम्मद बिन सलमान सऊदी को आधुनिक बनाने और अपने सेक्युलर बनाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन  रूढिवादी  लोग मोहम्मद बिन सलमान की आलोचना करने से बाज नहीं आते |  उन्हें लगता है कि वो बहुत तेजी से फर्राटा भर  रहे हैं | अरब संकट पर नजर रखने वाले जानकारों को लगता है  वह अपने ताबड़तोड़ कदमों और कूटरनीति  के आसरे  भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेन्स  चाहते हैं और विदेश नीति के मोर्चे पर अपनी बिसात मजबूत करना चाहते हैं  | 

सऊदी अरब पश्चिम एशिया का एक महत्वपूर्ण देश है और तेल की मेहरबानी से उसकी हैसियत दुनिया में काफी ऊंची है लेकिन यह हैसियत इस समय कुछ डांवाडोल है, क्योंकि एक तो अभी तेल की कीमतें बहुत ऊंचे स्तर पर नहीं हैं |  घटते तेल के दामों और यमन की लड़ाई की वजह से सऊदी अरब के पास नकदी बहुत कम हो गई है । सऊदी अरब को 1979 से ईरान से तगड़ी चुनौती मिल रही है जहां शिया विचारधारा का वर्चस्व है और जिसका वहाबियों के साथ छत्तीस का आंकड़ा है। पश्चिम एशिया का सामरिक माहौल मुख्य रूप से दो संघर्ष बिंदुओं पर टिका हुआ है। एक तो अरब-इज़राइल संघर्ष जिसमें तल्खी कम हो रही है और दूसरे, शिया-सुन्नी  विवाद जो समय के साथ और ज्यादा बढ़ता जा रहा है। आईएसआईएस  की पराजय और सीरियाई गृहयुद्ध में ईरान-रूस-सीरिया की तिकड़ी के दबदबे ने ईरान के लिए रणनीतिक लाभ की राह खोली है। इसे अमेरिका, इजराइल और सऊदी अरब अपने लिए खतरनाक मान रहे हैं शायद यही वजह है तीनो अपना नया त्रिकोण अपनी बिसात बिछाने के अनुरूप बिठा  रहे हैं |   

जनवरी 2015  में किंग अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अजीज की मौत हो गई। इसके बाद मोहम्मद बिन सलमान के पिता सलमान 79  वर्ष की उम्र में किंग बने थे। किंग सलमान ने सत्ता संभालते ही अपने बेटे मोहम्मद बिन सलमान को सत्ता के करीब करते हुए रक्षा मंत्री बना दिया। रक्षा मंत्रालय का पदभार संभालते ही मोहम्मद बिन सलमान ने मार्च 2015  में यमन के साथ युद्ध की घोषणा  कर दी। हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना सहित यमन के कई इलाकों पर कब्जा कर लिया और यमन के राष्ट्रपति अब्दुर रहमान मंसूर को देश से भागने के लिए मजबूर कर दिया था। उस वक्त सऊदी ने यमन के राष्ट्रपति को आश्रय दिया था। सऊदी सैन्य गठबंधन ने इसी के बाद हूती विद्रोहियों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। सऊदी अरब के इस कदम की मानवाधिकारों ने निंदा की थी।  शाह सलमान ने  एक दौर में  अपने भतीजे शहजादा नायेफ को युवराज और गृहमंत्री के पद से हटा दिया था उनकी जगह पर अपने बेटे मोहम्मद बिन सलकान को युवराज घोषित किया  तब से मोहम्मद बिन सलमान की ठसक सऊदी  अरब में बढ़ी है । मोहम्मद बिन सलमान ने अपने कार्यकाल में अहम फैसलों में अमेरिका के साथ  न केवल  रक्षा खरीद का करार किया बल्कि  सऊदी और अमेरिका के बीच करीब 100 अरब डॉलर के टैंक , आर्टिलरी , हेलीकॉप्टर और  मिसाइलों की बिक्री के करार की घोषणा की।

 अप्रैल 2016  में प्रिंस सलमान ने बड़े पैमाने पर आर्थिक विकास और सामाजिक सुधार शुरू किए जिसका मुख्य उद्देश्य था सऊदी अरब की तेल पर निर्भरता को कम करना था यही नहीं मोहम्मद बिन सलमान ने विजन 2030  नाम से देश में एक नई परियोजना शुरू की जिसके तहत 2020  तक सऊदी अरब की तेल पर निर्भरता खत्म हो जाएगी। उन्होंने इसके लिए रेगिस्तान में आधे खरब डॉलर का एक बड़ा शहर बसाने की योजना बनाई है। इस शहर में औरतों और मर्दों को एक दूसरे से मिलने-जुलने की आजादी होगी। इससे पहले इस रूढ़िवादी समाज में ऐसी बातें कभी नहीं सुनी गई थीं। सऊदी अरब को आधुनिक बनाने के पीछे एक मंशा ईरान के ख़िलाफ़ चल रहे संघर्ष में पश्चिमी देशों ख़ासकर अमरीका का समर्थन हासिल करना भी है|  

अपनी ऐसी पहल से बिन सलमान ये संदेश  दिया है  कि उनके देश में धार्मिक चरमपंथ अब ख़ात्मे की तरफ़ बढ़ रहा है | बिन सलमान के पास आने वाले समय के लिए भी योजनाएं हैं | वह स्टॉक मार्केट में दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी अरामको के शेयर बेचना चाहते हैं साथ ही उनकी मंशा  500 अरब डॉलर से बनने वाला बेहद आधुनिक निओम शहर बसाने की है  जिसका सारा काम रोबोट संभालेंगे | यही नहीं  उनका इरादा 2030 तक सऊदी अरब की तेल पर निर्भरता घटाने केलिए एक बड़ी कार्ययोजना को भी अंजाम तक पहुँचाना चाहते हैं | एक दौर ऐसा था जब सऊदी अरब दुनिया का एकमात्र ऐसा देश था जहां औरतों को गाड़ी चलाने की इजाजत नहीं थी लेकिन अब ये प्रतिबंध खत्म हो गया और यह भी सलमान के दौर में ही हुआ है |  एक ऐसे देश में  महिलाओं को गाड़ी चलाने के लिए लाइसेंस मिलने लगा है जो अपनी रूढ़िवादी और पर्दा प्रथा के चलते पहले महिलाओं को घरों से बाहर  निकलने से रोकता था  |  यह प्रिंस सलमान का ही दौर रहा जिन्होंने महिलाओं की आज़ादी की खुली वकालत कर डाली | 

2015 में किंग सलमान ने जब सऊदी की सत्ता संभाली थी उस वक्त उनके बेटे मोहम्मद बिन सलमान को कम ही लोग जानते थे। लेकिन बीते बरसों  में किंग सलमान अपने बेटे को को बहुत आगे लाए हैं। दरअसल  मोहम्मद सलमान ने कहा था कि देश को आधुनिक बनाने की योजना के तहत वह उदार इस्लाम की वापसी चाहते हैं। बीते बरस  उन्होंने आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाने के लिए बड़े  सुधारों का पिटारा खोला था |  

सऊदी को भ्रष्टाचार मुक्त करने के युवराज मोहम्मद बिन सलमान को देश के सुरक्षाबलों को पूरी आज़ादी भी दे डाली | मोहम्मद बिन सलमान सऊदी पर पूर्ण नियंत्रण चाहते हैं। वह किसी भी ऐसे व्यक्ति को शीर्ष पद पर नहीं रहने देना चाहते जो उन्हें चुनौती दे सके। सऊदी नागरिकों में खासकर युवाओं में  मोहम्मद बिन सलमान काफी लोकप्रिय हैं  लेकिन बुजुर्ग और पुराने रूढ़िवादी उन्हें कम पसंद करते हैं। रूढ़िवादियों का कहना है कि वो कम समय में देश में अधिक बदलाव करना चाहते हैं वहीँ  सऊदी के युवा मानते हैं प्रिंस सलमान 50  वर्षों तक देश के किंग रह सकते हैं।

 भारत यात्रा पर बीते दिनों आए  मोहम्मद बिन सलमान ने कहा कि आतंकवाद और कट्टरपंथ हमारी साझी चिंता है। वह  इसके खिलाफ भारत के साथ हर संभव  सहयोग करेंगे। यही नहीं  सऊदी अरब ने आतंकवाद के खिलाफ जंग में साथ देने और खुफिया सूचनाएं साझा करने पर भी अपनी  सहमति जताई । इससे पहले ईरान और अफगानिस्तान का रुख भी पाकिस्तान के खिलाफ ही रहा है। भारत से पहले युवराज मोहम्मद बिन सलमान पाकिस्तान भी गए। यहाँ  उनका कार्यक्रम वैसे तो तीन दिन का था लेकिन पुलवामा हमले के चलते यह 2 दिन का ही रहा |  सलमान ने कर्ज में डूबे पाक को 20 बिलियन राहत पैकेज देने के लिए निवेश सौदों पर भी हस्ताक्षर किये वह भी ऐसे समय में जब पुलवामा हमले के बाद से पाक पूरी दुनिया की अआंखों में खटक रहा है |

  सऊदी अरब ने भारत के साथ सौ बिलियन डॉलर का निवेश करने पर सहमति जताई है | सऊदी के प्रिंस क्राउन सलमान बिन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी मुलाक़ात की और  सऊदी की तेल कंपनी अरामको ने चीन में 10 अरब डॉलर की लागत से रिफाइनरी व पेट्रोकेमिकल कांप्लेक्स विकसित करने के करार पर हस्ताक्षर किए। इसके अलावा दोनों देशों ने 28 अरब डॉलर मूल्य के अन्य 35 आर्थिक करार पर हस्ताक्षर किए। अरामको चीन में एक रिफाइनरी विकसित करेगा जिसमें तीन लाख बैरल रोजाना तेल शोधन किया जाएगा। इसके अलावा 15 लाख टन सालाना इथिलीन क्रैकर और 13 लाख टन सालाना पैराक्सीलीन बनाने की इकाई चीनी की नोरिनको कंपनी समूह और पन्जीन सिनसेन के साथ लगाई जाएगी | 

नई कंपनी में हुआजिन अरामको पेट्रोकेमिकल में सऊदी की कंपनी की 35 फीसदी हिस्सेदारी होगी, जबकि नोरिको और पन्जीन सिनसेन की हिस्सेदारी क्रमश: 36 फीसदी और 29 फीसदी होगी। अरामको इस कंपनी को 70 फीसदी कच्चे तेल की आपूर्ति करेगी। कंपनी का संचालन 2024 से शुरू किये जाने की संभावना जताई जा रही है । 

 सऊदी अरब पाक संबंधों में  शुरुवात से ही गर्माहट रही  है | वजह  पाकिस्तान उसके  हथियारों का सबसे बड़ा आयातक है। पाकिस्तान ने जब परमाणु परीक्षण किया था तो सऊदी ने  सबसे पहले इसका खुलकर समर्थन किया था। सऊदी अरब ने 1998 से 1999 तक पाकिस्तान को 50 हजार बैरल तेल मुफ्त में दिया था। सऊदी ने ऐसा तब किया जब उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगे थे। अफगानिस्तान से रूसी सेना वापस गई तो संयुक्त अरब अमीरात के अलावा सऊदी अरब एकमात्र देश था जिसने काबुल में तालिबान शासन का समर्थन किया था। इसके साथ ही कश्मीर मसले पर भी सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ रहा है | 

सऊदी अरब की पाकिस्तान के साथ दोस्ती  बहले ही पहले जैसी रही हो  लेकिन वह  भारत की भी उपेक्षा भी  नहीं कर सकता क्युकि  आज भारत की हैसियत दुनिया के मुल्कों में बड़ी है जिसकी वजह भारत की  बड़ी उभरती  ताकत है |   सऊदी अरब ने अपने मौजूदा  आर्थिक हितों को साधने के लिए  भारत ,  पाक  और चीन को भी  साथ रखा है । सऊदी अरब का भारत के लिए बहुत सामरिक-रणनीतिक महत्व है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा में उसकी बड़ी अहमियत है, क्योंकि इराक को  छोड़कर  सऊदी भारत का सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बन गया है। पश्चिमी एशिया और खासतौर से सऊदी अरब में भारतीय बड़ी संख्या में कार्यरत हैैं। इस क्षेत्र में कार्यरत करीब 80 लाख भारतीयों में से अकेले 28 लाख तो सऊदी में ही हैं, जो भारत में हर साल  अरब डॉलर भेजते हैं।

 भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए  यह  खासी सुकून वाली खबर है | भारत और सऊदी अरब आर्थिक रूप से एक दूसरे के लिए काफी अहम हो गए हैं। 2014-15 में दोनों देशों देशों के बीच 39.4 अरब डॉलर का व्यापार हुआ था। दूसरी तरफ पाकिस्तान और सऊदी के बीच महज  6 अरब डॉलर का ही व्यापार हुआ। भारत और सऊदी में आर्थिक संबंध काफी मजबूत हैं, लेकिन पाकिस्तान और सऊदी के बीच रक्षा सम्बन्ध  मजबूत  हैं।अब भारत बाकी के खाड़ी देशों से रक्षा सम्बन्ध  भी बढ़ रहे हैं। 

प्रधानमंत्री मोदी भी सऊदी के दौरे पर  गए थे और उनका शाही इस्तेकबाल गर्मजोशी से हुआ था। यही नहीं मोदी को सऊदी का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भी दिया गया था।  सलमान की भारत यात्रा   के बाद  भारत और सऊदी के बीच रिश्ते और मजबूत होंगे इससे इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए आने वाले दिनों में  सऊदी अरब की कोई भी  राजनीतिक अस्थिरता हमारी  अर्थव्यवस्था को भी  कमजोर कर सकती  है जिसके चलते  नौकरियों पर संकट खड़ा हो सकता है । अगर यह अस्थिरता  ज्यादा बढ़ती है तो फिर भारतीयों को वहां से निकालने के अलावा और कोई चारा नहीं होगा, जैसा कि वर्ष 2015 में यमन में किया गया था। इतने बड़े पैमाने पर लोगों के रोजगार खत्म होने से लाखों परिवार संकट में आ जाएंगे और भारत में भी इसके खतरनाक सामाजिक प्रभाव महसूस किए जाएंगे। हालाँकि सलमान के रहते यह आशंकाएं  निर्मूल साबित होंगी लेकिन  अपने हितों की पूर्ति के लिए भारत को एक संतुलन साधन होगा।

Wednesday, 30 January 2019

अलविदा जार्ज



कोई हम दम ना रहा कोई सहारा ना रहा
हम किसी के ना रहे कोई हमारा ना रहा
शाम तन्हाई की है आएगी मंजिल कैसे
जो मुझे राह दिखाए वही तारा ना रहा
क्या बताऊ मैं कहाँ यू ही चला जाता हू
जो मुझे फिर से बुला ले वो इशारा ना रहा

 
झुमरू की याद जेहन में आ रही है |  मजरूह सुल्तानपुरी और किशोर की गायकी इस गाने में चार चाँद लगा देती है |  पुराने गीतों के बारे में प्रायः कहा जाता है "ओल्ड इस गोल्ड " | इसका सही से पता अब चल रहा है |  70   के दशक की राजनीती के सबसे बड़े महानायक पर यह जुमला फिट बैठ रहा है | कभी ट्रेड यूनियनों के आंदोलनों के अगवा रहे जार्ज की कहानी जीवन के अंतिम समय में ऐसी हो जायेगी , ऐसी कल्पना शायद किसी ने नहीं  की होगी | कभी समाजवाद का झंडा बुलंद करने वाला यह शेर आज हमेशा के लिए चैन की नींद सो गया है और अल्जाइमर्स  से बाहर नहीं आ पाया |  उसके  निधन की खबर अस्वस्थ सियासत तले  तब गई |

 आज की नयी नवेली पीढ़ी  के पास इतनी भी फुर्सत नहीं कि वह उस दौर को जी ले जिसमें जॉर्ज जनता के सरोकारों की राजनीती करते  देश की राजनीति के पोस्टर बॉय के रूप में उभरे  |  वह भी एक दौर था जब देश  की राजनीती का असली बैरोमीटर मुजफ्फरपुर  हुआ करता था | यह भी एक दौर है जब मोदिनोमिक्स कीबिसात तले समूची  सियासत 360 डिग्री घूम चुकी है | जॉर्ज की सियासत को समझने के लिए हमें उस दौर में जाना होगा जब ट्रेड यूनियन आंदोलन को नयी धार देने में वह आगे न केवल रहे बल्कि जे पी के आंदोलन को अंजाम तक पहुंचाने और इंदिरा के खिलाफ आक्रोश को हवा देने में वह  नई लकीर खींचते नजर आये | यही नहीं नीतीश कुमार  , शरद यादव को मोहरा बनाकर  लालू प्रसाद को राजनीती की बिसात में चेक देने से लेकर गैर कांग्रेस वाद का झंडा बुलंद करने में जॉर्ज हमेशा आगे रहे | वह मानते थे कि नेहरूपरिवार  देश की दुर्गति का सबसे बड़ा कारण है इसलिए  समाजवादी पार्टी के कलकत्ता अधिवेशन में डॉ लोहिया ने पहली बार  जब गैर-कांग्रेस का नारा दिया तो गैर-कांग्रेसवाद  का झंडा बुलंद करने वालों में जॉर्ज फर्नांडिस आगे  थे | जॉर्ज फर्नांडिस पर आरोप लगा कि वो किसी भी कीमत पर कांग्रेस पार्टी को सत्ता से उखाड़ना चाहते थे |  इसके लिए उनपर रेल की पटरियों को डाइनामाइट से उड़ाने का षड़यंत्र रचने का आरोप लगाया गया | डायनामाइट का इस्तेमाल कर जॉर्ज और उनके साथ सरकार के प्रमुख संस्थाओं और रेल पटरियों को उखाड़कर पूरे सिस्टम को हिला देना चाहते थे | 

 फर्नाडीस को 10 जून, 1976 को कोलकाता में गिरफ्तार कर उन पर बहुचर्चित बड़ौदा डायनामाइट मामले में केस चलाया गया था। उन पर तत्कालीन इंदिरा सरकार का तख्तापलट करने की कोशिश में सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने का भी मुकदमा चलाया गया था। वह  सरकार की गैरसंवैधानिक नीतियों का सशस्त्र विरोध करने के पक्षधर थे |  इसके लिये हथियार की जरूरत थी और हथियार जुटाने के लिए जॉर्ज फर्नांडिस ने पुणे से मुंबई जाने वाली ट्रैन को लूटने का प्लान बनाया | दरअसल इस ट्रैन से सरकारी गोला बारूद भेजा जाता था | आपातकाल समाप्त होने के ठीक बाद 1977 में जेल से मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ने वाले जॉर्ज भारी मतों से जीते थे। यह चुनाव तानाशाही बनाम लोकशाही के रूप में जाना जाता था। जॉर्ज के खिलाफ कांग्रेस के नेता नीतेश्वर प्रसाद सिंह चुनाव लड़े थे। जॉर्ज की हथकड़ी लगी तस्वीर की चर्चा पूरे देश में रही। पूरा मुजफ्फरपुर इस तस्वीर से पाट दिया गया था। केन्द्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ने प्रचार कमान संभाली थी। सुषमा का चुनाव प्रचार व प्रभावशाली भाषण काफी चर्चित रहा। कहा जाता है कि सुषमा स्वराज का राजनीति में उदय मुजफ्फरपुर चुनाव के बाद ही हुआ। 1980 में जॉर्ज ने फिर मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ा। उनके खिलाफ कांग्रेस के रजनी रंजन साहू उम्मीदवार थे। इस बार भी जॉर्ज फर्नांडीस चुनाव जीते। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वर्ष 1984 के चुनाव में जॉर्ज साहब ने मुजफ्फरपुर का चुनावी मैदान छोड़ दिया और बेंगलुरु से भाग्य आजमाया, लेकिन वह हार गए। वर्ष 1989 के चुनाव में जॉर्ज साहब फिर मुजफ्फरपुर लौटे और पूर्व केन्द्रीय मंत्री व कांग्रेसी उम्मीदवार ललितेश्वर प्रसाद शाही और 1991 में कांग्रेसी उम्मीदवार रघुनाथ पाण्डेय को पराजित किया।  1996 के लोकसभा चुनाव में जॉर्ज ने नालंदा कूच किया और राजद उम्मीदवार विजय कुमार यादव को धूल चटाई  वहीँ  1999 में वामपंथी उम्मीदवार गया सिंह को पराजित किया । वर्ष 2004 के लोककसभा चुनाव में जॉर्ज साहब ने फिर मुजफ्फरपुर का रुख किया और  लोजपा के उम्मीदवार भगवानलाल सहनी को पराजित किया परन्तु  2009 के चुनाव में जयनारायण निषाद से से पराजित हो गए।  15 वी लोकसभा का जब भी जिक्र होगा तो यह जॉर्ज के बिना अधूरा रहेगा |   असल में मुज्जफरपुर से जार्ज फर्नांडीज अक्सर चुनाव लड़ा करते थे लेकिन 1  5 वी लोक सभा में उनका पत्ता कट गया.....नीतीश और शरद यादव की जोड़ी ने उनको टिकट देने से साफ़ मना कर दिया | इसके बाद यह संसदीय इलाका पूरे देश में चर्चा में आ गया था |  तब  नीतीश ने तो साफ़ कह दिया था अगर जार्ज यहाँ से चुनाव लड़ते है तो वह चुनाव लड़कर अपनी भद करवाएंगे |  पर जार्ज कहाँ मानते? उन्होंने निर्दलीय चुनाव में कूदने की ठान ली | आखिरकार इस बार उनकी नही चल पायी और उनको पराजय का मुह देखना पड़ा |  जार्ज के चलते मुजफ्फरपुर में विकास कार्य तो  तेजी से हुए लेकिन निर्दलीय मैदान में उतरने से उनकी राह आसान नही हो पायी | 


जार्ज  को समझने ले लिए हमको 50 के दशक की तरफ रुख करना होगा |  यही वह दौर था जब उन्होंने कर्नाटक की धरती को अपने जन्म से पवित्र कर दिया था..3 जून 1930 को जान और एलिस फर्नांडीज के घर उनका जन्म मंगलौर में हुआ था | 50 के दशक में एक मजदूर नेता के तौर पर उन्होंने अपना परचम महाराष्ट्र की राजनीती में लहराया  | यही वह दौर था जब उनकी राजनीती परवान पर गयी | कहा तो यहाँ तक जाता है हिंदी फिल्मो के "ट्रेजिडी किंग " दिलीप कुमार को उनसे बहुत प्रेरणा मिला करती थी | अपनी फिल्मो की शूटिंग से पहले वह जार्ज की  सभाओ में जाकर अपने को तैयार करते थे |  जार्ज को असली पहचान उस समय मिली जब 1967  में उन्होंने मुंबई में कांग्रेस के सबसे बड़े नेता एस के पाटिल को पराजित कर दिया | लोकसभा में पाटिल जैसे बड़े नेता को हराकर उन्होंने उस समय लोक सभा में दस्तक दी |  इस जीत ने जार्ज को राजनीती का  महानायक बना दिया |  बाद में अपने समाजवाद का झंडा बुलंद करते हुए 1974  में वह रेलवे संघ के मुखिया बना दिए गए | उस समय उनकी ताकत को देखकर तत्कालीन सरकार के भी होश उड़ गए थे | जार्ज जब सामने हड़ताल के नेतृत्व के लिए आगे आते थे तो उनको सुनने के लिए मजदूर कामगारों की टोली से सड़के जाम हो जाया करती थी |

आपातकाल के दौरान उन्होंने मुजफ्फरपुर की जेल से अपना नामांकन भरा और जे पीका समर्थन किया |  तब जॉर्ज के पोस्टर मुजफ्फरपुर के हर घर में लगा करते थे | लोग उनके लिए मन्नते माँगा करते थे और कहा करते थे जेल का ताला टूटेगा हमारा जॉर्ज छूटेगा | 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी तो उनको उद्योग मंत्री बनाया गया | उस समय उनके मंत्रालय में जया जेटली के पति अशोक जेटली हुआ करते थे | उसी समय उनकी जया जेटली से पहचान हुई | बाद में यह दोस्ती में बदल गयी और वे उनके साथ रहने लगी |  लैला कबीर और जॉर्ज  के किस्से राजनीती में सुने जाते हैं | लैला कबीर  उनकी जिन्दगी में उस समय आ गयी थी जब वह मुम्बई में संघर्ष कर रहे थे | तभी उनकी मुलाकात तत्कालीन केन्द्रीय मंत्री हुमायु कबीर की पुत्री लैला कबीर से हुई जो उस समय समाज सेवा से जुडी हुई थी |  लैला के पास नर्सिंग का डिप्लोमा था और वह इसी में अपना करियर बनाना चाहती थी  | बताया जाता है तब जार्ज ने ही उनकी मदद की और उनके साथ यही निकटता प्रेम सम्बन्ध में बदल गयी और 21 जुलाई 1971  को वे परिणय सूत्र में बढ़ गए|  इसके बाद कुछ वर्षो तक दोनों के बीच सब कुछ ठीक चला परन्तु जैसे ही जॉर्ज मोरार जी की सरकार में उद्योग मंत्री बनाये गए तो लैला कबीर  जॉर्ज से दूर होती गई | जॉर्ज अपने निजी सचिव अशोक जेटली की  पत्नी जया जेटली के ज्यादा निकट चले गए |  इस प्रेम को देखते हुए लैला कबीर  ने अपने को जॉर्ज से दूर कर लिया और 31  अक्तूबर 1984  से दोनों अलग अलग रहने लगे | इसके बाद लैला दिल्ली के पंचशील पार्क में रहने लगी | वहीँ  जॉर्ज कृष्ण मेनन मार्ग में | बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर एक दौर में लालू अपराजेय मान लिए गए थे। लालू के शासन के तीसरे साल में जब जॉर्ज ने उन्हें सत्ता से नेस्तनाबूद करने की ठानी तो किसी को सहसा यकीं नहीं हुआ |  वह भी एक दौर आया जब 1995 के विधानसभा चुनाव  में समता पार्टी महज  सात सीटों पर सिमट गई तो यही कहा गया कि जॉर्ज की सियासत का अंत हो जायेगा | लेकिन  ऐसा हुआ नहीं। पराजय के बाद शरद  और नीतीश कुमार ठोस रणनीति के साथ मैदान में आए जिसमें लालू की जंगलराज की सियासत को घेरने का ब्रह्मास्त्र जॉर्ज ने ही छोड़ा | लालू के दुर्ग पर फतह पाने के लिए उन्होंने  भाजपा से दोस्ती की और एनडीए  के संयोजक भी बने  जिसमें बाजपेयी के साथ कई पार्टियों का कुनबा 1998  में जुड़ा | 

पहली बार विचाराधारा से इतर कोई दल एनडीए का घटक बना तो वह जॉर्ज की समता पार्टी थी। इसके बाद जॉर्ज एनडीए के संयोजक बने और उन्होंने कई दलों को एनडीए में लाने में अहम भूमिका निभाई। जॉर्ज की स्वीकार्यता ज्यादा होने के कारण उन्हें एनडीए का संयोजक बनाया गया और इस प्रकार कई दल एनडीए का हिस्सा बने। एनडीए के भीतर और बाहर दोनों जगह वाजपेयी के बाद उनकी स्वीकार्यता सर्वाधिक थी। 1998 से 2004 के बीच दो बार एनडीए की सरकार के गठन और विभिन्न मौकों पर उत्पन्न परिस्थितियों एवं मतभेदों के समाधान में जॉर्ज फर्नांडिस अहम भूमिका निभाते थे। इस प्रकार कांग्रेस के खिलाफ तीसरे मोर्चे की विफलता से जो स्थान रिक्त हो रहा था, उसे एनडीए ने पूरा किया। 2000 आते-आते लालू प्रसाद की सत्ता को चुनौती मिली और बिहार में यह जुमला कहा जाने लगा समोसे में रहेगा आलू पर बिहार में नहीं रहेंगे लालू |  जार्ज के दौर में ही  यह मिथ टूट गया था कि लालू अपराजेय हैं। केंद्रीय मंत्री के रूप में जार्ज हमेशा  दो फैसलों के लिए जाने रहेंगे । 1977 में उन्होंने कोका कोला व आईबीएम को भारत से बाहर कर दिया था और 2002 में देश की दूसरी सबसे बड़ी तेल कंपनी एचपीसीएल को बेचने की प्रक्रिया में अड़ंगा लगाया था। 1999 में रक्षामंत्री रहते हुए उन्होंने कारगिल से पाक सैनिकों को खदेड़ने में अहम भूमिका निभाई थी। वीपी सिंह की राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार में 1989 में वह रेल महकमे के ही मंत्री बने थे। इस सरकार में अधिकांश वामपंथी नेता थे। संघ विरोधी पर अटल सरकार में रहे जॉर्ज फर्नाडीस आरएसएस के कट्टर आलोचक थे लेकिन उन्होंने भाजपा नीत राजग की अटल सरकार में 1998 व 1999 में रक्षा मंत्री पद संभाला था। उन्हीं के नेतृत्व में भारत ने कारगिल युद्ध लड़ा और 1998 में पोकरण में परमाणु परीक्षण किए थे।

जॉर्ज की छवि रक्षा सौदों में दलाली से लेकर तहलका तक में बहुत धूमिल हुई | लेकिन जार्ज अपनी स्पष्ट वादिता और मूल्यों की राजनीति के लिए हमेशा जाने जाते रहेंगे  |  रक्षा सौदों में दलाली के मसले पर विपक्ष  ने उनको खूब घेरा लेकिन जार्ज  इस्तीफ़ा देने से नहीं घबराये |  ऐसा कहा जाता है तहलका  दाग लगाने में जया जेटली  की बड़ी भूमिका रही | यही नही जॉर्ज को मुजफ्फर पुर से लोकसभा  चुनाव लड़वाने  की रणनीति भी खुद जया की थी | इस हार के बाद उनको राज्य सभा में भेजने की कोई जरुरत नही थी | वैसे भी एक दौर में जॉर्ज कहा करते थे समाजवादी कभी राज्य सभा  के रास्ते "इंट्री" नहीं  करते |

 इन सब बातो के बावजूद भी उनका राज्य सभा जाना मेरे मन में कई बार सवालों को पैदा करता था | यही नही शरद नीतीश की जोड़ी का हाथ पकड़कर उनको राज्य सभा पहुचाना कई बार उनकी समाजवादी उनकी छवि पर ग्रहण लगाता था | जार्ज भले ही आज भले ही हमारे बीच में नहीं हैं लेकिन भारतीय राजनीती के इतिहास में हमेशा उनको संघर्षशील , जिंदादिल और सादगीपूर्ण और शालीन नेता के तौर पर याद किया जाता रहेगा जिसने अपनी राजनीति से जनता के सरोकारों की हमेशा फ़िक्र की | अब जॉर्ज की मौत के बाद  उनकी  संपत्ति को लेकर विवाद गर्माने के आसार बन रहे हैं | चुनावो के दौरान जॉर्ज द्वारा दी गयी जानकारी के मुताबिक वह करोडो के स्वामी है जिनके पास मुम्बई , हुबली, दिल्ली में करोड़ो की संपत्ति है | यहीं नही मुम्बई के एक बैंक में उनके शेयरों की कीमत भी अब काफी हो चली  है | ऐसे में आने वाले दिनों में संपत्ति को लेकर विवाद होना तो लाजमी ही है|

Wednesday, 28 November 2018

दोराहे पर पाकिस्तान






आज पाक उस दोराहे पर खड़ा है जहाँ वह यह तय नहीं कर पा रहा है कि अपने मुल्क में वह कट्टर पंथी संगठनो और आतंकियों का साथ दे या फिर अमरीका की आतंकवाद विरोधी मुहिम में साझीदार बन खड़ा हो। एक चुनी हुई इमरान खान की सरकार के दौर में पाक के हालात दिन पर दिन बद से बद्तर होते जा रहे है लोग इस बात के कयास लगा रहे थे कि इमरान खान के सत्ता संभालने के बाद पाक में नया सवेरा होगा लेकिन एक के बाद एक संकट से घिरे पाकिस्तान कि आवाम का जीना दुश्वार हो गया है। वहां पर अलग सा बदला बदला माहौल दिख रहा है। ऐसे मे दिल में अगर यह विचार आ जाए वहां पर जम्हूरियत का क्या भविष्य है तो इसका जवाब यह होगा क्या वह यहाँ कभी सफल भी हो पाई है ?

जब भी वहां सूरज की नई किरण उम्मीद बनकर निकली है तो उस किरण के मार्ग मे सैन्य शासन ने दखल देकर उसको अपना लिबास ओड़ने को ना केवल मजबूर ही किया है बल्कि इस बात को भी पिछले कई बरसो से साबित किया है कि बिना सेना के पाक के भीतर सरकार में भी पत्ता तक नहीं हिलता। इमरान खान भी पाक के कट्टर पंथियों के हाथ की कठपुतली ही बने है

भारतीय दर्शन में आचार्य रामानुज ''स्यादवाद" की जमकर आलोचना करते है। इस प्रसंग मे आज हम पाक को फिट कर सकते हैं। रामानुज कहा करते थे किसी पदार्थ मे "भाव" और "अभाव" दोनों साथ साथ नही रह सकते है इस तरह यदि हम यह चाहते हैं कि पाक के पदार्थ रुपी लोकतंत्र मे सेना और सरकार दोनों साथ साथ चलेंगे तो यह नैकस्मिन सम्भवात वाली बात ही होगी। फिर पाक में तानाशाह की भरमार जिस तरीके से एक लम्बे दौर से रही है उसमे दोनों के साथ आने की उम्मीद तो बेमानी ही लगती है मुशर्रफ़ से पहले से ही सैन्य शासको ने किस तरह रिमोट अपने हाथ में लेकर पाक को चलाया और उनका क्या हश्र हुआ हम सब यह जानते है। 9 साल तक मुशर्रफ़ ने पाक मे किस तरह काम किया उसकी मिसाल आज तक वहाँ की अवाम को देखने को नही मिली है मुशर्रफ़ ने कारगिल की ज़ंग खेल नवाज की पीठ में छूरा भोंक कर की और कारगिल मे हार मिलने के बाद पाक को अपने स्टाइल में चलाने के फेर मे उनको सुपर सीड कर खुद सत्ता हथिया ली जिसके बाद वह अपनी सरजमी से बेदखल कर दिए गए 1999 मे मुशर्रफ़ का पहला अवतार तानाशाह के रूप मे हुआ। दूसरा अवतार सैनिक वर्दी के उतरने के बाद राष्ट्रपति की कुर्सी से चिपके रहने के रूप मे देखा जा सकता था जहाँ अमरीका को साधकर उन्होंने अपना एकछत्र राज कायम किया सत्ता का स्वाद कितना मजेदार होता है यह सब परवेज मुशर्रफ़ की शातिर चालबाजियों से समझा जा सकता था जब सैनिक वर्दी उतरने के बाद भी वह वहां की सुप्रीम पोस्ट पर विराजमान हुए 

जिस दौर मे मुशर्रफ़ ने नवाज से सत्ता हथियाई उस समय की स्थितियाँ अलग थी भारत के पोकरण की प्रतिक्रिया मे पाक ने गौरी का परीक्षण कर डाला उनको पाक की खस्ता हाल अर्थव्यवस्था का तनिक भी आभास नही हुआ भारत ने तो विश्व के सारे प्रतिबंधो को झेल लिया लेकिन पाक के लिए यह सब कर पाना मुश्किल था लेकिन फिर भी मुशर्रफ़ ने चुनौतियों को स्वीकार किया और जैसे तैसे दो बरस तक पाक की गाडी पटरी पर दौड़ाई 2001 मुशर्रफ़ के लिए नई सौगात लेकर आया जब 9/11 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर मे हमला हो गया जिसकी जिम्मेदारी ओसामा बिन लादेन ने ली जिसमे अमेरिका के बहुत नागरिक मारे गए बेगुनाह नागरिकों की मौत का बदला लेने और वैश्विक आतंकवाद समाप्त करने के संकल्प के साथ अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के संगठन को प्रतिबंधित संगठनो की सूची मे डाल दिया और उसके खिलाफ आर पार की लड़ाई लड़ने की ठानी अमेरिका के साथ आतंक के खात्मे के लिए पहली बार पाक यहीं से उसका हम दम साथी बनने को ना केवल तैयार हुआ बल्कि झटके में अपने प्रतिबंधो से भी मुक्त हो गया जो दुनिया ने परमाणु परीक्षण के बाद लगाये थे यह बात तालिबानी लडाको के गले नही उतर पाई

आतंकवाद के खात्मे के नाम पर पाक सरकार को मुशर्रफ़ के कारण अरबों रुपये की मदद मिलनी शुरू हुई जिसने पाक के लिए टानिक का काम करना शुरू किया जिस कारण विकास के मोर्चे पर हिचकोले खा रही पाक की अर्थव्यवस्था मे नई जान आयी उस दौर में अमेरिका ने पाक से कहा लादेन हर हाल मे चाहिए चाहे जिन्दा या मुर्दा लेकिन मुशर्रफ़ ने होशियारी दिखाते हुए फूक फूक कर कदम रखा आतंक और दहशतगर्दी को ख़त्म करने के लिए अभियान शुरू होने से पहले तक अफगानिस्तान में तालिबान की तूती बोला करती थी ओसामा के चेलों ने इस पूरे इलाके मे अपना आधिपत्य जहाँ कायम किया वहीँ कबीलाई इलाको में उसने अपनी मजबूत पकड़ कर ली।

अमेरिका द्वारा मुशर्रफ़ को मदद दिए जाने के निर्णय को ओसामा के अनुयायी तक नही पचा पा रहे थे लेकिन उनको क्या पता मुशर्रफ़ ने अपने इस कदम से एक तीर से दो निशाने खेले 9/11 के बाद मुशर्रफ़ के अमेरिका के पैसो से अपने सूबा सरहद की सेहत मजबूत की आतंकवाद समाप्त करना तो दूर मुशर्रफ़ तमाशबीन बने रहेअमेरिका के सैनिक जब अफगान इलाके पर हमला करते तो पाक सरकार के भेदिये जवाबी कार्यवाही की जानकारी उनको हर दम पंहुचा देते थे जिस कारण वह हर दिन अपना नया घर खोजते रहतेअमेरिका के सैनिकों को चकमा देकर यह लडाके पाक के अन्दर छिपे रहते ऐसी सूरत मे उनको पकड़ पाना मुश्किल होता जा रहा था चित भी मेरी पट भी मेरी फोर्मुले के सहारे मुशर्रफ़ ने पाक मे सत्ता समीकरणों का जमकर लुफ्त उठाया जिसके बाद इमरान शाहबाज और नवाज शरीफ के बाद वहाँ कोई ऐसा नेता नही बचा जो उनका बाल बांका कर सके  

अमेरिका से अत्यधिक निकटता दहशतगर्दो को रास नही आई और ओसामा बिन लादेन के एबटाबाद में मारे जाने और अफगान सीमा को निशाना बनाये जाने की घटना के बाद से पाकिस्तान में स्वात, पेशावर सरीखे इलाको में तालिबानी लडाको ने अपने पैर मजबूती के साथ जमाने शुरू कर दिए जिनके खात्मे के लिए अमेरिका ने कभी पाक की सरकार को मदद दी और आज तक वहाँ की तस्वीर खून से रंगी ही है

अमरीकी मदद का पाक ने बेजा इस्तेमाल शुरू से आतंक की फैक्ट्रियो को पालने पोसने में ही किया है। मुशर्रफ़ के जाने के बाद जहाँ डेरा इस्माईल खान और आयुध कारखाने मे बड़े बड़े विस्फोट हुए वहीँ मिया नवाज शरीफ के आने के बाद भी मस्जिदों से लेकर सेना को निशाने पर लिया गया है खैबर से लेकर क्वेटा वजीरिस्तान से लेकर स्वात घाटी सब जगह तालिबानी आतंकियों ने मासूम लोगो को अपने निशाने पर लिया है इन विस्फोटों में सबसे ज्यादा तहरीके तालिबान का नाम सामने आया जो तालिबानी लडाको को लेकर पाक में अपना कहर बरपाते रहता है

असल में अफगानिस्तान में रहने वाले तालिबानी लडाको का यह संगठन है जिसकी अब उत्तरी कबीलाई इलाको पर अभी भी मजबूत पकड़ है। 2013 में हकिमुल्ला मसूद की हत्या के बाद से ही इसकी कमान मौलाना फजउल्लाह को सौंपी गई जिसने अफगानिस्तान से सटी पाकिस्तानी सेना की जवाबी कार्यवाहियों के जवाब में पाकिस्तान के भीतर दहशत का वातावरण बनाने में देरी नहीं लगाई है आज आलम यह है सेना के पूरे दखल के बावजूद भी तालिबानी आतंक पाक को अन्दर से खोखला करने पर तुला हुआ है और अब खुद ही नासूर बन गया है सरकार होने के बाद भी वहाँ पर सेना की राह आज भी अलग दिख रही है वह यह नही चाहते किसी सूरत पर पाक के भीतर अमेरिका की सेनाओं की इंट्री हो जहाँ पर कट्टर लोग छिपे है लेकिन ट्रम्प के आने के बाद पाक की पूरी अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी है सरकार और पाक की सेना दोनों अभी तक यह तय नही कर पा रहे हैं कि आतंक के खिलाफ जंग में किसका साथ दिया जाए ? यानि पहली बार परिस्थितियां उधेड़बुन इधर कुआं तो उधर खाई वाली हो चली हैं। जब भी पाक की तरफ से कठोर कार्यवाही तालिबानियों के खिलाफ की जाती है उसकी प्रतिक्रिया में भी कट्टर पंथी बम विस्फोट से अपना जवाब हर समय देते नजर आते हैं और हर हमले के बाद जिम्मेदारी लेने से भी पीछे नहीं हटते

 पिछले कई बरस से पाकिस्तान में आतंकवाद ने मजबूती के साथ पैर पसारे हैं। मौजूदा दौर में इमरान खान की सियासी पार्टी तहरीक का सिक्का मजबूती के साथ चल रहा है लेकिन खुद मिया इमरान का इन कट्टर पंथियों के खिलाफ एक दौर में बहुत सॉफ्ट कॉर्नर रहा है। सियासत की कुछ मजबूरियों के तहत उन्हें पाकिस्तान की सरजमीं से दहशतगर्दों को पूरी तरह से खत्म करने का साझा वायदा भी करना पड़ा है। पाकिस्तान में पिछले कुछ समय से जमात उद दावा, जैश ए महुम्मद , लश्कर ऐ तैयबा, हरकत उल मुजाहिदीन सरीखे दर्जनो संगठनो को बीज और खाद न केवल मुहैया करवाई गयी है बल्कि डी कंपनी यानी दाऊद इब्राहीम को भी अपने यहाँ पनाह दी। नवाज शरीफ इमरान खान भी दहशतगर्दों के खिलाफ बड़ी जंग लड़ने की बात जरूर कही है लेकिन सेना के अब तक के इतिहास को देखते हुए यह लगता नहीं पाकिस्तान अपने कट्टर पंथियों के खिलाफ कोई बड़ी लड़ाई सीधे लड़ पायेगा। 

26\11 के मुंबई हमलों के मुख्य आरोपी हाफिज सईद पर पाकिस्तान सबूत देने के बावजूद भी कार्रवाई तक नहीं कर सका है जबकि उसका संगठन जमात उद दावा संयुक्त राष्ट्र संगठन की प्रतिबंधित संगठन की सूची में खुद शामिल है। यही नहीं उस पर करोडो डालरों का इनाम भी रखा जा चुका है जिसके बाद भी पाकिस्तान की सेना और सरकार दोनों आज तक उसका बाल बांका नहीं कर सकी है। मुंबई हमलों के आरोपी जकी-उर रहमान लखवी को फ्री छोड़ दिए जाने से आतंक के मुद्दे पर पाकिस्तान का दोहरा रवैया एक बार फिर से उजागर हो गया है। हमने पाकिस्तान को पर्याप्त सबूत दिए थे इसके बावजूद इस मामले की वहां पर ठीक से सुनवाई नहीं हुई और लखवी को जमानत दे दी गई। लखवी हाफिज सईद का दाहिना हाथ माना जाता है और उसने पाकिस्तान में कसाब के साथी आतंकियों को मुम्बई हमले की ट्रेनिंग ही नहीं दी बल्कि पाक में बैठकर मुंबई हमलों की पल पल की अपडेट ली। अब ऐसे हालातो में क्या हम पाक से ख़ाक उम्मीद कर सकते हैं?  

पाकिस्तान की सेना एक मकसद के तहत अब कश्मीरी आतंकवादियों को साथ लेकर भारत में हमले कर रही है साथ ही कश्मीर को लेकर नई बिसात आतंकियों को साथ लेकर बिछा रही है 18 नवंबर को अमृतसर के निरंकारी भवन में हुए हमले के पीछे पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता क्युकि जिन ग्रेनेड से हमला हुआ वे भी पाकिस्तान में ही बने थे लेकिन पाक हर हमले में अपने को पाक साफ़ बताने से बाज नहीं आता पाक की फितरत ही झूठ और फरेब में ही टिकी हुई है क्या नफरत की नीव में सुलग रहा पाकिस्तान अब भी इमरान खान के आने के बाद बदलने को बेकरार है ? जी नहीं, फिलहाल तो हमें यह दूर की कौड़ी ही नजर आ रहा है। ऐसे में भारत सरकार को भी चाहिए वह तब तक पाक से कोई बात नहीं करे जब तक वह आतंकवाद पर कठोर कार्यवाही न करे

Wednesday, 14 November 2018

एन डी तिवारी को कैसे याद रखेगा इतिहास ?

       





देश  की राजनीति का बड़ा कवच लम्बे समय से एन डी तिवारी के इर्द गिर्द ही घूमता रहा है और  उनके चाहने वाले प्रशंसक न केवल कांग्रेस बल्कि हर राजनीतिक दल में आज भी मौजूद हैं |  तिवारी ने अपने कार्यकाल में विकास कार्यों से जनता के दिलों में अपने लिए  न केवल  अलग छवि बनाई बल्क़ि  तिवारी जी ने भी किसी को निराश नहीं किया |  उत्तराखंड की राजनीती में भी एन डी फैक्टर खासा अहम रहा है और तिवारी को विकास पुरुष की संज्ञा से  अगर  नवाजा जाता रहा  तो इसका बड़ा कारण अपने कार्यकाल में तिवारी के द्वारा खींची गई वह लकीर रही  जिसके पास आज तक उत्तराखंड का कोई मंत्री , नेता और मुख्यमंत्री तक नहीं फटक सका है | आज भी उत्तराखंड के गाँवों से लेकर शहर तक में तिवारी के बार में एक जुमला कहा जाता है जितना पैसा तिवारी जी उत्तराखंड के लिए अपने संपर्कों के आसरे लेकर आये उतना कोई मौजूदा नेता नहीं ला सकता शायद यही वजह है तिवारी जी विकास के शिखर पुरुष के रूप में उत्तराखंड के हर तबके में सर्वस्वीकार्य रहे  |   

 उत्तराखंड की राजनीती में कई लोगों ने एन डी तिवारी से ही राजनीती का ककहरा सीखा |  इंदिरा हृदयेश से लेकर डॉ हरक सिंह रावत , यशपाल आर्य से लेकर विजय बहुगुणा और सतपाल महाराज  सरीखे कई बड़े नाम तिवारी की छत्रछाया में ही पले  बढे हैं | 2009  में आंध्र प्रदेश के "सीडी" काण्ड  के बाद जहां तिवारी  की  कांग्रेसी आलाकमान से दूरियां  बढ़ गयी  वहीँ  हर बार चुनावी बरस में तिवारी की राय को कांग्रेस लगातार अनदेखा करती रही  जिसके चलते राजनीतिक  बियावान में उम्र के अंतिम पड़ाव में   तिवारी अकेले पड़  गए लेकिन फिर भी उत्तराखंड को लेकर उनकी सक्रियता हमेशा  बनी रही |   इस दौर में वह न केवल अपने पुराने स्कूल गए  बल्कि भवाली सैनिटोरियम से लेकर एच एम  टी  फैक्ट्री नैनीताल  के विकास कार्यों को लेकर चिंतित नजर आये  |   उम्र के अंतिम  पडाव पर एन डी  को न केवल उनकी पार्टी ने  तन्हा छोड़ा दिया बल्कि उनसे  सारी  सुख सुविधा छीन ली वहीँ उत्तर प्रदेश के पूर्व सी एम अखिलेश ने उन्हें न केवल आसरा दिया बल्कि खुद उनको दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री का दर्जा दिया |   एक मुलाक़ात के  दौरान  तिवारी जी के बेटे रोहित  ने  मुझे दिल्ली में एक  बताया  था  तिवारी का पूरा परिवार उत्तराखंड में अपनी उपेक्षा से ख़ासा आहत है |  कांग्रेस के सबसे बुजुर्ग नेता और उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने   नैनीताल-ऊधमसिंहनगर की  सीट में एक दौर में विकास की गंगा बहाई  | गौरतलब है इस सीट से तिवारी तीन बार सांसद रह चुके थे  |  तीन बार उत्तर प्रदेश और एक बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे एनडी की राज्य में मान्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था  कि अब तक बने 9 मुख्यमंत्रियों में वह  उत्तराखंड के ऐसे इकलौते सीएम रहे  जिन्होंने काफी खींचतान  के बावजूद अपना  कार्यकाल पूरा किया |

18 अक्तूबर, 1925 को नैनीताल के बलूती गांव में पैदा हुए तिवारी तिवारी  देश के  ऐसे इकलौते  नेता रहे  जो राजनीति में  परोक्ष रूप से सक्रिय रहे  |  तिवारी के पिता पूरन चंद तिवारी स्वतंत्रता सेनानी थे।  पिता के संस्कार बेटे नारायण दत्त तिवारी में भी आए । देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर विद्यार्थी जीवन में ही आजादी के आंदोलन से जुड़ गए । भारत  छोड़ो आंदोलन में पिता और पुत्र दोनों एक साथ गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए । जेल से छूटने पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूरी की । आजादी के समय इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ के अध्यक्ष भी  रहे  । जवाहरलाल नेहरू, महामना मदनमोहन मालवीय, आचार्य नरेंद्र देव आदि के संपर्क में आए और समाजवादी बन गए | उत्तर प्रदेश में 3  बार और एक बार उत्तराखंड के मुख्यमंत्री तथा केंद्र में लगभग हर महत्वपूर्ण विभाग के मंत्री रहे तिवारी  की राजनीतिक पारी राजनीती की पिच पर उनकी बैटिंग करने की टेस्ट मैच  स्टाइल को बखूबी बयां करती थी  । वित्त मंत्री  में तिवारी तूती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था  उनके दौर में  देश की विकास की विकास दर पहली बार दहाई  आंकड़े को पार गई  | 

 1951-52 के चुनाव में नैनीताल उत्तर सीट से पहली बार सोशलिस्ट  पार्टी के बैनर तले  तिवारी ने  चुनाव जीत कर सबको  चौंका  दिया | उस दौर को याद करें तो सही मायनों में कांग्रेस की हवा के बावजूद  तिवारी जी पहली बार विधानसभा पहुंचे  ।   उस चुनाव में 431 सदस्यीय  सदन में सोशलिस्ट  पार्टी के  20  सदस्य चुनाव जीत गए | 1965  में वह कांग्रेस के टिकट पर  विधान सभा का चुनाव  न केवल जीते बल्कि मंत्री परिषद में जगह बनाने में सफल हुए | 1968  में  जवाहरलाल  नेहरू युवा केन्द्र  स्थापना  तिवारी  योगदान को नहीं भुलाया जा सकता | 1969 -1971 में  कांग्रेस  के युवा संगठन  कमान भी जहाँ तिवारी जिम्मे आई वहीं   1 जनवरी 1976  में पहली  बार  उत्तर प्रदेश  मुख्यमंत्री बनने  गौरव तिवारी  को हासिल हुआ | दूसरी बार तिवारी  1984 और तीसरी बार 1988 में वह  उत्तर प्रदेश जैसे राज्य के मुख्यमंत्री रहे। 

  नैनीताल और उधमसिंहनगर  का पूरा इलाका  तिवारी का मजबूत गढ़ रहा  । अपने कार्यकाल में इस तराई के इलाके में तिवारी ने विकास की जो गंगा बहाई उसकी आज भी विपक्षी तारीफ़ किया करते हैं और जितना कुछ आज उत्तराखंड में  दिख रहा है यह सब तिवारी की ही देन है | अपने कार्यकाल में एन  डी तिवारी ने न केवल इस इलाके में सडकों का भारी जाल बिछाया बल्कि औद्योगिक इकाईयों की स्थापना से लेकर बुनियादी इन्फ्रास्ट्रेक्चर मुहैय्या करवाने में तिवारी के योगदान को आज भी नहीं भुलाया जा सकता शायद यही वजह है उनके विरोधी भी उनके राजनीतिक कौशल के कायल रहे  । नोएडा , ग्रेटर नोएडा, ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट ,   ट्रोनिका सिटी सरीखी परिकल्पनाएं जहाँ आज चकाचौंध अट्टालिकाओं में दिखता  है यह सब  तिवारी की  देन है | यही नहीं गंगा  यमुना  तहजीब से जुडी नवाबों  की नगरी लखनऊ के गोमतीनगर और इंदिरानगर सरीखे इलाके तिवारी जी  के बसाये  हुए हैं | 

एन डी तिवारी के सक्रिय  राजनीतिक जीवन की शुरुवात भी  नैनीताल की कर्मभूमि से ही हुई  । चालीस के दशक में जनान्दोलनों में सक्रिय  रहे तिवारी ने अपनी सियासी पारी को नई उड़ान इसी नैनीताल संसदीय इलाके ने जहाँ दी ,वहीँ स्वतंत्रता आंदोलन और आपातकाल  के दौर में भी तिवारी ने अपनी भागीदारी से अपनी राजनीतिक कुशलता को बखूबी साबित किया । नारायण दत्त तिवारी नब्बे  के दशक  में प्रधानमंत्री की कुर्सी से भी चूक गए थे । उस दौर को अगर याद करें तो नरसिंह राव ने चुनाव नहीं लड़ा लेकिन  नरसिंह  राव  पीएम बन गए । आज भी तिवारी के मन में  पी एम न बन सकने की कसक रही  |  1991  में नैनीताल बहेड़ी संसदीय  सीट से वह इसलिए चुनाव हार गए क्युकि चुनाव प्रचार के दौरान अभिनेता दिलीप कुमार ने बहेड़ी में सभा की | उनका असली नाम युसूफ मिया था और किसी ने अफवाह उड़ा दी कि युसूफ मियां की सिफारिश पर ही उन्हें टिकट मिला है | इससे लोगों में गलत सन्देश गया और उनके वोट कट गए |  अगर तिवारी नैनीताल में नहीं हारते तो शायद वह उस समय देश के प्रधानमंत्री बन जाते । 800  वोटों के मामूली अंतर  हुई  इस हार चलते तिवारी पीएम  कुर्सी के करीब आते आते फिसल गए  और नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने | 1995 में उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर  अपनी अलग पार्टी बनाई लेकिन सफल नहीं हो  सके और 2 बरस बाद ही घर वापसी कर  गए | 

    इसके बाद तिवारी की उत्तराखंड में मुख्यमंत्री के रूप में इंट्री वानप्रस्थ के रूप में 2002  में हुई । इसी वर्ष  उत्तराखंड के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के सत्ता में आने पर कांग्रेस आलाकमान ने  हरीश रावत को नकारकर एनडी तिवारी को  सरकार की बागडोर सौंपी थी |  तिवारी उस समय लोकसभा में नैनीताल सीट से ही सांसद थे लिहाजा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर रामनगर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और रिकार्ड जीत दर्ज कर उत्तराखंड में अपनी  धमाकेदार इंट्री की। तिवारी के तमाम राजनीतिक कौशल के वाबजूद उनके विरोधी तिवारी को राज्य आंदोलन के मुखर विरोधी नेता के रूप में आये   शायद इसकी बड़ी वजह तिवारी का अतीत में दिया गया वह बयान रहा जिसमे उन्होंने कहा था उत्तराखंड उनकी लाश पर बनेगा लेकिन इन सब के बीच नारायण दत्त तिवारी की गिनती विकास पुरुष के रूप में उत्तराखंड में होती रही तो  इसका सबसे बड़ा कारण यह था उन्होंने अपनी सरकार में विरोधियो के साथ तो लोहा लिया ही साथ ही विपक्षियो को भी अपनी अदा से खुश रखा शायद यही वजह रही  उस दौर में भाजपा पर मित्र विपक्ष के आरोप भी लगे और तिवारी ने जमकर लाल बत्तियां राज्य में बांटी  ।

 उत्तराखंड में 2002 विधानसभा चुनाव  के बाद उन्होंने  कोई चुनाव नहीं लड़ा लेकिन 2012 में हल्द्वानी, रामनगर, काशीपुर , विकासनगर,  किच्छा ,जसपुर, रुद्रपुर और गदरपुर में कांग्रेस के उम्मीदवारों के लिए  बड़े रोड शो करके वोट मांगे ।  2009  में  हैदराबाद राजभवन "सेक्स स्कैंडल" और  " रोहित  शेखर" पुत्र विवाद के बाद सियासत में  बेशक उनका सियासी कद घट जरुर गया और उनके अपने कांग्रेसियों ने उनसे दूरी बनाने में ही अपनी भलाई समझी | उत्तराखंड  में सोमनवारी बाबा का एक  किस्सा  तिवारी जी  बारे में खूब मशहूर रहा । तिवारी जब चार बरस  के थे तो सोमनवारी बाबा ने उन्हें आशीर्वाद दिया था कि यह बालक जीवन में कई ऊंचाइयां छुएगा। बाबा के आशीर्वाद से ऐसा हुआ भी लेकिन तिवारी की एक भूल से बाबा नाराज हो गए थे। उन्होंने शाप दिया कि वह  जीवन में ऊंचाइयां तो हासिल करेंगे, लेकिन अंतिम  मोड़ पर पिछड़ जाएंगे ।  सही मायनों  में अंतिम समय में तिवारी की राजनीति कुछ इसी करवट बैठी | हैदराबाद राजभवन "सेक्स स्कैंडल" और  " रोहित  शेखर" पुत्र विवाद के बाद भी तिवारी टायर्ड  नहीं हुए बल्कि देहरादून  में फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट का "अनंतवन "  फिर से उनकी नई राजनीति का नया  केंद्र बन गया  जहाँ से उन्होंने लखनऊ की तरफ अपने कदम बढ़ाये और अखिलेश सरकार को अपना मार्गदर्शन देने का  न केवल काम  किया बल्कि  यू पी के कई सरकारी विभागो की ख़ाक छानकर यह बता दिया अभी भी राजनीती तिवारी की रग रग में है  । भले ही कांग्रेस आलाकमान उनको भाव ना दे लेकिन वह  हर बड़े  और छोटे   नेता  को सलाह देने को  वह हमेशा तैयार रहे |    

 तिवारी की मौत के बाद देश की राजनीती के एक बड़े युग का अवसान हो गया |  योजना आयोग के उपाध्यक्ष , उद्योग , वाणिज्य , वित्त सरीखे भारी भरकम मंत्रालय संभालकर तिवारी ने सही मायनो में  अपनी विकास पुरुष की छवि को चमकाया  | निवेश के आसरे राजस्व बढ़ाने में तिवारी  को महारत हासिल थी और आजीवन तिवारी जी  ने अपनी  ऊर्जा विकास कार्यों को आगे बढ़ाने में लगा दी |   उनके बेटे  रोहित को अब  अपने पिता एन डी के विकासकार्यों को आगे बढ़ाना है | इसके लिए सबसे सही तरीका संवाद है और एन डी भी इस कुशलता के माहिर खिलाड़ी रहे हैं लिहाजा रोहित को भी आज चाहिए वह लोगों के बीच व्यक्तिगत तौर पर जाकर अपनी अलग पहचान खुद से बनाये और जनता से जुडी जमीनी राजनीती करें | वह इसमें कितना कामयाब होंगे यह तो आना वाला कल ही  बतायेगा लेकिन  उत्तराखंड में तिवारी जी की मौत से राजनीती  के बड़े युग का अवसान हुआ  है | 

Thursday, 19 July 2018

20 बरस का सूखा खत्म , फ्रांस फीफा चैम्पियन




फीफा विश्व कप के रोमांचक फाइनल में फ्रांस ने क्रोएशिया को 4-2 से हराकर दूसरी बार विश्व चैंपियन बनने का गौरव हासिल किया। फ्रांस ने 18वें मिनट में मारियो मैंडजुकिच के आत्मघाती गोल से बढ़त बनाई लेकिन इवान पेरिसिच ने 28वें मिनट में बराबरी का गोल दाग दिया। फ्रांस को  जल्द ही पेनल्टी मिली जिसे एंटोनी ग्रीजमैन ने 38वें मिनट में गोल में बदला जिससे फ्रांस मध्यांतर तक 2-1 से आगे रहा। पॉल पोग्बा ने 59वें मिनट में तीसरा गोल दागा जबकि किलियान एमबापे ने 65वें मिनट में फ्रांस की बढ़त 4-1 कर दी।  क्रोएशिया के हाथ से मौका निकल चुका था  तब मैंडजुकिच ने 69वें मिनट में गोल करके  उम्मीद जगाई। फ्रांस ने इससे पहले 1998 में विश्व कप जीता था। तब उसके कप्तान डिडियर डेसचैम्प्स थे जो अब टीम के कोच हैं। इस तरह से डेसचैम्प्स खिलाड़ी और कोच के रूप में विश्व कप जीतने वाले तीसरे व्यक्ति बन गए हैं। उनसे पहले ब्राजील के मारियो जगालो और जर्मनी फ्रैंक बेकनबऊर ने यह उपलब्धि हासिल की थी। क्रोएशिया पहली बार  फीफा  के फाइनल में पहुंचा लेकिन  जालटको डालिच की टीम को उप विजेता बनकर ही संतोष करना पड़ा। निसंदेह क्रोएशिया ने बेहतर फुटबाल खेली लेकिन फ्रांस ने प्रभावी  खेल दिखाया जिसके दम पर वह 20 साल बाद फिर चैंपियन बनने में सफल रहा। इस विश्व कप में क्रोएशिया की युवा खिलाडियों से सजी टीम ने  पूरी दुनिया को प्रभावित किया और हर मैच में अपने आकर्षक खेल से करोडो फ़ुटबाल प्रेमियों का दिल जीत लिया | विश्वकप मुकाबले में तीसरे स्थान पर बेल्जियम  रहा जिसने  इंग्लैंड को 2-0 की करारी शिकस्त देकर तीसरा स्थान अपने नाम किया | 

इस बार का फुटबॉल वर्ल्ड कप इसलिए भी खास है क्योंकि यूरोप की बड़ी-बड़ी टीमें  औंधे  मुँह गिर  गई  | पुर्तगाल , अर्जेंटीना, स्पेन , जर्मनी , ब्राज़ील  सेमीफइनल तक नहीं पहुंच  पाए  |  नीदरलैंड्स और इटली की टीमें  तो  क्वालिफाई ही नहीं कर पाई  वहीँ  जर्मनी ने ग्रुप स्तर पर ही मुकाबले से निकलकर सभी को चौंका दिया |  2010 की विजेता स्पेन और यूरोपियन चैंपियन पुर्तगाल की  भी टीमें इस बरस पिछड़ गयी |  गौर करने लायक बात  यह रही क्वार्टर फाइनल में पहुंचने वाली 6  टीमें यूरोप की रही |  पहले सेमीफाइनल मुकाबले में फ्रांस ने बेल्जियम को 1-0 से हरा दिया वहीँ  दूसरे सेमीफाईनल में इंग्लैंड को  क्रोएशिया ने धो डाला | सेमीफ़ाइनल में इंग्लैंड पर  विजय के बाद न केवल क्रोएशिया के  खिलाडियों के हौंसले बुलंद थे बल्कि इस जीत के बाद फ़ाइनल में वह फ्रांस  पर मनोवैज्ञानिक बढ़त बनाने की सोच रहे थे लेकिन फ्रांस की टीम से पार पाना उनके लिए आसान नहीं था |  फ्रांस  और  क्रोएशिया  के बीच खेले गए फ़ाइनल मैच का रोमांच फर्स्ट हाफ  तक  बना रहा  लेकिन फ़ाइनल में क्रोएशिया की टीम बहुत ज्यादा डिफेंसिव हो गई जिसके चलते अंतिम समय में टीम की रक्षापंक्ति बिखरती नजर आई | जहां क्रोएशियाई टीम पहली बार फीफा तक इस बरस  तक ​​पहुंची वहीँ  दूसरी ओर फ्रांस टीम तीसरी बार खिताबी मुकाबले में जगह बनाने में कामयाब रही । फ्रांस की टीम एक बार की फीफा चैंपियन भी है। उसने 1998 में ब्राजील को हराकर खिताब अपने नाम किया था। उस विश्व कप में क्रोएशिया पहली बार सेमीफाइनल में पहुंची थी। जहां उसे फ्रांस से हार का सामना करना पड़ा था । जर्मनी और इटली अब तक चार  बार फीफा का ताज अपने नाम कर चुके हैं |   जर्मनी की टीम 1954, 1974,  1990 ,2014 में फीफा चैम्पियन रही  वहीँ ब्राज़ील 1958, 1962, 1970, 1994, 2002  में 5 बार  फीफा चैम्पियन  रह चुका है  |  इंग्लैंड की टीम 1990 में फीफा विश्व कप सेमीफाइनल में पहुंची थी लेकिन वहां जर्मनी की टीम के खिलाफ उसे करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था  | इससे पहले इंग्लैंड सिर्फ एक बार 1966 में फाइनल में पहुंची जब फीफा का आयोजन इंग्लैंड में ही हुआ था |  इटली की टीम भी 1934, 1938, 1982, 2006 में चार बार फीफा का खिताब अपने नाम कर चुकी है |  उरुग्वे की टीम भी अब तक दो बार फीफा फाइनल जीत चुकी हैं | 


2018  के फीफा फाइनल मैच में भी मुकाबला बहुत रोमांचक रहा और फ्रांस  की टीम ने क्रोएशिया  की टीम को कड़ी टक्कर दी शायद यही वजह रही क्रोएशिया गोल बनाने के कई मौको को गंवाती नजर आई  वहीँ  क्रोएशिया की  रक्षा पंक्ति को कई मौकों पर रोककर फ्रांस  ने  अपनी पकड़ मजबूत की | हाफ टाइम के बाद हुए 2  फटाफट गोलों ने फाइनल मैच का पूरा सीन बदल डाला | इस विश्व कप में क्रोएशिया  की टीम  की ख़ास बात यह रही हर मैच में इसका डिफेन्स बहुत अच्छा रहा | तकरीबन 7   से 8  खिलाड़ी हर मैच में चले लेकिन फाइनल में टीम पर दबावों का ऐसा पहाड़ खड़ा हो गया जिसके बोझ तले वह अपना वास्तविक खेल खेलने में नाकाम रहे | फ़ाइनल मैच देखने रूस  पहुचे  क्रोएशिया  के करोडो समर्थको को यकीन ही नहीं हो रहा था क्या यह वही टीम है  जो अपने लाजवाब खेल के लिए इस विश्वकप में जानी जा रही थी  | फाइनल मैच के अंतिम हाल्फ  में पोग्बा और  एमबापे की सधी रणनीति के आगे क्रोएशिया  मौका चूक गया जबकि मैच ख़त्म  होने में   काफी समय बचा था | खेल में किसी भी खिलाडी का दिन होता है और फ़ाइनल क्रोएशिया  का दिन नहीं था और उनके करोडो समर्थक उनके प्रदर्शन से निराश हो गए | क्रोएशिया की किस्मत ने भी  इस बरस के फीफा फाइनल मुकाबले में उसका साथ नहीं दिया। 

फाइनल मैच का पहला गोल फ्रांस ने किया लेकिन यह आत्मघाती गोल था, जो क्रोएशिया के मारियो मंडुजुकिच ने किया। गौरतलब है कि मंडुजुकिच के गोल से ही क्रोएशिया ने सेमीफाइनल में इंग्लैंड को 2-1 से हराने में कामयाबी पायी थी। यह विश्व कप के फाइनल में हुआ पहला आत्मघाती गोल था, जिसने क्रोएशिया को निराश कर दिया। इसी गोल से फाइनल मैच में क्रोएशिया की उल्टी गिनती शुरू हो गई। हालांकि ईवान पेरीसिच ने शानदार गोल ठोक क्रोएशिया को बराबरी करने का मौका दिया, लेकिन भाग्य एक बार फिर क्रोएशिया से रूठा रहा। पहले हाफ में जबरदस्त खेलने वाली क्रोएशिया की टीम दूसरे हाफ में फ्रांस द्वारा किए गए दो गोल के सामने बिखर गई और पहले खिताब से चूक गई|  क्रोएशियाई फुटबॉल टीम आखिरी बार 1998 में फीफा विश्व कप में इतना आगे तक आई थी। फ्रांस में हुए उस विश्व कप के दौरान क्रोएशियाई टीम तीसरे पायदान पर रहने में सफल रही थी जहां उनके स्टार खिलाड़ी डेवर सूकर को गोल्डन बूट का पुरस्कार भी मिला था। जब भारत में बाजार को मुक्त करने की बात चल रही थी तो क्रोशिया अपने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहा था। विश्व के मानचित्र में स्वतंत्र देश के रूप में दर्ज हुए क्रोएशियाई  को करीब 3 दशक हो गए हैं इसके बावजूद इस देश को बहुत कम लोग जानते हैं। 

फ्रांस की टीम ने 20  बरस के लम्बे इन्तजार के बाद इतिहास में अपना नाम दर्ज कर दिया | इस विश्व कप में क्रोएशिया  के पास मूलर, क्लोजा , ओजिल सरीखे खिलाडियों की तिकड़ी थी जो किसी भी पल मैच का रुख अपनी तरफ मोड़ने में कामयाब रही थी लेकिन फाइनल में सारे सूरमा विपक्षियो के आगे फीके पड़ गए |  इस बार भाग्य ने फीफा  फाइनल में फ्रांस  के खिलाडियों का साथ बखूबी दिया और फ़ाइनल में खिलाडियों की टीम स्प्रिट ने एक नया जज्बा जगाया जिसको क्रोशिया की टीम सही से हैंडल करने में कामयाब नहीं हुई | हार के बाद मायूसी क्रोशिया  के खिलाड़ियों के  चेहरे पर साफ़ झलक रही थी | भले ही क्रोशिया इस बार फीफा  जीतने में कामयाब नहीं हो पाया  लेकिन युवा जोश से लबालब  भरी इस टीम ने दुनिया  के दिल पर क्रोशिया के लिए जगह बना दी | 

2018  का  फीफा विश्वकप कई मायनों में इस बार खास रहा | मैचो में रोमांच बना रहा और जर्मनी , अर्जेंटीना , पुर्तगाल सरीखी टीमों की   प्री  क्वार्टर फाइनल मैच में ही विदाई हो गयी | वहीँ  क्रोएशिया ने कई टीमों का बोरिया बिस्तरा बाध दिया और अपनी ख़ास छाप छोड़ी  | क्वार्टर फाइनल में  उरुग्वे ,  बेल्जियम , ब्राजील , स्वीडन , इंग्लैंड , रूस  ने पहुंचकर सभी को चौंकाया |  लेकिन इसके बाद उनकी आगे की डगर कठिन हो गयी | इस बार फीफा में कई सितारे जहाँ बुलंदियों के शिखर पर जा पहुचे वहीँ कई ऐसे भी रहे जिनका जादू फीका रहा | कैलाइन  एमबापे  ,हैरी कैन, डैनिश चेरिशेव , पावर्ड , डैनिजल  सुबासिक  , लुका  मॉड्रिक ने जहाँ प्रशंसको के दिलो में अपनी जगह बनाई वहीँ रोनाल्डो,  मार्सेलो , मिरांडा,  मैसी , रोनाल्डो , नेमार , सिल्वा, पेपे , डिएगो गोडिन , पाल पोग्बा , रामोस सरीखे खिलाडियों की चमक फीफा में फीकी पड़ी |  एमबापे,  टोनी ग्रीजमेन , गोलोविन भविष्य की  उम्मीद बन सकते हैं यह इस बार के फीफा ने दिखा दिया | 

रूस  ने अपने शानदार आयोजन से इस विश्व कप को यादगार बना दिया | रूस  में विश्व कप के दौरान खास तरह का चकाचौंध देखने को मिला | पूरा शहर रात में रौशनी से नहाया लग रहा था |  टिकट को लेकर मारामारी भी खूब मची और फाइनल में तो टिकटों की कालाबाजारी भी चरम पर पहुच गयी जहाँ टिकट पाने के लिए लोगो को अपनी जेबें भी गरम करनी पड़ी |  एशिया में भी फीफा का जलवा देखने को मिला | लोगो ने जमकर देर रात तक जागकर  टी वी स्क्रीनों में  मैच का लुफ्त उठाया | भारत में भी करोडो लोगो ने इस बार फीफा के मैचो का आनंद अपने घर में लिया और बता दिया क्रिकेट के अलावे  फ़ुटबाल  की दीवानगी भी यहाँ सर चढ़कर  बोल रही है |  ‘क्रिकेट चालीसा’ टी वी में अब तक चलाते रहे भारतीय समाचार चैनलों ने भी पहली बार फुटबाल विश्व कप के मैचो को लेकर अपने विशेष प्रोग्राम चलाये जिस कारण लोगो में फुटबाल के मैचो को लेकर विशेष उत्सुकता देखने को मिली |  

भारतीय टी वी चैनलों का यह संकेत खेलो की सेहत के लिए कम से कम बहुत अच्छा  कहा जा सकता है |  अगर क्रिकेट से इतर अन्य खेलो के लिए मीडिया इसी तरह की कवरेज को प्रमुखता दे तो सभी खेलो के ‘अच्छे दिन `’ जल्द  आ सकते हैं |  क्रोएशिया ने भारत के लिए यह आइना दिखाया है कि एक ऐसा देश जिसकी आबादी दिल्ली की आबादी से भी आधी है जब वह  फीफा के फाइनल तक अपनी युवा  टीम के बूते पहुँच सकता है तो वहीँ सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश  जिसकी  सबसे बड़ी युवा ताकत है उस भारत में फुटबॉल को प्रोत्साहन कब मिलेगा? 

Friday, 5 January 2018

कब सुधरेगा पाकिस्तान ?



पाकिस्तान ने एक बार फिर अपना घिनौना  चेहरा पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया है  । बीते बरस  31 दिसम्बर को तड़के 2 बजे भारतीय सुरक्षाबलों पर हमले की कड़ी में अंडर बैरल ग्रेनेड लांचरों तथा स्वचालित हथियारों से लैस पाकिस्तानी आतंकवादियों ने पुलवामा जिले के लेथपुरा क्षेत्र में सी.आर.पी.एफ. के ट्रेनिंग सैंटर पर हमला करके 5 जवानों को शहीद और 3 जवानों को घायल कर दिया।

 आतंकवादी खतरे व संभावित हमले के इनपुट के बावजूद आतंकवादी अत्यधिक पहरे वाले सिक्योरिटी कैम्प पर हमला करने में सफल हो गए। इस हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली और बीते 4 महीनों में यह तीसरा हमला है जब जैश के फिदायीनों ने सुरक्षा कैम्पों का घेरा तोड़ा। जैश के प्रवक्ता  ने कहा है कि 3 फिदायीनों ने नूर मोहम्मद तांत्रे और तलहा रशीद की हत्या का बदला लेने के लिए सी.आर.पी.एफ. कैम्प पर हमला किया था। उधर  पुलिस महानिदेशक एस पी वैद ने बताया कि सुरक्षा बलों को पिछले तीन दिनों से कश्मीर घाटी में आतंकी हमले के बारे में खुफिया सूचनाएं मिल रही थी  शायद उन्हें पहले घुसने का मौका नहीं मिला। इसलिए उन्होंने रात को हमला किया |  ऐसा करके पाक ने  एक बार फिर  आतंक का अपना चेहरा पूरी दुनिया के सामने उजागर कर दिया ।  

असल में इस कार्यवाही ने एक बार फिर साबित कर दिया है पाक में भले ही शाहिद अब्बासी  की अगुवाई में सरकार चल रही  है लेकिन अभी भी कमोवेश वैसी ही स्थितियां हैं जैसी पहले हुआ करती थी । आज भी पाक में चलती है तो सेना और चरमपंथियों  की  और  उसके बिना पत्ता तक नहीं  हिलता |   भले ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाक के नेता  खुद को आतंक से प्रभावित देश बताते हुए भारत के साथ  सम्बन्ध सुधारने की दुहाई देते रहते हो लेकिन पुलवामा जिले के लेथपुरा क्षेत्र की इस कार्यवाही के शुरुवाती संकेत तो यही कहानी कह रहे हैं इस कार्यवाही को पाक के कट्टरपंथियों और आतंकियों का खुला समर्थन था जो भारत के साथ सम्बन्ध किसी कीमत पर ठीक नहीं होने देना चाहते हैं और आज भी  कश्मीर को अस्थिर करने  की नापाक कोशिश करने में लगे हैं । लगता नहीं है  बिना सेना को भरोसे में लिए फिदायीनों  ने इसे अंजाम दिया  | 
   
भारतीय  जवानों के  साथ की गई  कार्यवाही ने हमें यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया है अब पाक  के साथ दोस्ती का आधार क्या हो वह भी तब जब वह लगातार भारत की पीठ पर छुरा भौंकते  हुए लगातार विश्वासघात ही करता जा रहा है । इस दुस्साहसिक कारवाई  की जहाँ पूरे देश में निंदा  हुई है वहीँ आम आदमी अब भारतीय नीति नियंताओ से सीधे सवाल पूछ रहा है कि अब समय आ गया है जब पकिस्तान  को अंततरराष्ट्रीय मंचो पर लताड़कर काम नहीं बनने वाला | उसे लेकर कोई ठोस नीति बनानी ही होगी |  पठानकोट के बाद अब तक का यह सबसे बड़ा हमला है जिसमे कठघरे में सीधे पाक खड़ा है । हमेशा की तरह  अगर इस बार  भी केंद्र सरकार  धैर्य धारण करने के  लिए कदमताल करने की सोचेगी  तो यह सही  नहीं होगा क्युकि  लगातार होते हमलो से हमारा  धैर्य अब जवाब दे रहा है । 

 इस घटना से पाक की मंशा धरती के स्वर्ग कश्मीर में उन्माद फैलाने की ही रही है | ऐसे हमलों के जरिये पाक अपनी स्टेट पालिसी के तहत कश्मीर में उन्माद का वातावरण पूरी दुनिया को दिखाना चाहता है ।   सभी आतंकी  जम्मू-कश्मीर में अशांति फैलाना चाहते थे और इन्होंने इसी मकसद से हमले को अंजाम दिया  । बुरहान वाणी के मारे जाने के बाद  से ही कश्मीर  में हिंसा का दौर जारी है और ताजा हमले ने पाक की संलिप्तता को फिर से उजागर कर दिया है जहाँ गृह मंत्रालय से जुड़े लोगों की जानकारी से स्पष्ट हो रहा है कि यह जैश का ही फ़िदायीन दस्ता था जिसका मकसद भारतीय सैनिकों के मनोबल को तोडना था | वैसे आतंरिक सुरक्षा पर  एक अलर्ट आई बी ने जारी किया था इसके बाद भी  नए बरस से  पहले  हमला कई सवालों को मौजूदा दौर में खड़ा कर रहा है | आखिर अलर्ट के बाद भी आतंकी बेस कैम्प तक कैसे पहुंचे यह अपने में बड़ा सवाल बन गया है जिसकी पड़ताल नए सिरे से गृह मंत्रालय को करने की जरूरत है | 

आतंकवादी खतरे व संभावित हमले के इनपुट के बावजूद आतंकवादी अत्यधिक पहरे वाले सिक्योरिटी कैम्प पर हमला करने में सफल हो गए। गुप्तचर विभाग द्वारा दी गई पूर्व चेतावनी के बावजूद  अगर यह हमला  हुआ है तो नए सिरे से  हमें फिदायीनों की रणनीति पर  गौर करने की जरूरत है | अनेक सवालों के जवाब तो जांच के बाद ही मिल पायेंगे लेकिन इस हमले ने एक बार फिर पाक को कठघरे में खड़ा कर दिया है क्युकि पठानकोट की तर्ज पर आतंकी सीमा पार से ही आये |

        असल में  कारगिल  के दौर में भी पाक  ने भारत के साथ ऐसा ही सलूक किया था  ।  हमारे प्रधानमंत्री वाजपेयी रिश्तो  में गर्मजोशी लाने लाहौर बस से गए लेकिन  नवाज  शरीफ  को अँधेरे में रखकर मिया मुशर्रफ  कारगिल की पटकथा तैयार करने में लगे रहे । इस काम में उनको पाक की सेना का पूरा सहयोग मिला था । इस बार की कहानी भी पिछले बार से जुदा नहीं है ।  उरी  में भी  पाक की  सेना  का  फिदायीन आतंकियों को  पूरा समर्थन रहा और अभी भी आतंकियों को हुक्का पानी पाक की सेना  ही मुहैया करवाती है |  पाक में सरकार तो नाम मात्र की है पर  वहां पर चलती सेना की ही है और बिना सेना के वहां पर पत्ता भी नहीं हिलता   । 

कट्टरपंथियों की बड़ी जमात वहां ऐसी है जो भारत के साथ सम्बन्ध सुधरते नहीं देखना चाहती है और कश्मीर को किसी भी तरह अंतर्राष्ट्रीयकरण करना चाहती है ।आखिर कब तक  हमारे जवान सीमा में मारे जायेंगे ? पाक अभी तक  हर मोर्चे पर वह हमको धोखा ही धोखा देता आया है । इस घटना के बाद हमारे नीतिनियंताओ को यह सोचना पड़ेगा  अविश्वास की खाई  में दोनों मुल्को की दोस्ती में दरार पडनी  तय है । अतः अब समय आ गया है जब हम अपने सब्र का बाँध तोड़ें और  ईंट का जवाब ईट से दें । 

  मुंबई  में 26/11 के हमलो में भी पाक की संलिप्तता पूरी दुनिया के सामने ना केवल उजागर हुई थी बल्कि पकडे गए आतंकी कसाब ने  यह खुलासा  भी किया हमलो की साजिश पाकिस्तान में रची गई जिसका मास्टर माइंड हाफिज मोहम्मद  सईद  था । हमने पठानकोट हमलो के पर्याप्त सबूत पाक को सौंपे भी लेकिन आज तक वह इनके दोषियों पर कोई कार्यवाही नहीं कर पाया  । आतंक का सबसे बड़ा मास्टर माईंड हाफिज पाकिस्तान में खुला घूम रहा है और  पार्टी बनाने की तैयारियों में  लगा हुआ है  | वह भारत  के खिलाफ लोगो को जेहाद छेड़ने के लए उकसा भी रहा है लेकिन आज तक हम पाक को हाफिज के मसले पर ढील ही देते रहे हैं  यही कारण  है वहां की सरकार  उसे पकड़ने में नाकामयाब रही है । 

 2001 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हमले के बाद उसके जमात उद  दावा ने  कश्मीर के ट्रेंनिग कैम्पों में घुसकर युवको को  जेहाद के लिए प्रेरित किया । अमेरिका द्वारा उसके संगठन  को प्रतिबंधित  घोषित  करने  और उस पर करोडो डालर के इनाम रखे जाने के बाद भी पाकिस्तान  सरकार  ने उसे कुछ दिन लाहौर की जेल में पकड़कर रखा और जमानत पर रिहा कर दिया । आज  पाकिस्तान  उसे   पाक में होने को सिरे से नकारता रहा है जबकि असलियत यह है कि बुरहान की मौत के बाद लगातार वह भारत के खिलाफ जहर उगल रहा है और खुले आम घूम रहा है ।

  भारतीय गृह मंत्रालय तो हमेशा उसको ना पकड़ सकने का रोना रोता रहा है ।   भारत के खिलाफ  होने वाली हर  साजिश  को अंजाम देने में उसे पाक की सेना और कट्टरपंथी सगठनों  का पूरा सहयोग मिल रहा है । यह तो बानगी भर है | जैश , हिज्बुल और लश्कर का पाक में बड़ा नेटवर्क है | किसी भी बड़ी आतंकी घटना के तार सीधे इन्ही संगठनों से मिलते है और ये खुद ही आतंकी हमलों में अपनी संलिप्तता से पीछे नहीं हटते |   26 / 11 के हमलो के बाद भारत ने  जहा कहा था जब तक 26 /11 के दोषियों पर पाक  कार्यवाही नहीं करेगा तब तक हम उससे कोई बात  नहीं  करेंगे लेकिन आज तक उसके द्वारा दोषियों पर कोई कार्यवाही ना किये जाने के बाद भी हम उस पर कोई कार्यवाही नहीं कर पा  रहे हैं तो यह हमारी लुंज पुंज विदेश नीति वाले रवैये को उजागर करता है ।  

अब तो  हर घटना में अपना  हाथ होने से इनकार करना पाक का शगल ही बन गया है । लाइन ऑफ़ कंट्रोल में अक्सर  सैनिको के बीच  तनाव देखा जा सकता है और फायरिंग की घटनाएं आये  दिन होती रहती हैं । भारतीय सेना में घुसपैठ की कार्यवाहियां अब पाक की सेना आतंकियों के साथ लगातार कर  रही है जो पठानकोट के बाद उरी और अब पुलवामा के हमले में साफतौर पर उजागर हो गयी है । उसे लगता है कश्मीर में अगर हिंसा का ऐसा ही तांडव जारी रहा तो आने वाले दिनों में दुनिया की नज़रों में  कश्मीर  आ जायेगा । अतः ऐसे हालातो में वह अब लश्कर और हिजबुल मुजाहिदीन और जैश  जैसे संगठनो को पी ओ  के  में भारत के खिलाफ एक  बड़ी जंग लड़ने के लिए उकसा रहा  है जिसमे कई कट्टरपंथी संगठन उसे मदद कर रहे हैं । 

पाक की राजनीती का असल सच किसी से छुपा नहीं है । वहां पर सेना कट्टरपंथियों का हाथ की कठपुतली ही  रही है । सरकार तो नाम मात्र की लोकत्रांत्रिक  है  असल नियंत्रण तो सेना का हर जगह है ।  पाक  यह महसूस कर रहा है अगर समय रहते उसने भारत के खिलाफ अपनी जंग शुरू नहीं की तो कश्मीर का मुद्दा ठंडा पड  जायेगा । अतः वह भारतीय सेना को अपने निशाने पर लेकर कट्टरपंथियों की पुरानी  लीक पर चल निकला है । कश्मीर का राग पाक का पुराना राग है जो दोस्ती के रिश्तो में सबसे बड़ी दीवार है । ऐसे दौर में हमें पाक पर ज्यादा ध्यान देने की जरुरत है । 

हमारी सेना को ज्यादा से ज्यादा अधिकार सीमा से सटे इलाको में मिलने चाहिए साथ ही कश्मीर को अब पूरी तरह सेना के हवाले किये जाने की जरूरत है । पाक अधिकृत क्षेत्रों में आतंकवादियों ने लगातार जम्मू-कश्मीर में हिंसा का तांडव जारी रखा हुआ है | हमारे सुरक्षाबलों पर लगातार हमले का दौर पहले भी चल रहा था आज भी हालात जस के तस ही हैं ।   बीते बरस ही जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों के कम से कम 86 सदस्य और 97 सिविलियन मारे गए हैं जो खासी चिंता का विषय है | 

पुलवामा  के हमले के बाद अब भारत को पाक के साथ सख्ती से पेश आना चाहिए । उसे किसी तरह की ढील नहीं मिलनी चाहिए । पाक  हमारे धैर्य  की परीक्षा ना ले अब ऐसे बयान देकर काम नहीं चलने वाला क्युकि  इस घटना ने हमारे  सैनिकॊ  के मनोबल को   गिराने का काम किया है । पाक के साथ भारत को अब किसी तरह की नरमी नहीं बरतनी चाहिए और कूटनीति के जरिये अंतर्राष्ट्रीय स्तर  पर उसके खिलाफ माहौल बनाना  चाहिए  साथ ही अमेरिका सरीखे मुल्को से बात कर पाक के खिलाफ ठोस ऐक्शन लेने की जरूरत है  | 

आतंक के असल सरगना पाकिस्तान  में  पल रहे हैं और आतंकवाद के नाम पर दी जाने वाली हर मदद का इस्तेमाल पाक दहशतगर्दी फैलाने में कर रहा है ।  अगर पाक को विदेशो से मिलने वाली मदद इस दौर में बंद हो जाए तो उसका दीवाला निकल जायेगा । ऐसी सूरत में कट्टरपंथियों के हौंसले भी पस्त हो जायेंगे । पाकिस्तान के आतंक को भारत लगातार झेल रहा है अब दुनिया भी इसे समझ रही है |  नए साल पर  राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्वीट किया कि  पिछले 15 सालों में अमेरिका ने 33 बिलियन डॉलर पाकिस्तान को देकर बेवकूफी की है | बदले में उन्होंने हमें सिर्फ झूठ और धोखा दिया है, हमारे नेताओं को बेवकूफ बनाते हुए |  जिन आतंकियों को हम अफगानिस्तान में मारते हैं उन्हें वो अपनी जमीन पर पनाह देता है |  

इस ट्ववीट के गंभीर मायने हैं और कहा जा रहा है अमरीका पाक की साढ़े 22 करोड़ डॉलर की सहायता रोक सकता है | अगर सच में ऐसा हुआ तो यह पाक पर अमरीका का सबसे बड़ा निर्मम प्रहार होगा | अमरीकी मदद का पाक ने बेजा इस्तेमाल शुरू से आतंक की फैक्ट्रियो को पालने पोसने में ही किया है । ट्रम्प  ने नए साल पर पाकिस्तान को करारा झटका दिया है। अमेरिका ने पाकिस्तान को झूठा और धोखेबाज करार देते हुए कहा है कि पाकिस्तान को अरबों डॉलर की सहायता देना मूर्खतापूर्ण फैसला था और अब उसे कोई मदद नहीं दी जाएगी।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नेनववर्ष की शुरुआत के साथ लंबे समय से दोस्त रहे पाकिस्तान पर तीखा हमला किया। ट्रंप ने कहा कि जिन आतंकवादियों को हम अफगानिस्तान में तलाश रहे हैं, उन्हें पाकिस्तान अपने यहां सुरक्षित पनाह दे रखा है। आतंकवाद के खात्मे के नाम पर पाक सरकार को हर बरस अमरीका से करोड़ों रुपये की मदद मिली  जिसने  पाक के लिए टानिक का काम करना शुरू किया | जिस कारण विकास के मोर्चे पर हिचकोले खा रही पाक  की अर्थव्यवस्था  मे नई जान आई है वरना पाक की अर्थव्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर जाती | अब अगर ट्रम्प पाक को लेकर अपनी नई घेराबंदी करते हैं तो इससे भारत की कूटनीतिक जीत के तौर पर देखना होगा क्युकि ओबामा और उससे पहले के दौर में अमरीका का पाक के प्रति नजरिया दोस्ताना सरीखा रहा है |

  यह पहला मौका है जब पाकिस्तान पर भारत और अफगानिस्तान दोनों देशों के खिलाफ आतंकियों को पनाह देने का आरोप अमरीका ने लगाए हैं वहीँ  आज तक हमने पाक के हर हमले का जवाब बयानबाजी से ही दिया है । भारत सरकार धैर्य , संयम  की दुहाई देकर हर बार लोगो के सामने सम्बन्ध सुधारने की बात दोहराती रहती है ।  इसी नरम रुख से पाक का दुस्साहस इस कदर बढ  गया है  कभी वह  पठानकोट तो कभी उरी  तो कभी पुलवामा में हमारे जवानो को निशाना बनाता है और कश्मीर पर मध्यस्थता का पुराना राग छेड़ता  रहता है ।

भारत की कोशिश अब यह होनी चाहिए में पाक को बेनकाब कर उसका हुक्का पानी बंद करवाते हुए  उसे एक आतंकी देश घोषित करवाए । अगर ऐसा होता है तो यह मोदिनोमिक्स की विदेश नीति की बड़ी जीत होगी |